{
    "_id": "BG7.23",
    "chapter": 7,
    "verse": 23,
    "slok": "अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् |\nदेवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ||७-२३||",
    "transliteration": "antavattu phalaṃ teṣāṃ tadbhavatyalpamedhasām .\ndevāndevayajo yānti madbhaktā yānti māmapi ||7-23||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।7.23।। परन्तु उन अल्प बुद्धि पुरुषों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "7.23 Verily the reward (fruit) that accrues to those men of small intelligence is finite. The worshippers of the gods go to them, but My devotees come to Me.",
        "ec": "7.23 अन्तवत् finite? तु verily? फलम् the fruit? तेषाम् of them? तत् that? भवति is? अल्पमेधसाम् those of small intelligence? देवान् to the gods? देवयजः the worshippers of the gods? यान्ति go to? मद्भक्ताः My devotees? यान्ति go to? माम् Me? अपि also.Commentary The exertion in the two kinds is the same and yet people do not attempt to worship the Supreme Being in order to attain the maximum benefits or the infinite reward (liberation or Moksha). The reward obtained by men of small understandng and petty intellect who worship the minor deities is small? perishable and temporary.Yajnas (Vedic rituals)? Homas (rituals in which oblations are offered into the sacred fire) and Tapas (penance) of various sorts can bestow only temporary rewards on the performer. Liberation from the wheel of transmigration alone will give everlasting bliss and eternal peace.Those who worship Indra and others are Sattvic devotees those who worship Yakshas and Rakshasas (demoniacal beings) are Rajasic devotees and those who worship the Bhutas and Pretas (discarnate spirits) are Tamasic devotees.The knowledge of those who worship the small deities is partial and incomplete. It cannot lead to liberation. (Cf.IX.25)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "7.23 The fruit that comes to men of limited insight is, after all, finite. They who worship the Lower Powers attain them; but those who worship Me come unto Me alone."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।7.23।। नाशवान् भोगों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए मनुष्य जो कर्म करता है वह अनित्य होने से उसका फल भी क्षणभंगुर ही होता है। स्वर्ण से बने आभूषण स्वर्ण ही होंगे। कार्य का गुणधर्म पूर्णतया कारण पर निर्भर करता है।देशकाल से परिच्छिन्न कर्मों से प्राप्त फल अनित्य ही होगा  चाहे वह सुख हो या दुख। सुख का अन्त दुख का प्रारम्भ है। अत जब कोई इच्छा पूर्ण हो जाती है तब यद्यपि क्षणमात्र के लिए सुख का आभास भी होता है परन्तु शीघ्र ही उसके समाप्त होने पर दुख का कटु अनुभव मनुष्य को होता है।भगवान् श्रीकृष्ण सामान्य नियम बताते हैं कि देवपूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं। जिस नियम का जो अधिष्ठाता देवता है या जिस क्षेत्र में जो उत्पादन क्षमता है उसका आह्वान करने पर मनुष्य केवल उसी फल को प्राप्त कर सकता है।