{
    "_id": "BG7.8",
    "chapter": 7,
    "verse": 8,
    "slok": "रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः |\nप्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ||७-८||",
    "transliteration": "raso.ahamapsu kaunteya prabhāsmi śaśisūryayoḥ .\npraṇavaḥ sarvavedeṣu śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu ||7-8||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।7.8।। हे कौन्तेय ! जल में मैं रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सब वेदों में प्रणव (ँ़कार) हूँ तथा आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "7.8 I am the sapidity in water, O Arjuna; I am the light in the moon and the sun; I am the syllable Om in all the Vedas, sound in ether and virility in men.",
        "ec": "7.8 रसः sapidity? अहम् I? अप्सु in water? कौन्तेय O Kaunteya (son of Kunti)? प्रभा light? अस्मि am (I)? शशिसूर्ययोः in the moon and the sun? प्रणवः the syllable Om? सर्ववेदेषु in all the Vedas? शब्दः sound? खे in ether? पौरुषम् virility? नृषु in men.Commentary In Me all beings and the whole world are woven as a cloth in the warp. In Me as sapidity the water is woven in Me as light? the sun and the moon are woven in Me as the sacred syllable Om all the Vedas are woven in Me as virility all men are woven.The manifestations of the Lord are described in the verses 8? 9? 10 and 11. (Cf.XV.12)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "7.8 O Arjuna! I am the Fluidity in water, the Light in the sun and in the moon. I am the mystic syllable Om in the Vedic scriptures, the Sound in ether, the Virility in man."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।7.8।। See commentary under 7.9."
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "7.8. O son of Kunti !  I am the taste in waters; the light in the moon and the sun; the best hymn (OM) in the entire Vedas; the sound that exists in the ether (or the mystic hymnal sound in the entire Vedas-a sound that is in the ether); and the manly vigour in men."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "7.8 I am the taste in the waters, O Arjuna! I am the light in the sun and the moon; the sacred syllable Om in all the Vedas; sound in the ether; and manhood in men am I."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "7.8 O son of Kunti, I am the taste of water, I am the effulgence of the moon and the sun; (the letter) Om in all the Vedas, the sound in space, and manhood in men."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।7.8  7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः  पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौजीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च  प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च  तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।7.8।।अबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेस्त्वय्येव सर्वं प्रोतमित्ययुक्तमिति मत्वा पृच्छति  केनेति। तत्रोत्तरमुत्तरग्रन्थेन दर्शयति  उच्यत इति। सारो मधुरो हेतुरिति यावत्। रसोऽहमिति कथं तत्राह  तस्मिन्निति। अप्सु यो रसः सारस्तस्मिन्मयि मधुररसे कारणभूते प्रोता आप इतिवदुत्तरत्र सर्वत्र व्याख्यानं कर्तव्यमित्याह  एवमिति। उक्तमर्थं दृष्टान्तं कृत्वा प्रभास्मीत्यादि व्याचष्टे  यथेति। चन्द्रादित्ययोर्या प्रभा तद्भूते मयि तौ प्रोतावित्यर्थः। तत्र वाक्यार्थं। कथयति  तस्मिन्निति। प्रणवभूते तस्मिन्वेदानां प्रोतत्ववदाकाशे यः सारभूतः शब्दस्तद्रूपे परमेश्वरे प्रोतमाकाशमित्याह  तथेति। पौरुषं नृष्विति भागं पूर्ववद्विभजते  तथेत्यादिना। पुरुषत्वमेव विशदयति  यत इति। पुंस्त्वसामान्यात्मके परस्मिन्नीश्वरे प्रोतास्तद्विशेषास्तदुपादानत्वेन तत्स्वभावत्वादित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।7.8।। हे कुन्तीनन्दन ! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ।",
        "hc": "।।7.8।। व्याख्या--[जैसे साधारण दृष्टिसे लोगोंने रुपयोंको ही सर्वश्रेष्ठ मान रखा है तो रुपये पैदा करने और उनका संग्रह करनेमें लोभी आदमीकी स्वाभाविक रुचि हो जाती है। ऐसे ही देखने, सुनने, मानने और समझनेमें जो कुछ जगत् आता है उसका कारण भगवान् हैं (7। 6); भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं-- ऐसा माननेसे भगवान्में स्वाभाविक रुचि हो जाती है। फिर स्वाभाविक ही उनका भजन होता है। यही बात दसवें अध्यायके आठवें श्लोकमें कही है कि 'मैं सम्पूर्ण संसारका कारण हूँ, मेरेसे ही संसारकी उत्पत्ति होती है,--ऐसा समझकर बुद्धिमान् मनुष्य मेरा भजन करते हैं। ऐसे ही अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें कहा है कि 'जिस परमात्मासे सम्पूर्ण जगत्की प्रवृत्ति होती है और जिससे सारा संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मोंके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त कर लेता है।' इसी सिद्धान्तको बतानेके लिये यह प्रकरण आया है।]\n\n'रसोऽहमप्सु कौन्तेय'--हे कुन्तीनन्दन ! जलोंमें मैं 'रस' हूँ। जल रस-तन्मात्रासे (टिप्पणी प0 403) पैदा होता है; रस-तन्मात्रामें रहता है और रस-तन्मात्रामें ही लीन होता है। जलमेंसे अगर 'रस' निकाल दिया जाय तो जलतत्त्व कुछ नहीं रहेगा। अतः रस ही जलरूपसे है। वह रस मैं हूँ।\n\n'प्रभास्मि शशिसूर्ययोः'--चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश करनेकी जो एक विलक्षण शक्ति 'प्रभा' है (टिप्पणी प0 404), वह मेरा स्वरूप है। प्रभा रूप-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है रूपतन्मात्रामें रहती है और अन्तमेंरूपतन्मात्रामें ही लीन हो जाती है। अगर चन्द्रमा और सूर्यमेंसे प्रभा निकाल दी जाय तो चन्द्रमा और सूर्य निस्तत्त्व हो जायँगे। तात्पर्य है कि केवल प्रभा ही चन्द्र और सूर्यरूपसे प्रकट हो रही है। भगवान् कहते हैं कि वह प्रभा भी मैं ही हूँ।'प्रणवः सर्ववेदेषु'--सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मेरा स्वरूप है। कारण कि सबसे पहले प्रणव प्रकट हुआ। प्रणवसे त्रिपदा गायत्री और त्रिपदा गायत्रीसे वेदत्रयी प्रकट हुई है। इसलिये वेदोंमें सार 'प्रणव' ही रहा। अगर वेदोंमेंसे प्रणव निकाल दिया जाय तो वेद वेदरूपसे नहीं रहेंगे। प्रणव ही वेद और गायत्रीरूपसे प्रकट हो रहा है। वह प्रणव मैं ही हूँ। 