{
    "_id": "BG6.32",
    "chapter": 6,
    "verse": 32,
    "slok": "आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन |\nसुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ||६-३२||",
    "transliteration": "ātmaupamyena sarvatra samaṃ paśyati yo.arjuna .\nsukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ sa yogī paramo mataḥ ||6-32||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.32।। हे अर्जुन ! जो पुरुष अपने समान सर्वत्र सम देखता है, चाहे वह सुख हो या दु:ख, वह परम योगी माना गया है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.32 He who, through the likeness of the Self, O Arjuna, sees eality everywhere, be it pleasure or pain, he is regarded as the highest Yogi.",
        "ec": "6.32 आत्मौपम्येन through the likeness of the Self? सर्वत्र everywhere? समम् eality? पश्यति sees? यः who? अर्जुन O Arjuna? सुखम् pleasure? वा and? यदि if? वा or? दुःखम् pain? सः he? योगी Yogi? परमः highest? मतः is regarded.Commentary He sees that whatever is pleasure or pain to himself is also pleasure or pain to all other beings. He does not harm anyone. He is ite harmless. He wishes good to all. He is compassionate to all creatures. He has a very soft and large heart. He sees thus eality everywhere as he is endowed with the right knowlede of the Self? as he beholds the Self only everywhere? and as he is established in the unity of the Self. Therefore he is considered as the highest among all Yogis. (Cf.VI.47)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.32 O Arjuna! He is the perfect saint who, taught by the likeness within himself, sees the same Self everywhere, whether the outer form be pleasurable or painful."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.32।। तत्त्वज्ञान और आत्मानुभव में स्थित योगीजन स्वभावत सर्वत्र व्याप्त आत्मा के दर्शन करते हैं। वे सभी कर्मों में आत्मा के वैभव को देखते हैं और जानते हैं कि उपाधियों के द्वारा किये जाने वाले समस्त कर्म आत्मकृपा से ही होते हैं। बाह्य स्थूल और आन्तरिक सूक्ष्म जगत् आत्मा की ही अभिव्यक्ति है।गीता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो अन्य के सुख एवं दुख को इस प्रकार समझता है जैसे वे उसके अपने ही हों। प्रसिद्ध नैतिक नियम है कि अन्य के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा कि उससे तुम अपेक्षा रखते हो। परन्तु यह नियम सामान्य मनुष्य को अप्रिय लगता है क्योंकि स्वार्थ के कारण वह सोचता है कि क्यों वह दूसरों को अपने ही समान समझे। अज्ञान तथा स्वार्थ के कारण लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति अनैतिकता की ओर झुक जाती है।पूर्व श्लोकों में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि क्यों हमें प्राणीमात्र से प्रेम करना चाहिए। योगी आत्मसाक्षात्कार के द्वारा समस्त सृष्टि को आत्मा की ही अभिव्यक्ति के रूप में पहचानता है अत सबसे प्रेम होना स्वाभाविक ही है। प्रत्येक मनुष्य को अपने शरीर से तादात्म्य होने के कारण शरीर के समस्त अंगों से उसे एक समान ही प्रेम होता है। यदि अकस्मात् दांतों से जिह्वा कट जाती है तो मनुष्य कभी भी दांतों को दण्ड देने का विचार नहीं करता क्योंकि दांतों में तथा जिह्वा में समान रूप से वह स्वयं व्याप्त है। इसी प्रकार आत्मा को पहचान लेने पर सम्पूर्ण नामरूप की सृष्टि आत्मस्वरूप ही बन जाती है और समस्त कालों में सर्वत्र केवल मैं (आत्मा) ही व्याप्त रहता हूँ।आत्मैकत्व दर्शन करने वाला सिद्ध व्यक्ति ही गीता में परम योगी माना गया है जो समाज को देता अधिक है और लेता कम है। प्रेम उसका श्वास है और करुणा उसकी जीविका।श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञानी पुरुष का जो उपर्युक्त वर्णन शब्दचित्र के माध्यम से किया गया है वह किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है किन्तु व्यावहारिक बुद्धि का अर्जुन उक्त लक्ष्य को पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है और वह प्रश्न के रूप में अपनी शंका को व्यक्त करता है।यथोक्त सम्यग्दर्शन रूप योग का संपादन दुष्कर जानकर उसकी प्राप्ति का निश्चयात्मक उपाय जानने की इच्छा से अर्जुन कहता है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.32. Whosoever finds pleasure or pain eally in all as in the case of himself-that person is considered to be a great man of Yoga, O Arjuna !"