{
    "_id": "BG7.13",
    "chapter": 7,
    "verse": 13,
    "slok": "त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् |\nमोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ||७-१३||",
    "transliteration": "tribhirguṇamayairbhāvairebhiḥ sarvamidaṃ jagat .\nmohitaṃ nābhijānāti māmebhyaḥ paramavyayam ||7-13||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।7.13।। त्रिगुणों से उत्पन्न इन भावों (विकारों) से सम्पूर्ण जगत् (लोग) मोहित हुआ इन (गुणों) से परे अव्यय स्वरूप मुझे नहीं जानता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "7.13 Deluded by these Natures (states or things) composed of the three alities of Nature all this world does not know Me as distinct from them and immutable.",
        "ec": "7.13 त्रिभिः by three? गुणमयैः composed of Gunas? भावैः by natures? एभिः by these? सर्वम् all? इदम् this? जगत् world? मोहितम् deluded? न not? अभिजानाति knows? माम् Me? एभ्यः from them? परम् higher? अव्ययम् immutable.Commentary Persons of this world are deluded by the three alities of Nature or Maya. Affection? attachment and infatuated love are all modifications of these alities. On account of delusion created by these three alities they are not able to break the worldly ties and to turn the mind towards the Supreme Soul? the Lord of the three alities.Avyayam Immutable or unchangeable or inexhaustible or imperishable. The Self is of one homogeneous essence. It has not got the six changes or modifications (Shad Bhava Vikaras) which the body has? viz.? existence? birth? growth? modification? decay and death. (Cf.VII.25)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "7.13 The inhabitants of the world, misled by those natures which the Qualities have engendered, know not that I am higher than them all, and that I do not change."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।7.13।। प्रश्न यह है कि यदि त्रिगुणों से परे कोई परम अव्यय तत्त्व है तो सामान्य मनुष्य उसे क्यों नहीं जान पाता है  पूर्ण साक्षात्कार न भी सहज हो तब भी कम से कम उसके अस्तित्व के विषय में तो उसे शंका नहीं होनी चाहिए  इसका उत्तर इस श्लोक में दिया गया है।त्रिगुणों से उत्पन्न राग द्वेषादि विकारों के कारण मनुष्य अपने दिव्य स्वरूप को भूलकर उपाधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करके केवल विषयोपभोग का ही जीवन जीते हैं। स्वाभाविक है कि इस आसक्ति के कारण स्वस्वरूप की ओर इनका ध्यान तक नहीं जाता। एक बार स्तम्भ में प्रेत का आभास होने पर वह स्तम्भ उससे आच्छादित हो जाता है। यह एक तथ्य है कि जब तक यह आभास बना रहता है तब तक स्तम्भ का एक इञ्च भाग भी मोहित व्यक्ति को नहीं दिखाई देता इसी प्रकार माया से उत्पन्न उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण आत्मा को मानो जीवभाव प्राप्त हो जाता है। यह जीव बाह्य जगत् में व्यस्त और आसक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने में स्वयं को असमर्थ पाता है। स्वयं में स्वयं के साथ स्वयं का चल रहा लुकाछिपी का यह खेल विचित्र एवं रहस्यमय है जिसके कारण यह अपने लिए और जगत् के लिए अनन्त दुख और विक्षेप उत्पन्न करता रहता है।अगले श्लोक में इस आवरण शक्ति की परिभाषा का वर्णन किया गया है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "7.13. Being duluded by these three beings of the Strands, this entire world does not recognise Me Who am eternal and transcending these [Strands]."