'शब्दः खे'--सब जगह यह जो पोलाहट दीखती है, यह आकाश है। आकाश शब्द-तन्मात्रासे पैदा होता है, शब्द-तन्मात्रामें ही रहता है और अन्तमें शब्द-तन्मात्रामें ही लीन हो जाता है। अतः शब्द-तन्मात्रा ही आकाश-रूपसे प्रकट हो रही है। शब्द-तन्मात्राके बिना आकाश कुछ नहीं है। वह शब्द मैं ही हूँ।'पौरुषं नृषु'--मनुष्योंमें सार चीज जो पुरुषार्थ है, वह मेरा स्वरूप है। वास्तवमें नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव करना ही मनुष्योंमें असली पुरुषार्थ है। परन्तु मनुष्योंने अप्राप्तको प्राप्त करनेमें ही अपना पुरुषार्थ मान रखा है; जैसे--निर्धन आदमी धनकी प्राप्तिमें पुरुषार्थ मानता है, अपढ़ आदमी पढ़ लेनेमें पुरुषार्थ मानता है, अप्रसिद्ध आदमी अपना नाम विख्यात कर लेनेमें अपना पुरुषार्थ मानता है, इत्यादि। निष्कर्ष यह निकला कि जो अभी नहीं है, उसकी प्राप्तिमें ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ मानता है। पर यह पुरुषार्थ वास्तवमें पुरुषार्थ नहीं है। कारण कि जो पहले नहीं थे, प्राप्तिके समय भी जिनका निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है और अन्तमें जो 'नहीं' में भरती हो जायँगे, ऐसे पदार्थोंको प्राप्त करना पुरुषार्थ नहीं है। परमात्मा पहले भी मौजूद थे, अब भी मौजूद हैं और आगे भी सदा मौजूद रहेंगे; क्योंकि उनका कभी अभाव नहीं होता। इसलिये परमात्माको उत्साहपूर्वक प्राप्त करनेका जो प्रयत्न है, वही वास्तवमें पुरुषार्थ है। उसकी प्राप्ति करनेमें ही मनुष्योंकी मनुष्यता है। उसके बिना मनुष्य कुछ नहीं है अर्थात् निरर्थक है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।7.8।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।",
        "et": "7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।7.8।।रसोऽहमप्स्विति।  सर्वत्रास्वाद्यमानो योऽनुद्भिन्न (N मानयोरनुद्भिन्न  ) मधुरादिविभागः सामान्यः सोऽहम्।  एवं प्रकाशः मृदुत्वचण्डत्वादिरहितः।  खे आकाशे।  यः शब्द इति सर्वस्यैव शब्दस्य नभोगुणत्वात् अत्रावधारणम्।   अथवा  यः केवलं ( SN केवलगगन  ) गगनगुणया ध्वनिसंयोगविभागादिसामग्र्यन्तररहितः अवहितहृदयैः ब्रह्मगुहागगनगामी योगिगणैः संवेद्यः अनाहताख्यः सकलश्रुतिग्रामानुगामी ( श्रुतिमार्गानुगामी) तत् भगवतस्तत्त्वम्।  पौरुषम् येन तेजसा पुरुषोऽह(य)मिति सार्वभौमं प्रतिपद्यते (N प्रतिपाद्यते)।",
        "et": "7.8 Raso  'ham apsu etc.  I am that  [basic] taste which has not yet devolped as to have the classification of sweetness and so on,  and which is being  tasted in all waters.  Similarly, the light :  That  [light]  which is  devoid of gentleness and fierceness etc.  (The sound that exist]  in the ether in the sky.  The sound that etc.  Here the emphasis is on all sounds,  as they are attributes of  the ether.  Or, the passage denotes that empty basic  sound which, being exclusively an attribute of th ether;  which does not depend on any other  external  cuases like union  and partition   [of some  objects];  which exists in the ether within the cave of the Brahman;  which is ite intelligible  to the groups of Yogins  with attentive heart  (mind);  which bears the name Anahata; and which pervades the entire groups of the Vedas - that sound represents the Absolute.  