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.32 He who, by reason of the similarity of selves everywhere, sees the pleasure or pain as the same everywhere - that Yogin, O Arjuna, is deemed as the nighest."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.32 O Arjuna, that yogi is considered the best who judges what is happiness and sorrow in all beings by the same standard as he would apply to himself."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.32।।साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे आत्मौपम्येनेति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.32।।स्वैराचरणस्याप्रतिबन्धकत्वकथनात्परपीडनस्य योगिनः सम्यग्दर्शनं प्रत्यप्रतिबन्धकत्वप्रसक्तावुक्तं  किञ्चेति। अन्यदपि किञ्चिदुच्यते परमयोगिनो निर्देशद्वारा योगमाहात्म्यमित्यर्थः। उपमैवोपम्यमात्मा च तदौपम्यं च तेन सर्वभूतेषु यः समं पश्यतीत्युक्ते तदेव समदर्शनं प्रश्नपूर्वकं विवृणोति  किमित्यादिना। विकल्पार्थत्वं वारयति  वाशब्द इति। उपदर्शितसमदर्शनफलमभिलषति  न कस्यचिदिति। किमपेक्षया तस्य परमत्वं तत्राह  सर्वेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.32।। हे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।",
        "hc": "।।6.32।। व्याख्या--[जिसको इसी अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें 'ब्रह्मभूत' कहा है और जिसको अट्ठाईसवें श्लोकमें 'अत्यन्त सुख' की प्राप्ति होनेकी बात कही है, उस सांख्ययोगीका प्राणियोंके साथ कैसा बर्ताव होता है--इसका इस श्लोकमें वर्णन किया गया है। कारण कि गीताके ब्रह्मभूत सांख्ययोगीका सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें स्वाभाविक ही रति होती है--'सर्वभूतहिते रताः'(5। 25 12। 4)]'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन'--साधारण मनुष्य जैसे अपने शरीरमें अपनी स्थिति देखता है, तो उसके शरीरके किसी अङ्गमें किसी तरहकी पीड़ा हो-- ऐसा वह नहीं चाहता, प्रत्युत सभी अङ्गोंका समानरूपसे आराम चाहता है। ऐसे ही सब प्राणियोंमें अपनी समान स्थिति देखनेवाला महापुरुष सभी प्राणियोंका समानरूपसे आराम चाहता है। उसके सामने कोई दुःखी प्राणी आ जाय, तो अपने शरीरके किसी अङ्गका दुःख दूर करनेकी तरह ही उसका दुःख दूर करनेकी स्वाभाविक चेष्टा होती है। तात्पर्य है कि जैसे साधारण प्राणीकी अपने शरीरके आरामके लिये चेष्टा होती है, ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषकी दूसरोंके शरीरोंके आरामके लिये स्वाभाविक चेष्टा होती है।'सर्वत्र' कहनेका तात्पर्य है कि उसके द्वारा वर्ण, आश्रम, देश, वेश, सम्प्रदाय आदिका भेद न रखकर सबको समान रीतिसे सुख पहुँचानेकी स्वाभाविक चेष्टा होती है। ऐसे ही पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंको भी समानरीतिसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा होती है और साथ-ही-साथ उनका दुःख दूर करनेका भी स्वाभाविक उद्योग होता है।अपने शरीरके अङ्गोंका दुःख दूर करनेकी समान चेष्टा होनेपर भी अङ्गोंमें भेद-दृष्टि तो रहती ही है और रहना आवश्यक भी है। जैसे, हाथका काम पैरसे नहीं किया जाता। अगर हाथको हाथ छू जाय तो हाथ धोनेकी जरूरत नहीं पड़ती; परन्तु पैरको हाथ छू जाय तो हाथ धोना पड़ता है। अगर मल-मूत्रके अङ्गोंको हाथसे साफ किया जाय, तो हाथको मिट्टी लगाकर विशेषतासे धोना, निर्मल करना पड़ता है। ऐसे ही शास्त्र और वर्ण-आश्रमकी मर्यादाके अनुसार सबके सुख-दुःखमें समान भाव रखते हुए भी स्पर्श-अस्पर्शका ख्यालरखकर व्यवहार होना चाहिये। किसीके प्रति किञ्चिन्मात्र भी घृणाकी सम्भावना ही नहीं होनी चाहिये। जैसे अपने शरीरके पवित्र-अपवित्र अङ्गोंकी रक्षा करनेमें और उनको सुख पहुँचानेमें कोई कमी न रखते हुए भी शुद्धिकी दृष्टिसे उनमें स्पर्श-अस्पर्शका भेद रखते हैं। ऐसे ही शास्त्र-मर्यादाके अनुसार संसारके सभी प्राणियोंमें स्पर्श-अस्पर्शका भेद मानते हुए भी ज्ञानी महापुरुषके द्वारा उनका दुःख दूर करनेकी और उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टामें कभी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं आती। तात्पर्य है कि जैसे अपने शरीरका कोई अङ्ग अस्पृश्य होनेपर भी वह अप्रिय नहीं होता, ऐसे ही शास्त्रमर्यादाके अनुसार कोई प्राणी अस्पृश्य होनेपर भी उसमें प्रियता, हितैषिताकी कभी कमी नहीं होती।'