{
    "_id": "BG9.5",
    "chapter": 9,
    "verse": 5,
    "slok": "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् |\nभूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ||९-५||",
    "transliteration": "na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram .\nbhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ ||9-5||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।9.5।। और (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "9.5 Nor do beings exist in Me (in reality); behold My divine Yoga, supporting all beings, but not dwelling in them, is My Self, the efficient cause of beings.",
        "ec": "9.5 न not? च and? मत्स्थानि dwelling in Me? भूतानि beings? पश्य behold? मे My? योगम् Yoga? ऐश्वरम् Divine? भूतभृत् supporting the beings? न not? च and? भूतस्थः dwelling in the beings? मम My? आत्मा Self? भूतभावनः bringing forth beings.Commentary Brahman or the Self no connection with any object as It is very subtle and attributes and formless and so It is unattached (Asanga). There cannot be any real connection between matter and Spirit. Saakara (an object with form) can have no connection with Nirakara (the formless). How could this be Devoid of attachment It is never attached. (Brihadaranyaka Upanishad? III.9.26) Though unattached? It supports all beings It is the efficient or instrumental cause It brings forth all beings but It does not dwell in them? because It is unconnected with any object. This is a great mystery. Just as the dreamer has no connection with the dream object? just as ether or air has no connection with the vessel? so also Brahman has no connection with the objects or the body. The connection between the Self and the physical body is illusory.The Adhishthana or support (Brahman) for the illusory object (Kalpitam) superimposed on,Brahman has no connection whatsoever with the alities or the defects of the objects that are superimposed on the Absolute. The snake is superimposed on a rope. The rope is the support (Adhishthana) for the illusory snake (Kalpitam). This is an example of superimposition or Adhyasa. (Cf.VII.25X.7.XI.8)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "9.5 Nevertheless, they do not consciously abide in Me. Such is My Divine Sovereignty that though I, the Supreme Self, am the cause and upholder of all, yet I remain outside."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।9.5।। पूर्व श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि समस्त भूत अर्थात् सम्पूर्ण चराचर सृष्टि उनमें स्थित है? परन्तु वे उसमें नहीं हैं। उसी विषय के तर्क की अगली कड़ी बताते हुए वे अब कहते हैं कि वस्तुत? वे भूत मुझमें स्थित नहीं हैं? अर्थात् अनन्त से सान्त की उत्पत्ति कभी नहीं हुई  स्तम्भ और प्रेत के दृष्टान्त का पुन उपयोग करते हुए? भगवान् की उक्ति स्तम्भ के इस कथन के तुल्य होगी कि? वास्तव में? मुझ विद्युत् स्तम्भ में प्रेत का अस्तित्व कदापि नहीं था। अनन्त स्वरूप शुद्ध चैतन्य परमात्मा में इस नानाविध जगत् का अस्तित्व न कभी था? न अब है और न कभी होगा। जाग्रत पुरुष के लिए स्वप्न के भोग कभी उपलब्ध नहीं होते। संक्षेप में? आत्मानुभव में इस नानाविध सृष्टि का दर्शन नहीं होता। वर्तमान में इसकी प्रतीति का कारण अज्ञानरूप आत्मविस्मृति है।यह आत्मा भूतमात्र को उत्पन्न करने वाला और उसका धारकपोषक है? जैसे? समस्त तरंगों का जन्मदाता और धारणपोषण करने वाला समुद्र है और फिर भी? मैं उनमें (भूतों में) स्थित नहीं हूँ। कैसे  जैसे? समुद्र तरंगों में नहीं रहता अर्थात् उसके परिच्छेदों से सदा मुक्त रहता है। समस्त घटों की उत्पत्ति? स्थिति और धारण मिट्टी से ही है? तथापि उनमें से कोई एक घट अथवा घटसमुदाय न तो मिट्टी को परिभाषित कर सकता है और न उसके सम्पूर्ण ज्ञान को करा सकता है। दिव्य? सनातन शुद्ध चैतन्य स्वरूप परमात्मा ही वह अधिष्ठान है? जो इस नित्य परिवर्तनशील विविधरूप सृष्टि के विस्तृत हृदय को धारण और प्रकाशित करता है।ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों के ग्रहण से मन में विषयाकार वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं? जिन्हें सर्वरूपों में स्थित चैतन्य आत्मा प्रकाशित करता है। यदि यह चैतन्य न होता तो हमें अखण्ड अनुभवों की धारा के रूप में जीवन का कभी भान भी नहीं हो सकता था। जैसे कपड़े में कपास है? आभूषणों में स्वर्ण और अग्नि में उष्णता है? वैसे ही क्षर सृष्टि में अक्षर तत्त्व है। जाग्रत पुरुष के बिना स्वप्नद्रष्टा नहीं हो सकता जाग्रत पुरुष स्वप्न जगत् को व्याप्त किये रहता है? परन्तु वह स्वप्न से कभी दूषित या लिप्त नहीं होता और? जाग्रत पुरुष की दृष्टि से स्वप्न का अस्तित्व कभी होता ही नहीं।