{
    "_id": "BG7.4",
    "chapter": 7,
    "verse": 4,
    "slok": "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च |\nअहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||७-४||",
    "transliteration": "bhūmirāpo.analo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca .\nahaṃkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā ||7-4||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।7.4।। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "7.4 Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and egoism  thus is My Nature divided eightfold.",
        "ec": "7.4 भूमिः earth? आपः water? अनलः fire? वायुः air? खम् ether? मनः mind? बुद्धिः intellect? एव even? च and? अहङ्कारः egoism? इति thus? इयम् this? मे My? भिन्ना divided? प्रकृतिः Nature? अष्टधा eightfold.Commentary This eightfold Nature constitutes the inferior Nature or Apara Prakriti. The five gross elements are formed out of the Tanmatras or rootelements through the process of Pancikarana or fivefold mixing. Tanmatras are the subtle rootelements. In this verse? earth? water? etc.? represent the subtle or rudimentary elements out of which the five gross elements are formed.Mind stands here for its cause Ahamkara intellect for its cause the Mahat Ahamkara for the Avyaktam or the unmanifested (MulaPrakriti) united with Avidya which is conjoined with all kinds of Vasanas or latent tendencies. As Ahamkara (Iness) is the cause for all the actions of every individual and as Ahamkara is the most vital principle in man on which all the other Tattvas or principles depend? the Avyaktam combined with the Ahamkara is itself called here Ahamkara? just as food which is mixed with poison is itself called poison."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "7.4 Earth, water, fire, air, ether, mind, intellect and personality; this is the eightfold division of My Manifested Nature."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।7.4।। वैदिक काल के महान् मनीषियों ने जगत् की उत्पत्ति पर सूक्ष्म विचार करके यह बताया है कि जगत् जड़ पदार्थ (प्रकृति) और चेतनतत्त्व (पुरुष) के संयोग से उत्पन्न होता है। उनके अनुसार पुरुष की अध्यक्षता में जड़ प्रकृति से बनी शरीरादि उपाधियाँ चैतन्ययुक्त होकर समस्त व्यवहार करने में सक्षम होती हैं। एक आधुनिक दृष्टान्त से इस सिद्धांत को स्पष्ट किया जा सकता है।लोहे के बने वाष्प इंजिन में स्वत कोई गति नहीं होती। परन्तु जब उसका सम्बन्ध उच्च दबाब की वाष्प से होता है तब वह इंजिन गतिमान हो जाता है। केवल वाष्प भी किसी यन्त्र की सहायता के बिना अपनी शक्ति को व्यक्त नहीं कर सकती दोनों के सम्बन्ध से ही यह कार्य सम्पादित किया जाता है।भारत के तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने वैज्ञानिक विचार पद्धति से इसका वर्णन किया है कि किस प्रकार सनातन पूर्ण पुरुष प्रकृति की जड़ उपाधियों के संयोग से इस नानाविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुआ है।भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में प्रकृति का वर्णन करते हैं तथा अगले श्लोक में चेतन तत्त्व का। यदि एक बार मनुष्य प्रकृति और पुरुष जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट रूप से समझ ले तो वह यह भी सरलता से समझ सकेगा कि जड़ उपाधियों के साथ आत्मा का तादात्म्य ही उसके सब दुखों का कारण है। स्वाभाविक ही इस मिथ्या तादात्म्य की निवृत्ति होने पर वह स्वयं अपने स्वरूप को पहचान सकता है जो पूर्ण आनन्दस्वरूप है। आत्मा और अनात्मा के परस्पर तादात्म्य से जीव उत्पन्न होता है। यही संसारी दुखी जीव आत्मानात्मविवेक से यह समझ पाता है कि वह तो वास्तव में जड़ प्रकृति का अधिष्ठान चैतन्य पुरुष है जीव नहीं।अर्जुन को जड़ और चेतन का भेद स्पष्ट करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण प्रथम प्रकृति के आठ भागों को बताते हैं जिसे यहाँ अष्टधा प्रकृति कहा गया है। इस विवेक से प्रत्येक व्यक्ति अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप को पहचान सकता है।आकाश वायु अग्नि जल और पृथ्वी  वे पंचमहाभूत तथा मन बुद्धि और अहंकार यह है अष्टधा प्रकृति जो परम सत्य के अज्ञान के कारण उस पर अध्यस्त (कल्पित) है। व्यष्टि (एक जीव) में स्थूल पंचमहाभूत का रूप है स्थूल शरीर तथा उनके सूक्ष्म भाव का रूप पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं जिनके द्वारा मनुष्य बाह्य जगत् का अनुभव करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे कारण हैं जिनके द्वारा विषयों की संवेदनाएं मन तक पहुँचती हैं। इन प्राप्त संवेदनाओं का वर्गीकरण तथा उनका ज्ञान और निश्चय करना बुद्धि का कार्य है। इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण मन के द्वारा उनका एकत्रीकरण तथा बुद्धि के द्वारा उनका निश्चय  इन तीनों स्तरों पर एक अहं वृत्ति सदा बनी रहती है जिसे अहंकार कहते हैं। ये जड़ उपाधियाँ हैं जो चैतन्य का स्पर्श पाकर चेतनवत् व्यवहार करने में समर्थ होती हैं।इसके पश्चात् अपनी पराप्रकृति बताने के लिए भगवान् कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "7.4. My nature is divided eightfold, such as the Earth, the Water, the Fire, the Wind, the Ether, the Mind, and also the Intellect and the Ego;"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "7.4 Earth, water, fire, air, ether, Manas, Buddhi and ego-sense - thus My Prakrti is divided eightfold."