Manly vigour ;  that lusture by means of which one is identified  as a man throughout the earth."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।7.8।।यह समस्त जगत् किसकिस धर्मसे युक्त आपमें पिरोया हुआ है इसपर कहते हैं  जलमें मैं रस हूँ अर्थात् जलका जो सार है उसका नाम रस है उस रसरूप मुझ परमात्मामें समस्त जल पिरोया हुआ है। ऐसे ही और सबमें भी समझना चाहिये। जैसे जलमें मैं रस हूँ वैसे ही चन्द्रमा और सूर्यमें मैं प्रकाश हूँ। समस्त वेदोंमें मैं ओंकार हूँ अर्थात् उस ओंकाररूप मुझ परमात्मामें सब वेद पिरोये हुए हैं। आकाशमें उसका सारभूत शब्द हूँ अर्थात् उस शब्दरूप मुझ ईश्वरमें आकाश पिरोया हुआ है। तथा पुरुषोंमें मैं पौरुष हूँ अर्थात् पुरुषोंमें जो पुरुषत्व है जिससे उनको पुरुष समझा जाता है वह मैं हूँ उस पौरूषरूप  मुझ ईश्वरमें पुरुष पिरोये हुए हैं।",
        "sc": "।।7.8।। रसः अहम् अपां यः सारः स रसः तस्मिन् रसभूते मयि आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वत्र। यथा अहम् अप्सु रसः एवं प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः ओंकारः सर्ववेदेषु तस्मिन् प्रणवभूते मयि सर्वे वेदाः प्रोताः। तथा खे आकाशे शब्दः सारभूतः तस्मिन् मयि खं प्रोतम्। तथा पौरुषं पुरुषस्य भावः पौरुषं यतः पुंबुद्धिः नृषु तस्मिन् मयि पुरुषाः प्रोताः।।",
        "et": "7.8 Kaunteya, O son of Kunti, aham, I; am rasah, the taste, which is the essence of water. The idea is that water is depedent on Me who am its essence. This is how it is to be understood in every case. Just as I am the essence of water, similarly, asmi, I am; the prabha, effulgence; sasi-suryayoh, of the moon and the sun; pranavah, (the letter) Om; sarva-vedesu, in all the Vedas. All the Vedas are established on Me who am that Om. So also (I am) sabdah, the sound; khe, in space, as the essence. Space is established on Me who am that (sound). In the same way, nrsu, in men; (I am) paurusam, manhood- the ality of being man, from which arises the idea of manhood. Men are established on Me who am such."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।7.8  7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह  इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह  रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति  अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह  तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह  रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं  न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकं चेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह  भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापिविशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह  उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह  उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति  स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह  धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह  उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह  पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते  अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह  तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह  ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह  ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतो विषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह  न चेति। कुतो नेत्यत आह  स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह  आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह  न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह  स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह  शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह  अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह  शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह  भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह  आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह  न त्वहमिति।तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह  उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।7.8।।नन्वेकस्य भगवतः कारणत्वमुपादानत्वेन निमित्तत्वादिना वा तत्रापि तन्मुख्यं गौणं वा इति चेत् उच्यते  तस्य मुख्यमेव सर्वकारणत्वं सर्वरूपत्वात्सर्वशक्तित्वात्सहकारिनिरपेक्षत्वाच्च कामधेन्वादिवत्। उक्तं हि श्रीभागवते 6।4।30यस्मिन्यतो येन च यस्य यस्मै यद्यो यथा कुरुते कार्यते वा (च)। परावरेषां परमं प्राक्प्रसिद्धं तद्धीश (तद्ब्रह्म) तद्धेतुरनन्यदेकम् इत्यादि। एकोऽहं बहु स्याम् स आत्मानं स्वयमकुरुत सहैतावानाससर्वनामा स च विश्वरूपः इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु मुख्यमेवास्य कारणत्वं सर्वमुक्तम्। तथैव स्वविभूतिमहिमविज्ञानं स्पष्टयति सङ्क्षेपेण चतुर्भिःरसोऽहमप्सु इत्यारभ्यकामोऽस्मि 7।11 इत्यन्तम्। तत्र सप्तविधोऽहं सन् प्रकृतिकार्ये गुणरूपनामात्मना स्थितः चित्प्रकृतिकार्येऽपि तथैवेत्याशयेनाह रसोऽहमिति। अप्सु रसत्वेन स्थितोऽस्मि। प्रभेति रूपभेदः। प्रणवो नामात्मा कः शब्दो गुणाः खे। नृषु मानुषेषु पौरुषं वीर्यम्।यतः सर्वगुणानां सम्मिश्रं रूपं सप्तमोऽप्येको भेदो मध्ये निरूपितः मिश्रितत्वात्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।7.8।।अबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेः कथं त्वयि सर्वमिदं प्रोतमिति च न शङ्क्यम् रसादिरूपेण ममैव स्थितत्वादित्याह पञ्चभिः  रसः पुण्यो मधुरस्तन्मात्ररूपः सर्वासामपां सारः कारणभूतो योऽप्सु सर्वास्वनुगतः सोऽहं हे कौन्तेय तद्रूपे मयि सर्वा आपः प्रोता इत्यर्थः। एवं सर्वेषु पर्यायेषु व्याख्यातव्यम्। इयं विभूतिराध्यानायोपदिश्यत इति नातीवाभिनिवेष्टव्यम्। तथा प्रभा प्रकाशः शशिसूर्ययोरहमस्मि। प्रकाशसामान्यरूपे मयि शशिसूर्यौ प्रोतावित्यर्थः। तथा प्रणव ओंकारः सर्ववेदेष्वनुस्यूतोऽहंतद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् इति श्रुतेः। संतृण्णानि ग्रथितानि। सर्वा वाक् सर्वो वेद इत्यर्थः। शब्दः पुण्यस्तन्मात्ररूपः खे आकाशेऽनुस्यूतोऽहम्। पौरुषं पुरुषत्वसामान्यं नृषु पुरुषेषु यदनुस्यूतं तदहम्। सामान्यरूपे मयि सर्वे विशेषाः प्रोताः श्रौतैर्दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैरिति सर्वत्र द्रष्टव्यम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।