भगवान् श्रीकृष्ण यह अनुभव करते हैं कि विरोधाभास की यह भाषा अर्जुन जैसे सामान्य पुरुषों के लिए एक पहेली सिद्ध हो रही है? इसलिए करूणासागर भगवान् अपने शिष्य के लिए एक दृष्टान्त देते हैं --"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "9.5. Yet, the beings do not exist in Me.  Look at the Sovereign Yoga of Mine.  My Self is the sustainer of the beings, does not exist in beings, and cuases beings to be born."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "9.5 And yet beings do not abide in Me. Behold My divine Yoga. I am the upholder of all beings and yet I am not in them. My will alone causes their existence."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "9.5 Nor do the beings dwell in Me. Behod My divine Yoga! I am the sustainer and originator of beings, but My Self is not contained in the beings."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।9.5।।मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि न तथा मयीत्याह -- न चेति।न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च [म.भा.12।339।21] इति हि मोक्षधर्मे।संज्ञासंज्ञः [म.भा.12।338।47] इति च। ममात्मा देह एव भूतभावनः।महाविभूतेर्माहात्म्यशरीरइति इति मोक्षधर्मे [म.भा.12।338।17475]।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।9.5।।परमेश्वरस्य भूतेषु स्थित्यभावेऽपि भूतानां तत्र स्थितिरास्थितेति कुतोऽसङ्गत्वं तत्राह -- अतएवेति। नचेत्यत्र चकारोऽवधारणार्थः। भूतानामीश्वरे नैव स्थितिरित्यत्र हेतुमाह -- पश्येति। आत्मनोऽसङ्गत्वं,स्वरूपमित्यत्र प्रमाणमाह -- तथाचेति। असङ्गश्चेदीश्वरस्तर्हि कथं मत्स्थानि भूतानीत्युक्तं कथं च तथोक्त्वा नच मत्स्थानीति तद्विरुद्धमुदीरितमित्याशङ्क्याह -- इदं चेति। तर्हि भूतसंबन्धः स्यादिति नेत्याह -- नचेति। यथोक्तेन न्यायेन। असङ्गत्वेनेति यावत्। असङ्गतया वस्तुतो भूतासंबन्धेऽपि कल्पनया तदविरोधान्न मिथोविरोधोऽस्तीति भावः। आत्मनः सकाशादात्मनोऽन्यत्वायोगात्कुतः संबन्धोक्तिरित्याशङ्क्याह -- असाविति। (विभज्येति)। यथा लोको वस्तुतत्त्वमजानन्भेदमारोप्य ममायमिति संबन्धमनुभवति न तथेह संबन्धव्यपदेश आत्मनि स्वतो भेदाभावादतो भेदेऽसत्येव लोके संबन्धबुद्धिदर्शनमनुसरन्भगवानात्मनो देहादिसंघातं विभज्याहंकारं तस्मिन्नारोप्य असौ ममात्मेति भेदं व्यपदिशति। तथाच संघातस्य ममेति व्यपदेशात्ततो नि(कृ)ष्कृष्टस्य स्वरूपस्यात्मशब्देन निर्देशान्न भूतस्थोऽसावित्यर्थः। पूर्वोक्तासङ्गत्वाङ्गीकारेणैवात्मा भूतानि भावयतीत्याह -- तथेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।9.4 -- 9.5।। यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मेरेमें स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।",
        "hc": "।।9.5।। व्याख्या--'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना'--मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे जिसका ज्ञान होता है, वह भगवान्का व्यक्तरूप है और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियोंका विषय नहीं है अर्थात् मन आदि जिसको नहीं जान सकते, वह भगवान्का अव्यक्तरूप है। यहाँ भगवान्ने 'मया' पदसे व्यक्त(साकार) स्वरूप और,'अव्यक्तमूर्तिना' पदसे अव्यक्त-(निराकार-) स्वरूप बताया है। इसका तात्पर्य है कि भगवान् व्यक्तरूपसे भी हैं और अव्यक्तरूपसे भी हैं। इस प्रकार भगवान्की यहाँ व्यक्तअव्यक्त (साकारनिराकार) कहनेकी गूढ़ाभिसन्धि समग्ररूपसे है अर्थात् सगुणनिर्गुण, साकारनिराकार आदिका भेद तो सम्प्रदायोंको लेकर है, वास्तवमें परमात्मा एक हैं। ये सगुणनिर्गुण आदि एक ही परमात्माके अलगअलग विशेषण हैं, अलगअलग नाम हैं।\n\nगीतामें जहाँ सत्असत्, शरीरशरीरीका वर्णन किया गया है, वहाँ जीवके वास्तविक स्वरूपके लिये आया है-- 'येन सर्वमिदं ततम्' (2। 17) क्योंकि यह परमात्माका साक्षात् अंश होनेसे परमात्माके समान ही सर्वत्र व्यापक है अर्थात् परमात्माके साथ इसका अभेद है। जहाँ सगुणनिराकारकी उपासनाका वर्णन आया है, वहाँ बताया है -- 'येन सर्वमिदं ततम्' (8। 22), जहाँ कर्मोंके द्वारा भगवान्का पूजन बताया है, वहाँ भी कहा है -- 'येन सर्वमिदं ततम्' (18। 46)। इन सबके साथ एकता करनेके लिये ही भगवान् यहाँ कहते हैं --'मया ततमिदं सर्वम्'। 'मतस्थानि सर्वभूतानि'-- सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं अर्थात् पराअपरा प्रकृतिरूप सारा जगत् मेरेमें ही स्थित है। वह मेरेको छोड़कर रह ही नहीं सकता। कारण कि सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं, मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं अर्थात् उनका उत्पत्ति,स्थिति और प्रलयरूप जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरेमें ही होता है। अतः वे सब प्राणी मेरेमें स्थित हैं।'न चाहं तेष्ववस्थितः'-- पहले भगवान्ने दो बातें कहीं -- पहली 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' और दूसरी 'मत्स्थानि सर्वभूतानि।' अब भगवान् इन दोनों बातोंके विरुद्ध दो बातें कहते हैं।    