{
    "_id": "BG6.15",
    "chapter": 6,
    "verse": 15,
    "slok": "युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः |\nशान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ||६-१५||",
    "transliteration": "yuñjannevaṃ sadātmānaṃ yogī niyatamānasaḥ .\nśāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchati ||6-15||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.15।। इस प्रकार सदा मन को स्थिर करने का प्रयास करता हुआ संयमित मन का योगी मुझमें स्थित परम निर्वाण (मोक्ष) स्वरूप शांति को प्राप्त होता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.15 Thus always keeping the mind balanced, the Yogi, with the mind controlled, attains to the peace abiding in Me, which culminates in liberation.",
        "ec": "6.15 युञ्जन्  balancing? एवम् thus? सदा always? आत्मानम् the self? योगी Yogi? नियतमानसः one with the controlled mind? शान्तिम् to peace? निर्वाणपरमाम् that which culminates in Nirvana (Moksha)? मत्संस्थाम् abiding in Me? अधिगच्छति attains.Commentary Thus in the manner prescribed in the previous verse.The Supreme Self is an embodiment of peace. It is an ocean of peace. When one attains to the supreme peace of the Eternal? by controlling the modifications of the mind and keeping it always balanced? he attains to liberation or perfection."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.15 Thus keeping his mind always in communion with Me, and with his thoughts subdued, he shall attain that Peace which is mine and which will lead him to liberation at last."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.15।। शरीर का आसन मन का भाव बुद्धि के द्वारा चिन्तन का वर्णन करने के पश्चात् अब भगवान् ध्यानविधि के अन्तिम चरण का वर्णन अपने प्रिय मित्र अर्जुन के लिए करते हैं। उक्त गुणों से सम्पन्न साधक अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन में सामञ्जस्य स्थापित करके एक अलौकिक क्षमता को प्राप्त करता है। ऐसा संयमित मन का पुरुष सतत साधनारत हुआ परम पद को प्राप्त होता है।सदा का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि साधक को अपने परिवार एवं समाज के प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा करने की सीख यहाँ दी गयी है। ऐसा करना समाज के प्रति अपराध होगा। सदा का तात्पर्य प्रतिदिन के ध्यान के अभ्यास के समय से है। पूरी लगन से ध्यान करने पर साधक पूर्ण शांति का अनुभव करता है।यह शांति ही परमात्मा का स्वरूप है क्योंकि आत्मा में शरीर मन और बुद्धि की उत्तेजना चंचलता और विक्षेपों का सर्वथा अभाव है। आत्मा इन उपाधियों से परे है। भगवान् के इस कथन से कि योगी मुझमें स्थित परम शांति को प्राप्त होता है  ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यहाँ श्रीकृष्ण द्वैतवाद के मत का प्रतिपादन कर रहे हैं। परन्तु परम सत्य को गुण युक्त मानने का अर्थ होगा  उसे एक द्रव्य पदार्थ समझना जो कि परिच्छिन्न और विकारी होगा। उसी प्रकार उस शांति की प्राप्ति एक विषय की प्राप्ति के समान होगी।भगवान् श्रीकृष्ण तत्त्व का ज्ञान कराने में भाषा की असमर्थता एवं सीमित योग्यता को जानते हैं इसलिए वे उक्त दोष का परिहार करने के लिए शांति को एक विशेषण देते हैं  निर्वाण परमाम्  अर्थात् मोक्ष स्वरूप शांति।तात्पर्य यह है कि जब योगी का मन विषयों से पूर्णतया निवृत्त होता है तब वह उस शांति का अनुभव करता है जो उसने बाह्य जगत् में कभी अनुभव नहीं की थी। शीघ्र ही वह पुरुष परम सत्य स्वरूप के साथ एक हो जाता है जिसकी सुगंध पूर्वानुभूत शांति होती है। ध्यान के अन्तिम चरण में योगी अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव तद्रूप होकर ही करता है। इसी अद्वैतानुभूति का वर्णन सम्पूर्ण गीता में किया गया है।अब योगी के लिए आहारादि के नियम का वर्णन करते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.15. Yoking his self (mind) incessantly in this manner, My devotee, with mind not attached to anything else,  realises peace which culminates in the nirvana and is in the form of ending in Me."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.15 Ever applying his mind in this way, the Yogin of controlled mind, attains the peace which is the summit of beatitude and which abides in Me."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.15 Concentrating the mind thus for ever, the yogi of controlled mind achieves the Peace which culminates in Liberation and which abides in Me."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.15।।निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.15।।संप्रति परमफलकथनपरत्वेनानन्तरश्लोकमादत्ते  अथेति। योगस्वरूपं तदङ्गमासनद्वयं तत्कर्तृविशेषणमित्यस्यार्थस्य प्रकथनानन्तरमित्यथशब्दार्थः। आत्मानं युञ्जन्निति संबन्धः। आत्मशब्दो मनोविषयः। यथोक्तो विधिरासनादिः। उक्तविशेषणत्रयद्योतनार्थं सदेत्युक्तम्। योगी ध्यायी संन्यासीत्यर्थः। मनःसंयमस्य योगं प्रत्यसाधारणत्वं दर्शयति  नियतेति। शान्तिशब्दितोपरतेः सर्वसंसारनिवृत्तिपर्यवसायित्वं मत्वा विशिनष्टि  निर्वाणेति। यथोक्ताया मुक्तेर्ब्रह्मस्वरूपावस्थानादनर्थान्तरत्वमाह  मत्संस्थामिति। मदधीनां मदात्मिकामित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.15।। नियत  मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है।",
