{
    "_id": "BG9.21",
    "chapter": 9,
    "verse": 21,
    "slok": "ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं\nक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |\nएवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना\nगतागतं कामकामा लभन्ते ||९-२१||",
    "transliteration": "te taṃ bhuktvā svargalokaṃ viśālaṃ kṣīṇe puṇye martyalokaṃ viśanti .\nevaṃ trayīdharmamanuprapannā gatāgataṃ kāmakāmā labhante ||9-21||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।9.21।। वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "9.21 They, having enjoyed the vast heaven, enter the world of mortals when their merit is exhausted; thus abiding by the injunctions of the ï1threeï1 (Vedas) and desiring (objects of) desires, they attain to the state of going and returning.",
        "ec": "9.21 ते they? तम् that? भुक्त्वा having enjoyed? स्वर्गलोकम् heavenworld? विशालम् vast? क्षीणे at the exhaustion of? पुण्ये merit? मर्त्यलोकम् the world of mortals? विशन्ति enter? एवम् thus? त्रयीधर्मम् of the three Vedas? अनुप्रपन्नाः abiding by? गतागतम् the state of goind and returning? कामकामाः desiring desires? लभन्ते attain.Commentary When the accumulated merit (the cause of heavenly pleasures) is exhausted? they descend to this world. They come and go. They have no independence.The Dharma of the three Mere Vedic ritual? enjoined by the three Vedas. KamaKamah The people whose minds are filled with Vasanas or worldly tendencies."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "9.21 Yet although they enjoy the spacious glories of Paradise, nevertheless, when their merit is exhausted, they are born again into this world of mortals. They have followed the letter of the scriptures, yet because they have sought but to fulfill their own desires, they must depart and return again and again."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।9.21।। जिन्होंने तीनों वेदों के कर्मकाण्ड का अध्ययन किया हो और जो स्वर्गादि फल के प्रापक यज्ञयागादि के विधिविधान भी जानते हों? ऐसे लोग यदि सकाम भावना से श्रद्धापूर्वक उन कर्मों का अनुष्ठान करते हैं? तो वे  स्वर्ग लोक को प्राप्त हो कर वहाँ दिव्य देवताओं के भोगांे को भोगते हैं।सोम नामक एक लता होती है? जिसका दूधिया रस यज्ञ कर्म में प्रयोग किया जाता है और यज्ञ की समाप्ति पर अल्प मात्रा में तीर्थपान के समान इसे ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सोमपा शब्द से अभिप्राय यज्ञकर्म की समाप्ति से समझना चाहिए। सकाम भावना से किये गये ये यज्ञकर्म अनित्य फल देने वाले होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वर्ग को प्राप्त जीव पुण्य समाप्त होने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं।ऐसे अविवेकी कामी लोगों के प्रति भगवान् की अरुचि उनके इन शब्दों में स्पष्ट होती है कि वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान कर? भोगों की कामना करने वाले? बारम्बार (स्वर्ग को) जाते और (संसार को) आते हैं।