{
    "_id": "BG7.1",
    "chapter": 7,
    "verse": 1,
    "slok": "श्रीभगवानुवाच |\nमय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः |\nअसंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||७-१||",
    "transliteration": "śrībhagavānuvāca .\nmayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ .\nasaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu ||7-1||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।7.1।। हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "7.1 The Blessed Lord said  O Arjuna, hear how you shall without doubt know Me fully, with the mind intent on Me, practising Yoga and taking refuge in Me.",
        "ec": "7.1 मयि on Me? आसक्तमनाः with mind intent? पार्थ O Partha? योगम् Yoga? युञ्जन् practising? मदाश्रयः taking refuge in Me? असंशयम् without doubt? समग्रम् wholly? माम् Me? यथा how? ज्ञास्यसि shall know? तत् that? श्रृणु hear.Commentary He who wishes to attain some result or reward performs the ritual known as Agnihotra or does charity? sinks wells? builds hospitals? resting places? etc.? with Sakama Bhavana (with an inner profit motive) and attains them. But the Yogi on the contrary practises Yoga with a steadfast mind and takes refuge in the Lord alone? with the mind wholly fixed on Him? on His lofty attributes such as omnipotence? omniscience? omnipresence? infinite love? beauty? grace? strength? mercy? inexhaustible wealth? ineffable splendour? pristine glory and purity.The servant of a king? though he constantly serves the king? has not got his mind fixed on him. The mind is ever fixed on his wife and children. Unlike the servant? fix your mind on Me? (the allpervading One)? and take refuge in Me alone. Practise control of the mind in accordance with the instructions given in chapter VI. Then you will know Me and My infinite attributes in full.If you sing the glory and the attributes of the Lord? you will develop love for Him and then your mind will be fixed on Him. Intense love for the Lord is real devotion. You must get full knowledge of the Self without any doubt.He who has taken refuge in the Lord? and he who is trying to fix or has fixed his mind on the Lord cannot bear the separation from the Lord even for a second."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "7.1 \"Lord Shri Krishna said: Listen, O Arjuna! And I will tell thee how thou shalt know Me in my Full perfection, practising meditation with thy mind devoted to Me, and having Me for thy refuge."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।7.1।। ध्यानाभ्यास का आरम्भ करने के पूर्व साधक जब तक केवल बौद्धिक स्तर पर ही वेदान्त का विचार करता है जैसा कि प्रारम्भ में होना स्वाभाविक है तब तक उसके मन में प्रश्न उठता रहता है कि परिच्छिन्न मन के द्वारा अनन्तस्वरूप सत्य का साक्षात्कार किस प्रकार किया जा सकता है यह प्रश्न सभी जिज्ञासुओं के मन में आता है और इसीलिए वेदान्तशास्त्र इस विषय का विस्तार से वर्णन करता है कि किस प्रकार ध्यान की प्रक्रिया से मन अपनी ही परिच्छिन्नताओं से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप का अनुभव करता है।इस षडाध्यायी के विवेच्य विषय की प्रस्तावना करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार के सिद्धान्त एवं उपायों का समग्रत वर्णन करेंगे जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि किस प्रकार सुसंगठित मन के द्वारा आत्मस्वरूप का ध्यान करने से आत्मा की अपरोक्षानुभूति होती है। ध्यान के सन्दर्भ में मन शब्द का प्रयोग होने पर उससे शुद्ध एवं एकाग्र मन का ही अभिप्राय है न कि अशक्त तथा विखण्डित मन। अनुशासित और असंगठित मन जब अपने स्वरूप में समाहित होता है तब साधक का विकास तीव्र गति से होता है। इस प्रकरण कै विषय है  आन्तरिक विकास का युक्तियुक्त विवेचन।श्रीभगवान् कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "7.1. The Bhagavat said  O son of Prtha, hear [from Me]  how, having your mind attached to Me,  practising Yoga  and taking refuge in Me, you shall understand Me fully, without any doubt."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "7.1 The Lord said  With your mind focussed on Me, having Me for your support and practising Yoga - how you can without doubt know Me fully, hear, O Arjuna."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "7.1 The Blessed Lord said  O Partha, hear how you, having the mind fixed on Me, practising the Yoga of Meditation and taking refuge in Me, will know Me with certainly and in fulness."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।7.1।।