इसी प्रकार मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। परिच्छिन्न भोगों के लिए मनुष्य इतना अधिक प्रयत्न करके अन्त में क्षणिक फल को ही प्राप्त करता है। यदि वही प्रयत्न वह दैवी जीवन जीने में करे तो उसे नित्य आनन्दस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है। किन्तु मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के कारण वह अनात्म उपाधियों से तादात्म्य करके बाह्य वैषयिक जगत् में ही रमता है।विवेकी पुरुष विषयोपभोग की तुच्छता और व्यर्थता को पहचान कर उनसे विरक्त हो जाते हैं। विवेक और वैराग्य से सम्पन्न होकर जब वे आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं तब उन्हें परम आनन्दस्वरूप की वह अनुभूति होती है जो शरीर मन और बुद्धि तीनों के परे है नित्य है।गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो मैं शब्द का प्रयोग किया है वह उस अनन्त तत्त्व को सूचित करता है जो व्यष्टि और समष्टि का अधिष्ठान है। अत वे कहते हैं कि मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं तब उनका तात्पर्य ऐतिहासिक पुरुष देवकी पुत्र कृष्ण से नहीं वरन् चैतन्यस्वरूप पुरुष से होता है। इस दृष्टि से आत्मवित् आत्मस्वरूप ही बन जाता है। यही भगवान् श्रीकृष्ण के कथन का वास्तविक अभिप्राय है।तब क्या कारण है कि सामान्य जन आपको प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करता उत्तर है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "7.23. But, that fruit of  those men of poor intellect is finite.  Those, who perform sacrifices, aiming at the gods, go to gods, and My devotees go to Me."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "7.23 But limited is the fruit gained by these men of small understanding. The worshippers of the gods will go to the gods but My devotees will come to Me."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "7.23 That result of theirs who are of poor intellect is indeed limited. The worshippers of gods go to the gods. My devotees go to Me alone."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।7.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।7.23।।प्रेक्षापूर्वकारिणि कामानां हितत्वाभावे हेतुमाह  यस्मादिति। किञ्च ये कामिनस्ते न विवेकिनस्ततश्चाविवेकपूर्वकत्वात्कामानां कुतो हितत्वाशङ्केत्याह  अविवेकिन इति। कामानामनन्तफलत्वेन हितत्वमाशङ्क्याह  अत इति। तेषामविवेकपूर्वकत्वमतःशब्दार्थः। तुशब्दोऽवधारणार्थः। कामफलस्य विनाशित्वेकिमिति कामनिष्ठत्वं जन्तूनामित्याशङ्क्य प्रज्ञामान्द्यादित्याह   अल्पेति। किं तर्हि साधनमनन्तफलायेत्याशङ्क्य भगवद्भक्तिरित्याह  मद्भक्ता इति। अक्षरार्थमुक्त्वा श्लोकस्य तात्पर्यार्थमाह  एवमिति। देवताप्राप्तौ चेति शेषः। मामवेत्यादौ देवताविशेषं प्रपद्यन्तेऽन्तवत्फलायेति वक्तव्यम्। उक्तवैपरीत्ये कारणमविवेकातिरिक्तं नास्तीत्यभिप्रेत्याह  अहो खल्विति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।7.23।। परन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला (नाशवान्) ही मिलता है। देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे ही प्राप्त होते हैं।",
