{
    "_id": "BG6.45",
    "chapter": 6,
    "verse": 45,
    "slok": "प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः |\nअनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ||६-४५||",
    "transliteration": "prayatnādyatamānastu yogī saṃśuddhakilbiṣaḥ .\nanekajanmasaṃsiddhastato yāti parāṃ gatim ||6-45||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.45।। परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी सम्पूर्ण पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों से (शनै: शनै:) सिद्ध होता हुआ, तब परम गति को प्राप्त होता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.45 But the Yogi who strives with assiduity, purified of sins and perfected gradually through many births, reaches the highest goal.",
        "ec": "6.45 प्रयत्नात् with assiduity? यतमानः striving? तु but? योगी the Yogi? संशुद्धकिल्बिषः purified from sins? अनेकजन्मसंसिद्धः perfected through many births? ततः then? याति reaches? पराम् the highest? गतिम् path.Commentary He gains experiences little by little in the course of many births and eventually attains to perfection. Then he gets the knowledge of the Self and attains to the final beatitude of life."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.45 Then after many lives, the student of spirituality, who earnestly strives, and whose sins are absolved, attains perfection and reaches the Supreme."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.45।। मनुष्य अपने पूर्व जन्म में संचित संस्कारों के अनुसार स्थूल शरीर के द्वारा जगत् में कर्म करता है। ये वासनाएं ही उसके विचारों को दिशा प्रदान करती हैं और उन्हीं के अनुसार वर्तमान में कर्मों की योग्यता निश्चित होती है। मन और बुद्धिरूप अन्तकरण में स्थित इन वासनाओं को पाप अथवा चित्त की अशुद्धि कहते हैं। इनके क्षय का उपाय हैं  कर्मयोग।सर्वप्रथम पाप वासनाओं का त्याग करते हुए पुण्यमय रचनात्मक संस्कारों का संचय करना चाहिए। ध्यानाभ्यास में ये पुण्य संस्कार भी विघ्नकारक सिद्ध हो सकते हैं। तथापि अभ्यास को निरन्तर बनाये रखने से जब मन अलौकिक आन्तरिक शान्ति में स्थिर हो जाता है तब पुण्य वासनाएं भी समाप्त हो जाती हैं। वासनाक्षय के साथ मन और अहंकार दोनों ही नष्ट हो जाते हैं और यही परम गति अथवा आत्म साक्षात्कार की स्थिति है।यद्यपि इस सिद्धांत का वर्णन पुस्तक के अर्ध पृष्ठ में ही किया जा सकता है परन्तु इसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करना अनेक जन्मों के सतत प्रयत्नों का फल है। यहाँ अनेकजन्मसंसिद्ध शब्द का स्पष्ट प्रयोग किया गया है जो अत्यन्त उपयुक्त है  क्योंकि मनुष्य का विकास कोई रंगमंच पर खेला गया संन्धयाकालीन नाटक नहीं वरन् अनेक युगों में की गई उन्नति का इतिहास है। तत्त्वदर्शी ऋषियों का यह सही विचार है।जिस पुरुष में जीवन को समझने की प्रवृत्ति आत्मसाक्षात्कार के लिए व्याकुलता विषय सुख की व्यर्थता को जानने की क्षमता ऋषियों के पदचिन्हों पर चलने का साहस परम शान्ति की इच्छा नैतिक जीवन जीने की सार्मथ्य और परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने की तत्परता होती है वही वास्तव में मनुष्य कहलाने योग्य होता है। ऐसा ही श्रेष्ठ साधक पुरुष सत्य के मन्दिर में प्रवेश पाने का अधिकारी होता है।यदि ध्यानाभ्यास में हमारी रुचि है तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा है और दिव्य जीवन जीने का हममें साहस है तो इसी क्षण  यही वर्तमान जन्म हमारा अन्तिम जन्म हो सकता है।