श्रीमद्वरदराजाय नमः। ँ़। साधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः उत्तरैरस्तु षड्भिर्भगवन्माहात्म्यं प्राधान्येनाह  मयीति। आसक्तमना अतीव स्नेहयुक्तमनाः। मदाश्रयः भगवानेव सर्वं मया कारयति स एव मे शरणम् तस्मिन्नेवाहं स्थित इति स्थितः। असंशयं समग्रमिति क्रियाविशेषणम्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।7.1।।कर्मसंन्यासात्मकसाधनप्रधानं त्वंपदार्थप्रधानं च प्रथमषट्कं व्याख्याय मध्यमषट्कमुपास्यनिष्ठं तत्पदार्थनिष्ठं च व्याख्यातुमारभमाणः समनन्तराध्यायमवतारयति  योगिनामिति। अतीताध्यायान्ते मद्गतेनान्तरात्मा यो भजते मामिति प्रश्नबीजं प्रदर्श्य कीदृशं भगवतस्तत्त्वं कथं वा मद्गतान्तरात्मा स्यादित्यर्जुनस्य प्रश्नद्वये जाते स्वयमेव भगवानपृष्टमेतद्वक्तुमिच्छन्नुक्तवानित्यर्थः। परमेश्वरस्य वक्ष्यमाणविशेषणत्वं सकलजगदायतनत्वादिनानाविधविभूतिभागित्वं तत्रासक्तिर्मनसो विषयान्तरपरिहारेण तन्निष्ठत्वम्। मनसो भगवत्येवासक्तौ हेतुमाह  योगमिति। विषयान्तरपरिहारे हि गोचरमालोच्यमाने भगवत्येव प्रतिष्ठितं भवतीत्यर्थः। तथापि स्वाश्रये पुरुषो मनः स्थापयति नान्यत्रेत्याशङ्क्याह  मदाश्रय इति। योगिनो यदीश्वराश्रयत्वेन तस्मिन्नेवासक्तमनस्त्वमुपन्यस्तं तदुपपादयति  यो हीति। ईश्वराख्याश्रयस्य प्रतिपत्तिमेव प्रकटयति  हित्वेति। अस्तु योगिनस्त्वदाश्रयप्रतिपत्त्या मनसस्त्वय्येवासक्तिस्तथापि मम किमायातमित्याशङ्क्य द्वितीयार्धं व्याचष्टे  यस्त्वमेवमिति। एवंभूतो यथोक्तध्याननिष्ठपुरुषवदेव मय्यासक्तमना यस्त्वं स त्वं तथाविधः सन्नसंशयमविद्यमानः संशयो यत्र ज्ञाने तद्यथा स्यात्तथा मां समग्रं ज्ञास्यसीति संबन्धः। समग्रमित्यस्यार्थमाह  समस्तमिति। विभूतिर्नानाविधैश्वर्योपायसंपत्तिः। बलं शरीरगतं सामर्थ्यम्। शक्तिर्मनोगतं प्रागल्भ्यम्। ऐश्वर्यमीशितव्यविषयमीशनसामर्थ्यम्। आदिशब्देन ज्ञानेच्छादयो गृह्यन्ते। असंशयमितिपदस्य क्रियाविशेषणत्वं विशदयन् क्रियापदेन संबन्धं कथयति  संशयमिति। विना संशयं भगवत्तत्त्वपरिज्ञानमेव स्फोरयति  एवमेवेति। भगवत्तत्त्वे ज्ञातव्ये कथं मम ज्ञानमुपदेक्ष्यति नहि त्वामृते तदुपदेष्टा कश्चिदस्तीत्याशङ्क्याह  तच्छृण्विति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।7.1।। श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन।",
        "hc": "।।7.1।। व्याख्या--'मय्यासक्तमनाः'--मेरेमें ही जिसका मन आसक्त हो गया है अर्थात् अधिक स्नेहके कारण जिसका मन स्वाभाविक ही मेरेमें लग गया है, चिपक गया है, उसको मेरी याद करनी नहीं पड़ती, प्रत्युत स्वाभाविक मेरी याद आती है और विस्मृति कभी होती ही नहीं--ऐसा तू मेरेमें मनवाला हो।जिसका उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धका आकर्षण मिट गया है, जिसका इस लोकमें शरीरके आराम, आदर-सत्कार और नामकी ब़ड़ाईमें तथा स्वर्गादि परलोकके भोगोंमें किञ्चिन्मात्र भी खिंचाव, आसक्ति या प्रियता नहीं है, प्रत्युत केवल मेरी तरफ ही खिंचाव है, ऐसे पुरुषका नाम 'मय्यासक्तमनाः' है।                साधक भगवान्में मन कैसे लगाये, जिससे वह 'मय्यासक्तमनाः' हो जाय--इसके लिये दो उपाय बताये जाते हैं-- (1) साधक जब सच्ची नीयतसे भगवान्के लिये ही जप-ध्यान करने बैठता है, तब भगवान् उसको अपना भजन मान लेते हैं। जैसे, कोई धनी आदमी किसी नौकरसे कह दे कि 'तुम यहाँ बैठो, कोई काम होगा तो तुम्हारेको बता देंगे।' किसी दिन उस नौकरको मालिकने कोई कम नहीं बताया। वह नौकर दिनभर खाली बैठा रहा और शामको मालिकसे कहता है--'बाबू!  मेरेको पैसे दीजिये।' मालिक कहता है--'तुम सारे दिन बैठे रहे, पैसे किस बातके?' वह नौकर कहता है--'बाबूजी !सारे दिन बैठा रहा ,इस बातके! इस तरह जब एक मनुष्यके लिये बैठनेवालेको भी पैसे मिलते हैं, तब जो केवल भगवान्में मन लगानेके लिये सच्ची लगनसे बैठता है, उसका बैठना क्या भगवान् निरर्थक मानेंगे? तात्पर्य यह हुआ कि जो भगवान्में मन लगानेके लिये भगवान्का आश्रय लेकर, भगवान्के ही भरोसे बैठता है, वह भगवान्की कृपासे भगवान्में मनवाला हो जाता है।\n(2) भगवान् सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं; क्योंकि अगर यहाँ नहीं हैं तो भगवान् सब जगह हैं--यह कहना नहीं बनता। भगवान् सब समयमें हैं तो इस समय भी हैं; क्योंकि अगर इस समय नहीं हैं तो भगवान् सब समयमें हैं--यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबमें हैं तो मेरेमें भी हैं; क्योंकि अगर मेरेमें नहीं हैं तो भगवान् सबमें हैं-- यह कहना नहीं बनता। भगवान् सबके हैं तो मेरे भी हैं; क्योंकि अगर मेरे नहीं हैं तो भगवान् सबके हैं--यह कहना नहीं बनता इसलिये भगवान् यहाँ हैं, अभी हैं, अपनेमें हैं और अपने हैं। कोई देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना और क्रिया उनसे रहित नहीं है, उनसे रहित होना सम्भव ही नहीं है। इस बातको दृढ़तासे मानते हुए, भगवन्नाममें, प्राणमें, मनमें, बुद्धिमें, शरीरमें, शरीरके कण-कणमें परमात्मा हैं--इस भावकी जागृति रखते हुए नाम-जप करे तो साधक बहुत जल्दी भगवान्में मनवाला हो सकता है।'मदाश्रयः'--जिसको केवल मेरी ही आशा है, मेरा ही भरोसा है, मेरा ही सहारा है, मेरा ही विश्वास है और जो सर्वथा मेरे ही आश्रित रहता है, वह 'मदाश्रयः' है।