{
    "_id": "BG9.12",
    "chapter": 9,
    "verse": 12,
    "slok": "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः |\nराक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ||९-१२||",
    "transliteration": "moghāśā moghakarmāṇo moghajñānā vicetasaḥ .\nrākṣasīmāsurīṃ caiva prakṛtiṃ mohinīṃ śritāḥ ||9-12||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।9.12।। वृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "9.12 Of vain hopes, of vain actions, of vain knowledge and senseless, they verily are possessed of the deceitful nature of demons and undivine beings.",
        "ec": "9.12 मोघाशाः of vain hopes? मोघकर्माणः of vain actions? मोघज्ञानाः of vain knowledge? विचेतसः senseless? राक्षसीम् devilish? आसुरीम् undivine? च and? एव verily? प्रकृतिम् nature? मोहिनीम् deceitful? श्रिताः (are) possessed of.Commentary They entertain vain hopes? for there can be no hope in perishable forms. It is vain hope because they run after transient objects and miss the Eternal. It is vain action? because it is not performed by them as sacrifice unto the Lord. The Agnihotra (a ritual) and other actions performed by them are fruitless? because they insult the Lord. They are senseless. They have no,discrimination. They have no idea of the eternal Self. They worship their body only. They behold no self beyond the body. They neglect their own Self. They do atrocious crimes and cruel actions. They rob others property and murder people. They partake of the nature of the demons and the undivine beings.The Rakshasa are Tamasic and the Asuras are Rajasic.Prakriti means here Svabhava (ones own nature).They see the external human body only. They have no knowledge of the Self that dwells within the body. They do not behold God in the universe. They life for eating and drinking only.He who entertains hope of getting the rewards of actions through mere Karma alone? without the grace of the Lord is one of empty hope and empty deed. Karmas are insentient. They cannot give rewards independently. The omniscient Lord Who knows the relationship between Karmas and their fruits can dispense them. He who has obtained knowledge from books which do not admit of the existence of the Self and which do not speak of the Self is one of empty knowledge. This will not give any reward. That knowledge obtained through the study of spiritual books which treat of Brahman alone can give the reward. (Cf.VII.15XVI.6?20)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "9.12 Their hopes are vain, their actions worthless, their knowledge futile; they are without sense, deceitful, barbarous and godless."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।9.12।। See commentary under 9.13"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "9.12. [They]  are of futile aspirations, futile actions, futile knowledge and wrong intellect; and they take recourse only to the delusive nature that is demoniac and also devilish."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "9.12 Senseless men entertain a nature which is deluding and akin to that of Raksasas (fiends) and Asuras (monsters). Their hopes are vain, acts are vain and knowledge is vain."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "9.12 Of vain hopes, of vain actions, of vain knowledge, and senseless, they become verily possessed of the deceptive disposition of fiends and demons."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।9.12।।तेषां फलमाह -- मोघाशा इति। वृथाशाः? भगवद्वेषिभिराशासितं न किञ्चिदाप्यते। यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां? ज्ञानं च। केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकस्तैराप्यत इत्यर्थः। वक्ष्यति चतानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् [16।