{
    "_id": "BG6.41",
    "chapter": 6,
    "verse": 41,
    "slok": "प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः |\nशुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ||६-४१||",
    "transliteration": "prāpya puṇyakṛtāṃ lokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ .\nśucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo.abhijāyate ||6-41||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.41।। योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर वहाँ दीर्घकाल तक वास करके शुद्ध आचरण वाले श्रीमन्त (धनवान) पुरुषों के घर में जन्म लेता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.41 Having attained to the worlds of the righteous and having dwelt there for everlasting years, he who fell from Yoga is rorn in a house of the pure and wealthy.",
        "ec": "6.41 प्राप्य having attained? पुण्यकृताम् of the righteous? लोकान् worlds? उषित्वा having dwelt? शाश्वतीः everlasting? समाः years? शुचीनाम् of the pure? श्रीमताम् of the wealty? गेहे in the house? योगभ्रष्टः one fallen from Yoga? अभिजायते is born.Commentary Yogabhrashta one who has fallen from Yoga? i.e.? one who was not able to attain perfection in Yoga? or one who climbed a certain height on the ladder of Yoga but fell down on account of lack of dispassion or slackness in the practice (by becoming a victim to Maya or his turbulent senses).The righteous Those who tread the path of truth? who do virtuous actions such as charity? Yajna? rituals? worship of the Lord? and who act in accordance with the prescribed rules of the scriptures.Everlasting years means only a considerably long period but not absolutely everlasting.The pure those who lead a pure? moral life those who have a pure heart (free from jealousy? hatred? pride? greed? etc.). (Cf.IX.20?21)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.41 Having reached the worlds where the righteous dwell, and having remained there for many years, he who has slipped from the path of spirituality will be born again in the family of the pure, benevolent and prosperous."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.41।। परलोक की गति इहलोक में किये गये कर्मों तथा उनके प्रेरक उद्देश्यों पर निर्भर करती है। कर्म मुख्यत दो प्रकार के होते हैं  पाप और पुण्य। पापकर्म का आचरण करने वालों की अधोगति होती है केवल पुण्यकर्म का आश्रय लेने वाले ही आध्यात्मिक उन्नति करते हैं। हमारे शास्त्रों में इन पुण्यकर्मों को भी दो वर्गों में विभाजित किया गया है  (क) सकाम कर्म अर्थात् इच्छा से प्रेरित कर्म और (ख) निष्काम कर्म अर्थात् समर्पण की भावना से ईश्वर की पूजा समझकर किया गया कर्म। कर्म का फल कर्ता के उद्देश्य के अनुरूप ही होता है इसलिए सकाम और निष्काम कर्मों के फल निश्चय ही भिन्न होते हैं। स्वाभाविक है पूर्णत्व के चरम लक्ष्य तक पहुँचने के इन पुण्यकर्मियों के मार्ग भी भिन्नभिन्न होगें। इस प्रकरण में उन्हीं मार्गों को दर्शाया गया है।