{
    "_id": "BG6.7",
    "chapter": 6,
    "verse": 7,
    "slok": "जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः |\nशीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ||६-७||",
    "transliteration": "jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ .\nśītoṣṇasukhaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥ ||6-7||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.7।। शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.7 The Supreme Self of him who is self-controlled and peaceful is balanced in cold and heat, pleasure and pain, as also in honour and dishonour.",
        "ec": "6.7 जितात्मनः of the selfcontrolled? प्रशान्तस्य of the peaceful? परमात्मा the Supreem Self? समाहितः balanced? शीतोष्णसुखदुःखेषु in cold and heat? pleasure and pain? तथा as also? मानापमानयोः in honour and dishonour.Commentary The selfcontrolled Yogi who is rooted in the Self keeps poise amidst the pairs of opposites (Dvandvas) or the alternating waves of cold and heat? pleasure and pain? honour and dishonour. When the Yogi has subdued his senses? when his mind is balanced and peaceful under all conditions? when he is not in the least influenced by the pairts of opposites? when he has renounced all actions? then the Highest Self really becomes his own Self. He attains to Selfrealisation. As he rests in hiw own Self? he is ever serene or tranil he is not affected by the pairs of opposites? and he stands as adamant in the face of the changing conditions of Nature."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.7 The Self of him who is self-controlled, and has attained peace is equally unmoved by heat or cold, pleasure or pain, honour or dishonour."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.7।। जब योगारूढ़ पुरुष आत्मचिन्तन में स्थित हो जाता है तब उसमें वह क्षमता आ जाती है कि वह जीवन की सभीअनुकूल और प्रतिकूलपरिस्थितियों में ध्यानाभ्यास की निरन्तरता बनाये रख सकता है। यहाँ दूसरी पंक्ति में स्पष्ट दर्शाया है कि बाह्य जगत् में कोई ऐसा पर्याप्त कारण नहीं रह जाता जो उसे आत्मध्यान से विचलित कर सके।शीतउष्ण सुखदुख तथा मानअपमान  इन तीन द्वन्द्वों के द्वारा भगवान् सभी संभाव्य विघ्नों को सूचित करते हैं जो मनुष्य के जीवन में आकर उसकी समता और शांति को भंग करने में समर्थ होते हैं।शीतउष्ण  इसका अनुभव स्थूल शरीर के स्तर पर होता है। शीत या उष्ण में हमारे मन के विचारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे शीत में न सिकुड़ते हैं और न काँपते हैं  उसी प्रकार उष्णता से न वे अधिक व्यापक होते हैं और न उन्हें स्वेद आता है  ये सब लक्षण शरीर में ही दिखाई देते हैं और इसलिये शीतउष्ण इस द्वन्द्व के द्वारा वे सभी अनुभव बताये गये हैं जो शरीर को होते हैं जैसेरोग युवावस्था वृद्धावस्था आदि।सुखदुख  मन के स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों को सुखदुख रूप द्वन्द्व से दर्शाया गया है। स्पष्ट है कि इसका अनुभव मन को होता है शरीर को नहीं। प्रेम और घृणा स्नेह और ईर्ष्या करुणा और क्रूरता  ऐसी ही असंख्य प्रकार की भावनाएँ मन में उठती रहती हैं जो मनुष्य को विचलित कर देती हैं  परन्तु इनमें किसी में भी यह सार्मथ्य नहीं कि वह जितेन्द्रिय संयमित पुरुष को किसी प्रकार की हानि पहुँचा सके।