16] इत्यादि। मोक्षधर्मे च [म.भा.12।346।6?7]कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद्विष्णुमव्ययम्। मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः। यो द्विष्याद्विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम्। कथं स न भवेद्वेष्य आलोकान्तस्य (आत्मा लोकस्य) कस्यचित् इति। सर्वोत्कृष्टे ज्ञानभक्ती हि यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये। सर्वावमे द्वेषयुतश्च तस्मिन्भ्रूणानन्तघ्नोऽस्य समो न चैव इति सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम्।द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः [भाग.7।1।30]वैरणं यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रशाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः। ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयुरनुरक्तधियः पुनः किम् [11।5।48] इति भागवते। भक्तिप्रियत्वज्ञापनार्थं नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च? स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलात् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान्ददातीति।भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः शापबलात् द्वेषिणः। तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वशापादिकथनाच्चैतज्ज्ञायते। अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते। भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम्।न मे भक्तः प्रणश्यति [9।31] इति वक्ष्यति। न चभावो हि भवकारणं इत्यादिविरोधः। द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम्। अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्यनिष्टमापद्येत। न चाकृतधीत्वे विशेषः? तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः।हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः। विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः [भाग.4।21।47] इति।यदनिन्दत्पिता मह्यं (मे त्वां) इत्यारभ्यतस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद्दुस्तरादघात् [भाग.7।10।1517] इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च। बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः। कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः। यस्मिंस्तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः।महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात्। अयुक्तिमद्भ्यो युक्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि। युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम्। न चैषां काचिद्गतिः। साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत्। लोकानुकूलं भक्तप्रियत्वं च नेतरत्। उक्तं च तेषां भक्तत्वम्।मन्ये सुरान्भागवतांस्त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् [भाग.3।1।24] इत्यादि। अतो न भगवद्वेषिणां काचिद्गतिरिति सिद्धम्। द्वेषकारणमाह -- राक्षसीमिति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।9.12।।भगवन्तमवजानतां प्रश्नपूर्वकं शोच्यत्वं विशदयति -- कथमिति। भगवन्निन्दापराणां न काचिदपि प्रार्थनार्थवतीत्याह -- वृथेति। ननु भगवन्तं निन्दन्तोऽपि नित्यं नैमित्तिकं वा कर्मानुतिष्ठन्ति? तदनुष्ठानाच्च तेषां प्रार्थनाः सार्था भविष्यन्तीति नेत्याह -- तथेति। परिभवस्तिरस्करणम्? अवज्ञानमनादरणम्। तेषामपि शास्त्रार्थाज्ञानवतां तद्द्वारा प्रार्थनार्थवत्त्वमित्याशङ्क्याह -- तथा मोघेति। तथापि यौक्तिकविवेकवशात्तत्प्रार्थनासाफल्यमित्याशङ्क्याह -- विचेतस इति। न केवलमुक्तविशेषणवत्त्वमेव तेषां किंतु वर्तमानदेहपातादनन्तरं तत्तदतिक्रूरयोनिप्राप्तिश्च निश्चितेत्याह -- किञ्चेति। मोहकरीमिति प्रकृतिद्वयेऽपि तुल्यं विशेषणं? छिन्धि भिन्धि पिब खादेति प्राणिहिंसारूपो रक्षसां स्वभावः? असुराणां स्वभावस्तु न देहि नो जुहुधि परस्वमेवापहरेत्यादिरूपः? मोहो मिथ्याज्ञानम्। उक्तमेव स्फुटयति -- छिन्धीति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।9.12।। जिनकी सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान सत्-फल देनेवाले नहीं होते, ऐसे अविवेकी मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी फकृतिका आश्रय लेते हैं।",