जो लोग स्वर्गादि लोकों को प्राप्त करने की इच्छा से ईश्वर की आराधना यज्ञयागादि तथा अन्य पुण्य कर्म करते हैं उन्हें देहत्याग के पश्चात ऐसे ही लोकों की प्राप्ति होती है जो उनकी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए अनुकूल हों। उस लोक में वास करके वे पुन इस लोक में शुद्ध आचरण करने वाले धनवान पुरुषों के घर जन्म लेते हैं। संक्षेप में यदि दृढ़ इच्छा तथा समुचित प्रयत्न किये गये हों तो मनुष्य की कोई भी इच्छा हो वह यथासमय पूर्ण होती ही है।परन्तु निष्काम भाव से पुण्य कर्म करने वालों की क्या गति होती है भगवान् कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.41. Having attained the worlds of performers of pious acts, [and] having resided there for years of Sasvata, the fallen-from-Yoga is born [again] in the house of the pure persons, who are rich."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.41 He who has fallen away from Yoga is born again in the house of the pure and prosperous after having attained to the worlds of doers of good deeds and dwelt there for many long years."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.41 Attaining the worlds of the righteous, and residing there for eternal years, the man fallen from Yoga is born in the house of the pious and the properous."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.41।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.41।।योगभ्रष्टस्य लोकद्वयेऽपि नाशाभावे किं भवतीति पृच्छति  किंत्विति। तत्र श्लोकेनोत्तरमाह  प्राप्येति। कथं संन्यासीति विशेष्यते तत्राह  सामर्थ्यादिति। कर्मणि व्यापृतस्य कर्मिणो योगमार्गप्रवृत्त्यनुपपत्तेस्तत्प्रवृत्तावपि फलाभिलाषविकलस्येश्वरे समर्पितसर्वकर्मणस्तद्भ्रंशाशङ्कानवकाशादित्यर्थः। समानां नित्यत्वं मानुषसमाविलक्षणत्वम्। वैराग्यभावविवक्षया विभूतिमतां गृहे जन्मेति विशेष्यते।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.41।। वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध  श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।",
        "hc": "।।6.41।। व्याख्या--'प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्'--जो लोग शास्त्रीय विधि-विधानसे यज्ञ आदि कर्मोंको साङ्गोपाङ्ग करते हैं, उन लोगोंका स्वर्गादि लोकोंपर अधिकार है, इसलिये उन लोगोंको यहाँ 'पुण्यकर्म करनेवालोंके लोक' कहा गया है। तात्पर्य है कि उन लोकोंमें पुण्यकर्म करनेवाले ही जाते हैं, पापकर्म करनेवाले नहीं। परन्तु जिन साधकोंको पुण्य-कर्मोंके फलरूप सुख भोगनेकी इच्छा नहीं है, उनको वे स्वर्गादि लोक विघ्नरूपमें और मुफ्तमें मिलते हैं! तात्पर्य है कि यज्ञादि शुभ कर्म करनेवालोंको परिश्रम करना पड़ता है, उन लोकोंकी याचना--प्रार्थना करनी पड़ती है, यज्ञादि कर्मोंको विधि-विधानसे और साङ्गोपाङ्ग करना पड़ता है, तब कहीं उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति होती है। वहाँ भी उनकी भोगोंकी वासना बनी रहती है; क्योंकि उनका उद्देश्य ही भोग भोगनेका था। परन्तु जो किसी कारणवश अन्तसमयमें साधनसे विचलितमना हो जाते हैं, उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिये न तो परिश्रम करना पड़ता है, न उनकी याचना करनी पड़ती है और न उनकी प्राप्तिके लिये यज्ञादि शुभ कर्म ही करने पड़ते हैं। फिर भी उनको स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति हो जाती है। वहाँ रहनेपर भी उनकी वहाँके भोगोंसे अरुचि हो जाती है; क्योंकि उनका उद्देश्य भोग भोगनेका था ही नहीं। वे तो केवल सांसारिक सूक्ष्म वासनाके कारण उन लोकोंमें जाते हैं। परन्तु उनकी वह वासना भोगी पुरुषोंकी वासनाके समान नहीं होती।