मानअपमान  के कारण यदि किसी साधक को विक्षेप होता है तो उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं। मानअपमान की कल्पना बुद्धि की होती है और फिर मनुष्य अपनी कल्पना के अनुसार प्राप्त परिस्थितियों में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।शरीर मन और बुद्धि ये तीन उपाधियाँ हैं जिनके द्वारा उपर्युक्त द्वन्द्वरूप विघ्न आने की संभावनायें रहती हैं। भगवान् कहते हैं कि प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय पुरुष के लिये परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहता है। इन परिस्थितियों का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितयाँ हों अच्छा या बुरा वातावरण हो अथवा मूर्ख या बुद्धिमान का साथ हो  आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है।ऐसे ज्ञानी पुरुष की क्या विशेषता है क्यों कोई पुरुष इस कठिन साधना का अभ्यास करे भगवान् कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.7. The thinking of the person, with subdued mind and [hence] with complete calmness,  remains in eilibrium in the case of others and of himself,  in cold and heat, in pleasure and pain, like-wise in honour and dishonour."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.7 Of him whose mind is conered and who is serene, the great self is well secured in heat and cold, in pleasure and pain, and in honour and dishonour."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.7 The supreme Self of one who has control over the aggregate of his body and organs, and who is tranil, becomes manifest. (He should be eipoised) [These words are supplied to complete the sentence.] in the midst of cold and heat, happiness and sorrow, as also honour and dishonour."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.7  6.8।।जितात्मनः फलमाह  जितात्मन इति। जितात्मा हि प्रशान्तो भवति। न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति। तदा च परमात्मा सम्यगाहितः हृदि सन्निहितो भवति अपरोक्षज्ञानी भवतीत्यर्थः। अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति  शीतोष्णेत्यादिना। शीतोष्णादिषु कूटस्थः ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा विजितेन्द्रिय इति कूटस्थत्वे हेतुः। विज्ञानं विशेषज्ञानं अपरोक्षज्ञानं वा। तच्चोक्तं  सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः। देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम्। इति।श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते। तज्ज्ञानं दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत्। विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा इत्यादि। कूटस्थो निर्विकारः कूटवत्स्थित इति व्युत्पत्तेः। कूटमाकाशःकूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते। इत्यभिधानात्। योगी योगं कुर्वन्। युक्तो योगसम्पूर्णः। एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.7।।कथं संयतकार्यकरणस्य बन्धुरात्मेति तत्राह  जितात्मन इति। जितकार्यकरणसंघातस्य प्रकर्षेणोपरतबाह्याभ्यन्तरकरणस्य परमात्मा विक्षेपेण पुनः पुनरनभिभूयमानो निरन्तरं चित्ते प्रथत इत्यर्थः। जितात्मानं संन्यस्तसमस्तकर्माणमधिकारिणं प्रदर्श्य योगाङ्गानि दर्शयति  शीतेति। समः स्यादित्यध्याहारः। पूर्वार्धं व्याचष्टे  जितेत्यादिना। न केवलं तस्य परमात्मा साक्षादात्मभावेन वर्तते किंतु शीतोष्णादिभिरपि नासौ चाल्यते तत्त्वज्ञानादित्युत्तरार्धं विभजते  किञ्चेति। तेषु समः स्यादिति संबन्धः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.7।। जिसने अपने-आपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।",