किसी-न-किसीका आश्रय लेना इस जीवका स्वभाव है। परमात्माका अंश होनेसे यह जीव अपने अंशीको ढूँढ़ता है। परन्तु जबतक इसके लक्ष्यमें, उद्देश्यमें परमात्मा नहीं होते, तबतक यह शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़े रहता है और शरीर जिसका अंश है, उस संसारकी तरफ खिंचता है। वह यह मानने लगता है कि इससे ही मेरेको कुछ मिलेगा, इसीसे मैं निहाल हो जाऊँगा, जो कुछ होगा, वह संसारसे ही होगा। परन्तु जब यह भगवान्को ही सर्वोपरि मान लेता है, तब यह भगवान्में आसक्त हो जाता है और भगवान्का ही आश्रय ले लेता है।संसारका अर्थात् धन, सम्पत्ति, वैभव, विद्या, बुद्धि, योग्यता, कुटुम्ब आदिका जो आश्रय है, वह नाशवान् है, मिटनेवाला है, स्थिर रहनेवाला नहीं है। वह सदा रहनेवाला नहीं है और सदाके लिये पूर्ति और तृप्ति करानेवाला भी नहीं है। परन्तु भगवान्का आश्रय कभी किञ्चिन्मात्र भी कम होनेवाला नहीं है; क्योंकि भगवान्का आश्रय पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। अतः आश्रय केवल भगवान्का ही लेना चाहिये। केवल भगवान्का ही आश्रय, अवलम्बन, आधार, सहारा हो। इसीका वाचक यहाँ 'मदाश्रयः' पद है।भगवान् कहते हैं कि मन भी मेरेमें आसक्त हो जाय और आश्रय भी मेरा हो। मन आसक्त होता है --प्रेमसे, और प्रेम होता है--अपनेपनसे। आश्रय लिया जाता है--बड़ेका, सर्वसमर्थका। सर्वसमर्थ तो हमारे प्रभु ही हैं। इसलिये उनका ही आश्रय लेना है और उनके प्रत्येक विधानमें प्रसन्न होना है कि मेरे मनके विरुद्ध विधान भेजकर प्रभु मेरी कितनी निगरानी रखते हैं! मेरा कितना ख्याल रखते हैं कि मेरी सम्मति लिये बिना ही विधान करते हैं! ऐसे मेरे दयालु प्रभुका मेरेपर कितना अपनापन है! अतः मेरेको कभी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार भगवान्के आश्रित रहना ही 'मदाश्रयः' होना है।'योगं युञ्जन्'--भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध अखण्ड सम्बन्ध है, उस सम्बन्धको मानता हुआ तथा सिद्धि-असिद्धिमें सम रहता हुआ साधक जप, ध्यान, कीर्तन ,करनेमें, भगवान्की लीला और स्वरूपका चिन्तन करनेमें स्वाभाविक ही अटल भावसे लगा रहता है। उसकी चेष्टा स्वाभाविक ही भगवान्के अनुकूल होती है। यही 'योगं युञ्जन्' कहनेका तात्पर्य है।जब साधक भगवान्में ही आसक्त मनवाला और भगवान्के ही आश्रयवाला होगा, तब वह अभ्यास क्या करेगा? कौन-सा योग करेगा? वह भगवत्सम्बन्धी अथवा संसार-सम्बन्धी जो भी कार्य करता है, वह सब योगका ही अभ्यास है। तात्पर्य है कि जिससे परमात्माका सम्बन्ध हो जाय, वह (लौकिक या पारमार्थिक) काम करता है और जिससे परमात्माका वियोग हो जाय, वह काम नहीं करता है।'असंशयं समग्रं माम्'--जिसका मन भगवान्में आसक्त हो गया है, जो सर्वथा भगवान्के आश्रित हो गया है और जिसने भगवान्के सम्बन्धको स्वीकार कर लिया है--ऐसा पुरुष भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है अर्थात् सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, अवतार-अवतारी और शिव, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि जितने रूप हैं, उन सबको वह जान लेता है।भगवान् अपने भक्तकी बात कहते-कहते अघाते नहीं हैं और कहते हैं कि ज्ञानमार्गसे चलनेवाला तो मेरेको जान सकता है और प्राप्त कर सकता है; परंतु भक्तिसे तो मेरा भक्त समग्ररूपको जान सकता है और इष्टका अर्थात् जिस रूपसे मेरी उपासना करता है, उस रूपका दर्शन भी कर सकता है।\n\n'यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु'--यहाँ 'यथा' (टिप्पणी प0 390.1) पदसे प्रकार बताया गया है कि तू जिस प्रकार जान सके, वह प्रकार भी कहूँगा, और 'तत्'(टिप्पणी प0 390.2) पदसे बताया गया है कि जिस तत्त्वको तू जान सकता है, उसका मैं वर्णन करता हूँ तू सुन।छठे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें 'श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः' पदोंमें प्रथम पुरुष-(वह-) का प्रयोग करके सामान्य बात कही था और यहाँ सातवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए 'यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु' पदोंमें मध्यम पुरुष-(तू-) का प्रयोग करके अर्जुनके लिये विशेषतासे कहते हैं कि तू जिस प्रकार मेरे समग्ररूपको जानेगा, वह मेरेसे सुन।       इससे पहलेके छः अध्यायोंमें भगवान्के लिये 'समग्र' शब्द नहीं आया है। चौथे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें'ज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' पदोंमें कर्मके विशेषणके रूपमें 'समग्र' शब्द आया है और यहाँ 'समग्र' शब्द भगवान्के विशेषणके रूपमें आया है। 'समग्र' शब्दमें भगवान्का तात्त्विक स्वरूप सब-का-सब आ जाता है, बाकी कुछ नहीं बचता।\n\nविशेष बात\n\n(1) इस श्लोकमें 'आसक्ति केवल मेरेमें ही हो, आश्रय भी केवल मेरा ही हो, फिर योगका अभ्यास किया जाय तो मेरे समग्ररूपको जान लेगा'--ऐसा कहनेमें भगवान्का तात्पर्य है कि अगर मनुष्यकी आसक्ति भोगोंमें है और आश्रय रुपये-पैसे, कुटुम्ब आदिका है तो कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि किसी योगका अभ्यास करता हुआ भी मेरेको नहीं जान सकता। मेरे समग्ररूपको जाननेके लिये तो मेरेमें ही प्रेम हो, मेरा ही आश्रय हो। मेरेसे किसी भी कार्यपूर्तिकी इच्छा न हो। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये--इस कामनाको छोड़कर भगवान् जो करते हैं वही होना चाहिये और भगवान् जो नहीं करना चाहते वह नहीं होना चाहिये इस भावसे केवल मेरा आश्रय लेता है, वह मेरे समग्र रूपको जान लेता है। इसलिये भगवान् अर्जुनको कहते हैं कि तू 'मय्यासक्तमनाः' और 'मदाश्रयः' हो जा।