गीता के अध्येता जानते हैं कि यह कोई नवीन मौलिक अर्थ नहीं बताया गया है। जो पवित्र शास्त्र ग्रन्थ पुन पुन सत्य की घोषणा करता हुआ मनुष्य में आशा और उत्साह का संचार करता चल आ रहा है जिसमें कहीं भी नरक में जाने का भय नहीं दिखाया गया है उसके सम्बन्ध में ऐसा नहीं माना जा सकता कि अकस्मात् उसने उपदेश में परिवर्तन करके मनुष्य को अनेक जन्मों के पश्चात् ही मुक्ति का आश्वासन दिया है। यद्यपि अनेक धर्म प्रवंचक इस प्रकार का विपरीत अर्थ करते हैं तथापि बुद्धिमान पुरुष को धोखा नहीं दिया जा सकता। यहाँ बताये हुए अनेक जन्म ज्ञान प्राप्ति के पूर्व के हैं और न कि भावी।इसलिए"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.45. After that, the assiduously striving man of Yoga, having his sins completely cleansed and being perfected through many briths, reaches the Supreme Goal."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.45 But the Yogin striving earnestly, cleansed of all his stains, and perfected through many births, reaches the supreme state."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.45 However, the yogi, applying himself assiduously, becoming purified from sin and attaining perfection through many births, thery acheives the highest Goal."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.45।।नैकजन्मनीत्याह  प्रयत्नादिति। जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्न करोति। एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति। आह च  अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः। ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान्। विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन इति नारदीये।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.45।।योगनिष्ठस्य श्रेष्ठत्वे हेत्वन्तरं वक्तुमुत्तरश्लोकमवतारयति  कुतश्चेति। मृदुप्रयत्नोऽपि क्रमेण मोक्ष्यते चेदधिकप्रयत्नस्य क्लेशहेतोरकिञ्चित्करत्वमित्याशङ्क्य हेत्वन्तरमेव प्रकटयति  प्रयत्नादिति। तत्र योगविषये प्रयत्नातिरेके सतीत्यर्थः। ततः संचितसंस्कारसमुदायादिति यावत्। समुत्पन्नसम्यग्दर्शनवशात्प्रकृष्टा गतिः संन्यासिना लभ्यते तेन शीघ्रं मुक्तिमिच्छन्नधिकप्रयत्नो भवेदल्पप्रयत्नस्तु चिरेणैव मुक्तिभागित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.45।। परन्तु जो योगी प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है और जिसके पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो अनेक जन्मोंसे सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परमगतिको प्राप्त हो जाता है।",
        "hc": "।।6.45।। व्याख्या--[वैराग्यवान् योगभ्रष्ट तो तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त योगियोंके कुलमें जन्म लेने और वहाँ विशेषतासे यत्न करनेके कारण सुगमतासे परमात्माको प्राप्त हो जाता है। परन्तु श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट परमात्माको कैसे प्राप्त होता है? इसका वर्णन इस श्लोकमें करते हैं।]'तु'--इस पदका तात्पर्य है कि योगका जिज्ञासु भी जब वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रण कर जाता है, उनसे ऊँचा उठ जाता है, तब जो योगमें लगा हुआ है और तत्परतासे यत्न करता है, वह वेदोंसे ऊँचा उठ जाय और परमगतिको प्राप्त हो जाय, इसमें तो सन्देह ही क्या है!'योगी'--जो परमात्मतत्त्वको, समताको चाहता है और राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंमें नहीं फँसता, वह योगी है।'