{
    "_id": "BG8.18",
    "chapter": 8,
    "verse": 18,
    "slok": "अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे |\nरात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ||८-१८||",
    "transliteration": "avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame .\nrātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake ||8-18||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।8.18।। (ब्रह्माजी के) दिन का उदय होने पर अव्यक्त से (यह) व्यक्त (चराचर जगत्) उत्पन्न होता है; और (ब्रह्माजी की) रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "8.18 From the Unmanifested all the manifested (worlds) proceed at the coming of the 'day'; at the coming of the 'night' they dissolve verily into ï1thatï1 alone which is called the Unmanifested.",
        "ec": "8.18 अव्यक्तात् from the Unmanifested? व्यक्तयः the manifested? सर्वाः all? प्रभवन्ति proceed? अहरागमे at the coming of day? रात्र्यागमे at the coming of night? प्रलीयन्ते dissolve? तत्र there? एव verily? अव्यक्तसंज्ञके in that which is called the Unmanifested.Commentary When Brahma awakes? all manifestations? moving and unmoving (animate and inanimate) stream forth at the coming of the day from the Avyakta or the Unmanifested. When Brahma goes to sleep? all the manifestations merge in the Unmanifested? for the cosmic night has set in.Coming of the day Commencement of creation.Coming of the night Commencement of dissolution. (Cf.IX.7and8)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "8.18 At the dawning of that day all objects in manifestation stream forth from the Unmanifest, and when evening falls they are dissolved into It again."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।8.18।। See Commentary under 8.19.,"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "8.18. While the day approaches, all manifestations issue forth from the unmanifest and while the night approaches they dissolve into the same that bears the name 'the unmanifest.'"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "8.18 With the coming of day all manifested things emerge from the Unmanifest and when night comes they merge in that itself which is called the Unmanifested. \n\n8.18 From the Unmanifested all the manifested (worlds) proceed at the coming of the 'day'; at the coming of the 'night' they dissolve verily into ï1thatï1 alone which is called the Unmanifested.\n\n8.18 Ahar-agame, with the coming of day, at the time when Brahma wakes; sarvah vyaktayah, all manifested things, all things that get manifested, all creatures characterized as moving and non-moving; prabhavanti, emerge, become manifested; avyaktat, from the Unmanifested-avyakta (Unmanifested) is the state of sleep of Prajapati; from that avyakta. Similarly, ratri-agame, when night comes, at the time when Brahma sleeps; praliyante, they, all the manifested things, merge; tatra eva, in that itself; avyakta-sanjnake, which is called the Unmanifested referred to above.