पहली बात(मैं सम्पूर्ण जगत्में स्थित हूँ) के विरुद्ध यहाँ कहते हैं कि मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। कारण कि यदि मैं उनमें स्थित होता तो उनमें जो परिवर्तन होता है, वह परिवर्तन मेरेमें भी होता उनका नाश होनेसे मेरा भी नाश होता और उनका अभाव होनेसे मेरा भी अभाव होता। तात्पर्य है कि उनका तो परिवर्तन, नाश और अभाव होता है परन्तु मेरेमें कभी किञ्चिन्मात्र भी विकृति नहीं आती। मैं उनमें सब तरहसे व्याप्त रहता हुआ भी उनसे निर्लिप्त हूँ, उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित हूँ। मैं तो निर्विकाररूपसे अपनेआपमें ही स्थित हूँ।वास्तवमें मैं उनमें स्थित हूँ -- ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि मेरी सत्तासे ही उनकी सत्ता है, मेरे होनेपनसे ही उनका होनापन है। यदि मैं उनमें न होता, तो जगत्की सत्ता ही नहीं होती। जगत्का होनापन तो मेरी सत्तासे ही दीखता है। इसलिये कहा कि मैं उनमें स्थित हूँ।\n\n'न च मत्स्थानि भूतानि' (टिप्पणी प0 489)--  अब भगवान् दूसरी बात(सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं) के विरुद्ध यहाँ कहते हैं कि वे प्राणी मेरेमें स्थित नहीं हैं। कारण कि अगर वे प्राणी मेरेमें स्थित होते तो मैं जैसा निरन्तर निर्विकाररूपसे ज्योंकात्यों रहता हूँ, वैसा संसार भी निर्विकाररूपसे ज्योंकात्यों रहता। मेरा कभी उत्पत्तिविनाश नहीं होता, तो संसारका भी उत्पत्तिविनाश नहीं होता। एक देशमें हूँ और एक देशमें नहीं हूँ, एक कालमें हूँ, और एक कालमें नहीं हूँ, एक व्यक्तिमें हूँ और एक व्यक्तिमें नहीं हूँ -- ऐसी परिच्छिन्नता मेरेमें नहीं है, तो संसारमें भी ऐसी परिच्छिन्नता नहीं होती। तात्पर्य है कि निर्विकारता, नित्यता, व्यापकता, अविनाशीपन आदि जैसे मेरेमें हैं, वैसे ही उन प्राणियोंमें भी होते। परन्तु ऐसी बात नहीं है। मेरी स्थिति निरन्तर रहती है और उनकी स्थिति निरन्तर नहीं रहती, तो इससे सिद्ध हुआ कि वे मेरेमें स्थित नहीं हैं।अब उपर्युक्त विधिपरक और निषेधपरक चारों बातोंको दूसरी रीतिसे इस प्रकार समझें। संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है तथा परमात्मा संसारमें नहीं हैं और संसार परमात्मामें नहीं है। जैसे, अगर तरंगकी सत्ता मानी जाय तो तरंगमें जल है और जलमें तरंग है। कारण कि जलको छोड़कर तरंग रह ही नहीं सकती। तरंग जलसे ही पैदा होती है, जलमें ही रहती है और जलमें ही लीन हो जाती है अतः तरंगका आधार, आश्रय केवल जल ही है। जलके बिना उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये तरंगमें जल है और जलमें तरंग है। ऐसे ही संसारकी सत्ता मानी जाय तो संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है। कारण कि परमात्माको छोड़कर संसार रह ही नहीं सकता। संसार परमात्मासे ही पैदा होता है, परमात्मामें ही रहता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है। परमात्माके सिवाय संसारकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये संसारमें परमात्मा हैं और परमात्मामें संसार है।अगर तरंग उत्पन्न और नष्ट होनेवाली होनेसे तथा जलके सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता न होनेसे तरंगकी सत्ता न मानी जाय, तो न तरंगमें जल है और न जलमें तरंग है अर्थात् केवल जलहीजल है और जल ही तरंगरूपसे दीख रहा है। ऐसे ही संसार उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होनेसे तथा परमात्माके सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता न होनेसे संसारकी सत्ता न मानी जाय, तो न संसारमें परमात्मा हैं और न परमात्मामें संसार है अर्थात् केवल परमात्माहीपरमात्मा हैं और परमात्मा ही संसाररूपसे दीख रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे तत्त्वसे एक जल ही है, तरंग नहीं है, ऐसे ही तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं, संसार नहीं है -- 'वासुदेवः सर्वम्' (7। 19)।अब कार्यकारणकी दृष्टिसे देखें तो जैसे मिट्टीसे बने हुए जितने बर्तन हैं, उन सबमें मिट्टी ही है क्योंकि वे मिट्टीसे ही बने हैं, मिट्टीमें ही रहते हैं और मिट्टीमें ही लीन होते हैं अर्थात् उनका आधार मिट्टी ही है। इसलिये बर्तनोंमें मिट्टी है और मिट्टीमें बर्तन हैं। परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो बर्तनोंमें मिट्टी और मिट्टीमें बर्तन नहीं हैं। अगर बर्तनोंमें मिट्टी होती, तो बर्तनोंके मिटनेपर मिट्टी भी मिट जाती। परन्तु मिट्टी मिटती ही नहीं। अतः मिट्टी मिट्टीमें ही रही अर्थात् अपनेआपमें ही स्थित रही। ऐसे ही अगर मिट्टीमें बर्तन होते, तो मिट्टीके रहनेपर बर्तन हरदम रहते। परन्तु बर्तन हरदम नहीं रहते। इसलिये मिट्टीमें बर्तन नहीं हैं। ऐसे ही संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार रहते हुए भी संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार नहीं है। कारण कि अगर संसारमें परमात्मा होते तो संसारके मिटनेपर परमात्मा भी मिट जाते। परन्तु परमात्मा मिटते ही नहीं। इसलिये संसारमें परमात्मा नहीं हैं। परमात्मा तो अपनेआपमें स्थित हैं। ऐसे ही परमात्मामें संसार नहीं है। अगर परमात्मामें संसार होता तो परमात्माके रहनेपर संसार भी रहता परन्तु संसार नहीं रहता। इसलिये परमात्मामें संसार नहीं है।