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "7.4 This Prakrti of Mine is divided eight-fold thus: earth, water, fire, air, space, mind, intellect and also egoism."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।7.4।।प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह  महतोऽहङ्कार एवान्तर्भावः।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।7.4।।ज्ञानार्थं प्रयत्नस्य तद्द्वारा ज्ञानलाभस्य तदुभयद्वारेण मुक्तेश्च दुर्लभत्वाभिधानस्य श्रोतृप्ररोचनं फलमिति मत्वाह  श्रोतारमिति। आत्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति  आहेति। भूमिशब्दस्य व्यवहारयोग्यस्थूलपृथिवीविषयत्वं व्यावर्तयति  भूमिरितीति। तत्र हेतुमाह  भिन्नेति। प्रकृतिसमभिव्याहाराद्गन्धतन्मात्रं स्थूलपृथिवीप्रकृतिरुत्तरविकारो भूमिरित्युच्यते न विशेष इत्यर्थः। भूमिशब्दवदबादिशब्दानामपि सूक्ष्मभूतविषयत्वमाह  तथेति। तेषामपि प्रकृतिसमानाधिकृतत्वाविशेषात्तन्मात्राणां पूर्वपूर्वप्रकृतीनामुत्तरोत्तरविकाराणां न विशेषत्वसिद्धिरित्यर्थः। मनःशब्दस्य संकल्पविकल्पात्मककरणविषयत्वमाशङ्क्याह  मन इतीति। न खल्वहंकाराभावे संकल्पविकल्पयोरसंभवात्तदात्मकं मनः संभवतीत्यर्थः। निश्चयलक्षणा बुद्धिरित्यभ्युपगमाद्बुद्धिशब्दस्य निश्चयात्मककरणाविषयत्वमाशङ्क्याह  बुद्धिरितीति। नहि हिरण्यगर्भसमष्टिबुद्धिरूपमन्तरेण व्यष्टिबुद्धिः सिध्यतीत्यर्थः। अहंकारस्याभिमानविशेषात्मकत्वेनान्तःकरणप्रभेदत्वं व्यावर्तयति  अहंकार इतीति। अविद्यासंयुक्तमित्यविद्यात्मकमित्यर्थः। कथं मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वमित्याशङ्क्योक्तमर्थं दृष्टान्तेन स्पष्टयति  यथेत्यादिना। मूलकारणस्याहंकारशब्दत्वे हेतुमाह  प्रवर्तकत्वादिति। तस्य प्रवर्तकत्वं प्रपञ्चयति अहंकार एवेति। सत्येवाहंकारे ममकारो भवति तयोश्च भावे सर्वाप्रवृत्तिरिति प्रसिद्धमित्यर्थः। उक्तां प्रकृतिमुपसंहरति  इतीयमिति। इयमित्यपरोक्षा साक्षिदृश्येति यावत्। ऐश्वरी तदाश्रया तदैश्वर्योपाधिभूता। प्रक्रियते महदाद्याकारेणेति प्रकृतिः। त्रिगुणं जगदुपादानं प्रधानमिति मतं व्युदस्यति  मायेति। तस्यास्तत्कार्याकारेण परिणामयोग्यत्वं द्योतयति  शक्तिरिति। अष्टधेति। अष्टभिः प्रकारैरिति यावत्।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।7.4 -- 7.5।।  पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश -- ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार -- यह आठ प्रकारके भेदोंवाली मेरी 'अपरा' प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस अपरा प्रकृतिसे भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी 'परा' प्रकृतिको जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है।",
        "hc": "।।7.4।। व्याख्या--'भूमिरापोऽनलो वायुः ৷৷. विद्धि मे पराम्'--परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं(टिप्पणी प0 397.1)। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम 'अपरा प्रकृति' है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान् 'परा प्रकृति' कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनशील है।प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतन्त्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम 'प्रकृति' है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्माका स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह परमात्मस्वरूप ही है; फिर इसकी जीव या प्रकृति संज्ञा नहीं रहती अर्थात् इसमें बन्धनकारक कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं रहता (गीता 18। 17)।यहाँ अपरा प्रकृतिमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार--ये आठ शब्द लिये गये हैं। इनमेंसे अगर पाँच स्थूल भूतोंसे स्थूल सृष्टि मानी जाय तथा मन, बुद्धि और अहंकार--इन तीनोंसे सूक्ष्म सृष्टि मानी जाय तो इस वर्णनमें स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि तो आ जाती है, पर कारणरूप प्रकृति इसमें नहीं आती। कारणरूप प्रकृतिके बिना प्रकृतिका वर्णन अधूरा रह जाता है। अतः आदरणीय टीकाकारोंने पाँच स्थूल भूतोंसे सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) को लिया है जो कि पाँच स्थूल भूतोंकी कारण हैं। 'मन' शब्दसे अहंकार लिया है, जो कि मनका कारण है। 'बुद्धि' शब्दसे महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) और 'अहंकार' शब्दसे प्रकृति ली गयी है। इस प्रकार इन आठ शब्दोंका ऐसा अर्थ लेनसे ही समष्टि अपरा प्रकृतिका पूरा वर्णन होता है; क्योंकि इसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण--ये तीनों समष्टि शरीर आ जाते हैं। शास्त्रोंमें इसी समष्टि प्रकृतिका 'प्रकृति-विकृति' के नामसे वर्णन किया गया है (टिप्पणी प0 397.2)। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान देनेकी है कि भगवान्ने यहाँ अपरा और परा प्रकृतिका वर्णन 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे नहीं किया है। यदि भगवान् 'प्रकृति-विकृति' की दृष्टिसे वर्णन करते तो चेतनको प्रकृतिके नामसे कहते ही नहीं; क्योंकि चेतन न तो प्रकृति है और न विकृति है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने यहाँ जड और चेतनका विभाग बतानेके लिये ही अपरा प्रकृतिके नामसे जडका और परा प्रकृतिके नामसे चेतनका वर्णन किया है।यहाँ यह आशय मालूम देता है कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश--इन पाँच तत्त्वोंके स्थूलरूपसे स्थूल सृष्टि ली गयी है और इनका सूक्ष्मरूप जो पञ्चतन्मात्राएँ कही जाती हैं, उनसे सूक्ष्मसृष्टि ली गयी है। सूक्ष्मसृष्टिके अङ्ग मन, बुद्धि और अहंकार हैं।