        "hc": "।।9.12।। व्याख्या--'मोघाशाः'--  जो लोग भगवान्से विमुख होते हैं, वे सांसारिक भोग चाहते हैं, स्वर्ग चाहते हैं तो उनकी ये सब कामनाएँ व्यर्थ ही होती हैं। कारण कि नाशवान् और परिवर्तनशील वस्तुकी कामना पूरी होगी ही-- यह कोई नियम नहीं है। अगर कभी पूरी हो भी जाय, तो वह टिकेगी नहीं अर्थात् फल देकर नष्ट हो जायगी। जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक कितनी ही सांसारिक वस्तुओंकी इच्छाएँ की जायँ और उनका फल भी मिल जाय तो भी वह सब व्यर्थ ही है (गीता 7। 23)।'मोघकर्माणः'--भगवान्से विमुख हुए मनुष्य शास्त्रविहित कितने ही शुभकर्म करें, पर अन्तमें वे सभी व्यर्थ हो जायँगे। कारण कि मनुष्य अगर सकामभावसे शास्त्रविहित यज्ञ, दान आदि कर्म भी करेंगे, तो भी उन कर्मोंका आदि और अन्त होगा और उनके फलका भी आदि और अन्त होगा। वे उन कर्मोंके फलस्वरूप ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें भी चले जायँगे, तो भी वहाँसे उनको फिर जन्म-मरणमें आना ही पड़ेगा। इसलिये उन्होंने कर्म करके केवल अपना समय बरबाद किया, अपनी बुद्धि बरबाद की और मिला कुछ नहीं। अन्तमें रीते-के-रीते रह गये अर्थात् जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला था, उस लाभसे सदा ही रीते रह गये। इसलिये उनके सब कर्म व्यर्थ, निष्फल ही हैं।तात्पर्य यह हुआ कि ये मनुष्य स्वरूपसे साक्षात् परमात्माके अंश हैं, सदा रहनेवाले हैं और कर्म तथा उनका,फल आदि-अन्तवाला है; अतः जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी, तबतक वे सकामभावपूर्वक कितने ही कर्म करें और उनका फल भोंगे, पर अन्तमें दुःख और अशान्तिके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा।\n\nजो शास्त्रविहित कर्म अनुकूल परिस्थिति प्राप्त करनेकी इच्छासे सकामभावपूर्वक किये जाते हैं, वे ही कर्म व्यर्थ होते हैं अर्थात् सत्-फल देनेवाले नहीं होते। परन्तु जो कर्म भगवान्के लिये, भगवान्की प्रसन्नताके लिये किये जाते हैं और जो कर्म भगवान्के अर्पण किये जाते हैं, वे कर्म निष्फल नहीं होते अर्थात् नाशवान् फल देनेवाले नहीं होते, प्रत्युत सत्-फल देनेवाले हो जाते हैं-- 'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते'(गीता 17। 27)।    सत्रहवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि जिनकी मेरेमें श्रद्धा नहीं है अर्थात् जो मेरेसे विमुख हैं, उनके द्वारा किये गये यज्ञ, दान, तप आदि सभी कर्म असत् होते हैं अर्थात् मेरी प्राप्ति करानेवाले नहीं होते। उन कर्मोंका इस जन्ममें और मरनेके बाद भी (परलोकमें) स्थायी फल नहीं मिलता, अर्थात् जो कुछ फल मिलता है? विनाशी ही मिलता है। इसलिये उनके वे सब कर्म व्यर्थ ही हैं।    'मोघज्ञाना'--उनके सब ज्ञान व्यर्थ हैं। भगवान्से विमुख होकर उन्होंने संसारकी सब भाषाएं सीख लीं, सब लिपियाँ सीख लीं, तरहतरहकी कलाएँ सीख लीं, तरहतरहकी विद्याओंका ज्ञान प्राप्त कर लिया, कई तरहके आविष्कार कर लिये, अनन्त प्रकारके ज्ञान प्राप्त कर लिये, पर इससे उनका कल्याण नहीं होगा, जन्ममरण नहीं छूटेगा। इसलिये वे सब ज्ञान निष्फल हैं। जैसे, हिसाब करते समय एक अंककी भी भूल हो जाय तो हिसाब कभी सही नहीं आता, सब गलत हो जाता है, ऐसे ही जो भगवान्से विमुख हो गये हैं, वे कुछ भी ज्ञानसम्पादन करें, वह सब गलत होगा और पतनकी तरफ ही ले जायगा।    'विचेतसः'--  उनको सार-असार, नित्य-अनित्य, लाभहानि, कर्तव्य-अकर्तव्य, मुक्ति-बन्धन आदि बातोंका ज्ञान नहीं है।  'राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः'--  ऐसे वे अविवेकी और भगवान्से विमुख मनुष्य आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति अर्थात् स्वभावका आश्रय लेते हैं।जो मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करनेमें, अपनी कामना-पूर्ति करनेमें, अपने प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे रहते हैं, दूसरोंको कितना दुःख हो रहा है, दूसरोंका कितना नुकसान हो रहा है -- इसकी परवाह ही नहीं करते, वे आसुरी स्वभाववाले होते हैं।       जिनके स्वार्थमें, कामना-पूर्तिमें बाधा लग जाती है, उनको गुस्सा आ जाता है और गुस्सेमें आकर वे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये दूसरोंका नुकसान कर देते हैं, दूसरोंका नाश कर देते हैं, वे 'राक्षसी' स्वभाववाले होते हैं।