जैसे, किसीने हरिद्वारको याद किया तो उसके मनमें हरिकी पैड़ी दीखने लग गयी। बीचमें घण्टाघर बना हुआ है। उसके दोनों ओर गङ्गाजी बह रही हैं। सीढ़ियोंपर लोग स्नान कर रहे हैं। जलमें मछलियाँ उछलकूद मचा रही हैं। यह सबकासब हरिद्वार मनमें है। इसलिये हरिद्वारमें बना हुआ सब कुछ,(पत्थर, जल, मनुष्य, मछलियाँ आदि) मन ही है। परन्तु जहाँ चिन्तन छोड़ा, वहाँ फिर हरिद्वार नहीं रहा, केवल मनहीमन रहा। ऐसे ही परमात्माने 'बहु स्यां प्रजायेय' संकल्प किया, तो संसार प्रकट हो गया। उस संसारके कणकणमें परमात्मा ही रहे और संसार परमात्मामें ही रहा क्योंकि परमात्मा ही संसाररूपमें प्रकट हुए हैं। परन्तु जहाँ परमात्माने संकल्प छोड़ा, वहाँ फिर संसार नहीं रहा, केवल परमात्माहीपरमात्मा रहे।तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मा हैं और संसार है -- इस दृष्टिसे देखा जाय तो संसारमें परमात्मा और परमात्मामें संसार है। परन्तु तत्त्वकी दृष्टिसे देखा जाय तो न संसारमें परमात्मा हैं और न परमात्मामें संसार है क्योंकि वहाँ संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। वहाँ तो केवल परमात्माहीपरमात्मा हैं -- 'वासुदेवः सर्वम्।' यही जीवन्मुक्तोंकी, भक्तोंकी दृष्टि है।\n\n'पश्य मे योगमैश्वरम्' (टिप्पणी प0 490)--मैं सम्पूर्ण जगत्में और सम्पूर्ण जगत् मेरेमें होता हुआ भी सम्पूर्ण जगत् मेरेमें नहीं है और मैं सम्पूर्ण जगत्में नहीं हूँ अर्थात् मैं संसारसे सर्वथा निर्लिप्त हूँ, अपनेआपमें ही स्थित हूँ -- मेरे इस ईश्वरसम्बन्धी योगको अर्थात् प्रभाव(सामर्थ्य) को देख। तात्पर्य है कि मैं एक ही अनेकरूपसे दीखता हूँ और अनेकरूपसे दीखता हुआ भी मैं एक ही हूँ अतः केवल मैंहीमैं हूँ।'पश्य' क्रियाके दो अर्थ होते हैं -- जानना और देखना। जानना बुद्धिसे और देखना नेत्रोंसे होता है। भगवान्के योग(प्रभाव) को जाननेकी बात यहाँ आयी है और उसे देखनेकी बात ग्यारहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें आयी है।'भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः'  --  मेरा जो स्वरूप है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको पैदा करनेवाला, सबको धारण करनेवाला तथा उनका भरणपोषण करनेवाला है। परन्तु मैं उन प्राणियोंमें स्थित नहीं हूँ अर्थात् मैं उनके आश्रित नहीं हूँ, उनमें लिप्त नहीं हूँ। इसी बातको भगवान्ने पंद्रहवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें कहा है कि क्षर (जगत्) और अक्षर (जीवात्मा) -- दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जिसको,परमात्मा नामसे कहा गया है और जो सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर सबकाभरणपषण करता हुआ सबका शासन करता है।तात्पर्य यह हुआ कि जैसे मैं सबको उत्पन्न करता हुआ और सबका भरणपोषण करता हुआ भी अहंताममतासे रहित हूँ और सबमें रहता हुआ भी उनके आश्रित नहीं हूँ, उनसे सर्वथा निर्लिप्त हूँ। ऐसे ही मनुष्यको चाहिये कि वह कुटुम्बपरिवारका भरणपोषण करता हुआ और सबका प्रबन्ध, संरक्षण करता हुआ उनमें अहंताममता न करे और जिसकिसी देश, काल, परिस्थितिमें रहता हुआ भी अपनेको उनके आश्रित न माने अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहे।भक्तके सामने जो कुछ परिस्थिति आये, जो कुछ घटना घटे, मनमें जो कुछ संकल्पविकल्प आये, उन सबमें उसको भगवान्की ही लीला देखनी चाहिये। भगवान् ही कभी उत्पत्तिकी लीला, कभी स्थितिकी लीला और कभी संहारकी लीला करते हैं। यह सब संसार स्वरूपसे तो भगवान्का ही रूप है और इसमें जो परिवर्तन होता है, वह सब भगवान्की ही लीला है -- इस तरह भगवान् और उनकी लीलाको देखते हुए भक्तको हरदम प्रसन्न रहना चाहिये।\n\nमार्मिक बात\n\nसब कुछ परमात्मा ही है -- इस बातको खूब गहरा उतरकर समझनेसे साधकको इसका यथार्थ अनुभव हो जाता है। यथार्थ अनुभव होनेकी कसौटी यह है कि अगर उसकी कोई प्रशंसा करे कि आपका सिद्धान्त बहुत अच्छा है आदि, तो उसको अपनेमें बड़प्पनका अनुभव नहीं होना चाहिये। संसारमें कोई आदर करे या निरादर -- इसका भी साधकपर असर नहीं होना चाहिये। अगर कोई कह दे कि संसार नहीं है और परमात्मा हैं --यह तो आपकी कोरी कल्पना है और कुछ नहीं आदि, तो ऐसी काटछाटँसे साधकको किञ्चिन्मात्र भी बुरा नहीं लगना चाहिये। उस बातको सिद्ध करनेके लिये दृष्टान्त देनेकी, प्रमाण खोजनेकी इच्छा ही नहीं होनी चाहिये और कभी भी ऐसा भाव नहीं होना चाहिये कि यह हमारा सिद्धान्त है, यह हमारी मान्यता है, इसको हमने ठीक समझा है आदि। अपने सिद्धान्तके विरुद्ध कोई कितना ही विवेचन करे, तो भी अपने सिद्धान्तमें किसी कमीका अनुभव नहीं होना चाहिये और अपनेमें कोई विकार भी पैदा नहीं होना चाहिये। अपना यथार्थ अनुभव स्वाभाविकरूपसे सदासर्वदा अटल और अखण्डरूपसे बना रहना चाहिये। इसके विषयमें साधकको कभी सोचना ही नहीं पड़े।\n\n सम्बन्ध--अब भगवान् पीछेके दो श्लोकोंमें कही हुई बातोंको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।9.5।।न च मत्स्थानि भूतानि न घटादीनां जलादेः इव मम धारकत्वम्? कथम् मत्संकल्पेन।पश्य मम ऐश्वरं योगम् अन्यत्र कुत्रचिद् असंभवनीयं मदसाधारणम् आश्चर्यं योगं पश्य।कः असौ योगः भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः। सर्वेषां भूतानां भर्ता अहं न च तैः कश्चिद् अपि मम उपकारः। मम आत्मा एव भूतभावनः? मम मनोमयः संकल्प एव भूतानां भावयिता धारयिता नियन्ता च।  सर्वस्य अस्य स्वसंकल्पायत्तस्थितिप्रवृत्तित्वे निदर्शनम् आह --",