परन्तु जो पुरुष निष्काम और तत्त्वदर्शी हैं? उनके विषय में भगवान् कहते हैं --"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "9.21. Having enjoyed that vast world of heaven, they, when their merit is exhausted, enter the world of the mortals.  Thus the persons, who long for pleasure and continuously take refuge in the code of conduct prescribed by the Three Vedas, attain the state of going and coming."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "9.21 Having enjoyed the spacious world of heaven, they return to the world of mortals their merit is exhausted. Thus, those who follow the Vedic rituals and are drawn by desires, come and go."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "9.21 After having enjoyed that vast heavenly world, they enter into the human world on the exhaustion of their merit. Thus, those who follow the rites and duties prescribed in the three Vedas, and are desirous of pleasures, attain the state of going and returning."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।9.20 -- 9.21।।तथापि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद्वरमिति दर्शयति -- त्रैविद्या इत्यादिना।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।9.21।।तर्हि स्वर्गप्राप्तिरपि भगवत्प्राप्तितुल्येत्याशङ्क्याह -- ते तमिति। पुण्ये स्वर्गप्राप्तिहेताविति यावत्। प्रसिद्ध्यार्थो हिशब्दः। त्रयाणां हौत्रादीनां वेदत्रयविहितानां धर्माणां समाहारस्त्रिधर्मं तदेव त्रैधर्म्यं तदनुप्रपन्नाः। तदनुगता इति यावत्। कामकामानां गमनागमनद्वारा कामितफलाप्तिश्चेदिष्टमेव चेष्टितमित्याशङ्क्याह -- गतेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।9.21।। वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं।",
        "hc": "।।9.21।। व्याख्या--'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं ৷৷. कामकामा लभन्ते'--स्वर्गलोक भी विशाल (विस्तृत) है वहाँकी आयु भी विशाल (लम्बी) है और वहाँकी भोगसामग्री भी विशाल (बहुत) है। इसलिये इन्द्रलोकको विशाल कहा गया है।स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवाले न तो भगवान्का आश्रय लेते हैं और न भगवत्प्राप्तिके किसी साधनका ही आश्रय लेते हैं। वे तो केवल तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मों-(अनुष्ठानों-) का ही आश्रय लेते हैं। इसलिये उनको त्रयीधर्मके शरण बताया गया है।   'गतागतम्' का अर्थ है -- जाना और आना। सकाम अनुष्ठान करनेवाले स्वर्गके प्रापक जिन पुण्योंके फलस्वरूप स्वर्गमें जाते हैं, उन पुण्योंके समाप्त होनेपर वे पुनः मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार उनका घटीयन्त्रकी तरह बारबार सकाम शुभकर्म करके स्वर्गमें जाने और फिर लौटकर मृत्युलोकमें आनेका चक्कर चलता ही रहता है। इस चक्करसे वे कभी छूट नहीं पाते।अगर पूर्वश्लोकमें आये 'पूतपापाः' पदसे जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं और यहाँ आये 'क्षीणे पुण्ये' पदोंसे जिनके सम्पूर्ण पुण्य क्षीण हो गये हैं -- ऐसा अर्थ लिया जाय, तो उनको (पापपुण्य दोनों क्षीण होनेसे) मुक्त हो जाना चाहिये परन्तु वे मुक्त नहीं होते, प्रत्युत आवागमनको प्राप्त होते हैं। इसलिये यहाँ 'पूतपापाः' पदसे वे लिये गये हैं, जिनके स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप यज्ञ करनेसे नष्ट हो गये हैं और 'क्षीणे पुण्ये' पदोंसे वे लिये गये हैं, जिनके स्वर्गके प्रापक पुण्य वहाँका सुख भोगनेसे समाप्त हो गये हैं। अतः सम्पूर्ण पापों और पुण्योंके नाशकी बात यहाँ नहीं आयी है।