जिसमें अपना न स्वार्थ है, न परमार्थ है और न वैर है, फिर भी बिना किसी कारणके जो दूसरोंका नुकसान कर देते हैं, दूसरोंको कष्ट देते हैं (जैसे, उड़ते हुए पक्षीको गोली मार दी, सोते हुए कुत्तेको लाठी मार दी और फिर राजी हो गये), वे मोहिनी स्वभाववाले होते हैं।परमात्मासे विमुख होकर केवल अपने प्राणोंको रखनेकी अर्थात् सुखपूर्वक जीनेकी जो इच्छा होती है, वह आसुरी प्रकृति है। ऊपर जो तीन प्रकारकी प्रकृति (आसुरी, राक्षसी और मोहिनी) बतायी गयी है, उसके मूलमें आसुरी प्रकृति ही है अर्थात् आसुरी सम्पत्ति ही सबका मूल है। एक आसुरी सम्पत्तिके आश्रित होनेपर राक्षसी और मोहिनी प्रकृति भी स्वाभाविक आ जाती है। कारण कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंका ध्येय होनेसे सब अनर्थपरम्परा आ ही जाती है। उसी आसुरी सम्पत्तिके तीन भेद यहाँ बताये गये हैं -- कामनाकी प्रधानतावालोंकी आसुरी, क्रोधकी प्रधानतावालोंकी राक्षसी और मोह(मूढ़ता) की प्रधानतावालोंकी मोहिनी प्रकृति होती है। तात्पर्य है कि कामनाकी प्रधानता होनेसे आसुरी प्रकृति आती है। जहाँ कामनाकी प्रधानता होती है, वहाँ राक्षसी प्रकृति -- क्रोध आ ही जाता है-- 'कामात्क्रोधोऽभिजायते'  (गीता 2। 62) और जहाँ क्रोध आता है, वहाँ मोहिनी प्रकृति (मोह) आ ही जाता है-- 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः' (2। 63)। यह सम्मोह लोभसे भी होता है और मूर्खतासे भी होता है।\n\n सम्बन्ध--चौथे श्लोकसे लेकर दसवें श्लोकतक भगवान्ने अपने प्रभाव, सामर्थ्य आदिका वर्णन किया। उस प्रभावको न माननेवालोंका वर्णन तो ग्यारहवें और बारहवें श्लोकमें कर दिया। अब उस प्रभावको जानकर भजन करनेवालोंका वर्णन आगके श्लोकमें करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।9.12।।मम मनुष्यत्वे परमकारुण्यादिपरत्वतिरोधानकरीं राक्षसीम् आसुरीं च मोहिनीं प्रकृतिम् आश्रिताः? मोघाशाः मोघवाञ्छिता निष्फलवाञ्छिताः? मोघकर्माणः मोघारम्भाः? मोघज्ञानाः सर्वेषु मदीयेषु चराचरेषु अर्थेषु मयि च विपरीतज्ञानतया निष्फलज्ञानाः विचेतसः तथा सर्वत्र विगतयाथात्म्यज्ञानाः? मां सर्वेश्वरम् इतरसमं मत्वा मयि यत् कर्तुम् इच्छन्ति? यद् उद्दिश्य आरम्भान् कुर्वते? तत् सर्वं मोघं भवति इत्यर्थः।",
        "et": "9.12 Men yielding to the deluding nature characteristics of Asuras and Raksas and not aware of My higher nature like compassion etc. When I am in a human form, are possessed of vain hopes, i.e, their hopes remain fruitless, and their knowledge also is vain, i.e., is fruitless. They are so because of their erroneous understanding which fails to know that all things, mobile and immobile, belong to Me. They are ignorant on account of their being devoid of knowledge of truth everywhere. Whatever they do regarding Me, the Lord of all, is done with an attitude that I am an ordinary mortal. So their efforts go in vain. All this springs from their partaking of the nature of Raksasas and Asuras."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।9.12।।मोघेति।  तेषां च कर्म ज्ञानम् आकांक्षाश्च सर्वं निष्फलम्? अवस्तुविषयत्त्वात्।  आसुरीं राक्षसीं चेति -- उद्रिक्तरजस्तमोधर्माण इति।",
        "et": "9.12 Mogha-etc.  Their action, knowledge and aspirations are all futile, as these are concerned with the unreal.  The demoniac and devilish nature etc.  They are of the nature of excessive desire and ignorance."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।9.12।।क्योंकि --, वे मोघाशा -- जिनकी आशाएँ -- कामनाएँ व्यर्थ हों ऐसे व्यर्थ कामना करनेवाले और मोघकर्मा -- व्यर्थ कर्म करनेवाले होते हैं क्योंकि उनके द्वारा जो कुछ अग्निहोत्रादि कर्म किये जाते हैं वे सब अपने अन्तरात्मारूप भगवान्का अनादर करनेके कारण निष्फल हो जाते हैं। इसलिये वे मोघकर्मा होते हैं। इसके अतिरिक्त वे मोघज्ञानी -- निष्फल ज्ञानवाले होते हैं? अर्थात् उनका ज्ञान भी निष्फल ही होता है। और वे विचेता अर्थात् विवेकहीन भी होते हैं। तथा वे मोह उत्पन्न करनेवाली देहात्मवादिनी राक्षसी और आसुरी प्रकृतिका यानी राक्षसोंके और असुरोंके स्वभावका आश्रय करनेवाले हो जाते हैं। अभिप्राय यह कि तोड़ो? फोड़ो? पिओ? खाओ? दूसरोंका धन लूट लो इत्यादि वचन बोलनेवाले और बड़े क्रूरकर्मा हो जाते हैं। श्रुति भी कहती है कि वे असुरोंके रहने योग्य लोक प्रकाशहीन हैं  इत्यादि।",