जो केवल भोग भोगनेके लिये स्वर्गमें जाते हैं, वे जैसे भोगोंमें तल्लीन होते हैं, वैसे योगभ्रष्ट तल्लीन नहीं हो सकता। कारण कि भोगोंकी इच्छावाले पुरुष भोगबुद्धिसे भोगोंको स्वीकार करते हैं और योगभ्रष्टको विघ्नरूपसे भोगोंमें जाना पड़ता है।'उषित्वा शाश्वतीः समाः'--स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें यज्ञादि शुभ-कर्म करनेवाले भी (भोग भोगनेके उद्देश्यसे)जाते हैं और योगभ्रष्ट भी जाते हैं। भोग भोगनेके उद्देश्यसे स्वर्गमें जानेवालोंके पुण्य क्षीण होते हैं और पुण्योंके क्षीण होनेपर उन्हें लौटकर मृत्युलोकमें आना पड़ता है। इसलिये वे वहाँ सीमित वर्षोंतक ही रह सकते हैं। परन्तु जिसका उद्देश्य भोग भोगनेका नहीं है, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिका है, वह योगभ्रष्ट किसी सूक्ष्म वासनाके कारण स्वर्गमें चला जाय, तो वहाँ उसकी साधन-सम्पत्ति क्षीण नहीं होती। इसलिये वह वहाँ असीम वर्षोंतक रहता है अर्थात् उसके लिये वहाँ रहनेकी कोई सीमा नहीं होती।जो भोग भोगनेके उद्देश्यसे ऊँचे लोकोंमें जाते हैं, उनका उन लोकोंमें जाना कर्मजन्य है। परन्तु योगभ्रष्टका ऊँचे लोकोंमें जाना कर्मजन्य नहीं है; किन्तु यह तो योगका प्रभाव है, उनकी साधन-सम्पत्तिका प्रभाव है, उनके सत्-उद्देश्यका प्रभाव है।\n\nस्वर्ग आदिका सुख भोगनेके उद्देश्यसे जो उन लोकोंमें जाते हैं, उनको न तो वहाँ रहनेसे स्वतन्त्रता है और न वहाँसे आनेमें ही स्वतन्त्रता है। उन्होंने भोग भोगनेके उद्देश्यसे ही यज्ञादि कर्म किये हैं, इसलिये उन शुभ कर्मोंका फल जबतक समाप्त नहीं होता, तबतक वे वहाँसे नीचे नहीं आ सकते और शुभ कर्मोंका फल समाप्त होनेपर वे वहाँ रह भी नहीं सकते। परन्तु जो परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही साधन करनेवाले हैं और केवल अन्त-समयमें योगसे विचलित होनेके कारण स्वर्ग आदिमें गये हैं, उनका वासनाके तारतम्यके कारण वहाँ ज्यादा-कम रहना हो सकता है, पर वे वहाँके भोगोंमें फँस नहीं सकते। कारण कि जब योगका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है (6। 44), तब वह योगभ्रष्ट वहाँ फँस ही कैसे सकता है?'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते'--स्वर्गादि लोकोंके भोग भोगनेपर जब भोगोंसे अरुचि हो जाती है, तब वह योगभ्रष्ट लौटकर मृत्युलोकमें आता है और शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है। उसके फिर लौटकर आनेमें क्या कारण है? वास्तवमें इसका कारण तो भगवान् ही जानें; किन्तु गीतापर विचार करनेसे ऐसा दीखता है कि वह मनुष्य-जन्ममें साधन करता रहा! वह साधनको छोड़ना नहीं चाहता था, पर अन्त-समयमें साधन छूट गया। अतः उस साधनका जो महत्त्व उसके अन्तःकरणमें अङ्कित है, वह स्वर्गादि लोकोंमें भी उस योगभ्रष्टको अज्ञातरूपसे पुनः साधन करनेके लिये प्रेरित करता रहता है, उकसाता रहता है। इससे उस योगभ्रष्टके मनमें आती है कि मैं साधन करूँ। ऐसी मनमें क्यों आती है--इसका उसको पता नहीं लगता। जब श्रीमानोंके घरमें भोगोंके परवश होनेपर भी पूर्वजन्मका अभ्यास उसको जबर्दस्ती खींच लेता है (6। 44) तब वह साधन उसको स्वर्ग आदिमें साधनके बिना चैनसे कैसे रहने देगा? अतः भगवान् उसको साधन करनेका मौका देनेके लिये शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म देते हैं।