\nIn order to obviate the defect of the emergence of some unmerited result and the destruction of merited results; [The following verse says that the very same multitude of beings continues in the different cycles of creation, and there-fore these two defects do not arise.] for pointing out the meaningfulness of the scriptures [For the earlier reason the scriptures do not lose their validity.] dealing with bondage and Liberation; and with a view to propounding detachment from the world on the ground that the helpless multitude of beings perishes after being born again and again under the influence of accumulated results of actions that have for their origin such evils as ignorance etc. [The five evils are: ignorance, egoism, attachment, aversion and clinging to life. (See P. Y. Su. 2.3)], the Lord says this:"
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "8.18 With the coming of day all manifested things emerge from the Unmanifest and when night comes they merge in that itself which is called the Unmanifested."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।8.17 -- 8.19।।मां प्राप्य न पुनरावृत्तिरिति स्थापयितुं अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति -- सहस्रयुगेत्यादिना। सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची। ब्रह्मपरम्। सा विश्वरूपस्य रजनी इति श्रुतिः। द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः।अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः [8।18] इत्युक्तेः। उक्तं च महाकौर्मेअनेकयुगपर्यन्तं महाविष्णोस्तथा निशा। रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ तु जायते इति च।यः स सर्वेषु भूतेषु [8।20] इति वाक्यशेषाच्च।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।8.18।।यतः प्रजापतेरहस्तद्युगसहस्रपरिमितं या च तस्य रात्रिः सापि तथेति कालविदामभिप्रायमनुसृत्य ब्राह्मस्याहोरात्रस्य कालपरिमाणं दर्शयित्वा तत्रैव विभज्य कार्यं कथयति -- प्रजापतेरिति। अव्यक्तमव्याकृतमिति शङ्कां वारयति -- अव्यक्तमित्यादिना। जातिप्रतियोगिभूता व्यक्तीर्व्यावर्तयति -- स्थावरेति। असदुत्पत्तिप्रसक्तिं प्रत्यादिशति -- अभिव्यज्यन्त इति। पूर्वोक्तमव्यक्तसंज्ञकं स्वापावस्थं ब्रह्म प्रजापतिशब्दितं तस्मिन्निति यावत्।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।8.18।। ब्रह्माजीके दिनके आरम्भकालमें अव्यक्त- (ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर-) से सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं और ब्रह्माजीकी रातके आरम्भकालमें उसी अव्यक्तमें सम्पूर्ण प्राणी लीन हो जाते हैं।",
        "hc": "।।8.18।। व्याख्या--'अव्यक्ताद्व्यक्तयः ৷৷. तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके'--मात्र प्राणियोंके जितने शरीर हैं, उनको यहाँ 'व्यक्तयः'और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें 'मूर्तयः' कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् 'मैं' और 'मेरापन' को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टि जीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टि जीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि दीखती है, वह