7.8।। जगतः स्थितिहेतुत्वं प्रपञ्चयति  रसोऽहमिति पञ्चभिः। अप्सु रसोऽहम्। रसतन्मात्ररूपया विभूत्या तदाश्रयत्वेनाप्सु स्थितोऽहमित्यर्थः। तथा शशिसूर्ययोः प्रभास्मि। चन्द्रेऽर्के च प्रकाशरूपया विभूत्या तदाश्रयत्वेन स्थितोऽहमित्यर्थः। एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम्। सर्वेषु वेदेषु वैखरीरूपेषु तन्मूलभूतः प्रणव ओंकारोऽस्मि। खे आकाशे शब्दतन्मात्ररूपोऽस्मि। नृषु पुरुषेषु पौरुषमुद्यमोऽस्मि। उद्यमे हि पुरुषास्तिष्ठन्ति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।7.8।।नन्वबादीनां रसादिषु प्रोतत्वप्रतीतेस्त्वय्येव सर्वं कथं प्रोतमित्याशङ्क्य रसादिरुपे मय्येवाबादिकं प्रोतमित्याह  रस इति।अपां यः सारो रसः पुण्यो गन्धः इति गन्धस्य पुण्यत्वप्रदर्शनं पुण्यत्वप्रदर्शनं रसादेरपि पुण्यत्वोपलक्षणार्थम्। रसः पुण्यो मधुरस्तस्मिन् रसरुपे मयि आपः प्रोताः। कौन्तेयेति संबोधयन् अस्मन्मातुलेये त्वयि कथं सर्वं प्रोतमित्यसंभावनां माकुर्विति ध्वनयति। तथा प्रभा प्रखाशस्तस्मिन्प्रखाशरुपे मयि शशिसूर्यो प्रोतौ तदा सर्ववेदसारभूते प्रणवे ओंकाररुपे मयि सर्वे वेदाः प्रोताः। तथा आकाशानुस्यूते पुण्ये शब्दे शब्दतन्मात्ररुपे मयि आकाशः प्रोतस्तथा पौरुषं पुरुषस्य भावः पुंबुद्धिः पुरुषसारभूता तस्मिन्पौरुषरुपे मयि पुरुषाः प्रोताः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।7.8।। एवंभूमिरापः 7।4 इत्यादिना भेदश्रुत्यर्थ उपबृंहितःमयि सर्वम् 7।7 इति तु घटकश्रुत्यर्थः अथ तदुभयनिर्वाहिताभेदश्रुत्यर्थोपबृंहणं क्रियत इत्यभिप्रायेणाह  अत इति। केचित्मयि सर्वमिदम् इत्यस्य रसादिधर्मविशिष्टे मयि प्रोतमित्यर्थः तद्विवरणंरसोऽहम् इत्यादि इति व्याचख्युः तत्परिहारायाह  सर्वस्य परमपुरुषशरीरत्वेनेति। परोक्ते त्वाधाराधेयभाववैपरीत्यादिदोष इति भावः। प्रकारवाचिशब्दानां प्रकारिणि पर्यवसानस्वाभाव्यं जातिगुणादिशब्देष्वपि सामान्यतः सिद्धमिति दर्शयितुं प्रकारत्वोपादानम्।अभिधानं मुख्यवृत्त्या बोधनम्। यद्यपि रसादिशब्दा लोके निष्कर्षकाः प्रयुज्यन्ते व्यधिकरणतया चात्रावादिद्रव्योपादानम् तथापि रसादीनां परमात्मशरीरभूतद्रव्यप्रकारत्वेन परमात्मनः प्रकारित्वाद्रसादिशब्दानां चात्र तत्समानाधिकरणतया प्रयोगात्तत्र निष्कर्षकत्वं नास्तीत्यभ्युपगन्तव्यम्। द्रव्योपादानं तु तत्रतत्र द्रव्ये प्रधानभूतरसगन्धादिप्रकारीभूतोऽहमिति ज्ञापनार्थम्। द्रव्यप्रकाराणां च तत्प्रकारत्वं काठिन्यवान् (न्येन)यो बिभर्ति वि.पु.1।14।28 इत्यादिषु प्रयुक्तमिति भावः। रसस्य पृथिव्यां वृत्तौ सत्यामप्यपां रूपादिगुणान्तरसद्भावेऽपिरसोऽहमप्सु इति विशिष्योपादानं तेजस्तत्त्वादब्रूपपरिणामस्य पूर्वतत्त्वानुत्पन्नरसप्रधानत्वात्। अन्यत्र चआत्तगन्धा तदा (ततो) भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते वि.पु.6।4।14 इत्यादिना च पृथिव्यादीनां गन्धरसाद्यधीनत्वमुक्तम्। एवमुत्तरत्रापि प्राधान्यतो विशेषनिर्देशे यथोचितं भाव्यम्।प्रभा स्वाश्रयातिरिक्तप्रसारितेजोद्रव्यविशेषः। प्रभयैव चन्द्रसूर्यौ जगदुपकारहेतुभूताविति तौ तत्प्रधानौ। सर्वेषां वेदानां बीजत्वादिना तेषुप्रणवः प्रधानभूतः।