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "7.13 The entire universe is deluded by these three states originating from the Gunas (of Prakrti), and fails to recognise Me, who am beyond them and immutable."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "7.13 All this world, deluded as it is by these three things made of the gunas (alities), does not know Me who am transcendental to these and undecaying."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।7.13।।तर्हि कथमेवं न ज्ञायते इत्यत आह  त्रिभिरिति। तादात्म्यार्थे मयट्। तच्चोक्तम्तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा इति। न हि गुणकार्यभूता माया।गुणमयी 7।14 इति च वक्ष्यति। सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः इत्यादि व्यासयोगे। भावैः पदार्थैः। सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत एवेति दर्शयति  एभिरिति। ज्ञानिव्यावृत्त्यर्थंइदं इति। गुणमयदेहादिकं दृष्ट्वेश्वरदेहेऽपि तादृश इति मायामोहित इत्यर्थः। जगाद च व्यासयोगेगौणान्ब्रह्मादिदेहादीन्दृष्ट्वा विष्णोरपीदृशः। देहादिरिति मन्वानो मोहितोऽज्ञो जनो भृशम् इति। एभ्यो गुणमयेभ्यःगुणेभ्यश्च परं 14।19 इति वक्ष्यमाणत्वात्। केवलो निर्गुणश्च श्वे.उ.6।11 इत्यादिश्रुतिभ्यश्च त्रैगुण्यवर्जितमिति चोक्तम्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।7.13।।सतीश्वरस्य स्वातन्त्र्ये नित्यशुद्धत्वादौ च कुतो जगतस्तदात्मकस्य संसारित्वमित्याशङ्क्य तदज्ञानादित्याह  एवंभूतमपीति। यद्यप्रपञ्चोऽविक्रियश्च त्वं कस्मात्त्वामात्मभूतं स्वयंप्रकाशं सर्वो जनस्तथा न जानातीति मत्वा शङ्कते  तच्चेति। श्लोकेनोत्तरमाह  उच्यत इति। एभ्यः परमित्यप्रपञ्चकत्वमुच्यते। अव्ययमिति सर्वविक्रियाराहित्यम्।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।7.13।। किन्तु - इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सब जगत् इन गुणोंसे अतीत अविनाशी मुझे नहीं जानता।",
        "hc": "।।7.13।। व्याख्या--'त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः ৷৷. परमव्ययम्'--सत्त्व रज और तम--तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न और लीन होती रहती हैं। उनके साथ तादात्म्य करके मनुष्य अपनेको सात्त्विक, राजस और तामस मान लेता है अर्थात् उनका अपनेमें आरोप कर लेता है कि 'मैं सात्त्विक, राजस और तामस हो गया हूँ।' इस प्रकार तीनों गुणोंसे मोहित मनुष्य ऐसा मान ही नहीं सकता कि मैं परमात्माका अंश हूँ। वह अपने अंशी परमात्माकी तरफ न देखकर उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वृत्तियोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है--यही उसका मोहित होना है। इस प्रकार मोहित होनेके कारण वह 'मेरा परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्ध है'--इसको समझ ही नहीं सकता।   यहाँ 'जगत्' शब्द जीवात्माका वाचक है। निरन्तर परिवर्तनशील शरीरके साथ तादात्म्य होनेके कारण ही यह जीव 'जगत्' नामसे कहा जाता है। तात्पर्य है कि शरीरके जन्मनेमें अपना जन्मना, शरीरके मरनेमें अपना मरना, शरीरके बीमार होनेमें अपना बीमार होना और शरीरके स्वस्थ होनेमें अपना स्वस्थ होना मान लेता है, इसीसे यह 'जगत्' नामसे कहा जाता है। जबतक यह शरीरके साथ अपना तादात्म्य मानेगा, तबतक यह जगत् ही रहेगा अर्थात् जन्मता-मरता ही रहेगा, कहीं भी स्थायी नहीं रहेगा।गुणोंकी भगवान्के सिवाय अलग सत्ता माननेसे ही प्राणी मोहित होते हैं। अगर वे गुणोंको भगवत्स्वरूप मानें तो कभी मोहित हो ही नहीं सकते।