सब-की-सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात् प्रकृतिसे पैदा होती है और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माजीके जगनेपर तो 'सर्ग' होता है और ब्रह्माजीके सोनेपर 'प्रलय' होता है। जब ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी आयु बीत जाती है, तब 'महाप्रलय' होता है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान्में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीकी जितनी आयु होती है, उतना ही महाप्रलयका समय रहता है। महाप्रलयका समय बीतनेपर ब्रह्माजी भगवान्से प्रकट हो जाते हैं तो 'महासर्ग' का आरम्भ होता है (गीता 9। 7 8)।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।8.18।।तत्र ब्रह्मणः अहरागमसमये त्रैलोक्यान्तर्वर्तिन्यो देहेन्द्रियभोग्यभोगस्थानरूपा व्यक्तयः चतुर्मुखदेहावस्थाद् अव्यक्तात् प्रभवन्ति। तत्र एव अव्यक्तावस्थाविशेषे चतुर्मुखदेहे रात्र्यागमसमये प्रलीयन्ते।",
        "et": "8.18 Thus, at the dawn of a day of Brahma, the manifest entities existing in the three worlds, possessing body, senses, objects, and places of enjoyment appear from the non-manifest (Avyakta), which is the condition of Brahma's body in that state, and at the beginning of the night they are dissolved into the condition of the unevolved (Avyakta) which forms the body of Brahma then."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।8.17 -- 8.19।।ननु क एवं जानाति यत् सर्वभुवनेभ्यः पुनरावृत्तिः।  ब्रह्मादय एव ही तावत् चिरतरस्थायिनः श्रूयन्ते।  ते एव (SN अत एव तावत्) कथं पुनरावर्त्तिनः पुनरावर्त्तित्वे हि तेऽपि स्युः प्रभवाप्ययधर्माणाः इत्या[शङ्कया ] ह -- सहस्रेत्यादि आगम इत्यन्तम्।  ये खलु दीर्घदृश्वानः (N अदीर्घ -- )  ते ब्रह्मणोऽपि रात्रिं दिवं [ च ] पश्यन्ति प्रलयोदयतया।  तथा च अहरहस्त एव विबुध्य निजां निजामेव चेष्टामनुरुध्यन्ते ( -- मवरुध्यन्ते) प्रतिरात्रि च तेषामेव निवृत्तपरिस्पन्दानां (S  -- परिस्पन्दिनाम्) शक्तिमात्रत्वेनावस्थानम् (N  -- त्वेनोपस्थानम्)।  एवं सृष्टौ प्रलये च पुनः पुनर्भावः (K (n) -- र्भवः)।  नान्येऽन्ये उपसृज्यन्ते अपि तु त एव जीवाः।  कालकृतस्तु चिरक्षिप्रप्रत्ययात्मा  विशेषः।  एष च परिच्छेदः प्रजापतीनामप्यस्ति।  ततश्च तेऽपि प्रभवाप्ययधर्माण एवेति स्थितम्।",
        "et": "8.18 See Comment under 8.19"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।8.18।।प्रजापतिके दिनमें और रात्रिमें जो कुछ होता है उसका वर्णन किया जाता है --, दिनके आरम्भकालका नाम अहरागम है ब्रह्माके दिनके आरम्भकालमें अर्थात् ब्रह्माके प्रबोधकालमें अव्यक्तसे -- प्रजापतिकी निद्रावस्थासे समस्त व्यक्तियाँ -- स्थावरजङ्गमरूप समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं -- प्रकट होती हैं। जो व्यक्तप्रकट होती है उसका नाम व्यक्ति है। तथा रात्रिके आनेपर -- ब्रह्माके शयन करनेके समस्त उस पूर्वोक्त अव्यक्त नामक प्रजापतिकी निद्रावस्थामें ही समस्त प्राणी लीन हो जाते हैं।,",
        "sc": "।।8.18।। --,अव्यक्तात् अव्यक्तं प्रजापतेः स्वापावस्था तस्मात् अव्यक्तात् व्यक्तयः व्यज्यन्त इति व्यक्तयः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजाः प्रभवन्ति अभिव्यज्यन्ते अह्नः आगमः अहरागमः तस्मिन् अहरागमे काले ब्रह्मणः प्रबोधकाले। तथा रात्र्यागमे ब्रह्मणः स्वापकाले प्रलीयन्ते सर्वाः व्यक्तयः तत्रैव पूर्वोक्ते अव्यक्तसंज्ञके।।अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशदोषपरिहारार्थम् बन्धमोक्षशास्त्रप्रवृत्तिसाफल्यप्रदर्शनार्थम् अविद्यादिक्लेशमूलकर्माशयवशाच्च अवशः भूतग्रामः भूत्वा भूत्वा प्रलीयते इत्यतः संसारे वैराग्यप्रदर्शनार्थं च इदमाह --,",
