{
    "_id": "BG6.43",
    "chapter": 6,
    "verse": 43,
    "slok": "तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |\nयतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ||६-४३||",
    "transliteration": "tatra taṃ buddhisaṃyogaṃ labhate paurvadehikam .\nyatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana ||6-43||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.43।। हे कुरुनन्दन ! वह पुरुष वहाँ पूर्व देह में प्राप्त किये गये ज्ञान से सम्पन्न होकर योगसंसिद्धि के लिए उससे भी अधिक प्रयत्न करता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.43 Thee he comes in touch with the knowledge acired in his former body and strives more than before for perfection, O Arjuna.",
        "ec": "6.43 तत्र there? तम् that? बुद्धिसंयोगम् union with knowledge? लभते obtains? पौर्वदेहिकम् acired in his fomer body? यतते strives? च and? ततः than that? भूयः more? संसिद्धौ for perfection? कुरुनन्दन O son of the Kurus.Commentary When he takes a human body again in this world his previous exertions and practice in the path of Yoga are not wasted. They bear full fruit now? and hasten his moral and spiritual evolution.Our thoughts and actions are left in our subconscious minds in the form of subtle Samskaras or impressions. Our experiences in the shape of Samskaras? habits and tendencies are also stored up in our subconscious mind. These Samskaras of the past birth are revivified and reenergised in the next birth. The Samskaras of Yogic practices and meditation and the Yogic tendencies will compel the spiritual aspirant to strive with greater vigour than that with which he attempted in the former birth. He will endeavour more strenuously to get more spiritual experiences and to attain to higher planes of realisation than those acired in his previous birth."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.43 Then the experience acquired in his former life will revive, and with its help he will strive for perfection more eagerly than before."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.43।। किसी को यह आशंका हो सकती है कि पुनर्जन्म लेने पर उस साधक को पुन प्रारम्भ से साधना का अभ्यास करना पड़ेगा। यह आशंका निर्मूल है। भगवान् कहते हैं कि योग के अनुकूल वातावरण में जन्म लेने के पश्चात् वह पुरुष पूर्व देह में अर्जित ज्ञान से सम्पन्न हो जाता है जिनके कारण अन्य लोगों की अपेक्षा वह अपनी शिक्षा अधिक सरलता से पूर्ण कर लेता है। कारण यह है कि उसके लिए यह कोई नवीन अध्ययन नहीं वरन् पूर्वार्जित ज्ञान की मात्र पुनरावृत्ति या सिंहावलोकन ही होता है। अल्पकाल में ही वह अपने हृदय में ही ज्ञान को सिद्ध होते हुए देखता है जो अव्यक्त रूप में पूर्व से ही निहित था।इतना ही नहीं कि वह पौर्वदेहिक ज्ञान से युक्त होता है किन्तु वह फिर संसिद्धि के लिए पूर्व से भी अधिक प्रयत्न करता है। उसमें उत्साह क्षमता तथा प्रयत्न की कमी नहीं होती। प्रयत्न रहित ज्ञान साधक के लिए दुखदायी भार ही बनता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कुरुनन्दन योगभ्रष्ट पुरुष संसिद्धि के लिए और भी अधिक प्रयत्न करता है।पौर्वदेहिक बुद्धि संयोग का प्रभाव बताते हुये कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.43. There in that life, he gains (regains) that link of mentality transmitted from his former body.  Conseently once again he strives for a full success, O rejoicer of the Kurus !"