\n\n(2) परमात्माके साथ वास्तविक सम्बन्धका नाम 'योगम्' है और उस सम्बन्धको अखण्डभावसे माननेका नाम 'युञ्जन्'है। तात्पर्य यह है कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदिके साथ सम्बन्ध मानकर अपनेमें 'मैं'-रूपसे जो एक व्यक्तित्व मान रखा है, उसको न मानते हुए परमात्माके साथ जो अपनी वास्तविक अभिन्नता है, उसका अनुभव करता रहे।वास्तवमें 'योगं युञ्जन्' की इतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी आवश्यकता संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेकी है। संसारकी आसक्ति और आश्रय छोड़नेसे परमात्माका चिन्तन स्वतः-स्वाभाविक होगा और सम्पूर्ण क्रियाएँ निष्काम-भावपूर्वक होने लगेंगी। फिर भगवान्को जाननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ेगा। इसका तात्पर्य यह है कि जिसका संसारकी तरफ खिंचाव है और जिसके अन्तःकरणमें उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व बैठा हुआ है, वह परमात्माके वास्तविक स्वरूपको नहीं जान सकता। कारण कि उसकी आसक्ति, कामना, महत्ता संसारमें है, जिससे संसारमें परमात्माके परिपूर्ण रहते हुए भी वह उनको नहीं जान सकता।मनुष्यका जब समाजके किसी बड़े व्यक्तिसे अपनापन हो जाता है, तब उसको एक प्रसन्नता होती है। ऐसे ही जब हमारे सदाके हितैषी और हमारे खास अंशी भगवान्में आत्मीयता जाग्रत् हो जाती है, तब हरदम प्रसन्नता रहते हुए एक अलौकिक, विलक्षण प्रेम प्रकट हो जाता है। फिर साधक स्वाभाविक ही भगवान्में मनवाला और भगवान्के आश्रित हो जाता है।\n\nशरणागतिके पर्यायआश्रय, अवलम्बन, अधीनता, प्रपत्ति और सहारा--ये सभी शब्द 'शरणागति' के पर्यायवाचक होते हुए भी अपना अलग अर्थ रखते हैं; जैसे-- (1)'आश्रय'जैसे हम पृथ्वीके आधारके बिना जी ही नहीं सकते और उठना-बैठना आदि कुछ कर ही नहीं सकते, ऐसे ही प्रभुके आधारके बिना हम जी नहीं सकते और कुछ भी कर नहीं सकते। जीना और कुछ भी करना प्रभुके आधारसे ही होता है। इसीको 'आश्रय'कहते हैं।\n\n(2) 'अवलम्बन' जैसे किसीके हाथकी हड्डी टूटनेपर डाक्टरलोग उसपर पट्टी बाँधकर उसको गलेके सहारेलटका देते हैं तो वह हाथ गलेके अवलम्बित हो जाता है, ऐसे ही संसारसे निराश और अनाश्रित होकर भगवान्के गले पड़ने अर्थात् भगवान्को पकड़ लेनेका नाम 'अवलम्बन' है।\n\n(3) 'अधीनता' अधीनता दो तरहसे होती है--1-कोई हमें जबर्दस्तीसे अधीन कर ले या पकड़ ले और 2-हम अपनी तरफसे किसीके अधीन हो जायँ या उसके दास बन जायँ। ऐसे ही अपना कुछ भी प्रयोजन न रखकर अर्थात् केवल भगवान्को लेकर ही अनन्यभावसे सर्वथा भगवान्का दास बन जाना और केवल भगवान्को ही अपना स्वामी मान लेना 'अधीनता' है।\n\n(4) 'प्रपत्ति' जैसे कोई किसी समर्थके चरणोंमें लम्बा पड़ जाता है, ऐसे ही संसारकी तरफसे सर्वथा निराश होकर भगवान्के चरणोंमें गिर जाना 'प्रपत्ति' (प्रपन्नता) है।\n\n(5) सहारा--जैसे जलमें डूबनेवालेको किसी वृक्ष, लता, रस्से आदिका आधार मिल जाय, ऐसे ही संसारमें बार-बार जन्म-मरणमें डूबनेके भयसे भगवान्का आधार ले लेना'सहारा' है।इस प्रकार उपर्युक्त सभी शब्दोंमें केवल शरणागतिका भाव प्रकट होता है। शरणागति तब होती है, जब भगवान्में ही आसक्ति हो और भगवान्का ही आश्रय हो अर्थात् भगवान्में ही मन लगे और भगवान्में ही बुद्धि लगे। अगर मनुष्य मन-बुद्धिसहित स्वयं भगवान्के आश्रित (समर्पित) हो जाय, तो शरणागतिके उपर्युक्त सबकेसब भाव उसमें आ जाते हैं।मन और बुद्धिको अपने न मानकर 'ये भगवान्के ही हैं' ऐसा दृढ़तासे मान लेनेसे साधक मय्यासक्तमनाः और मदाश्रयः हो जाता है। सांसारिक वस्तुमात्र प्रतिक्षण प्रलयकी तरफ जा रही है और किसी भी वस्तुसे अपना नित्य सम्बन्ध है ही नहीं--यह सबका अनुभव है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दिया जाय अर्थात् मिटनेवाले सम्बन्धको अपना न माना जाय तो अपने कल्याणका उद्देश्य होनेसे भगवान्की शरणागति स्वतः आ जायगी। कारण कि यह स्वतः ही भगवान्का है। संसारके साथ सम्बन्ध केवल माना हुआ है (वास्तवमें सम्बन्ध है नहीं) और भगवान्से केवल विमुखता हुई है (वास्तवमें विमुखता है नहीं)। इसलिये माना हुआ सम्बन्ध छोड़नेपर भगवान्के साथ जो स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जाता है।\n\n सम्बन्ध--पहले श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि तू मेरे समग्र रूपको जैसा जानेगा, वह सुन। अब भगवान् आगेके श्लोकमें उसे सुनानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।7.1।।श्रीभगवानुवाच  मयि आभिमुख्येन आसक्तमनाः मत्प्रियत्वातिरेकेण मत्स्वरूपेण गुणैः च चेष्टितेन मद्विभूत्या विश्लेषे सति तत्क्षणाद् एव विशीर्यमाणस्वभावतया मयि सुगाढं बद्धमनाः मदाश्रयः तथा स्वयं च मया विना विशीर्य्यमाणतया मदाश्रयः मदेकाधारः मद्योगं युञ्जन् योक्तुं प्रवृत्तो योगविषयभूतं माम् असंशयं निःसंशयं समग्रं सकलं यथा ज्ञास्यसि येन ज्ञानेन उक्तेन ज्ञास्यसि तद् ज्ञानम् अवस्थितमनाः श्रृणु।",