तीनों गुणोंका कार्य जो शरीर है, उस शरीरको चाहे अपना मान लें, चाहे अपनेको शरीर मान लें--दोनों ही मान्यताओंसे मोह पैदा होता है। शरीरको अपना मानना 'ममता' हुई और अपनेको शरीर मानना 'अहंता' हुई। शरीरके साथ अहंता-ममता करना ही मोहित होना है। मोहित हो जानेसे गुणोंसे सर्वथा अतीत जो भगवत्तत्त्व है, उसको नहीं जान सकता। यह उस भगवत्तत्त्वको तभी जान सकता है जब त्रिगुणात्मक शरीरके साथ इसकी अहंताममता मिट जाती है। यह सिद्धान्त है कि मनुष्य संसारसे सर्वथा अलग होनेपर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे सर्वथा अभिन्न होनेपर भी परमात्माको जान सकता है। कारण इसका यह है कि त्रिगुणात्मक शरीरसे यह स्वयं सर्वथा भिन्न है और परमात्माके साथ यह स्वयं सर्वथा अभिन्न है।अस्वाभाविकमें स्वाभाविक भाव होना ही मोहित होना है। जो प्रतिक्षण नष्ट होनेवाले तीनों गुणोंसे परे हैं, अत्यन्त निर्लिप्त हैं और नित्य-निरन्तर एकरूप रहनेवाले हैं, ऐसे परमात्मा 'स्वाभाविक' हैं। परमात्माकी यह स्वाभाविकता बनायी हुई नहीं है, कृत्रिम नहीं है, अभ्याससाध्य नहीं है, प्रत्युत स्वतः-स्वाभाविक है। परंतुशरीर तथा संसारमें अहंता-ममता अर्थात् 'मैं' और 'मेरा'-भाव उत्पन्न हुआ है एवं नष्ट होनेवाला है, यह केवल माना हुआ है, इसलिये यह 'अस्वाभाविक' है। इस अस्वाभाविकको स्वाभाविक मान लेना ही मोहित होना है, जिसके कारण मनुष्य स्वाभाविकताको समझ नहीं सकता।         जीव पहले परमात्मासे विमुख हुआ या पहले संसारके सम्मुख (गुणोंसे मोहित) हुआ?--इसमें दार्शनिकोंका मत यह है कि परमात्मासे विमुख होना और संसारसे सम्बन्ध जोड़ना--ये दोनों अनादि हैं, इनका आदि नहीं है। अतः इनमें पहले या पीछेकी बात नहीं कही जा सकती। परन्तु मनुष्य यदि मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे, उसे केवल भगवान्में ही लगाना शुरू कर दे तो यह संसारसे ऊपर उठ जाता है अर्थात् इसका जन्म-मरण मिट जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मनुष्य प्रभुकी दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके ही बन्धनमें पड़ा है। अपनी स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके नष्ट होनेवाले पदार्थोंमें उलझ जानेसे यह परमात्मतत्त्वको जान नहीं सकता।     'परमव्ययम्'पदसे भगवान् कहते हैं कि मैं इन गुणोंसे पर हूँ अर्थात् इन गुणोंसे सर्वथा रहित, असम्बद्ध, निर्लिप्त हूँ। मैं न कभी किसी गुणसे बँधा हुआ हूँ और न गुणोंके परिवर्तनसे मेरेमें कोई परिवर्तन ही होता है। ऐसे मेरे वास्तविक स्वरूपको गुणोंसे मोहित प्राणी नहीं जान सकते।\n\n सम्बन्ध-- अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनेको न जान सकनेमें हेतु बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।7.13।।तदेवं चेतनाचेतनात्मकं कृत्स्नं जगत् मदीयं काले काले मत्त एव उत्पद्यते मयि च प्रलीयते मयि एव अवस्थितं मच्छरीरभूतं मदात्मकं च इति अहम् एव कार्यावस्थायां कारणावस्थायां च सर्वशरीरतया सर्वप्रकारः अवस्थितः। अतः कारणत्वेन शेषित्वेन च ज्ञानाद्यसंख्येयकल्याणगुणगणैः च अहम् एव सर्वैः प्रकारैः परतरः। मत्तः अन्यत् केन अपि कल्याणगुणगणेन परतरं न विद्यते। एवंभूतं मां त्रिभ्यः सात्त्विकराजसतामसगुणमयेभ्यः भावेभ्यः परं मदसाधारणैः कल्याणगुणगणैः तत्तद्भोग्यताप्रकारैः च परम् उत्कृष्टतमम् अव्ययं सदा एकरूपम् अपि तैः एव त्रिभिः गुणमयैः निहीनतरैः क्षणविध्वंसिभिः पूर्वकर्मानुगुणदेहेन्द्रियभोग्यत्वेन अवस्थितैः पदार्थैः मोहितं देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मना अवस्थितम् इदं जगत् न अभिजानाति।कथं स्वत एव अनवधिकातिशयानन्दे नित्ये सदा एकरूपे लौकिकवस्तुभोग्यताप्रकारैः च उत्कृष्टतमे त्वयि स्थिते अपि अत्यन्तनिहीनेषु गुणमयेषु अस्थिरेषु भावेषु सर्वस्य भोक्तृवर्गस्य भोग्यत्वबुद्धिः उपजायते इत्यत्र आह",