        "hc": "।।6.15।। व्याख्या--'योगी नियतमानसः' जिसका मनपर अधिकार है, वह 'नियतमानसः' है। साधक 'नियतमानस' तभी हो सकता है, जब उसके उद्देश्यमें केवल परमात्मा ही रहते हैं। परमात्माके सिवाय उसका और किसीसे सम्बन्ध नहीं रहता। कारण कि जबतक उसका सम्बन्ध संसारके साथ बना रहता है, तबतक उसका मन नियत नहीं हो सकता।साधकसे यह एक बड़ी गलती होती है कि वह अपने-आपको गृहस्थ आदि मानता है और साधन ध्यानयोगका करता है। जिससे ध्यानयोगकी सिद्धि जल्दी नहीं होती। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने-आपको गृहस्थ, साधु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि किसी वर्ण-आश्रमका न मानकर ऐसा माने कि 'मैं तो केवल ध्यान करनेवाला हूँ। ध्यानसे परमात्माकी प्राप्ति करना ही मेरा काम है। सांसारिक ऋद्धि-सिद्धि आदिको प्राप्त करना मेरा उद्देश्य ही नहीं है।' इस प्रकार अहंताका परिवर्तन होनेपर मन स्वाभाविक ही नियत हो जायगा; क्योंकि जहाँ अहंता होती है, वहाँ ही अन्तःकरण और बहिःकरणकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।'युञ्जन्नेवं सदात्मानम्'--दसवें श्लोकके 'योगी युञ्जीत सततम्' पदोंसे लेकर चौदहवें श्लोकके 'युक्त आसीत मत्परः' पदोंतक जितना ध्यानका, मन लगानेका वर्णन हुआ है, उस सबको यहाँ 'एवम्' पदसे लेना चाहिये।'युञ्जन् आत्मानम्' का तात्पर्य है कि मनको संसारसे हटाकर परमात्मामें लगाते रहना चाहिये।'सदा' का तात्पर्य है कि प्रतिदिन नियमितरूपसे ध्यानयोगका अभ्यास करना चाहिये। कभी योगका अभ्यास किया और कभी नहीं किया--ऐसा करनेसे ध्यानयोगकी सिद्धि जल्दी नहीं होती। दूसरा तात्पर्य यह है कि परमात्माकी प्राप्तिका लक्ष्य एकान्तमें अथवा व्यवहारमें निरन्तर बना रहना चाहिये।'शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति'--भगवान्में जो वास्तविक स्थिति है, जिसको प्राप्त होनेपर कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता, उसको यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति' कहा गया है। ध्यानयोगी ऐसी निर्वाणपरमा शान्तिको प्राप्त हो जाता है।एक 'निर्विकल्प स्थिति' होती है और एक निर्विकल्प बोध होता है। ध्यानयोगमें पहले निर्विकल्प स्थिति होती है फिर उसके बाद निर्विकल्प बोध होता है। इसी निर्विकल्प बोधको यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति नामसे कहा गया है।शान्ति दो तरहकी होती है--शान्ति और परमशान्ति। संसारके त्याग (सम्बन्ध-विच्छेद) से 'शान्ति' होती है और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर 'परमशान्ति' होती है। इसी परमशान्तिको गीतामें 'नैष्ठिकी शान्ति' (5। 12), 'शश्वच्छान्ति' (9। 31) आदि नामोंसे और यहाँ निर्वाणपरमा शान्ति नामसे कहा गया है।\n\n सम्बन्ध--अब आगेके दो श्लोकोंमें ध्यानयोगके लिये उपयोगी नियमोंका क्रमशः व्यतिरेक और अन्वय-रीतिसे वर्णन करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.15।।एवं मयि परस्मिन् ब्रह्मणि पुरुषोत्तमे मनसः शुभाश्रये सदा आत्मानं मनो युञ्जन् नियतमानसः निश्चलमानसः मत्स्पर्शपवित्रीकृतमानसतया निश्चलमानसः मत्संस्थां निर्वाणपरमां शान्तिम् अधिगच्छति निर्वाणकाष्ठारूपां मत्संस्थां मयि संस्थितां शान्तिम् अधिगच्छति।एवम् आत्मयोगम् आरभमाणस्य मनोनैर्मल्यहेतुभूतां मनसो भगवति शुभाश्रये स्थितिम् अभिधाय अन्यद् अपि योगोपकरणम् आह",
        "et": "6.15 'Ever applying his mind on Me,' i.e., the Supreme Brahman, the Supreme Person and the holy and auspicious object of meditation, 'the Yogin of controlled mind,' i.e., one having his mind steady because of his being purified in mind through contact with Me, comes to the peace which abides in Me, which is of the highest degree of beatitude. That means he comes to the peace which is the supreme end of beatitude which abides in Me.\n\nFor the person who commences Yoga of the self, Sri Krsna, after thus teaching how the mind should be fixed on the Lord, who is the holy and auspicious object of meditation, proceeds in order to effect the purification of the mind, to speak of the other side of Yoga:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.10  6.15।।