{
    "_id": "BG6.44",
    "chapter": 6,
    "verse": 44,
    "slok": "पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः |\nजिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ||६-४४||",
    "transliteration": "pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśo.api saḥ .\njijñāsurapi yogasya śabdabrahmātivartate ||6-44||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.44।। उसी पूर्वाभ्यास के कारण वह अवश हुआ योग की ओर आकर्षित होता है। योग का जो केवल जिज्ञासु है वह शब्दब्रह्म का अतिक्रमण करता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.44 By that very former practice he is borne on in spite of himself. Even he who merely wishes to know Yoga goes beyond the Brahmic word.",
        "ec": "6.44 पूर्वाभ्यासेन former practice? तेन by that? एव verily? ह्रियते is borne? हि indeed? अवशः helpless? अपि even? सः he? जिज्ञासुः he who wishes to know Yoga? अपि even? योगस्य of Yoga? शब्दब्रह्म wordBrahman? अतिवर्तते goes beyond.Commentary The man who fell from Yoga is carried to the goal which he intended to reach in his previous birth? by the force of the Samskaras of the practice of Yoga though he may not be conscious of them and even if he may not be willing to adopt the course of Yogic discipline on account of the force of some evil Karma. If he had not done any great evil action which could overwhelm his Yogic tendencies he will certainly continue his Yogic practices in this birth very vigorously through the force of the Yogic Samskaras created by his Yogic practices in his previous birth. If the force of the evil action is stronger? the Yogic tendencies will be overpowered or suppressed for some time. As soon as the fruits of the evil actions are exhausted? the force of the Yogic Samskaras will begin to manifest itself. He will start his Yogic practices vigorously and attain the final beatitude of life.Even an enirer in whom a desire for information about Yoga is kindled goes beyond the Brahmic word? i.e.? the Vedas. He rises superior to the performer of the Vedic rituals and ceremonies. He is beyond the entanglement of forms and ceremonies. He is not satisfied with mere ritualism. He thirsts for a satisfaction higher than that given by the sensual objects. He who simply wishes to know the nature of the principles of Yoga frees himself from the SabdaBrahma? i.e.? from the effects of the Vedic rituals and ceremonies. If this be the case of a simple enirer? how much more exalted should be the condition of a real practitioner or knower of Yoga or of one who is established in Nirvikalpa Samadhi He will be absolutely free from the effects of the Vedic rituals and ceremonies. He will enjoy the eternal bliss and the everlasting peace of the Eternal.An aspirant who is desirous of obtaining Moksha alone is not affected by the sin of nonperformance of action even if he renounces all the obligatory and optional or occasional duties. He goes beyond the word of Brahman (the scripture or the Vedas).When such is the case of an aspirant who is without any spiritual inclinations or Samskaras of the previous birth? how much more exalted will be the state of that student who has done Yogic practices in his previous birth? who has fallen from Yoga in his previous birth? and who has taken up Yoga in this birth? renouncing all the worldly activitiesImpelled by the strong desire for liberation he practises rigorous Sadhana in this birth. He is constrained? as it were? by the force of the good Samskaras of his previous birth to take to Yogic practices in spite of himself.In this verse the Lord lays stress on the fact that no effort in the practice of Yoga goes in vain. Even the smallest effor will have its effect sooner or later in this birth or another. Therefore there is no cause for disappointment even for the dullest type of spiritual aspirant."