        "hc": "।।6.7।। व्याख्या--[छठे श्लोकमें'अनात्मनः' पद और यहाँ 'जितात्मनः' पद आया है। इसका तात्पर्य है कि जो 'अनात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंके साथ 'मैं 'और 'मेरा'-पन करके अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करता है और जो 'जितात्मा' होता है, वह शरीरादि प्राकृत पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न मानकर अपने साथ मित्रताका बर्ताव करता है। इस तरह अनात्मा मनुष्य अपना पतन करता है और जितात्मा मनुष्य अपना उद्धार करता है।]'जितात्मनः' जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि किसी भी प्राकृत पदार्थकी अपने लिये सहायता नहीं मानता और उन प्राकृत पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी अपनेपनका सम्बन्ध नहीं जोड़ता, उसका नाम 'जितात्मा' है। जितात्मा मनुष्य अपनी तो हित करता ही है, उसके द्वारा दुनियाका भी बड़ा भारी हित होता है।'शीतोष्णसुखदुःखेषु प्रशान्तस्य'--यहाँ 'शीत' और 'उष्ण'--इन दोनों पदोंपर गहरा विचार करें तो ये सरदी और गरमीके वाचक सिद्ध नहीं होते; क्योंकि सरदी और गरमी--ये दोनों केवल त्वगिन्द्रियके विषय हैं। अगर जितात्मा पुरुष केवल एक त्वगिन्द्रियके विषयमें ही शान्त रहेगा तो श्रवण, नेत्र, रसना और घ्राण--इन इन्द्रियोंके विषय बाकी रह जायँगे, अर्थात् इनमें उसका प्रशान्त रहना बाकी रह जायगा तो उसमें पूर्णता नहीं आयेगी। अतः यहाँ 'शीत' और 'उष्ण' पद अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं।शीत अर्थात् अनुकूलताकी प्राप्ति होनेपर भीतरमें एक तरहकी शीतलता मालूम देती है और उष्ण अर्थात् प्रतिकूलताकी प्राप्ति होनेपर भीतरमें एक तरहका सन्ताप मालूम देता है। तात्पर्य है कि भीतरमें न शीतलता हो और न सन्ताप हो, प्रत्युत एक समान शान्ति बनी रहे अर्थात् इन्द्रियोंके अनुकूल-प्रतिकूल विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होनेपर भीतरकी शान्ति भङ्ग न हो। कारण कि भीतरमें जो स्वतःसिद्ध शान्ति है, वह अनुकूलतामें राजी होनेसे और प्रतिकूलतामें नाराज होनेसे भङ्ग हो जाती है। अतः शीत-उष्णमें प्रशान्त रहनेका अर्थ हुआ कि बाहरसे होनेवाले संयोग-वियोगका भीतर असर न पड़े।अब यह विचार करना चाहिये कि 'सुख' और 'दुःख' पदसे क्या अर्थ लें। सुख और दुःख दो-दो तरहके होते हैं--(1) साधारण लौकिक दृष्टिसे जिसके पास धन-सम्पत्ति-वैभव, स्त्री-पुत्र आदि अनुकूल सामग्रीकी बहुलता हो, उसको लोग 'सुखी' कहते हैं। जिसके पास धन-सम्पत्ति-वैभव, स्त्री-पुत्र आदि अनुकूल सामग्रीका अभाव हो, उसको लोग 'दुःखी' कहते हैं।\n\n(2) जिसके पास बाहरकी सुखदायी सामग्री नहीं है वह भोजन कहाँ करेगा--इसका पता नहीं है, पासमें पहननेके लिये पूरे कपड़े नहीं हैं, रहनेके लिये स्थान नहीं है, साथमें कोई सेवा करनेवाला नहीं है--ऐसी अवस्था होनेपर भी जिसके मनमें दुःख-सन्ताप नहीं होता और जो किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी आवश्यकताका अनुभव भी नहीं करता, प्रत्युत हर हालतमें बड़ा प्रसन्न रहता है, वह 'सुखी' कहलाता है। परन्तु जिसके पास बाहरकी सुखदायी सामग्री पूरी है, भोजनके लिये बढ़ियासेबढ़िया पदार्थ हैं पहननेके लिये बढ़िया-से-बढ़िया कपड़े हैं, रहनेके लिये बहुत बढ़िया मकान है, सेवाके लिये कई नौकर हैं--ऐसी अवस्था होनेपर भी भीतरमें रात-दिन चिन्ता रहती है कि मेरी यह सामग्री कहीं नष्ट न हो जाय यह सामग्री कायम कैसे रहे, बढ़े कैसे? आदि। इस तरह बाहरकी सामग्री रहनेपर भी जो भीतरसे दुःखी रहता है, वह 'दुःखी' कहलाता है।