प्रयत्नाद्यतमनः'--प्रयत्नपूर्वक यत्न करनेका तात्पर्य है कि उसके भीतर परमात्माकी तरफ चलनेकी जो उत्कण्ठा है, लगन है, उत्साह है, तत्परता है, वह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही रहती है। साधनमें उसकी निरन्तर सजगता रहती है।श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पूर्वाभ्यासके कारण परमात्माकी तरफ खिंचता है और वर्तमानमें भोगोंके सङ्गसे संसारकी तरफ खिंचता है। अगर वह प्रयत्नपूर्वक शूरवीरतासे भोगोंका त्याग कर दे, तो फिर वह परमात्माको प्राप्त कर लेगा। कारण कि जब योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है, तो फिर जो तत्परतासे साधनमें लग जाता है, उसका तो कहना ही क्या है! जैसे निषिद्ध आचरणमें लगा हुआ पुरुष एक बार चोट खानेपर फिर विशेष जोरसे परमात्मामें लग जाता है, ऐसे ही योगभ्रष्ट भी श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेपर विशेष जोरसे परमात्मामें लग जाता है।'संशुद्धकिल्बिषः'--उसके अन्तःकरणके सब दोष, सब पाप नष्ट हो गये हैं अर्थात् परमात्माकी तरफ लगन होनेसे उसके भीतर भोग, संग्रह, मान, बड़ाई आदिकी इच्छा सर्वथा मिट गयी है।जो प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है, उसके प्रयत्नसे ही यह मालूम होता है कि उसके सब पाप नष्ट हो चुके हैं।\n\n'अनेकजन्मसंसिद्धः--(टिप्पणी प0 383.1)' पहले मनुष्यजन्ममें योगके लिये यत्न करनेसे शुद्धि हुई, फिर अन्तसमयमें योगसे विचलित होकर स्वर्गादि लोकोंमें गया तथा वहाँ भोगोंसे अरुचि होनेसे शुद्धि हुई, और फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेकर परमात्मप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक यत्न करनेसे शुद्धि हुई। इस प्रकार तीन जन्मोंमें शुद्ध होना ही अनेकजन्मसंसिद्धि होना है (टिप्पणी प0 383.2)।\n\n'ततो याति परां गतिम्'--इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जिसको प्राप्त होनेपर उससे बढ़कर कोई भी लाभ माननेमें नहीं आता और जिसमें स्थित होनपर भयंकर-से-भयंकर दुःख भी विचलित नहीं कर सकता (गीता 6। 22)--ऐसे आत्यन्तिक सुखको वह प्राप्त हो जाता है।\n\nमार्मिक बात\n\nवास्तवमें देखा जाय तो मनुष्यमात्र अनेक-जन्म-संसिद्ध है। कारण कि इस मनुष्यशरीरके पहले अगर वह स्वर्गादि लोकोंमें गया है, तो वहाँ शुभ कर्मोंका फल भोगनेसे उसके स्वर्गप्रापक पुण्य समाप्त हो गये और वह पुण्योंसे शुद्ध हो गया। अगर वह नरकोंमें गया है, तो वहाँ नारकीय यातना भोगनेसे उसके नरकप्रापक पाप समाप्त हो गये और वह पापोंसे शुद्ध हो गया। अगर वह चौरासी लाख योनियोंमें गया है, तो वहाँ उस-उस योनिके रूपमें अशुभ कर्मोंका, पापोंका फल भोगनेसे उसके मनुष्येतर योनिप्रापक पाप कट गये और वह शुद्ध हो गया (टिप्पणी प0 383.3)। इस प्रकार यह जीव अनेक जन्मोंमें पुण्यों और पापोंसे शुद्ध हुआ है। यह शुद्ध होना ही इसका 'संसिद्ध' होना है।दूसरी बात, मनुष्यमात्र प्रयत्नपूर्वक यत्न करके परम-गतिको प्राप्त कर सकता है, अपना कल्याण कर सकता है। कारण कि भगवान्ने यह अन्तिम जन्म इस मनुष्यको केवल अपना कल्याण करनेके लिये ही दिया है। अगर यह मनुष्य अपना कल्याण करनेका अधिकारी नहीं होता, तो भगवान् इसको मनुष्यजन्म ही क्यों देते? अब जब मनुष्यशरीर दिया है, तो यह मुक्तिका पात्र है ही। अतः मनुष्यमात्रको अपने उद्धारके लिये तत्परतापूर्वक यत्न करना चाहिये।\n\n सम्बन्ध--योगभ्रष्टका इस लोक और परलोकमें पतन नहीं होता; योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है--यह जो भगवान्ने महिमा कही है, यह महिमा भ्रष्ट होनेकी नहीं है, प्रत्युत योगकी है। अतः अब आगेके श्लोकमें उसी योगकी महिमा कहते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.45।।अनेकजन्मार्जितपुण्यसञ्चयैः संशुद्धकिल्बिषः संसिद्धः संजातः प्रयत्नाद् यतमानः तु योगी चलितः अपि पुनः परां गतिं याति एव।अतिशयितपुरुषार्थनिष्ठतया योगिनः सर्वस्माद् आधिक्यम् आह",