जिनका धन शुद्ध कमाईका है, जो कभी पराया हक नहीं लेते, जिनके आचरण तथा भाव शुद्ध हैं, जिनके अन्तःकरणमें भोगोंका और पदार्थोंका महत्त्व, उनकी ममता नहीं है, जो सम्पूर्ण पदार्थ, घर, परिवार आदिको साधन-सामग्री समझते हैं, जो भोगबुद्धिसे किसीपर अपना व्यक्तिगत आधिपत्य नहीं जमाते, वे 'शुद्ध श्रीमान्' कहे जाते हैं। जो धन और भोगोंपर अपना आधिपत्य जमाते हैं वे अपनेको तो उन धन और पदार्थोंका मालिक मानते हैं, पर हो जाते हैं उनके गुलाम! इसलिये वे शुद्ध श्रीमान् नहीं हैं। सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें तो भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके अनुसार योगभ्रष्टकी गति बतायी। अब आगेके श्लोकमें अथवा कहकर अपनी ही तरफसे दूसरे योगभ्रष्टकी बात कहते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.41।।यज्जातीयभोगाभिकाङ्क्षया योगात् प्रच्युतः अयम् अतिपुण्यकृतां प्राप्यान् लोकान् प्राप्य तज्जातीयान् अतिकल्याणभोगान् ज्ञानोपाययोगमाहात्म्याद् एव भुञ्जानो यावत् तद्भोगतृष्णावसानं शाश्वतीः समाः तत्र उषित्वा तस्मिन् भोगे वितृष्णः शुचीनां श्रीमतां योगोपक्रमयोग्यानां कुले योगोपक्रमे भ्रष्टो योगमाहात्म्याद् जायते।",
        "et": "6.41 This person, who had wandered away from Yoga because of desire for whatever kind of enjoyments, he will gain those very enjoyments through the excellence of Yoga alone. Having attained to the worlds of those who do meritorious acts, he will dwell there for a long time, i.e., till his desire for such enjoyments gets exhausted. Then, devoid of desire for these enjoyment, this person who has swerved from Yoga at the very beginning of Yoga, is born, by virtue of the excellence of Yoga, in a family of those who are competent to practise Yoga."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.41।।प्राप्येति।  शाश्वतस्य विष्णोः समाः वैष्णवानि त्रीणि वर्षाणि।  शुचीनामिति येषां भगवदंशस्पर्शि चित्तम्।",
        "et": "6.41 Prapya  etc.  Of  Sasvata  of  Visnu  (personal god).  [His]  years :  three years of Visnu.  Of the pure persons :  of  those  whose mind is prone to touch  (to meditate upon)  the body  (amsa) of the Lord."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.41।।तो फिर इस योगभ्रष्टका क्या होता है  योगमार्गमें लगा हुआ योगभ्रष्ट संन्यासी पुण्यकर्म करनेवालोंके अर्थात् अश्वमेध आदि यज्ञ करनेवालोंके लोकोंमें जाकर वहाँ बहुत कालतक अर्थात् अनन्त वर्षोंतक वास करके उनके भोगका क्षय होनेपर शास्त्रोक्त कर्म करनेवाले शुद्ध और श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है। प्रकरणकी सामर्थ्यसे यहाँ योगभ्रष्टका अर्थ संन्यासी लिया गया है।",
        "sc": "।।6.41।। योगमार्गे प्रवृत्तः संन्यासी सामर्थ्यात् प्राप्य गत्वा पुण्यकृताम् अश्वमेधादियाजिनां लोकान् तत्र च उषित्वा वासमनुभूय शाश्वतीः नित्याः समाः संवत्सरान् तद्भोगक्षये शुचीनां यथोक्तकारिणां श्रीमतां विभूतिमतां गेहे गृहे योगभ्रष्टः अभिजायते।।",