\n\nउपर्युक्त दो प्रकारसे सुख-दुःख कहनेका तात्पर्य है--बाहरकी सामग्रीको लेकर सुखी-दुःखी होना और भीतरकी प्रसन्नता-खिन्नताको लेकर सुखी-दुःखी होना। गीतामें जहाँ सुख-दुःखमें 'सम' होनेकी बात आयी है, वहाँ बाहरकी सामग्रीमें सम रहनेके लिये कहा गया है; जैसे--'समदुःखसुखः'(12। 13 14। 24) 'शीतोष्णसुखदुःखेषु समः' (12। 18) आदि। जहाँ सुख-दुःखसे 'रहित' होनेकी बात आयी है, वहाँ भीतरकी प्रसन्नता और खिन्नतासे रहित होनेके लिये कहा गया है; जैसे--'द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः' (15। 5) आदि। जहाँ सुख-दुःखमें सम होनेकी बात है, वहाँ सुख-दुःखकी सत्ता तो है पर उसका असर नहीं पड़ता और जहाँ सुखदुःखसे रहित होनेकी बात है वहाँ सुखदुःखकी सत्ता ही नहीं है। इस तरह चाहे बाहरकी सुखदायी-दुःखदायी सामग्री प्राप्त होनेपर भीतरसे सम होना कहें, चाहे भीतरसे सुख-दुःखसे रहित होना कहें--दोनोंका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि सम भी भीतरसे है और रहित भी भीतरसे है।यहाँ शीत-उष्ण और सुख-दुःखमें प्रशान्त (सम) रहनेकी बात कही गयी है। अनुकूलतासे सुख होता है--'अनुकूलवेदनीयं सुखम्' और प्रतिकूलतासे दुःख होता है--'प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम्।' इसलिये अगर शीत-उष्णका अर्थ अनुकूलता-प्रतिकूलता लिया जाय तो सुख-दुःख कहना व्यर्थ हो जायगा और सुख-दुःख कहनेसे शीत-उष्ण कहना व्यर्थ हो जायगा; क्योंकि सुख-दुःख पद शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) के ही वाचक हैं। फिर यहाँ शीत-उष्ण और सुख-दुःख पदोंकी सार्थकता कैसे सिद्ध होगी? इसके लिये 'शीत-उष्ण' पदसे प्रारब्धके अनुसार आनेवाली अनुकूलता-प्रतिकूलताको लिया जाय और 'सुख-दुःख' पदसे वर्तमानमें किये जानेवाले क्रियमाण कर्मोंकी पूर्ति-अपूर्ति तथा उनके तात्कालिक फलकी सिद्धि-असिद्धिको लिया जाय तो इन पदोंकी सार्थकता सिद्ध हो जाती है। तात्पर्य यह निकला कि चाहे प्रारब्धकी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति हो, चाहे क्रियमाणकी तात्कालिक सिद्धि-असिद्धि हो--इन दोनोंमें ही प्रशान्त (निर्विकार) रहे।इस प्रकरणके अनुसार भी उपर्युक्त अर्थ ठीक दीखता है। कारण कि इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें आये 'नेन्द्रियार्थेषु (अनुषज्जते)' पदको यहाँ 'शीत-उष्ण' पदसे कहा गया है और 'न कर्मसु अनुषज्जते' पदोंको यहाँ सुख-दुःख पदसे कहा गया है अर्थात् वहाँ प्रारब्धके अनुसार आयी हुई अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिमें और क्रियमाण कर्मोंकी पूर्ति-अपूर्ति तथा तात्कालिक फलकी सिद्धि-असिद्धिमें आसक्ति-रहित होनेकी बातआयी है और यहाँ उन दोनोंमें प्रशान्त होनेकी बात आयी है।'