ननु जितात्मनः इत्युक्तम् तत्कथं तज्जय  इत्याशङ्क्य आरुरुक्षोः कश्चिदुपायः कायसमत्वादिकः (SN कायसमुद्धारकः) चित्तसंयम उपदिश्यते  योगीत्यादि अधिगच्छतीत्यन्तम्।  आत्मानं च चित्तं च युञ्जीत एकाग्रीकुर्यात्।  सततमिति  न परिमितं कालम्।  एकाकित्वादिषु सत्सु एतद्युज्यते ( N युञ्जीत) नान्यथा।  आसनस्थैर्यात् कालस्थैर्ये (S  कालस्थैर्यम्) चित्तस्थैर्यम्।  चित्तक्रियाः संकल्पात्मनः अन्याश्चेन्द्रियक्रिया येन यताः नियमं नीताः।  धारयन् यत्नेन।  नासिकाग्रस्यावलोकने  सति  दिशामनवलोकनम्।  मत्परमतया युक्त आसीत (N आसीत्) इत्यर्थः (S omits इत्यर्थः)।  एवमात्मानं युञ्जतः समादधतः शान्तिर्जायते यस्यां संस्थापर्यन्तकाष्ठा मत्प्राप्तिः (K  प्राप्तिर्योगोऽस्तीति)।",
        "et": "6.10-15 Yogi etc. upto adhigacchati.  Self :  the mind.  Let him yoke it :  let him make it single-pointed.  Always : not for a limited period of time.  If the conditions like remaining alone etc., are fulfilled, this [controlling of mind] is possible and not otherwise.  On account of the firmness of seat, the time-nerve  (or the body ?)  remains firm and due to this, mind remains firm.  He, by whom the mental activities  i.e.,  those that are in the form of intention, and  other activities  of the sense-organs are subdued  i.e.,  are brought under full control; [he is the person of the subdued  mental and sensual activities].  Holding :  i.e., with effort.  If the nose-tip is looked at,  [it is possible]  not to look  at  [different]  directions.  Let him remain endowed with the state of having  Me alone as supreme goal.  This is the meaning  [here].  He who yokes  i.e.,  concentrates  his self (mind)  in this manner, there arises for him Peace in  which the culmination - as far as the end-is the same as attaining  Me."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.15।।अब योगका फल कहा जाता है  नियत मनवाला योगी अर्थात् जिसका मन जीता हुआ है ऐसा योगी उपर्युक्त प्रकारसे सदा आत्माका समाधान करता हुआ अर्थात् मनको परमात्मामें स्थिर करताकरता मुझमें स्थित निर्वाणदायिनी शान्तिको  उपरतिको पाता है अर्थात् जिस शान्तिकी परमनिष्ठा  अन्तिम स्थिति मोक्ष है एवं जो मुझमें स्थित है  मेरे अधीन है ऐसी शान्तिको प्राप्त होता है।",
        "sc": "।।6.15।। युञ्जन् समाधानं कुर्वन् एवं यथोक्तेन विधानेन सदा आत्मानं सर्वदा योगी नियतमानसः नियतं संयतं मानसं मनो यस्य सोऽयं नियतमानसः शान्तिम् उपरतिं निर्वाणपरमां निर्वाणं मोक्षः तत् परमा निष्ठा यस्याः शान्तेः सा निर्वाणपरमा तां निर्वाणपरमाम्. मत्संस्थां मदधीनाम् अधिगच्छति प्राप्नोति।।इदानीं योगिनः आहारादिनियम उच्यते",
        "et": "6.15 Yunjan, concentrating; atmanam, the mind; evam, thus, according to the methods shown above; sada, for ever; the yogi, niyata-manasah, of controlled mind; adhi-gacchati, achieves; santim, the Peace, the indifference to worldly attachments and possessions; nirvana-paramam, which culminates in Liberation; and mat-samstham, which abides in Me.\nNow are bieng mentioned the rules about the yogi's food etc.:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.15।।ननु शान्तिर्निर्वाणमिति मोक्षपर्यायौ तत्कथं शान्तेर्निर्वाणपरमत्वं इत्यत आह   निर्वाणेति। न जीवन्मुक्तिमात्रमित्यर्थः। उपशान्तेर्योगकारणत्वात् योगफलत्वमनुपपन्नम्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.15।।एवं सदा योगी युक्तः सिद्धः स मयि संस्थां लयं मोक्षादक्षरतादात्म्यरूपादपि परमं प्रवेशं प्राप्नोति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.15।।एवं संप्रज्ञातसमाधिनासीनस्य किं स्यादित्युच्यते  एवं रहोवस्थानादिपूर्वोक्तनियमेनात्मानं मनो युञ्जन्नभ्यासवैराग्याभ्यां समाहितं कुर्वन् योगी सदा योगाभ्यासपरोऽभ्यासातिशयेन नियतं निरुद्धं मानसं मनो येन। नियता निरुद्धा मानसा मनोवृत्तिरूपा विकारा येनेति वा नियतमानसः सन् शान्तिं सर्ववृत्त्युपरतिरूपां प्रशान्तवाहितां निर्वाणपरमां तत्त्वसाक्षात्कारोत्पत्तिद्वारेण सकार्याविद्यानिवृत्तिरूपमुक्तिपर्यवसायिनीं मत्संस्थां मत्स्वरूपपरमानन्दरूपां निष्ठामधिगच्छति नतु सांसारिकाण्यैश्वर्याण्यनात्मविषयसमाधिफलान्यधिगच्छति तेषामपवर्गोपयोगिसमाध्युपसर्गत्वात्। तथाच तत्तत्समाधिफलान्युक्त्वाह भगवान्पतञ्जलिःते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः इतिस्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रङ्गात् इति च। स्थानिनो देवाः। तथाचोद्दालको देवैरामन्त्रितोऽपि तत्र सङ्गमादरं स्मयं गर्वं चाकृत्वा देवानवज्ञाय पुनरनिष्टप्रसङनिवारणाय निर्विकल्पकमेव समाधिमकरोदिति