        "et": "8.18 Ahar-agame, with the coming of day, at the time when Brahma wakes; sarvah vyaktayah, all manifested things, all things that get manifested, all creatures characterized as moving and non-moving; prabhavanti, emerge, become manifested; avyaktat, from the Unmanifested-avyakta (Unmanifested) is the state of sleep of Prajapati; from that avyakta. Similarly, ratri-agame, when night comes, at the time when Brahma sleeps; praliyante, they, all the manifested things, merge; tatra eva, in that itself; avyakta-sanjnake, which is called the Unmanifested referred to above.\nIn order to obviate the defect of the emergence of some unmerited result and the destruction of merited results; [The following verse says that the very same multitude of beings continues in the different cycles of creation, and there-fore these two defects do not arise.] for pointing out the meaningfulness of the scriptures [For the earlier reason the scriptures do not lose their validity.] dealing with bondage and Liberation; and with a view to propounding detachment from the world on the ground that the helpless multitude of beings perishes after being born again and again under the influence of accumulated results of actions that have for their origin such evils as ignorance etc. [The five evils are: ignorance, egoism, attachment, aversion and clinging to life. (See P. Y. Su. 2.3)], the Lord says this:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।8.17 -- 8.19।।उत्तरप्रकरणस्यासङ्गतिमाशङ्क्याह -- मां प्राप्येति। अवस्थितानामिति शेषः। प्रतिज्ञामात्रेण हि तदुक्तं अव्यक्तसामर्थ्यस्यात्र कथनात् कथमात्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- अव्यक्ताख्येति। प्रलयादीति तत्कारणत्वमात्मनः। सृष्टिप्रलययोरिदम्पूर्वत्वाभावज्ञापनाय गीतामुल्लङ्घ्योक्तम्। अत्र सहस्रशब्दो दशशतवाचीतिप्रतीतिनिरासायाह -- सहस्रेति। बहुशब्दपर्यायोऽयं न तु प्रसिद्धार्थः। विरिञ्चाहोरात्रयोः प्रसिद्धस्य सहस्रचतुर्युगपर्यन्तत्वात् कथमेतत् इत्यत आह -- ब्रह्मेति। तथा च द्विपरार्धप्रलयस्यादिसृष्टेश्चात्र विवक्षितत्वात् उक्तं युक्तम्। ननु परस्य ब्रह्मणो नित्यत्वादहोरात्रे न स्तः। तत्कथं तत्परमेतत् इत्यत आह -- सेति। सा निर्व्यापारावस्था परिपूर्णरूपस्यापि हरेः रजनीत्यर्थः। अनेनाहरपि सिद्धम्। भवेदेतद्यद्यत्र द्विपरार्धप्रलयस्यादिसृष्टेश्च विवक्षेत्यत्र प्रमाणं स्यादित्यत आह -- द्विपरार्धेति। एवमादिसृष्टिश्चेत्यपि ग्राह्यम्। न ह्यवान्तरसृष्टिप्रलययोः सर्वकार्योत्पत्तिविनाशाविति भावः। आगमान्तरसम्मतेश्चैवमित्याह -- उक्तं चेति। इतोऽप्येवमित्याह -- य इति। न ह्यवान्तरप्रलये सर्वेषामाकाशादीनां भूतानां नाशः नापि विरिञ्चस्य पञ्चभूतनाशेऽपि अविनाशित्वमिति भावः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।8.18।।