\n सम्बन्ध--जो त्रयीधर्मका आश्रय लेते हैं, उनको तो देवताओंसे प्रार्थना-- याचना करनी पड़ती है परन्तु जो केवल मेरा ही आश्रय लेते हैं, उनको अपने योगक्षेमके लिये मनमें चिन्ता, संकल्प अथवा याचना नहीं करनी पड़ती-- यह बात भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।9.21।।ते तं विशालं स्वर्गलोकं भुक्त्वा तदनुभवहेतुभूते पुण्ये क्षीणे पुनरपि मर्त्यलोकं विशन्ति।एवं त्रय्यन्तसिद्धज्ञानविधुराः काम्यस्वर्गादिकामाः केवलं त्रयीधर्मम् अनुप्रपन्नाः गतागतं लभन्ते। अल्पास्थिरस्वर्गादीन् अनुभूय पुनः पुनः निवर्तन्ते इत्यर्थः।महात्मानः तु निरतिशयप्रियरूपं मच्चिन्तनं कृत्वा माम् अनवधिकातिशयानन्दं प्राप्य न पुनरावर्तन्ते इति तेषां विशेषं दर्शयति --",
        "et": "9.21 After enjoying the spacious world of heaven, they return to the world of mortals when the meritorious Karma forming the cause of that experience is exhausted. Thus, lacking in the knowledge established in the Vedanta and desiring only the attainment of heaven etc., they who follow the teaching of the three Vedas on sacrificial rites, come and go. After enjoying the trifling and transient pleasures of heaven, they return to Samsara again and again.\n\nBut the great souls meditating on Me, who am incomparably dear to them, attain boundless and unsurpassed bliss and do not return to Samsara.\n\nSri Krsna desribes their distinguishing features:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।9.20 -- 9.21।।नन्वेवं यदि बाह्ययागादिनाऽपि ब्रह्म प्राप्तिः (S ब्रह्माप्तिः) ? तर्हि अग्निष्टोमादिष्वपि किम्,अन्यो याज्यः  अभ्युपगमे भेदवादः वासुदेव एव (S omits एव) इति चेत्? कथं नापवर्गस्तैः [प्राप्यते]  तदर्थमुच्यते -- त्रैविद्या इत्यादि।  ते तमित्यादि।  यद्यपि ते मामेव यजन्ते।  तथापि स्वर्गमात्रप्रार्थनया मितं कर्म निजसत्त्वदुर्बलतया स्वर्गादिमात्रेणैव फलेनावच्छिन्दन्ति।  अत एवैषां पुनरावर्तको धर्मः।  एवं ते गतागतं लभन्ते? न तु यागस्य पुनरावृत्तिप्रसवधर्मा स्वभावः।",
        "et": "9.20-21 Traividyah etc.  Te tam etc. Of course, they worship Me (Vasudeva) alone.  However, the action [like sacrifice] is limited (or is known  [to them]) by their aspiration for heaven only.  Hence, on account of the weakness is their own being  (sattva), they  condition the action solely by the result of the heaven.  That is why their  religious act leads to rirth and thus they attain the state of going and coming.  But [on that account] it is not the inherent nature of the sacrifice to beget rirth.\t\t\t\t\t\t\t\t\t\t\n For instance :"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।9.21।।वे उस विशाल -- विस्तृत स्वर्गलोकको भोग चुकनेपर ( उसकी प्राप्तिके कारणरूप ) पुण्योंका क्षय हो जानेपर इस मृत्युलोकमें लौट आते हैं। उपर्युक्त प्रकारसे केवल वैदिक कर्मोंका आश्रय लेनेवाले कामकामी -- विषयवासनायुक्त मनुष्य बारंबार आवागमनको ही प्राप्त होते रहते हैं अर्थात् जाते हैं और लौट आते हैं इस प्रकार बराबर आवागमनको ही प्राप्त होते हैं? कहीं भी स्वतन्त्रता लाभ नहीं करते।",