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.44 Unconsciously he will return to the practices of his old life; so that he who tries to realise spiritual consciousness is certainly superior to one who only talks of it."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.44।। बैंक में हमारे खाते में जमा राशि वही होगी जो पासबुक में दर्शायी गयी होती है। बैंक से हमे उस राशि से अधिक धन नहीं प्राप्त हो सकता और न ही कम राशि दिखाकर हमें धोखा दिया जा सकता है। इसी प्रकार व्यक्ति के हृदय के विकास में भी कोई भी देवता उस व्यक्ति को उसके प्रयत्नों से अधिक न दे सकता है और न कुछ अपहरण कर सकता है। प्रतिदिन के जीवन में अनुभूत अखण्डता के समान ही प्रत्येक जन्म पूर्व जीवन की अगली कड़ी है। जैसे आज का दिन बीते हुए कल का विस्तार है। इस तथ्य को सम्यक् प्रकार से ध्यान में रखकर इस श्लोक का मनन करने पर इसका तात्पर्य सरलता से समझ में आ जायेगा।जिस व्यक्ति ने अपने पूर्व जन्म में योग साधना की होगी वह उस पूर्वभ्यास के कारण अपने आप अवश हुआ योग की ओर आकर्षित होगा। हमारे इस लोक के जीवन में भी इस तथ्य की सत्यता प्रमाणित होती है। एक शिक्षित तथा सुसंस्कृत व्यक्ति के व्यवहार और संभाषण में उसकी शिक्षा का प्रभाव सहज ही व्यक्त होता है जिसके लिए उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। कोई भी सुसंस्कृत व्यक्ति दीर्घकाल तक सफलतापूर्वक मूढ़ पुरुष का अभिनय नहीं कर सकता और उसी प्रकार न हीं एक दुष्ट व्यक्ति सभ्य पुरुष जैसा व्यवहार कर सकता है। कभीनकभी वे दोनों अनजाने ही अपने वास्तविक स्वभाव का परिचय सम्भाषण विचार और कर्म द्वारा व्यक्त कर देंगे।इसी प्रकार योगभ्रष्ट पुरुष भी जन्म लेने पर अवशसा हुआ स्वत ही योग की ओर खिंचा चला जायेगा। यदि जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं तब भी उन सभी में जिस सम और शान्त भाव में वह रहता है वह स्वयं उसके लिए भी एक आश्चर्य ही होता है।यह मात्र सिद्धांत नहीं है। समाज के सभी स्तरों के जीवन में इसका सत्यत्व प्रमाणित होता है। पूर्व संस्कारों की शक्ति अत्यन्त प्रबल होती है। एक लुटेरा भी दृढ़ निश्चयपूर्वक की गई साधना के फलस्वरूप आदि कवि बाल्मीकि बन गया। ऐसे अनेक उदाहरण हमें इतिहास में देखने को मिलते हैं। इन सबका सन्तोषजनक स्पष्टीकरण यही हो सकता है कि जीव का अस्तित्व देह से भिन्न है जो अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न शरीर धारण करता है। इसलिए उसके अर्जित संस्कारों का प्रभाव किसी देह विशेष में भी दृष्टिगोचर होता है।योगभ्रष्ट पुरुष पुन साधना मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। उसे चाहे राजसिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया जाय अथवा बाजार के कोलाहल या किसी गली के असम्मान पूर्ण स्थान पर बैठा दिया जाय सभी स्थानों पर उसकी सहृदयता और उसका दार्शनिक स्वभाव छिपा नहीं रह सकता। चाहे वह संसार की समस्त सम्पत्ति का स्वामी हो जाये चाहे राजसत्ता की असीम शक्ति उसे प्राप्त हो जाये चाहे अपार आदर और स्नेह उसे मिले किन्तु इन समस्त प्रलोभनों के द्वारा उसे योगमार्ग से विचलित नहीं किया जा सकता। यदि सम्पूर्ण जगत् उसके विचित्र व्यवहार एवं असामान्य आचरण को विस्मय से देखता हो तो वह स्वयं भी अपनी ओर सबसे अधिक आश्चर्य से देख रहा होता है इस ध्यानयोग की महत्ता को दर्शाते हुए भगवान् कहते हैं कि जो केवल योग का जिज्ञासु है वह शब्दब्रह्म का अतिक्रमण कर जाता है। श्रीशंकराचार्य के अनुसार शब्दब्रह्म से तात्पर्य वेदों के कर्मकाण्ड से है जहाँ विभिन्न प्रकार के फल प्राप्त करने के लिए यज्ञयागादि साधन बताये गये है। अर्थ यह हुआ कि जो केवल जिज्ञासु है वह इन सब फलों की कामना से मुक्त हो जाता है तब फिर ज्ञानी के विषय में क्या कहनाकिस कारण से योगी श्रेष्ठ है इस पर कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.44. Being not a master of himself, he is dragged only by that former practice (its mental impression); only a seeker of the knowledge of the Yoga passes over what strengthens the [sacred] text."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.44 By the power of his earlier practice, he is carried forward even against his will. Even though he is an enirer about Yoga, he transcends the Sabda-brahman i.e., Prakrti or matter."