अहंकार दो प्रकारका होता है--(1) 'अहं-अहं' करके अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम भी अहंकार है जो कि करणरूप है। यह हुई 'अपरा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ चौथे श्लोकमें हुआ है और (2) 'अहम्रूपसे व्यक्तित्व, एकदेशीयताका नाम भी अहंकार है, जो कि कर्तारूप है अर्थात् अपनेको क्रियाओंका करनेवाला मानता है। यह हुई 'परा प्रकृति', जिसका वर्णन यहाँ पाँचवें श्लोकमें हुआ है। यह अहंकार कारणशरीरमें तादात्म्यरूपसे रहता है। इस तादात्म्यमें एक जड-अंश है और एक चेतन-अंश है। इसमें जो जड-अंश है, वह कारण-शरीर है और उसमें जो अभिमान करता है, वह चेतन-अंश है। जबतक बोध नहीं होता, तबतक यह जड-चेतनके तादात्म्यवाला कारण-शरीरका 'अहम्' कर्तारूपसे निरन्तर बना रहता है। सुषुप्तिके समय यह सुप्तरूपसे रहता है अर्थात् प्रकट नहीं होता। नींदसे जगनेपर 'मैं सोया था, अब जाग्रत् हुआ हूँ' इस प्रकार 'अहम्' की जागृति होती है। इसके बाद मन और बुद्धि जाग्रत् होते हैं; जैसे--मैं कहाँ हूँ, कैसे हूँ--यह मनकी जागृति हुई और मैं इस देशमें, इस समयमें हूँ--ऐसा निश्चय होना बुद्धिकी जागृति हुई। इस प्रकार नींदसे जगनेपर जिसका अनुभव होता है, वह 'अहम्' परा प्रकृति है और वृत्तिरूप जो अहंकार है, वह अपरा प्रकृति है। इस अपरा प्रकृतिको प्रकाशित करनेवाला और आश्रय देनेवाला चेतन जब अपरा प्रकृतिको अपनी मान लेता है, तब वह जीवरूप परा प्रकृति होती है--'ययेदं धार्यते जगत्।'\n\nअगर यह परा प्रकृति अपरा प्रकतिसे विमुख होकर परमात्माके ही सम्मुख हो जाय, परमात्माको ही अपना माने और अपरा प्रकृतिको कभी भी अपना न माने अर्थात् अपरा प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धरहित होकर निर्लिप्तताका अनुभव कर ले तो इसको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। स्वरूपका बोध हो जानेपर परमात्माका प्रेम प्रकट हो जाता है (टिप्पणी प0 398), जो कि पहले अपरा प्रकृतिसे सम्बन्ध रखनेसे आसक्ति और कामनाके रूपमें था। वह प्रेम अनन्त, अगाध, असीम, आनन्दरूप और प्रतिक्षण वर्धमान है। उसकी प्राप्ति होनेसे यह परा प्रकृति प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाती है, अपने असङ्गरूपका अनुभव होनेसे ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाती है और अपरा प्रकृतिको संसारमात्रकी सेवामें लगाकर संसारसे सर्वथा विमुख होनेसे कृतकृत्य हो जाती है। यही मानव-जीवनकी पूर्णता है, सफलता है।'प्रकृतिरष्टधा अपरेयम्'पदोंसे ऐसा मालूम देता है कि यहाँ जो आठ प्रकारकी अपरा प्रकृति कही गयी है, वह 'व्यष्टि अपरा प्रकृति' है। इसका कारण यह है कि मनुष्यको व्यष्टि प्रकृति--शरीरसे ही बन्धन होता है, समष्टि प्रकृतिसे नहीं। कारण कि मनुष्य व्यष्टि शरीरके साथ अपनापन कर लेता है, जिससे बन्धन होता है।व्यष्टि कोई अलग तत्त्व नहीं है, प्रत्युत समष्टिका ही एक क्षुद्र अंश है। समष्टिसे माना हुआ सम्बन्ध ही व्यष्टि कहलाता है अर्थात् समष्टिके अंश शरीरके साथ जीव अपना सम्बन्ध मान लेता है, तो वह समष्टिका अंश शरीर ही 'व्यष्टि'  कहलाता है। व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बन्धन है। इस बन्धनसे छुड़ानेके लिये भगवान्ने आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिका वर्णन करके कहा है कि जीवरूप परा प्रकृतिने ही इस अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। यदि धारण न करे तो बन्धनका प्रश्न ही नहीं है।पंद्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने जीवात्माको अपना अंश कहा है --'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।'परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित रहनेवाले मन और पाँचों इन्द्रियोंको खींचता है अर्थात् उनको अपनी मानता है--'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।' इसी तरह तेरहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्ररूपसे समष्टिका वर्णन करके छठे श्लोकमें व्यष्टिके विकारोंका वर्णन किया; क्योंकि ये विकार व्यष्टिके ही होते हैं, समष्टिके नहीं। इन सबसे यही सिद्ध हुआ कि व्यष्टिसे सम्बन्ध जोड़ना ही बाधक है। इस व्यष्टिसे सम्बन्ध तोड़नेके लिये ही यहाँ व्यष्टि अपरा प्रकृतिका वर्णन किया गया है, जो कि समष्टिका ही अङ्ग है। व्यष्टि प्रकृति अर्थात् शरीर समष्टि सृष्टिमात्रके साथ सर्वथा अभिन्न है, भिन्न कभी हो ही नहीं सकता।वास्तवमें मूल प्रकृति कभी किसीकी बाधक या साधक (सहायक) नहीं होती। जब साधक उससे अपना सम्बन्ध नहीं मानता, तब तो वह सहायक हो जाती है, पर जब वह उससे अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बाधक हो जाती है क्योंकि प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे व्यष्टि अहंता (मैं-पन) पैदा होती है। यह अहंता ही बन्धनका कारण होती है।यहाँ 'इतीयं मे'पदोंसे भगवान् यह चेता रहे हैं कि यह अपरा प्रकृति मेरी है। इसके साथ भूलसे अपनापन कर लेना ही बार-बार जन्म-मरणका कारण है; और जो भूल करता है, उसीपर भूलको मिटानेकी जिम्मेवारी होती है। अतः जीव इस अपराके साथ अपनापन न करे।अहंतामें भोगेच्छा और जिज्ञासा--ये दोनों रहती हैं। इनमेंसे भोगेच्छाको कर्मयोगके द्वारा मिटाया जाता है और जिज्ञासाको ज्ञानयोगके द्वारा पूरा किया जाता है। कर्मयोग और ज्ञानयोग--इन दोनोंमेंसे एकके भी सम्यक्तया पूर्ण होनेपर एक-दूसरेमें दोनों आ जाते हैं (गीता 5। 4 5) अर्थात् भोगेच्छाकी निवृत्ति होनेपर जिज्ञासाकी भी पूर्ति हो जाती है और जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर भोगेच्छाकी भी निवृत्ति हो जाती है। कर्मयोगमें भोगेच्छा मिटनेपर तथा ज्ञानयोगमें जिज्ञासाकी पूर्ति होनेपर असङ्गता स्वतः आ जाती है। उस असङ्गताका भी उपभोग न करनेपर वास्तविक बोध हो जाता है और मनुष्यका जन्म सर्वथा सार्थक होजाता है।'जीवभूताम्'--वास्तवमें यह जीवरूप नहीं है, प्रत्युत जीव बना हुआ है। यह तो स्वतः साक्षात् परमात्माका अंश है। केवल स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीररूप प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही यह जीव बना है। यह सम्बन्ध जोड़ता है--अपने सुखके लिये। यही सुख इसके जन्म-मरणरूप महान् दुःखका खास कारण है।'