        "sc": "।।9.21।। --,ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं विस्तीर्णं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति आविशन्ति। एवं यथोक्तेन प्रकारेण त्रयीधर्मं केवलं वैदिकं कर्म अनुप्रपन्नाः गतागतं गतं च आगतं च गतागतं गमनागमनं कामकामाः कामान् कामयन्ते इति कामकामाः लभन्ते गतागतमेव? न तु स्वातन्त्र्यं क्वचित् लभन्ते इत्यर्थः।।ये पुनः निष्कामाः सम्यग्दर्शनिः --,",
        "et": "9.21 Bhuktva, after having enjoyed; tam, that: visalam, vast; svargalokam, heavenly world; te, they; visanti, enter into; this martyalokam, human world; ksine, on the exhaustion; of their punye, merit. Evam, thus, indeed; anuprapannah, those who follow in the manner described; trai-dharmyam, [A variant reading is trayi-dharmam.-Tr.] the rites and duties prescribed in the three Vedas-merely the Vedic rites and duties; and are kama-kamah, desirous of pleasures; labhante, attain; only gata-agatam, the state of going and returning, but never that of independence. This is the meaning."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।9.20 -- 9.21।।सदसच्चाहमर्जुन [9।16] इति विज्ञानस्योपसंहृतत्वादुत्तरस्यासङ्गतिमाशङ्क्याह -- तथापीति।अहं क्रतुः [9।16] इत्यादिना सर्वक्रत्वादिभोक्तृत्वं यदुक्तं भगवतस्तदसदिति वक्ष्यामीति गूढाभिसन्धिना यदि सर्वत्र भोक्ता भगवान्? तर्हि किं भागवतानां त्रैविद्यानां च फलसाम्यमेव इति पृष्टस्येदमुत्तरमित्याशयः। तथापि सर्वत्र भगवतो भोक्तृत्वेऽपि मद्भजनं भागवतैरनुष्ठितम्? देवतेति पित्राद्युपलक्षणम् त्रैविद्याद्यनुष्ठिताद्वरमुत्कृष्टफलम्। इत्यादिना श्लोकत्रयेण।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।9.20 -- 9.21।।त्रैविद्या इति। त्रिगुणात्मकत्रिवेदविद्यायां निष्णाताः? तथा च त्रिगुणकर्मकारिणः तथाविधैरेव यज्ञैस्तत्तद्देवताविशेषं समाराध्य वस्तुतस्तत्राहमेवेति मामित्युक्तम्। स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।।स्वर्गतिमित्युपलक्षणं कर्मानुगुणलोकानाम्। तथाहि निबन्धे -- सात्त्विकः सात्त्विकं कर्म यथा श्रुतिपरः कृती। स्वर्गलोकस्तस्य सिद्धयेद्विमानैस्त्रीभिरावृतः।।पुण्यस्य तु तिरोधाने पतत्यर्वाक्शिरास्ततः। पुण्यशेषं समादाय समीचीनेषु जायते। राजसं कर्म कुर्वाणो मेर्वादिसुखभाग्भवेत्। तामसं कर्म कुर्वाणोऽधोलोके सुखभाग्भवेत्।।राजसं सात्विकं कुर्वन् दैत्यसर्गेषु जायते। राजसं कर्म कुर्वाणश्चन्द्रलोके सुखी भवेत्। वृष्टिद्वाराऽन्नरूपः सन् रेतोयोनिषु जायते।,तामसं कर्म कुर्वाणो यक्षलोके सुखी भवेत्। तामसः सात्विकं कुर्वन् पितृलोके महीयते। राजसं कर्म कुर्वाणो भूतादिसुखमाप्नुयात्।।तामसं कर्म कुर्वाणः सर्पादिसुखभाग्भवेत्। सर्वेषां पुनरावृत्तिस्तथा कर्म पुनर्भवः इति। तदाह -- क्षीणे पुण्ये इति। न तु क्षीणे लोके तद्यथेह कर्मजितो [चितो] लोकः क्षीयत एवमेव अमुत्र पुण्यजितो [चितो] लोकः क्षीयते [छां.उ.8।1।6] इति श्रुतिस्तूपचारमात्रम्। एवं त्रयीधर्मपराः कामकामा गतागतमवाप्नुवन्ति जन्ममरणपर्यावर्त्तमनुभवन्तो गुणप्रवाहमार्गे पतिता भवन्तीत्यर्थः। अयं जायस्य म्रियस्वेति तृतीयो दुष्टोऽधर्म -- (गुण) प्रवाहमार्ग उक्तः? तत्र अधर्मप्रवाहमार्गे जीवा नाङ्गीकृताः केनापि स्वरूपेण किन्तु माययेति सिद्धान्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।