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.44 For, by that very past practice, he is carried forward even in spite of himself! Even a seeker of Yoga transcends the result of the performance of Vedic rituals!"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.44।।योगस्य जिज्ञासुरपि। ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते। परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.44।।यदि पूर्वसंस्कारोऽस्येच्छामुपनयन्न प्रवर्तयति तथाच प्रवृत्तिरनिच्छया स्यादित्याशङ्क्याह  पूर्वेति। स हि योगभ्रष्टः समनन्तरजन्मकृतसंस्कारवशादुत्तरस्मिञ्जन्मनि अनिच्छन्नपि योगं प्रत्येवाकृष्टो भवतीत्यर्थः। तत्र कैमुतिकन्यायं सूचयति  जिज्ञासुरिति। पूर्वार्धं विभजते  यः पूर्वेति। तस्मान्नेच्छया तस्य प्रवृत्तिरिति शेषः। योगभ्रष्टस्याधर्मादिप्रतिबन्धेऽपि तर्हि पूर्वाभ्यासवशाद्बुद्धिसंबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह  नेत्यादिना। यदि योगभ्रष्टेन योगाभ्यासजनितसंस्कारप्राबल्यात्प्रबलमरधर्मप्रभेदरूपं कर्म न कृतं स्यात्तदा तेन संस्कारेण वशीकृतः सन्निच्छादिरहितोऽपि बुद्धिसंबन्धभाग्भवतीत्यर्थः। विपक्षे योगसंस्कारस्याभिभूतत्वान्न कार्यारम्भकत्वमित्याह  अधर्मश्चेदिति। योगजसंस्कारस्याधर्माभिभूतस्य कार्यमकृत्वैवाभिभावकप्राबल्ये प्रणाशः स्यादित्याशङ्क्याह  तत्क्षये त्विति। कालव्यवधानान्निवृत्तिं शङ्कित्वोक्तं  नेति। तृणजलायुकादृष्टान्तश्रुत्या संस्कारस्य दीर्घतायाः समधिगतत्वादिति भावः। कैमुतिकन्यायोक्तिपरमुत्तरार्धं विभजते  जिज्ञासुरपीत्यादिना। अत्रापि संन्यासीति विशेषणं पूर्ववदवधेयमित्याह  सामर्थ्यादिति। नहि कर्मी कर्ममार्गे प्रवृत्तस्ततो भ्रष्टः शङ्कितुं शक्यते अतः संन्यासी पूर्वोक्तैर्विशेषणैर्विशिष्टो योगभ्रष्टोऽभीष्टः सोऽपि वैदिकं कर्म तत्फलं चातिवर्तते किमुत योगं बुद्ध्वा तन्निष्ठः सदाभ्यासं कुर्वन्कर्म तत्फलं चातिवर्तत इति वक्तव्यमिति योजना। योगनिष्ठस्य कर्मतत्फलातिवर्तनं ततोऽधिकफलावाप्तिर्विवक्ष्यते।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.44।। वह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है।",
        "hc": "।।6.44।। व्याख्या--पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः--योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टको जैसी साधनकी सुविधा मिलती है, जैसा वायुमण्डल मिलता है, जैसा सङ्ग मिलता है, जैसी शिक्षा मिलती है, वैसी साधनकी सुविधा, वायुमण्डल, सङ्ग, शिक्षा आदि श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवालोंकोनहीं मिलती। परन्तु स्वर्गादि लोकोंमें जानेसे पहले मनुष्यजन्ममें जितना योगका साधन किया है, सांसारिक भोगोंका त्याग किया है, उसके अन्तःकरणमें जितने अच्छे संस्कार पड़े हैं, उस मनुष्य-जन्ममें किये हुए अभ्यासके कारण ही भोगोंमें आसक्त होता हुआ भी वह परमात्माकी तरफ जबर्दस्ती खिंच जाता है।'अवशोऽपि' कहनेका तात्पर्य है कि वह श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेसे पहले बहुत वर्षोंतक स्वर्गादि लोकोंमें रहा है। वहाँ उसके लिये भोगोंकी बहुलता रही है और यहाँ (साधारण घरोंकी अपेक्षा) श्रीमानोंके घरमें भी भोगोंकी बहुलता है। उसके मनमें जो भोगोंकी आसक्ति है, वह भी अभी सर्वथा मिटी नहीं है, इसलिये वह भोगोंके परवश हो जाता है। परवश होनेपर भी अर्थात् इन्द्रियाँ, मन आदिका भोगोंकी तरफ आकर्षण होते रहनेपर भी पूर्वक अभ्यास आदिके कारण वह जबर्दस्ती परमात्माकी तरफ खिंच जाता है। कारण यह है कि भोग-वासना कितनी ही प्रबल क्यों न हो, पर वह है 'असत्' ही। उसका जीवके सत्स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है। जितना ध्यानयोग आदि साधन किया है, साधनके जितने संस्कार हैं वे कितने ही साधारण क्यों न हों, पर वे हैं 'सत्' ही। वे सभी जीवके सत्स्वरूपके अनुकूल हैं। इसलिये वे संस्कार भोगोंके परवश हुए योगभ्रष्टको भीतरसे खींचकर परमात्माकी तरफ लगा ही देते हैं।'जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते'--इस प्रकरणमें अर्जुनका प्रश्न था कि साधनमें लगा हुआ शिथिल प्रयत्नवाला साधक अन्तसमयमें योगसे विचलित हो जाता है तो वह योगकी संसिद्धिको प्राप्त न होकर किस गतिको जाता है अर्थात् उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? इसके उत्तरमें भगवान्ने इस लोकमें और परलोकमें योगभ्रष्टका पतन न होनेकी बात इस श्लोकके पूर्वार्धतक कही। अब इस श्लोकके उत्तरार्धमें योगमें लगे हुए योगीकी वास्तविक महिमा कहनेके लिये योगके जिज्ञासुकी महिमा कहते हैं।