        "et": "6.45 Because of such excellence of Yoga, through accumulation of merit collected in many births the Yogin striving earnestly, becomes cleansed from stains. Having become perfected, he reaches the supreme state, even though he had once gone astray.\n\nSri Krsna now speaks of the superiority of the Yogin above all others because of his being devoted to the supreme goal of human existence."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.43  6.45।।तत्रेत्यादि परां गतिमित्यन्तम्।  संसिद्धौ मोक्षात्मिकायाम्।  अवशः परतन्त्र एव किल तेन पूर्वाभ्यासेन बलादेव योगाभ्यासं प्रति नीयते।  न चैतत् सामान्यम्।  योगजिज्ञासामात्रेणैव हि शब्दब्रह्मातिवृत्तिः मन्त्रस्वाध्यायादिरूपं च शब्दब्रह्म अतिवर्तते न स्वीकुरुते।ततः जिज्ञासानन्तरम् यत्नवान् अभ्यासक्रमेण देहान्ते वासुदेवत्वं प्राप्नोति।  न चासौ तेनैव देहेन सिद्ध इति मन्तव्यम्।  अपि तु बहूनि जन्मानि तेन तदभ्यस्तमिति मन्तव्यम्।  अत एव यस्य अनन्यव्यापारतया भगद्व्यापारानुरागित्वं स योगभ्रष्ट इति निश्चेयम् ( N निश्चेयः)।",
        "et": "6.43-45 Tatra  etc.  upto  param  gatim.  For a full success :  for emancipation. Being not a master of himself :  Indeed being exclusively under the control of other  [force],  he is forcibly driven towards the practice of Yoga by that  [mental  impression of his]  former practice.  This is not an ordinary  thing.  For, his act of passing over what  strengthens the  [sacred texual]  sound is only due to his desire for knowing the Yoga.  He passes over,  i.e.,  he does not undertake, what strengthens  the sound i.e.,  that which is of  the nature of  hymn-recitation  etc.  After that :  after  [the rise of]  desire for knowing  [Yoga].  Striving by method of practice,  he attains the Vasudevahood (identity with the  Surpeme)  at the time of destruction of  his body.  It should not be regarded that he has achieved success by [his pratice in] that single body gone.  Instead, it should be regarded that he had practised during  the course of many  a life-period.  Therefore, it may be conclude that the fallen-from-Yoga is he who craves continously for activities of  [attaining]  the Bhagavat by  abandoning all other activities.\t\t\t\n The superiority (or importance) of the Yoga, [the Lord] describes:"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.45।।योगित्व श्रेष्ठ किस कारणसे है  जो प्रयत्नपूर्वक  अधिक साधनमें लगा हुआ है वह विद्वान् योगी विशुद्धकिल्बिष अर्थात् अनेक जन्मोंमें थोड़ेथोड़े संस्कारोंको एकत्रितकर उन अनेक जन्मोंके सञ्चित संस्कारोंसे पापरहित होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुआ  सम्यक् ज्ञानको प्राप्त करके परमगति  मोक्षको प्राप्त होता है।",
        "sc": "।।6.45।। प्रयत्नात् यतमानः अधिकं यतमान इत्यर्थः। तत्र योगी विद्वान् संशुद्धकिल्बिषः विशुद्धकिल्बिषः संशुद्धपापः अनेकजन्मसंसिद्धः अनेकेषु जन्मसु किञ्चित्किञ्चित् संस्कारजातम् उपचित्य तेन उपचितेन अनेकजन्मकृतेन संसिद्धः अनेकजन्मसंसिद्धः ततः लब्धसम्यग्दर्शनः सन् याति परां प्रकृष्टां गतिम्।।यस्मादेवं तस्मात्",
