{
    "_id": "BG6.40",
    "chapter": 6,
    "verse": 40,
    "slok": "श्रीभगवानुवाच |\nपार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते |\nन हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ||६-४०||",
    "transliteration": "śrībhagavānuvāca .\npārtha naiveha nāmutra vināśastasya vidyate .\nna hi kalyāṇakṛtkaścid durgatiṃ tāta gacchati ||6-40||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.40।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ ! उस पुरुष का, न तो इस लोक में और न ही परलोक में ही नाश होता है; हे तात ! कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.40 The Blessed Lord said  O Arjuna, neither in this world, nor in the next world is there destruction for him; none, verily, who does good, O My son, ever comes to grief.",
        "ec": "6.40 पार्थ O Partha, न not, एव verily, इह here, न not, अमुत्र in the next world, विनाशः destruction, तस्य of him, विद्यते is, न not, हि verily, कल्याणकृत् he who does good, कश्चित् anyone, दुर्गतिम् bad state or grief, तात O My son, गच्छति goes.Commentary He who has not succeeded in attaining to perfection in Yoga in this birth will not be destroyed in this world or in the next world. Surely he will not take a birth lower than the present one. What will he attain, then? This is described by the Lord in verses 41, 42, 43 and 44.\nTata: son. A disciple is regarded as a son."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.40 Lord Shri Krishna replied: My beloved child! There is no destruction for him, either in this world or in the next. No evil fate awaits him who treads the path of righteousness."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.40।। अपने उत्तर के प्रारम्भ में ही भगवान् स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि कोई भी शुभ कर्म करने वाला न इहलोक में और न परलोक में दुर्गति को प्राप्त होता है।भगवान् का यह कथन किसी अन्धविश्वास पर आधारित मात्र भावुक आश्वासन नहीं है अथवा न किसी देवदूत के माध्यम से दिया गया दैवी आदेश है जिसे धर्मपारायण लोगों को स्वीकार ही करना है। मनुष्य की बुद्धि एवं तर्क के विरुद्ध किसी भी मत को हिन्दू स्वीकार नहीं करते चाहे वह मत किसी देवता का ही क्यों न हो। धर्म जीवन का विज्ञान है और इसलिये उसमें प्रतिपादित सिद्धान्तों एवं साधनाओं का युक्तियुक्त विवेचन भी होना आवश्यक है।हमारी संस्कृति की इस विशिष्टता के अनुरूप ही भगवान् अपने कथन को स्पष्ट करते हुये कहते हैं कि हे तात  कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। वर्तमान में पुण्य कर्म करने वाला भविष्य में कभी दुख नहीं पायेगा क्योंकि भूत और वर्तमान का परिणत रूप ही भविष्य है।अर्जुन को योगभ्रष्ट के नाश की आशंका होने का कारण यह था कि जीवन की निरन्तरता और नियमबद्धता को वह ठीक से समझ नहीं पाया था। जन्म और मृत्यु के साथ ही जीव के अस्तित्व का प्रारम्भ और नाश हुआ समझना दर्शनशास्त्र की प्रारम्भिक अवस्था में ही संभव है। वस्तुत ऐसे सिद्धांत को दर्शन भी नहीं कहा जा सकता।साहसिक बुद्धि के जो जिज्ञासु साधक जीवन के नियम एवं अर्थ तथा विश्व के प्रयोजन को जानना चाहते हैं उन्हें यह स्वीकारना पड़ेगा कि मनुष्य का वर्तमान जीवन सत्य के वक्षस्थल को सुशोभित करने वाले अनन्त सौन्दर्य के कण्ठाभरण का एक मुक्ता है। भूत का परिणाम है वर्तमान और प्रत्येक विचार ज्ञान एवं कर्म के द्वारा हम भविष्य की रूपरेखा खींच रहे होते हैं। हिन्दुओं में देहधारी जीव के पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। इसी को पुनर्जन्म का सिद्धांत कहते हैं।