जब योगका जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्म और उनके फलोंका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् उनसे ऊपर उठ जाता है, फिर योगभ्रष्टके लिये तो कहना ही क्या है! अर्थात् उसके पतनकी कोई शङ्का ही नहीं है। वह योगमें प्रवृत्त हो चुका है; अतः उसका तो अवश्य उद्धार होगा ही।\n\nयहाँ 'जिज्ञासुरपि योगस्य' पदोंका अर्थ होता है कि जो अभी योगभ्रष्ट भी नहीं हुआ है और योगमें प्रवृत्त भी नहीं हुआ है; परन्तु जो योग-(समता-) को महत्त्व देता है और उसको प्राप्त करना चाहता है--ऐसा योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्मका (टिप्पणी प0 381) अर्थात् वेदोंके सकाम कर्मके भागका अतिक्रमण कर जाता है।योगका जिज्ञासु वह है, जो भोग और संग्रहको साधारण लोगोंकी तरह महत्त्व नहीं देता, प्रत्युत उनकी अपेक्षा करके योगको अधिक महत्त्व देता है। उसकी भोग और संग्रहकी रुचि मिटी नहीं है, पर सिद्धान्तसे योगको ही महत्त्व देता है। इसलिये वह योगारूढ़ तो नहीं हुआ है, पर योगका जिज्ञासु है, योगको प्राप्त करना चाहता है। इस जिज्ञासामात्रका यह माहात्म्य है कि वह वेदोंमें कहे सकाम कर्मोंसे और उनके फलसे ऊँचा उठ जाता है। इससे सिद्ध हुआ कि जो यहाँके भोगोंकी और संग्रहकी रुचि सर्वथा मिटा न सके और तत्परतासे योगमें भी न लग सके, उसकी भी इतनी महत्ता है, तो फिर योगभ्रष्टके विषयमें तो कहना ही क्या है! ऐसी ही बात भगवान्ने दूसरे अध्यायके चालीसवें श्लोकमें कही है कि योग-(समता-) का आरम्भ भी नष्ट नहीं होता और उसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है अर्थात् कल्याण कर देता है। फिर जो योगमें प्रवृत्त हो चुका है, उसका पतन कैसे हो सकता है? उसका तो कल्याण होगा ही, इसमें सन्देह नहीं है।\n\nविशेष बात\n\n(1) 'योगभ्रष्ट' बहुत विशेषतावाले मनुष्यका नाम है। कैसी विशेषता? कि मनुष्योंमें हजारों और हजारोंमें कोई एक सिद्धिके लिये यत्न करता है (गीता 7। 3) तथा सिद्धिके लिये यत्न करनेवाला ही योगभ्रष्ट होता है।योगमें लगनेवालेकी बड़ी महिमा है। इस योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है अर्थात् ऊँचे-से-ऊँचे ब्रह्मलोक आदि लोकोंसे भी उसकी अरुचि हो जाती है। कारण कि ब्रह्मलोक आदि सभी लोक पुनरावर्ती है और वह अपुनरावर्ती चाहता है। जब योगकी जिज्ञासामात्र होनेकी इतनी महिमा है, तो फिर योगभ्रष्टकी कितनी महिमा होनी चाहिये! कारण कि उसके उद्देश्यमें योग (समता) आ गयी है, तभी तो वह योगभ्रष्ट हुआ है।इस योगभ्रष्टमें महिमा योगकी है, न कि भ्रष्ट होनेकी। जैसे कोई 'आचार्य' की परीक्षामें फेल हो गया हो, वह क्या 'शास्त्री' और 'मध्यमा' की परीक्षामें पास होनेवालेसे नीचा होगा? नहीं होगा। ऐसे ही जो योगभ्रष्ट हो गया है, वह सकामभावसे बड़े-बड़े यज्ञ, दान, तप आदि करनेवालोंसे नीचा नहीं होता प्रत्युत बहुत श्रेष्ठ होता है। कारण कि उसका उद्देश्य समता हो गया है। बड़ेबड़े यज्ञ दान तपस्या आदि करनेवालोंको लोग बड़ा मानते हैं, पर वास्तवमें बड़ा वही है, जिसका उद्देश्य समताका है। समताका उद्देश्यवाला शब्दब्रह्मका भी अतिक्रमण कर जाता है।इस योगभ्रष्टके प्रसङ्गसे साधकोंको उत्साह दिलानेवाली एक बड़ी विचित्र बात मिलती है कि अगर साधक 'हमें तो परमात्माकी प्राप्ति ही करनी है'--ऐसा दृढ़तासे विचार कर लें, तो वे शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जायँगे!\n\n(2) यदि साधक आरम्भमें 'समताको' प्राप्त न भी कर सके, तो भी उसको अपनी रुचि या उद्देश्य समताप्राप्तिका ही रखना चाहिये; जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं-- मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी।\nचहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।।(मानस 1। 8। 4) तात्पर्य यह है कि साधक चाहे जैसा हो, पर उसकी रुचि या उद्देश्य सदैव ऊँचा रहना चाहिये। साधककी रुचि या उद्देश्यपूर्तिकी लगन जितनी तेज, तीव्र होगी, उतनी ही जल्दी उसके उद्देश्यकी सिद्धि होगी। भगवान्का स्वभाव है कि वे यह नहीं देखते कि साधक करता क्या है, प्रत्युत यह देखते हैं कि साधक चाहता क्या है-- ।  रीझत राम जानि जन जी की।।\nरहति न प्रभु चित चूक किए की।\nकरत सुरति सय बार हिए की।।(मानस 1। 29। 2 3)एक प्रज्ञाचक्षु सन्त रोज मन्दिरमें (भगवद्विग्रहका दर्शन करने) जाया करते थे। एक दिन जब वे मन्दिर गये, तब किसीने पूछ लिया कि आप यहाँ किसलिये आते हैं? सन्तने उत्तर दिया कि दर्शन करनेके लिये आता हूँ। उसने कहा कि आपको तो दिखायी ही नहीं देता! सन्त बोले--मुझे दिखायी नहीं देता तो क्या भगवान्को भी दिखायी नहीं देता? मैं उन्हें नहीं देखता, पर वे तो मुझे देखते हैं; बस, इसीसे मेरा काम बन जायगा! इसी तरह हम समताको प्राप्त भले ही न कर सकें, फिर भी हमारी रुचि या उद्देश्य समताका ही रहना चाहिये, जिसको भगवान् देखते ही हैं! अतः हमारा काम जरूर बन जायगा।