महाबाहो'--हे अर्जुन ! तुम बड़े शक्तिशाली हो, इसलिये तुम अपरा और परा प्रकृतिके भेदको समझनेमें समर्थ हो। अतः तुम इसको समझो--'विद्धि।'\n\nययेदं धार्यते जगत् (टिप्पणी प0 399)--वास्तवमें यह जगत् जगद्रूप नहीं है प्रत्युत भगवान्का ही स्वरूप है--'वासुदेवः सर्वम्'(7। 19) 'सदसच्चाहम्'(9। 19)। केवल इस परा प्रकृति--जीवने इसको जगत्रूपसे धारण कर रखा है अर्थात् जीव इस संसारकी स्वतन्त्र सत्ता मानकर अपने सुखके लिये इसका उपोयग करने लग गया। इसीसे जीवका बन्धन हुआ है। अगर जीव संसारकी स्वतन्त्र सत्ता न मानकर इसको केवल भगवत्स्वरूप ही माने तो उसका जन्म-मरणरूप बन्धन मिट जायगा।       भगवान्की परा प्रकृति होकर भी जीवात्माने इस दृश्यमान जगत्को, जो कि अपरा प्रकृति है, धारण कर रखा है अर्थात् इस परिवर्तनशील, विकारी जगत्को स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मानकर 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे धारण कर रखा है। जिसकी भोगों और पदार्थोंमें जितनी आसक्ति है, आकर्षण है, उसको उतना ही संसार और शरीर स्थायी, सुन्दर और सुखप्रद मालूम देता है। पदार्थोंका संग्रह तथा उनका उपभोग करनेकी लालसा ही खास बाधक है। संग्रहसे अभिमानजन्य सुख होता है और भोगोंसे संयोगजन्य सुख होता है। इस सुखासक्तिसे ही जीवने जगत्को जगत्-रुप से धारण कर रखा है। सुखासक्तिके कारण ही वह इस जगत्को भगवत्स्वरूपसे नहीं देख सकता। जैसे स्त्री वास्तवमें जनन-शक्ति है परन्तु स्त्रीमें आसक्त पुरुष स्त्रीको मातृरूपसे नहीं देख सकता, ऐसे ही संसार वास्तवमें भगवत्स्वरूप है; परंतु संसारको अपना भोग्य माननेवाला भोगासक्त पुरुष संसारको भगवत्स्वरूप नहीं देख सकता। यह भोगासक्ति ही जगत्को धारण कराती है अर्थात् जगत्को धारण करानेमें हेतु है।दूसरी बात, मात्र मनुष्योंके शरीरोंकी उत्पत्ति रज-वीर्यसे ही होती है, जो कि स्वरूपसे स्वतः ही मलिन है। परंतु भोगोंमें आसक्त पुरुषोंकी उन शरीरोंमें मलिन बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत रमणीय बुद्धि होती है। यह रमणीय बुद्धि ही जगत्को धारण कराती है।नदीके किनारे खड़े एक सन्तसे किसीने कहा कि 'देखिये महाराज! यह नदीका जल बह रहा है और उस पुलपर मनुष्य बह रहे हैं।' सन्तने उससे कहा कि 'देखो भाई ! नदीका जल ही नहीं खुद नदी भी बह रही है; और पुलपर मनुष्य ही नहीं, खुद पुल भी बह रहा है।' तात्पर्य यह हुआ कि ये नदी, पुल तथा मनुष्य बड़ी तेजीसे नाशकी तरफ जा रहे हैं। एक दिन न यह नदी रहेगी, न यह पुल रहेगा और न ये मनुष्य रहेंगे। ऐसे ही यह पृथ्वी भी बह रही है अर्थात् प्रलयकी तरफ जा रही है। इस प्रकार भावरूपसे दीखने-वाला यह सारा जगत् प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है; परन्तु जीवने इसको भावरूपसे अर्थात् 'है' रूपसे धारण (स्वीकार) कर रखा है। परा प्रकृतिकी (स्वरूपसे) उत्पत्ति नहीं होती; पर अपरा प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेके कारण यह शरीरकी उत्पत्तिको अपनी उत्पत्ति मान लेता है और शरीरके नाशको अपना नाश मान लेता है, जिससे यह जन्मता-मरता रहता है। अगर यह अपराके साथ सम्बन्ध न जोड़े, इससे विमुख हो जाय अर्थात् भावरूपसे इसको सत्ता न दे तो जगत् सत्-रुपसे दीख ही नहीं सकता।'इदम्'पदसे शरीर और संसार--दोनों लेने चाहिये; क्योंकि शरीर और संसार अलग-अलग नहीं हैं। तत्त्वतः (धातु चीज) एक ही है। शरीर और संसारका भेद केवल माना हुआ है, वास्तवमें अभेद ही है। इसलिये तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने 'इदं शरीरम्' पदोंसे शरीरको क्षेत्र बताया (13। 1); परन्तु जहाँ क्षेत्रका वर्णन किया है, वहाँ समष्टिका ही वर्णन हुआ है (13। 5) और इच्छा-द्वेषादि विकार व्यष्टिके माने गये हैं (13। 6); क्योंकि इच्छा आदि विकार व्यष्टि प्राणीके ही होते हैं। तात्पर्य है कि समष्टि और व्यष्टि तत्त्वतः एक ही हैं। एक होते हुए भी अपनेको शरीर माननेसे 'अहंता' और शरीरको अपना माननेसे 'ममता' पैदा होती है, जिससे बन्धन होता है। अगर शरीर और संसारकी अभिन्नताका अथवा अपनी और भगवान्की अभिन्नताका साक्षात् अनुभव हो जाय तो अहंता और ममता स्वतः मिट जाती है। ये अहंता और ममता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग--तीनोंसे ही मिटती हैं। कर्मयोगसे--'निर्ममो निरहंकारः' (गीता 2। 71) ज्ञानयोगसे--'अहंकारं ৷৷. विमुच्य निर्ममः' (गीता 18। 53) और भक्तियोगसे 'निर्ममो निरहंकारः' (गीता 12। 13)। तात्पर्य है कि जडताके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होना चाहिये, जो कि केवल माना हुआ है। अतः विवेक-पूर्वक न माननेसे अर्थात् वास्तविकताका अनुभव करनेसे वह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है।\n\nविशेष बात\n\nजैसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध होता है, तो इसमें गुरु शिष्यको अपना शिष्य मानता है। शिष्य गुरुको अपना गुरु मानता है। इस प्रकार गुरु अलग है और शिष्य अलग है अर्थात् उन दोनोंकी अलग-अलग सत्ता दीखती है। परन्तु उन दोनोंके सम्बन्धसे एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'सम्बन्धकी सत्ता' कहते हैं (टिप्पणी प0 400)। ऐसे ही साक्षात् परमात्माके अंश जीवने शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। इस सम्बन्धके कारण एक तीसरी सत्ता प्रतीत होने लग जाती है, जिसको 'मैं'-पन कहते हैं। सम्बन्धकी यह सत्ता ('मैं'-पन) केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। जीव भूलसे इस माने हुए सम्बन्धको सत्य मान लेता है अर्थात् इसमें सद्भाव कर लेता है और बँध जाता है। इस प्रकार जीव संसारसे नहीं, प्रत्युत संसारसे माने हुए सम्बन्धसे ही बँधता है।