इसी सिद्धांत के आधार पर श्रीकृष्ण यहाँ योगी के विनाश अथवा दुर्गति की संभावना को नकारते हैं। हो सकता है कि कभीकभी साधक का पतन होते हुए या मृत्यु होती हुई दिखाई दे किन्तु उनका विनाश नहीं होता। आज का परिणत रूप भविष्य है।पुत्र को संस्कृत में तात कहते हैं। उपनिषदों में भी शिष्य को पुत्र रूप में संबोधित किया गया है। उसी परम्परा के अनुसार अर्जुन को तात कहकर संबोधित करने में उसके प्रति भगवान् का पुत्रवत् भाव स्पष्ट हो जाता है। कोई व्यक्ति अन्य लोगों के प्रति कितनी ही दुष्टता एवं वंचना का भाव क्यों न रखता हो परन्तु अपने ही पुत्र को हानि पहुँचाने का विचार उसके मन में कभी नहीं आता। इसी पितृप्रेम से श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि साधक का कभी वास्तविक पतन नहीं होता। आत्मिक विकास की सीढ़ी पर एक भी सोपान चढ़ने का अर्थ है पूर्णत्व की ओर बढ़ना।योगसिद्धि को जो प्राप्त नहीं हुआ उसकी निश्चित रूप से क्या गति होती है भगवान् कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.40. The Bhagavat said  O dear Partha !  Neither in this [world], nor in the other is there a destruction for him.  Certainly, no performer of an auspicious act does ever come to a grievous state."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.40 The Lord said  Neither here (in this world) nor there (in the next), Arjuna, is there destruction for him. For, no one who does good ever comes to an evil end."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.40 The Blessed Lord said  O Partha, there is certainly no ruin for him here or hereafter. For, no one engaged in good meets with a deplorable end, My son!"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.40।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.40।।योगिनो नाशाशङ्कां परिहरन्नुत्तरमाह  श्री भगवानिति। यदुक्तमुभयभ्रष्टो योगी नश्यतीति तत्राह  पार्थेति। तत्र हेतुमाह  नैवेहीति। योगिनो मार्गद्वयाद्विभ्रष्टस्यैहिको नाशः शिष्टगर्हालक्षणो न भवतीति श्रद्धादेः सद्भावात्तथापि कथमामुष्मिकनाशशून्यत्वमित्याशङ्क्य तद्रूपनिरूपणपूर्वकं तदभावं प्रतिजानीते  नाशो नामेति। तत्र हेतुभागं विभजते  न हीत्यादिना। उभयभ्रष्टस्यापि श्रद्धेन्द्रियसंयमादेः सामिकृतश्रवणादेश्च भावादुपपन्नं शुभकृत्त्वम्। तातेति कथं पुत्रस्थानीयःशिष्यः संबोध्यते पितुरेव तातशब्दत्वादित्याशङ्क्याह  तनोतीति। तेन पुत्रस्थानीयस्य शिष्यस्य तातेति संबोधनमविरुद्धमित्यर्थः। न गच्छति कुत्सितां गतिं कल्याणकारित्वादिति नाशाभावः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.40।। श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।",
        "hc": "।।6.40।। व्याख्या--[जिसको अन्तकालमें परमात्माका स्मरण नहीं होता उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता--इस बातको लेकर अर्जुनके हृदयमें बहुत व्याकुलता है। यह व्याकुलता भगवान्से छिपी नहीं है। अतः भगवान् अर्जुनके कां गतिं कृष्ण गच्छति  इस प्रश्नका उत्तर देनेसे पहले ही अर्जुनके हृदयकी व्याकुलता दूर करते हैं।]\n\n'पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते'--हे पृथानन्दन! जो साधक अन्तसमयमें किसी कारणवश योगसे, साधनसे विचलित हो गया है, वह योगभ्रष्ट साधक मरनेके बाद चाहे इस लोकमें जन्म ले, चाहे परलोकमें जन्म ले, उसका पतन नहीं होता (गीता 6। 41 45)। तात्पर्य है कि उसकी योगमें जितनी स्थिति बन चुकी है, उससे नीचे वह नहीं गिरता। उसकी साधन-सामग्री नष्ट नहीं होती। उसका पारमार्थिक उद्देश्य नहीं बदलता। जैसे अनादिकालसे वह जन्मता-मरता रहा है, ऐसे ही आगे भी जन्मता-मरता रहे--उसका यह पतन नहीं होता।