        "et": "7.1 The Lord said  Listen attentively to My words imparting knowledge to you, by which you will understand Me indubitably and fully - Me, the object of the Yogic contemplation in which you are engaged with a mind so deeply bound to Me by virtue of overwhelming love that it would disintegrate instantaneously the moment it is out of touch with My essential nature, attributes, deeds and glories, and with your very self resting so completely on Me that it would break up when bereft of Me."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।7.1  7.2।।मय्यासक्तेति ज्ञानमिति।  ज्ञानविज्ञाने ज्ञानक्रिये एव।  ततो न किञ्चिदवशिष्यते सर्वस्य ज्ञेयजातस्य ज्ञानक्रियानिष्ठत्वात्।",
        "et": "7.1 See comment under 7.2"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।7.1।।इस श्लोकद्वारा छठे अध्यायके अन्तमें प्रश्नके बीजकी स्थापना करके फिर स्वयं ही ऐसा मेरा तत्त्व हे इस प्रकार मुझमें स्थित अन्तरात्मावाला हो जाना चाहिये इत्यादि बातोंका वर्णन करनेकी इच्छावाले भगवान् बोले  आगे कहे जानेवाले विशेषणोंसे युक्त मुझ परमेश्वरमें ही जिसका मन आसक्त हो वह मय्यासक्तमना है और मैं परमेश्वर ही जिसका ( एकमात्र ) अवलम्बन हूँ वह मदाश्रय है हे पार्थ  ऐसा मय्यासक्तमना और मदाश्रय होकर तू योगका साधन करताहुआ अर्थात् मनको ध्यानमें स्थित करता हुआ ( जिस प्रकार मुझको संशयरहित समग्ररूपसे जानेगा सो सुन  ) जो कोई ( धर्मादि पुरुषार्थोंमेंसे ) किसी पुरुषार्थका चाहनेवाला होता है वह उसके साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्म तप या दानरूप किसी एक आश्रयको ग्रहण किया करता है परंतु यह योगी तो अन्य साधनोंको छोड़कर केवल मुझको ही आश्रयरूपसे ग्रहण करता है और मुझमें ही आसक्तचित्त होता है। इसलिये तू उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न होकर विभूति बल ऐश्वर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न मुझ समग्र परमेश्वरको जिस प्रकार संशयरहित जानेगा कि भगवान् निस्सन्देह ठीक ऐसा ही है वह प्रकार मैं तुझसे कहता हूँ सुन।",
        "sc": "।।7.1।। मयि वक्ष्यमाणविशेषणे परमेश्वरे आसक्तं मनः यस्य सः मय्यासक्तमनाः हे पार्थ योगं युञ्जन् मनःसमाधानं कुर्वन् मदाश्रयः अहमेव परमेश्वरः आश्रयो यस्य सः मदाश्रयः। यो हि कश्चित् पुरुषार्थेन केनचित् अर्थी भवति स तत्साधनं कर्म अग्निहोत्रादि तपः दानं वा किञ्चित् आश्रयं प्रतिपद्यते अयं तु योगी मामेव आश्रयं प्रतिपद्यते हित्वा अन्यत् साधनान्तरं मय्येव आसक्तमनाः भवति। यः त्वं एवंभूतः सन् असंशयं समग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसंपन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि संशयमन्तरेण एवमेव भगवान् इति तत् श्रृणु उच्यमानं मया।।तच्च मद्विषयम्",
        "et": "7.1 O Partha, mayi asaktamanah, having the mind fixed on Me- one whose mind (manah) is fixed (asakta) on Me (mayi) who am the supreme God possessed on the alification going to be spoken of-.\nYogam yunjan, practising the Yoga of Meditation, concentrating the mind-.\nMadasrayah, taking refuge in Me-one to whom I Myself, the supreme Lord, am the refuge (asraya) is madasrayah-.\nAnyone who hankers after some human objective resorts to some rite such as the Agnihotra etc., austerity or charity, which is the means to its attainment. This yogi, however, accepts only Me as his refuge; rejecting any other means, he keeps his mind fixed on Me alone.\nSrnu, hear; tat, that, which is being spoken of by Me; as to yatha, how, the process by which; you who, having become thus, jnasyasi, will know; mam, Me; asamsayam, with certainty, without doubt, that the Lord is such indeed; and samagram, in fullness, possessed of such alities as greatness, strength, power, majesty, etc. [Strength-physical; power-mental; etc. refers to omniscience and will.] in their fullness."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।7.1।।ज्ञानसाधनादन्यदुत्तराध्यायप्रतिपाद्यं वक्तुंयोगे त्विमां शृणु 2।39 इति प्रतिज्ञातमसमाप्य कथमर्थान्तरमुच्यते। इत्याशङ्कां तावत्परिहरति  साधनमिति। ज्ञानस्येति शेषः। तत्र तत्र भगवन्महिम्नोऽपि वर्णितत्वेन प्राधान्येनेत्युक्तम्। प्राचुर्येणेत्यर्थः।उक्तं इत्यनेन प्रतिज्ञातसमाप्तिं सूचयति। तच्च प्रतिज्ञान्तरकरणादवगम्यते। इदानीमुत्तरग्रन्थप्रतिपाद्यमाह  उत्तरैस्त्विति। अध्यायैरिति वर्तते। अनेन ज्ञानविज्ञानशब्दौ ज्ञेयभगवन्माहात्म्यपराविति सूचितम्। अत्रापि क्वचित्साधनस्योक्तत्वात्प्राधान्येन इत्युक्तम्। सङ्गतिस्तु प्रथमश्लोक एवोक्ता अनेन द्विविधेन योगेन यज्ज्ञातव्यं तच्छृण्वित्युक्तत्वात्।आसक्तमनाः सम्बद्धमनाः इति प्रतीतिनिरासायाह  आसक्तेति।अतीव इत्याङोऽर्थः सम्बन्धमात्रस्य योगानङ्गत्वादिति भावः। भगवदाश्रयत्वं सर्वसाधारणं कथं योगिनो विशेषणम्। इत्यत आह  मदाश्रय इति। शरणं रक्षकः। इति स्थित इति जानन्निति यावत्।असंशयं समग्रं इत्युभयं भगवद्विशेषणत्वेन भास्करो व्याख्यातवान् संशयरहितं समग्रं कृत्स्नं मां इति। अपरस्तु (शां.) समग्रमित्येवसमग्रं समस्तं विभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसम्पन्नं मां ৷৷. संशयमन्तरेण इति तन्निरासार्थमाह  असंशयमिति तच्च समग्रं यथा भवति तथेत्यर्थः। न हि भगवतः संशयराहित्यमिदानीं वक्तव्यम्। न च भगवान्समग्रोऽन्येन केनचिच्छक्यो ज्ञातुम्स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं 10।