        "sc": "।।9.12।। --,मोघाशाः वृथा आशाः आशिषः येषां ते मोघाशाः? तथा मोघकर्माणः यानि च अग्निहोत्रादीनि तैः अनुष्ठीयमानानि कर्माणि तानि च? तेषां भगवत्परिभवात्? स्वात्मभूतस्य अवज्ञानात्? मोघान्येव निष्फलानि कर्माणि भवन्तीति मोघकर्माणः। तथा मोघज्ञानाः मोघं निष्फलं ज्ञानं येषां ते मोघज्ञानाः? ज्ञानमपि तेषां निष्फलमेव स्यात्। विचेतसः विगतविवेकाश्च ते भवन्ति इत्यभिप्रायः। किञ्च -- ते भवन्ति राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावम् आसुरीम् असुराणां च प्रकृतिं मोहिनीं मोहकरीं देहात्मवादिनीं श्रिताः आश्रिताः? छिन्द्धि? भिन्द्धि? पिब? खाद? परस्वमपहर? इत्येवं वदनशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्ति इत्यर्थः?  असुर्या नाम ते लोकाः (ई0 उ0 3) इति श्रुतेः।।ये पुनः श्रद्दधानाः भगवद्भक्तिलक्षणे मोक्षमार्गे प्रवृत्ताः --,",
        "et": "9.12 Moghasah, of vain hopes. So also, mogha-karmanah, of vain actions: their rites, such as Agnihotra etc. which are undertaken by them, verily become vain, fruitless actions, because of dishonouring the Lord, disregarding Him who is their own Self. In this way they are of vain actions.\nSimilarly, mogha-jnanah, of vain knowledge: of fruitless knowledge; even their knowledge verily becomes useless. And vicetasah, senseless: i.e., they lose their power of discrimination. Besides, [Besides, in the next birth৷৷.] they become sritah, possessed of; the mohinim, self-deceptive, self-delusive; prakritim, disposition; raksasim, of fiends; and asurim, of demons-according to which the body is the Self; i.e., they become habitually inclined to act cruelly, saying, 'cut, break, drink, eat, steal others' wealth,' etc. [The habit to cut, break, drink, eat, etc. is characteristic of fiends. The habit of stealing others' wealth, etc. is characteristic of demons.] This is stated in the Sruti, 'Those worlds of devils (are covered by blinding darkness)' (Is. 3)."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।9.12।।किञ्च तेषां फलमित्यस्य परिहारो न दृश्यते अत आह -- तेषामिति। अनर्थत्वप्रदर्शनाय व्याचष्टे -- वृथेति। सम्पदादिप्राप्तिदर्शनात्कथमित्यत आह -- भगवदिति। युद्धादिकर्मणां साफल्यदर्शनात्कथं मोघकर्माणः इत्यत आह -- यज्ञादीति। ज्ञानं तत्त्वविषयं तेषां नास्त्येव? अतः कथं तस्य मोघत्वमुच्यते इत्यत आह -- ज्ञानं चेति। ज्ञानं च तेषां वृथैवेत्यस्य केनापीत्यर्थ इति सम्बन्धः। अनेन ज्ञानपदमुपलक्षणमिति चोक्तं भवति। न केवलं पुरुषार्थानवाप्तिः? अपितु दुःखावाप्तिश्चेति भावेन तत्र प्रमाणान्याह -- वक्ष्यति चेति। आ सम्यक् लोकान्तस्य चण्डालादेः। पुष्करविष्टराद्ये पद्मासनस्य पितरि। भ्रूणानन्तघ्नोऽनन्तभ्रूणघ्नः। यद्येवं? कथं तर्हि भागवतादौ भगवद्द्वेषस्य मोक्षसाधनत्ववचनम् इत्यत आह -- द्वेषादिति। तद्गतिं गता इति सम्बन्धः। वैरेण ध्यायन्तः यदीयगत्यादिभिराकृतधियः आकृष्टबुद्धयः। ये पूर्वं भक्ताः शिशुपालादयस्तद्विषये भवत्वेषा गतिः? न तु पौण्ड्रशाल्वादिविषये? अत आह -- नित्येति। भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थमित्युक्तं विवृणोति -- स्वभक्तस्येति। इति भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थमिति योजना।स्यादेतत्? यदि तेषां स्वतो भक्तत्वं शापबलादेव द्वेषित्वमित्येतत्प्रमितं स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह -- भक्ता एव हीति। प्रसिद्धमेवैतत् भागवतादावित्यर्थः। कुतो वचनानामर्थान्तरकल्पनेति चेत्?यो द्विष्यात् इत्याद्युदाहृतवाक्याविरोधात्। हेत्वन्तरं चाह -- तत्प्रश्नेति।अहो अत्यद्भुतं ह्येतद्दुर्लभैकान्तिनामपि। वासुदेवे भगवति गतिश्चैद्यस्य विद्विषः [भाग.7।1।15] इति युधिष्ठिरेण द्वेषिणः कथं मुक्तिर्जातेत्येवंरूपे तद्विषये प्रश्ने कृते सति नारदेनमातृष्वसेयो वश्चैद्यो दन्तवक्त्रश्च पाण्डव। पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात्पदच्युतौ [भाग.7।1।32] इति तदुत्तरत्वेन पूर्वपार्षदत्वादिकं कथ्यते। ततोऽपि द्वेषो न मोक्षसाधनमित्येततज्ज्ञायते। कथमित्यत आह -- अन्यथेति। यदि द्वेषो मोक्षसाधनं स्यात्तदा किमत्राद्भुतम् यतो द्वेषोऽप्येको मुक्तिमार्ग इत्युत्तरं वक्तव्यम्। पूर्वपार्षदत्वादिकं त्वप्रस्तुतमनुपयुक्तं न वक्तव्यं स्यादित्यर्थः। ननु नारदेननिन्दनस्तवसत्कारन्यक्वारार्थं [भाग.7।