\n\n सम्बन्ध--श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेके बाद जब वह योगभ्रष्ट परमात्माकी तरफ खिंचता है, तब उसकी क्या दशा होती है? यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.44।।तेन पूर्वाभ्यासेन पूर्वेण योगविषयेण अभ्यासेन सः योगभ्रष्टो हि अवशः अपि योगे एव ह्रियते प्रसिद्धं हि एतद् योगमाहात्म्यम् इत्यर्थः। अप्रवृत्तयोगोयोगजिज्ञासुः अपि ततः चलितमानसः पुनरपि ताम् एव जिज्ञासां प्राप्य कर्मयोगादिकं योगम् अनुष्ठाय शब्दब्रह्म अतिवर्तते।शब्दब्रह्म देवमनुष्यपृथिव्यन्तरिक्षस्वर्गादिशब्दाभिलापयोग्यं ब्रह्म प्रकृतिः प्रकृतिसम्बन्धाद् विमुक्तो देवमनुष्यादिशब्दाभिलापानर्हं ज्ञानानन्दैकतानम् आत्मानं प्राप्नोति इत्यर्थः।यत एवं योगमाहात्म्यम् ततः",
        "et": "6.43 - 6.44 There, in that existence, he regains the mental disposition for Yoga that he had in the previous birth. Like one awakened from sleep, he strives again from where he had left before attaining complete success. He strives so as not to be defeated by impediments. This person who has fallen away from Yoga is borne on towards Yoga alone by his previous practice, i.e., by the older practice with regard to Yoga. This power of Yoga is well known.\n\nEven a person, who has not engaged in Yoga but has only been desirous of knowing Yoga, i.e., has failed to follow it up, acries once again the same desire to practise Yoga. He then practises Yoga, of which the first stage is Karma Yoga, and transcends Sabda-brahman (or Brahman which is denotable by words). The Sabda-brahman is the Brahman capable of manifesting as gods, men, earth, sky, heaven etc., namely, Prakrti. The meaning is that having been liberated from the bonds of Prakrti, he attains the self which is incapable of being named by such words as gods, men etc., and which comprises solely of knowledge and beatitude.\n\nAfter thus describing the glory of Yoga the verse says:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.43  6.45।।तत्रेत्यादि परां गतिमित्यन्तम्।  संसिद्धौ मोक्षात्मिकायाम्।  अवशः परतन्त्र एव किल तेन पूर्वाभ्यासेन बलादेव योगाभ्यासं प्रति नीयते।  न चैतत् सामान्यम्।  योगजिज्ञासामात्रेणैव हि शब्दब्रह्मातिवृत्तिः मन्त्रस्वाध्यायादिरूपं च शब्दब्रह्म अतिवर्तते न स्वीकुरुते।ततः जिज्ञासानन्तरम् यत्नवान् अभ्यासक्रमेण देहान्ते वासुदेवत्वं प्राप्नोति।  न चासौ तेनैव देहेन सिद्ध इति मन्तव्यम्।  अपि तु बहूनि जन्मानि तेन तदभ्यस्तमिति मन्तव्यम्।  अत एव यस्य अनन्यव्यापारतया भगद्व्यापारानुरागित्वं स योगभ्रष्ट इति निश्चेयम् ( N निश्चेयः)।",
        "et": "6.44 See Comment under 6.45"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.44।।पहले शरीरकी बुद्धिसे उसका संयोग कैसे होता है सो कहते हैं  क्योंकि वह योगभ्रष्ट पुरुष परवश हुआ भी पूर्वाभ्यासके द्वारा अर्थात् जो पहले जन्ममें किया हुआ अभ्यास है उस अति बलवान् पूर्वाभ्यासके द्वारा योगकी ओर खींच लिया जाता है। यदि योगाभ्यासके संस्कारोंकी अपेक्षा अधिक बलवान् अधर्मादि कर्म न किये हों तो वह योगाभ्यासजनित संस्कारोंसे खिंच जाता है और यदि अधिक बलवान् अधर्म किया हुआ होता है तो उससे योगजन्य संस्कार भी दब ही जाते हैं। परंतु उस पापकर्मका क्षय होनेपर योगजन्य संस्कार स्वयं ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। बहुत बालतक दबे रहनेपर भी उसका नाश नहीं होता। जो योगका जिज्ञासु भी है अर्थात् जो योगके स्वरूपको जाननेकी इच्छा करके योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी है वह भी शब्दब्रह्मको अर्थात् वेदमें कहे हुए कर्मफलको अतिक्रम कर जाता है फिर जो योगको जानकर उसमें स्थित हुआ अभ्यास करता है उसका तो कहना ही क्या है। यहाँ प्रसंगकी शक्तिसे जिज्ञासुका अर्थ संन्यासी किया गया है।",