15 इति वक्ष्यमाणत्वादिति भावः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।7.1।।पूर्वत्रात्माधिगमनं साङ्ख्ययोगकृतेः फलम्। अथातो महिमज्ञानपूर्वकं भक्तिरुच्यते।।1।।माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः। स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चान्यथा।।2।।धात्वर्थ उत्तमा सेवा स्नेहोऽर्थो प्रत्ययस्य च। प्रकृतिप्रत्ययार्थात्मा निबन्धे भक्तिरुच्यते।।3।।माहात्म्यविज्ञानमत्र वासुदेवस्य योगिनाम्। अन्ते सिद्धिकरं नान्यदिति तस्योद्यमः पुनः।।4।।पुरुषोत्तममाहात्म्यविज्ञानं साङ्गमुत्तमम्। प्रयाणकाले सर्वस्य भक्तस्य स्मरतः फलम्।।5।।प्रथमं योगधर्मेण महिमज्ञानमुत्तमम्। ततः प्रपत्तिर्ज्ञानं च ज्ञानिनः श्रेष्ठता यतः।।6।।ईश्वरज्ञानवान् श्रेष्ठो नात्मविज्ञानवान् परम्। यतः स्वात्मज्ञानवद्भिरीश्वरः सेव्यतेऽनिशम्।।7।।तत्र कीदृशमाहात्म्योऽहं यस्य सेवा कर्त्तव्या इत्यपराधनिवृत्त्यर्थं स्वमहिमानं निरूपयिष्यन् स्वयं श्रीभगवानुवाच  मय्यासक्तमना इति। हे पार्थ मयि परमात्मनि भगवति सर्वधर्माश्रये निरतिशयालौकिकलीले परमनियन्तरि करुणाशीले आसक्तचित्तः योगमुक्तलक्षणं समभ्यसन् मदाश्रयो मत्प्रपन्नः सन् निस्संशयं समग्रं निरतिशयालौकिकगुणपूर्णं निरुपधिमहिमानं यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तच्छृणु। सूत्रवृत्तिवदिदम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।7.1।।यद्भक्तिं न विना मुक्तिर्यः सेव्यः सर्वयोगिनाम्। तं वन्दे परमानन्दघनं श्रीनन्दनन्दनम्।।1।।एवं कर्मसंन्यासात्मकसाधनप्रधानेन प्रथमषट्केन ज्ञेयं त्वंपदलक्ष्यं सयोगं व्याख्यायाधुना ध्येयब्रह्मप्रतिपादनप्रधानेन मध्यमेन षट्केन तत्पदार्थों व्याख्यातव्यः। तत्रापियोगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः इति प्रागुक्तस्य भगवद्भजनस्य व्याख्यानाय सप्तमोऽध्याय आरभ्यते। तत्र कीदृशं भगवतो रूपं भजनीयं कथं वा तद्गतोऽन्तरात्मा स्यादित्येतद्वयं प्रष्टव्यमर्जुनेनापृष्टमपि परमकारुणिकतया स्वयमेव विवक्षुः श्रीभगवानुवाच  मयि परमेश्वरे सकलजगदायतनत्वादिविविधविभूतिभागिन्यासक्तं विषयान्तरपरिहारेण सर्वदा निविष्टं मनो यस्य तव स त्वं अतएव मदाश्रयो मदेकशरणः राजाश्रयो भार्याद्यासक्तमनाश्च राजभृत्यः प्रसिद्धः मुमुक्षुस्तु मदाश्रयो मदासक्तमनाश्च त्वं त्वद्विधो वा योगं युञ्जन्मनःसमाधानं षष्ठोक्तप्रकारेण कुर्वन् असंशयं यथा भवत्येवं समग्रं सर्वविभूतिबलशक्त्यैश्वर्यादिसंपन्नं मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तच्छृणूच्यमानं मया।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।7.1।।विज्ञेयमात्मनस्तत्त्वं सयोगं समुदाहृतम्। भजनीयमथेदानीमैश्वरं रूपमीर्यते।।1।।पूर्वाध्यायान्ते मद्गतेनान्तरात्मना यो मां भजते स मे युक्ततमो मत इत्युक्तं तत्र कीदृशस्त्वं यस्य भक्तिः कर्तव्येत्यपेक्षायां स्वस्वरूपं निरूपयिष्यञ्श्रीभगवानुवाच  मय्यासक्तमना इति। मयि परमेश्वरे आसक्तमभिनिविष्टं मनो यस्य सः। मदाश्रयोऽहमेवाश्रयो यस्यानन्यशरणः सन्योगं युञ्जन्नभ्यसन् असंशयं यता भवत्येवं मां समग्रं विभूतिबलैश्वर्यादिसहितं यथा ज्ञास्यसि तदिदं मया वक्ष्यमाणं शृणु।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।7.1।। यतो जातं येन स्थितमिदमशेषं प्रविलयं प्रयात्याद्ये यस्मिञ्श्रुतिभिरुदिते जन्तव इमे।\tभवत्येकं ब्रह्मामलममृतामाराध्य यमहं शिवं रासं कृष्णं तमजमजरं नौम्यखिलगम्।।1।।एवं त्वंपदार्थ निरुप्य तत्पदार्थ निरुपयितुं पूर्वाध्यायान्तेयोगिनामपि सर्वेषां मद्भतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्तातमो मतः इत्युक्तं तत्रेदृशं मदीयं तत्त्वमनेन प्रकारेण मद्भतान्तरात्मा स्यादित्येतद्वक्तुमिच्छुः श्रीमगवानुवाच। मयि वक्ष्यमाणविशेषणे परमेश्वरे आसक्तं मनो यस्य सः। मयि मनआसक्तिसंपादनं तव सुलभमिति सूचयन्नाह  पार्थेति। योगं युञ्चन्मःसमाधानं कुर्वन्मदाश्रयः अहमेव परमेश्वर आश्रयो यस्य तु नतु कस्मैचित्पुरुषार्थायेहामुत्रभ्याय राज्यादिर्यज्ञदानादिर्वा आश्रयो यस्य सः त्वमप्यासक्तमना मदाश्रयः सन् असंशयं यथा स्यात्तथा मां यथा येन प्रकारेण ज्ञास्यसि तं वक्ष्यमाणप्रकारं श्रृणु। ननु मदग्ने भवान् स्थितोऽसंशयं मया ज्ञायत एवातः किमिदमुच्यत इत्याशङ्क्याह  समग्मिति। समस्तविभतिबलशक्त्यैश्वर्यादिगुणसंपन्नं सगुणं निर्गुणं च मामसंशयं यथा ज्ञास्यसि तच्छृण्वित्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।7.1।।षट्कसङ्गतिमाह  प्रथमेनेति।परमेत्यादिना वक्तुमित्यन्तेन द्वितीयषट्कार्थ उक्तः। ततः परं प्रथमषट्कार्थः। प्रथमेनाध्यायषट्केनोक्तमित्यन्वयः।मामुपेत्य 8।16 इत्यादीनामर्थं दर्शयति  परमप्राप्यभूतस्येति। तेन परिशुद्धजीवमात्रव्यावर्तनम्। परमप्राप्यत्वे हेतुः परब्रह्मत्वादिकम्।परं ब्रह्म परं धाम 10।12 इत्यादिकं वक्ष्यति। पुरुषोत्तमत्वप्रकरणादीनामर्थो निरवद्यत्वम्। एतेनाचिद्गता विकारादयः चिद्गताः क्लेशादयश्च परिहृताः।अहं सर्वस्य प्रभवः 10।8़ इत्यादेरर्थमाह  निखिलेति। चिदचिदात्मकं सर्वं जगत्प्रतिनिमित्तोपादानभूतस्येत्यर्थः। एवं परमप्राप्यस्यैव कारणत्वप्रतिपादनाद्व्योमातीतमतन्निरस्तम्। निमित्तोपादानत्वोपयुक्तंमत्तः परतरम् 7।7 इत्याद्यभिप्रेतं सर्वज्ञत्वादिकम्।सर्वभूतस्य  सर्वान्तर्यामितया सर्वशरीरकस्येत्यर्थः।सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः 11।