        "et": "7.13 Now, in this way, the whole universe, consisting of animate and inanimate entities belonging to Me, evolves from time to time from Me only, is absorbed in Me, and abides in Me alone. It constitutes My body and has Me for its self. Whether in the causal state or in the state of effect, it is I who have all these entities as My modes, because all entities form My body. Thus, in regard to all these modes, I am superior to them, as I am their cause, principal, and as I possess a complex of countless auspicious attributes like knowledge, strength etc. In every way I remain as the highest being. There exists none higher than Myself.\n\nSuch being the case, I am superior to these entities composed of the alities of Sattva, Rajas and Tamas - superior to them by My extraordinary attributes and by having these various modes for My enjoyment. I am the highest and immutable, i.e., I form a unity in Myself. This world constituted of gods, men, animals and immovables, and deluded by the three Gunas of Prakrti and its evolutes are inferior and transient. The forms of bodies, senses and objects of enjoyment comprising the world are there in accordance with their past Karmas. No one in the world knows Me.\n\nHow is it possible that all experiencing beings think as enjoyable objects which are inferior, constituted of the Gunas and are transient, while You exist - You who are of the nature of unbounded and abundant bliss, who has an eternal unchanging form and who is the source of the enjoyableness of even the objects of the world?  Sri Krsna replies:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।7.12  7.13।।ये चेति।  त्रिभिरिति।  सत्त्वादीनि मन्मयानि न त्वहं तन्मयः।  अत एव च भगवन्मयः सर्वं भगवद्भावेन संवेदयते न तु नानाविधपदार्थविज्ञाननिष्ठो भगवत्तत्त्वं प्रतिपद्यते इति सकलमानसावर्जक एष क्रमः।  अनेनैव चाशयेन वक्ष्यते वासुदेवः सर्वम् इति (K adds another इति) ज्ञानेन यो बहुजन्मोपभोगजनितकर्मसमतासमनन्तरसमुत्पन्नपरशक्तिपातानुगृहीतान्तःकरण असौ प्रतिपद्यते भगवत्तत्त्वं(S  omits भगवत्तत्त्वम्) ननु (K omits ननु) सर्वं वासुदेवः इति बुद्ध्या स महात्मा स च दुर्लभ इति।  एवं ह्यबुद्ध्यमानं ( N हि बुद्ध्यमानम्)  प्रत्युत सत्त्वादिभिर्गुणैः मोहितमिदं जगत् गुणातीतं वासुदेवतत्त्वंनैवोपलभते।",
        "et": "7.12-13 Ye ca  etc.  Tribhih etc.  The [Strands]  Sattva etc., are derived from Me, and not I from them.  That is why he who has achieved his identity with the Bhagavat  (the  Absolute),  properly realises all [objects]  as being the Bhagavat  [Himself].  On the other hand, the person who is established in the knowledge of objects of umpteen varieties does not understand  the reality of the Bhagavat. This krama  (traditional order)  pleases the mind of all.  With this idea only the Lord is going to declare presently  'Vasudeva is all'.   There the meaning is this :  He, whose internal organ is favoured by the  descent  of the Supreme  Energy  or grace  (Sakti-pata)  that arises after [teaching the stage of]  eableness of effects of actions (karma-samata) that is  brought about by the enjoyment  [of effects] through many births;  and who realises the reality of Bhagavat, with conviction  'verily all is Vasudeva' - that person is the great Soul and he is difficult to find.  But, not knowing in this manner and,  on the contrary, being duluded by the Strands,  Sattva etc., this  world, fails to perceive the reality of Vasudeva, transcending the Strands.