\n\nजैसे भरत मुनि भारतवर्षका राज्य छोड़कर एकान्तमें तप करते थे। वहाँ दयापरवश होकर वे हरिणके बच्चेमें आसक्त हो गये, जिससे दूसरे जन्ममें उनको हरिण बनना पड़ा। परन्तु उन्होंने जितना त्याग, तप किया था, उनकी जितनी साधनकी पूँजी इकट्ठी हुई थी, वह उस हरिणके जन्ममें भी नष्ट नहीं हुई। उनको हरिणके जन्ममें भी पूर्वजन्मकी बात याद थी, जो कि मनुष्यजन्ममें भी नहीं रहती। अतः वे (हरिण-जन्ममें) बचपनसे ही अपनी माँके साथ नहीं रहे। वे हरे पत्ते न खाकर सूखे पत्ते खाते थे। तात्पर्य यह है कि अपनी स्थितिसे न गिरनेके कारण हरिणके जन्ममें भी उनका पतन नहीं हुआ (श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 5, अध्याय 7 8)। इसी तरहसे पहले मनुष्यजन्ममें जिनका स्वभाव सेवा करनेका, जप-ध्यान करनेका रहा है, और विचार अपना उद्धार करनेका रहा है वे किसी कारणवश अन्तसमयमें योगभ्रष्ट हो जायँ तथा इस लोकमें पशु-पक्षी भी बन जायँ, तो भी उनका वह अच्छा स्वभाव और सत्संस्कार नष्ट नहीं होते। ऐसे बहुत-से उदाहरण आते हैं कि कोई दूसरे जन्ममें हाथी, ऊँट आदि बन गये, पर उन योनियोंमें भी वे भगवान्की कथा सुनते थे। एक जगह कथा होती थी, तो एक काला कुत्ता आकर वहाँ बैठता और कथा सुनता। जब कीर्तन करते हुए कीर्तन-मण्डली घूमती, तो उस मण्डलीके साथ वह कुत्ता भी घूमता था। यह हमारी देखी हुई बात है।'न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति'--भगवान्ने इस श्लोकके पूर्वार्धमें अर्जुनके लिये 'पार्थ' सम्बोधन दिया, जो आत्मीय-सम्बन्धका द्योतक है। अर्जुनके सब नामोंमें भगवान्को यह 'पार्थ' नाम बहुत प्यारा था। अब उत्तरार्धमें उससे भी अधिक प्यारभरे शब्दोंमें भगवान् कहते हैं कि 'हे तात् ! कल्याणकारी कार्य करनेवालेकी दुर्गति नहीं होती।' यह 'तात' सम्बोधन गीताभरमें एक ही बार आया है, जो अत्यधिक प्यारका द्योतक है।इस श्लोकमें भगवान्ने मात्र साधकके लिये बहुत आश्वासनकी बात कही है कि जो कल्याणकारी काम करनेवाला है अर्थात् किसी भी साधनसे सच्चे हृदयसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करना चाहता है, ऐसे किसी भी साधककी दुर्गति नहीं होती।उसकी दुर्गति नहीं होती--यह कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य कल्याणकारी कार्यमें लगा हुआ है अर्थात् जिसके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, उस अपने असली काममें लगा हुआ है तथा सांसारिक भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, वह चाहे किसी मार्गसे चले, उसकी दुर्गति नहीं होती। कारण कि उसका ध्येय चिन्मय-तत्त्व मैं (परमात्मा) हूँ; अतः उसका पतन नहीं होता। उसकी रक्षा मैं करता ही रहता हूँ, फिर उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है?\n\nमेरी दृष्टि स्वतः प्राणिमात्रके हितमें रहती है। जो मनुष्य मेरी तरफ चलता है, अपना परमहित करनेके लिये उद्योग करता है, वह मुझे बहुत प्यारा लगता है; क्योंकि वास्तवमें वह मेरा ही अंश है, संसारका नहीं। उसका वास्तविक सम्बन्ध मेरे साथ ही है। संसारके साथ उसका वास्तविक सम्बन्ध नहीं है। उसने मेरे साथ इस वास्तविक सम्बन्धको, असली लक्ष्यको पहचान लिया, तो फिर उसकी दुर्गति कैसे हो सकती है? उसका किया हुआ साधन भी नष्ट कैसे हो सकता है? हाँ, कभी-कभी देखनेमें वह मोहित हुआ-सा दीखता है, उसका साधन छूटा हुआ-सा दीखता है; परन्तु ऐसी परिस्थिति उसके अभिमानके कारण ही उसके सामने आती है। मैं भी उसको चेतानेके लिये, उसका अभिमान दूर करनेके लिये ऐसी घटना घटा देता हूँ, जिससे वह व्याकुल हो जाता है और मेरी तरफ तेजीसे चल पड़ता है। जैसे, गोपियोंका अभिमान (मद) देखकर मैं रासमें ही अन्तर्धान हो गया, तो सब गोपियाँ घबरा गयीं! जब वे विशेष व्याकुल हो गयीं, तब मैं उन गोपियोंके समुदायके बीचमें ही प्रकट हो गया और उनके पूछनेपर मैंने कहा--'मया परोक्षं भजता तिरोहितम्' (श्रीमद्भा0 10। 32। 