वसिष्ठेपाख्यायते। मुमुभिर्हेयश्च समाधिः सूत्रितः पतञ्जलिनावितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञातः। सम्यक् संशयविपर्ययानध्यवसायरहितत्वेन प्रज्ञायते प्रकर्षेण विशेषरूपेण ज्ञायते भाव्यस्वरूपं येन स संप्रज्ञातः समाधिर्भावनाविशेषः। भावना हि भावस्य विषयान्तरपरिहारेण चेतसि पुनःपुनर्निवेशनम्। भाव्यं च त्रिविधं ग्राह्यग्रहणग्रहीतृभेदात्। ग्राह्यमपि द्विविधं स्थूलसूक्ष्मभेदात्। तदुक्तंक्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः इति। क्षीणा राजसतामसवृत्तयो यस्य तस्य चित्तस्य ग्रहीतृग्रहणग्राह्येष्वात्मेन्द्रियविषयेषु तत्स्थता तत्रैवैकाग्रकता। तदञ्जनता तन्मयता। न्यग्भूते चित्ते भाव्यमानस्यैवोत्कर्ष इति यावत्। तथाविधा समापत्तिस्तद्रूपः परिणामो भवति। यथाभिजातस्य निर्मलस्य स्फटिकमणेस्तत्तदुपाश्रयवशात्तत्तद्रूपापत्तिरेवं निर्मलस्य चित्तस्य तत्तद्भावनीयवस्तूपरागतत्तद्रूपापत्तिः समापत्तिः समाधिरिति च पर्यायः। यद्यपि ग्रहीतृग्रहणग्राह्येष्वित्युक्तं तथापि भूमिकाक्रमवशाद्ग्राह्यग्रहणग्रहीतृष्विति बोद्धव्यम्। यतः प्रथमं ग्राह्यनिष्ठ एव समाधिर्भवति ततो ग्रहणनिष्ठस्ततो ग्रहीतृनिष्ठ इति। ग्रहीत्रादिक्रमोऽप्यग्रे व्याख्यास्यते। तत्र यदा स्थूलं महाभूतेन्द्रियात्मकषोडशविकाररूपं विषयमादाय पूर्वापरानुसंधानेन शब्दार्थोल्लेखेन च भावना क्रियते तदा सवितर्कः समाधिः। अस्मिन्नेवालम्बने पूर्वापरानुसंधानशब्दार्थोल्लेखशून्यत्वेन यदा भावना प्रवर्तते तदा निर्वितर्कः। एतावुभावप्यत्र वितर्कशब्देनोक्तौ। तन्मात्रान्तःकरणलक्षणं सूक्ष्मं विषयमालम्ब्य तस्य देशकालधर्मावच्छेदेन यदा भावना प्रवर्तते तदा सविचारः। अस्मिन्नेवालम्बने देशकालधर्मावच्छेदं विना धर्मिमात्रावभासित्वेन यदा भावना प्रवर्तते तदा निर्विचारः। एतावुभावप्यत्र विचारशब्देनोक्तौ। तथाच भाष्यंवितर्कश्चित्तस्य स्थूल आलम्बने आभोगः सूक्ष्मे विचारः इति। इयं ग्राह्यसमापत्तिरिति व्यपदिश्यते। यदा रजस्तमोलेशानुविद्धमन्तःकरणसत्त्वं भाव्यते तदा गुणभावाच्चिच्छक्तेः सुखप्रकाशमयस्य सत्त्वस्य भाव्यमानस्योद्रेकात्सानन्दः समाधिर्भवति। अस्मिन्नेव समाधौ ये बद्धधृतयस्तत्त्वान्तरं प्रधानपुरुषरूपं न पश्यन्ति ते विगत देहाहंकारत्वाद्विदेहशब्देनोच्यन्ते। इयं ग्रहणसमापत्तिः। ततःपरं रजस्तमोलेशानभिभूतं शुद्धं सत्त्वमालम्बनीकृत्य या भावनप्रवर्तते तस्यां ग्राह्यस्य सत्त्वस्य न्यग्भावाच्चितिशक्तेरुद्रेकात्सत्तामात्रावशेषत्वेन समाधिः सास्मित इत्युच्यते। नचाहंकारास्मितयोरभेदः शङ्कनीयः। यतोयत्रान्तःकरणमहमित्युल्लेखेन विषयान्वेदयते सोऽहंकारः। यत्र त्वन्तर्मुखतया प्रतिलोम परिणामेन प्रकृतिलीने चेतसि सत्तामात्रमवभाति सास्मिता। अस्मिन्नेव समाधौ ये कृतपरितोषास्ते परं पुरुषमपश्यन्तश्चेतसः प्रकृतौ लीनत्वात्प्रकृतिलया इत्युच्यन्ते। सेयं ग्रहीतृसमापत्तिरस्मितामात्ररूपग्रहीतृनिष्ठत्वात्। येतु परं पुरुषं विविच्य भावनायां प्रवर्तन्ते तेषामपि केवलपुरुषविषया विवेकख्यातिर्गहीतृसमापत्तिरपि न सास्मितः समाधिर्विवेकेनास्मितायास्त्यागात्। तत्र ग्रहीतृभानपूर्वकमेव ग्रहणभानं तत्पूर्वकं च सूक्ष्मग्राह्यभानं तत्पूर्वकं च स्थूलग्राह्यभानमिति स्थूलविषयो द्विविधोऽपि वितर्कश्चतुष्टयानुगतः द्वितीयो वितर्कविकलस्त्रितयानुगतः तृतीयोऽवितर्कविचाराभ्यां विकलो विक्रीयानुगतः चतुर्थो वितर्क विचारानन्दैर्विकलोऽस्मितामात्र इति चतुरवस्थोऽयं संप्रज्ञात इति। एवं सवितर्कः सविचारः सानन्दः सास्मितश्च समाधिरन्तर्धानादिसिद्धिहेतुतया मुक्तिहेतुसमाधिविरोधित्वाद्धेय एव मुमुक्षुभिः। ग्रहीतृग्रहणयोरपि चित्तवृत्तिविषयतादशायां ग्राह्यकोटौ निक्षेपाद्धेयोपादेयविभागकथनाय ग्राह्यसमापत्तिरेव विवृता सूत्रकारेण। चतुर्विधा हि ग्राह्यसमापत्तिः स्थूलग्राह्यगोचरा द्विविधा सवितर्का निर्वितर्का च। सूक्ष्मग्राह्यगोचरापि द्विविधा सविचारा निर्विचारा च। तत्रशब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का शब्दार्थज्ञानविकल्पसंभिन्ना स्थूलार्थावभासरूपा सवितर्का समापत्तिः स्थूलगोचरा सविकल्पकवृत्तिरित्यर्थः।स्मृतिपरिशुद्धौ स्वस्वरूपशून्ये वार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। तस्मिन्नेव स्थूल आलम्बने शब्दार्थस्मृतिप्रविलये प्रत्युदितस्पष्टग्राह्याकारप्रतिभासितया न्यग्भूतज्ञानांशत्वेन स्वरूपशून्यैव निर्वितर्का समापत्तिः। स्थूलगोचरा निर्विकल्पकवृत्तिरित्यर्थः।एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता। सूक्ष्मस्तन्मात्रादिर्विषयो यस्याः सा सूक्ष्मविषया समापत्तिर्द्विविधा सविचारा निर्विचारा च। सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदेन। एतयैव सवितर्कया निर्वितर्कया च स्थूलविषयया समापत्त्या व्याख्याता। शब्दार्थज्ञानविकल्पसहितत्वेन देशकालधर्माद्यवच्छिन्नः सूक्ष्मोऽर्थः प्रतिभाति यस्यां सा सविचारा। शब्दार्थज्ञानविकल्परहितत्वेन देशकालधर्माद्यनवच्छिन्नत्वेन च धर्मिमात्रतया सूक्ष्मोऽर्थः प्रतिभाति यस्यां सा निर्विचारा। सविचारनिर्विचारयोः सूक्ष्मविषयत्वविशेषणात्सवितर्कनिर्वितर्कयोः स्थूलविषयत्वमर्थाद्व्याख्यातम्।सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्। सविचाराया निर्विचारायाश्च समापत्तेर्यत्सूक्ष्मविषयत्वमुक्तं तदलिङ्गपर्यन्तं द्रष्टव्यम्। तेन सानन्दसास्मितयोर्ग्रहीतृग्रहणसमापत्त्योरपि ग्राह्मसमापत्तावेवान्तर्भाव इत्यर्थः। तथाहि पार्थिवस्याणोर्गन्धतन्मात्रं सूक्ष्मो विषयः आप्यस्यापि रसतन्मात्रं तैजसस्य रूपतन्मात्रं वायवीयस्य स्पर्शतन्मात्रं नभसः शब्दतन्मात्रं तेषामहंकारस्तस्य लिङ्गमात्रं महत्तत्त्वं तस्याप्यलिङ्गं प्रधानं सूक्ष्मो विषयः। सप्तानामपि प्रकृतीनां प्रधान एव सूक्ष्मताविश्रान्तेस्तत्पर्यन्तमेव सूक्ष्मविषयत्वमुक्तम्। यद्यपि प्रधानादपि पुरुषः सूक्ष्मोऽस्ति तथाप्यन्वयिकारणत्वाभावात्तस्य सर्वान्वयिकारणे प्रधान एव निरतिशयं सौक्ष्म्यं व्याख्यातम्। पुरुषस्तु निमित्तकारणं सदपि नान्वयिकारणत्वेन सूक्ष्मतामर्हति। अन्वयिकारणत्वाविवक्षायां तु पुरुषोऽपि सूक्ष्मो भवत्येवेति द्रष्टव्यम्।ता एव सबीजः समाधिः। ताश्चतस्त्रः समापत्तयो ग्राह्येण बीजेन सह वर्तन्त इति सबीजः समाधिर्वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्संप्रज्ञात इति प्रागुक्तः। स्थूलेऽर्थे सवितर्को निर्वितर्कः। सूक्ष्मेऽर्थे सविचारो निर्विचार इति। तत्रान्तिमस्य फलमुच्यते।निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः स्थूलविषयत्वे तुल्येऽपि सवितर्कशब्दार्थज्ञानविकल्पसंकीर्णमपेक्ष्य तद्रहितस्य निर्विकल्परूपस्य निर्वितर्कस्य प्राधान्यम्। ततः सूक्ष्मविषयस्य सविकल्पकप्रतिभासरूपस्य सविचारस्य ततोऽपि सूक्ष्मविषयस्य निर्विकल्पकप्रतिभासरूपस्य निर्विचारस्य प्राधान्यम्। तत्र पूर्वेषां त्रयाणां निर्विचारार्थत्वान्निर्विचारफलेनैव फलवत्त्वं निर्विचारस्य तु प्रकृष्टाभ्यासबलाद्वैशारद्ये रजस्तमोऽनभिभूतसत्त्वोद्रेके सत्यध्यात्मप्रसादः। क्लेशवासनारहितस्य चित्तस्य भूतार्थविषयः क्रमाननुरोधी स्फुटः प्रज्ञालोकः प्रादुर्भवति। तथाच भाष्यम्प्रज्ञाप्रसादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान्। भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान्प्राज्ञोऽनुपश्यति।। इति।ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा। तत्र तस्मिन्प्रज्ञाप्रसादे सति समाहितचित्तस्य योगिनो या प्रज्ञा जायते सा ऋतंभरा ऋंत सत्यमेव बिभर्ति न तत्र विपर्यासगन्धोऽप्यस्तीति यौगिक्येवेयं समाख्या। सा चोत्तमो योगः। तथाच भाष्यम्आगमेनानुमानेन ध्यानाभ्यासरसेन च। त्रिधा प्रकल्पयन्प्रज्ञां लभते योगमुत्तमम्।। इति। सातुश्रुतानु मानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् श्रुतमागमविज्ञानं तत्सामान्यविषयमेव। नहि विशेषेण सह कस्यचिच्छब्धस्य संगतिर्ग्रहीतुं शक्यते। तथानुमानं सामान्यविषयमेव। नहि विशेषेण सह कस्यचिद्व्याप्तिर्ग्रहीतुं शक्यते। तस्माच्छुतानुमानविषयो न विशेषः कश्चिदस्ति। नचास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोकप्रत्यक्षेण ग्रहणमस्ति किंतु समाधिप्रज्ञानिर्ग्राह्य एव च सविशेषो भवति भूतसूक्ष्मगतो वा पुरुषगतो वा। तस्मान्निर्विचारवैशारद्यसमुद्भवायां श्रुतानुमानविलक्षणायां सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टसर्वविशेषविषयायामृतंभरायामेव प्रज्ञायां योगिना महान्प्रयत्न आस्थेय इत्यर्थः। ननु क्षिप्तमूढविक्षिप्ताख्यव्युत्थानसंस्काराणामेकाग्रतायामपि सवितर्कनिर्वितर्कसविचारजानां संस्काराणां सद्भावात्तैश्चाल्यमानस्य चित्तस्य कथं निर्विचारवैशारद्यपूर्वकाध्यात्मप्रसादलभ्या ऋतंभरा प्रज्ञा प्रतिष्ठिता स्यादत आह  तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी। तया ऋतंभरया प्रज्ञया जनितो यः संस्कारः स तत्त्वविषयया प्रज्ञया जनितत्वेन बलवत्त्वादन्यान्व्युत्थानजान्समाधिजांश्च संस्कारानतत्त्वविषयप्रज्ञाजनितत्वेन दुर्बलान्प्रतिबध्नाति स्वकार्याक्षमान्करोति नाशयतीति वा। तेषां संस्काराणामभिभवात्तत्प्रभवाः प्रत्यया न भवन्ति। ततः समाधिरुपतिष्ठते। ततः समाधिजा प्रज्ञा। ततः प्रज्ञाकृताः संस्कारा इति नवोनवः संस्कारातिशयो वर्धते। ततश्च प्रज्ञा। ततश्च संस्कारा इति। ननुभवति व्युत्थानसंस्काराणामतत्त्वविषयप्रज्ञाजनितानां तत्त्वमात्रविषयसंप्रज्ञातसमाधिप्रज्ञाप्रभवैः संस्कारैः प्रतिबन्धस्तेषां तु संस्काराणां प्रतिबन्धकाभावदेकाग्रभूमावेव सबीजः समाधिः स्यान्न तु निर्बीजो निरोधभूमाविति तत्राह  तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः तस्य संप्रज्ञातस्य समाधेरेकाग्रभूमिजन्यस्य अपिशब्दात्क्षिप्तमूढविक्षिप्तानामपि निरोधे योगिप्रयत्नविशेषेण विलये सति सर्वनिरोधात्समाधेः समाधिजस्य संस्कारस्यापि निरोधान्निर्बीजो निरालम्बनोऽसंप्रज्ञातसमाधिर्भवति. सच चोपायः प्राक्सूत्रितःविरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः इति। विरम्यतेऽनेनेति विरामो वितर्कविचारानन्दास्मितादिरूपचिन्तात्यागः। तस्य प्रत्ययः कारणम्। परं वैराग्यमिति यावत्। विरामश्चासौ प्रत्ययश्चित्तवृत्तिविशेष