सुखं वा यदि वा दुःखम्'-- अपने शरीरकी उपमासे दूसरोंके सुख-दुःखमें समान रहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि दूसरोंके शरीरके किसी अङ्गमें पीड़ा हो जाय, तो वह पीड़ा अपने शरीरमें भी हो जाय, अपनेको भी उस पीड़ाका अनुभव हो जाय। अगर ऐसी समता ली जाय तो अपनेको दुःख ही ज्यादा होगा; क्योंकि संसारमें दुःखी प्राणी ही ज्यादा हैं।दूसरी बात, जैसे विरक्त त्यागी महात्मालोग अपने शरीरकी और अपने शरीरके अङ्गोंमें होनेवाली पीड़ाकी उपेक्षा कर देते हैं, ऐसे ही दूसरोंके शरीरोंकी और उनके शरीरोंके अङ्गोंमें होनेवाली पीड़ाकी उपेक्षा हो जाय अर्थात् जैसे उनको अपने शरीरके सुख-दुःखका भान नहीं होता, ऐसे ही दूसरोंके सुख-दुःखका भी अपनेको भान न हो--यह भी उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य नहीं है।उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है कि जैसे शरीरमें आसक्त अज्ञानी पुरुषके शरीरमें पीड़ा होनेपर उस पीड़ाको दूर करनेमें और सुख पहुँचानेमें उसकी जैसी चेष्टा होती है, तत्परता होती है, ऐसे ही दूसरोंका दुःख दूर करनेमें और सुख पहुँचानेमें ज्ञानी महात्माओंकी स्वाभाविक चेष्टा होती है, तत्परता होती है।जैसे, किसीके हाथमें चोट लग गयी और वह लोक-समुदायमें जाता है तो उस पीड़ित हाथको धक्का न लग जाय, इसलिये दूसरे हाथको सामने रखकर उस पीड़ित हाथकी रक्षा करता है और उसको धक्का न लगे, ऐसा उद्योग करता है। परन्तु उसके मनमें कभी यह अभिमान नहीं आता कि मैं इस हाथकी पीड़ा दूर करनेवाला हूँ, इसको सुख पहुँचानेवाला हूँ। वह उस हाथपर ऐसा एहसान भी नहीं करता कि देख हाथ! मैंने तेरी पीड़ा दूर करनेके लिये कितनी चेष्टा की! पीड़ाको शान्त करनेपर वह अपनेमें विशेषताका भी अनुभव नहीं करता। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा दुःखी प्राणियोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा स्वाभाविक होती है। उनके मनमें यह अभिमान नहीं आता कि मैं प्राणियोंका दुःख दूर कर रहा हूँ; दूसरोंको सुख पहुँचा रहा हूँ। उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा करनेपर वे अपनेमें कोई विशेषता भी नहीं देखते। उनका स्वभाव ही दूसरोंका दुःख दूर करनेका, उनको सुख पहुँचानेका होता है।     ज्ञानी पुरुषके शरीरमें पीड़ा होती है, तो वह उसको सह सकता है और उसके द्वारा उस पीड़ाकी उपेक्षा भी हो सकती है; परन्तु दूसरेके शरीरमें पीड़ा हो तो उसको वह सह नहीं सकता। कारण कि जैसे दोनों हाथोंमें अपनी व्यापकता समान है, ऐसे ही सब शरीरोंमें अपनी स्थिति समान है। परन्तु जिस अन्तःकरणमें बोध हुआ है, उसमें पीड़ा सहनेकी शक्ति है और दूसरोंके अन्तःकरणमें पीड़ा सहनेकी वैसी सामर्थ्य नहीं है। अतः उनके द्वारा दूसरोंके शरीरोंकी पीड़ा दूर करनेमें विशेष तत्परता होती है। जैसे, इन्द्रने बिना किसी अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया। पीछे अश्विनी-कुमारोंने उनको पुनः जिला दिया। परन्तु जब इन्द्रका काम पड़ा, तब दधीचिने अपना शरीर छोड़कर उनको (वज्र बनानेके लिये) अपनी हड्डियाँ दे दीं! यहाँ शङ्का हो सकती है कि अपने शरीरके दुःखकी तो उपेक्षा होती है और दूसरोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होती--यह तो विषमता हो गयी! यह समता कहाँ रही? इसका समाधान है कि वास्तवमें यह विषमता समताकी जनक है, समताको प्राप्त करानेवाली है। यह विषमता समतासे भी ऊँचे दर्जेकी चीज है। साधक साधन-अवस्थामें ऐसी विषमता करता है, तो सिद्ध-अवस्थामें भी उसकी ऐसी ही स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। परन्तु उसके अन्तःकरणमें किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं आती।'स योगी परमो मतः'-- उसकी दृष्टिमें सिवाय परमात्माके कुछ नहीं रहा। वह नित्ययोग (परमात्माके नित्यसम्बन्ध) और नित्यसमतामें स्थित रहता है। कारण कि शरीर-संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे उसका परमात्मासे कभी वियोग होता ही नहीं और वह सभी अवस्थाओं तथा परिस्थितियोंमें एकरूप ही रहता है। अतः वह मुझे परमयोगी मान्य है। विशेष बात(1) यहाँ जैसे ध्यानयोगीके लिये 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति' कहा गया है, ऐसे ही कर्मयोगीके लिये 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' (5। 7) और ज्ञानयोगीके लिये 'सर्वभूतहिते रताः' (5। 25 12। 4) कहा गया है। परन्तु भक्तियोगमें तो भक्त सम्पूर्ण शरीरोंमें अपने इष्टदेवको देखता है (6। 30) और अपने कर्मोंके द्वारा उनका पूजन करता है--'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' (18। 46) तात्पर्य यह है कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी साधकोंको चाहिये कि वे सबमें अपने-आपको देखें तथा भक्तियोगी साधकोंको चाहिये कि वे सबमें ईश्वरको, अपने इष्टदेवको देखें।