गुरु और शिष्यमें तो दोनोंकी अलग-अलग सत्ता है और दोनों एक-दूसरेसे सम्बन्ध मानते हैं; परन्तु जीव (चेतन) और संसार (जड)--इन दोनोंमें केवल एक जीवकी ही वास्तविक सत्ता है और यही भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मानता है। संसार प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है; अतः उससे माना हुआ सम्बन्ध भी प्रतिक्षण स्वतः नष्ट हो रहा है। ऐसा होते हुए भी जबतक संसारमें सुख प्रतीत होता है, तबतक उससे माना हुआ सम्बन्ध स्थायी प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि संसारसे माना हुआ सम्बन्ध सुखासक्तिपर ही टिका हुआ है। संसारसे सुखासक्तिपूर्वक माने हुए सम्बन्धके कारण ही संसार अप्राप्त होनेपर भी प्राप्त और परमात्मा प्राप्त होनेपर भी अप्रप्त प्रतीत हो रहे हैं। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध टूटते ही परमात्माके वास्तविक सम्बन्धका अथवा संसारकी अप्राप्ति और परमात्माकी प्राप्तिका अनुभव हो जाता है।'मैं'-पनको मिटानेके लिये साधक प्रकृति और प्रकृतिके कार्यको न तो अपना स्वरूप समझे, न उससे कुछ मिलनेकी इच्छा रखे और न हि अपने लिये कुछ करे। जो कुछ करे, वह सब केवल संसारकी सेवाके लिये ही करता रहे। तात्पर्य है कि जो कुछ प्रकृतिजन्य पदार्थ हैं, उन सबकी संसारके साथ एकता है; अतः उनको केवल संसारका मानकर संसारकी ही सेवामें लगाता रहे। इससे क्रिया और पदार्थोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना स्वरूप अवशिष्ट रह जाता है अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जाता है। यह कर्मयोग हुआ। ज्ञानयोगमें विवेक-विचारपूर्वक प्रकृतिके कार्य पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर स्वरूपका बोध हो जाता है। इस प्रकार जडके सम्बन्धसे जो अहंता ('मैं'-पन) पैदा हुई थी, उसकी निवृत्ति हो जाती है।भक्तियोगमें 'मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं तथा मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ और शरीर-संसार मेरे नहीं हैं'--ऐसी दृढ़ मान्यता करके भक्त संसारसे विमुख होकर केवल भगवत्परायण हो जाता है, जिससे संसारका सम्बन्ध स्वतः टूट जाता है और अहंताकी निवृत्ति हो जाती है।इस प्रकार कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग--इन तीनोंमेंसे किसी एकका भी ठीक अनुष्ठान करनेपर जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।7.4।।अस्य विचित्रानन्दभोग्यभोगोपकरणभोगस्थानरूपेण अवस्थितस्य जगतः प्रकृतिः इयं गन्धादिगुणकपृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशादिरूपेण मनःप्रभृतीन्द्रियरूपेण च महदंकाररूपेण च अष्टधा भिन्ना मदीया इति विद्धि।",
        "et": "7.4 Know that Prakrti, the material cause of this universe, which consists of endless varieties of objects and means of enjoyment and places of enjoyment, is divided into eightfold substances - earth, water, fire, air and ether, having smell, taste etc., as their attributes, and Manas along with kindred sense organs and the categories Mahat and ego-sense - all belonging to Me."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।7.4  7.5।।भूमिरिति।  अपरेति।  इयमिति प्रत्यक्षेण या संसारावस्थायां।  सर्वजनपरिदृश्यमाना सा चैकैव सती प्रकाराष्टकेन भिद्यते इति एकप्रकृत्यारब्धत्वादेकमेव विश्वमिति प्रकृतिवादेऽपि अद्वैतं प्रदर्शितम्।  सैव जीवत्वं पुरुषत्वं प्राप्ता परा ममैव नान्यस्य च।  सा (S omits सा) उभयरूपा वेद्यवेदकात्मकप्रपञ्चोपरचनविचित्रा तत एव स्वात्मविमलमुकुरतलकलितसकलभावभूमिः स्वस्वभावात्मिका सततमव्यभिचारिणी प्रकृतिः।  इदं जगत् भूम्यादि।",
        "et": "7.4 See Comment under 7.5"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।7.4।।इस प्रकार रुचि बढ़ाकर श्रोताको सम्मुख करके कहते हैं  भिन्ना प्रकृतिरष्टधा वह कथन होनेके कारण यहाँ भूमिशब्दसे पृथिवीतन्मात्रा कही जाती है स्थूल पृथ्वी नहीं वैसे ही जल आदि तत्त्व भी तन्मात्रारूपसे कहे जाते हैं। ( इस प्रकार पृथ्वी ) जल अग्नि वायु और आकाश एवं मन  यहाँ मनसे उसके कारणभूत अहंकारकाग्रहण किया गया है  तथा बुद्धि अर्थात् अहंकारका कारण महत्तत्त्व और अहंकार अर्थात् अविद्यायुक्त अव्यक्त  मूलप्रकृति। जैसे विषयुक्त अन्न भी विष ही कहा जाता है वैसे ही अहंकार और वासनासे युक्त अव्यक्त  मूलप्रकृति भी अहंकार नामसे कही जाती है क्योंकि अहंकार सबका प्रवर्तक है संसारमें अहंकार ही सबकी प्रवृत्तिका बीज देखा गया है। इस प्रकार यह उपर्युक्त प्रकृति अर्थात् मुझ ईश्वरकी मायाशक्ति आठ प्रकारसे भिन्न है  विभागको प्राप्त हुई है।",
        "sc": "।।7.4।। भूमिः इति पृथिवीतन्मात्रमुच्यते न स्थूला भिन्ना प्रकृतिरष्टधा इति वचनात्। तथा अबादयोऽपि तन्मात्राण्येव उच्यन्ते  आपः अनलः वायुः खम्। मनः इति मनसः कारणमहंकारो गृह्यते। बुद्धिः इति अहंकारकारणं महत्तत्त्वम्। अहंकारः इति अविद्यासंयुक्तमव्यक्तम्। यथा विषसंयुक्तमन्नं विषमित्युच्यते एवमहंकारवासनावत् अव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते प्रवर्तकत्वात् अहंकारस्य। अहंकार एव हि सर्वस्य प्रवृत्तिबीजं दृष्टं लोके। इतीयं यथोक्ता प्रकृतिः मे मम ऐश्वरी मायाशक्तिः अष्टधा भिन्ना भेदमागता।।",