\t\t\t\t\t\t\t\n [The Lord]  declares why  the persons established exclusively in the Sattva etc.  (Strands), are not conscious of the real nature of the Bhagavat :"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।7.13।।ऐसा जो साक्षात् परमेश्वर नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव एवं सब भूतोंका आत्मा गुणोंसे अतीत और संसाररूप दोषके बीजको भस्म करनेवाला मैं हूँ उसको जगत् नहीं पहचानता  इस प्रकार भगवान् खेद प्रकट करते हैं और जगत्का यह अज्ञान किस कारणसे है सो बतलाते हैं  गुणोंमें विकाररूप सात्त्विक राजस और तामस इन तीनों भावोंसे अर्थात् उपर्युक्त राग द्वेष और मोह आदि पदार्थोंसे यह समस्त जगत्  प्राणिसमूह मोहित हो रहा है अर्थात् विवेकशून्य कर दिया गया है अतः इन उपर्युक्त गुणोंसे अतीत  विलक्षण अविनाशी  विनाशरहित तथा जन्मादि सम्पूर्ण भावविकारोंसे रहित मुझ परमात्माको नहीं जान पाता।",
        "sc": "।।7.13।। त्रिभिः गुणमयैः गुणविकारैः रागद्वेषमोहादिप्रकारैः भावैः पदार्थैः एभिः यथोक्तैः सर्वम् इदं प्राणिजातं जगत् मोहितम् अविवेकितामापादितं सत् न अभिजानाति माम् एभ्यः यथोक्तेभ्यः गुणेभ्यः परं व्यतिरिक्तं विलक्षणं च अव्ययं व्ययरहितं जन्मादिसर्वभावविकारवर्जितम् इत्यर्थः।।कथं पुनः दैवीम् एतां त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं मायामतिक्रामति इत्युच्यते",
        "et": "7.13 Sarvam, all; idam, this; jagat, world, the aggregate of creatures; mohitam, deluded as it is-made to have indiscrimination; hih, by these; aforesaid tribhih, three; bhavaih, things, in the forms of attachment, repulsion, delusion, etc; and gunamayaih, made of the gunas, of the transformations of the gunas; na abhijanati, does not know; mam, Me; who am param, transcendental to, distinct, different; hyah, from these gunas as referred to above; and am avyayam, undecaying, i.e. free from all (the six kinds of) changes in things, viz birth etc. [See note on p.38.-Tr.]\nHow, again, do they cross over this divine Maya of Visnu, constituted by the three gunas? That is being stated:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।7.13।।ननु विज्ञाननिरूपणं प्रारभ्यत्रिभिः इत्यादिकं किमर्थमुच्यते इत्यत आह  तर्हीति।ये चैव 7।12 इति। विज्ञाननिरूपणोपसंहारवाक्ये सत्त्वादिगुणनिर्वृतानां भगवान्कारणमाश्रयश्च तदनाश्रयश्चेत्युक्तम्। पृ.371 तेनैव गुणातीत इति चोक्तप्रायम्। तस्यायमाक्षेपः। एवं गुणातीततया सगुणश्च ज्ञायस इति शेषः। एवमनुपलम्भविपरीतोपलम्भाभ्यामुक्तमसदिति भावः। विकारार्थतानिरासार्थमाह  तादात्म्येति। मयटस्तादात्म्यार्थत्वं कुतः इत्यत आह  तच्चेति। तादात्म्ये प्रयोगं दर्शयितुमुपोद्धातमाह   न हीति। कार्यभूतेत्युपलक्षणम्। गुणप्राचुर्यादिकमपि तस्यां न सम्भवति। ततः किं इत्यत आह  गुणेति।दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया 7।14 इति मायाया गुणमयीत्वमुच्यते। न च तत्र विकाराद्यर्थता सम्भवति ततः परिशेषतः तादात्म्यार्थता ग्राह्येत्यर्थः। अस्तु मयटस्तादातम्ये शक्तिः। अत्र विकारार्थतां परित्यज्य तद्ग्रहणे को हेतुः इति चेत् उच्यते  विकारार्थताग्रहणेमामेभ्यः परं इत्यत्र गुणकार्येभ्य एव भगवतः परत्वमुक्तं स्यात् न तु गुणेभ्यः। अतस्तत्सङ्ग्रहाय तादात्म्यार्थताग्रहणम्। एवं तर्हि गुणेभ्य एव परत्वमुक्तं स्यात् न तु गुणकार्येभ्योऽपीति समानमित्यत आह  सिद्धं चेति। सिद्धं प्रमितम्। ततश्चगुणात्मकैः इत्युक्ते गुणानां तत्कार्याणां चोपादाने सति उभयपरत्वमुक्तं भवति  कार्यधर्मादेरिति। कार्यद्रव्यस्योपादानेन गुणक्रियाजातिपूर्वाणां धर्माणां गुण्यादिभिरित्यर्थः। भावशब्दस्यानेकार्थत्वात्तस्य विवक्षितमर्थमाह  