परं समष्टिभूतस्याह। पुनरागमे व्यष्टिभूतानां व्यक्तिप्रभवो नैमित्तिकश्च रात्र्यागमे लयस्तमाह -- अव्यक्ताद्व्यक्तय इति। अक्षरात्मकात्तत उद्भूतात् परमेष्ठिपुरुषात् समष्टिमूलभूतात्तत्प्रकृत्यन्वितात् दैवेच्छया निराकाराणां चेतनानां जीवानां ब्रह्मण्यनुशयितानां व्यक्तयो व्यष्टयो देहाद्या योनयो लोकाश्च प्रभवन्ति आविर्भवन्ति। तिरोभावात्मकं लयमाह। रात्र्यागमे तथाभूते तस्मिन्नेवाव्यक्तसंज्ञके प्रलीयन्ते तिरोभवन्ति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।8.18।।यथोक्तैरहोरात्रैः पक्षमासादिगणनया पूर्णं वर्षशतं प्रजापतेः परमायुरिति कालपरिच्छिन्नत्वेनानित्योऽसौ। तेन तल्लोकात्पुनरावृत्तिर्युक्तैव। ये तु ततोऽर्वाचीनास्तेषां तदहर्मात्रपरिच्छिन्नत्वात्तत्तल्लोकेभ्यः पुनरावृत्तिरिति किमु वक्तव्यमित्याह -- अत्र दैनंदिनसृष्टिप्रलययोरेव वक्तुमुपक्रान्तत्वात्तत्र चाकाशादीनां सत्त्वादव्यक्तशब्देनाव्याकृतावस्था नोच्यते किंतु प्रजापतेः स्वापावस्थैव। स्वापावस्थः प्रजापतिरिति यावत्। अहरागमे प्रजापतेः प्रबोधसमयेऽव्यक्तात्तत्स्वापावस्थारूपाद्व्यक्तयः शरीरविषयादिरूपा भोगभूमयः प्रभवन्ति व्यवहारक्षमतयाऽभिव्यज्यन्ते। रात्र्यागमे तस्य स्वापकाले पूर्वोक्ताः सर्वा अपि व्यक्तयः प्रलीयन्ते तिरोभवन्ति यत आविर्भूतास्तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके कारणे प्रागुक्ते स्वापावस्थे प्रजापतौ।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।8.18।। ततः किमत आह -- अव्यक्तादिति। कार्यस्याव्यक्तं रूपं कारणात्मकं तस्मादव्यक्तात्कारणरूपाद्व्यज्यन्तेऽभिव्यज्यन्त इति व्यक्तयश्चराचराणि भूतानि प्रादुर्भवन्ति। कदा। अहरागमे ब्रह्मणो दिनस्योपक्रमे। तथा रात्रेरागमे ब्रह्मशयने तस्मिन्नेवाव्यक्तसंज्ञके कारणरूपे प्रलयं यान्ति। यद्वा तेऽहोरात्रविद इत्येतन्न विधीयते किंतु ते प्रसिद्धा अहोरात्रविदो जना यद्ब्रह्मणोऽहविंदुस्तस्याह्न आगमे अव्यक्ताद्व्यक्तयः प्रभवन्ति यां च रात्रिं विदुस्तस्या,रात्रेरागमे प्रलीयन्त इति द्वयोरन्वयः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।8.18।।प्रजापतेरहोरात्रे यद्भवति तदाह -- अवक्तादिति। अत्राव्यक्तशब्देन नाव्याकृतं गृह्यते दैनंदिनसृष्टिप्रलययोः पस्तुतत्वात्तत्र चाकाशोदेरुत्पत्तिनाशानुक्तेस्तस्मादव्यक्तं प्रजापतेः स्वापावस्था तस्माद्य्वज्यन्त इति व्यक्तयश्चराचरलक्षणा निखिलाः प्रजा भवन्ति आविर्भवन्ति नत्वसन्त्य उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते इत्यनुरोधात्। युक्तियुक्तत्वाच्च सत्कार्यावादस्तावद्युक्तियुक्तो नत्वसत्कार्यवादः। तथाहि कारणव्यापारात्प्रागपि सत्कार्यं कारणव्यापारेण तर्हि किं साध्यत इतिचेत्पूर्वं सत एव कार्यस्याविर्भाव इति ब्रूमः। यत्तु भृत्पिण्टादिध्वंसानन्तरं घटाद्युत्पत्तिर्दृश्यते न तत्र प्रध्वंसः कारणमपितु भाव एव मृदाद्यवयवरुपः। अन्यथाऽभावस्य सर्वत्र सुलभत्वेन सर्वत्र सर्वदा कार्योत्पत्तिः प्रसज्येत। कारणव्यापारादसत्कार्यवादे तु असतः कार्यस्य सत्त्वं केनापि कर्तुमशक्यम्। नहि शिल्पिलक्षेणापि सिकताभ्यस्तैलं प्रसज्येत। कारणव्यापारदसत्कार्यवादे तु असतः कार्यस्य सत्त्वं केनापि कर्तुमशक्यम्। नहि शिल्पिलक्षेणापि सिकताभ्यस्तैलं कुड्यादेरङकुरमुत्पादयुतुं शक्यम्। किंच कार्येण संबद्धं ह्युपादानकारणं कार्यस्य जनकं संबन्धश्चा सतः कार्यस्य कारणेन न संभवति। ननु मास्तु संबन्धोऽसंबद्धमेव कारणैः कार्यं कस्मान्न जन्यते तथाचासदेव कार्यमुत्पत्स्यत इतिचेन्न। तथात्वेऽसंबद्धत्वाविशेषेण सर्वस्य कार्यजातस्य सर्वस्मात्कारणादुत्पत्तिप्रसङ्गात्। नन्वसंबद्धमपि सत्कारणं तदेव करोति यत्कारणं यत्र शक्तं शक्तिश्च कार्यदर्शनादवगम्यते।