1।22] इत्यादिना भगवतो निन्दादौ साम्यमपि तदुत्तरत्वेन कथ्यते? यदि स्तुतेरिव निन्दाया तु मोक्षसाधनत्वं स्यात्तदा तदनुपयुक्तं न वक्तव्यमिति सत्प्रतिपक्षार्थापत्तिरित्यतोऽस्यान्यथोपपत्तिमाह --  भगवत इति। साम्यं निर्विकारत्वम्। भक्तानामपराधं भगवान्न गणयतीत्येतत्कुतः इत्यत आह -- नेति। द्वेषस्य मुक्तिसाधनत्वाभावेभावो यथा कथञ्चिच्चिन्तनं? भवस्य मोक्षस्य कारणम् इत्यादिवचनविरोधः स्यादित्यत आह -- न चेति। कुतो नेत्यत आह -- द्वेषेति। हि यस्मादेतद्वचनमिति युक्तं घटनोपेतं तस्मादित्यर्थः। यथोक्तम्यादृशी भावना ज्ञेया सिद्धिर्भवति तादृशी [   ] इति। प्रतीत एवार्थः किं न स्यात् इत्यत आह -- अन्यथेति। भगवद्द्वेषिणो मुक्तिभाजः तदाकृतधीत्वात्? भगवद्भक्तवत् इत्यनुमानविरोध इत्यत आह -- नचेति। उभयोराकृतधीत्वे सति फलेऽप्यविशेष इति च नेत्यर्थः। कुतः इत्यतः कालातीतत्वादित्याह -- तेषामेवेति। आकृतधीनामेव। विविक्षुर्वक्ष्यतीति सम्भावनाविषयः। आशङ्कायामचेतनेषूपसङ्ख्यानात्। मह्यं मम। ननु वचनत्वाविशेषात्यो द्विष्यात् इत्यादिभिःद्वेषाच्चेद्यादयः इत्यादीनां कथं बाधनं इत्यत आह -- बह्विति। निषेधो द्वेषस्य मुक्तिसाधनतायाः। न केवलं बहुत्वाबहुत्वरूपोऽनयोर्विशेषः। किन्तु स्वव्याहतत्वास्वव्याहतत्वरूपोऽपीत्याह -- यस्मिन्निति। भागवतादौ ग्रन्थेभगवन्निन्दया इत्यादिर्निषेधः।भगवद्गुणोत्कर्ष एव सर्ववेदानां यन्महातात्पर्यं तद्विरोधो द्वेषान्मुक्तिवाचिनाम्? इतरेषां तु तदानुकूल्यमिति च विशेष इति भावेनाह -- महातात्पर्येति। उक्तः उक्तप्रायः। इतोऽपि बाध्यबाधकभावो युक्त इति भावेन व्याप्तिं तावदाह -- अयुक्तिमद्भ्य इति। सप्तम्यर्थे मतुप्। ततः किमित्यत आह -- युक्तयश्चेति। महातात्पर्यविरोधश्चेत्यपेक्षया। अन्येषामनुकूलाः।अव्ययं विबुधश्रेष्ठम्पुष्करविष्टराद्ये इति। सावकाशत्वनिरवकाशत्वविशेषाच्चैवमित्याह -- न चेति। इतरेषां तूक्तैवेति शेषः। इतश्च बाध्यबाधकभावो युक्त इत्यभिप्रेत्य व्याप्तिं तावदाह -- साम्येऽपीति। गुणान्तरेण साम्येऽपीति कैमुत्यार्थं लोकानुकूलशब्देन,लोकदृष्टव्याप्तिकानुमानानुकूलत्वमुच्यते। ततः किमित्यत आह -- लोकेति। इतरद्द्वेषिप्रियत्वं भगवत्प्रीत्यैव मोक्ष इति तु प्रसिद्धमेव। शिशुपालादीनां पूर्वभक्तत्वं प्रसिद्धमित्युक्तम्? तत्कथमिति चेत्? पार्षदत्वात्? वचनाच्चेत्याह -- उक्तं चेति। त्रयाणां लोकानामधीशे। संरम्भेण मार्गमात्रेणाभिनिविष्टचित्तान्। उपसंहरति -- अत इति। गतिः सद्गतिः। स्वमौढ्यादेव मामवजानन्ति। न मद्दोषात्तेषां न महाननर्थ इति सर्वं समाहितम्। राक्षसीमित्यादि तु किमर्थं इत्यत आह -- द्वेषेति। मौढ्यान्मिथ्याज्ञानं भवतु? प्रज्वलनात्मको द्वेषस्तु कुतः इत्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमिति शेषः। अन्येषामविद्यमानं मौढ्यमेव तेषां कुतः इत्याशङ्कानिरासार्थमिति वा। अत्र कारणमिति मूलकारणम्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।9.12।।न केवलमजानन्त इत्येव वक्तव्यं सर्वस्य तथात्वात्। किञ्च ते मोघाशाः परमार्थतो मोघे स्वर्गादौ देवतायां च ईश्वरं विना कर्मैव फलदमिति मोघा वा आशा येषां ते? अतएव मोघकर्माणः मोघमेव च ज्ञानमासुरं मायावादादिशास्त्रोपदेशजन्यं येषां तत एव विक्षिप्तचेतसः। सर्वत्र हेतुः राक्षसीमासुरीं चेति। मम मनुष्यानुकरणे परमकारुण्यादिपरत्वभावनिरोधकरीं प्रकृतिं स्वभावरूपां शब्दादिविषयैकपरां राजसीमासुरीं मायेत्यसुरा इति श्रूयमाणां श्रिताः राक्षसीं तामसीं शिश्नोदरभरणैकस्वभावरूपां तथा मोहिनीं सात्विकराजसी मानुषीं प्रकृतिं संश्रिता इत्यासुरादयो मामवजानन्ति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।9.12।।ते च भगवदवज्ञाननिन्दनजनितमहादुरितप्रतिबद्धबुद्धयो निरन्तरं निरयनिवासार्हा एव -- ईश्वरमन्तरेण कर्माण्येव नः फलं दास्यन्तीत्येवंरूपा मोघा निष्फलैवाशा फलप्रार्थना येषां ते। अतएवेश्वरविमुखत्वान्मोघानि श्रममात्ररूपाण्यग्निहोत्रादीनि कर्माणि येषां ते। तथा मोघमीश्वराप्रतिपादककुतर्कशास्त्रजनितं ज्ञानं येषां ते। कुत एवं। यतो विचेतसो भगवदवज्ञानजनितदुरितप्रतिबद्धविवेकविज्ञानाः। किंच ते भगवदवज्ञानवशात् राक्षसीं तामसीं अविहितहिंसाहेतुद्वेषप्रधानां आसुरीं च राजसीं शास्त्रानभ्यनुज्ञातविषयभोगहेतुरागप्रधानां च। मोहिनीं शास्त्रीयज्ञानभ्रंशहेतुं प्रकृतिं स्वभावमाश्रिता एव भवन्ति। ततश्चत्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभः इत्युक्तनरकद्वारभागितया नरकयातनामेव ते सततमनुभवन्तीत्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।