        "et": "9.5 And yet 'beings do not abide in Me,' as I do not support them as a jug or any kind of vessel supports the water contained in them. How then are they contained?  By My will. Behold My divine Yoga power, namely, My wonderful divine modes, unie to Me alone and having no comparison elsewhere. What are these modes?  'I am the upholder of all beings and yet I am not in them - My will sustains all beings.' The meaning is I am the supporter of all beings, and yet I derive no help for Myself whatever from them. My will alone projects, sustains and controls all beings.\n\nHe gives an illustration to show how all beings depend on His will for their being and acts:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।9.5।।न चेति।  न च मत्स्थानि -- अविद्यान्धानां तत्त्वादृष्टेः।  न हि मूढा अविच्छिन्नसंवित्स्वभावं परमेश्वरं समस्तवस्तुपरिच्छेदप्रतिष्ठास्थानं मन्यन्ते।  अपि तु कृशो देवदत्तोऽहम् इदं वेद्मि भूतले (S omits भूतले) इदं स्थितम् इति मितमेवस्वभावं प्रतिष्ठास्थानतया (N प्रतिष्ठानस्थानतया) पश्यन्ति।ननु कथमेतद्विरुद्धम् [उच्यते]  इत्या [शङ्क्या] ह पश्य योगमैश्वरम्इति।  योगः शक्तिः युज्यमानत्वात्।  एतदेव ममैश्वर्यम्? यदेवं निरतिशयाद्भुतवृत्ति स्वातन्त्र्यमित्यर्थः।",
        "et": "9.5 Na ca etc. Yet, the beings do not exist in Me :  For, the persons, who are blind with nescience, do not see the reality.  The ignorant  do not consider the Absolute Lord - Who is of the nature of infinite  Consciousness - as a basis of determinate knowledge of all objects.  On the other hand conceiving  [like] 'I, the lean Devadatta,  know this, as existing here on the floor',  they view  [things of]  finite nature aone as the basis  [of determination].\n \nBut why this contradiction ?  On this doubt  [the Lord] says  Look at the Sovereign Yoga of Mine.  Yoga signifies the  Power  [of the Absolute],  because it is being employed.  This is indeed My Sovereignty,  which is the Freedom of behaving in this manner in a highly strange way.  This is the idea  (here)."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।9.5।।मैं असंसर्गी हूँ? इसलिये --, ( वास्तवमें ) ब्रह्मादि सब प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं हैं? तू मेरे इस ईश्वरीय योग -- युक्ति -- घटनाको देख? अर्थात् मुझ ईश्वरके योगको यानी यथार्थ आत्मतत्त्वको समझ। संसर्गरहित आत्मा कहीं भी लिप्त नहीं होता यह श्रुति भी संसर्गरहित होनेके कारण ( आत्माकी ) निर्लेपता दिखलाती है। यह और भी आश्चर्य देख कि भूतभावन मेरा आत्मा संसर्गरहित होकर भी भूतोंका भरणपोषण करता रहता है परंतु भूतोमें स्थित नहीं है। क्योंकि परमात्माका भूतोंमें स्थित होना सम्भव नहीं? यह बात उपर्युक्त न्यायसे स्पष्ट दिखलायी जा चुकी है। पू0 -- ( जब कि आत्मा अपनेसे कोई अन्य वस्तु ही नहीं है ) तो मेरा आत्मा यह कैसे कहा जाता है उ0 -- लौकिक बुद्धिका अनुकरण करते हुए देहादि संघातको आत्मासे अलग करके फिर उसमें अहंकारका अध्यारोप करके मेरा आत्मा ऐसा कहते हैं? आत्मा अपने आपसे भिन्न है ऐसा समझकर लोगोंकी भाँति अज्ञानपूर्वक ऐसा नहीं कहते। जो भूतोंको प्रकट करता है -- उत्पन्न करता है या बढ़ाता है उसको भूतभावन कहते हैं।",
        "sc": "।।9.5।। --  न च मत्स्थानि भूतानि ब्रह्मादीनि। पश्य मे योगं युक्तिं घटनं मे मम ऐश्वरम् ईश्वरस्य इमम् ऐश्वरम्? योगम् आत्मनो याथात्म्यमित्यर्थः। तथा च श्रुतिः असंसर्गित्वात् असङ्गतां दर्शयति -- असङ्गो न हि सज्जते (बृह0 उ0 3।9।26) इति। इदं च आश्चर्यम् अन्यत् पश्य -- भूतभृत् असङ्गोऽपि सन् भूतानि बिभर्ति न च भूतस्थः? यथोक्तेन न्यायेन दर्शितत्वात् भूतस्थत्वानुपपत्तेः। कथं पुनरुच्यते असौ मम आत्मा इति विभज्य देहादिसङ्घातं तस्मिन् अहंकारम् अध्यारोप्य लोकबुद्धिम् अनुसरन् व्यपदिशति मम आत्मा इति? न पुनः आत्मनः आत्मा अन्यः इति लोकवत् अजानन्। तथा भूतभावनः भूतानि भावयति उत्पादयति वर्धयतीति वा भूतभावनः।।यथोक्तेन श्लोकद्वयेन उक्तम् अर्थं दृष्टान्तेन उपपादयन् आह --,",