        "et": "6.45 The yogi, the man of Knowledge; yatamanah, applying himself; prayatnat, assiduously, i.e. striving more intensely; and as a result, samsuddha-kilbisah, becoming purified from sin; and aneka-janma-samsiddhah, attaining perfection through many births- gathering together tendencies little by little in many births, and attaining perfection through that totality of impressions acired in many births; tatah, thery coming to have full Illumination; yati, achieves; the param, highest, most perfect; ;gatim, Goal.\nSince this is so, therefore."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.45।।योगजिज्ञासामात्रेण परब्रह्मप्राप्तिश्चेत् योगानुष्ठानवैयर्थ्यं स्यादित्यत एतदेवाशङ्क्य भगवतैवोत्तरं दत्तमित्याह  नैकेति। न योगजिज्ञासामात्रेणेत्यभिप्रायः। अत्र योगजिज्ञासोरपरामर्शात् कथं तद्विषयमेतदित्यतोऽध्याहारेण व्याचष्टे  जिज्ञासुरिति। ज्ञात्वा योगमिति शेषः। यतनानन्तरमनेकजन्मसंसिद्ध इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह  एवमिति। योगे सम्पूर्णे संसिद्धेर्विलम्बे कारणाभावादिति भावः। व्याख्यातार्थे पुराणसम्मतिमाह  आह चेति।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.45।।अयं चायतिरेव निर्दिष्टः। प्रयत्नान्मानसव्यापाराद्यतमानस्तु योगी भ्रंशाभावात् संशुद्धकिल्विषोऽनेकजन्मसंसिद्धः अनेकजन्मसु तत्त्वज्ञानवान् सन् ततोऽन्तिमजन्मनि सिद्धज्ञानतः परांगतिमक्षरं मत्स्वरूपं याति। यद्वाऽनेकजन्मविपाकेन भक्तिमान् भवति। ततो भक्तितः परां गतिं भगवद्धाम वैकुण्ठाख्यं याति। एवमेवोक्तं निबन्धेईश्वरालम्बनं योगो जनयित्वा तु तादृशम्। बहुजन्मविपाकेन भक्तिं जनयति ध्रुवम् इति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.45।।यदा चैवं प्रथमभूमिकायां मृतोऽपि अनेकभोगवासनाव्यवहितमपि विविधप्रमादकारणवति महाराजकुलेऽपि जन्म लब्ध्वापि योगभ्रष्टः पूर्वोपचितज्ञानसंस्कारप्राबल्येन कर्माधिकारमतिक्रम्य ज्ञानाधिकारी भवति तदा किमु वक्तव्यं द्वितीयायां तृतीयायां वा भूमिकायां मृतो विषयभोगान्ते लब्धमहाराजकुलजन्मा यदि वा भोगमकृत्वैव लब्धब्रह्मविद्ब्राह्मणकुलजन्मा योगभ्रष्टः कर्माधिकारातिक्रमेण ज्ञानाधिकारी भूत्वा तत्साधनानि संपाद्य तत्फललाभेन संसारबन्धनान्मुच्यत इति तदेतदाह  प्रयत्नात्पूर्वकृतादप्यधिकधिकं यतमानः प्रयत्नातिरेकं कुर्वन् योगी पूर्वोपचितसंस्कारवांस्तेनैव योगप्रयत्नपुण्येन संशुद्धकिल्बिषो धौतज्ञानप्रतिबन्धकपापमलः अतएव संस्कारोपचयात्पुण्योपचयाच्चानेकैर्जन्मभिः संसिद्धः संस्कारातिरेकेण पुण्यातिरेकेण च प्राप्तचरमजन्मा ततः साधनपरिपाकाद्याति परां प्रकृष्टां गतिं मुक्तिम्। नास्त्येवात्र कश्चित्संशय इत्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.45।।यदैवं मन्दप्रयत्नोऽपि योगी परां गतिं याति तदा यस्तु योगी प्रयत्नादुत्तरोत्तरमधिकं योगे यतमानो यत्नंकुर्वन्योगेनैव संशुद्धकिल्बिषो विधूतपापः सोऽनेकेषु जन्मसूपचितेन योगेन संसिद्धः सम्यग्ज्ञानी भूत्वा ततः श्रेष्ठां गतिं यातीति किं वक्तव्यमित्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.45।।इतश्च योगित्वं श्रेय इत्याह  प्रयत्नादिति। प्रयत्नादधिकयत्नात्प्रकर्षेण यत्नेन यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः संशुद्धपापाोऽनेकेषु जन्मसु किंचित्कंचित्संस्कारजातमुपचित्य तेनोपचितेनानेकजन्मकृतेन संसिद्धोऽनेकजन्मसंसिद्धस्ततः प्राप्ततत्त्वसाक्षात्कारः सन् परां मोक्षाख्यां गतिं याति। यत्तु तत इति तच्छब्देन प्रकृतं चलितमानसत्वं परामृशति। ततश्चलितमानसत्वाद्धेतोः। अयंभावः  चलितत्वदशायां काम्यानि कर्माणि यानि कृतानि तेषां प्रत्येकं फलदातृत्वात् युगपत्सर्वकर्मफलसंयोगासंभवात् एकैकस्य फलमनुभूय शुचीनां श्रीमतां योगिनां वा गेहे जन्मानुभूय पुनः कर्मयोगे यतमानः तत्तत्काम्यकर्मसंख्याकजन्मान्यनुभूय ज्ञानसंपन्नः सन् मोक्षं प्रतिपद्यत इति। प्रयत्नादिति कर्मणि ल्यब्लोपे पञ्चमी। प्रयत्नं प्राप्येत्यर्थः। कर्मयोगी कर्मानुष्ठाता। योगिनं विशिनष्टि  यतमान इति। उज्क्षितदर्प इत्यर्थः। शुचीनां श्रीमतां योगिनां वा कुलेऽहमुत्पन्न इत्यभिमानवर्जति इति भाव इति तच्चिन्त्यम्। निरर्थकाया ल्यब्लोपकल्पनायाः प्रकृष्टपरामर्शकल्पनाया उत्तरश्लोकेन सर्वतः श्रैष्ठ्येन वर्ण्यमानस्य योगिनः क्रमयोगिपरत्वेन वर्णनस्य जिज्ञासुरपीत्यननुरोधेन यतमानपदव्याख्यानस्य चायुक्तत्वादिति दिक्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.45।।