भावैरिति। एवं सति सर्वपरत्वलाभादिति भावः। नन्वेवमप्येभिरिति पुरोवर्तिनामेव ग्रहणात् न सर्वपरत्वसिद्धिरित्यत आह  सर्व इति। प्रमितपरामर्शोऽयं न पुरोवर्तिमात्रस्येति भावः। जगन्मोहितमित्यलं किमिदमित्यनेनेत्यत आह  ज्ञानीति। व्यवहारपतितमित्यर्थः। ननु भगवद्विषयस्य सगुणत्वमोहस्य कथं गुणात्मकाः पदार्थाः कारणं इत्यत आह  गुणमयेति। देहत्वादिहेतुनेति शेषः। मायेति गुणमयानां ग्रहणम्। मोहितो जनः। अत्र प्रमाणमाह  जगाद चेति। आदिपदेनेन्द्रियादिग्रहणम्। यदर्थं तादात्म्यार्थग्रहणं कृतं तदाह  एभ्य इति। ननु भगवतो गुणातीतत्वे प्रमिते तदर्थोऽयं श्रमः सफलः स्यात्। तदेव कुतः इत्यत आह  गुणेभ्यश्चेति।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।7.13  7.14।।परमेतदसंस्पष्टं मां वेदान्तवेद्यं न जगद्वेदेह गुणतन्त्रत्वादित्याह  त्रिभिरिति। भावैस्त्रिभिः पदार्थैः। त्रित्व गुणमयत्वाभिप्रायेण। मोहितं जगदिदमावृतं एभ्यस्त्रिगुणात्मकेभ्यो भावेभ्यो मूलभूतगुणेभ्यो वा परमव्ययं विनाशरहितं मां न जानाति। प्रकृतेर्गुणा एव बन्धकाः। सत्त्वरजस्तमोमयैः भावैः सर्वं जगन्मोहितं मम मायागुणा एव हि परिणता अपि स्वरूपावरणे विक्षेपे च हेत्वन्तरभूताः भगवज्ज्ञानसाधनप्रतिकूलाः प्रत्युत बन्धरूपाः जीवेऽविद्याकृताध्यासदार्ढ्यकारणभूताश्चसर्वाध्यासनिवृत्तौ हि सर्वथा न भवेद्यथा। सा च विद्योदये सा च न शब्दात्सुविचारितात्। मर्यादाभङ्ग एव स्यात्प्रमाणानां तथा सति। गजानुमानं नैव स्यात्साङ्कर्यं वा तथा भवेत्। दशमस्त्वमसीत्यादौ देहादिविषयत्वतः। शब्दस्य साहचर्येण चक्षुषैव भवेन्मतिः। स्मारकत्वमतो वाक्ये सङ्ख्याज्ञानं पुराः यतः। अध्यासस्यानिवृत्तत्वान्न विविक्तात्मदर्शनम्। मनसा शक्यते कर्त्तुं नान्यथा सर्वदा भवेत्। प्रत्यक्षेणापि विज्ञानं मायया ज्ञानकाशया। स्वप्नबोधरीत्या हि किमु शब्दं निवारयेत्। सर्वज्ञस्वं सर्वभावज्ञानं चापाततः फलम्। सर्वो न ब्रह्म सर्वं तु वामदेवस्तथा जगौ। अवयुज्यागर्भवासात्सूर्याद्यनुवदन्मुहुः। ज्ञानदुर्बलवाक्यत्वात्पाषण्डवचनं मतम्। सत्ये युगेऽतिमहतां भवत्येतन्न चान्यथा। स्वप्नो जागरणं चैव यथा ह्यन्योन्यवैरिणौ। विद्याविद्ये तथा स्यातां न तु सर्वात्मना लयः। इदमेव विनिश्चित्य श्रीकृष्णोऽर्जुनमाह वै। मामेवेति। एवकारेण सर्वेषामनुपायत्वमाह ज्ञानादीनां सर्वेषां भगवदधीनत्वात्।विश्वासं सर्वतस्त्यक्त्वा कृष्णमेव भजेद्बुधः इति श्रीमदाचार्योक्तानुसारेण प्रपत्तिमार्गरीत्या ये भजन्ते मां पुरुषोत्तममेव ते मायां तरन्ति। इयं च दैवी माया प्रकृते नासुरी अन्यस्याज्ञानविशेषेण स्वकृतिसाध्येन च बाधितत्वनियमात् अतएव दुरत्यया। यद्वा धात्वन्वर्था दैवी गुणमयी च। ममेति मदधीनभक्तहितकारिण्येषा भवतीति एतां मायां त एव जगति स्थिता मदीया निर्गुणात्मकास्तीर्णा इत्यर्थः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।7.13।।तव परमेश्वरस्य स्वातन्त्र्ये नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वे च सति कुतो जगतस्त्वदात्मकस्य संसारित्वं एवंविधमत्स्वरूपापरिज्ञानादिति चेत् तदेव कुत इत्यत आह  एभिः प्रागुक्तैस्त्रिभिस्त्रिविधैर्गुणमयैः सत्त्वरजस्तमोगुणविकारैर्भावैः सर्वैरपि भवनधर्मभिः सर्वमिदं जगत्प्राणिजातं मोहितं विवेकायोग्यत्वमापादितं सदेभ्यो गुणमयेभ्यो भावेभ्यः परं एषां कल्पनाधिष्ठानमत्यन्तविलक्षणमव्ययं सर्वविक्रियाशून्यमप्रपञ्चमानन्दघनमात्मप्रकाशमव्यवहितमपि मां नाभिजानाति। ततश्च स्वरूपापरिचयात्संसरतीवेत्यहो दौर्भाग्यमविवेकिजनस्येत्यनुक्रोशं दर्शयति भगवान्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।7.13।।एवंभूतं त्वां परमेश्वरमयं जनः किमिति न जानातीत्यत आह  त्रिभिरिति। त्रिभिस्त्रिविधैरेभिः पूर्वोक्तैः गुणमयैः कामलोभादिभिर्गुणविकारैः भावै स्वभावैर्मोहितमिदं जगत् अतो मां नाभिजानाति। कथंभूतम्। एभ्यो भावेभ्यः परं एभिरसंस्पृष्टम्। एतेषां नियन्तारमत एवाव्ययम्। निर्विकारमित्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।