        "hc": "।।7.23।। व्याख्या--'अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्'--देवताओंकी उपासना करनेवाले अल्पबुद्धि-युक्त मनुष्योंको अन्तवाला अर्थात् सीमित और नाशवान् फल मिलता है। यहाँ शङ्का होती है कि भगवान्के द्वारा विधान किया हुआ फल तो नित्य ही होना चाहिये, फिर उनको अनित्य फल क्यों मिलता है? इसका समाधान यह है कि एक तो उनमें नाशवान् पदार्थोंकी कामना है और दूसरी बात, वे देवताओंको भगवान्से अलग मानते हैं। इसलिये उनको नाशवान् फल मिलता है। परन्तु उनको दो उपायोंसे अविनाशी फल मिल सकता है--एक तो वे कामना न रखकर (निष्कामभावसे) देवताओंकी उपासना करें तो उनको अविनाशी फल मिल जायगा और दूसरा, वे देवताओंको भगवान्से भिन्न न समझकर, अर्थात् भगवत्स्वरूप ही समझकर उनकी उपासना करें तो यदि कामना रह भी जायगी, तो भी समय पाकर उनको अविनाशी फल मिल सकता है अर्थात् भगवत्प्राप्ति हो सकती है।यहाँ 'तत्' कहनेका तात्पर्य है कि फल तो मेरा विधान किया हुआ ही मिलता है, पर कामना होनेसे वह नाशवान् हो जाता है।यहाँ 'अल्पमेधसाम्' कहनेका तात्पर्य है कि उनको नियम तो अधिक धारण करने पड़ते हैं तथा विधियाँ भी अधिक करनी पड़ती हैं, पर फल मिलता है सीमित और अन्तवाला। परन्तु मेरी आराधना करनेमें इतने नियमोंकी जरूरत नहीं है तथा उतनी विधियोंकी भी आवश्यकता नहीं है, पर फल मिलता है असीम और अनन्त। इस तरह देवताओंकी उपासनामें नियम हों अधिक, फल हो थोड़ा और हो जाय जन्म-मरणरूप बन्धन और मेरी आराधनामें नियम हों कम, फल हो अधिक और हो जाय कल्याण--ऐसा होनेपर भी वे उन देवताओंकी उपासनामें लगते हैं और मेरी उपासनामें नहीं लगते। इसलिये उनकी बुद्धि अल्प है, तुच्छ है।'देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि'--देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं। यहाँ 'अपि 'पदसे यह सिद्ध होता है कि मेरी उपासना करनेवालोंकी कामनापूर्ति भी हो सकती है और मेरी प्राप्ति तो हो ही जाती है अर्थात् मेरे भक्त सकाम हों या निष्काम, वे सब-के-सब मेरेको ही प्राप्त होते हैं। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवालोंकी सभी कामनाएँ पूरी हो जायँ, यह नियम नहीं है। भगवान् उचित समझें तो पूरी कर भी दें और न भी करें अर्थात् उनका हित होता हो तो पूरी कर देते हैं और अहित होता हो तो कितना ही पुकारनेपर तथा रोनेपर भी पूरी नहीं करते।\n\nयह नियम है कि भगवान्का भजन करनेसे भगवान्के नित्यसम्बन्धकी स्मृति हो जाती है; क्योंकि भगवान्का सम्बन्ध सदा रहनेवाला है। अतः भगवान्की प्राप्ति होनेपर फिर संसारमें लौटकर नहीं आना पड़ता--'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' (15। 6)। परन्तु देवताओंका सम्बन्ध सदा रहनेवाला नहीं है; क्योंकि वह कर्मजनित है। अतः देवतालोककी प्राप्ति होनेपर संसारमें लौटकर आना ही पड़ता है--'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' (9। 21)।\n\nमेरा भजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं--इसी भावको लेकर भगवान्ने अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी--इन चारों प्रकारके भक्तोंको सुकृती और उदार कहा है (7। 16 18)।यहाँ 'मद्भक्ता यान्ति मामपि' का तात्पर्य है कि जीव कैसे ही आचरणोंवाला क्यों न हो अर्थात् वह दुराचारी-से-दुराचारी क्यों न हो, आखिर है तो मेरा ही अंश। उसने केवल आसक्ति और आग्रहपूर्वक संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया है। अगर संसारकी आसक्ति और आग्रह न हो तो उसे मेरी प्राप्ति हो ही जायगी।