        "sc": "।।6.44।। यः पूर्वजन्मनि कृतः अभ्यासः सः पूर्वाभ्यासः तेनैव बलवता ह्रियते संसिद्धौ हि यस्मात् अवशोऽपि सः योगभ्रष्टः न कृतं चेत् योगाभ्यासजात् संस्कारात् बलवत्तरमधर्मादिलक्षणं कर्म तदा योगाभ्यासजनितेन संस्कारेण ह्रियते अधर्मश्चेत् बलवत्तरः कृतः तेन योगजोऽपि संस्कारः अभिभूयत एव तत्क्षये तु योगजः संस्कारः स्वयमेव कार्यमारभते न दीर्घकालस्थस्यापि विनाशः तस्य अस्ति इत्यर्थः। अतः जिज्ञासुरपि योगस्य स्वरूपं ज्ञातुमिच्छन् अपि योगमार्गे प्रवृत्तः संन्यासी योगभ्रष्टः सामर्थ्यात् सोऽपि शब्दब्रह्म वेदोक्तकर्मानुष्ठानफलम् अतिवर्तते अतिक्रामति अपाकरिष्यति किमुत बुद्ध्वा यः योगं तन्निष्ठः अभ्यासं कुर्यात्।।कुतश्च योगित्वं श्रेयः इति",
        "et": "6.44 Hi, for; tena eva, by that very; purva-abhyasena, past practice-the powerful habit formed in the past life; hiryate, he, the yogi who had fallen from Yoga, is carried forward; avasah api, even inspite of himself. If he had not committed any act which could be characterized as unrigtheous etc. and more powerful than the tendency created by the practice of Yoga, then he is carried forward by the tendency created by the practice of Yoga. If he had committed any unrighteous act which was more powerful, then, even the tendency born of Yoga gets surely overpowered. But when that is exhausted, the tendency born of Yoga begins to take effect by itself. The idea is that it does not get destroyed, even though it may lie in abeyance over a long period.\nJijnasuh api, even a seeker; yogasya, of Yoga from the force of the context, the person implied is a monk who had engaged in the path of Yoga with a desire to known his true nature, but had falled from Yoga-; ;even he, ativartate, trascends-will free himself from; sabda-brahma, the result of the performance of Vedic ritual. What to speak of him who after understanding Yoga, may undertake it with steadfastness!\nAnd why is the state of Yoga higher?"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.44।।उप्रत्यययोगेन लोकाव्यय   अष्टा.2।3।69 इति षष्ठीनिषेधात् योगस्य स्वरूपमित्यध्याहृत्य कश्चिद्व्याख्यातवान्। श्रमो वृथैवनञा निर्दिष्टमनित्यम् इत्यस्यानित्यत्वात्। अतः कात्यायनोद्विषः शतुर्वा वचनं अष्टा.2।3।69 वार्तिकं इत्याद्यवोचदित्यभिप्रेत्याह  योगस्येति।ब्रह्मजिज्ञासा ब्र.सू.1।1।1 इत्यादाविव विचारार्थताशङ्कानिरासाय व्याचष्टे  ज्ञातव्य इति। अतीवेत्युप्रत्ययस्यार्थः।सनाशंसभिक्षउः अष्टा.3।3।168 इति तच्छीलादौ तस्य विहितत्वात् इच्छार्थे बाधकाभावादिति भावः।शब्दब्रह्मातिवर्तते इत्येतद्वेदोक्तकर्मकारिभ्योऽतिरिच्यत इति कश्चिद्व्याचष्टे तदसत्।ततो याति परां गतिम् 16।22 इत्यस्यार्थस्य परामर्शादिति भावेनाह  शब्देति। शब्दब्रह्मशब्देन वैदिकविधिनिषेधावत्रोच्येते। तदतिवर्तनं परंब्रह्मप्राप्तस्यैवेत्यत एवमुक्तम्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.44।।पूर्वदेहकृताभ्यासेनावशोऽपि कुतश्चिदन्तरायादनिच्छन्नपि ह्रियते विषयेभ्यः परावृत्त्य योगनिष्ठः क्रियते। किञ्च कैमुत्येन दृढयति  जिज्ञासुरपीति। यः कश्चिद्योगस्य जिज्ञासावानपि भवति सोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्त्तते शब्दब्रह्मातिक्राम्यति परमहंस इव सम्पूजितो भवति। किमुत तन्निष्ठः शब्दब्रह्मातिलङ्घनो भवतीति वक्तव्यम् यद्वा शब्दब्रह्मातिवर्त्ततेऽर्थात्परं ब्रह्म शब्दब्रह्मतात्पर्यभूतं पारोक्ष्येण जानाति तत्प्रभावेणेत्यर्थः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.44।।ननु यो ब्रह्मविदां ब्राह्मणानां सर्वप्रमादकारणशून्ये कुले समुत्पन्नस्तस्य मध्ये विषयभोगव्यवधानाभावादव्यवहितप्राग्भवीयसंस्कारोद्वोधात्पुनरपि सर्वकर्मसंन्यासपूर्वको ज्ञानसाधनलाभो भवतु नाम। यस्तु श्रीमतां महाराजचक्रवर्तिनां कुले बहुविधविषयभोगव्यवधानेनोत्पन्नस्तस्य विषयभोगवासनाप्राबल्यात्प्रमादकारणसंभवाच्च कथमतिव्यवहितज्ञानसंस्कारोद्बोधः क्षत्रियत्वेन सर्वकर्मसंन्यासानर्हस्य कथं वा ज्ञानसाधनलाभ इति। तत्रोच्यते  अतिचिरव्यवहितजन्मोपचितेनापि तेनैव पूर्वाभ्यासेन प्रागर्जितज्ञानसंस्कारेणावशोऽपि मोक्षसाधनायाप्रयतमानोऽपि ह्रियते स्ववशीक्रियते अकस्मादेव भोगवासनाभ्यो व्युत्थाप्य मोक्षसाधनोन्मुखः क्रियते ज्ञानवासनाया एवाल्पकालाभ्यस्ताया अपि वस्तुविषयत्वेनावस्तुविषयाभ्यो भोगवासनाभ्यः प्राबल्यात्। पश्य यथा त्वमेव युद्धे प्रवृत्तो ज्ञानायाप्रयतमानोऽपि