तथा मानापमानयोः'--ऐसे ही जो मान-अपमानमें भी प्रशान्त है। अब यहाँ कोई शङ्का करे कि मान-अपमान भी तो प्रारब्धका फल है; अतः यह शीत-उष्ण (अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति) के ही अन्तर्गत आ गया। फिर इसको अलगसे क्यों लिया गया मानअपमानको अलगसे इसलिये लिया गया है कि शीतउष्ण तो दैवेच्छा(अनिच्छा) कृत प्रारब्धका फल है, पर मान-अपमान परेच्छाकृत प्रारब्धका फल है। यह परेच्छाकृत प्रारब्ध मान-बड़ाईमें भी होता है और निन्दा-स्तुति आदिमें भी होता है। इसलिये 'मान-अपमान' पदमें निन्दा-स्तुति लेना चाहें, तो ले सकते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मयोगी दूसरोंके द्वारा किये गये मान-अपमानमें भी प्रशान्त रहता है अर्थात् उसकी शान्तिमें किञ्चिन्मात्र भी फरक नहीं पड़ता।मान-अपमानमें प्रशान्त रहनेका उपाय--साधकका कोई मान-आदर करे, तो साधक यह न माने कि यह मेरे कर्मोंका, मेरे गुणोंका, मेरी अच्छाईका फल है, प्रत्युत यही माने कि यह तो मान-आदर करनेवालेकी सज्जनता है, उदारता है। उसकी सज्जनताको अपना गुण मानना ईमानदारी नहीं है। अगर कोई अपमान कर दे, तो ऐसा माने कि यह मेरे कर्मोंका ही फल है। इसमें अपमान करनेवालेका कोई दोष नहीं है, प्रत्युत वह तो दयाका पात्र है; क्योंकि उस बेचारेने मेरे पापोंका फल भुगतानेमें निमित्त बनकर मेरेको शुद्ध कर दिया है। इस तरह माननेसे साधक मान-अपमानमें प्रशान्त, निर्विकार हो जायगा। अगर वह मानको अपना गुण और अपमानको दूसरोंका दोष मानेगा, तो वह मान-अपमानमें प्रशान्त नहीं हो सकेगा।\n\n'परमात्मा समाहितः'--शीत-उष्ण, सुख-दुःख और मान-अपमान--इन छहोंमें प्रशान्त, निर्विकार रहनेसे सिद्ध होता है कि उसको परमात्मा प्राप्त हैं। कारण कि भीतरसे विलक्षण आनन्द मिले बिना बाहरकी अनुकूलता-प्रतिकूलता, सिद्धि-असिद्धि और मान-अपमानमें वह प्रशान्त नहीं रह सकता। वह प्रशान्त रहता है, तो उसको एकरस रहनेवाला विलक्षण आनन्द मिल गया है। इसलिये गीताने जगह-जगह कहा है कि 'जिन पुरुषोंका मन साम्यावस्थामें स्थित है, उन पुरुषोंने इस जीवित-अवस्थामें ही संसारको जीत लिया है' (5। 19); जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक लाभका होना मान ही नहीं सकता और जिसमें स्थित होनेपर बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं हो सकता (6। 22) आदि-आदि।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.7।।शीतोष्णसुखदुःखेषु मानापमानयोः च जितात्मनः जितमनसः विकाररहितमनसः प्रशान्तस्य मनसि परमात्मा समाहितः सम्यगाहितः। स्वरूपेण अवस्थितः प्रत्यगात्मा अत्र परमात्मा इत्युच्यते तस्य एव प्रकृतत्वात् तस्य अपि पूर्वपूर्वास्थापेक्षया परमात्मत्वात्। आत्मा परं समाहित इति वा सम्बन्धः।",
        "et": "6.7 Of him whose self is conered, i.e., whose mind is conered, whose mind is free from fluctuations and who is very calm, 'the great self' becomes well secured, i.e., exceedingly well secured in connection with heat and cold, pleasure and pain, and honour and dishonour.\n\nHere the individual self (Pratyagatman) is called 'the great self' (Paramatman), as the context justifies this only. It can also be called 'great', because it is at a higher stage relatively to previous successive stages. Or the word may be construed as follows:  The self is secured greatly - Atma parma samahitah. [In any case it should not be taken as the Supreme Being]."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.7।।तत्र जितमनस इदं रूपम्  जितेति।  प्रशान्तो निरहंकारः।  परेषु आत्मनि च शीतोष्णादिषु च अभेदधीः न रागद्वेषौ।",