विशेष बातसब कुछ भगवत्स्वरूप ही है और भगवान्का विधान भी भगवत्स्वरूप है--ऐसा होते हुए भी भगवान्से भिन्न संसारकी सत्ता मानना और अपनी कामना रखना--ये दोनों ही पतनके कारण हैं। इनमेंसे यदि कामनाका सर्वथा नाश हो जाय तो संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जायगा और यदि संसार भगवत्स्वरूप दीखने लग जाय तो कामना मिट जायगी। फिर मात्र क्रियाओँके द्वारा भगवान्की सेवा होने लग जायगी। अगर संसारका भगवत्स्वरूप दीखना और कामनाका नाश होना--दोनों एक साथ हो जायँ, तो फिर कहना ही क्या है!\n\n सम्बन्ध--यद्यपि देवताओंकी उपासनाका फल सीमित और अन्तवाला होता है, फिर भी मनुष्य उसमें क्यों उलझ जाते हैं, भगवान्में क्यों नहीं लगते--इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।7.23।।तेषाम् अल्पमेधसाम् अल्पबुद्धीनाम् इन्द्रादिमात्रयाजिनां तदाराधनफलं स्वल्पम् अन्तवत् च भवति। कुतः देवान् देवयजो यान्ति यत इन्द्रादीन् देवान् तद्याजिनो यान्ति। इन्द्रादयो हि परिच्छिन्नभोगाः परिमितकालवर्तिनश्च। ततः तत्सायुज्यं प्राप्ताः तैः सह प्रच्यवन्ते।मद्भक्ता अपि तेषाम् एव कर्मणां मदाराधनरूपतां ज्ञात्वा परिच्छिन्नफलसङ्गं त्यक्त्वा मत्प्रीणनैकप्रयोजनाः माम् एव प्राप्नुवन्ति न च पुनर्निवर्तन्तेमामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते (गीता 8।16) इति वक्ष्यते।इतरे तु सर्वसमाश्रयणीयत्वाय मम मनुष्यादिषु अवतारम् अपि अकिञ्चित्करं कुर्वन्ति इत्याह",
        "et": "7.23 The men of 'small understanding' means those whose understanding is poor, who worship only Indra and other divinities. The fruit of their worship is small and finite. Why?  The worshippers of divinities like Indra go to the divinities. And Indra and other divinities possess limited joy and live only for a limited time. So if they attain eality of enjoyment with them, they also fall down along with them in due course; but My devotees, knowing that their acts are of the nature of My worship, renouncing attachment for finite, fruits, reach Me, having for their purpose the pleasing of Me alone. That is, they never more return to Samsara. For Sri Krsna teaches later on:  'But on reaching Me there is no rirth, O Arjuna' (8.16).\n\nNow Sri Krsna declares:  'But these others (i.e., who worship Indra etc.) regard as insignificant even My incarnations among men and other beings in order to make Myself easy for all to resort to.'"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।7.20  7.23।।कामैरित्यादि मामपीत्यन्तम्।  ये पुनः स्वेन स्वेनोत्तमादिकामनास्वभावेन विचित्रेण परिच्छिन्नमनसस्ते कामनापहृतचेतनाः (N   चेतस)) तत्समुचितामेव ममैवावान्तरतनुं देवताविशेषमुपासते। अतो मत एव कामफलमुपाददते (S  पासते)।  किं तु तस्यान्तोऽस्ति निजयैव वासनया परिमितीकृतत्त्वात्।  अत एवेन्द्रादिभावनातात्पर्येण यागादि कुर्वन्तस्तथाविधमेव फलमुपाददते।  मत्प्राप्तिपरास्तु मामेव।",