पूर्वसंस्कारप्राबल्यादकस्मादेव रणभूमौ ज्ञानोन्मुखोऽभूरिति। अतएव प्रागुक्तं नेहाभिक्रमनाशोऽस्तीति। अनेकजन्मसहस्रव्यवहितोऽपि ज्ञानसंस्कारः स्वकार्यं करोत्येव सर्वविरोध्युपमर्देनेत्यभिप्रायः। सर्वकर्मसंन्यासाभावेऽपि हि क्षत्रियस्य ज्ञानाधिकारः स्थित एव। यथा पाटच्चरेण बहूनां रक्षिणां मध्ये विद्यमानमप्यश्वादिद्रव्यं स्वयमनिच्छदपि तान्सर्वानभिभूय स्वसामर्थ्यविशेषादेवापह्रियते पश्चात्तु कदापहृतमिति विमर्शो भवति एवं बहूनां ज्ञानप्रतिबन्धकानां मध्ये विद्यमानोऽपि योगभ्रष्टः स्वयमनिच्छन्नपि ज्ञानसंस्कारेण बलवता स्वसामर्थ्यविशेषादेव सर्वान्प्रतिबन्धकानभिभूयात्मवशीक्रियत इति हृञः प्रयोगेण सूचितम्। अतएव संस्कारप्राबल्याज्जिज्ञासुर्ज्ञातुमिच्छुरपि योगस्य मोक्षसाधनज्ञानस्य विषयं ब्रह्मज्ञानं प्रथमभूमिकायां स्थितः संन्यासीति यावत्। सोऽपि तस्यामेव भूमिकायां मृतोऽन्तराले बहून्विषयान्भुक्त्वा महाराजचक्रवर्तिनां कुले समुत्पन्नोऽपि योगभ्रष्टः प्रागुपचितज्ञानसंस्कारप्राबल्यात्तस्मिञ्जन्मनि शब्दब्रह्म वेदं कर्मप्रतिपादकमतिवर्ततेऽतिक्रम्य तिष्ठति। कर्माधिकारातिक्रमेण ज्ञानाधिकारी भवतीत्यर्थः। एतेनापि ज्ञानकर्मसमुच्चयो निराकृत इति द्रष्टव्यम्। समुच्चये हि ज्ञानिनोऽपि कर्मकाण्डातिक्रमाभावात्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.44।।तत्र हेतुः  पूर्वेति। तेनैव पूर्वदेहकृताभ्यासेनावशोऽपि कुतश्चिदन्तरायादनिच्छन्नपि संह्रियते। विषयेभ्यः परावर्त्य ब्रह्मनिष्ठः क्रियते। तदेवं पूर्वाभ्यासवशेन प्रयत्नं कुर्वञ्शनैर्मुच्यत इतीममर्थं कैमुत्यन्यायेन स्फुटयति  जिज्ञासुरिति सार्धेन। योगस्य स्वरूपं जिज्ञासुरेव केवलं नतु प्राप्तयोगः। एवंभूतो योगे प्रविष्टमात्रोऽपि पापवशाद्योगभ्रष्टोऽपि शब्दब्रह्म वेदमतिवर्तते वेदोक्तकर्मफलान्यतिक्रामति। तेभ्योऽधिकं फलं प्राप्य मुच्यत इत्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.44।।कथंभूतं बुद्धिसंयोगं लभत इत्यपेक्षायां तेनैव पूर्वाभ्यासेनावशस्यापि योगभ्रष्टस्य बुद्धिंप्रत्येवाहरणरुपमित्याह  पूर्वेति। यः पूर्व जन्मानि कृतोऽभ्यासः तेनैव बलवता हि यसमादवशः पित्राद्यधीनोऽपि सः योगभ्रष्टो ह्नियते स्ववशीक्रियते योगाभ्याससंस्कारात् बलवत्तरस्याधर्मस्य प्रतिबन्धकस्याभावात् प्रतिबन्धे सत्यपि पूर्वाभ्यासस्तत्क्षयः प्रतीक्षते। ननु तस्य नाशोऽस्ति। एतदेव कैमुत्येन द्रढयति। योगस्य जिज्ञासुर्नतु यतमानो योगी सोऽपि शब्दब्रह्म वेदोक्तकर्मानुष्ठानफलमतिवर्तते मुञ्चति किमुत यो योगं ज्ञात्वा तन्निष्ठोभ्यासं कुर्यात्। एतेन ननु योगिनां दरिद्राणां कुले जातस्य बुद्धिसंयोगोऽस्तु नाम शुचीनां श्रीमतां कुले उत्पन्नस्य द्रव्यजनितभोगादिप्रतिबन्धवशाद्धुद्धिसंयोगो न भविष्यतीत्याङ्कापि परास्ता।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.44।।तेनेत्यस्यार्थोयोगविषयेणेति।तेनैव इत्यवधारणफलितमाह  योग एव ह्रियत इति। हिशब्दार्थमाहप्रसिद्धमिति। प्रसिद्धिश्चादिभरतविदुरभीष्मादिवृत्तान्तेषु द्रष्टव्या। पार्थकुरुनन्दनशब्दाभ्यामुभयकुलशुद्ध्यादिसूचकाभ्यामर्जुनस्यापि शुचीनां श्रीमतामित्याद्यन्वयः सूचितः।जिज्ञासुः इत्यादिप्रकरणवशाद्वासनया विच्छिन्नघटकत्वप्रदर्शनार्थमित्याह  अप्रवृत्तेति।जिज्ञासुरपि इति सन्नन्तापिशब्दयोः सामर्थ्यात्  अप्रवृत्तयोग इत्युक्तम्। यद्यपिन लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् अष्टा.2।3।69 इति कर्मणि षष्ठीनिषेधः तथाप्यत्र सम्बन्धसामान्यविवक्षयायोगस्य इति षष्ठी। योगिनश्चलितस्य योगः प्रक्रान्तयोगस्य चलितस्थ तत्प्रक्रमः योगमारुरुक्षोश्चलितस्यारुरुक्षेति तत्तदवस्थानुरूपं प्रति समाधानमिति भावः।कर्मयोगादिकं कर्मयोगज्ञानयोगावित्यर्थः। यद्वा कर्मयोग उपक्रमो यस्यात्मसाक्षात्काररूपस्य योगस्य स तथोक्तः। ब्रह्मशब्दोऽत्र न परब्रह्मविषयः तस्यातिवर्तनीयत्वानुपपत्तेःशब्दब्रह्म इति विशेषणायोगाच्च। अत एव न जीवविषयः नापि वेदविषयः तस्याप्यनिवर्तनीयत्वानिरूपणात्। नापि लक्षणया वेदप्रतिपाद्यकर्मविषयः तत्फलविषयो वा तत्रापि वेदे ब्रह्मशब्दस्य गौणः प्रयोगः तदस्य परस्ताल्लक्षणा उपनिषदंशात्सङ्कोच इति बहुदोषप्रसङ्गात्। नापि शब्दजन्यं ज्ञानमात्रं शब्दब्रह्म योगं जिज्ञासोस्तदतिवृत्तेर्विरुद्धत्वात्।स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत् वि.पु.6।62 इत्यादिप्रकोपप्रसङ्गाच्च। योगमारुरुक्षुः पुरुषः शब्दश्रवणजनितज्ञानमात्रवतः पुरुषादधिकःब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः। कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः मनुः1।