        "et": "6.41 Prapya, attaining, reaching, lokan, the worlds; punya-krtam, of the righteous, of the performers of the Horse-sacrifice, etc.; and usitva, residing there, enjoying the stay; for sasvatih, eternal; samah, years; (then,) when the period of enjoyment is over, the yoga-bhrastah, man fallen from Yoga, the one who had set out on the path Yoga, i.e. a monk-as understood from the force of the context [From Arjuna's estion it minght appear that he was asking about the fate of people who fall from both the paths, viz that of Karma and of Meditation. But the possibility of getting ruined by performing actios (rites and duties) according to Vedic instructions does not arise, since their results are inevitable. However, the estion of ruin is relevant in the case of a monk, for on the one hand he has renounced actions, and on the other he may fail to attain perfection in Yoga in the present life. Hence, the Lord's answer relates to the fall and ruin of a monk alone.]; abhijayate, is born; gehe, in the house; sucinam, of the pious, who perform actions according to scriptural instructions; and srimatam, who are prosperous."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.41।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.41।।किन्तु पुण्यकृताँल्लोकान् प्राप्य यावत् कल्याणकर्मफलभोगेन शाश्वतीः समा वर्षानुषित्वा मध्ये भ्रंशात्पूर्वकृतादेव हेतोरिह योगभ्रष्टोऽभिजायते परं श्रीमतां शुचीनां सदाचाराणां गेहे जन्मवान् भवति अशुभस्याकृतत्वात्तत्फलभाक् न भवति इति भावः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.41।।तदेवं योगभ्रष्टस्य शुभकृत्त्वेन लोकद्वयेऽपि नाशाभावे किं भवतीत्युच्यते  योगमार्गप्रवृत्तः सर्वकर्मसंन्यासी वेदान्तश्रवणादि कुर्वन्नन्तराले म्रियमाणः कश्चित्पूर्वोपचितभोगवासनाप्रादुर्भावाद्विषयेभ्यः स्पृहयति। कश्चित्तु वैराग्यभावानादार्ढ्यान्न स्पृहयति। तयोः प्रथमः प्राप्य पुण्यकृतामश्वमेधयाजिनां लोकानर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकान्। एकस्मिन्नपि भोगभूमिभेदापेक्षया बहुवचनम्। तत्र चोषित्वा वासमनुभूय शाश्वतीर्ब्रह्मपरिमाणेनाक्षयाः समाः संवत्सरान् तदन्ते शुचीनां शुद्धानां श्रीमतां विभूतिमतां महाराजचक्रवर्तिनां गेहे कुले भोगवासनाशेषसद्भावादजातशत्रुजनकादिवद्योगभ्रष्टोऽभिजायते। भोगवासनाप्राबल्याद्ब्रह्मलोकान्ते सर्वकर्मसंन्यासायोग्यो महाराजो भवतीत्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.41।। तर्हि किमसा प्राप्नोतीत्यपेक्षायामाह  प्राप्येति। पुण्यकारिणामश्वमेधादियाजिनां लोकान्प्राप्य तत्र शाश्वतीः समाः बहून्संवत्सरानुषित्वा वाससुखमनुभूय शुचीनां सदाचाराणां श्रीमतां धनिनां गेहे स योगभ्रष्टो जन्म प्राप्नोति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.41।।दुर्गत्यभावमुक्त्वा सुगतिमाह  प्राप्येति। योगभ्रष्टो योगमार्गे प्रवृत्तस्यत्यक्तसर्वकर्मा तत्त्वज्ञानमलब्ध्वैव मृतः पुण्यकृतामश्वमैधादिया जिनां लोकांस्तैः प्राप्यान्ब्रह्मलोकादीन्प्राप्य तत्र च शास्वती समाः असंख्यातान्तसंवत्सरानुषित्वा वासमनुभूय तद्भोगक्षये श्रीमतान्। धनदुर्मदान्धरां तेषां वारयति। शुचीनां यथोक्तेन स्वधर्माचरणएन पवित्राणआं गेहे कुले जायत उत्पद्यते।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.41।।अथवेति। उभयभ्रष्टतापरिहारायोक्तमुभयान्वयं प्रपञ्चयति  प्राप्य इत्यादिनापरां गतिम् 6।