        "et": "7.20-23 Kamaih etc.  upto man api.  On the other hand, those persons, whose minds are conditioned  by a variety of their own respective desires for the best and so on (or the desires that may be classified as the best and so on) - they have thier thinking faculty  carried away by their desires,  and worship a particular deity who possesses nothing but My intermediate body that suits only to those devotees'  desires.   Hence, they obtain their desired result from Me alone.  But, that result has an end of its own, because it is limited by the mental impressions of their own.  Therefore those who perform sacrifice etc.,  with the aim of becming Indra  etc.,  (or of attaining the houses of Indra etc.)  gain their desired fruit accordingly.  On the other hand, those whose chief aim is to attain Me,  they gain Me alone.\t\t\t\t\t\t\t\t\t\t\n But, while the Absolute-being is immanent  in all, how is it that  the fruit  achieved by the worshippers of other deities is limited ?  The answer is given as :"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।7.23।।क्योंकि वे कामी और अविवेकी पुरुष विनाशशील साधनकी चेष्टा करनेवाले होते हैं इसलिये  उन अल्पबुद्धिवालोंका वह फल नाशवान्  विनाशशील होता है। देवयाजी अर्थात् जो देवोंका पूजन करनेवाले हैं वे देवोंको पाते हैं और मेरे भक्त मुझको ही पाते हैं। अहो  बड़े दुःखकी बात है कि इस प्रकार समानपरिश्रम होनेपर भी लोग अनन्त फलकी प्राप्ति के लिये केवल मुझ परमेश्वरकी ही शरणमें नहीं आते। इस प्रकार भगवान् करुणा प्रकट करते हैं।",
        "sc": "।।7.23।। अन्तवत् विनाशि तु फलं तेषां तत् भवति अल्पमेधसां अल्पप्रज्ञानाम्। देवान्देवयजो यान्ति देवान् यजन्त इति देवयजः ते देवान् यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि। एवं समाने अपि आयासे मामेव न प्रपद्यन्ते अनन्तफलाय अहो खलु कष्टं वर्तन्ते इत्यनुक्रोशं दर्शयति भगवान्।।किंनिमित्तं मामेव न प्रपद्यन्ते इत्युच्यते",
        "et": "7.23 Since those non-discriminating men with desires are engaged in disciplines for limited results, therefore, tat phalam, that result; tesam, of theirs; alpamedhasam, who are of poor intellect, of poor wisdom; antavat tu bhavati, is limited, ephemeral, indeed. Deva-yajah, the worshippers of gods; yanti, go; devan, to the gods. Madbhaktah, My devotees; yanti, to; mam api, to Me alone.\n'Thus, though the effort needed is the same, they do not resort to me alone for the unlimited result. Alas! they are surely in a pitiable condition.' In this manner the Lord expresses his compassion.\n'Why do they not take refuge in Me alone?'\nThe answer is:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।7.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।7.23।।अतो भावभेदात्फलभेद इत्याह  अन्तवदिति। तुशब्दो भेदं सूचयति। यतोऽल्पमेधसां इन्द्रादिमात्राङ्गयाजिनां शाखाफलपत्रान्यतरसेचकानामिव तेषां फलमल्पमन्तवद्विनाशि च भवति वदति चदेवान्देवयजो यान्ति इत्यादौ तत्तद्देवसायुज्यं चाप्याप्तव्यमेवेति। यागे तु श्रौते देवानां भगवदङ्गभूतत्वज्ञानपूर्वकमाराधनमिति न विरोधः। भक्तौ तु केवलं तदङ्गिन एवाराधने सर्वाराधनं भवतीति भावेन मूलरूपत्वादिति ज्ञेयम् किंबहुना यो यं भजते श्रद्धया तं तमेवतीत्यभिप्रायेण मद्भक्ता यान्ति मामपीत्युक्तम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।7.23।।