\n\n(2) सबको अपना भाई समझो--यह भ्रातृभाव बड़ा उत्तम है। परन्तु स्वार्थभावको लेकर जब भाई-भाई लड़ते हैं, तब भ्रातृभाव नहीं रहता, प्रत्युत वैरभाव पैदा हो जाता है। जैसे कौरवों और पाण्डवोंमें लड़ाई हो गयी। परन्तु 'आत्मौपम्येन सर्वत्र' अर्थात् शरीरभावमें कभी वैर नहीं हो सकता। जैसे अपने दाँतोंसे अपनी जीभ अथवा होठ कट जाय, तो दाँतोंको कोई नहीं तोड़ता अर्थत् दाँतोंके साथ कोई वैर नहीं करता। ऐसे ही अपने शरीरकी उपमासे जो सबमें सुख-दुःखको समान देखता है, उसमें कभी वैरभाव नहीं होता। इस शरीरभावसे भी ऊँचा है--भगवद्भाव। इस भावमें अपने इष्टदेवका भाव होता है। तात्पर्य है कि भगवद्भाव भ्रातृभाव और शरीरभावसे भी ऊँचा है। अतः भगवान्ने गीतामें जगह-जगह अपने भक्तोंकी बहुत महिमा गायी है; जैसे-- वह परम श्रेष्ठ है--'स मे युक्ततमो मतः' (6। 47) वे योगी मेरे मतमें अत्यन्त उत्कृष्ट हैं--'ते मे युक्ततमा मताः' (12। 2) वे भक्त मेरेको अत्यन्त प्यारे हैं--'भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः' (12। 20) आदिआदि।\n\n सम्बन्ध--जिस समताकी प्राप्ति सांख्ययोग और कर्मयोगके द्वारा होती है, उसी समताकी प्राप्ति ध्यानयोगके द्वारा भी होती है--इसको भगवान्ने दसवें श्लोकसे बत्तीसवें श्लोकतक बताया। अब अर्जुन ध्यानयोगसे प्राप्त समताको लेकर आगेके दो श्लोकोंमें अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.32।।आत्मनः च अन्येषां च आत्मनाम् असंकुचितज्ञानैकाकारतया औपम्येन स्वात्मनि च अन्येषु सर्वत्र वर्तमानं पुत्रजन्मादिरूपं सुखं तन्मरणादिरूपं च दुःखम् असम्बन्धसाम्यात् समं यः पश्यति परपुत्रजन्ममरणादिसमं स्वपुत्रजन्ममरणादिकं यः पश्यति इत्यर्थः। स योगी परमयोगकाष्ठं गतो मतः।",
        "et": "6.32 (iv) He who - because of the similarity between his own self and other selves, as they are all constituted similarly of uncontracted knowledge in their essential being - views the pleasures in the form of the birth of a son and the sorrows in the form of the death of a son of his own and of others, as eal, on the ground of their eal unrelatedness to such pleasures and pains to him. Viewing his own pleasures and pains of the above description as being not different from those of others of the same kind - tht Yogin is deemed the highest; he is judged as having reached the summit of Yoga. [The idea is to prevent misconstruing the verse as meaning  that one shares the joy and misery of all as his own. It means only that the highest type of yogins understand that the self is unrelated to the pain and pleasures of his own body-mind. He understands also that the same is the case with other selves.]"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.32।।आत्मौपम्येनेति।  सर्वस्य च सुखदुःखे आत्मतुल्यतया पश्यतीति स्वरूपमेतदनूदितम् न पुनरेषोऽपूर्वो विधिः।",
        "et": "6.32 Atma-etc.  'That he finds the pleasure  and pain of all on analogy of himself'.  This is only a statement of characteristic mark [of the Yogin];  and it is not an injunction enjoining a new action."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.32।।तथा और भी कहते हैं  आत्मा अर्थात् स्वयं आप और जिसके द्वारा उपमित किया जाय वह उपमा उस उपमाके भावको ( सादृश्यको ) औपम्य कहते हैं। हे अर्जुन  उस आत्मौपम्यद्वारा अर्थात् अपनी सदृशतासे जो योगी सर्वत्र  सब भूतोंमें तुल्य देखता है। वह तुल्य क्या देखता है सो कहते हैं   जैसे मुझे सुख प्रिय है वैसे ही सभी प्राणियोंको सुख अनुकूल है और जैसे दुःख मुझे अप्रिय  प्रतिकूल है वैसे ही वह सब प्राणियोंको अप्रिय  प्रतिकूल है। इस प्रकार जो सब प्राणियोंमें अपने समान ही सुख और दुःखको तुल्यभावसे अनुकूल और प्रतिकूल देखता है किसीके भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता यानी अहिंसक है। यहाँ वा शब्दका प्रयोग च के अर्थमें हुआ है। जो इस प्रकारका अहिंसक पुरुष पूर्ण ज्ञानमें स्थित है वह योगी अन्य सब योगियोंमें परम उत्कृष्ट माना जाता है।",