        "et": "7.4 Iyam, this; prakrtih, Prakrti, [Prakrti here does not mean the Pradhana of the Sankhyas.] the divine power called Maya; me, of Mine, as described; bhinna, is divided; astadha, eight-forl; iti, thus: bhumih, earth-not the gross earth but the subtle element called earth, this being understood from the statement, 'Prakrti (of Mine) is divided eight-fold'. Similarly, the subtle elements alone are referred to even by the words water etc.\nApah, water; analah, fire; vayuh, air; kham, space; manah, mind. By 'mind' is meant its source, egoism. By buddhih, intellect, is meant the principle called mahat [Mahat means Hiranyagarbha, or Cosmic Intelligence.] which is the source of egoism. By ahankarah, egoism, is meant the Unmanifest, associated [Associated, i.e. of the nature of.] with (Cosmic) ignorance. As food mixed with position is called poison, similarly the Unmainfest, which is the primordial Cause, is called egoism since it is imbued with the impressions resulting from egoism; and egoism is the impelling force (of all). It is indeed seen in the world that egoism is the impelling cause behind all endeavour."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।7.4।।मनुष्याणामितिवदुत्तरमप्यन्यार्थमिति प्रतीतिनिरासार्थं प्रतिज्ञातयोरुभयोः किमादावुच्यते इत्यपेक्षायां चाह  प्रतिज्ञातमिति। असङ्गतिपरिहारायानन्यार्थताज्ञापनाय च ज्ञानस्य प्राथम्ये हेतुसूचनाय च प्रतिज्ञातमित्युक्तम्। प्रतिज्ञातत्वेन सङ्गतं प्रतिज्ञातमेव। न तु तदर्थं प्राथम्येन प्रतिज्ञातम्।रसोऽहं इत्यतः प्राक्तनग्रन्थसङ्ग्रहायादिपदम्। महत्तत्त्वमत्र नोपात्तं तत्किं नास्त्येव इत्यत आह  महत इति। अहङ्कारेऽहङ्कारशब्दार्थेऽन्तर्भावः। कार्यवाचिनाऽहङ्कारशब्देन कारणस्य महतोऽप्युलक्षणमेव न त्वभाव इत्यर्थः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।7.4।।तथाविधं स्वमहिमज्ञानं ब्रह्मवादानुसारेण स्वयमेवोपदिशति  भूमिरित्यादिना। तत्रादौ सर्वधर्माश्रयं पुरुषोत्तमापरपर्यायं ब्रह्मैव परं स्वेच्छया सर्वं भवतीति श्रूयते भूमिवत् दुग्धवच्च अतएवक्षीरवद्धि इति सूत्रे व्यवस्थापितम्आत्मकृतेः परिणामात् ब्र.सू.1।4।26 इत्येवं श्रुत्यर्थं व्याख्यायाभिन्ननिमित्तोपादानकारणं तद्ब्रह्मेति भाष्ये निगदितं च। भागवतेऽपि 10।10।3031त्वमेव कालो भगवान्विष्णुपुरव्यय ईश्वरः। त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजस्सत्त्वतमोमयी।। इति। परापरप्रकृतिरूपेण स्वात्मनाऽसाधारणसृष्ट्यादिकार्यकरणमाहात्म्यं ज्ञापयितुं स्वस्य प्रकृतिद्वयं तावदाह द्वाभ्यां  भूमिराप इति। मे निरतिशयानन्तमहिम्नः सम्बन्धिनी संदशभूताऽप्यजा प्रकृतिरित्यष्टधा भिन्ना भूम्यादिरूपेण परिणताऽष्टविधा तत्र पञ्चधा स्थूलभावमिता पञ्चमहाभूतानि स्पष्टान्येव। मनो बुद्धिरहङ्कारश्चेत्यनिरुद्धप्रद्युम्नसङ्कर्षणाधिष्ठानभूता सूक्ष्मा। चित्तं च स्वाभेदाभिप्रायेण नोक्तं दृश्यमानत्वात् स्वस्य भागवतं वा तन्न प्राकृतमिति नोक्तम्। इयं च प्रकृतिः सदंशभूताऽचिदित्युच्यते चित्सम्बन्धे सर्वकार्यकरणक्षमा नान्यथेत्यपरा इयम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।7.4।।एवं प्ररोचनेन श्रोतारमभिमुखीकृत्यात्मनः सर्वात्मकत्वेन परिपूर्णत्वमवतारयन्नादावपरां प्रकृतिमुपन्यस्यति  सांख्यैर्हि पञ्चतन्मात्राण्यहंकारो महानव्यक्तमित्यष्टौ प्रकृतयः पञ्च महाभूतानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि उभयसाधारणं मनश्चेति षोडशविकारा उच्यन्ते। एतान्येव चतुर्विशतितत्त्वानि। तत्र भूमिरापोऽनलो वायुः खमिति पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाख्यपञ्चमहाभूतसूक्ष्मावस्थारूपाणि गन्धरसरूपस्पर्शशब्दात्मकानि पञ्चतन्मात्राणि लक्ष्यन्ते।बुद्ध्यहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेव। मनःशब्देन च परिशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते प्रकृतिशब्दसामानाधिकरण्येन स्वार्थहानेरावश्यकत्वात्। मनःशब्देन वा स्वकारणमहंकारो लक्ष्यते पञ्चतन्मात्रसंनिकर्षात्। बुद्धिशब्दस्त्वहंकारकारणे महत्तत्त्वे मुख्यवृत्तिरेव। अहंकारशब्देन च सर्ववासनावासितमविद्यात्मकमव्यक्तं लक्ष्यते प्रवर्तकत्वाद्यसाधारणधर्मयोगाच्च। इत्युक्तकारेणेयमपरोक्षा साक्षिभास्यत्वात्प्रकृतिर्मायाख्या पारमेश्वरी शक्तिरनिर्वचनीयस्वभावा त्रिगुणात्मिकाऽष्टधा भिन्नाऽष्टभिः प्रकारैर्भेदमागता। सर्वोऽपि जडवर्गोऽत्रैवान्तर्भवतीत्यर्थः। स्वसिद्धान्ते चेक्षणसंकल्पात्मकौ मायापरिणामावेव बुद्ध्यहंकारौ। पञ्चतन्मात्राणि चापञ्चीकृतपञ्चमहाभूतानीत्यसकृदवोचाम।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।7.4।।एवं श्रोतारमभिमुखीकृत्येदानीं प्रकृतिद्वारा सृष्ट्यादिकर्तृत्वेनेश्वरतत्त्वं प्रतिज्ञातं निरूपयिष्यन्परापरभेदेन प्रकृतिद्वयमाह  भूमिरिति द्वाभ्याम्। भूम्यादिशब्दैः पञ्चगन्धादितन्मात्राण्युच्यन्ते मनःशब्देन तत्कारणभूतोऽहंकारः बुद्धिशब्देन तत्कारणभूतं महत्तत्त्वं अहंकारशब्देन तत्कारणमविद्येत्येवमष्टधा भिन्ना। यद्वा भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सहैकीकृत्य गृह्यन्ते अहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनःशब्देन मनसैवोन्नेयमव्यक्तरूपं प्रधानमित्यनेन प्रकारेण मे प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरब्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विंशतिभेदभिन्नाप्यष्टस्वेवान्तर्भावविवक्षयाष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विंशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।7.4।।यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यत इत्युक्तेन श्रोतारममिमुखीकृत्य तदुपपत्तये चेतनातेतनप्रपञ्चस्य स्वस्मिन्परमात्मन्यध्यस्तत्वहबोधनायाह  भूमिरिति। आकाशादिभिः शब्दस्पर्शरुपरगन्धाख्यानि तन्मात्राणि लक्ष्यन्ते। इत्तीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधेति वाक्यशेषात्। मनःशब्देन तत्कारणमहंकारो लक्ष्यते। बुद्धिरित्यहंकारकारणं महत्तत्त्वं गृह्यते। अहंकार इत्यविद्यासंमिश्रमव्यक्तं लक्ष्यते। यथा विषसंमिश्रमन्नं विषमित्युच्यते तथाहंकारवासनावदव्यक्तं मूलकारणमहंकार इत्युच्यते। यत्तु बुद्य्धाहंकारशब्दौ तु स्वार्थावेन मनःशब्देनावशिष्टमव्यक्तं लक्ष्यते इति यत्पक्षान्तरं कैश्चित्प्रदर्शितं कैश्चत्प्रदर्शितं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु क्रमत्यागप्रसङ्गादि। यत्तु भूम्यादिशब्दैः पञ्चमहाभूतानि सूक्ष्मैः सैकीकृत्य गृह्यन्तेऽहंकारशब्देनैवाहंकारस्तेनैव तत्कार्याणीन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धिरिति महत्तत्त्वं मनः शब्देन तु मनसवोन्नेयमव्यक्तरुपं प्रधानमिति। अनेन रुपेण प्रकृतिर्मायाख्या शक्तिरष्टधा भिन्ना विभागं प्राप्ता। चतुर्विशतिभेदभिन्नैवेत्यष्टास्वेवान्तर्भावविवक्ष्याष्टधा भिन्नेत्युक्तम्। तथाच वक्ष्यमाणक्षेत्राध्याये इमामेव प्रकृतिं चतुर्विशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयिष्यतिमहाभून्यहांकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः इत्यपरेवर्णयन्ति। तत्रेदमवधेयम्मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षोडशकस्तु विकारः इति सांख्योक्तप्रकारेणष्टस्वेव प्रकृतित्वव्यवहारो न विकारेषु। अत्रापि इतीयं से भिन्ना प्रकृतिरष्टघेति बचनादष्टौ प्रकृतय एव गृह्यन्ते। विकारस्य तु एतद्योनीनि भूतानिति भूतपदाभिधेयस्य सर्वस्याप्युपादानं क्षेत्राध्याये तु क्षेत्रनिरुपणावसरे इदमुक्तं तत्क्षेत्रमित्यारम्भइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघाश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् इत्यन्तम्। यत्त्वन्ये नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा श्रृणेति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन नवापि प्रकृतयः। तथाचैवं योज्यम्। इयं मे मम मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले संप्रसीयते इति तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणादिति व्याचख्युस्तत्प्रकृताननुगुणम्। निर्देशानुसरणे तु मनःशब्देनोक्तश्रुत्या तस्य प्रकृतित्वात्तस्यैव ग्रहस्ततग्रहे मूलप्रकृतिग्रहे चोभयोरुपादाने वाष्टघेति विरोधापत्तेः मनसः प्रकृतित्ववर्णनमप्यसंगतम्। उदाहृतश्रुत्या तदलाभात्। मसा करणेनेन्द्रियद्वारकेण पश्यतीति श्रुत्यर्थाभ्युपगमात्। करणं विना द्वारस्याकिंचित्कतत्वात्। किंच विद्यारण्यादिभिराचार्यैर्मनसः श्रोत्राद्युत्पन्नमिति न प्रदर्शितं किंतुवियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे। सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम्। रजौशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमात्कर्मेन्द्रियाणि तु।। इति भूतेभ्य इन्द्रियाणामुत्पत्तिर्दर्शिता। पुराणेषु तु अहंकारदेव सात्त्विकादिरुपेण त्रिविधात्समनस्कानामिन्द्रियदेवतानां त्वगादीन्द्रियाणां भूतानां च क्रमात्सेति सर्वथापि मनस इन्द्रियंप्रति प्रकृतित्वं नास्ति। यत्र क्वापि मनसस्तत्कल्पकत्वं श्रुयते तत्रापि मनउपाधिकस्यात्मन उपाधिप्रधानस्येति द्रष्टव्यम्।वदन्वाक्पश्यंश्चक्षुः श्रृण्वञश्रोत्रम् इत्यादिश्रुतेः। यदपि प्रकृतेः सादित्वं साधितं तदपि सिद्धान्तविरुद्धम्। मायाविद्यारूपेण द्विविधाया अपि मूलप्रकृतेः सर्वैरपि वेदान्तिभिरनादित्वेन सिद्धान्तित्वात्। तदुत्पत्तिलयवचनानि त्वाविर्भावतिरोभावपराणि। अन्यथा तत्कारणभूतायाः प्रकृतेरावश्यकत्वेनानवस्थापातादिति दिक्। इदीयं यथोक्ता प्रकृतिर्मे मम माया पारमेश्वरी अष्टधा अष्टभिः प्रकारैर्भिन्ना भेदमागता।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।7.4।।अथभूमिः इत्यादिनानत्वहं तेषु ते मयि 7।12 इत्यन्तेन स्वयाथात्म्यमुपदिश्यते। तत्र प्रथमं कार्यकारणरूपाचिद्विलक्षणत्वं तच्छेषत्वादिमुखेन दर्शयति। भूम्यादीनां प्रकृतिकार्याणामत्र प्रकृतित्वेन उच्यमानत्वाद्व्यष्टिसृष्ट्यपेक्षया प्रकृतित्वमिह विवक्षितमित्यभिप्रायेणाह  अस्येति। केचिदाहुः  अष्टौ प्रकृतयः गर्भो.3 इति श्रुतेरिह भूम्यादिशब्दैस्तन्मात्राणि गृह्यन्ते मनश्शब्देन मनसः कारणभूतोऽहङ्कारः अहङ्कारशब्देन त्वहङ्कारवासनास्पदं अव्यक्तं मूलकारणमिति। एवं समस्तपदमुख्यार्थभङ्गक्लेशाद्व्यष्ट्यपेक्षया प्रकृतित्वं वरमिति भावः। यद्वा प्रकृतिशब्देन मूलप्रकृतिरेवोच्यते द्रव्यैक्यात्सैवाष्टधाऽवस्थितेत्युच्यते एषा हि पूर्वमेका पश्चादष्टधा परिणता। अत्र स्वोपदेश प्रवृत्तस्यप्रकृतेरष्टविधत्वोपदेशो न सङ्गतः नच स्वकीयत्वात् तत्सङ्गतिः तथात्वेनेतः प्रागनुपदिष्टत्वात्। अतः प्रत्यक्षादिसिद्धपृथिव्याद्याकारपरिणता प्रकृतिरिहानूद्यते स्वस्य तद्विलक्षणत्वतच्छेषित्वतन्नियामकत्वादिसिद्ध्यर्थंमे इति तस्याः स्वकीयत्वं विधीयत इत्यभिप्रायेणोक्तं  मदीयेति।विद्धि इति पृथिव्यादीनामितरेतरवैषम्यार्थं भोग्यत्वसिद्ध्यर्थमनुक्तानां तन्मात्राणां कार्यविशेषप्रदर्शनार्थं चगन्धादिगुणकेत्युक्तम्। एतेन भूतोक्तिस्तन्मात्रोपलक्षणार्थेत्यपि दर्शितम्। तदभिप्रायेणआकाशादीत्यादिशब्दोऽपि पठ्यते। तन्मात्राणां भूतानामप्यनतिविप्रकर्षात्सङ्ख्यानिवेशः। मनश्शब्दः करणभूतेन्द्रियवर्गोपलक्षणार्थ इति दर्शयितुंमनःप्रभृतीन्द्रियरूपेणेत्युक्तम्। बुद्ध्यहङ्कारशब्दयोरत्र ज्ञानगर्वाद्यर्थान्तरभ्रमव्युदासाय तत्त्वविशेषविषयत्वं ज्ञापयतिमहदहङ्काररूपेणेति। एवं समष्टिव्यष्टितत्त्वमखिलमुक्तं भवति। अत्र सम्बन्धसामान्यविहितापि षष्ठी स्वस्वामिलक्षणसम्बन्धविशेषपर्यवसिता।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।7.4।।एवं सावधानतया श्रोतव्यत्वेनार्जुनं बोधयित्वा पूर्वप्रतिज्ञातस्वस्वरूपज्ञानार्थं स्वस्य सर्वकर्त्तृत्वं सर्वस्वरूपत्वं चाह  भूमिराप इत्यादिभिः। भूमिः आपः अनलः वायुः खम् एवं पञ्च महाभूतानि। मनः सङ्कल्पादिसाधनम् बुद्धिर्ज्ञानात्मिका अहङ्कारोऽभिमानादिरूपः इति। अनेन प्रकारेण इयं मे अष्टधा प्रकृतिर्माया भिन्ना विभागं प्राप्ता। लौकिककार्यार्थमिति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।7.4।।