यद्यपि सर्वा अपि देवताः सर्वात्मनो ममैव तनवस्तदाराधनमपि वस्तुतो मदाराधनमेव सर्वत्रापि च फलदातान्तर्याम्यहमेव तथापि साक्षान्मद्भक्तानां च तेषां च वस्तुविवेकाविवेककृतं फलवैषम्यं भवतीत्याह  अल्पमेधसां मन्दप्रज्ञत्वेन वस्तुविवेकासमर्थानां तेषां तत्तद्देवताभक्तानां तन्मया विहितमपि तत्तद्देवताराधनजं फलं अन्तवदेव विनाश्येव नतु मद्भक्तानां विवेकिनामिवानन्तं फलं तेषामित्यर्थः। कुत एवं यतो देवानिन्द्रादीनन्तवत एव देवजयो मदन्यदेवताराधनपरा यान्ति प्राप्नुवन्ति। मद्भक्तास्तु त्रयः सकामाः प्रथमं मत्प्रसादादभीष्टान्कामान्प्राप्नुवन्ति। अपिशब्दप्रयोगात्ततो  मदुपासनापरिपाकान्मामनन्तमानन्दघनमीश्वरमपि यान्ति प्राप्नुवन्ति। अतः समानेऽपि सकामत्वे मद्भक्तानामन्यदेवताभक्तानां च महदन्तरं तस्मात्साधूक्तमुदाराः सर्व एवैत इति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।7.23।।तदेव यद्यपि सर्वा अपि देवता ममैव मूर्तयः अतस्तदाराधनमपि वस्तुतो मदाराधनमेव तत्तत्फलदातापि चाहमेव तथापि साक्षान्मद्भक्तानां च तेषां फलवैषम्यं भवतीत्याह  अन्तवत्त्विति। अल्पमेधसां परिच्छिन्नदृष्टीनां मया दत्तमपि तत्फलमन्तवद्विनाशि भवति। तदेवाह। देवान्यजन्तीति देवयजः ते देवानन्तवतो यान्ति। मद्भक्तास्तु मामनाद्यन्तं तं परमानन्दं प्राप्नुवन्ति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।7.23।।समानेऽप्यायासेऽन्तवत्फलासाधने तत्तद्देवताराधने प्रवर्तन्ते नतु मामेव भगवन्तं सर्वात्मानं तत्तत्कर्मफलप्रदं वासुदेवमनन्तफलाय प्रतिपद्यन्त इत्यहो तेषामल्पबुद्धितेत्यनुक्रोशं दर्शयन्नाह  अन्तवदिति। तेषां तत्तद्देवताराधनापराणामल्पमेधसांअथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम् इति श्रुतेरल्पे द्वैते मेधा बुद्धिर्येषां ते भेदबुद्धय इत्यर्थः। अल्पेऽन्तवत्फले बुद्धिर्येषामिति वा अल्पे परिच्छिन्ने देवतान्तरे बुद्धिर्येषामिति वा अनल्पानन्तफलाय वासुदेव एव भजनीयो नतु अन्तवत्फलाय देवतान्तरमिति विवेक्तुमक्षमत्वात्स्वल्पा बुद्धिर्येषामिति वा फलमन्तवद्विनासि तु एव भवति तन्मया दत्तमपि। तदेवाह। यतो देवयज इन्द्राद्यर्चका देवानन्तवतो यान्ति गच्छन्ति। मद्भक्तास्वार्तादयस्त्रयोऽपि तत्तदीप्सितं लब्धवा क्रमेण मां वासुदेवं सच्चिदानन्दघनमनन्तं मोक्षाभिधेयमपि यान्ति गच्छन्ति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।7.23।।यदि भवत्प्रसादात्तेषामपि फलसिद्धिस्तर्हि तत्र को विशेषो भवदुपासकेभ्यः इत्यत्रोत्तरम्  अन्तवत्तु इत्यादि। पूर्वार्धे सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदभ्रमनिरासायतेषामल्पमेधसामिति सामानाधिकरण्यं दर्शितम्। तेषामिति फलाल्पत्वहेतुपरामर्शं इत्याहइन्द्रादिमात्रयाजिनामिति। तत्र हेतुरल्पबुद्धित्वम्। अल्पेष्विन्द्रादिषु तदधीनफलेषु च मेधा बुद्धिर्येषां तेऽल्पमेधसः। अल्पगोचरत्वादल्पा मेधा येषामिति वा। अल्पमेधस्त्वादेव तत्फलस्याप्यल्पत्वं सिद्धमिति कृत्वाअल्पमन्तवच्च भवतीत्युक्तम्।देवान् देवयजः इत्यत्र देवशब्दो गोबलीवर्दन्यायान्मच्छब्दोक्तभगवद्व्यतिरिक्तदेवपरः। अथवा मनुष्यादिसहपठितकर्मवश्यदेवजातिविशेषपर इत्यभिप्रायेणइन्द्रादीन् देवांस्तद्याजिन इत्युक्तम्। कथमिन्द्रादिप्राप्तिः फलस्याल्पास्थिरत्वहेतुः इत्यत्राह  इन्द्रादयोऽपि हीति। अस्तु तेषामल्पभोगत्वमस्थिरत्वं च ततः किं तदुपासकस्य भगवत्प्रसादाधीनफललाभस्येत्यत्राहतत इति। केवलेन्द्रादियाजिनां तत्तदभिलषितं तत्सायुज्यादिकमेव हि भगवान् प्रयच्छति सायुज्यं च समानभोगत्वमेव तत इन्द्रादिभोगस्य परिमितस्वरूपत्वात्परिमितकालवर्तित्वाच्च तत्समानस्तदुपासकभोगोऽपि तथाविध एव भवेदिति भावः।