        "et": "6.7 Jita-etc.  A person with complete calmness :  a person without ego.  [The thinking etc.] ;  A thinking that entertains no difference in the case of others and of himself,  and of cold and heat etc., i.e.,  [entertains] no like and dislike [for them]."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.7।।जिसने मन इन्द्रिय आदिके संघातरूप इस शरीरको अपने वशमें कर लिया है और जो प्रशान्त है  जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है उस संन्यासीको भली प्रकारसे सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है अर्थात् साक्षात् आत्मभावसे विद्यमान है। तथा वह सर्दीगर्मी और सुखदुःखमें एवं मान और अपमानमें यानी पूजा और तिरस्कारमें भी ( सम हो जाता है )।",
        "sc": "।।6.7।। जितात्मनः कार्यकरणसंघात आत्मा जितो येन सः जितात्मा तस्य जितात्मनः प्रशान्तस्य प्रसन्नान्तःकरणस्य सतः संन्यासिनः परमात्मा समाहितः साक्षादात्मभावेन वर्तते इत्यर्थः। किञ्च शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा माने अपमाने च मानापमानयोः पूजापरिभवयोः समः स्यात्।।",
        "et": "6.7 Parama-atma, the supreme Self; jita-atmanah, of one who has control over the aggregate of his body and organs; prasantasya, who is tranil, who is a monk with his internal organ placid; samahitah, becomes manifest, i.e. becomes directly manifest as his own Self. Moreover, (he should be eipoised) sita-usna-sukha-duhkhesu, in the midst of cold and heat, happiness and sorrow; tatha, as also; mana-apamanayoh in honour and dishonour, adoration and despise."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.7  6.8।।योगो विहितः तत्किं जितात्मन इत्यनेन इत्यत आह  जितात्मन इति। उपकारी हि बन्धुरुच्यते। तत्र जितं मनः कमुपकारं करोति येन बन्धुः स्यात् आत्मोद्धारं करोतीति चेत् स एव च कः इत्याशङ्क्येति शेषः। जितात्मनः फले वक्तव्ये प्रशान्तस्येत्यनुवादः किमर्थः इत्यत आह  जितात्मा हीति। वाक्यभेदेनेदमेव फलकथनमिति भावः। ननु जितात्मत्वमेव प्रशान्तत्वं तत्कथं तत्फलं स्यात् इत्यत आह  नेति। तस्य जितात्मनः स्वत एवेति शेषः। तर्हि निराकाङ्क्षत्वादुत्तरं वाक्यं व्यर्थमित्यतः परमफलं दर्शयितुं तदिति भावेन न्यूनमध्याहारेण पूरयन्व्याचष्टे  तदा चेति। प्रशान्तत्वे सति परमात्मा सर्वेषां हृदि सन्निहित एव तत्कुतः प्रशान्तस्य विशेषः इत्यतः सम्यक्पदसूचितार्थं विवृणोति  अपरोक्षेति। योगारूढ इत्यर्थः।यदा हि 6।5 इति योगारूढस्य लक्षणमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यत आह  अपरोक्षेति। सार्धश्लोकद्वयग्रहणायादिपदं अत्र सप्तम्या अन्वयो न दृश्यतेऽत आह  शीतेति। अत्र भास्करोऽन्वयमपश्यन्परमात्मा समाहितः इति सम्प्रदायागतं पाठं विसृज्यपरात्मसु समा मतिः इति पाठान्तरं प्रकल्प्यसमा मतिः इति तु आवर्त्य सप्तम्या अन्वयमुक्त्वा पूर्वपाठेऽन्वयाभाव इत्यवादीत् तदनेन नापहसितं भवति। कृत्रिमेऽपि पाठेसुहृत् इत्यादिकंआत्मौपम्येन 6।32 इत्यादिकं च पुनरुक्तं स्यात्। ननु यः शीतोष्णादिषु कूटस्थः तस्य ज्ञानविज्ञानतृप्तमनस्त्वं विजितेन्द्रियत्वं चार्थात्सिद्धमेव तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यत आह   ज्ञानेति। प्रत्येकमन्वयादेकवचनम्। ननु शिल्पादिविषया बुद्धिर्विज्ञानम्मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः अमरः1।5।