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.43 There he regains the disposition of mind which he had in his former body, O Arjuna, and from there he strives much more for success inYoga."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.43 There he becomes endowed with that wisdom acired in the previous body. and he strives more than before for perfection, O scion of the Kuru dynasty."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.43।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.43।।यदुत्तमतरं जन्मोक्तं तस्योत्तमत्वे हेत्वन्तरमाह  यस्मादिति। बुद्ध्येत्यात्मविषययेति शेषः। पूर्वस्मिन्देहे भवं तत्रानुष्ठितसाधनविशेषयुक्तमित्यर्थः। तर्हि यथोक्तजन्मनि साधनानुष्ठानमन्तरेणैव बुद्धिसंबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह  यतते चेति। प्रयत्नः श्रवणाद्यनुष्ठानविषयः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.43।। हे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।",
        "hc": "।।6.43।। व्याख्या--'तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्'--तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंके कुलमें जन्म होनेके बाद उस वैराग्यवान् साधककी क्या दशा होती है? इस बातको बतानेके लिये यहाँ 'तत्र' पद आया है।'पौर्वदेहिकम्' तथा 'बुद्धिसंयोगम्' पदोंका तात्पर्य है कि संसारसे विरक्त उस साधकको स्वर्ग आदि लोकोंमें नहीं जाना पड़ता, उसका तो सीधे योगियोंके कुलमें जन्म होता है। वहाँ उसको अनायास ही पूर्वजन्मकी साधन-सामग्री मिल जाती है। जैसे, किसीको रास्तेपर चलते-चलते नींद आने लगी और वह वहीं किनारेपर सो गया। अब जब वह सोकर उठेगा, तो उतना रास्ता उसका तय किया हुआ ही रहेगा; अथवा किसीने व्याकरणका प्रकरण पढ़ा और बीचमें कई वर्ष पढ़ना छूट गया। जब वह फिरसे पढ़ने लगता है, तो उसका पहले पढ़ा हुआ प्रकरण बहुत जल्दी तैयार हो जाता है, याद हो जाता है। ऐसे ही पूर्वजन्ममें उसका जितना साधन हो चुका है, जितने अच्छे संस्कार पड़ चुके हैं, वे सभी इस जन्ममें प्राप्त हो जाते हैं, जाग्रत् हो जाते हैं।'यतते च ततो भूयः संसिद्धौ'--एक तो वहाँ उसको पूर्वजन्मकृत बुद्धिसंयोग मिल जाता है और वहाँका सङ्ग अच्छा होनेसे साधनकी अच्छी बातें मिल जाती हैं, साधनकी युक्तियाँ मिल जाती हैं। ज्यों-ज्यों नयी युक्तियाँ मिलती हैं, त्यों-त्यों उसका साधनमें उत्साह बढ़ता है। इस तरह वह सिद्धिके लिये विशेष तत्परतासे यत्न करता है।अगर इस प्रकरणका अर्थ ऐसा लिया जाय कि ये दोनों ही प्रकारके योगभ्रष्ट पहले स्वर्गादि लोकोंमें जाते हैं। उनमेंसे जिसमें भोगोंकी वासना रही है, वह तो शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है और जिसमें भोगोंकी वासना नहीं है वह योगियोंके कुलमें जन्म लेता है, तो प्रकरणके पदोंपर विचार करनेसे यह बात ठीक नहीं बैठती। कारण कि ऐसा अर्थ लेनेसे 'योगियोंके' कुलमें जन्म लेनेवालेको 'पौर्वदेहिक' बुद्धिसंयोग अर्थात् पूर्वजन्मकृत साधन-सामग्री मिल जाती है--यह कहना नहीं बनेगा। यहाँ 'पौर्वदेहिक' कहना तभी बनेगा, जब बीचमें दूसरे शरीरका व्यवधान न हो। अगर ऐसा मानें कि स्वर्गादि लोकोंमें जाकर फिर वह योगियोंके कुलमें जन्म लेता है, तो उसका 'पूर्वाभ्यास' कह सकते हैं (जैसा कि श्रीमानोंके घर जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टके लिये आगेके श्लोकमें कहा है), पर 'पौर्वदेहिक' नहीं कह सकते। कारण कि उसमें स्वर्गादिका व्यवधान पड़ जायगा और स्वर्गादि लोकोंके देहको पौर्वदेहिक बुद्धिसंयोग नहीं कह सकते; क्योंकि उन लोकोंमें भोग-सामग्रीकी बहुलता होनेसे वहाँ साधन बननेका प्रश्न ही नहीं है। अतः वे दोनों योगभ्रष्ट स्वर्गादिमें जाकर आते हैं--यह कहना प्रकरणके अनुसार ठीक नहीं बैठता।