इति वा तस्याभ्यासः पौनःपुन्येन चेतसि निवेशनं तदेव पूर्वं कारणं यस्य स तथा संस्कारमात्रशेषः सर्वथा निर्वृत्तिकोऽन्यः पूर्वोक्तात्सबीजाद्विलक्षणो निर्बीजोऽसंप्रज्ञातसमाधिरित्यर्थः। संप्रज्ञातस्य हि समाधेर्द्वावुपायावुक्तावभ्यासो वैराग्यं च। तत्र सालम्बनत्वादभ्यासस्य न निरालम्बनसमाधिहेतुत्वं घटत इति निरालम्बनं परं वैराग्यमेव हेतुत्वेनोच्यते। अभ्यासस्तु संप्रज्ञातसमाधिद्वारा प्रणाड्योपयुज्यते। तदुक्तंत्रयमन्तरङगं पूर्वेभ्यः धारणाध्यानसमाधिरूपं साधनत्रयं यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहाररूपसाधनपञ्चकापेक्षया सबीजस्य समाधेरन्तरङ्गं साधनम्। साधनकोटौ च समाधिशब्देनाभ्यास एवोच्यते। मुख्यस्य समाधेः साध्यत्वात्।तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य। अनिर्बीजस्य तु समाधेस्तदपि त्रयं बहिरङ्गं परंपरयोपकारि तस्य तु परं वैराग्यमेवान्तरङ्गमित्यर्थः। अयमपि द्विविधो भवप्रत्यय उपायप्रत्ययश्च।भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् विदेहानां सानन्दानां प्रकृतिलयानां च सास्मितानां देवानां प्राग्व्याख्यातानां जन्मविशेषादोषधिविशेषान्मन्त्रविशेषात्तपोविशेषाद्वा यः समाधिः स भवप्रत्ययः। भवः संसार आत्मनात्मविवेकाभावरूपः प्रत्ययः कारणं यस्य स तथा। जन्ममात्रहेतुको वा पक्षिणामाकाशगमनवत् पुनः संसारहेतुत्वान्मुमुक्षुभिर्हेय इत्यर्थः।श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् जन्मौषधिमन्त्रतपःसिद्धव्यतिरिक्तानामात्मानात्मविवेकदर्शिनां तु यः समाधिः स श्रद्धादिपूर्वकः। श्रद्धादयः पूर्वे उपाया यस्य स तथा। उपायप्रत्यय इत्यर्थः। तेषु श्रद्धा योगविषये चेतसः प्रसादः। सा हि जननीव योगिनं पाति। ततः श्रद्दधानस्य विवेकार्थिनो वीर्यमुत्साह उपजायते। समुपजातवीर्यस्य पाश्चात्त्यासु भूमिषु स्मृतिरुत्पद्यते तत्स्मरणाच्च चित्तमनाकुलं सत्समाधीयते। समाधिरत्रैकाग्रता। समाहितचित्तस्य प्रज्ञा भाव्यगोचरा विवेकेन जायते। तदभ्यासात्पराच्च वैराग्याद्भवत्यसंप्रज्ञातः समाधिर्मुमुक्षूणामित्यर्थः।प्रतिक्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः इति न्यायेन तस्यामपि सर्ववृत्तिनिरोधावस्थायां चित्तपरिणामप्रवाहस्तज्जन्यसंस्कारप्रवाहश्च भवत्येवेत्यभिप्रेत्य संस्कारशेष इत्युक्तम्। तस्य च संस्कारस्य प्रयोजनमुक्तम्ततः प्रशान्तवाहिता संस्कारात् इति। प्रशान्तवाहिता नामावृत्तिकस्य चित्तस्य निरिन्धनाग्निवत्प्रतिलोमपरिणामेनोपशमः। यथा समिदाज्याद्याहुतिप्रक्षेपे वह्निरुत्तरोत्तरवृद्ध्या प्रज्वलति समिदादिक्षये तु प्रथमक्षणे किंचिच्छाम्यति उत्तरोत्तरक्षणेषु त्वधिकमधिकं शाम्यतीति क्रमेण शान्तिर्वर्धते तथा निरुद्धचित्तस्योत्तरोत्तराधिकः प्रशमः प्रवहति। तत्र पूर्वप्रशमजनितः संस्कार एवोत्तरोत्तरप्रशमस्य कारणम्। यदा च निरिन्धनाग्निवच्चित्तं क्रमेणोपशाम्यद्व्युत्थानसमाधिनिरोधसंस्कारैः सह स्वस्यां प्रकृतौ लीयते तदा समाधिपरिपाकप्रभवेन वेदान्तवाक्यजेन सम्यग्दर्शनेनाविद्यायां निवृत्तायां तद्धेतुकदृग्दृश्यसंयोगाभावाद्वृत्तौ पञ्चविधायामपि निवृत्तायां स्वरूपप्रतिष्ठः पुरुषः शुद्धः केवलो मुक्त इत्युच्यते। तदुक्तंतदा द्रष्टुः स्वरूपेणावस्थानम् इति। तदा सर्ववृत्तिनिरोधे। वृत्तिदशायां तु नित्यापरिणामिचैतन्यरूपत्वेन तस्य सर्वदा शुद्धत्वेऽप्यनादिना दृश्यसंयोगेनाविद्यकेनान्तःकरणतादात्म्याध्यासादन्तःकरणवृत्तिसारूप्यं प्राप्नुवन्नभोक्तापि भोक्तेव दुःखानां भवति। तदुक्तंवृत्तिसारूप्यमितरत्र। इतरत्र वृत्तिप्रादुर्भावे। एतदेव विवृतंद्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् चित्तमेव द्रष्टृदृश्योपरक्तं विषयिविषयनिर्भासं चेतनाचेतनस्वरूपापन्नं विषयात्मकमप्यविषयात्मकमिवाचेतनमपि चेतनमिव स्फटिकमणिकल्पं सर्वार्थमित्युच्यते। तदनेन चित्तसारूप्येण भ्रान्ताः केचित्तदेव चेतनमित्याहुः  तदसंख्येयवासनाभिश्चित्तमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्। यस्य भोगापवर्गार्थं तत्स एव परश्चेतनोऽसंहतः पुरुषो नतु घटादिवत्संहत्यकारि चित्तं चेतनमित्यर्थः। एवंचविशेषदर्शिन आत्मभावभावनानिवृत्तिः। एवं योऽन्तःकरणपुरुषयोर्विशेषदर्शी तस्य यान्तःकरणे प्रागविवेकवशादात्मभावनासीत्सा निवर्तते। भेददर्शने सत्यभेदभ्रमानुपपत्तेः। सत्त्वपुरुषयोर्विशेषदर्शनं च भगवदर्पितनिष्कामकर्मसाध्यम्। तल्लिङंग च योगभाष्ये दर्शितम्  यथा प्रावृषि तृणाङ्कुरस्योद्भेदेन तद्बीजसत्तानुमीयते तथा मोक्षमार्गश्रवणेन सिद्धान्तरुचिवशाद्यस्य लोमहर्षाश्रुपातौ दृश्येते तत्राप्यस्ति विशेषदर्शनबीजमपवर्गभागीयं कर्माभिनिर्वर्तितमित्यनुमीयते। यस्य तु तादृशं कर्मबीजं नास्ति तस्य मोक्षमार्गश्रवणे पूर्वपक्षयुक्तिषु रुचिर्भवत्यरुचिश्च सिद्धान्तयुक्तिषु। तस्य कोऽहमासं कथमहमासमित्यादिरात्मभावभावना स्वाभाविकी प्रवर्तते। सा तु विशेषदर्शिनो निवर्तत इति। एंव सति किं स्यादिति तदाह  तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्। निम्नं जलप्रवहणयोग्यो नीचदेशः। प्राग्भारस्तदयोग्य