        "et": "9.5 Na ca bhutani, nor do the beings, beginning from Brahma; matsthani, dwell in Me. Pasya, behold; me, My; aisvaram, divine; yogam, Yoga, action, performance, i.e. this real nature of Myself. The Upanisadic text, too, similarly shows the absence of association (of the Self) due to Its being free from contact: '৷৷.unattached, for It is never attached' (Br. 3.9.26). Behold this other wonder: I am the bhuta-bhrt, sustainer of beings, though I am unattached. Ca, but; mama atma, My Self; na bhutasthah, is not contained in the bengs. As it has been explained according to the logic stated above, there is no possibility of Its remaining contained in beings. How, again, is it said, 'It is My Self? Following human understanding, having separated the aggregate of body etc. (from the Self) and superimposing eoism of them, the Lord calls It 'My Self'. But not that He has said so by ignorantly thinking like ordinary mortals that the Self is different from Himself.\nSo also, I am the bhuta-bhavanah, originator of beings, one who gives birth to or nourishes the beings.\nBy way of establishing with the help of an illustration the subject-matter [Subject-matter-that the Self, which has no contact with anything, is the substratum of creation, continuance and dissolution.] dealt with in the aforesaid two verses, the Lord says:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।9.5।।मत्स्थानि सर्वभूतानि [9।4] इत्युक्त्वा पुनः कथंन च मत्स्थानि इति व्याहृतमुच्यते इत्यत आह -- मत्स्थत्वेऽपीति। स्पृष्ट्वेति। स्पर्शनेन्द्रियेण तां ज्ञात्वाऽन्योन्यधर्मसंक्रान्तिमासाद्य चेत्यर्थः। परमेश्वरस्य स्पर्शनाद्यवेद्यत्वे प्रमाणमाह -- नेति। संज्ञया शब्देनैव संज्ञा सम्यग् ज्ञानं यस्यासौ तथोक्तः। मत्स्थानीत्यादेरुक्तत्वात् भूतभृदित्यादिकं पुनरुक्तमित्यत आह --  ममेति। प्राग्भूताधारत्वादिकं स्वस्योक्तम्? अत्र पुनरव्यक्तमूर्तिनेति मूर्तावुक्तायां साऽस्मदादीनामिव भिन्नेति भ्रान्तिनिरासार्थं स्वलक्षणं स्वदेहस्योच्यत इत्यर्थः।,भूतभावनत्वस्याधिकस्योक्तेश्च न पुनरुक्तिरिति भावेनोक्तम् -- भूतेति। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवद्देहस्येदं भवेत्। तदेव कुतः इत्यत आह -- महाविभूतेरिति। माहात्म्यमेव शरीरं यस्यासौ तथोक्तः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।9.5।।तेन भूतानि पञ्चमहाभूतानि प्राणिजातानि च नामरूपज्ञानकर्मात्मकानि मत्स्थानि अस्तिभातिप्रियत्वेन रूपेण नाम्ना च प्रकाशमाने मय्येवाक्षरे सर्वान्तर्यामिस्वरूपे उपादाने स्थितानि। द्वितीयपक्षे मत्स्थानि भूतानि मदायत्तस्थितिकानीत्यर्थः। अहं तु न तदायत्तस्थितिरित्याहनचाहं तेषु [9।4] इति। एवम्भूतो ममाखिलधर्माश्रयस्य मूलभूतस्य क्षराक्षरातीतस्य स्वैश्वर्यमहिमेति बोधयतिन च मत्स्थानि इति। निर्लेपतया विरुद्धसर्वधर्माश्रयत्वमाह। वस्तुतो न च मत्स्थानि नहि घटादीनामिव जलाद्यवलेपकत्वं (जलावधारकत्वं) मयि मदाधारशक्त्या तत्स्थितिरपि नान्यथेत्यचिन्त्यैश्वर्ययोगोऽयं ममेत्याहपश्य मे योगमैश्वरं इति। तथाहि मे मनोमयसङ्कल्प एव सर्वं कर्त्तुं शक्तोऽलौकिकयोगः स एवान्यव्यामोहको मायापदव्यपदिश्यमानोऽपि क्वचित् स च ममात्माऽक्षरस्वरूपोऽध्यात्मधर्माख्यो भूतानां भावयिता नियन्ता च तमेतं पश्य मम विरुद्धधर्माश्रयमालोचय। स किम्भूतः भूतभृन्न च भूतस्थ इति। न तत्सजातीयः? अपितु भूम्याद्यन्तर्वर्त्ती पालक उद्भावकश्च।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।9.5।।अतएव दिविष्ठ इवादित्ये कल्पितानि जलचलनादीनि मयि कल्पितानि भूतानि परमार्थतो मयि न सन्ति। त्वमर्जुनः प्राकृतीं मनुष्यबुद्धिं हित्वा पश्य पर्यालोचय। मे योगं प्रभावमैश्वरं अघटनघटनाचातुर्यं मायाविन इव ममावलोकयेत्यर्थः। नाहं कस्यचिदाधेयो नापि कस्यचिदाधारस्तथाप्यहं सर्वेषु भूतेषु मयि च सर्वाणि भूतानीति महतीयं माया। यतो भूतानि सर्वाणि कार्याण्युपादानतया बिभर्ति धारयति पोषयतीति च भूतभृत् भूतानि सर्वाणि कर्तृतयोत्पादयतीति भूतभावनः। एवमभिन्ननिमित्तोपादानभूतोऽपि ममात्मा मम परमार्थस्वरूपभूतः सच्चिदानन्दघनोऽसङ्गाद्वितीयस्वरूपत्वान्न भूतस्थः परमार्थतो न भूतसंबन्धी स्वप्नदृगिव न परमार्थतः स्वकल्पितसंबन्धीत्यर्थः। ममात्मेति राहोः शिर इतिवत्कल्पनया षष्ठी।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।9.5।।किंच -- नचेति। नच मयि स्थितानि भूतान्यसङ्गत्वादेव मम। ननु तर्हि व्यापकत्वमाश्रयत्वं च पूर्वोक्तं विरुद्धमित्याशङ्क्याह -- यथेति। म ऐश्वरमसाधारणं योगं युक्तिमघटितघटनाचातुर्यं पश्य। मदीययोगमायावैभवस्यावितर्क्यत्वान्न विरुद्धं किंचिदित्यर्थः। अन्यदप्याश्चर्यं पश्येत्याह -- भूतेति। भूतानि बिभर्ति धारयतीति भूतभृत्। भूतानि भावयति पालयतीति भूतभावनः। एवंभूतोऽपि ममात्मा परं स्वरूपं भूतस्थो न भवति।।अयंभावः -- यथा जीवो देहं बिभ्रत्पालयंश्चाहंकारेण तत्संश्लिष्टस्तिष्ठत्येवमहं भूतानि धारयन्पालयन्नपि न तेषु तिष्ठामि? निरहंकारत्वादिति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।