7.13।।एवंभूतमपि मामीश्वरं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सर्वात्मानं निर्गुणं संसारमूलोच्छेदाय जगन्नाभिजानातीत्याकोशं दर्शयन्स्वाज्ञाने निमित्तमाह  त्रिभिरिति। त्रिभिस्त्रविधैः गुणमयैर्गुणविकारैः भावैः पदार्थे रागद्वेषमोहादिभिः सर्वमिदं जगत्चराचरात्मकं मोहितं विवेकाच्छादकमोहं प्रापितं सन्मामेभ्यो गुणतद्विकारेभ्यः परमतिरिक्तमत एवाव्ययं व्ययरहितम्। जन्मादिसर्वभाविकारविवर्जितमित्यर्थः। नाभिजानाति। स्वाभिन्नत्वेन न साक्षात्करोतीत्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।7.13।।एवं स्वयाथात्म्यमुपदिष्टम् अथत्रिभिः इत्यादिना प्रकृत्यास्य तिरोधिमुपदिशतिअत्र माम् इत्यनेन।भूमिरापोऽनलः 7।4 इत्यारभ्योक्तं यथावस्थितस्वरूपं गुणमयभावेभ्यः परत्वप्रदर्शनायानूदितमिति दर्शयितुमाहतदेवमिति। उत्पत्तिप्रलययोरविरोधं सर्वेषु कल्पेषु तस्यैव कारणत्वं चाभिप्रेत्योक्तंकाले काल इति।त्रिभिर्गुणमयैरेभिः इति पदत्रयेण दुःखमिश्रत्वनश्वरत्वसातिशयत्वादीनि विवक्षितानि। रजस्तमोमिश्रत्वाद्दुःखमिश्रत्वम्। सुखदुःखमोहात्मका हि त्रयो गुणाः। कार्यत्वादनित्यत्वमिन्द्रियपरिच्छिन्नत्वात्क्षुद्रत्वमिति भावः।मामेभ्यः परमव्ययम् इति तु त्रिभिर्निखिलदुःखप्रत्यनीकस्वरूपत्वनिरतिशयानन्दत्वनित्यत्वान्यभिप्रेतानीति दर्शयतिएवम्भूतमिति। कारणत्वेन पितृत्वाद्धितैषिणं शेषित्वेन शेषभूतानामुज्जीवनमप्यात्मलाभं मन्वानं सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वादिभिरनिष्टनिवर्तनेष्टप्रापणयोरन्यनिरपेक्षं चेतिएवम्भूतशब्दाभिप्रायः। दुःखमिश्रत्वादिविशिष्टतया प्रस्तुता एव भावाःएभ्यः इत्यवधित्वेन परामृश्यन्त इति प्रदर्शनायत्रिभ्य इत्यादिकमुक्तम्।एभ्यः परम् इत्यत्र तमसः परस्तात् य.सं.31।18 इत्यादिष्विव देशादिविवक्षाव्युदासायोत्कृष्टत्वोक्तिः।तत्तद्भोग्यताप्रकारैश्चेति समुद्रे गोष्पदमस्तीतिवत्। श्रूयते हि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितम् छां.उ.8।1।3 इति। शब्दस्पर्शादिरूपेण प्राकृता भावा भोग्याः। परमात्मा तु ज्ञानशक्त्यादिगुणगणैः स्वरूपसमवेतैः शब्दादिविसजातीयानुकूल्यप्रकारैरप्राकृतैश्च शब्दादिभिः प्राकृतैश्च तैरेव स्वपर्यन्तताबोधादप्राकृतकल्पैः प्रत्येकं भोग्यतायामनवधिकातिशयपरत्वविशिष्ट इति भावः। एवं निर्दिष्टभोग्यतमस्वरूपस्याविकारित्वेन कालावच्छेदव्युदासपरोऽव्ययशब्द इत्यभिप्रायेणाहसदैकरूपमिति।तैरेवेति उक्तदोषत्रययुक्तैरेवेत्यर्थः।त्रिभिरिति  गुणाः परस्परन्यूनाधिकाभावेन अवस्थिता अप्यविनाभूताः। ततश्च गुणत्रयमयानां भावानां दुःखमिश्रत्वमवर्जनीयमिति भावः।निहीनतरैरिति कर्मानुरूपगुणत्रयमयभोगास्तत्कर्मानुरूप्येण क्षुद्रा इति भावः।क्षणध्वंसिभिरिति कर्मावसाने क्षणान्तरं स्थातुं न प्रभवन्तीति भावः। ननु सत्त्वेन कथं मोहः इत्थं  यथा विषसम्पृक्तेऽप्यन्ने मधुनिषेको मन्दस्य भोजनाभिलाषमुत्पादयति तथा तत्तत्कर्मानुरूपानर्थपर्यवसितसुखलवहेतुत्वेन युक्तं सत्त्वस्यैव मोहहेतुत्वमिति। सर्वशब्दोऽत्र देवजात्यनुप्रविष्टब्रह्मरुद्रादेः सङ्ग्रहपरः। इदंशब्दोऽनुभूयमानभोक्तृवर्गवैचित्र्याभिप्रायः। जगच्छब्दश्चाचिद्विशिष्टचेतनवाचीत्यभिप्रायेणदेवेत्यादिकमुक्तम्।ब्रह्माद्याः सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा। विष्णुमायामहावर्तमोहान्धतमसावृताः वि.पु.5।30।17 इत्यादिकमत्रानुन्धेयम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।7.13।।एवं लीलया रसार्थं प्रकटितान् गुणान् मयि दृष्ट्वा सर्वे मोहं प्राप्य मां न जानन्तीत्याह  त्रिभिरिति। एभिः परिदृश्यमानैर्मत्सम्बन्धेन स्नेहलीलारसतः प्रकटभूतैस्त्रिभिः सात्त्विकादिभिर्गुणमयैर्मद्गुणात्मकैर्भावैर्भावनात्मकैरिदं परिदृश्यमानमधिकरणात्मकमाध्यात्मिकं जगत् मामेभ्यः पूर्वोक्तभावेभ्यः परमुत्कृष्टं केवलं रसात्मकमत एवाव्ययं विप्रयोगादिभावेषु न्यूनतादिरहितं नाभिजानाति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।