एवमेकविज्ञानात्सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तदुपपत्तये सर्वस्य जडाजडप्रपञ्चस्य ज्ञानात्मकब्रह्मप्रभवत्वमाह त्रिभिः  भूमिरिति। अत्र भूम्यादिपदैस्तत्तत्कारणान्येव गृह्यन्ते प्रकृतिरित्यधिकारात् स्थूलभूम्यादेश्च विकृतिमात्रत्वात्। तथा च भूमिरिति गन्धतन्मात्रं आप इति रसतन्मात्रं अनल इति रूपतन्मात्रं वायुरिति स्पर्शतन्मात्रं खमिति शब्दतन्मात्रं मन इति तत्कारणमहंकारः बुद्धिरिति समष्टिबुद्धिर्महत्तत्त्वं अहंकरोत्यनयेत्यहंकारो मूलप्रकृतिः। करणे घञो दुर्लभत्वेऽप्यगत्या बाहुलकात्तद्बोध्यम्। इयं मे मत्तोऽभिन्नाऽपृथक्सिद्धा शुक्तिशकलादिव रजतं अष्टधा अष्टप्रकारा प्रकृतिर्जडप्रपञ्चोपादानभूता। यद्वा नात्राव्यक्तमहदहंकारपञ्चतन्मात्राण्येवाष्टौ सांख्याभिमता एव प्रकृतयो ग्राह्या इति नियमोऽस्ति।मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति इति मनस इन्द्रियान्तरप्रकृतित्वश्रवणेन सन्तु नवापि प्रकृतयः। तथा चैवं योज्यम्। इयं मे मदभिन्ना प्रकृतिरव्याकृताख्या भूम्यादिभेदेनाष्टधेति मूलप्रकृतेरत्र भूम्यादिभिः सह पाठाज्जन्यत्वमवगम्यते न सांख्यानामिवाजन्यत्वम्।तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम इतिअव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्निष्कले प्रविलीयते इति च तस्या अपि प्रभवप्रलययोः स्मरणात्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Earth, water, fire, air, ether, mind, intelligence and false ego – all together these eight constitute My separated material energies.",
        "ec": " The science of God analyzes the constitutional position of God and His diverse energies. Material nature is called prakṛti, or the energy of the Lord in His different puruṣa incarnations (expansions) as described in the Nārada Pañcarātra, one of the Sātvata-tantras: viṣṇos tu trīṇi rūpāṇi puruṣākhyāny atho viduḥ ekaṁ tu mahataḥ sraṣṭṛ dvitīyaṁ tv aṇḍa-saṁsthitam tṛtīyaṁ sarva-bhūta-sthaṁ tāni jñātvā vimucyate “For material creation, Lord Kṛṣṇa’s plenary expansion assumes three Viṣṇus. The first one, Mahā-viṣṇu, creates the total material energy, known as the mahat-tattva. The second, Garbhodaka-śāyī Viṣṇu, enters into all the universes to create diversities in each of them. The third, Kṣīrodaka-śāyī Viṣṇu, is diffused as the all-pervading Supersoul in all the universes and is known as Paramātmā. He is present even within the atoms. Anyone who knows these three Viṣṇus can be liberated from material entanglement.” This material world is a temporary manifestation of one of the energies of the Lord. All the activities of the material world are directed by these three Viṣṇu expansions of Lord Kṛṣṇa. These puruṣas are called incarnations. Generally one who does not know the science of God (Kṛṣṇa) assumes that this material world is for the enjoyment of the living entities and that the living entities are the puruṣas – the causes, controllers and enjoyers of the material energy. According to Bhagavad-gītā this atheistic conclusion is false. In the verse under discussion it is stated that Kṛṣṇa is the original cause of the material manifestation. Śrīmad-Bhāgavatam also confirms this. The ingredients of the material manifestation are separated energies of the Lord. Even the brahma-jyotir, which is the ultimate goal of the impersonalists, is a spiritual energy manifested in the spiritual sky. There are no spiritual diversities in the brahma-jyotir as there are in the Vaikuṇṭha-lokas, and the impersonalist accepts this brahma-jyotir as the ultimate eternal goal. The Paramātmā manifestation is also a temporary all-pervasive aspect of the Kṣīrodaka-śāyī Viṣṇu. The Paramātmā manifestation is not eternal in the spiritual world. Therefore the factual Absolute Truth is the Supreme Personality of Godhead Kṛṣṇa. He is the complete energetic person, and He possesses different separated and internal energies. In the material energy, the principal manifestations are eight, as above mentioned. Out of these, the first five manifestations, namely earth, water, fire, air and sky, are called the five gigantic creations or the gross creations, within which the five sense objects are included. They are the manifestations of physical sound, touch, form, taste and smell. Material science comprises these ten items and nothing more. But the other three items, namely mind, intelligence and false ego, are neglected by the materialists. Philosophers who deal with mental activities are also not perfect in knowledge because they do not know the ultimate source, Kṛṣṇa. The false ego – “I am,” and “It is mine,” which constitute the basic principle of material existence – includes ten sense organs for material activities. Intelligence refers to the total material creation, called the mahat-tattva. Therefore from the eight separated energies of the Lord are manifest the twenty-four elements of the material world, which are the subject matter of Sāṅkhya atheistic philosophy; they are originally offshoots from Kṛṣṇa’s energies and are separated from Him, but atheistic Sāṅkhya philosophers with a poor fund of knowledge do not know Kṛṣṇa as the cause of all causes. The subject matter for discussion in the Sāṅkhya philosophy is only the manifestation of the external energy of Kṛṣṇa, as it is described in the Bhagavad-gītā ."
    }
}