40 इति हि वक्ष्यति।भूमिरापः 7।4 इत्यादिना विभूत्यध्यायादिना (10) च वक्ष्यमाणं महाविभूतित्वं नारायणशब्दनिर्वचनमपिपरमप्राप्यभूतस्य महाविभूतेरित्यादिना सूचितम्। एतदुक्तं भवति  परत्वान्निरवद्यत्वात्पितृत्वाद्धितवेदनात्। अन्तरात्मतया दोषप्रतिक्षेपक्षमत्वतः। भोगलीलार्थनिस्सीमविभूतिद्वययोगतः। श्रीमत्वादप्युपास्योऽयं प्राप्यो नारायणः परः।। इति।प्राप्त्युपायभूतं तदुपासनमिति  परमात्मोपासनमेव तत्क्रतुन्यायात्तत्प्राप्त्युपायः जीवज्ञानं कर्मानुष्ठानं च तन्निवर्तकत्वेन परम्परयोपाय इति भावः। अङ्गप्राप्त्रोर्वचनानन्तरमङ्गिप्राप्ययोः प्रतिपादनमिति सङ्गत्यभिप्रायेणाह  इदानीमिति। पूर्वोक्तात्परिशुद्धात्मनो व्यावृत्तिं वक्ष्यमाणवैभवसङ्ग्रहं चाभिप्रेत्याह  परब्रह्मभूतपरमपुरुषस्वरूपमिति  एतेन तत्त्वपरेषु सामान्यब्रह्मशब्दस्य विशेषे स्थितिर्दर्शिता अथ मोक्षोपायपरेषु वेदान्तवाक्येषु वेदनोपासनादिशब्दानां विशेषपर्यवसानमाह  तदुपासनं च भक्तिशब्दवाच्यमिति। एवं वाक्यद्वयेन षटुद्वयसङ्ग्रश्लोकावप्यर्थाद्व्याख्यातौ। तथाहिज्ञानकर्मात्मिके निष्ठे योगलक्षे सुसंस्कृते। आत्मानुभूतिसिद्ध्यर्थे पूर्वषट्केन चोदिते। मध्यमे भगवत्तत्त्वयाथात्म्यावाप्तिसिद्धये। ज्ञानकर्माभिनिर्वर्त्यो भक्तियोगः प्रकीर्तितः गी.सं.2।3 इति।आत्मज्ञानपूर्वकेत्यनेन सुसंस्कृतशब्दो व्याख्यातः। बुद्धिविशेषसंस्कृतत्वं हि प्रागेवोपपादितम्।योगलक्षे आत्मानुभूतिसिद्ध्यर्थे इत्यत्र योगो विषयान्तरेभ्यश्चित्तवृत्तिनिरोधः तज्जन्यसाक्षात्कारस्त्विहात्मानुभूतिशब्देनोच्यत इत्यपौनरुक्त्यमित्यभिप्रायेणयाथात्म्यदर्शनमित्युक्तम्। तत्त्वयाथात्म्यशब्दविवरणंपरब्रह्मभूतेत्यादि। तत्त्वशब्दोऽत्र स्वरूपपरः। याथात्म्यं यथावस्थितः प्रकारः। भक्तेः कर्मानुष्टानसाध्यात्मदर्शनहेतुकत्वं अष्टादशे वक्ष्यत इत्याहतदेतदिति। ननु तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति श्वे.उ.3।86।15 इत्यादिबलाद्वेदनमात्रेण मोक्षः प्रतीयते अस्तु वाउपासीत इति बलादुपासनरूपेण वेदनेन मोक्षः तथापि न भक्त्या मोक्ष इति क्वचिदपि श्रुतम्।कर्मसमुच्चयश्च श्रुतिसिद्धो दुस्त्यजः परमपुरुषविषयस्यैवोपासनस्य मोक्षसाधनत्वमित्यपि दुर्वचम् रुद्रेन्द्राद्युपासनस्यापि मोक्षसाधनत्वेनाथर्वशिरःप्रतर्दनविद्यादिषु श्रुतेरित्याद्याशङ्क्याऽऽह  उपासनं त्विति। उपासनमेव न तु ज्ञानमात्रमित्येका प्रतिज्ञा तत्रापि भक्तिरूपापन्नं नोपासनमात्रमिति द्वितीया एवंविधमुपासनमेव न तु कर्मसमुच्चितमिति तृतीया तच्च परविषयमेवेति चतुर्थी। एषा तुपरमप्राप्त्युपायभूतमित्यनेन तत्क्रतुन्यायात्सूचिता।वेदान्तवाक्यसिद्धमिति  एतच्चतुष्टयमपि वेदान्तवाक्यैरेव सिद्धम् न तु कल्प्यम् नाप्युपबृंहणसापेक्षमिति भावः। तत्र प्रथमां प्रतिज्ञां समर्थयते  तमेवेत्यादिना अवगम्यत इत्यन्तेन। श्रोतव्यो मन्तव्यः बृ.उ.2।4।5 इत्येतयोस्तु रागप्राप्तश्रवणमननानुवादरूपत्वात्तत्परित्यागेन द्रष्टव्यः ৷৷. निदिध्यासितव्यः इति विध्यंश उपात्तः। ध्यानोपासनशब्दयोरत्रैकार्थ्यं दर्शयितुमुभयविशिष्टवाक्योपादानम्। द्रष्टव्यः ৷৷. निदिध्यासितव्यः इत्यनयोर्भिन्नार्थत्वप्रसिद्धेरेकवाक्यस्थयोरेकार्थत्वं पौनरुक्त्यादिदोषाच्च दर्शनं ध्यानं च पृथगेव विहितमिति शङ्कायां तयोरपि सामान्यविशेषन्यायविशेषेणैकार्थ्यमेवेति दर्शयितुं स्मृतिमात्रं दर्शनमात्रं च पृथक्सर्वग्रन्थिमोक्षहेतुतया वदतोरत एवैकार्थविषययोर्वाक्ययोरुपादानम्। एतदुक्तं भवति  समानप्रकरणपठितविशेषे सामान्यशब्दानां पर्यवसानं न्यायसिद्धम् अतोऽत्र वेदनादिसामान्यशब्दानां ध्यानोपासनशब्दवाच्ये विशेषे पर्यवसानमभ्युपेयम् ध्यानं च तैलधारावदविच्छिन्नस्मृतिसन्ततिरूपमिति ध्रुवा स्मृतिः छ"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।7.1।।भगवद्योगयुक्तात्मा युक्तो रूपप्रबोधने।\t अतः पार्थाय श्रीकृष्णः स्वरूपज्ञानमुक्तवान्।।1।।पूर्वाध्यायान्तेश्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः 6।47 इति योगसहितस्वभजनकर्त्तुरुत्तमत्वं स्वाभिमतत्वमुक्तं तत्र स्वरूपाज्ञाने भजनं न भवेत् तज्ज्ञानं च योगज्ञानोत्तरभावीति योगस्वरूपमुक्त्वा अथ भजनार्थं स्वरूपज्ञानमाह  श्रीभगवानुवाच  मय्यासक्तमना इति। हे पार्थ एतच्छ्रवणयोग्य मदाश्रयः मदर्थमेवाऽनन्यशरणः सन् मत्क्रीडार्थं संयोगार्थमाश्रयं कृत्वा योगं युञ्जन् दास्याभ्यासं कुर्वन् असंशयं संशयरहितं यथा स्यात्तथा समग्रं संयोगात्मकं सर्वरससहितं मां यथा ज्ञास्यसि तदिदमग्रे वक्ष्यमाणं ज्ञानस्वरूपं मय्यासक्तमनाः मयि आसक्तं स्वापेक्षारहितं मत्सुखाभिलाषिमनाः शृणु।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।7.1।।पूर्वाध्यायान्ते यो मां भजते स मे युक्ततमो मत इत्युक्तम् तत्र कीदृशं पूर्वोक्तनिष्कामकर्मयोगापेक्षया विलक्षणं तव भजनं केन वा गुणेन पूर्वयोगापेक्षया तस्य युक्ततमत्वमित्येतामर्जुनस्याशङ्कां स्वयमेव परिहरन् भगवानुवाच  मयीति। कश्चिद्राजाश्रयो धनमानासक्तमना भवति। अयं तु मदाश्रयेण मामेव परमपुरुषार्थभूतं प्राप्तुमिच्छन्नित्यर्थः। ईदृशो योगं युञ्जन्समाधिमनुतिष्ठन् त्वंपदार्थविवेककाले यद्यपि सार्वज्ञ्यमस्तिसर्वभूतस्थमात्मानम् इत्यादिवचनात्तथापि स्वस्मादन्य ईश्वरोऽस्ति नवेति पातञ्जलकापिलयोस्तार्किकमीमांसकयोर्वा सेश्वरानीश्वरयोर्मतभेदात्संशयः कारणाज्ञानाच्चासमग्रं तत्सार्वज्ञ्यमिति मत्वा आह  असंशयं समग्रमिति। मां तत्पदार्थमीश्वरं यथा ज्ञास्यसि तत् तं प्रकारं शृणु। अत्र वक्ष्यमाणरीत्या सर्वं ब्रह्म वासुदेवात्मकमिति भजने वैलक्षण्यं कारणज्ञातृत्वमस्य योगिनः पूर्वयोग्यपेक्षयाधिक्यमिति भावः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The Supreme Personality of Godhead said: Now hear, O son of Pṛthā, how by practicing yoga in full consciousness of Me, with mind attached to Me, you can know Me in full, free from doubt.",