6 इत्यभिधानात् तत्कथं विज्ञानेन तृप्तात्माऽयं स्यात् इत्यत आह  विज्ञानमिति। अनेन सामान्यज्ञानं परोक्षज्ञानं वा ज्ञानमिति सूचितम्। कुत एतत् इत्यत आह  तच्चेति। प्रसिद्धाभिधानार्थोऽप्यङ्गीक्रियत इति चशब्दः। सामान्यैः साधारणैः पुरुषैः। सामान्यविषयं तु ज्ञानमित्यपि द्रष्टव्यम्। तदेव ज्ञानमिति सम्बन्धः। अङ्गादेर्व्याकरणादेः शिल्पस्य च। विशिष्टं दर्शनं वैष्णवशास्त्रम्। कूटस्थशब्दो नित्यादिपर्यायः तेन कथमन्वयः सप्तम्याः इत्यत आह  कूटस्थ इति। तत्कथं इत्यत आह  कूटवदिति।सुपि स्थः अष्टा.3।2।4 कूटशब्दोऽनृतवाद्यादिवाची तत्परिग्रहे निर्विकारत्वं न लभ्यत इत्यत आह  कूटमिति। एतैः शब्दैराकाश उच्यत इत्यर्थः।युक्तो योगी इति पुनरुक्तिरिति मन्दाशङ्कानिरासार्थमाह  योगीति। इनेरस्त्यर्थत्वात् कुर्वन्नित्युक्तम्। निष्ठाया भूतार्थत्वात् सम्पूर्ण इति। वक्ष्यमाणान्वयापेक्षया क्रमोल्लङ्घनम्। तर्हि विरुद्धार्थयोः कथं सामानाधिकरण्यं इत्यत आह  एवम्भूत इति।धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः इति ह्युक्तम्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.7।।जितात्मनो बन्धुत्वं स्फुटयति  जितात्मन इति। कालधर्मेषु शीतोष्णादिषु सत्स्वपि तस्य परं केवलमात्मा समाहितो भवतीति परमात्माऽन्तर्यामीव समाधिगतो भवति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.7।।जितात्मनः स्वबन्धुत्वं विवृणोति  शीतोष्णसुखदुःखेषु चित्तविक्षेपकरेषु सत्स्वपि तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोश्चित्तविक्षेपहेत्वोः सतोरपि तेषु समत्वेनेति वा जितात्मनः प्रागुक्तस्य जितेन्द्रियस्य प्रशान्तस्य सर्वत्र समबुद्ध्या रागद्वेषशून्यस्य परमात्मा स्वप्रकाशज्ञानस्वभाव आत्मा समाहितः समाधिविषयो योगारूढो भवति। परमिति वा छेदः। जितात्मनः प्रशान्तस्यैव परं केवलमात्मा समाहितो भवति नान्यस्य। तस्माज्जितात्मा प्रशान्तश्च भवेदित्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.7।।जितात्मनः स्वस्मिन्बन्धुत्वं स्फुटयति  जितात्मन इति। जित आत्मा येन तस्य प्रशान्तस्य रागादिरहितस्यैव परं केवलमात्मा शीतोष्णादिषु सत्स्वपि समाहितः स्वात्मनिष्ठो भवति नान्यस्य। यद्वा तस्य हृदि परमात्मा समाहितः स्थितो भवति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.7।।जितात्मनः स्वबन्धुत्वे फल माह  जितात्मन इति। कार्यकारणसंगात आत्मा जितो येन स तस्य प्रशान्तस्य योगेन जितचित्तस्य योगारुढस्येतियावत्। परमात्मा शुद्धस्तत्पदार्थः समाहितः साक्षादात्मभावेन वर्तते। सत जीवन्मुक्तो भवतीत्याह  शीतेत्यादिना। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः पूजापरिभवयोः समः स्यादित्यध्याहारः। सर्वं वाक्यं सावधारणमिति न्यायेन जितात्मनः प्रशान्तस्यैवेत्यर्थः। एतेन प्रशान्तस्यैव परं केवलमिति प्रत्युक्तम्। यत्तु शीतोष्णसुखदुःखेषु चित्तविक्षेपकरेषु सत्स्वपि तथा मानापमानयोः सतोरपि तेषु समत्वेनेति वा जितात्मन इति केचिद्वर्णयन्ति तत्रेन्द्रियेषु जाग्रत्सु शीतादेरस्तित्वं संभवत्येवेति सत्स्वपीत्याद्युक्तिररुचिग्रस्ता। एतेन शीतादिषु प्राप्तेषु जितात्मनो निर्विकारचित्तस्य परमुत्कर्षेणात्मा समाहितः समाधिं प्राप्तो भवत्यतः समाधिसिद्य्धर्थ मनो जेतव्यं भवतीत्यर्थ इति प्रत्युक्तम्। शीतादिष्वप्राप्तेषु किंचित्समाहितस्य प्राप्तेषूत्कर्षेणेत्यस्य विपर्ययरुपत्वात् येतव्यस्य मनसः स्थितौ शीतादयोऽपि संत्येवेति प्राप्तेष्वित्यस्य व्यर्थत्वाच्च। यदप्येवंविधस्यात्मान्तःकरणं शीतादिषु द्वन्द्वशब्दवाच्येषु परमत्यर्थ समाहितः सहिष्णुरविक्रियो भवतीत्यर्थ इति तदपि न। मुख्यार्थे संभवत्यमुख्यार्थस्यान्याय्यत्वात्। यद्वा भाष्यस्योपलक्षणार्थत्वमङ्गीकृत्योदाहृतव्याख्यानान्युपादेयानि।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.7।।