        "sc": "।।6.32।। आत्मौपम्येन आत्मा स्वयमेव उपमीयते अनया इत्युपमा तस्या उपमाया भावः औपम्यं तेन आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वभूतेषु समं तुल्यं पश्यति यः अर्जुन स च किं समं पश्यति इत्युच्यते  यथा मम सुखम् इष्टं तथा सर्वप्राणिनां सुखम् अनुकूलम्। वाशब्दः चार्थे। यदि वा यच्च दुःखं मम प्रतिकूलम् अनिष्टं यथा तथा सर्वप्राणिनां दुःखम् अनिष्टं प्रतिकूलं इत्येवम् आत्मौपम्येन सुखदुःखे अनुकूलप्रतिकूले तुल्यतया सर्वभूतेषु समं पश्यति न कस्यचित् प्रतिकूलमाचरति अहिंसक इत्यर्थः। यः एवमहिंसकः सम्यग्दर्शननिष्ठः स योगी परमः उत्कृष्टः मतः अभिप्रेतः सर्वयोगिनां मध्ये।।एतस्य यथोक्तस्य सम्यग्दर्शनलक्षणस्य योगस्य दुःखसंपाद्यतामालक्ष्य शुश्रूषुः ध्रुवं तत्प्राप्त्युपायम् अर्जुन उवाच",
        "et": "6.32 Atma-aupamyena: Atma means the self, i.e. oneself. That by which a comparison is made is an upama. The abstract from of that is aupamya. Atma-aupamya means a standard as would be applicable to oneself.\nO Arjuna, yah, he who; pasyati, judges; sarvatra, in all beings; samam, by the same standard, in the same manner; atma-aupamyena, as he would apply to himself-. And what does he view with sameness? That is being stated: As sukham, happiness, is dear to me, so also is happiness agreeable to all creatures.\nVa, and-the word va is (used) in the sense of and; just as yadi, whatever; duhkham, sorrow is unfavourable, unwelcome to me, so also is sorrow unwelcome and unfavourable to all creatures.\nIn this way, he looks upon happiness and sorrow as pleasant and unpleasant to all bengs, by the same standard as he would apply to himself. He does not act against anyone. That is , he is non-injurious. He who is thus non-injurious and steadfast in full Illumination, sah, that yogi; paramah matah, is considered as the best among all the yogis.\nNoticing that his Yoga-as spoken of and consisting in full Illumination- is hard to acire, Arjuna, with a view to hearing the sure means to its attainment, said:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.32।।सर्वत्र समदर्शनः 5।29 इत्यस्यान्यथाव्याख्यानमितोऽप्यसदिति भावेनाह  साम्यमिति। साम्यदर्शनम्। समदर्शन इत्युक्ते किं गोनवयादिवद्भवति सम्यग्दर्शनमित्याकाङ्क्षायामेकत्वमास्थित इति स्वयमेव व्याख्यातम्। इदानीं तु भगवदनुवर्तिविषयतयाऽपि व्याचष्ट इत्यर्थः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.32।।अतः स एवंविधो योगी परमो मत इत्याह  आत्मौपम्येनेति। स्वसादृश्येन सर्वत्र समं दुःखादिकं पश्यन् भवति स परमो योगी मतः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.32।।एवमुत्पन्नेऽपि तत्त्वबोधे कश्चिन्मनोनाशवासनाक्षययोरभावाज्जीवन्मुक्तिसुखं नानुभवति चित्तविक्षेपेण च दृष्टदुःखमनुभवति सोऽपरमो योगी देहपाते कैवल्यभागित्वाद्देहसद्भावपर्यन्तं च दृष्टदुःखानुभवात् तत्त्वज्ञानमनोनाशवासनाक्षयाणां तु युगपदभ्यासाद्दृष्टदुःखनिवृत्तिपूर्वकं जीवन्मुक्तिसुखमनुभवन्प्रारब्धकर्मवशात्समाधेर्व्युत्थानकाले  आत्मैवौपम्यमुपमा तेनात्मदृष्टान्तेन सर्वत्र प्राणिजाते सुखं वा यदि वा दुःखं समं तुल्यं यः पश्यति स्वस्यानिष्टं यथा न संपादयति एवं परस्याप्यनिष्टं यो न संपादयति प्रद्वेषशून्यत्वात् एवंस्वस्येष्टं यथा संपादयति तथा परस्यापीष्टं यः संपादयति रागशून्यत्वात् स निर्वासनतयोपशान्तमनाः योगी ब्रह्मवित् परमः श्रेष्ठो मतः पूर्वस्मात् हे अर्जुन अतस्तत्त्वज्ञानमनोनाशवासनाक्षयाणामाक्रममभ्यासाय महान्प्रयत्न आस्थेय इत्यर्थः। तत्रेदं सर्वं द्वैतजातमद्वितीये चिदानन्दात्मनि मायया कल्पितत्वान्मृषैव आत्मैवैकः परमार्थसत्यः सच्चिदानन्दाद्वयोऽहमस्मीति ज्ञानं तत्त्वज्ञानं प्रदीपज्वालासंतानवद्वृत्तिसंतानरूपेण परिणममानमन्तःकरणद्रव्यं मननात्मकत्वान्मन इत्युच्यते। तस्य नाशो नाम वृत्तिरूपपरिणामं परित्यज्य सर्ववृत्तिविरोधिना निरोधाकारेण परिणामः। पूर्वापरपरामर्शमन्तरेण सहसोत्पद्यमानस्य क्रोधादिवृत्तिविशेषस्य हेतुश्चित्तगतः संस्कारविशेषो वासना पूर्वपूर्वाभ्यासेन चित्ते वास्यमानत्वात्। तस्याः क्षयो नाम विवेकजन्यायां चित्तप्रशमवासनायां दृढायां सत्यपि बाह्ये निमित्ते क्रोधाद्यनुत्पत्तिः। तत्र तत्त्वज्ञाने सति मिथ्याभूते जगति नरविषाणादाविव धीवृत्त्यनुदयादात्मनश्च दृष्टत्वेन पुनर्वृत्त्यनुपयोगान्निरिन्धनाग्निवन्मनो नश्यति। नष्टे च मनसि संस्कारोद्बोधकस्य बाह्यस्य निमित्तस्याप्रतीतौ वासना क्षीयते। क्षीणायां वासनायां हेत्वभावेन क्रोधादिवृत्त्यनुदयान्मनो नश्यति। नष्टे च मनसि शमदमादिसंपत्त्या तत्त्वज्ञानमुदेति। एवमुत्पन्ने तत्त्वज्ञाने रागद्वेषादिरूपा वासना क्षीयते। क्षीणायां च वासनायां प्रतिबन्धाभावात्तत्त्वज्ञानोदय इति परस्परकारणत्वं दर्शनीयम्। अतएव भगवान्वसिष्ठ आहतत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासनाक्षय एव च। मिथः करणतां गत्वा दुःसाध्यानि स्थितानि हि।।