        "ec": " In this Seventh Chapter of Bhagavad-gītā , the nature of Kṛṣṇa consciousness is fully described. Kṛṣṇa is full in all opulences, and how He manifests such opulences is described herein. Also, four kinds of fortunate people who become attached to Kṛṣṇa and four kinds of unfortunate people who never take to Kṛṣṇa are described in this chapter. In the first six chapters of Bhagavad-gītā , the living entity has been described as nonmaterial spirit soul capable of elevating himself to self-realization by different types of yogas. At the end of the Sixth Chapter, it has been clearly stated that the steady concentration of the mind upon Kṛṣṇa, or in other words Kṛṣṇa consciousness, is the highest form of all yoga. By concentrating one’s mind upon Kṛṣṇa, one is able to know the Absolute Truth completely, but not otherwise. Impersonal brahma-jyotir or localized Paramātmā realization is not perfect knowledge of the Absolute Truth, because it is partial. Full and scientific knowledge is Kṛṣṇa, and everything is revealed to the person in Kṛṣṇa consciousness. In complete Kṛṣṇa consciousness one knows that Kṛṣṇa is ultimate knowledge beyond any doubts. Different types of yoga are only steppingstones on the path of Kṛṣṇa consciousness. One who takes directly to Kṛṣṇa consciousness automatically knows about brahma-jyotir and Paramātmā in full. By practice of Kṛṣṇa consciousness yoga, one can know everything in full – namely the Absolute Truth, the living entities, the material nature, and their manifestations with paraphernalia. One should therefore begin yoga practice as directed in the last verse of the Sixth Chapter. Concentration of the mind upon Kṛṣṇa the Supreme is made possible by prescribed devotional service in nine different forms, of which śravaṇam is the first and most important. The Lord therefore says to Arjuna, tac chṛṇu, or “Hear from Me.” No one can be a greater authority than Kṛṣṇa, and therefore by hearing from Him one receives the greatest opportunity to become a perfectly Kṛṣṇa conscious person. One has therefore to learn from Kṛṣṇa directly or from a pure devotee of Kṛṣṇa – and not from a nondevotee upstart, puffed up with academic education. In the Śrīmad-Bhāgavatam this process of understanding Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead, the Absolute Truth, is described in the Second Chapter of the First Canto as follows: śṛṇvatāṁ sva-kathāḥ kṛṣṇaḥ puṇya-śravaṇa-kīrtanaḥ hṛdy antaḥ-stho hy abhadrāṇi vidhunoti suhṛt satām naṣṭa-prāyeṣv abhadreṣu nityaṁ bhāgavata-sevayā bhagavaty uttama-śloke bhaktir bhavati naiṣṭhikī tadā rajas-tamo-bhāvāḥ kāma-lobhādayaś ca ye ceta etair anāviddhaṁ sthitaṁ sattve prasīdati evaṁ prasanna-manaso bhagavad-bhakti-yogataḥ bhagavat-tattva-vijñānaṁ mukta-saṅgasya jāyate bhidyate hṛdaya-granthiś chidyante sarva-saṁśayāḥ kṣīyante cāsya karmāṇi dṛṣṭa evātmanīśvare “To hear about Kṛṣṇa from Vedic literatures, or to hear from Him directly through the Bhagavad-gītā , is itself righteous activity. And for one who hears about Kṛṣṇa, Lord Kṛṣṇa, who is dwelling in everyone’s heart, acts as a best-wishing friend and purifies the devotee who constantly engages in hearing of Him. In this way, a devotee naturally develops his dormant transcendental knowledge. As he hears more about Kṛṣṇa from the Bhāgavatam and from the devotees, he becomes fixed in the devotional service of the Lord. By development of devotional service one becomes freed from the modes of passion and ignorance, and thus material lusts and avarice are diminished. When these impurities are wiped away, the candidate remains steady in his position of pure goodness, becomes enlivened by devotional service and understands the science of God perfectly. Thus bhakti-yoga severs the hard knot of material affection and enables one to come at once to the stage of asaṁśayaṁ samagram, understanding of the Supreme Absolute Truth Personality of Godhead.” ( Bhāg. 1.2.17–21) Therefore only by hearing from Kṛṣṇa or from His devotee in Kṛṣṇa consciousness can one understand the science of Kṛṣṇa."
    }
}