9.12।।किंच -- मोघाशा इति। मत्तोऽन्यद्देवतान्तरं क्षिप्रं फलं दास्यतीत्येवंभूता मोघा निष्फलैवाशा येषां ते। अतएव मद्विमुखत्वान्मोघानि व्यर्थानि कर्माणि येषां ते। मोघमेव नानाकुतर्काश्रितं शास्त्रज्ञानं येषां ते। अतएव विचेतसो विक्षिप्तचित्ताः। सर्वत्र हेतुः। राक्षसीं तामसीं हिंसादिप्रचुराम् आसुरीं च राजसीं कामदर्पादिबहुलाम् मोहिनीं बुद्धिभ्रंशकरीं प्रकृतिं स्वभावं श्रिताः आश्रिताः सन्तो मामवजानन्तीति पूर्वेणान्वयः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।9.12।।ततश्च तेषामनादरणेन तिरस्कारणएन निन्दया च हतानां सर्वपुरुषार्थभ्रष्टानां अतिक्षुद्राणां केनापि कापि प्रार्थना न सिध्यतीत्याह -- मोघाशा इति। माघो व्यर्था आशा आशिषस्तत्तद्वस्तुप्रार्थना येषां ते। ननु तेषां प्रार्थना अग्निहोत्रादिकर्मानुष्ठानात्सार्था भविष्यतीतिचेत् भगवन्तिमात्मानमवजानतामग्निहोत्रादिकर्मणां श्रममात्रत्वेन नैष्फल्यान्नेत्याह -- मोघकर्माण इति। मोघानि निष्पलान्येव श्रमहेतुभूतानि अग्निहोत्रादीनि कर्माणि येषां ते। तदुक्तम्धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासुः यः। नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् इति। ननु भगवन्तमवजानन्तोऽपि ज्ञानिनो दृश्यन्ते ज्ञानाच्च तेषां मोक्षप्रार्थना सार्था भविष्यतीतिचेत्। भगवदवज्ञानसहितस्य तस्य साक्षात्काराहेतुत्वेन मोक्षाहेतुत्वान्नेत्याह। मोघज्ञाना मोघं निष्फलं ज्ञानं येषां ते। तदुक्तंनैष्कर्म्यम्पयत्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जमनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे च चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् इति। विगतचेतसो विगतविवेकाश्चेति भाष्ये चो हेतौ। यतो भगवदवज्ञानेन कर्मादीनि निष्फलानि तद्भक्त्या तु सफलानीति विवेकशून्या अत एतादृशास्ते भवन्तीत्यभिप्रायः। किंच यतो राक्षसीं रक्षसां प्रकृतिं स्वभावं च्छिन्धि भिन्धि पिब खादेत्येवंरुपाम्? आसूरीमसुराणां च प्रकृतिं न देहि न जुहुधि परस्वमपहरेत्येवंरुपां मोहिनीं मोहकारीं देहात्माभिमानरुपां श्रिता आश्रिताः क्रूरकरर्माणस्ते भवन्ति अतोऽपि तेषामुक्तविशेषणवत्त्वमित्यर्थः। यद्वा किंच न केवलमुक्तविशेषणवत्त्वमेव तेषामपि तु एतादृशा अपीत्याह -- राक्षसीमिति। अथवा न केवलं वर्तमानदेह एवैतादृशाः किंतु वर्तमानदेहपातानन्तरमेतेषां तत्तदतिक्रूरयोनिप्राप्तिश्च निश्चितेत्याह -- राक्षसीमिति। तथाच श्रुतिःअसूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः। तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये केचात्महनो जनाः इति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।9.12।।मोघाशाः इति श्लोकेन प्रस्तुतस्य हेतुफले प्रतिपाद्येते। मोहिनीप्रकृत्याश्रयणं हि मोघाशत्वादौ हेतुरिति पूर्वमुत्तरार्धव्याख्या। राक्षसीं रक्षस्सम्बन्धिनीं तामसीं? आसुरीमसुरसम्बन्धिनीं राजसीं क्रोधलोभादिमयीमित्यर्थः प्रकृतिंस्वभावमित्यर्थः।यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः। भूतान् प्रेतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः [17।4]मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरमथवा तामसात्मकम्। यस्मात्क्षिपसि गोविन्दं पाण्डवं च धनञ्जयम् इत्यादिष्विवेति द्रष्टव्यम्।मोहिनीम् इत्यनेन भगवत्परत्वतिरोधानादिकमभिप्रेतम्।मोघाशाः इति समासांशद्वयार्थकथनंमोघवाञ्छिता निष्फलवाञ्छिता इति। फलपर्यन्तकर्मस्वरूपासिद्ध्यभिप्रायेणमोघारम्भा इत्युक्तम्। उपक्रमप्रभृति निष्फलप्रवृत्तय इत्यर्थः। ज्ञानस्य मोघत्वं हि स्वाधीनप्रवृत्त्यभिमतफलराहित्यम्। तच्चायथार्थत्वनिबन्धनम्। तस्य चात्र विषयविशेषनिर्देशाभावाद्यथासम्भवं सर्वविषयत्वमुचितमित्यभिप्रायेणाहसर्वेष्विति। वैपरीत्यं च अस्वतन्त्रे स्वतन्त्रत्वम्? अन्यदीये स्वकीयत्वम्? अजडे नित्ये जडत्वानित्यत्वादिकम्? अस्थिरे स्थिरत्वमित्यादिकं द्रष्टव्यम्।