तस्माद्राघव यत्नेन पौरुषेण विवेकिना। भोगेच्छां दुरतस्त्यक्त्वा त्रयमेतत्समाश्रयेत।। इति। पौरुषो यत्नः केनाप्युपायेनावश्यं संपादयिष्यामीत्येवंविधोत्साहरूपो निर्बन्धः। विवेको नाम विविच्य निश्चयः। तत्त्वज्ञानस्य श्रवणादिकं साधनं मनोनाशस्य योगः वासनाक्षयस्य प्रतिकूलवासनोत्पादनमिति। एतादृशविवेकयुक्तेन पौरुषेण प्रयत्नेन भोगेच्छायाः स्वल्पाया अपि हविषा कृष्णवर्त्मेवेति न्यायेन वासनावृद्धिहेतुत्वाद्दूरत इत्युक्तम्। द्विविधो हि विद्याधिकारी कृतोपास्तिरकृतोपास्तिश्च। तत्र य उपास्यसाक्षात्कारपर्यन्तामुपास्तिं कृत्वा तत्त्वज्ञानाय प्रवृत्तस्तस्य वासनाक्षयमनोनाशयोर्दृढतरत्वेन ज्ञानादूर्ध्वं जीवन्मुक्तिः स्वत एव सिध्यति। इदानींतनस्तु प्रायेणाकृतोपास्तिरेव मुमुक्षुरौत्सुक्यमात्रत्वात्सहसा विद्यायां प्रवर्तते। योगं विना चिज्जडविवेकमात्रेणैव च मनोनाशवासनाक्षयौ तात्कालिकौ संपाद्य शमदमादिसंपत्त्या श्रवणमनननिदिध्यासनानि संपादयति। तैश्च दृढाभ्यस्तैः सर्वबन्धविच्छेदि तत्त्वज्ञानमुदेति। अविद्याग्रन्थिरब्रह्मत्वं हृदयग्रन्थिः संशयाः कर्माणि सर्वकामत्वं मृत्युः पुनर्जन्म चेत्यनेकविधो बन्धो ज्ञानान्निवर्तते। तथाच श्रुयतेयो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्यब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतिभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरेसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मयो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान्कामान्सहतमेव विदित्वातिमृत्युमेतियस्तु विज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायतेय एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदँ्सर्वं भवति इत्यसर्वज्ञत्वनिवृत्तिफलमुदाहार्यम्। सेयं विदेहमुक्तिः सत्यपि देहे ज्ञानोत्पत्तिसमकालीना ज्ञेया। ब्रह्मण्यविद्याध्यारोपितानामेतेषां बन्धानामविद्यानाशे सति निवृत्तौ पुनरुत्पत्त्यसंभवात्। अतः शैथिल्यहेवभावात्तत्त्वज्ञानं तस्यानुवर्तते। मनोनाशवासनाक्षयौ तु दृढाभ्यासाभावाद्भोगप्रदेन प्रारब्धेन कर्मणा बाध्यमानत्वाच्च सवातप्रदेशप्रदीपवत्सहसा निवर्तते। अत इदानींतनस्य तत्त्वज्ञानिनः प्राक्सिद्धे तत्त्वज्ञाने न प्रयत्नापेक्षा किंतु मनोनाशवासनाक्षयौ प्रयत्नसाध्याविति। तत्र मनोनाशोऽसंप्रज्ञातसमाधिनिरूपणेन निरूपितः प्राक्। वासनाक्षयस्त्विदानीं निरूप्यते। तत्र वासनास्वरूपं वसिष्ठ आहदृढभावनया त्यक्तपूर्वापरविचारणम्। यदादानं पदार्थस्य वासना सा प्रकीर्तिता।। अत्रच स्वस्वदेशाचारकुलधर्मस्वभावभेदतद्गतापशब्दसुशब्दादिषु प्राणिनामभिनिवेशः सामान्येनोदाहरणम्। सा च वासना द्विविधा मलिना शुद्धा च। शुद्धा दैवी सम्पत् शास्त्रसंस्कारप्राबल्यात्तत्त्वज्ञानसाधनत्वेनैकरूपैव। मलिना तु त्रिविधा लोकवासना शास्त्रवासना देहवासना चेति। सर्वे जना यथा न निन्दन्ति तथैवाचरिष्यामीत्यशक्यार्थाभिनिवेशो लोकवासना। तस्याश्चको लोकमाराधयितुं समर्थः इति न्यायेन संपादयितुमशक्यत्वात्पुरुषार्थानुपयोगित्वाच्च मलिनत्वम्। शास्त्रवासना तु त्रिविधा पाठव्यसनं बहुशास्त्रव्यसनं अनुष्ठानव्यसनं चेति क्रमेण भरद्वाजस्य दुर्वाससो निदाघस्य च प्रसिद्धा। मलिनत्वं चास्याः क्लेशावहत्वात्पुरुषार्थानुपयोगित्वाद्दर्पहेतुत्वाज्जन्महेतुत्वाच्च। देहवासनापि त्रिविधा आत्मत्वभ्रान्तिर्गुणाधानभ्रान्तिर्दोषापनयनभ्रान्तिश्चेति। तत्रात्मत्वभ्रान्तिर्विरोचनादिषु प्रसिद्धा सार्वलौकिकी। गुणाधानं द्विविधं लौकिकं शास्त्रीयं च। समीचीनशब्दादिविषयसंपादनं लौकिकं गङ्गास्नानशालग्रामतीर्थादिसंपादनं शास्त्रीयम्। दोषापनयनमपि द्विविधं लौकिकं शास्त्रीयं च। चिकित्सकोक्तैरोषधैर्व्याध्याद्यपनयनं लौकिकम्। वैदिकस्नानाचमनादिभिरशौचाद्यपनयनं वैदिकम्। एतस्याश्च सर्वप्रकाराया मलिनत्वमप्रामाणिकत्वादशक्यत्वात्पुरुषार्थानुपयोगित्वात्पुनर्जन्महेतुत्वाच्च शास्त्रे प्रसिद्धम्। तदेतल्लोकशास्त्रदेहवासनात्रयमविवेकिनामुपादेयत्वेन प्रतिभासमानमपि विविदिषोर्वेदनोत्पत्तिविरोधित्वाद्विदुषो ज्ञाननिष्ठाविरोधित्वाच्च विवेकिभिर्हेयम्। तदेवं बाह्यविषयवासना त्रिविधा निरूपिता। आभ्यन्तरवासना तु कामक्रोधदम्भदर्पाद्यासुरसंपद्रूपा सर्वानर्थमूलं मानसी वासनेत्युच्यते। तदेवं बाह्याभ्यन्तरवासनाचतुष्टयस्य शुद्धवासनया क्षयः संपादनीयः। तदुक्तं वसिष्ठेनमानसीर्वासनाः पूर्वं त्यक्त्वा विषयवासनाः। मैत्र्यादिवासना राम गृहाणामलवासनाः।। इति।  