9.21।। ततः किमनिष्टमिति तदाह -- ते सकामास्तं काम्येन पुण्येन प्राप्तं विशालं विस्तीर्णं स्वर्गलोकं भुक्त्वा? तद्भोगजनके पुण्ये क्षीणे सति तद्देहनाशात्पुनर्देहग्रहणाय मर्त्यंलोकं विशन्ति। पुनर्गर्भवासादियातना अनुभवन्तीत्यर्थः। पुनःपुनरेवमुक्तप्रकारेण। हि प्रसिद्ध्यर्थः। त्रैधर्म्यं हौत्राध्वर्यवौद्गात्रधर्मत्रयार्हं ज्योतिष्टोमादिकं काम्यं कर्म। त्रयीधर्ममिति पाठेऽपि त्रय्या वेदत्रयेण प्रतिपादितं धर्ममिति स एवार्थः। अनुप्रपन्नाः अनादौ संसारे पूर्वप्रतिपत्त्यपेक्षयाऽनुशब्दः पूर्वप्रतिपत्त्यनन्तरं मनुष्यलोकमागत्य पुनः प्रतिपन्नाः कामकामा दिव्यान्भोगान्कामयमाना एव गतागतं लभन्ते। कर्म कृत्वा स्वर्गं यान्ति तत आगत्य पुनः कर्म कुर्वन्तीत्येवं गर्भवासादियातनाप्रवाहस्तेषामनिशमनुवर्तत इत्यभिप्रायः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।9.21।।ततश्च -- ते तं भुक्त्वेति। ते स्वर्गकामास्तं प्रार्थितं विपुलं स्वर्गलोकं तत्सुखं भुक्त्वा भोगप्रापके पुण्ये क्षीणे सति,मर्त्यलोकं विशन्ति। पुनरप्येवमेव वेदत्रय्या विहितं धर्ममनुसृताः कामकामा भोगान्कामयमाना गतागतं यातायातं लभन्ते।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।9.21।।एतादृशस्याप्यतिकष्टेनासादितस्यापि स्वर्गलोकस्य सान्तत्वादनिष्टतां बोधयति -- ते इति। ते त्रैविद्याः तं स्वर्गलोकं विशालं विस्तीर्णं भुक्त्वा पुण्ये यज्ञादिरुपे भोगप्रदे भोगं दत्त्वा क्षीणे सति मर्त्यलोकं विशन्त्याविशन्ति। गर्भवासादिदुःखमनुभवन्तीत्यर्थः। एवं यथोक्तेन प्रकारेण हि प्रसिद्धं त्रयाणां धर्माणां हौत्राध्यर्ववौद्गात्राणां ऋग्यजुःसमाख्यवेदत्रयबोधतानां समाहारस्त्रिधर्मं तदेव त्रैधर्म्यमिति। त्रयीधर्ममिति वा पाठः। त्रय्या वेदत्रयेण प्रतिपादितमित्यर्थः। अयं पाठः कैश्चिद्य्वाख्यातोऽपि भाष्यकृद्भिरव्याख्यातत्वान्नादर्तव्यः। अनुप्रपन्नाः प्रकर्षेणानुसृतवन्तः कामान्विषयान् कामयन्त इति कामकामाः गतागतं गमनागमनं मरणवेदनामनुभूय क्षणिकं स्वर्गादिकंप्रति गमनं ततः जन्मादिवेदनामनुभवितुमागमनं  च लभन्ते नतु स्वातन्त्र्यं क्वचिदपि कर्माधीनत्वात्तेषाम्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 9.21 सदसच्चाहमर्जुन इत्यस्यानन्तरंत्रैविद्याः इत्यादिकमसङ्गतमिति शङ्कायां पूर्वोत्तरानुवृत्तप्रघट्टाकार्थं प्रदर्शयन् सङ्गतिमाह -- एवं महात्मनामिति।महात्मनां ज्ञानिनां भगवदनुभवैकभोगानामिति त्रिभिःमहात्मानस्तुज्ञात्वाअनन्यमनसः [9।13] इति प्रागुक्तस्मारणम्।अवजानन्ति [9।11] इत्याद्यपेक्षयामहात्मानस्तु इत्यादेः विशेषकथनरूपत्वेऽपि भजनकीर्तनादेर्भक्तस्वरूपनिरूपकतयावृत्तमुक्त्वेत्युक्तम्। एवं निरूपितस्वरूपाणां तेषां निरतिशयफलसौकर्यादिकमभिधास्यमानं विशेषो भवितुमर्हतीतितेषामेव विशेषं दर्शयितुमित्युक्तम्।अज्ञानामित्यनेनपरं भावमजानन्तः [9।11] इति प्रागुक्ता एवात्र फल्गुफलयोगादिभिः प्रपञ्च्यन्त इति सूचितम्।त्रैविद्याः इत्यत्र सङ्ख्याविशेषप्रसिद्ध्यात्रयीधर्मम् इति वक्ष्यमाणानुसन्धानाच्च विद्यां विशिंषन् समासार्थं चाहऋग्यजुरिति। तिस्रो विद्याः समाहृता इति द्रष्टव्यम्। द्विगुसमासत्वात् त्रिविद्यमित्येकवद्भावनपुंसकत्वे।अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियां भाष्यते इत्यस्यपात्रादिभ्यः प्रतिषेधो वक्तव्यः इत्यपवादः।