45 इत्यन्तेन। योगभ्रंशहेतुं पुण्यकृल्लोकप्राप्तिकृतातिशयितप्राकृतपुरुषार्थयोगे कर्माख्यसाधनरहितत्वेऽपि योगमाहात्म्यस्यैव साधनत्वं भोगावसानहेतुं वैतृष्ण्यमुत्पाद्य पुनर्योगमाहात्म्यस्यैव योगारम्भयोग्यकुलोद्भवहेतुत्वं च प्रदर्शयति  येज्जातीयेति। सर्वेषां मात्रया पुण्यकृत्त्वसद्भावेऽपि केषुचित्पुण्यकृच्छब्दप्रयोगस्तेषां अतिशयितपुण्यकृत्त्वनिबन्धन इत्याह  अतिपुण्यकृतामिति। तज्जातीयत्वेऽपि ततोऽतिशयितत्वायअतिकल्याणानित्युक्तम्। दृश्यते ह्येकजातीयेष्वपि रूपरसगन्धादिषु भूलोकेऽपि तारतम्यम्। एवं दिव्यादिव्यभेदः। यदि पुराकृतैः पुण्यैः पुण्यलोकावाप्तिः पापैरपि पुराकृतैः पापलोकप्राप्तिः स्यादित्यत्राह  योगमाहात्म्यादेवेति। धर्मार्थसम्पादितद्रव्यस्य भोगार्थविनियोगवदिति भावः। नह्यसौ पुण्यक्षयादिव योगमाहात्म्यक्षयान्निवर्तते तस्याक्षयत्वादिति दर्शयितुंयावदित्यादिकमुक्तम्। विषमविपाकसमयकर्ममूलसत्त्वोन्मेषकृतविवेकोदयवशात् निरन्तरभोगप्रकर्षादिवशाच्च वैतृष्ण्यसम्भवः सौभरिप्रभृतिवृत्तान्तेषु भाव्यः। शुचित्वं श्रीमत्त्वं च अदृष्टद्वारा दृष्टद्वारा च योगोपकारकमित्याह  योगोपक्रमयोग्यानामिति। योगभ्रष्टस्य स्वान्वयाद्योगोपक्रमानुगुणस्वभावानामित्यर्थः।अथवा योगिनामेव कुले"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.41।।एवं नाशाभावमुक्त्वा तस्य गतिस्वरूपमाह  प्राप्येति। स योगभ्रष्टः स्वरूपाज्ञानादभ्यासवैराग्याभावादभ्यस्यमानमार्गाद्भ्रष्टः पुण्यकृतां यज्ञादिकारिणां लोकान् श्रद्धामात्रप्रवृत्तिसाधनेन तत्फलभोगविचिकित्साजनितपूर्वप्रवृत्तमार्गस्वरूपज्ञानार्थं प्राप्य तत्र शाश्वतीः समाः बहून् संवत्सरान् उषित्वा स्थित्वा तत्फलभोगं कृत्वा तत्र विचिकित्सयाऽभावकेन मनसा पूर्वश्रद्धासाधनेनैव भवति। जन्मप्रार्थनया शुचीनां कापट्यादिदोषरहितानां श्रीमतां भगवच्छोभायुक्तानां भक्तानां गृहेऽभिजायते जन्म प्राप्नोति। उपसर्गेण स৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷.रतिपूर्वकं प्राप्तिर्ज्ञापिता।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.41।।इहामुत्र च तस्य महत्त्वमेवास्तीत्याह  प्राप्येति। उषित्वा वासं कृत्वा। शाश्वतीः समाः नित्यान्वत्सरान्योगभ्रष्टो रागी चेदल्पकालाभ्यस्तयोगश्चेत् श्रीमतां गेहे जायते। तत्रापि श्रीमानधो गच्छतीत्याशङ्क्य शुचीनामित्युक्तम्। शुचयो हि सत्कार्येष्वेव श्रियमुपयुञ्जानाः पूर्वापेक्षया महत्तरं स्थानमासादयन्तीत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The unsuccessful yogī, after many, many years of enjoyment on the planets of the pious living entities, is born into a family of righteous people, or into a family of rich aristocracy.",
        "ec": " The unsuccessful yogīs are divided into two classes: one is fallen after very little progress, and one is fallen after long practice of yoga. The yogī who falls after a short period of practice goes to the higher planets, where pious living entities are allowed to enter. After prolonged life there, one is sent back again to this planet, to take birth in the family of a righteous brāhmaṇa Vaiṣṇava or of aristocratic merchants. The real purpose of yoga practice is to achieve the highest perfection of Kṛṣṇa consciousness, as explained in the last verse of this chapter. But those who do not persevere to such an extent and who fail because of material allurements are allowed, by the grace of the Lord, to make full utilization of their material propensities. And after that, they are given opportunities to live prosperous lives in righteous or aristocratic families. Those who are born in such families may take advantage of the facilities and try to elevate themselves to full Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