उच्चप्रदेशः। चित्तं च सर्वदा प्रवर्तमानवृत्तिप्रवाहेण प्रवहज्जलतुल्यं तत्प्रागात्मानात्मविवेकरूपविमार्गवाहिविषयभोगपर्यन्तमस्यासीत्। अधुना त्वात्मानात्मविवेकमार्गवाहिकैवल्यपर्यन्तं संपद्यत इति। अस्मिंश्च विवेकवाहिनि चित्ते येऽन्तरायास्ते सहेतुका निवर्तनीया इत्याह सूत्राभ्याम्तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यःहानमेषां क्लेशवदुक्तम्। तस्मिन्विवेकवाहिनि चित्ते छिद्रेष्वन्तरालेषु प्रत्ययान्तराणि व्युत्थानरूपाण्यहंममेत्येवंरूपाणि व्युत्थानानुभवजेभ्यः संस्कारेभ्यः क्षीयमाणेभ्योऽपि प्रादुर्भवन्ति। एषां च संस्काराणां क्लेशानामिव हानमुक्तं यथा क्लेशा अविद्यादयो ज्ञानाग्निना दग्धबीजभावा न पुनश्चित्तभूमौ प्ररोहं प्राप्नुवन्ति तथा ज्ञानाग्निना दग्धबीजभावाः संस्काराः प्रत्ययान्तराणि न प्ररोढुमर्हन्ति। ज्ञानाग्निसंस्कारास्तु यावच्चित्तमनुशेरत इति। एवंच प्रत्ययान्तरानुदयेन विवेकवाहिनि चित्ते स्थिरीभूते सतिप्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः प्रसंख्यानं सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिः शुद्धात्मज्ञानमिति यावत्। तत्र बुद्धेः सात्त्विके परिणामे कृतसंयमस्य सर्वेषां गुणपरिणामानां स्वामिवदाक्रमणं सर्वाधिष्ठातृत्वम् तेषामेव च शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मित्वेन स्थितानां यथावद्विवेकज्ञानं सर्वज्ञातृत्वं च विशोका नाम सिद्धिः फलं तद्वैराग्याच्च कैवल्यमुक्तंसत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं चतद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् इति सूत्राभ्याम्। तदेतदुच्यते तस्मिन्प्रसंख्याने सत्यप्यकुसीदस्य फलमलिप्सोः प्रत्ययान्तराणामनुदये सर्वप्रकारैर्विवेकख्यातेः परिपोषाद्धर्ममेघः समाधिर्भवति।इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम्। अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।। इति स्मृतेः धर्मं प्रत्यग्ब्रह्मैक्यसाक्षात्कारं मेहति सिंचतीति धर्ममेघः तत्त्वसाक्षात्कारहेतुरित्यर्थः।ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः। ततो धर्ममेघात्समाधेर्धर्माद्वा क्लेशानां पञ्चविधानामविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशानां कर्मणां च रक्तकृष्णशुक्लभेदेन त्रिविधानामविद्यामूलानामविद्याक्षये बीजक्षयादात्यन्तिकी निवृत्तिः कैवल्यं भवति। कारणनिवृत्त्या कार्यनिवृत्तेरात्यन्तिक्या उचितत्वादित्यर्थः। एवं स्थितेयुञ्जन्नेवं सदात्मानम् इत्यनेन संप्रज्ञातः समाधिरेकाग्रभूमावुक्तः। नियतमानसः इत्यनेन तत्फलभूतोऽसंप्रज्ञातसमाधिर्निरोधभूमावुक्तः। शान्तिमिति निरोधसमाधिजसंस्कारफलभूता प्रशान्तवाहिता। निर्वाणपरमामिति धर्ममेघस्य समाधेस्तत्त्वज्ञानद्वारा कैवल्यहेतुत्वम्। मत्संस्थामित्यनेनौपनिषदभिमतं कैवल्यं दर्शितम्। यस्मादेवं महाफलो योगस्तस्मात्तं महता प्रयत्नेन संपादयेदित्यभिप्रायः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.15।।योगाभ्यासफलमाह  युञ्जन्नेवमिति। एवमुक्तप्रकारेण सदात्मानं मनो युञ्जन्समाहितं कुर्वन्नियतं निरुद्धं मानसं चित्तं यस्य सः। शान्तिं संसारोपरतिं प्राप्नोति। कथंभूताम्। निर्वाणं परमं प्राप्यं यस्यां तां मत्संस्थां मद्रूपेणावस्थितिम्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.15।।अथेदानीं योगफलमाह  युञ्जन्निति। एवं यथोक्तेन विधानेन योगी आत्मानं मनः सदा सर्वदा युञ्जन्समाधनं कुर्वन् नियतं संयतं मानसं मनो यस्य स योगान्नियतमानसो भूत्वा शान्तिमुपरतिं अविद्यानिवृत्तिलक्षणां ब्रह्मविद्याम्। कीदृशीम्। निर्वाणं मुक्तिः सैव परमा निष्ठा यस्यास्तां मोक्षस्यानन्यसाधनभूताम्।तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति। नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुतेः। तर्हि मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर इति किमर्थमुक्तमित्याशङ्क्याह  मत्संस्थां मदधीनां योगेनाराधितान्मत्तः सा लभ्यत इत्यर्थः। तथाच वक्ष्यतितेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।। इति। अधिगच्छति प्राप्नोति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।6.15।।जीवात्मयोगप्रकरणेमच्चित्तो मत्परः 6।14 इति परमात्मचिन्तनं किमर्थं विधीयते इत्यत्रोच्यते  युञ्जन्नेवम् इति। एवमित्यनुवादेमच्चित्तः मत्परः इत्युक्तमच्छब्दाभिप्रेतं परत्वादिकं विवृण्वन्नाह  एवं मयीति।परस्मिन् ब्रह्मणीत्यनेन सर्वकारणत्वेन सर्वात्मत्वादिकं विवक्षितम्। तथात्वेऽपि समस्तवैलक्षण्येन तद्गतदोषासंस्पर्शो देवताविशेषनिष्कर्षश्चपुरुषोत्तमशब्दाभिप्रेतः। उक्ताकारविशिष्टत्वाच्च मनसः शुभाश्रयत्वम्। एतेन शुभाश्रयप्रकरणान्तरोक्तदिव्यमङ्गलविग्रहविशिष्टत्वमप्यभिप्रेतम्। तत्रात्मशब्दः प्रकृतानुवादपरतया मनोविषयः।युञ्जन् इत्यस्य प्रयोजनं नियतमानसत्वम् तच्च निश्चलमानसत्वम्। तदुत्पत्तौ हेतोरवान्तरव्यापारोऽयमित्यभिप्रायेणाह  मत्स्पर्शेति।मत्संस्थाम् इत्यादिपरमप्रयोजनम्।