21) अर्थात् तुमलोगोंका भजन करता हुआ ही मैं अन्तर्धान हुआ था। तुमलोगोंकी याद और तुमलोगोंका हित मेरेसे छूटा नहीं है। इस प्रकार मेरे हृदयमें साधन करनेवालोंका बहुत बड़ा स्थान है। इसका कारण यह है कि अनन्त जन्मोंसे भूला हुआ यह प्राणी जब केवल मेरी तरफ लगता है, तब वह मेरेको बहुत प्यारा लगता है; क्योंकि उसने अनेक योनियोंमें बहुत दुःख पाया है और अब वह सन्मार्गपर आ गया है। जैसे माता अपने छोटे बच्चेकी रक्षा, पालन और हित करती रहती है, ऐसे ही मैं उस साधकके साधन और उसके हितकी रक्षा करते हुए उसके साधनकी वृद्धि करता रहता हूँ।\n\nतात्पर्य यह हुआ कि जिसके भीतर एक बार साधनके संस्कार पड़ गये हैं, वे संस्कार फिर कभी नष्ट नहीं होते। कारण कि उस परमात्माके लिये जो काम किया जाता है, वह 'सत्' हो जाता है--'कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते' (गीता 17। 27) अर्थात् उसका अभाव नहीं होता--'नाभावो विद्यते सतः'(गीता 2। 16)। इसी बातको भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि कल्याणकारी काम करनेवाले किसी भी मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। उसके जितने सद्भाव बने हैं, जैसा स्वभाव बना है, वह प्राणी किसी कारणवशात् किसी भी योनिमें चला जाय अथवा किसी भी परिस्थितिमें पड़ जाय, तो भी वे सद्भाव उसका कल्याण करके ही छोड़ेंगे। अगर वह किसी कारणसे किसी नीच योनिमें भी चला जाय तो वहाँ भी अपने सजातीय योनिवालोंकी अपेक्षा उसके स्वभावमें फरक रहेगा (टिप्पणी प0 377.1)।\n\nयद्यपि यहाँ अर्जुनका प्रश्न मरनेके बादकी गतिका है, तथापि परमात्माकी तरफ लगनेका बड़ा भारी माहात्म्य है--इस बातको बतानेके लिये यहाँ 'इह'पदसे 'इस जीवित अवस्थामें भी पतन नहीं होता'--ऐसा अर्थ भी लिया जा सकता है। ऐसा अर्थ लेनेसे यह शङ्का हो सकती है कि अजामिल-जैसा शुद्ध ब्राह्मण भी वेश्यागामी हो गया, बिल्वमङ्गल भी चिन्तामणि नामकी वेश्याके वशमें हो गये, तो इनका इस जीवित-अवस्थामें ही पतन कैसे हो गया? इसका समाधान यह है कि लोगोंको तो उनका पतन हो गया--ऐसा दीखता है, पर वास्तवमें उनका पतन नहीं हुआ है, क्योंकि अन्तमें उनका उद्धार ही हुआ है। अजामिलको लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आये और बिल्वमङ्गल भगवान्के भक्त बन गये। इस प्रकार वे पहले भी सदाचारी थे और अन्तमें भी उनका उद्धार हो गया, केवल बीचमें ही उनकी दशा अच्छी नहीं रही। तात्पर्य यह हुआ कि किसी कुसङ्गसे, किसी विघ्न-बाधासे, किसी असावधानीसे उसके भाव और आचरण गिर सकते हैं और 'मैं कौन हूँ, मैं क्या कर रहा हूँ, मुझे क्या करना चाहिये'--ऐसी विस्मृति होकर वह संसारके प्रवाहमें बह सकता है। परन्तु पहलेकी साधनावस्थामें वह जितना साधन कर चुका है, उसका संसारके साथ जितना सम्बन्ध टूट चुका है, उतनी पूँजी तो उसकी वैसी-की-वैसी ही रहती है अर्थात् वह कभी किसी अवस्थामें छूटती नहीं, प्रत्युत उसके भीतर सुरक्षित रहती है। उसको जब कभी अच्छा संग मिलता है अथवा कोई बड़ी आफत आती है तो वह भीतरका भाव प्रकट हो जाता है और वह भगवान्की ओर तेजीसे लग जाता है (टिप्पणी प0 377.2)। हाँ, साधनमें बाधा पड़ जाना, भाव और आचरणोंका गिरना तथा परमात्म-प्राप्तिमें देर लगना--इस दृष्टिसे तो उसका पतन हुआ ही है। अतः उपर्युक्त उदाहरणोंसे साधकको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें हर समय सावधान रहना है, जिससे हम कहीं कुसंगमें न पड़ जायँ, कहीं विषयोंके वशीभूत होकर अपना साधन न छोड़ दें और कहीं विपरीत कामोंमें न चले जायँ।\n\n सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दिया कि किसी भी साधकका पतन नहीं होता और वह दुर्गतिमें नहीं जाता। अब भगवान् अर्जुनद्वारा सैंतीसवें श्लोकमें किये गये प्रश्नके अनुसार योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.40।।श्रीभगवानुवाच  श्रद्धया योगे प्रक्रान्तस्य तस्मात् प्रच्युतस्य इह च अमुत्र च विनाशः न विद्यते प्राकृतस्वर्गादिभोगानुभवे ब्रह्मानुभवे च अभिलषितानवाप्तिरूपः प्रत्यवायाख्यः अनिष्टावाप्तिरूपश्च विनाशो न विद्यते इत्यर्थः। न हि निरतिशयकल्याणरूपयोगकृत् कश्चित् कालत्रये अपि दुर्गतिं गच्छति।कथम् अयं भविष्यति इत्यत्राह",