तदधीते तद्वेद [अष्टा.4।2।59] इत्यण्प्रत्ययविवक्षयाऽऽहत्रिविद्यनिष्ठा इति। सर्ववेदविषयत्वे विरोधात्कर्ममात्रविषयत्वज्ञापनायकेवलशब्दः। तदेव विशदयतिन तु त्रय्यन्तनिष्ठा इति। विषयव्यवस्थापनाय पूर्वोक्तानां महात्मनामपि वेदैकदेशभूतोपनिषन्निष्ठत्वं सर्वस्यापि वेदस्य तत्तद्द्वारा भगवत्परत्वस्वीकारं च वदन्? यथावस्थितज्ञानाधीनपुरुषार्थविशेषाभिलाषतदुपायनिष्ठतामात्रेण विशेषात्सिद्धान्तान्तरनिष्ठत्वभ्रमं च व्युदस्यन्? केवलत्रयीनिष्ठवृत्तव्याख्यानावसरे तद्व्यवच्छेद्यमखिलं दर्शयतित्रय्यन्तनिष्ठा हीति। एतेन प्रकरणान्तरेषुचतुर्थी विद्या इति मोक्षसाधनभूता त्रय्यन्तविद्यैवोच्यते इति दर्शितम्। यथाऽऽह जनकाय याज्ञवल्क्यः -- एषा तेऽऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी साम्परायिकी [म.भा.12।318।47] इतिचतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी [म.भा.12।318।35] इति च।वेदप्रतिपाद्येति -- कर्मभागमात्रप्रतिपाद्येत्यर्थः। महात्मनामपि विद्याङ्गकर्मगतसोमपानसद्भावात्तद्व्यवच्छेदायोक्तंकेवलेन्द्रादियागशिष्टेति। अयज्ञशिष्टसोमपानस्याधर्मत्वाद्यागशिष्टत्वोक्तिः।स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते इत्यनन्तरमभिधानात्तत्प्रतिबन्धकपापनिरासकत्वमात्रमेवात्र सोमपानस्येत्यभिप्रायेण स्वर्गादिप्राप्तिविरोधिपापात्पूता इत्युक्तम्। स्वर्गशब्दोपलक्षणार्थत्वज्ञापनायादिशब्दः। पापस्य पूतत्वं नाम निरस्तत्वम् तदेव हि पुरुषस्य पूतत्वमित्यभिप्रायेणपापात्पूता इति निर्देशः। पापान्मुक्ता इत्यर्थः। स्वर्गाद्यर्थिनां तत्त्वतो भगवज्ज्ञानाभावस्य साक्षाद्भगवद्याजिनां भगवत्प्राप्तेः केवलेन्द्रादियागानामपि वस्तुतः परमपुरुषाराधनरूपत्वस्य तज्ज्ञानाभावाच्च तेषां वैकल्यस्यये त्वन्यदेवताभक्ताः [9।23] इत्यादिश्लोकत्रयेण वक्ष्यमाणत्वात्?यज्ञैर्मामिष्ट्वा इत्येतत्परमपुरुषस्य स्वानुसन्धानमात्रमूलं वचः न पुनर्यजमानानुसन्धानमूलमिति ज्ञापनायोक्तंतैरित्यादि अजानन्त इत्यन्तम्। अनुष्ठानस्य फलकामनापूर्वकत्वेऽपि यज्ञानन्तरमेव हि फलं देहीति देवतां प्रति प्रार्थनम् अतःइष्ट्वा प्रार्थयन्ते इति क्रमोपपत्तिः। पुण्यक्रियातज्जन्यादृष्टयोर्लोकसामानाधिकरण्यायोगात् सुरेन्द्रलोकस्य फलमात्ररूपस्य पावनत्वेनाश्रुतत्वात् प्रभूतदुःखासम्भिन्नत्वस्य च श्रुतत्वात्पुण्यप्रतिक्षेप्यपापकार्यदुःखनिवृत्तिपरोऽयं पुण्यशब्द इत्यभिप्रायेणोक्तंदुःखासम्भिन्नमिति। पुण्यसाध्यसुखमयत्वलक्षणायां वा दुःखनिवृत्तिरर्थसिद्धा। पुण्यसाध्यत्वलक्षणायां त्वर्थतः पुनरुक्तिः स्यात्।सुरेन्द्रलोकं प्राप्य इत्युक्तेऽपि पुनःदिवि इति निर्देशो विचित्रभोगाश्रयतत्तदवान्तरप्रदेशविशेषविषयो भवितुमर्हतीतितत्रतत्रेत्युक्तम्।दिव्यानिति मोहनत्वाय भौमभोगवैलक्षण्यकथनम्। दिव्यान् दिवि भवान् देवभोगान् देवानां भोग्यानित्यर्थः। देवभोग्यपशुपुरोडाशादिभौमव्यवच्छेदार्थं चदिव्यशब्दः। देवा हि स्वरूपतः कालतश्च परिमितान् स्वभोगान् स्वयाजिभ्यः संविभजन्ते। अश्नन्ति भुञ्जते? अनुभवन्तीत्यर्थः।भुक्त्वेति ह्यनूद्यते।विशालम् इत्यनेन भौमभोगापेक्षया पृथुत्वसूचनम्।स्वर्गलोकं भुक्त्वेति स्वर्गलोकसम्भवान् भोगाननुभूयेत्यर्थः। नहि स्वर्गानुभवाद्बन्धकपुण्यान्तरक्षयः कर्मशेषेण विशिष्टजात्यादिप्राप्तिः श्रूयत इत्यभिप्रायेणोक्तंतदनुभवहेतुभूत इति। एतेनस्वर्गेऽपि पातभीतस्य [वि.पु.6।5।