7.13।।कथं तर्हि स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्चबाधेन जना आत्मानं नावगच्छन्तीत्याशङ्क्याह  त्रिभिरिति। एभिः पूर्वोक्तैस्त्रिभिस्त्रिविधैर्भावैः प्रकाशप्रवृत्तिनियमाद्यैर्गुणमयैः सत्वरजस्तमोगुणविकारैः इदं चराचरं प्राणिजातं जगच्छब्दवाच्यं मोहितं सत् एभ्यो गुणेभ्यः परं मां न जानाति। यथा रज्ज्वां सर्पभ्रमेण व्याकुलः सर्पात्परां रज्जुं न जानाति तद्वत्। परत्वे हेतुः अव्ययम्। एते भावाः परिणामित्वाद्व्ययवन्तः अहं तु तद्विपरीतः साक्षीत्यव्ययः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Deluded by the three modes [goodness, passion and ignorance], the whole world does not know Me, who am above the modes and inexhaustible.",
        "ec": " The whole world is enchanted by the three modes of material nature. Those who are bewildered by these three modes cannot understand that transcendental to this material nature is the Supreme Lord, Kṛṣṇa. Every living entity under the influence of material nature has a particular type of body and a particular type of psychological and biological activities accordingly. There are four classes of men functioning in the three material modes of nature. Those who are purely in the mode of goodness are called brāhmaṇas. Those who are purely in the mode of passion are called kṣatriyas. Those who are in the modes of both passion and ignorance are called vaiśyas. Those who are completely in ignorance are called śūdras. And those who are less than that are animals or animal life. However, these designations are not permanent. I may be either a brāhmaṇa, kṣatriya, vaiśya or whatever – in any case, this life is temporary. But although life is temporary and we do not know what we are going to be in the next life, by the spell of this illusory energy we consider ourselves in terms of this bodily conception of life, and we thus think that we are American, Indian, Russian, or brāhmaṇa, Hindu, Muslim, etc. And if we become entangled with the modes of material nature, then we forget the Supreme Personality of Godhead, who is behind all these modes. So Lord Kṛṣṇa says that living entities deluded by these three modes of nature do not understand that behind the material background is the Supreme Personality of Godhead. There are many different kinds of living entities – human beings, demigods, animals, etc. – and each and every one of them is under the influence of material nature, and all of them have forgotten the transcendent Personality of Godhead. Those who are in the modes of passion and ignorance, and even those who are in the mode of goodness, cannot go beyond the impersonal Brahman conception of the Absolute Truth. They are bewildered before the Supreme Lord in His personal feature, which possesses all beauty, opulence, knowledge, strength, fame and renunciation. When even those who are in goodness cannot understand, what hope is there for those in passion and ignorance? Kṛṣṇa consciousness is transcendental to all these three modes of material nature, and those who are truly established in Kṛṣṇa consciousness are actually liberated."
    }
}