प्रतिष्ठितयोगत्वावस्था तदारोहणोपायश्चोक्तौ अथ योगप्रक्रियां वक्तुं तदारम्भदशा ज्ञाप्यत इत्याह  योगारम्भेति। सप्तम्याःसमाहितः इत्यनेन अन्वयभ्रमव्युदासायान्वयं पदार्थांश्च व्यञ्जयति  शीतोष्णेति। एतेनमानावमानयोः समस्य इति परोक्ताध्याहारोऽनपेक्षित इति दर्शितम्। शीतोष्णादिषु द्वन्द्वेष्वनुभूयमानेषु कथं मनसो विजयः इत्यत्राह  विकाररहितमनस इति। विकारश्च हर्षोद्रेकादिरूपः प्रागुक्तः।प्रशान्तस्य इत्येतद्बाह्येन्द्रियव्यापारनिवृत्तिपरम् मनोविकारनिवृत्तेरुक्तत्वात् असन्निहितफलाभिसन्ध्यादिराहित्यपरं वा।समाहितः इत्यस्याकाङ्क्षितं प्रकृतमुचितं चाधिकरणमाह  मनसीति।सम्यगाहित इति  विशदानुसन्धानयोग्यो जात इत्यर्थः। जीवात्मप्रकरणे परमात्माकथमुच्यते इत्यत्राहस्वरूपेणेति।अत्रेति प्रकरणौचित्यसूचनम्। तदेव दर्शयति  तस्यैवेति। एवकारेण प्रासङ्गिको हि पूर्वं परमात्मप्रसङ्ग इतिज्ञापितम्। अपरस्य जीवस्य परमात्मशब्दविषयत्वं कथं इत्यत्राह  तस्यापीति। तथापि परमात्मशब्दस्य प्रसिद्धार्थः परित्यक्तः स्यात् परत्वं च सङ्कुचितम् परमशब्दनिर्वचनं च न घटते परो मा अस्मादिति हि तत्। नच पूर्वपूर्वावस्थापेक्षया परो मा अस्मादित्यन्वयः सिध्यतीत्यरुचेरन्वयान्तरमाह  आत्मा परमिति। अत्र चाधिकं केवलमिति वा परशब्दार्थः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.7।।ननु बन्धुत्वे कथं हितकृद्भवेत् इत्यत आह  जितात्मन इति। जितात्मनः वशीकृतभावात्मनः। शीतोष्णसुखदुःखेषु संयोगविप्रयोगेषु प्रशान्तस्य संयोगे स्वसौभाग्यादिमदरहितस्य विप्रयोगे क्लेशेन प्रिये दोषारोपरहितस्य। तथा भगवतः सकाशान्मानापमानयोः समस्य। परमात्मा पुरुषोत्तमः समाहितस्तदर्थं दास्यदाने सावधानस्तिष्ठति। तद्धृदय एव समाहितस्तिष्ठतीति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.7।।मनसो जये फलमाह  जितात्मन इति। शीतोष्णादिषु प्राप्तेषु जितात्मनो निर्विकारचित्तस्य आत्मा चित्तं परमुत्कर्षेण समाहितः समाधिं प्राप्तो भवति। अतः समाधिसिद्ध्यर्थं मनो जेतव्यमेवेत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "For one who has conquered the mind, the Supersoul is already reached, for he has attained tranquillity. To such a man happiness and distress, heat and cold, honor and dishonor are all the same.",
        "ec": " Actually, every living entity is intended to abide by the dictation of the Supreme Personality of Godhead, who is seated in everyone’s heart as Paramātmā. When the mind is misled by the external, illusory energy, one becomes entangled in material activities. Therefore, as soon as one’s mind is controlled through one of the yoga systems, one should be considered to have already reached the destination. One has to abide by superior dictation. When one’s mind is fixed on the superior nature, he has no alternative but to follow the dictation of the Supreme. The mind must admit some superior dictation and follow it. The effect of controlling the mind is that one automatically follows the dictation of the Paramātmā, or Supersoul. Because this transcendental position is at once achieved by one who is in Kṛṣṇa consciousness, the devotee of the Lord is unaffected by the dualities of material existence, namely distress and happiness, cold and heat, etc. This state is practical samādhi, or absorption in the Supreme."
    }
}