        "et": "6.40 The Lord said  Neither here nor there is destruction for him who has begun Yoga with faith and has then fallen away from it. The meaning is that there is no destruction either in the form of failure of attainment of desires or in the form of Pratyavaya, which means the attainment of what is undesirable because of defects in the performance of works. Therefore no one who practises this incomparably auspicious Yoga ever comes to an evil end in the present, past or future.\n\nSri Krsna explains how this is so:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.40।।अत्र निर्णयम् (S निर्णयः)पार्थेति।  न तस्य योगभ्रष्टस्य इह लोके परलोके (S परत्र) वा नाशोऽस्ति अनष्टश्रद्धत्वात् इति भावः(K adds तस्य लोकद्वयाविनाशिनः after भावः)।  स हि कल्याणं भगवन्मार्गलक्षणम् कृतवान्।  न च तत् अग्निष्टोमादिवत् क्षयि।",
        "et": "6.40 Partha etc.  The idea  [here]  is :  There is no  [estion of]  destruction for the fallen-from-Yoga,  either is this  world or in the other;  because his faith is not lost.  He has indeed  performed as auspicious  act of  seeking  the Bhagavat,  and that act is not of perishing nature as the Agnistoma  sacrifice etc., are."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.40।।श्रीभगवान् बोले  हे पार्थ  उस योगभ्रष्ट पुरुषका इस लोकमें या परलोकमें कहीं भी नाश नहीं होता है। पहलेकी अपेक्षा हीनजन्मकी प्राप्तिका नाम नाश है सो ऐसी अवस्था योगभ्रष्टकी नहीं होती। क्योंकि हे तात  शुभ कार्य करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको अर्थात् नीच गतिको नहीं पाता। पिता पुत्ररूपसे आत्माका विस्तार करता है अतः उसको तात कहते हैं तथा पिता ही पुत्ररूपसे उत्पन्न होता है अतः पुत्रको भी तात कहते हैं। शिष्य भी पुत्रके तुल्य है इसलिये उसको भी तात कहते हैं।",
        "sc": "।।6.40।। हे पार्थ नैव इह लोके नामुत्र परस्मिन् वा लोके विनाशः तस्य विद्यते नास्ति। नाशो नाम पूर्वस्मात् हीनजन्मप्राप्तिः स योगभ्रष्टस्य नास्ति। न हि यस्मात् कल्याणकृत् शुभकृत् कश्चित् दुर्गतिं कुत्सितां गतिं हे तात तनोति आत्मानं पुत्ररूपेणेति पिता तात उच्यते। पितैव पुत्र इति पुत्रोऽपि तात उच्यते। शिष्योऽपि पुत्र उच्यते। यतो न गच्छति।।किं तु अस्य भवति",
        "et": "6.40 O Partha, eva vidyate, there is certainly; na vinasah, no ruin; tasya, for him; iha, here, in this world; or amutra, hereafter, in the other world. Ruin means a birth inferior to the previous one; that is not there for one who has fallen from Yoga. Hi, for; na kascit, no one; kalyana-krt, engaged in good; gacchati, meets with; durgatim, a deplorable end; tata, My son! A father is called tata because he perpetuates himself (tanoti) through the son. Since the father himself becomes the son, therefore the son also is called tata. A disciple is called putra (son). [Sri krsna addressed Arjuna thus because the latter was his disciple.]\nBut what happens to him?"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.40।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.40।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच  पार्थेति सार्द्धैश्चतुर्भिः। इहामुत्र च तस्य न विनाशः। अत्रोपपत्तिमाह  न हीति। कल्याणकृदयं न त्वकल्याणकर्मकृत्। अन्यथाऽनिष्टफलं स्यादेव।