निर्वाणपरमाम् इत्यत्र निर्वाणं परमं यस्या इति समासे विशेषणव्यत्यासास्वारस्यम्। निर्वाणहेतुशान्तेश्चनियतमानसः इत्यनेन सिद्धत्वात् पुनरुक्तिश्च स्यात् परमशब्दश्चास्वरसः अतो निर्वाणस्य परमामिति समासः परमशब्दश्च परमावस्थाविषय इत्यभिप्रायेणाह  निर्वाणकाष्ठेति। परमात्मनि संस्थिता च शान्तिरशनायादिषडूर्भिराहित्यरूपा। यद्वामयि संस्थितां शान्तिमित्येतदेवशुभाश्रये स्थितिम् इत्यन्तेन विवृतण्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.15।।एवं योगाभ्यासकर्तुः फलमाह  युञ्जन्निति। एवं सदा निरन्तरं नियतमानसः दास्यैकपरचित्तः आत्मानं युञ्जन्नपि युक्तं कुर्वन् योगी मयि योगवान् निर्वाणपरमां मोक्षाधिकां मत्संस्थां मत्स्वरूपरसात्मिकां शान्तिं वियोगक्लेशादिरहितभावमधिगच्छति प्राप्नोति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.15।।अस्याः फलमाह  युञ्जन्निति। एवमनेन प्रकारेण सदा निरन्तरं दीर्घकालं च आत्मानं मनो युञ्जन्समादधानो योगी नियतं ख्यातिफलादपि निगृहीतं मानसं येन स नियतमानसः शान्तिं परमवैराग्यबलात्ख्यातिमपि निरुध्य निर्विकल्पं पदं निर्वाणं मोक्षस्तदेव परमा निष्ठा यस्याः शान्तेस्तां मत्संस्थां मय्येव संस्था एकीभावेनावस्थानं समाप्तिर्वा यस्यास्तामधिगच्छति प्राप्नोति। ख्यातिफलं च सूत्रकृता दर्शितंप्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः इतितत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् इतिसत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रात्सर्वज्ञातृत्वं सर्वभावाधिष्ठातृत्वं च इति सूत्रत्रयेण। प्रसंख्याने ध्याने। अकुसीदस्य वणिज इव फलानिच्छोः सर्वथा विवेकख्यातिरेव भवति तस्याश्च फलं धर्ममेघः समाधिः स च प्रागेव व्याख्यातः। तत् वैराग्यं परं परसंज्ञं पुरुषख्यातेः फलं। तस्य लक्षणं गुणेषु दिव्यादिव्यविषयेषु वैतृष्ण्यम्। एतस्यैव हि नान्तरीयकं फलं कैवल्यमिति योगा वदन्ति। तृतीयसूत्रोक्तं फलं सार्वज्ञ्यादिकं तु अभिप्रेत्य श्रूयतेकस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः इत्यादिकम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Thus practicing constant control of the body, mind and activities, the mystic transcendentalist, his mind regulated, attains to the kingdom of God [or the abode of Kṛṣṇa] by cessation of material existence.",
        "ec": " The ultimate goal in practicing yoga is now clearly explained. Yoga practice is not meant for attaining any kind of material facility; it is to enable the cessation of all material existence. One who seeks an improvement in health or aspires after material perfection is no yogī according to Bhagavad-gītā . Nor does cessation of material existence entail one’s entering into “the void,” which is only a myth. There is no void anywhere within the creation of the Lord. Rather, the cessation of material existence enables one to enter into the spiritual sky, the abode of the Lord. The abode of the Lord is also clearly described in the Bhagavad-gītā as that place where there is no need of sun, moon or electricity. All the planets in the spiritual kingdom are self-illuminated like the sun in the material sky. The kingdom of God is everywhere, but the spiritual sky and the planets thereof are called paraṁ dhāma, or superior abodes. A consummate yogī, who is perfect in understanding Lord Kṛṣṇa, as is clearly stated herein by the Lord Himself ( mat-cittaḥ, mat-paraḥ, mat-sthānam ), can attain real peace and can ultimately reach His supreme abode, Kṛṣṇaloka, known as Goloka Vṛndāvana. In the Brahma-saṁhitā (5.37) it is clearly stated, goloka eva nivasaty akhilātma-bhūtaḥ: the Lord, although residing always in His abode called Goloka, is the all-pervading Brahman and the localized Paramātmā as well by dint of His superior spiritual energies. No one can reach the spiritual sky (Vaikuṇṭha) or enter into the Lord’s eternal abode (Goloka Vṛndāvana) without the proper understanding of Kṛṣṇa and His plenary expansion Viṣṇu. Therefore a person working in Kṛṣṇa consciousness is the perfect yogī, because his mind is always absorbed in Kṛṣṇa’s activities ( sa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayoḥ ). In the Vedas also ( Śvetāśvatara Upaniṣad 3.8) we learn, tam eva viditvāti mṛtyum eti: “One can overcome the path of birth and death only by understanding the Supreme Personality of Godhead, Kṛṣṇa.” In other words, perfection of the yoga system is the attainment of freedom from material existence and not some magical jugglery or gymnastic feats to befool innocent people."
    }
}