दूसरी बात, जिसमें भोगोंकी वासना है, उसका तो स्वर्ग आदिमें जाना ठीक है; परन्तु जिसमें भोगोंकी वासना नहीं है और जो अन्त-समयमें किसी कारणवश साधनसे विचलित हो गया है, ऐसे साधकको स्वर्ग आदिमें भेजना तो उसको दण्ड देना है, जो कि सर्वथा अनुचित है।\n\n सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि तत्त्वज्ञ योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवालेको पूर्वजन्मकृत बुद्धिसंयोग प्राप्त हो जाता है और वह साधनमें तत्परतासे लग जाता है। अब शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगभ्रष्टकी क्या दशा होती है--इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.43।।तत्र जन्मनि तम् एव पौर्वदैहिकं योगविषयं बुद्धिसंयोगं लभते। ततः सुप्तप्रबुद्धवद् भूयः संसिद्धौ यतते। यथा न अन्तरायहतो भवति तथा यतते।",
        "et": "6.43 - 6.44 There, in that existence, he regains the mental disposition for Yoga that he had in the previous birth. Like one awakened from sleep, he strives again from where he had left before attaining complete success. He strives so as not to be defeated by impediments. This person who has fallen away from Yoga is borne on towards Yoga alone by his previous practice, i.e., by the older practice with regard to Yoga. This power of Yoga is well known.\n\nEven a person, who has not engaged in Yoga but has only been desirous of knowing Yoga, i.e., has failed to follow it up, acries once again the same desire to practise Yoga. He then practises Yoga, of which the first stage is Karma Yoga, and transcends Sabda-brahman (or Brahman which is denotable by words). The Sabda-brahman is the Brahman capable of manifesting as gods, men, earth, sky, heaven etc., namely, Prakrti. The meaning is that having been liberated from the bonds of Prakrti, he attains the self which is incapable of being named by such words as gods, men etc., and which comprises solely of knowledge and beatitude.\n\nAfter thus describing the glory of Yoga the verse says:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.43  6.45।।तत्रेत्यादि परां गतिमित्यन्तम्।  संसिद्धौ मोक्षात्मिकायाम्।  अवशः परतन्त्र एव किल तेन पूर्वाभ्यासेन बलादेव योगाभ्यासं प्रति नीयते।  न चैतत् सामान्यम्।  योगजिज्ञासामात्रेणैव हि शब्दब्रह्मातिवृत्तिः मन्त्रस्वाध्यायादिरूपं च शब्दब्रह्म अतिवर्तते न स्वीकुरुते।ततः जिज्ञासानन्तरम् यत्नवान् अभ्यासक्रमेण देहान्ते वासुदेवत्वं प्राप्नोति।  न चासौ तेनैव देहेन सिद्ध इति मन्तव्यम्।  अपि तु बहूनि जन्मानि तेन तदभ्यस्तमिति मन्तव्यम्।  अत एव यस्य अनन्यव्यापारतया भगद्व्यापारानुरागित्वं स योगभ्रष्ट इति निश्चेयम् ( N निश्चेयः)।",
        "et": "6.43 See Comment under 6.45"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.43।।क्योंकि  वहाँ योगियोंके कुलमें पहले शरीरमें होनेवाले उस बुद्धिके संयोगको पाता है  अर्थात् योगीकुलमें जन्म लेते ही उसका पूर्वजन्ममें प्राप्त हुई बुद्धिसे सम्बन्ध हो जाता है और हे कुरुनन्दन  वह उस पूर्वकृत संस्कारके बलसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त करनेके लिये फिर और भी अधिक प्रयत्न करता है।",
        "sc": "।।6.43।। तत्र योगिनां कुले तं बुद्धिसंयोगं बुद्ध्या संयोगं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकं पूर्वस्मिन् देहे भवं पौर्वदेहिकम्। यतते च प्रयत्नं च करोति ततः तस्मात् पूर्वकृतात् संस्कारात् भूयः बहुतरं संसिद्धौ संसिद्धिनिमित्तं हे कुरुनन्दन।।कथं पूर्वदेहबुद्धिसंयोग इति तदुच्यते",