तत्र विषयवासनाशब्देन पूर्वोक्तास्तिस्त्रो लोकशास्त्रदेहवासना विवक्षिताः। मानसवासनाशब्देनकामक्रोधदम्भदर्पाद्यासुरसंपद्विवक्षिता। यद्वा शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा विषयाः। तेषां भुज्यमानत्वदशाजन्यः संस्कारो विषयवासना। काम्यमानत्वदशाजन्यः संस्कारो मानसवासना। अस्मिन्पक्षे पूर्वोक्तानां चतसृणामनयोरेवान्तर्भावः बाह्याभ्यन्तरव्यतिरेकेण वासनान्तरासंभवात्। तासां वासनानां परित्यागो नाम तद्विरुद्धमैत्र्यादिवासनोत्पादनम्। ताश्च मैत्र्यादिवासना भगवता पतञ्जलिना सूत्रिताः प्राक् संक्षेपेण व्याख्याता अपि पुनर्व्याख्यायन्ते। चित्तं हि रागद्वेषपुण्यपापैः कलुषीक्रियते। तत्रसुखानुशयी रागः मोहादनुभूयमानं सुखमनुशेते कश्चिद्धीवृत्तिविशेषो राजसः सर्वं सुखजातीयं मे भूयादिति। तच्च दृष्टादृष्टसामग्र्यभावात्संपादयितुमशक्यम्। अतः स रागश्चित्तं  कलुषीकरोति। यदा तु सुखिषु प्राणिष्वयं मैत्रीं भावयेत्सर्वेऽप्येते सुखिनो मदीया इति तदा तत्सुखं स्वकीयमेव संपन्नमिति भावयतस्तत्र रागो निवर्तते। यथा स्वस्य राज्यनिवृत्तावापि पुत्रादिराज्यमेव स्वकीयं राज्यं तद्वत्। निवृत्ते च रागे वर्षाव्यपाये जलमिव चित्तं प्रसीदति। तथादुःखानुशयी द्वेषः दुःखमनुशेते कश्चिद्धीवृत्तिविशेषस्तमोनुगतरजःपरिणाम ईदृशं सर्वं दुःखं सर्वदा मे मा भूदिति। तच्च शत्रुव्याघ्रादिषु सत्सु न निवारयितुं शक्यम्। नच सर्वे ते दुःखहेतवो हन्तुं शक्यन्ते। अतः स द्वेषः सदा हृदयं दहति। यदा तु स्वस्येव परेषां सर्वेषामपि दुःखं माभूदिति करुणां दुःखिषु भावयेत्तदा वैर्यादिद्वेषनिवृत्तौ चित्तं प्रसीदति। तथाच स्मर्यतेप्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा। आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः।। इति। एतदेवेहाप्युक्तं  आत्मौपम्येन सर्वत्रेत्यादि। तथा प्राणिनः स्वभावत एव पुण्यं नानुतिष्ठन्ति पापं त्वनुतिष्ठन्ति। तदाहुःपुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः। न पापफलमिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः।। इति। ते च पुण्यपापे अक्रियमाणक्रियमाणे पश्चात्तापं जनयतः। सच श्रुत्यानूदितःकिमहं साधु नाकरवं किमहं पापमकरवम् इति। यद्यसौ पुण्यपुरुषेषु मुदितां भावयेत्तदा तद्वासनावान्स्वयमेवाप्रमत्तोऽशुक्लकृष्णे पुण्ये प्रवर्तते। तदुक्तंकर्माशुक्लकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् अयोगिनां त्रिविधं शुक्लं शुभं कृष्णमशुभं शुक्लकृष्णं शुभाशुभमिति। तथा पापपुरुषेषूपेक्षां भावयन्स्वयमपि तद्वासनावान्पापान्निवर्तते। ततश्च पुण्याकरणपापकरणनिमित्तस्य पश्चात्तापस्याभावे चित्तं प्रसीदति। एवं सुखिषु मैत्रीं भावयतो न केवलं रागो निवर्तते किंत्वसूयेर्ष्यादयोऽपि निवर्तन्ते। परगुणेषु दोषविष्करणमसूया। परगुणानामसहनमीर्ष्या। यदा मैत्रीवशात्परसुखं स्वीयमेव संपन्नं यदा परगुणेषु कथमसूयादिकं संभवेत्। तथा दुःखिषु करुणां भावयतः शत्रुवधादिकरो द्वेषो यदा निवर्तते तदा दुःखित्वप्रतियोगिकस्वसुखित्वप्रयुक्तदर्पोऽपि निवर्तते। एवं दोषान्तरनिवृत्तिरप्यूहनीया वासिष्ठरामायणादिषु। तदेवं तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासनाक्षयश्चेति त्रयमभ्यसनीयम्। तत्र केनापि द्वारेण पुनःपुनस्तत्त्वानुस्मरणं तत्त्वज्ञानाभ्यासः। तदुक्तं वासिष्ठेतच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्। एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यासं विदुर्बुधाः।।सर्गादावेव नोत्पन्नं दृश्यं नास्त्येव सर्वदा। इदं जगदहं चेति बोधाभ्यासं विदुः परम्।। इति। दृश्यावभासविरोधियोगाभ्यासो मनोनिरोधाभ्यासः। तदुक्तंअत्यन्ताभावसंपत्तौ ज्ञातुर्ज्ञेयस्य वस्तुनः। युक्त्या शास्त्रैर्यतन्ते ये तेऽप्यत्राभ्यासिनः स्थिताः।। इति। ज्ञातृज्ञेययोर्मिथ्यात्वधीरभावसंपत्तिः। स्वरूपेणाप्रतीतिरत्यन्ताभावसंपत्तिस्तदर्थं युक्त्या योगेनदृश्यासंभवबोधेन रागद्वेषादितानवे। रतिर्घनोदिता याऽसौ ब्रह्माभ्यासः स उच्यते।। इति रागद्वेषादिक्षीणतारूपवासनाक्षयाभ्यास उक्तः। तस्मादुपपन्नेमेतत्तत्त्वज्ञानाभ्यासेन मनोनाशाभ्यासेन वासनाक्षयाभ्यासेन च रागद्वेषशून्यतया यः स्वपरसुखदुःखादिषु समदृष्टिः स परमो योगी मतः यस्तु विषमदृष्टिः स तत्त्वज्ञानवानप्यपरमो योगीति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.32।।एवंच मां भजतां योगिनां मध्ये सर्वभूतानुकम्पी श्रेष्ठ इत्याह  आत्मौपम्येनेति। आत्मौपम्येन स्वसादृश्येन यथा मम सुखं प्रियं दुःखं चाप्रियं तथान्येषामपीति सर्वत्र समं पश्यन् सुखमेव सर्वेषां यो वाञ्छति नतु कस्यापि दुःखं स योगी श्रेष्ठो ममाभिमत इत्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.32।।