पौरुषं पुरुषस्य भावः यतः पुरुषबुद्धिरित्येके सन्तानपरम्पराहेतुभूतं रेत इत्यपरे यद्वा पौरुषं सामर्थ्यं कर्तृत्वशक्तिरित्यर्थः तयैव हि कर्तुरात्मनः कारकान्तरेभ्यः प्राधान्यम्। नृषु जीवेष्वित्यर्थः। यद्वा पौरुषं पुंस्त्वम् स्त्रीनपुंसकव्यावृत्तः सत्त्वादिस्वभावविशेषः। नृशब्दश्च पुरुषपर्यायः। पुण्यो गन्धः तुलस्यादिगन्धः सुरभिगन्धमात्रं वा तद्योगेन हि पृथिवी सत्त्वोन्मेषस्य सुखस्य वा हेतुर्भवति। विभावसुरत्राग्निः। तत्र च तेजो दाहकत्वशक्तिः। भूतशब्देनात्र शरीरिणो गृह्यन्ते। सर्वशब्देनात्र ब्रह्मशर्वादीनामपि सङ्ग्रहः। तेषु जीवनं प्राणनम् प्राणस्थितिहेतुर्वा। येन सर्वाणि भूतानि जीवन्ति भूतेषूपजीवनीयं वा रूपम्।सर्वभूतानां सनातनं बीजं प्रकृतितत्त्वम्। अथवा प्रधानधर्मनिर्देशप्रकरणत्वाद्बीजशब्दोऽत्रोपादानत्वाख्यस्वभावपरः। सर्वेषां परिणामिद्रव्याणां स्वकार्यपरिणामसामर्थ्यमित्यर्थः। अथवा बीजं प्ररोहकारणं जङ्गमस्थावरभूतानां तत्तदुपादानद्रव्यम्। बुद्धिः अध्यवसायः ज्ञानमात्रं वा। तेजस्विनः प्रतापशीलाः तेषां तेजः अनभिभवनीयत्वं पराभिभवसामर्थ्यं वा। तेजोऽभिमान इति केचित् प्रागल्भ्यमित्यपरे। बलं धारणादिशक्तिः। कामरागवशात् स्वकार्ये प्रवृत्तस्य बलस्य परपीडादिहेतुत्वाद्धर्मोपयुक्तशरीरादिधारणमात्रादिविषयत्वायकामरागविवर्जितम् इत्युक्तम्। काम इच्छायाःकाष्ठा प्राप्तदशा। राग इच्छा। यद्वा कामशब्दः काम्यपरः तद्विषयो रागः कामरागः भूतेषु देवमनुष्यादिरूपेणावस्थितेषु जन्तुषु। धर्माविरुद्धः कामः स्वदारप्रीत्यादिः।अथरसोऽहम् इत्यादिसामानाधिकरण्यं सहेतुकमुपपादयति  एत इति। न चायं तदधीनसामर्थ्यप्रदर्शनार्थोराजा राष्ट्रम् इत्यादिवदारोपः मुख्यसम्भवे वृत्त्यन्तरायोगादिति भावः।एत इत्यनेनेश्वरव्यतिरिक्तैरशक्यक्रियत्वमभिप्रेतम्।सर्व इत्यनेन ब्रह्मरुद्रादिभिरन्यैश्च क्रियमाणानामपि ब्रह्मादिशरीरपरमात्माधीनसृष्टत्वम्अहं कृत्स्नस्य 7।6 इति पूर्वोक्तं स्मारितम्। वक्ष्यमाणराजसतामसेभ्यो वैलक्षण्यार्थमुक्तंविलक्षणा इति।मत्त एव पृथग्विधाः 10।5 इति च वक्ष्यते। एतेनन विलक्षणत्वादस्य ब्र.सू.2।1।4 इत्यधिकरणार्थोऽपि स्मारितः।मत्त एवोत्पन्ना इत्यादि तत्तद्वस्त्वनुरूपं यथासम्भवं सामानाधिकरण्यहेतुः। गुणजातिशरीरेष्वनुगतः सामानाधिकरण्यहेतुरपृथक्सिद्धिरिति प्रदर्शनायोक्तंमय्येवावस्थिता इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।7.8।।आधिदैविकरूपेण जगतः स्थितिं स्वस्मिन्नाह  रसोऽहमिति पञ्चभिः। हे कौन्तेय मद्भक्त एतज्ज्ञानयोग्य अहमप्सु जलेषु रसरूपः। जले शैत्याद्याह्लादकानन्दादिगुणो मद्रूपस्थरसांशसम्बन्धादाविर्भवतीत्यर्थः। तथा शशिसूर्ययोः प्रभा प्रकाशकतेजोरूपोऽस्मि मद्रूपस्थसंयोगविप्रयोगानन्दरूपतेजस्सम्बन्धेनोभयोस्तद्रूपानन्दप्रकाशकत्वं भवतीति भावः। सर्ववेदेषु शब्दरसात्मके प्रणवे च ओङ्कारत्रिरूपाक्षररूपोऽस्मि शक्तिद्वयसहितपुरुषरूपोऽस्मि तत्सम्बन्धेनैव वेदशब्देषु रसरूपता अत एव श्रुतीनां भावोत्पत्तिः। खे आकाशे शब्दरूपोऽस्मि।अत्रायं भावः  आकाशस्वरूपात्मकभगवद्वेणुसम्बन्धेन शब्देष्वानन्दरूपत्वं भवति। नृषु मनुष्येषु पौरुषांशत्वम् पुरुषांशानामेव भजनयोग्यतेति तत्सम्बन्धेनैव सर्वमनुष्याणामुत्तमत्वमुच्यत इति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।7.8।।