50] इत्यादि दर्शितम्। मर्त्यशब्देन भूलोकेऽप्यस्थिरत्वं द्योतितम्। एवंशब्दाभिप्रेतेन प्रकारेण त्रयीशब्दस्य तत्र सङ्कोचं? कामकामत्वे हेतुं च दर्शयतिएवं त्रय्यन्तसिद्धज्ञानविधुरा इति। अनुवादोऽयं स्वरूपतो मोक्षानुगुणस्यापि धर्मस्य प्रकारविशेषात्पुनरावृत्तिहेतुत्वमिति ज्ञापनार्थः। पूर्वः कामशब्दः कर्मणि व्युत्पन्न इत्याहकाम्यस्वर्गादिकामा इति। मोक्षस्यापि फलतया काम्यमानत्वात्ततोऽत्र सङ्कोचाय स्वर्गादिशब्दः। केवलशब्देन त्रय्यन्तसिद्धस्वाङ्गिभूतपरमधर्मराहित्योक्तिः। गतं चागतं च गतागतं? तदेव लभन्ते। नहि गमनामनमात्रं दोष इत्यत्राहअल्पेति। अनुभवदशायामप्यल्पत्वात्?यथा पशुरेवं स देवानाम् [बृ.उ.1।4।10] इति प्रक्रिययाऽतिशयितब्रह्मादिसुखानुसन्धानेन दुःखत्वम तस्य चास्थिरत्वानुसन्धानाद्दुःखतरत्वम् तत्प्रध्वंसागमे तु दुःखतमत्वम् घटीयन्त्रन्यायेन पुनरावृत्त्यधीनगर्भवासव्याधिरनिरयादिसम्भवं तु दुःखं वक्तुमपि दुस्सहम् तच्चासङ्ख्यातप्रवाहमिति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।9.21।।ते पुण्यात्मकं सुरेन्द्रलोकमासाद्य प्राप्य दिवि स्वर्गे स्वर्गलोकं विशालं सकलविषयभोगयोग्यं भुक्त्वा भोगेन पुण्ये क्षीणे सति मर्त्यलोकं विशन्ति? प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। एवं प्रकारेण त्रयीधर्ममिष्टं৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. परित्यज्य,कामकामाः सन्तोऽनुप्रपन्नाः गतागतं जन्ममरणात्मकप्रवाहं लभन्ते प्राप्नुवन्तीत्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।9.21।।त्रयी वेदत्रयी तस्यामुक्तं धर्मं त्रयीधर्मं काम्ययज्ञं कामकामाः विषयकामुकाः गतागतं यातायातं सातत्येन लभन्ते। तथाच श्रुतिःप्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यान्ति इति। अष्टादशेति षोडशर्त्विजः यजमानः पत्नी चेति द्वौ।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "When they have thus enjoyed vast heavenly sense pleasure and the results of their pious activities are exhausted, they return to this mortal planet again. Thus those who seek sense enjoyment by adhering to the principles of the three Vedas achieve only repeated birth and death.",
        "ec": " One who is promoted to the higher planetary systems enjoys a longer duration of life and better facilities for sense enjoyment, yet one is not allowed to stay there forever. One is again sent back to this earth upon finishing the resultant fruits of pious activities. He who has not attained perfection of knowledge, as indicated in the Vedānta-sūtra ( janmādy asya yataḥ ), or, in other words, he who fails to understand Kṛṣṇa, the cause of all causes, becomes baffled about achieving the ultimate goal of life and is thus subjected to the routine of being promoted to the higher planets and then again coming down, as if situated on a ferris wheel which sometimes goes up and sometimes comes down. The purport is that instead of being elevated to the spiritual world, from which there is no longer any possibility of coming down, one simply revolves in the cycle of birth and death on higher and lower planetary systems. One should better take to the spiritual world to enjoy an eternal life full of bliss and knowledge and never return to this miserable material existence."
    }
}