9.5।।अतएव सर्वसङ्गविवर्जिते मयि परमात्मनि वस्तुस्तु भूतान्यपि सर्वाणि नच स्थितानि। पश्य मे योगमैश्वम्। योगं युक्तं घटनां ममैश्वरं याथात्म्यभावम्। तथाच श्रुतिःअङ्गो नहि सञ्जते इति। इदं चान्यद्योगमधटितधटनापटीयस्त्वं पश्य। भूतभृन्नच भूतस्थो ममात्माऽसङ्गित्वात् भूतेषु न तिष्ठतीति तथा वस्तुत एतादृशोऽपि सन् भूतानि स्थावरजङ्गमादीनि बिभर्ति धारयति पोषयतीति तथा भूतभावनः भूतानि भावत्युत्पादयतीति तथा ममात्मेति तु भेदमारोप्य राहोः शरि इतिवत्प्रयोगः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 9.5 एवमध्यायप्रधानार्थस्य प्रापकस्य माहात्म्यमुक्तम् अथ प्राप्यमाहात्म्यद्वाराऽपि तदेव स्थिरीक्रियत इत्यभिप्रायेणाहशृणु तावदिति।इदं सर्वम् इति निर्देशः प्रमाणसिद्धसमस्तवस्तुपर इत्यभिप्रायेणइदं चेतनाचेतनात्मकमित्युक्तम्।अव्यक्तमूर्तिना इत्यस्य विग्रहविषयत्वेऽत्रानुपयोगात्स्वरूपविषयोऽयमौपचारिकः प्रयोग इति दर्शयितुंअप्रकाशितस्वरूपेणेत्युक्तम्। आकाशवत्सन्निधिमात्ररूपव्याप्तिव्युदासाय बहुप्रमाणसिद्धो व्याप्तिप्रकारःमया इत्यनेनाभिप्रेत इत्याहअन्तर्यामिणेति। उक्तप्रकाराया व्याप्तेः प्रयोजनं तन्निदानं च दर्शयतिअस्येति। अत्र धारणमनन्तरग्रन्थसिद्धम् अत एव नियमनमप्यर्थसिद्धम्। धारणं हि प्रशासनाधीनं श्रूयते। शेषित्वं तु प्रागुक्तं? शरीरित्वेनार्थसिद्धं च। अप्रकाशितस्वरूपत्वेन नियामकत्वेन च सर्वव्याप्तिं श्रुतौ दर्शयतियथेति। पृथिव्युदाहरणं तत्प्रकरणोक्तसर्वाचेतनोपलक्षणार्थम्। उक्तप्रकारव्यापकत्ववशात्मत्स्थानि इत्यनेन जगतः पृथक्सिद्धता निरस्यत इत्यभिप्रायेणाहतत इति। श्रीविश्वरूपादिषु विग्रहाश्रितत्वमपि सर्वस्योच्यते अत्र तु स्वरूपनिष्ठतेत्यपौनरुक्त्याय -- मय्यन्तर्यामिणीत्युक्तम्। अनयोर्धारणनियमनयोरपि व्याप्त्या सहाधीततामाह -- तत्रैवेति।स्थितिनियमने -- स्थितिप्रवृत्ती इत्यर्थः। शरीरशरीरित्ववचनात् धृतिः शेषित्वं च तत्रार्थसिद्धे इत्यभिप्रायेणाहशेषित्वं चेति।मया ततमिदं सर्वम् इत्यभिधायैवन चाहं तेष्ववस्थितः इति वचनं व्याहतम्? यः पृथिव्यां तिष्ठन् इत्यादिश्रुतिविरुद्धं चेत्यत्राहअहं त्विति।मत्स्थानि सर्वभूतानि इति प्रस्तुतप्रकारा स्थितिरत्र निषिध्यते। स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः इत्यत्र स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नि [छां.उ.7।24।1] इति हि श्रूयत इति भावः। उक्तं विवृणोतिमत्स्थिताविति।न कश्चिदिति स्वरूपतः सङ्कल्पादृष्टादिना वेति भावः।मत्स्थानिन च मत्स्थानि इत्येतद्व्याहतमित्यत्राह -- न घटादीनामिति। मूर्त हि मूर्तान्तरं पतनप्रतिघातिना संयोगेन धारयति न तथाऽत्रेति भावः। लोकदृष्टविपरीतं न सम्भवतीत्यभिप्रायेण शङ्कतेकथमिति। शरीरशरीरिणोरिव सम्भवमभिप्रेत्याहमत्सङ्कल्पेनेति। स्वेच्छाधीनधारकत्वं हि विहितम्। अस्वतन्त्रतया धारकत्वं तु निषिध्यत इत्यविरोध इति भावः।ऐश्वरम् इत्यनेनानन्यसाधारणत्वं फलितम्।पश्य इत्यनेन चाश्चर्यता द्योतितेत्यभिप्रायेणाहअन्यत्रेति।योगः सन्नहनोपायध्यानसङ्गतियुक्तिषु [अमरः3।3।22] इति पाठात्सङ्कल्परूपं ध्यानमिह योगः? युज्यमानस्वभावादिर्वा।पश्य मे योगम् इत्युक्ते योगस्वरूपमेवानन्तरं वक्तव्यमिति तदाकाङ्क्षा दर्शयतिकोऽसाविति।भूतभृन्न च भूतस्थः इत्यत्रार्थौचित्यादहमित्येव विशेष्यम्। अथवाभूतभावनः इतिवत्ममात्मा इति निर्दिष्टसङ्कल्पविशेषणत्वेऽपि फलितकथनंसर्वेषां भूतानां भर्ताऽहमित्यादि।आत्मा इति विशेषनिर्देशः परिसङ्ख्यानयात्तदतिरिक्तसहकारिव्यवच्छेदार्थ इत्यभिप्रायेणाहममात्मैवेति।ममात्मा इति व्यधिकरणनिर्देशस्वारस्यसिद्धमात्मशब्दार्थमाहमम मनोमयः सङ्कल्प इति। एतेन देहादिसङ्घातेऽहङ्कारमध्यारोप्य लोकबुद्ध्यनुसारेणममात्मा इति व्यपदेश इतिशङ्करोक्तं प्रत्युक्तम्। सङ्कल्प एव मनःकार्यतयाऽन्यत्र प्रसिद्धो मनःप्रतिपादकेनात्मशब्देनात्र व्यपदिष्टः। यद्वा आत्मशब्दोऽत्र सङ्कल्परूपमनःपर एव?मनसैव जगत्सृष्टिं [वि.पु.5।22।15]मनोऽकुरुत (आत्मन्वी) स्यामिति [बृ.उ.1।2।1] इत्यादेः। तदर्थज्ञापनाय तु मनोमयशब्दः। धारणनियमनयोरेव प्रकृतत्वात्? अनन्तरश्लोके च निर्दिश्यमानत्वात्? सृष्टेश्च ततोऽप्यनन्तरं वक्ष्यमाणत्वादत्रभूतभावनः इत्येतत्सत्तातादधीन्यनियमनाद्युपलक्षणमित्यभिप्रायेणाहधारयिता नियन्ता चेति। अथवाभूतभृन्न च भूतस्थः इत्यस्यैवायमर्थः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।9.5।।मत्स्थानि सर्वभूतानि [9।4] इत्युक्त्या भगवतस्ते भिन्ना भविष्यन्तीति ज्ञानेन व्यापकत्वे भ्रमो मा भवत्वित्यत आह -- न च मत्स्थानीति। च पुनः। तानि भूतानि जातान्यपि भिन्नतया मत्स्थानि न? किन्तु मदात्मकान्येवेत्यर्थः। ननु तर्हि कथं भेदप्रतीतिः इत्यत आह -- पश्य मे योगमैश्वरमिति। मे ऐश्वरं कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थत्वरूपं क्रीडात्मकं योगं पश्य।अयमर्थः -- मया क्रीडार्थमभेदेऽपि भेदो बोध्यते। एतदेव विशदयति -- भूतभृदिति। भूतानि आधारत्वेन धारयति स्वरसार्थं पोषयतीति भूतभृत्। भूतानि पालयति तथा भावयति स्वभावभावितानि करोतीति भूतभावनः। एतादृशोऽपि सन् ममात्मा मदात्मस्वरूपं भूतस्थो न भवति। अयं भावः -- तेषु क्रीडां कुर्वन्नपि यथा ते क्रीडार्थं सृष्टास्तत्र स्थिताः स्वाभिमानेन भिन्नतया,तिष्ठन्ति तथाऽहं न तिष्ठामि।