        "et": "6.43 Tatra, there, in the family of yogis; labhate, tam buddhisamyogam, he becomes endowed with that wisdom; paurva-dehikam, acired in the previous body. And yatate, he strives; bhuyah, more intensely; tatah, than before, more intensely than that tendency acired in the previous birth; samsiddau, for, for the sake of, perfection; kuru-nandana, O scion of the Kuru dynasty.\nHow does he become endowed with the wisdom acired in the previous body? That is being answered:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.43।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.43।।ततः किं तत्राह  तत्र तमिति। यतत इति प्रयत्न उक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.43।।एतादृशजन्मद्वयस्य दुर्लभत्वं कस्मात्  यस्मात् तत्र द्विप्रकारेऽपि जन्मनि पूर्वदेहे भवं पौर्वदेहिकं सर्वकर्मसंन्यासगुरूपसदनश्रवणमनननिदिध्यासनानां मध्ये यावत्पर्यन्तमनुष्ठितं तावत्पर्यन्तमेव तं ब्रह्मात्मैक्यविषयया बुद्ध्या संयोगम्। तत्साधनकलापमिति यावत्। लभते प्राप्नोति। न केवलं लभत एव किंतु ततस्तल्लाभानन्तरं भूयोऽधिकं लब्धाया भूमेरग्रिमां भूमिं संपादयितुं संसिद्धौ संसिद्धिर्मोक्षस्तमन्निमित्तं यतते च प्रयत्नं करोति च। यावन्मोक्षं भूमिकाः संपादयतीत्यर्थः। हे कुरुनन्दन तवापि शुचीनां श्रीमतां कुले योगभ्रष्टजन्म जातमिति पूर्ववासनावशादनायासेनैव ज्ञानलाभो भविष्यतीति सूचयितुं महाप्रभावस्य कुरोः कीर्तनम्। अयमर्थो भगवद्वसिष्ठवचने व्यक्तः। यथा श्रीरामःएकामथ द्वितीयां वा तृतीयां भूमिकामुत। आरूढस्य मृतस्याथ कीदृशी भगवन्गतिः।। पूर्वं हि सप्त भूमयो व्याख्याताः। तत्र नित्यानित्यवस्तुविवेकपूर्वकादिहामुत्रार्थभोगवैराग्याच्छमदमश्रद्वातितिक्षावसर्वकर्मसंन्यासादिपुरःसरा मुमुक्षा शुभेच्छाख्या प्रथमा भूमिका साधनचतुष्टयसंपदिति यावत्। ततो गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्यविचारणात्मिका द्वितीया भूमिका श्रवणमननसंपदिति यावत्। ततः श्रवणमननपरिनिष्पन्नस्य तत्त्वज्ञानस्य निर्विचिकित्सतारूपा तनुमानसा नाम तृतीया भूमिका निदिध्यासनासंपदिति यावत्। चतुर्थी भूमिका तु तत्त्वसाक्षात्कार एव। पञ्चमषष्ठसप्तमभूमयस्तु जीवन्मुक्तेरवान्तरभेदा इति तृतीये प्राग्व्याख्यातम्। तत्र चतुर्थी भूमिं प्राप्तस्य मृतस्य जीवन्मुक्त्यभावेऽपि विदेहकैवल्यं प्रति नास्त्येव संशयः। तदुत्तरभूमित्रयं प्राप्तस्तु जीवन्नपि मुक्तः किमु विदेह इति नास्त्येव भूमिकाचतुष्टये शङ्का। साधनभूतभूमिकात्रये तु कर्मत्यागाज्ज्ञानालाभाच्च भवति शङ्केति तत्रैव प्रश्नः। श्रीवसिष्ठःयोगभूमिकयोत्क्रान्तजीवितस्य शरीरिणः। भूमिकांशानुसारेण क्षीयते पूर्वदुष्कृतम्।।ततः सुरविमानेषु लोकपालपुरेषु च। मेरूपवनकुञ्जेषु रमते रमणीसखः।।ततः सुकृतसंभारे दुष्कृते च पुराकृते। भोगक्षयात्परिक्षीणे जायन्ते योगिनो भुवि। शुचीनां श्रीमतां गेहे गुप्ते गुणवतां सताम्। जनित्वा योगमेवैते सेवन्ते योगवासिताः।।तत्र प्राग्भावनाभ्यस्तं योगभूमिक्रमं बुधाः। दृष्ट्वा परिपतन्त्युच्चैरुत्तरं भूमिकाक्रमम्।।इति। अत्र प्रागुपचितभोगवासनाप्राबल्यादल्पकालाभ्यस्तवैराग्यवासनादौर्बल्येन प्राणोत्क्रान्तिसमयेप्रादुर्भूतभोगस्पृहः सर्वकर्मसंन्यासी यः स एवोक्तः। यस्तु वैराग्यवासनाप्राबल्यात्प्रकृष्टपुण्यप्रकटितपरमेश्वरप्रसादवशेन प्राणोत्क्रान्तिसमयेऽनुद्भूतभोगस्पृहः संन्यासी भोगव्यवधानं विनैव ब्राह्मणानामेव ब्रह्मविदां सर्वप्रमादकारणशून्ये कुले समुत्पन्नस्तस्य प्राक्तनसंस्काराभिव्यक्तेरनायासेनैव संभवान्नास्ति पूर्वस्यैव मोक्षं प्रत्याशङ्केति स वसिष्ठेन नोक्तो भगवता तु परमकारुणिकेनाथवेति पक्षान्तरं कृत्वोक्त एव। स्पष्टमन्यत्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.43।। ततः किमत आह  तत्रेति सार्धेन। तत्र द्विःप्रकारेऽपि जन्मनि पूर्वदेहे भवं पौर्वदेहिकं तमेव ब्रह्मविषयया बुद्ध्या संयोगं लभते। ततश्च भूयोऽधिकं संसिद्धौ मोक्षे प्रयत्नं करोति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.43।।