माम् इति निर्दिष्टभगवत्स्वरूपस्य निरतिशयानन्दमयत्वात्तत्साधर्म्यमागतस्यापि निरतिशयभोगत्वं सिद्धम्। सूत्रं चभोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ब्र.सू.4।4।21 इति। तन्नित्यत्वाच्च तदुपासकभोगस्यापि नित्यत्वं दर्शयतिन च पुनर्निवर्तन्त इति। अत्राभिप्रेतं वक्ष्यमाणवचनेन विशदयतिमामुपेत्येति। अत्रापि सूत्रम्  अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ब्र.सू.4।4।22 इति।मद्भक्ता यान्ति मामपि इत्यत्र भगवति फलान्तरार्थिनामपि मोक्षे विश्रमो नारायणार्यैरुक्तः  तथा देवतान्तरभक्तानां अपेक्षितार्थलाभ एव फलम् भगवद्भक्तानां तु न तावन्मात्रं फलम् किन्तु स्वभावप्राप्तादनभिसंहितादपि पापपरिक्षयात् सत्त्वाधिक्योन्मीलनेन शुद्धेषु धर्मेषु श्रद्धोत्पत्त्या शनैश्शनैर्ज्ञानवैराग्यादिलाभद्वारेण पूर्वोक्तभक्तिविशेषलाभाच्चिरतरेणापि कालेन भगवत्प्राप्तिर्भविष्यतीति नित्यफलत्वमित्यभिप्रायः  इति। इदं चशाण्डिल्यसंहितायामपि भागवतापचारसङ्ग्रहे प्रोक्तं  भगवन्तं समुद्दिश्य तदेकशरणा नराः। कदाचिन्न च हीयन्ते काम्यकर्मरता अपि। इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।7.23।।तर्हि त्वन्निर्मितफलाप्त्या चोत्तमत्वमेव तत्फलस्य कथं न इत्यत आह  अन्तवत्त्विति। तु पुनः मन्निर्मितमपि फलं तेषामल्पमतिमतां भक्तिं विहाय कामपरत्वात् अन्तवत् विनाशयुक्तं भवतीत्यर्थः। तच्छब्देन तद्बुद्ध्यनुसारेण मया तत्फलं विधीयत इति व्यज्यते। ननु देवा अपि त्वदंशास्तद्भजने कथं नोत्तमफलम् इत्यत आह  देवानिति देवयजः৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ पूर्वोक्तप्रकारेण स्वकामितफलाप्त्यर्थं देवभजनकर्त्तारः। अथवा देवत्वेन तद्भजनकर्त्तारः न तु मदंशत्वेन स्फुरितस्तमानाः৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. अतो देवान् यान्ति मत्सायुज्यकामाभावे प्राप्नुवन्ति। कामनायां तु तदेव प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। अन्यदेवेषु देवत्वेन भजनकर्त्तारस्तत्सायुज्यमेव प्राप्नुवन्ति। कामनायां तु तदपि न प्राप्नुवन्त्यतः कामनयाऽपि मद्भजनमुत्तममित्याह  मद्भक्ता इति। मद्भक्ताः मद्भजनकर्तारो मामपि यान्ति। कामनयाऽपि प्रवृत्ताः पूर्वोक्तप्रकारेण। मामपि प्राप्नुवन्ति। अतएवउदाराः सर्व एवैते 7।18 इति पूर्वमुक्तम्। अतोऽग्रे तेषां मोक्षः। अक्षरसायुज्यमपि प्राप्नुवन्ति। अतएव हरिवंशेअपत्यं द्रविणं दारा हारा हर्म्यं हया गजाः। सुखानि स्वर्गमोक्षौ च न दूरे हरिभक्तितः।।इति। इदमेवापिशब्देन व्यज्यते।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।7.23।।अल्पमेधसांअथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यन्मनुतेऽन्यद्विजानाति तदल्पम् इति श्रुतेः द्वैतमल्पं तत्रैव मेधा येषां ते। बाह्यार्थाभिलाषिणामित्यर्थः। तेषां तत्फलमन्तवत् सर्वस्य बाह्यार्थस्यान्तवत्त्वादेव। तुशब्दोऽभेदेनेश्वरभक्तेभ्यो विभेदार्थः। यतो देवयजो देवान्यजन्ते इति देवयजस्ते देवानन्तयुक्तानेव यान्ति। एवं यक्षरक्षोभक्ता यक्षादीनेव यान्ति। भूतप्रेतभक्ताश्च भूतादीनेवेत्यपि द्रष्टव्यम्। मद्भक्तास्तु मामेवानन्तं यान्ति। अतस्तेऽनन्तफलभाज इत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Men of small intelligence worship the demigods, and their fruits are limited and temporary. Those who worship the demigods go to the planets of the demigods, but My devotees ultimately reach My supreme planet.",