,अतो नाव्यवस्थेति चेत्सा शक्तिः कारणश्रया सर्वत्र उत शक्यमात्रे। आद्ये तदवस्थैवाव्यवस्था। न द्वितीयः। असत्कार्यवादिनस्तव मते शक्यस्य कार्यस्यासत्त्वात्। ननु शक्तिभेद एवैतादृशो यतः यत्किंचिदेव कार्यमुत्पादयेत् न स्रवमितिचेत्। स शक्तिविशेषः किं कार्यसंबद्धः कार्यमुत्पादयति उतासंबद्धः। नाद्यः। असता संबन्धायोगात्। न द्वितीयः। अव्यस्थातादवस्थ्यादित्यन्यत्र विस्तरः। ब्रह्मणोऽह्नः आगमे तस्य प्रबोधकालेऽव्यक्ताद्य्वक्तयो भवन्ति तथा रात्र्यागमे ब्रह्मणः स्वापकाले सर्वा व्यक्तयोऽव्यक्तसंज्ञिके पूर्वोक्ते प्रलीयन्ते।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 8.18 सहस्र -- इत्यादिश्लोकत्रयस्य पिण्डितार्थमाह -- ब्रह्मलोकपर्यन्तानामिति। हिरण्यगर्भादिस्वातन्त्र्यसिद्धसत्यलोकादिस्थैर्यशङ्काव्युदासायाहपरमपुरुषसङ्कल्पकृतामिति। ईश्वरस्वातन्त्र्यमेव ह्यन्यूनानतिरिक्तदिनरात्र्यादिविचित्रव्यवस्थायां कारणम्। तथा चोच्यतेकालस्य च हि मृत्योश्च [म.भा.5।68।13]कालचक्रं जगच्चक्रं [म.भा.5।68।12] इत्यादिभिः। एवमेवोक्तमन्यत्रततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत्पुनः। कृत्वा मत्स्थानि भूतानि चराणि स्थावराणि च इत्यादि। यत्तु मानवेतद्ये युगसहस्रं तु (तद्वे युगसहस्रांतं) ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः। रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः [1।73] इति तत्र य इत्येव पाठाद्यथाक्रममन्वयः। इह तुसहस्र -- इतिश्लोकेयत् इत्यस्याहश्शब्देनैव ह्यन्वयो घटते ततश्चते इत्यस्यये इति पदमपेक्षितम् तत्रापिये विदुस्तेऽहोरात्रविदो जनाः इत्यन्वये प्रसङ्गरहिताहोरात्रवेदिव्युत्पादनरूपं स्तुतिपरं वाक्यं प्रस्तुतासङ्गतं स्यात् ततश्चयेऽहोरात्रविदो जनास्त एवं विदुः इत्यन्वयः। एवं कालव्यवस्थायां प्रामाणिकत्वप्रतिपादनपरोऽत्र स्वीकार्य इत्यभिप्रायेणाहये मनुष्यादीति। अनूद्यमानमहोरात्रवेदित्वं यथाप्रसिद्धि सर्वविषयमेव भवितुमर्हति तेन चतुर्मुखस्यापि मनुष्यादितुल्यता द्योतिता स्यादित्यभिप्रायेणमनुष्यादीत्यादिकमुक्तम्। ब्रह्मशब्दस्यात्र परमात्मविषयत्वभ्रमव्युदासायचतुर्मुखशब्दः। तस्यैव हि सहस्रयुगप्रतिनियताहोरजनीविभागः प्रसिद्ध इति भावः।सविशेषणौ विधिनिषेधौ विशेषणमुपसङ्कामतः इति न्यायात्येऽहोरात्रविदो जनाः इत्यहोरात्रवेदतांशस्यानूदितत्त्वाच्च सहस्रयुगपर्यन्ततावेदनमेवात्र विधेयमित्यभिप्रायेणतच्चतुर्युगसहस्रावसानं विदुरित्युक्तम्। सहस्रयुगानि पर्यन्तं यस्य तत्सहस्रयुगपर्यन्तम्। युगशब्दश्चात्र प्रमाणान्तरानुसाराच्चतुर्युगपरः। अस्त्वेवं चतुर्मुखस्याहोरात्रव्यवस्था ततः किं प्रस्तुतस्य इत्यत्रोत्तरम् -- अव्यक्तात् इति श्लोकः। तस्यार्थमाह -- तत्रेति।अयमभिप्रायः -- अत्र व्यक्तिशब्दस्तावन्न महदादिविषयः चतुर्मुखात्प्रागेव तदुत्पत्तेः। अतश्चतुर्मुखसृज्यमात्रविषय एवासौ। व्यज्यन्त इति व्यक्तयः। तत्रापि सत्यलोकादेः प्रतिकल्पं प्रलयाभावात् त्रैलोक्यान्तर्वर्त्तिदेहेन्द्रियादिवस्तुमात्रविषयत्वमेव स्वीकार्यम्। तेषां चोत्पत्तिः ब्रह्मशरीरादेव। ततश्चात्राव्यक्तशब्दोऽपि न मूलाव्यक्तविषयः अपितु तदुपादानकब्रह्मशरीरपरः। शरीरे चाव्यक्तशब्दप्रयोगः सूत्रेऽप्युपपादितःसूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् [ब्र.सू.1।4।2] इति।