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.40।।एवमर्जुनस्य योगिनं प्रति नाशाशङ्कां परिहरन्नुत्तरम्  श्रीभगवानुवाच  उभयविभ्रष्टो योगी नश्यतीति कोऽर्थः। किमिह लोके शिष्टविगर्हणीयो भवति वेदविहितकर्मत्यागात् यथा कश्चिदुच्छृङ्खलः किंवा परत्र निष्कृष्टां गतिं प्राप्नोति। यथोक्तं श्रुत्याअथैतयोः पथोर्न कतरेणचन ते कीटाः पतङ्गा यति दन्दशूकम् इति। तथाचोक्तं मनुनावान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाञ्च्युतः इत्यादि तदुभयमपि नेत्याह  हे पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य यथाशास्त्रं कृतसर्वकर्मसंन्यासस्य सर्वतो विरक्तस्य गुरुमुपसृत्य वेदान्तश्रवणादिकुर्वतोऽन्तराले मृतस्य योगभ्रष्टस्य विद्यते। उभयत्रापि तस्य विनाशो नास्तीत्यत्र हेतुमाह  हि यस्मात्कल्याणकृच्छास्त्रविहितकारी कश्चिदपि दुर्गतिमिहाकीर्ति परत्र च कीटादिरूपतां न गच्छति। अयं तु सर्वोत्कृष्ट एव सन् दुर्गतिं न गच्छतीति किमु वक्तव्यमित्यर्थ। तनोत्यात्मानं पुत्ररूपेणेति पिता तत उच्यते। स्वार्थेकेऽणि तत एव तातः राक्षसवायसादिवत्। पितैव च पुत्ररूपेण भवतीति पुत्रस्थानीयस्य शिष्यस्यतातेति संबोधनं कृपातिशयसूचनार्थम्। यदुक्तं योगभ्रष्टः कष्टां गतिं गच्छति अज्ञत्वे सति देवयानपितृयानमार्गान्यरासंबन्धित्वात्स्वधर्मभ्रष्टवदिति तदयुक्तम्। एतस्य देवयानमार्गासंबन्धित्वेन हेतोरसिद्धत्वात्। पञ्चाग्निविद्यायांय इत्थं विदुर्ये चामीऽरण्ये श्रद्धां सत्यमुपासते तेऽर्चिरभिसंभवन्ति इत्यविशेषेण पञ्चाग्निविदामिवातत्क्रतूनां श्रद्धासत्यवतां मुमुक्षूणामपि देवयानमार्गेण ब्रह्मलोकप्राप्तिकथनात् श्रवणादिपरायणस्य च योगभ्रष्टस्य श्रद्धावित्तो भूत्वेत्यनेन श्रद्धायाः प्राप्तत्वात् शान्तो दान्त इत्यनेन चानृतभाषणरूपवाग्व्यापारनिरोधरूपस्य सत्यस्य लब्धत्वात् बहिरिन्द्रियाणामुच्छृङ्खलव्यापारनिरोधो हि दमः। योगशास्त्रे चअहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः इति योगाङ्गत्वेनोक्तत्वात् यदि तु सत्यशब्देन ब्रह्मैवोच्यते तदापि न क्षतिः वेदान्तश्रवणादेरपि सत्यब्रह्मचिन्तनरूपत्वात् अतत्क्रतुत्वेऽपि च पञ्चाग्निविदामिव ब्रह्मलोकप्राप्तिसंभवात्। तथाच स्मृतिःसंन्यासाद्ब्रह्मणः स्थानम् इति। तथा प्राप्तैहिकवेदान्तवाक्यविचारस्यापि कृच्छ्राशीतिफलतुल्यफलत्वं स्मर्यते। एवंच संन्यासश्रद्धासत्यब्रह्मविचाराणामन्यतमस्यापि ब्रह्मलोकप्राप्तिसाधनत्वात्समुदितानां तेषां तत्साधनत्वं किं चित्रम्। अतएव सर्वक्रतुरूपत्वं योगिचरितस्य तैत्तिरीया आमनन्तितस्यैवं विदुषो यज्ञस्य इत्यादिना। स्मर्यते चस्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले सर्वापि दत्तावनिर्यज्ञानां च कृतं सहस्त्रमखिला देवाश्च संपूजिताः। संसाराच्च समुद्धृताः स्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योऽप्यसौ यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् इति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.40।। अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच  पार्थेति सार्धैश्चतुर्भिः। इह लोके नाश उभयभ्रंशात्पातित्यम् अमुत्र परलोके नाशो नरकप्राप्तिः तदुभयं तस्य नास्त्येव। यतः कल्याणकृच्छुभकारी कश्चिदपि दुर्गतिं न गच्छति। अयं च शुभकारी श्रद्धया योगे प्रवृत्तत्वात्। तातेति लोकरीत्योपलालयन्संबोधयति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.40।।एवमर्जुनेन संशयच्छेदनाय प्रार्थितः तं छेत्तुं श्रीभगवानुवाच  पार्थेति। तस्य योगभ्रष्टस्येहास्मिँल्लोकेऽमुत्र परलोके वा विनाशः पूर्वस्माद्धीनजन्मलाभो नरकप्राप्तिर्वा न विद्यते। हि यस्मात्कल्याणकृत्छुभकृत्कश्चिदपि दुर्गतिं न गच्छति न प्राप्नोति। तनोत्यात्मनां पुत्ररुपेणेति पिता ताता उच्यते। पितैव पुत्ररुपेणोत्पद्यति इति पुत्रोऽपि तात इत्युच्यते। शिष्यस्यापि पुत्रसमत्वादाह  हे तातेति।नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् इति मदुक्तं दिक्प्रदर्शकं अल्पबुद्धित्वात् स्त्रीस्वभावेन त्वया विस्मृत्य पृष्टमिति पार्थेति संबोधनेन ध्वनितम्। तथापि शिष्यत्वेन पुत्रतुल्यत्वात्पुनः पुनर्विस्तरेण मया बोधनीयोऽसीति सूचनायोक्तं तातेति। यत्तु इहामुत्र प्रवत्तस्येति शेषः। ततश्च इह यत्फलं मोचकज्ञानलक्षणं अमुत्रफलं स्वर्गादिलक्षणं तत्साधनं प्रवत्तस्येत्यर्थ इति तन्न। भाष्योक्तप्रकारेण सम्यग्वाक्यर्थोपपत्तौ लक्षणाया अध्याहारस्य च व्यर्थत्वात्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.40।।अथोभयपुरुषार्थान्वयमुखेन उभयविभ्रष्टतां परिहरति  पार्थेति।तस्य इत्यनेन परामृष्टमाकारद्वयमाह  श्रद्धयेति। इहामुत्रशब्दयोर्भूलोकस्वर्गलोकादिपरत्वं परिहृत्यात्र विवक्षितमाह  प्राकृतेति। यथा मुमुक्षोः पुण्यमपि पापकोटौ निक्षिप्यते तथा तस्य स्वर्गादिकमपीहशब्दनिर्देशार्हं प्रकरणसङ्गतं चेति भावः। विनाशशब्दःप्रत्यवायो न विद्यते 2।40 इति प्रागुक्तमप्यत्र सर्वं सङ्गृह्णातीत्याहप्रत्यवायाख्येति। कल्याणशब्दस्यात्र प्रस्तुतविशेषपर्यवसानव्यञ्जनायाहनिरतिशयेति।गच्छति इत्यनवच्छिन्नवर्तमाननिर्देशात्कालत्रयेऽपीत्युक्तम्। अनेककालोपचितानन्तपुण्यसाध्यत्वेन प्रागपि दुष्कृताभावः इदानीं च निरतिशयकल्याणरूपयोगप्रवृत्तिः परस्तादपि पुण्यलोकावाप्तियोगसिद्ध्यपवर्गप्रभृतिरिति कालत्रयेऽपि दुर्गत्यसम्भवः। दुर्गतिर्निरयोऽनिष्टमात्रं वा हिर्हेतौ प्रसिद्धौ वा। नहि योगे प्रक्रान्तस्य कस्यचित् कस्मिंश्चित्काले दुर्गतिप्राप्तिः कुतश्चित्प्रमाणात्सिद्धेति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.40।।एवं निश्चयात्मकमर्जुनस्य संशयवाक्यं श्रुत्वा भगवांस्तमाह  श्रीभगवानुवाच  पार्थेति। हे पार्थ तथासंशयानर्ह  इह लोके पूर्वत्यक्तकर्मानुकरणविहितधर्मभक्त्यादौ अमुत्र लोके परदास्यादिरूपे तस्य मदुक्तिविश्वासप्रवृत्तस्य विनाशः विशेषेण नाशो मददर्शनं न विद्यते। श्रद्धया मदुक्तिविश्वासप्रवृत्तौ कथं नाशः स्यात् यतोऽसाधारण्येनोत्तमकृतिप्रवृत्तस्य नाशो न भवतीत्याह  नहीति। भक्तत्वात्स्वबालकत्वेन तातेति सम्बोध्योपदिष्टम्। कल्याणकृत् धर्मादिबुद्ध्या फलेच्छासाधारण्येन शुभकृत् हीति निश्चयेन दुर्गतिं न गच्छति। तत्र श्रद्धयाऽत्र प्रवृत्तः कथं नश्येदित्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.40।।अत्रोत्तरं भगवानुवाच  पार्थेति। हे तातेति वात्सल्यात्संबोधयति। तस्येह विनाशो नीचयोनिप्राप्तिः अमुत्रविनाशो नरकप्राप्तिस्तदुभयमपि न जायते। हि यतः कल्याणकृच्छुभकृत् दुर्गतिं नैव प्राप्नोति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The Supreme Personality of Godhead said: Son of Pṛthā, a transcendentalist engaged in auspicious activities does not meet with destruction either in this world or in the spiritual world; one who does good, My friend, is never overcome by evil.",
        "ec": " In the Śrīmad-Bhāgavatam (1.5.17) Śrī Nārada Muni instructs Vyāsadeva as follows: tyaktvā sva-dharmaṁ caraṇāmbujaṁ harer bhajann apakvo ’tha patet tato yadi yatra kva vābhadram abhūd amuṣya kiṁ ko vārtha āpto ’bhajatāṁ sva-dharmataḥ “If someone gives up all material prospects and takes complete shelter of the Supreme Personality of Godhead, there is no loss or degradation in any way. On the other hand a nondevotee may fully engage in his occupational duties and yet not gain anything.” For material prospects there are many activities, both scriptural and customary. A transcendentalist is supposed to give up all material activities for the sake of spiritual advancement in life, Kṛṣṇa consciousness. One may argue that by Kṛṣṇa consciousness