नन्वेवं प्रपञ्चपरमात्मनोर्मणिसूत्रवदुपादानोपादेयभावोऽपि न स्यात्। नहि उपादानं चाननुवृत्तं चेति घटते मृद्धटादावदर्शनादित्याशङ्क्य स्वप्नमायेन्द्रजालरज्जूरगतुल्यत्वं प्रपञ्चस्योपपाद्योभयमप्यविरुद्धमित्युपदिष्टं चेदयमकस्मादुद्विग्नो भविष्यतीति मत्वा दृष्टान्तान्तरैरेवानुवृत्तिं व्यावृत्तिं चिज्जडयोर्दर्शयति  रस इति। यथा रसोऽप्सु एकमप्यप्परमाणुमपरित्यज्यानुस्यूतो दृश्यतेऽतो रसरूपे मयि आपः प्रोताः एवं प्रभायां चन्द्रादयः प्रोताः प्रणवे सर्वे वेदाः प्रोताःतद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक् संतृण्णा इति वाङ्मात्रे प्रणवानुस्यूतिश्रवणात्। संतृण्णानि संग्रथितानि। एवमाकाशे शब्दः सारभूतस्तस्मिन्मयि खं प्रोतम्। सर्वपुरुषेषु सारं पौरुषं शौर्यर्धैर्यादिरूपं तत्र पुरुषाः प्रोताः। एवमग्रेऽपि द्रष्टव्यम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "O son of Kuntī, I am the taste of water, the light of the sun and the moon, the syllable oṁ in the Vedic mantras; I am the sound in ether and ability in man.",
        "ec": " This verse explains how the Lord is all-pervasive by His diverse material and spiritual energies. The Supreme Lord can be preliminarily perceived by His different energies, and in this way He is realized impersonally. As the demigod in the sun is a person and is perceived by his all-pervading energy, the sunshine, so the Lord, although in His eternal abode, is perceived by His all-pervading diffusive energies. The taste of water is the active principle of water. No one likes to drink sea water, because the pure taste of water is mixed with salt. Attraction for water depends on the purity of the taste, and this pure taste is one of the energies of the Lord. The impersonalist perceives the presence of the Lord in water by its taste, and the personalist also glorifies the Lord for His kindly supplying tasty water to quench man’s thirst. That is the way of perceiving the Supreme. Practically speaking, there is no conflict between personalism and impersonalism. One who knows God knows that the impersonal conception and personal conception are simultaneously present in everything and that there is no contradiction. Therefore Lord Caitanya established His sublime doctrine: acintya bheda - and abheda-tattva – simultaneous oneness and difference. The light of the sun and the moon is also originally emanating from the brahma-jyotir, which is the impersonal effulgence of the Lord. And praṇava, or the oṁ-kāra transcendental sound in the beginning of every Vedic hymn, addresses the Supreme Lord. Because the impersonalists are very much afraid of addressing the Supreme Lord Kṛṣṇa by His innumerable names, they prefer to vibrate the transcendental sound oṁ-kāra. But they do not realize that oṁ-kāra is the sound representation of Kṛṣṇa. The jurisdiction of Kṛṣṇa consciousness extends everywhere, and one who knows Kṛṣṇa consciousness is blessed. Those who do not know Kṛṣṇa are in illusion, and so knowledge of Kṛṣṇa is liberation, and ignorance of Him is bondage."
    }
}