एवंविधसृष्टिप्रलयकारणविशेषं तदनुच्छेदाच्च सृष्टिप्रलयसन्तानानुच्छेदं अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गपरिहारमुक्तस्यार्थस्य सर्वेष्वपि कल्पेषु अभिव्याप्तिं यथापूर्वकल्पनं चभूतग्रामः इति श्लोकः प्रतिपादयतीत्यभिप्रायेणाह -- स एवायमिति। भूतशब्दोऽत्राचिद्विशिष्टक्षेत्रज्ञपरः। सृज्यत्वसंहार्यत्वहेतुभूतमवशत्वं कर्मनिबन्धनमेव हीत्यभिप्रायेणकर्मवश्य इत्युक्तम्।अहरागमे इति पदंभूत्वा इत्यत्रापि अनुवर्तनीयमित्यभिप्रायेणअहरागमे भूत्वेत्यन्वय उक्तः। इदं च नैमित्तिकप्रलयप्रतिपादनं श्रुत्यादिप्रसिद्धप्राकृतप्रलयस्याप्युपलक्षणम्। तथा सति [तेन] सत्यलोकविनाशसिद्धिःआब्रह्मभुवनाल्लोकाः [8।16] इति ह्युपक्रान्तमित्यभिप्रायेणाह -- तथेति। यद्वा रात्र्यागमशब्द एव ब्रह्मणोऽन्तिमरात्र्यागममपि शक्त्या संगृह्णातीति भावः। तदेतत्सूचितंवर्षशतावसानरूपयुगसहस्रान्त इति। तथा चान्यत्र स्मर्यते -- निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम् इति। एवमहरागमशब्दोऽपि प्रथममहः संगृह्णाति। पृथिव्यादितत्त्वानामेव विलये तदारब्धानां ब्रह्मलोकब्रह्मशरीरब्रह्माण्डादीनां का कथेत्यभिप्रायेण -- पृथिवीत्यादिश्रुतिरुदाहृता। तमोवस्थाचिद्द्रव्यस्यैकीभावो हि परस्मिन्नेव देवे श्रूयते। अत्रापिअहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयः [7।6] इत्यादिकं ह्युच्यत इत्यभिप्रायेणमय्येवेत्युक्तम्। एवं यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् [श्वे.उ.6।18]एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः [महो.1।1] इति क्रमेण पुनर्ब्रह्मादिसृष्टिः पुनश्च तत्प्रलय इत्यादिकमपि भाव्यम्। ईदृशसृष्टिप्रलयप्रतिपादनस्य प्रकृतोपयोगं दर्शयति -- एवमिति। सर्वेषु सृष्टिप्रलयप्रकरणेष्विदमेव तात्पर्यं भाव्यम्।मद्व्यतिरिक्तस्य कृत्स्नस्येत्यनेनअहं कृत्स्नस्य [7।6] इति प्रागुक्तं स्मारितम्। उक्तं च मोक्षधर्मेऽपिनित्यं हि (च) नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्। ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् [म.भा.12।339।32] इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।8.18।।पुनस्तत्प्रकटसमये तत्सहितानामागमनमित्याह -- अव्यक्तादिति। अव्यक्तादक्षराद्भगवच्चरणरूपात् व्यक्तयः स्थावरजङ्गमादयः सर्वाः देवादिकीटतृणादयः अहरागमे ब्रह्मदिनोद्गमे प्रभवन्ति उत्पद्यन्ते। तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके अक्षरे रात्र्यागमे रात्र्युद्गमे प्रलीयन्ते लीना भवन्तीति तद्विदो जनास्तत्र प्रविशन्तीत्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।8.18।।किं ब्रह्मणोऽह्नि जायते किंवा रात्रावित्यत आह -- अव्यक्तादिति। अत्र दैनंदिनसृष्टिप्रलययोः प्रकृतत्वादव्यक्तशब्देन नाव्याकृतं वियदादिकारणमिह ग्राह्यम्। तदा आकाशादीनां सत्त्वात्। किं तर्हि प्रजापतेः स्वापावस्थैवेहाव्यक्तशब्दार्थः। अयं भावः -- प्रजापतेः स्वापकाले तत्कल्पितः स्थावरजगंमप्रपञ्चः सर्वोऽपि तदीयेऽज्ञानेऽव्याकृताख्ये लीयते रात्र्यागमे। तथा दिवसागमे पुनस्तत एव यथापूर्वमाविर्भवति। एवं दृष्टिसृष्टिन्यायेनास्मत्कल्पितोऽप्ययं वियदादिप्रपञ्चोऽस्मत्सुषुप्तौ लीयते अस्मत्प्रबोधे यथापूर्वं प्रादुर्भवतीति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "At the beginning of Brahmā’s day, all living entities become manifest from the unmanifest state, and thereafter, when the night falls, they are merged into the unmanifest again.",
        "ec": "There is no purport for this verse"
    }
}