one may attain the highest perfection if it is completed, but if one does not attain such a perfectional stage, then he loses both materially and spiritually. It is enjoined in the scriptures that one has to suffer the reaction for not executing prescribed duties; therefore one who fails to discharge transcendental activities properly becomes subjected to these reactions. The Bhāgavatam assures the unsuccessful transcendentalist that there need be no worries. Even though he may be subjected to the reaction for not perfectly executing prescribed duties, he is still not a loser, because auspicious Kṛṣṇa consciousness is never forgotten, and one so engaged will continue to be so even if he is lowborn in the next life. On the other hand, one who simply follows strictly the prescribed duties need not necessarily attain auspicious results if he is lacking in Kṛṣṇa consciousness. The purport may be understood as follows. Humanity may be divided into two sections, namely, the regulated and the nonregulated. Those who are engaged simply in bestial sense gratifications without knowledge of their next life or spiritual salvation belong to the nonregulated section. And those who follow the principles of prescribed duties in the scriptures are classified amongst the regulated section. The nonregulated section, both civilized and noncivilized, educated and noneducated, strong and weak, are full of animal propensities. Their activities are never auspicious, because while enjoying the animal propensities of eating, sleeping, defending and mating, they perpetually remain in material existence, which is always miserable. On the other hand, those who are regulated by scriptural injunctions, and who thus rise gradually to Kṛṣṇa consciousness, certainly progress in life. Those who are following the path of auspiciousness can be divided into three sections, namely (1) the followers of scriptural rules and regulations who are enjoying material prosperity, (2) those who are trying to find ultimate liberation from material existence, and (3) those who are devotees in Kṛṣṇa consciousness. Those who are following the rules and regulations of the scriptures for material happiness may be further divided into two classes: those who are fruitive workers and those who desire no fruit for sense gratification. Those who are after fruitive results for sense gratification may be elevated to a higher standard of life – even to the higher planets – but still, because they are not free from material existence, they are not following the truly auspicious path. The only auspicious activities are those which lead one to liberation. Any activity which is not aimed at ultimate self-realization or liberation from the material bodily concept of life is not at all auspicious. Activity in Kṛṣṇa consciousness is the only auspicious activity, and anyone who voluntarily accepts all bodily discomforts for the sake of making progress on the path of Kṛṣṇa consciousness can be called a perfect transcendentalist under severe austerity. And because the eightfold yoga system is directed toward the ultimate realization of Kṛṣṇa consciousness, such practice is also auspicious, and no one who is trying his best in this matter need fear degradation."
    }
}