        "ec": " Some commentators on the Bhagavad-gītā say that one who worships a demigod can reach the Supreme Lord, but here it is clearly stated that the worshipers of demigods go to the different planetary systems where various demigods are situated, just as a worshiper of the sun achieves the sun or a worshiper of the demigod of the moon achieves the moon. Similarly, if anyone wants to worship a demigod like Indra, he can attain that particular god’s planet. It is not that everyone, regardless of whatever demigod is worshiped, will reach the Supreme Personality of Godhead. That is denied here, for it is clearly stated that the worshipers of demigods go to different planets in the material world but the devotee of the Supreme Lord goes directly to the supreme planet of the Personality of Godhead. Here the point may be raised that if the demigods are different parts of the body of the Supreme Lord, then the same end should be achieved by worshiping them. However, worshipers of the demigods are less intelligent because they don’t know to what part of the body food must be supplied. Some of them are so foolish that they claim that there are many parts and many ways to supply food. This isn’t very sanguine. Can anyone supply food to the body through the ears or eyes? They do not know that these demigods are different parts of the universal body of the Supreme Lord, and in their ignorance they believe that each and every demigod is a separate God and a competitor of the Supreme Lord. Not only are the demigods parts of the Supreme Lord, but ordinary living entities are also. In the Śrīmad-Bhāgavatam it is stated that the brāhmaṇas are the head of the Supreme Lord, the kṣatriyas are His arms, the vaiśyas are His waist, the śūdras are His legs, and all serve different functions. Regardless of the situation, if one knows that both the demigods and he himself are part and parcel of the Supreme Lord, his knowledge is perfect. But if he does not understand this, he achieves different planets where the demigods reside. This is not the same destination the devotee reaches. The results achieved by the demigods’ benedictions are perishable because within this material world the planets, the demigods and their worshipers are all perishable. Therefore it is clearly stated in this verse that all results achieved by worshiping demigods are perishable, and therefore such worship is performed by the less intelligent living entity. Because the pure devotee engaged in Kṛṣṇa consciousness in devotional service of the Supreme Lord achieves eternal blissful existence that is full of knowledge, his achievements and those of the common worshiper of the demigods are different. The Supreme Lord is unlimited; His favor is unlimited; His mercy is unlimited. Therefore the mercy of the Supreme Lord upon His pure devotees is unlimited."
    }
}