97 इतिवदिति चेत्   तदपि न अध्याहाराद्यापातात् अप्रस्तुताभिधानप्रसङ्गात् पूर्वोत्तरवाक्यानन्वयाच्च। अतः प्रकृतावपि ब्रह्मशब्दप्रयोगस्यात्रापि प्राचुर्यादतिवर्तनीयत्वौचित्याच्च ब्रह्मशब्दोऽत्र प्रकृतिविषयः। तस्या एव भोग्यभोगोपकरणभोगस्थानाख्यपरिणामप्रदर्शनायशब्दब्रह्म इति व्यपदेशः। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः। नामानि कृत्वा तै.आ.3।12।7 इत्यादिश्रुतेः। विभक्तरूपा हि प्रकृतिर्देवादिशब्दाभिलप्या तदेतदखिलमभिप्रेत्यदेवमनुष्येत्यादिकमुक्तम्। प्रकृत्यतिवर्तनशब्दार्थं फलितं च दर्शयतिप्रकृतिसम्बन्धादिति।देवमनुष्येत्यादिनापुमान्न देवो न नरः वि.पु.2।13।98 इत्यादिकं स्मारितम्।ज्ञानानन्दैकतानमित्यनेन चनाहं देवो न मर्त्यो वा न तिर्यक् स्थावरोऽपि वा। ज्ञानानन्दमयस्त्वात्मा शेषो हि परमात्मनः पां.रा. इत्यादिकम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.44।।ननु भूयोऽपि यत्ने पूर्ववदेव चेत्स्यात्तदा किं जन्मना यत्नेन चेत्याशङ्क्याह  पूर्वाभ्यासेनेति। तेनैव पूर्वाभ्यासेन श्रद्धामयेन अवशोऽपि तादृक्कुलजन्मप्राप्त्या कुलरीत्यापि अन्यभावेभ्यो हीयते परावर्त्तते भगवत्संयोगरसनिष्ठः क्रियत इति भावः। ननु पूर्वप्रवृत्त्या श्रद्धायुक्तया चेन्न सिद्धिरभूत् तदा कथमिदानीं तेनैव साधनेन सिद्धिर्भविष्यति इत्याशङ्क्याह  जिज्ञासुरपीति। योगस्य स्वरूपजिज्ञासुरेव शब्दब्रह्म नामरूपात्मकं विप्रयोगसामयिकजीवनहेतुरूपमतिवर्त्तते अतिक्रामति। परमक्लेशाविर्भावेन गुणगानादित्यागेन लौकिकदेहत्यागेनालौकिकदेहमाप्नोतीति भावः। तथा चायमर्थः  पूर्वश्रद्धया प्रवृत्तस्तु योगजिज्ञासया न प्रवृत्तः किन्तु साधारण्येन वाक्यश्रद्धयैव प्रवृत्तौ तेन सिद्धिरभूत्। अधुना तूत्तमकुलजन्माप्त्या तत्स्वरूपं कुरुते अतः प्राप्स्यतीति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.44।।कुतो यतते शिक्षितोऽपीत्यत आह  पूर्वेति। अवशोऽपि प्रह्नादादिवत्पित्रादिभिरन्यथा नीयमानोऽपि तेनैव पूर्वाभ्यासेन बलवता ह्रियते योगप्रवणः क्रियते। यतो योगस्य जिज्ञासुर्ज्ञानमात्रमिच्छन्यो भवति सोऽपि शब्दब्रह्म कर्मकाण्डं वेदमप्यतिक्रम्य वर्तते किं पुनः पित्राद्याज्ञाम्। इत्थं पूर्वाभ्यासबलं यन्महान्तमपि पित्रादियत्नं वृथा करोतीत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "By virtue of the divine consciousness of his previous life, he automatically becomes attracted to the yogic principles – even without seeking them. Such an inquisitive transcendentalist stands always above the ritualistic principles of the scriptures.",
        "ec": " Advanced yogīs are not very much attracted to the rituals of the scriptures, but they automatically become attracted to the yoga principles, which can elevate them to complete Kṛṣṇa consciousness, the highest yoga perfection. In the Śrīmad-Bhāgavatam (3.33.7) , such disregard of Vedic rituals by the advanced transcendentalists is explained as follows: aho bata śva-paco ’to garīyān yaj-jihvāgre vartate nāma tubhyam tepus tapas te juhuvuḥ sasnur āryā brahmānūcur nāma gṛṇanti ye te “O my Lord! Persons who chant the holy names of Your Lordship are far, far advanced in spiritual life, even if born in families of dog-eaters. Such chanters have undoubtedly performed all kinds of austerities and sacrifices, bathed in all sacred places and finished all scriptural studies.” The famous example of this was presented by Lord Caitanya, who accepted Ṭhākura Haridāsa as one of His most important disciples. Although Ṭhākura Haridāsa happened to take his birth in a Muslim family, he was elevated to the post of nāmācārya by Lord Caitanya due to his rigidly attended principle of chanting three hundred thousand holy names of the Lord daily: Hare Kṛṣṇa, Hare Kṛṣṇa, Kṛṣṇa Kṛṣṇa, Hare Hare/ Hare Rāma, Hare Rāma, Rāma Rāma, Hare Hare. And because he chanted the holy name of the Lord constantly, it is understood that in his previous life he must have passed through all the ritualistic methods of the Vedas, known as śabda-brahma. Unless, therefore, one is purified, one cannot take to the principles of Kṛṣṇa consciousness or become engaged in chanting the holy name of the Lord, Hare Kṛṣṇa."
    }
}