एतादृशजन्मनो दुर्लभतरत्वं कस्मात् यस्मात्तत्र योगिनां कुले तं पौर्वदेहिकं पूर्वदेहे भवं बुद्धिसंयोगं बुद्य्धा निष्कामकर्मणा शुद्धया श्रवणादिसंपन्नया संयोगं लभते प्राप्नोति। ततस्तस्मात्पूर्वदेहाभ्याससंस्कारद्भूयो बहुतरं संसिद्धौ मोक्षार्थ यतते तत्त्वसाक्षात्कारं यत्नेन संपादयतीत्यर्थः। यत्त्वेतादृशजन्मद्वयदुर्लभत्वं कस्माद्यस्मात् तत्र द्विःप्रकारेऽपि जन्मनीति तदुपेक्ष्यम्। अथवेत्यादिनोक्तपक्षस्य श्रेष्ठ्यप्रतिज्ञाया हेतोरावश्यकत्वात्। अन्यथोभयोरपि साभ्यप्रसङ्गे पतिज्ञाघातापत्तेः। योगिनां श्रीमता कुले जातस्य यथा योगित्वं बुद्धिमर्त्त्व च भवति तथा क्षात्रधर्मेऽतिकुशलस्य कुरोर्वंशे जातस्य तवापि स्वकुलोचितधर्मसंबन्ध आवश्यक इति सूचयन्नाह  हे कुरुनन्दनेति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.43।।ततः किमायातमपवर्गस्य पूर्वदेहारब्धस्य योगस्य शिथिलत्वात् योगिकुलजन्ममात्रस्य च मोक्षहेतुत्वाभावादित्यत्रोत्तरंतत्र तमिति। तत्रशब्दस्य सप्तमीसाम्याद्गेहविषयत्वभ्रमव्युदासाय पूर्वोक्तवाक्यार्थेन अन्वयमाह  तत्र जन्मनीत्यादि। पूर्वदेहे संस्कारहेतुबुद्धेरपि सद्भावात्तद्व्यवच्छेदायतम् इत्युक्तमित्याह  योगविषयमिति।ततः बुद्धिसंयोगादित्यर्थः। जन्मान्तरे समस्तसंस्कारतिरोधानस्य दृश्यमानत्वात् कथमिदमुपपद्यते इति शङ्कायां पुण्यकृतां तथाविधः संस्कारभ्रंशो नास्तीति प्रदर्शनायसुप्तप्रबुद्धवदिति दृष्टान्त उक्तः।संसिद्धौ इत्यत्रोपसर्गाभिप्रेतमाह  यथेति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.43।।तादृशजन्मानन्तरं किं स्यात् इत्यत आह  तत्र तमिति। तत्र तस्मिन् जन्मद्वयेऽपि तं पौर्वदेहिकं भगवत्कृपालब्धजीवभावानन्तरप्राप्तं प्रथमदेहसम्बन्धिनं बुद्धिसंयोगं भगवत्सेवार्थप्रकटितज्ञानरूपं भगवदीयकुलजन्ममात्रेण लभते। च पुनः तं लब्ध्वा भूयः सिद्धौ सम्यक् सिद्ध्यर्थं तथा भगवत्प्राप्त्यर्थं यतते यत्नं करोति। कुरुनन्दनेतिसम्बोधनं विश्वासार्थम्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.43।।तत्र द्विविधेऽपि जन्मनि पौर्वदेहिकं पूर्वदेहप्राप्तं बुद्धिसंयोगम्। यावती च योगभूमिः पूर्वजन्मनि जिता तत्र च यावान्बुद्धिलाभो जातस्तावन्तं बुद्धिसंयोगं पूर्वाभ्यासादल्पेनैवाभ्यासेन लभते। तस्मादपि भूयस्यां बह्व्यां संसिद्धौ ऊर्ध्वभूमिलाभार्थमित्यर्थः। यतते यत्नं करोति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "On taking such a birth, he revives the divine consciousness of his previous life, and he again tries to make further progress in order to achieve complete success, O son of Kuru.",
        "ec": " King Bharata, who took his third birth in the family of a good brāhmaṇa, is an example of good birth for the revival of previous transcendental consciousness. King Bharata was the emperor of the world, and since his time this planet has been known among the demigods as Bhārata-varṣa. Formerly it was known as Ilāvṛta-varṣa. The emperor, at an early age, retired for spiritual perfection but failed to achieve success. In his next life he took birth in the family of a good brāhmaṇa and was known as Jaḍa Bharata because he always remained secluded and did not talk to anyone. And later on he was discovered as the greatest transcendentalist by King Rahūgaṇa. From his life it is understood that transcendental endeavors, or the practice of yoga, never go in vain. By the grace of the Lord the transcendentalist gets repeated opportunities for complete perfection in Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