तदेवं योगभ्रष्टस्य पुनः संसिद्धौ यत्नपर्यन्तमुक्तम् अथ तत एव तस्यात्मप्राप्तिलक्षणपरमपुरुषार्थयोगोऽभिधीयते  प्रयत्नात् इति।ततः इति पदं यथास्थानान्वये प्रयोजनाभावात्प्रकृतहेतुपरमाहयत इति। अनेकजन्मसंसिद्धः अनेकैर्जन्मभिः सम्यग्योगयोग्यो जात इत्यर्थः। तत्र हेतुः संशुद्धकिल्बिषत्वम्।प्रयत्नाद्यतमानस्तुइन्द्रियनियमनादिप्रयत्नेन योगे यतमानः इत्यपुनरुक्तिः। अथवाऽधिकं यतमान इत्यर्थः। तुशब्दद्योतितं पूर्वोक्तं व्यञ्जयितुंचलितोऽपीत्युक्तम्। चलितोऽपि पुनरिति वा ततः शब्दव्याख्या।परागतिम् इति योग एव वा तत्साध्यात्मप्राप्त्यादिर्वोच्यते।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.45।।एतादृशकुलजन्मभावेऽपि यत्नवा प्राप्नुयात् तत्र तादृक्कुलोत्पन्नप्राप्तौ किं वक्तव्यं इत्याह  प्रयत्नादिति। यः सामान्यो न तु तादृशजन्मवानेव प्रयत्नाद्यतमानः संशुद्धकिल्बिषः तद्भावज्ञानप्रतिबन्धपापरहितो योगी योगस्वरूपज्ञानवान् भवति। तु पुनः। अनेकजन्मसंसिद्धः अनेकजन्मभिर्यतमानः सन् सिद्धः प्राप्तयोगरूपो भवति। ततः परां गतिं दास्यरूपां याति प्राप्नोतीत्यर्थः। यतो मत्संयोगात्मको योग उत्तमस्तस्मात्त्वं योगी भवेति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.45।।एवं योगभ्रष्टगतिमुक्त्वा यो विषयैर्ह्रियमाणोऽपि प्रयत्नेन योगमेवाभ्यसितुं प्रवर्तते तस्य गतिमाह  प्रयत्नादिति। प्रयत्नात्प्रकृष्टाद्धठाद्वायुनिरोधाद्विरूपात्खेचर्यादिमुद्राविशेषाभ्यासाद्यो यतमानः संशुद्धकिल्बिषो निष्पापो भवति। यदाह मनुःप्राणायामैर्दहेदेनः इति। हठयोगानां सर्वेषां पापनिवृत्त्युपयोगित्वं न तत्त्वसाक्षात्कारे साक्षात्साधनत्वमित्यर्थः। अतएव सः अनेकैर्जन्मनि संसिद्धः प्राप्तयोगो भूत्वा ततः परां गतिं मोक्षं याति। एतेनचक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः इति पञ्चमान्ते यत्सूत्रितं तद्व्याख्यातम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "And when the yogī engages himself with sincere endeavor in making further progress, being washed of all contaminations, then ultimately, achieving perfection after many, many births of practice, he attains the supreme goal.",
        "ec": " A person born in a particularly righteous, aristocratic or sacred family becomes conscious of his favorable condition for executing yoga practice. With determination, therefore, he begins his unfinished task, and thus he completely cleanses himself of all material contaminations. When he is finally free from all contaminations, he attains the supreme perfection – Kṛṣṇa consciousness. Kṛṣṇa consciousness is the perfect stage of being freed of all contaminations. This is confirmed in the Bhagavad-gītā (7.28) : yeṣāṁ tv anta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛḍha-vratāḥ “After many, many births of executing pious activities, when one is completely freed from all contaminations, and from all illusory dualities, one becomes engaged in the transcendental loving service of the Lord.”"
    }
}