मोघज्ञानाः इति ज्ञानविशेषस्य विहितत्वात्तत एव तत्कारणस्य च निषेद्धुमशक्यत्वात्विचेतसः इति निषेधस्तदतिरिक्तज्ञानपर इत्यभिप्रायेणाहसर्वत्र विगतयाथात्म्यज्ञाना इति। ननु मोघाशत्वादिकमसिद्धं? स्वर्गफलाद्यभिलषितसिद्धेः? तदुपायभूतयागादिषु यथार्थज्ञानाच्चेत्यत्राहमामिति। अत्र,यथार्थज्ञानाभावान्मोघज्ञानत्वम्? तत एव मोघाशत्वमोघारम्भत्वे इति क्रमः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।9.12।।तेषां मूढत्वं विशदयति -- मोघाशा इति। मोघाशाः मोघं निष्फलं असमर्पितान्नं केवलं देहपोषार्थं अश्नन्ति भक्षयन्तीति तथा। मोघं निष्फलमेव भगवत्सेवातिरिक्तकर्मकर्त्तारः। मोघज्ञानाः मोघं निष्फलं मोहकशास्त्रोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानातिरिक्तज्ञानयुक्ताः। विचेतसः अव्यवस्थितमनसः। राक्षसीं स्वदेहपोषणरूपाम्। च पुनः। आसुरीं परोपद्रवकरणरूपां मोहिनीं मद्विस्मारिकां प्रकृतिमेव मायामेव स्वभावमाश्रिताः। अतएव मां मानुषीं तनुमाश्रितं ज्ञात्वा अवमन्यन्त इति पूर्वेणान्वयः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।9.12।।मदवज्ञानाच्च ते मोघाशाः वृथैव आशा आशिषो येषां ते मोघाशाः। तथा मोघकर्माणो निष्फलोद्योगाः। मोघज्ञानाः निष्फलज्ञानाः। यतो विचेतसो निर्विवेकाः। यतो राक्षसीमासुरीं च रजस्तमःप्रधानां मोहिनीं मोहकरीं प्रकृतिं श्रिताः। छिन्धि भिन्धि पिब खाद परस्वमपहरेत्येवंवादशीलाः क्रूरकर्माणो भवन्तीत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Those who are thus bewildered are attracted by demonic and atheistic views. In that deluded condition, their hopes for liberation, their fruitive activities, and their culture of knowledge are all defeated.",
        "ec": " There are many devotees who assume themselves to be in Kṛṣṇa consciousness and devotional service but at heart do not accept the Supreme Personality of Godhead, Kṛṣṇa, as the Absolute Truth. For them, the fruit of devotional service – going back to Godhead – will never be tasted. Similarly, those who are engaged in fruitive pious activities and who are ultimately hoping to be liberated from this material entanglement will never be successful either, because they deride the Supreme Personality of Godhead, Kṛṣṇa. In other words, persons who mock Kṛṣṇa are to be understood to be demonic or atheistic. As described in the Seventh Chapter of Bhagavad-gītā , such demonic miscreants never surrender to Kṛṣṇa. Therefore their mental speculations to arrive at the Absolute Truth bring them to the false conclusion that the ordinary living entity and Kṛṣṇa are one and the same. With such a false conviction, they think that the body of any human being is now simply covered by material nature and that as soon as one is liberated from this material body there is no difference between God and himself. This attempt to become one with Kṛṣṇa will be baffled because of delusion. Such atheistic and demoniac cultivation of spiritual knowledge is always futile. That is the indication of this verse. For such persons, cultivation of the knowledge in the Vedic literature, like the Vedānta-sūtra and the Upaniṣads, is always baffled. It is a great offense, therefore, to consider Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead, to be an ordinary man. Those who do so are certainly deluded because they cannot understand the eternal form of Kṛṣṇa. The Bṛhad-viṣṇu-smṛti clearly states: yo vetti bhautikaṁ dehaṁ kṛṣṇasya paramātmanaḥ sa sarvasmād bahiṣ-kāryaḥ śrauta-smārta-vidhānataḥ mukhaṁ tasyāvalokyāpi sa-celaṁ snānam ācaret “One who considers the body of Kṛṣṇa to be material should be driven out from all rituals and activities of the śruti and the smṛti. And if one by chance sees his face, one should at once take bath in the Ganges to rid himself of infection.” People jeer at Kṛṣṇa because they are envious of the Supreme Personality of Godhead. Their destiny is certainly to take birth after birth in the species of atheistic and demoniac life. Perpetually, their real knowledge will remain under delusion, and gradually they will regress to the darkest region of creation."
    }
}