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।9.5।।एवमभ्युपगतमानन्दस्य जगद्विवर्ताधिष्ठानत्वं तदप्यपवदति -- न च मत्स्थानीति। अयंभावः -- अस्य द्वैतेन्द्रजालस्य यदुपादानकारणम्। अज्ञानं तदुपाश्रित्य ब्रह्मकारणमुच्यते इति वार्तिकोक्तेरज्ञानमेव जगत्कारणं तच्च तुच्छम्। अहं चासङ्गः। ततश्च तुच्छतरेण तत्कार्येण भूतसंघेन न ममासङ्गस्याधाराधेयभावसंबन्धोऽनिर्वचनीयोऽप्यस्ति। आवृतं हि रज्ज्वादिकमनिर्वचनीयेन सर्पादिना संबध्यते। अहं तु सर्वदानावृतः साक्षिरूपत्वात्तत्संबन्धशून्य इति न च मत्स्थानि भूतानीत्युक्तमिति। ननु साक्षिणस्तव ब्रह्मणो युवा सुखी चेति प्रतीत्येव भूतसंबन्धानुभवात्कथं न च मत्स्थानीत्युक्तिरित्याशङ्क्याह -- पश्य मे योगमैश्वरमिति। मे मम भूतैः सह योगं युक्तिघटनां पश्य। ऐश्वरं ईश्वरेण मायाविना निर्मितं गगने गन्धर्वनगरमिव। अतएव मम कारणशरीरस्यात्मा प्रत्यगानन्दे भूतभृदपि भूतस्थो न। चकारोऽप्यर्थे भिन्नक्रमश्च। खमिव गन्धर्वनगरभृदपि तत्स्थं न। तस्य तदाकारेण परिणामासंभवात्। एवंरूपोऽपि परानन्दरूपो ममात्मा स भूतभावनः भूतानां वृद्धिकरः।एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इत्यादिश्रुतिभ्यः। आकाशेऽव्याकृताख्ये स्वाधिष्ठानभूत आनन्दोऽनुस्यूतो न स्यात्तर्हि प्राणापानक्रियां कश्चिदपि न कुर्यात् कारणगतं जाड्यं कार्येऽपि स्यात्। आकाशे आनन्दानुबन्धे तु कारणस्य चेतनत्वात्कार्यमपि चेतनावत्स्यादिति श्रुत्यर्थः। बृहदारण्यकेऽपियदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं च इति मायाविनि सर्वस्योतप्रोतत्वमुक्त्वाकस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च इत्यस्योत्तरम्एतस्मिन्खल्वक्षरे गार्गि आकाश ओतश्च प्रोतश्च इत्यस्थूलादिलक्षणस्याक्षरस्याकाशाधारत्वमुक्तम्। तस्माद्युक्तमुक्तमाकाशशरीरेण भगवता कारणोपाधिनिष्कृष्टचिन्मात्राभिप्रायेण ममात्मा भूतभावन इति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "And yet everything that is created does not rest in Me. Behold My mystic opulence! Although I am the maintainer of all living entities and although I am everywhere, I am not a part of this cosmic manifestation, for My Self is the very source of creation.",
        "ec": " The Lord says that everything is resting on Him ( mat-sthāni sarva-bhūtāni ). This should not be misunderstood. The Lord is not directly concerned with the maintenance and sustenance of this material manifestation. Sometimes we see a picture of Atlas holding the globe on his shoulders; he seems to be very tired, holding this great earthly planet. Such an image should not be entertained in connection with Kṛṣṇa’s upholding this created universe. He says that although everything is resting on Him, He is aloof. The planetary systems are floating in space, and this space is the energy of the Supreme Lord. But He is different from space. He is differently situated. Therefore the Lord says, “Although they are situated on My inconceivable energy, as the Supreme Personality of Godhead I am aloof from them.” This is the inconceivable opulence of the Lord. In the Nirukti Vedic dictionary it is said, yujyate ’nena durghaṭeṣu kāryeṣu: “The Supreme Lord is performing inconceivably wonderful pastimes, displaying His energy.” His person is full of different potent energies, and His determination is itself actual fact. In this way the Personality of Godhead is to be understood. We may think of doing something, but there are so many impediments, and sometimes it is not possible to do as we like. But when Kṛṣṇa wants to do something, simply by His willing, everything is performed so perfectly that one cannot imagine how it is being done. The Lord explains this fact: although He is the maintainer and sustainer of the entire material manifestation, He does not touch this material manifestation. Simply by His supreme will, everything is created, everything is sustained, everything is maintained and everything is annihilated. There is no difference between His mind and Himself (as there is a difference between ourselves and our present material mind) because He is absolute spirit. Simultaneously the Lord is present in everything; yet the common man cannot understand how He is also present personally. He is different from this material manifestation, yet everything is resting on Him. This is explained here as yogam aiśvaram, the mystic power of the Supreme Personality of Godhead."
    }
}