ननु सर्वथा वर्तमानोऽपीत्युक्त्या कस्यचिहुःखहेतुभूतापि तस्य प्रवृत्तिः प्राप्तेति चेत्तर्हि तल्लक्षणं श्रृण्वित्याशयेनाह  आत्मेति। आत्मा स्वयमेव उपमाया भाव औपम्ायं तेन यः सर्वेषु भूतेषु। वाशब्दौ चार्थे। सुथं च यच्च दुःखं समं पश्यति यथा मम सुखदुःखे अनुकूलप्रतिकूले तथा सर्वस्यापीति तुल्यतया सर्वत्र समं पश्यति। न कस्यचित्प्रतिकुल माचरति अहिंसक इत्यर्थः। स सर्वेषां योगिनां मध्ये परमः श्रेष्ठो योगी मे मम मतः अमिमतः। तथाच महता प्रय्त्नेनापि परमयोगित्वलाभाय एतलक्षणं संपादनीयमित्याशयः। यद्यपि यः सर्वप्रकारेण वर्तते सोऽपि मुच्यत एव। तथाप्यत्र निषिद्धाद्याचरणात्सकलङ्गो भवति। अयं तु तथात्वाभावादत्रापि निष्कलङ्कः शुद्ध इति सूचयन्नाह  अर्जुनेति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.32।।प्रबलदुःखहेत्वागमेऽपि निर्विकारत्वापादिकां योगविपाककाष्ठाभूतां कर्मज्ञानतारतम्यप्रयुक्तसुखदुःखतारतम्यनिवृत्त्यनुसन्धानरूपां चतुर्थीं दशामाहेत्याह  ततोऽपि काष्ठामाहेति।आत्मौपम्येन इत्यस्य न पश्यतिनाऽन्वयः सममित्यनेन पौनरुक्त्यप्रसङ्गात्। अतः सर्वत्रात्मौपम्येनेत्यन्वयः। उपमाशब्दस्तुल्यवचनः। तस्य भाव औपम्यं सर्वेषामात्मनां पूर्वोक्तेन देहविलक्षणत्वादिसाम्येनेत्यर्थः।सर्वत्र इत्येतदेव काकाक्षिन्यायेनसमं पश्यति इत्यत्राप्यन्वितम्। सर्वेषामत्यन्तविषमतयाउपलक्ष्यमाणसुखदुःखान्वयसाम्यभ्रमव्युदासेन व्यतिरेकसाम्यानुसन्धानं दर्शयति  असम्बन्धसाम्यादिति। परेष्वसम्बन्धानुसन्धानस्य निष्प्रयोजनत्वादिहाभिप्रेतमाह  परेति। परंपुत्रजन्मादेः स्वात्मनि स्वपुत्रजन्मादेश्च परेषु यथा न सम्बन्धः तथा स्वात्मन्यपीत्युक्तं भवति। परमशब्दाभिप्रेतमाहपरमयोगकाष्ठां गतो मत इति। जीवात्मयोगकाष्ठेयम् परमात्मयोगस्य परस्ताद्वक्ष्यमाणत्वात्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.32।।ननु सर्वत्र कथमेकात्मत्वेन वर्तते इत्यत आह  आत्मौपम्येनेति। आत्मौपम्येन स्वसादृश्येन यथा स्वस्य कृपया संयोगरसाप्तौ सुखं वियोगरसाप्तौ दुःखं तथा सर्वत्र सर्वजीवेषु सुखं यदि वा दुःखं समं यः पश्यति स योगी मम परम उत्कृष्टो मतोऽभिमत इत्यर्थः। अत्रायं भावः  योऽलौकिकसुखदुःखाभिनिविष्टेष्वपि जीवेषु यथा स्वस्य तदंशलेशज्ञानेन सुखदुःखरसानुभवो भवति तथैव सर्वेषामप्यस्ति एवं यस्य सर्वत्रालौकिकस्फूर्तिः स्यात् स उत्तम इति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.32।।यद्यपि निषिद्धकर्मणाप्यात्मविन्न बध्यते तथापि शीलवानेव योगी श्रेष्ठ इत्याह  आत्मौपम्येनेति। यथा स्वस्य सुखमिष्टं दुःखमनिष्टं तद्वत्परस्यापीति बुद्ध्या योऽन्यस्मै दुःखं न प्रयच्छति सोऽहिंसकः परमयोगी मत इत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "He is a perfect yogī who, by comparison to his own self, sees the true equality of all beings, in both their happiness and their distress, O Arjuna!",
        "ec": " One who is Kṛṣṇa conscious is a perfect yogī; he is aware of everyone’s happiness and distress by dint of his own personal experience. The cause of the distress of a living entity is forgetfulness of his relationship with God. And the cause of happiness is knowing Kṛṣṇa to be the supreme enjoyer of all the activities of the human being, the proprietor of all lands and planets, and the sincerest friend of all living entities. The perfect yogī knows that the living being who is conditioned by the modes of material nature is subjected to the threefold material miseries due to forgetfulness of his relationship with Kṛṣṇa. And because one in Kṛṣṇa consciousness is happy, he tries to distribute the knowledge of Kṛṣṇa everywhere. Since the perfect yogī tries to broadcast the importance of becoming Kṛṣṇa conscious, he is the best philanthropist in the world, and he is the dearest servitor of the Lord. Na ca tasmān manuṣyeṣu kaścin me priya-kṛttamaḥ (Bg. 18.69) . In other words, a devotee of the Lord always looks to the welfare of all living entities, and in this way he is factually the friend of everyone. He is the best yogī because he does not desire perfection in yoga for his personal benefit, but tries for others also. He does not envy his fellow living entities. Here is a contrast between a pure devotee of the Lord and a yogī interested only in his personal elevation. The yogī who has withdrawn to a secluded place in order to meditate perfectly may not be as perfect as a devotee who is trying his best to turn every man toward Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
