{
    "_id": "BG6.14",
    "chapter": 6,
    "verse": 14,
    "slok": "प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः |\nमनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ||६-१४||",
    "transliteration": "praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivrate sthitaḥ .\nmanaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥ ||6-14||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।6.14।। (साधक को) प्रशान्त अन्त:करण, निर्भय और ब्रह्मचर्य ब्रत में स्थित होकर, मन को संयमित करके चित्त को मुझमें लगाकर मुझे ही परम लक्ष्य समझकर बैठना चाहिए।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "6.14 Serene-minded, fearless, firm in the vow of a Brahmachari, having controlled the mind, thinking of Me and balanced in mind, let him sit, having Me as his supreme goal.",
        "ec": "6.14 प्रशान्तात्मा sereneminded? विगतभीः fearless? ब्रह्मचारिव्रते in the vow of Brahmacharya? स्थितः firm? मनः the mind? संयम्य having controlled? मच्चित्तः thinking on Me? युक्तः balanced? आसीत let him sit? मत्परः Me as the supreme goal.Commentary The spiritual aspirant should possess serenity of mind. The Divine Light can descend only in a serene mind. Serenity is attained by the eradication of Vasanas or desires and cravings. He should be fearless. This is the most important alification. A timid man or a coward is very far from Selfrealisation.A Brahmachari (celibate) should serve his Guru or the spiritual preceptor wholeheartedly and should live on alms. This also constitutes the BrahmachariVrata. The aspirant should control the modifications of the mind. He should be balanced in pleasure and pain? heat and cold? honour and dishonour. He should ever think of the Lord and take Him as the Supreme Goal.Brahmacharya also means continence. Semen or the vital fluid tones the nerves and the brain? and energises the whole system. That Brahmachari who has preserved this vital force by the vow,of celibacy and sublimated it into Ojas Sakti or radiant spiritual power can practise steady meditation for a long period. Only he can ascend the ladder of Yoga. Without Brahmacharya or celibacy not an iota or spiritual progress is possible. Continence is the very foundation on which the superstructure of meditation and Samadhi can be built up. Many persons waste this vital energy -- a great spiritual treasure indeed -- when they become blind and lose their power of reason under sexual excitement. Pitiable is their lot They cannot make substantial progress in Yoga."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "6.14 With peace in his heart and nor fear, observing the vow of celibacy, with mind controlled and fixed on Me, let the student lose himself in contemplation of Me."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।6.14।। कुछ काल तक ध्यान का निरन्तर अभ्यास करने के फलस्वरूप साधक को अधिकाधिक शांति और सन्तोष का अनुभव होता है  अत्यन्त सूक्ष्म आन्तरिक शांति को प्राप्त पुरुष को यहाँ प्रशान्तात्मा कहा गया है। आत्मा को अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप में व्यक्त होने के लिए प्रशान्त अन्तकरण ही अत्यन्त उपयुक्त माध्यम है।ध्यानाभ्यास करने वाले साधक को केवल मानसिक भय के कारण आत्मानुभव की ऊँचाई नापने में कठिनाई होती है। शनैशनै योगी अपने मन की वैषयिक वासनाओं से मुक्त होता है और तदुपरांत यदि उसमें आवश्यक साधना की परिपक्वता न हो तो वह इस मन के अतीत आत्मतत्त्व के अनुभव से भयभीत हो जाता है। उसे लगता है कि वह शून्य में विलीन हो रहा है। अनादि काल से उपाधियों के साथ तादात्म्य करके जीवभाव में रहने से उसे विश्वास भी नहीं होता कि इन उपाधियों से परे किसी तत्त्व का अस्तित्व भी हो सकता है। यहाँ उन मछली बेचने वाली स्त्रियों की कथा का स्मरण होता है जिन्हें किसी कारणवश फूलों की दुकान मेें एक रात व्यतीत्ा करनी पड़ी। मछली की दुर्गन्ध की अभ्यस्त होने से वे फूलों की सुगन्ध के कारण तब तक नहीं सो पायीं जब तक कि मछली की टोकरियों को उन्होंने अपने सिरहाने नहीं रख लिया दुखदायी उपाधियों से दूर रहकर अनन्त आनन्द में प्रवेश करने से हम भयभीत हो जाते हैं।इस भय के कारण आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही अवरूद्ध हो जाता है। यदि सफलता प्राप्त भी होने लगे तो इसी मानसिक भय के कारण साधक उसकी उपेक्षा कर देगा। प्रशान्तचित्त होकर शास्त्राध्ययन के द्वारा निर्भय मन नित्य ध्यान का अभ्यास करने पर भी यदि ब्रह्मचर्य व्रत में दृढ़ स्थिति न हो तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। ब्रह्मचर्य व्रत औपनिषदिक अर्थ के साथसाथ इस शब्द का यहाँ विशिष्ट अर्थ भी है। सामान्यत ब्रह्मचर्य का अर्थ किया जाता है  मैथुन का त्याग। परन्तु इस शब्द का अर्थ अधिक व्यापक है। केवल संभोग की वृत्ति का संयम ही ब्रह्मचर्य नहीं वरन् समस्त इन्द्रियों की प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण होना ब्रह्मचर्य है। परन्तु यह संयम विवेकपूर्वक होना चाहिए इच्छाओं का मूढ़ दमन नहीं। असंयमित मन विषयों की संवेदनाओं से विचलित और क्षुब्ध हो जाता है और अपनी सम्पूर्ण शक्ति को विनष्ट कर देता है।इन्द्रिय संयम के इस सामान्य अर्थ के अतिरिक्त भी ब्रह्मचर्य का विशेष प्रयोजन है। संस्कृत भाषा में ब्रह्मचारी का अर्थ है वह पुरुष जिसका स्वभाव ब्रह्म में विचरण करने का हो। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का अर्थ होगा अपने मन को निरन्तर ब्रह्मविचार और निदिध्यासन में स्थिर करने का प्रयत्न करना। यही एकमात्र मुख्य उपाय है जिसके द्वारा हम मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को शांत एवं संयमित कर सकते हैं।मन का स्वभाव ही किसी न किसी विषय का चिन्तन करना है। जब तक उसे उत्कृष्ट लक्ष्य का ज्ञान नहीं कराया जाता तब तक उसकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति उनसे विमुख नहीं हो सकती। पूर्ण ब्रह्मचर्य की सफलता का रहस्य भी यही है। किसी योगी की ओर आश्चर्यचकित होकर देखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस योगी की सफलता को प्राप्त कर सकता है। उस सफलता के लिए आत्मसंयम की आवश्यकता है। इन्द्रियों के विषयों के आकर्षण से स्वयं को बचाने के निश्चयात्मक उपायों का ज्ञान न होने से ही मनुष्य उनके प्रलोभन में फँस जाता है और लोभ संवरण नहीं कर पाता।इस श्लोक में वर्णित तीनों गुणों से सम्पन्न साधक को ध्यान साधना में कठिनाई नहीं होती। प्रशान्ति निर्भयता और ब्रह्मचर्यये क्रमश बुद्धि मन और शरीर को ध्यान के योग्य बनाते हैं। इन तीनों के सुसंगठित होने पर साधक को अधिकतम शक्ति एवं शान्ति प्राप्त होती है जिनका उपयोग ध्यान के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार नवशक्ति सम्पन्न साधक क्षमतावान हो जाता है। वह अपने भटकने वाले मन को सहज ही विषयों से परावृत्त करके आत्मतत्त्व का ध्यान कर सकता है।इस श्लोक में दिया गया यह निर्देश अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि साधक को मुझे ही परम लक्ष्य समझकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जिस वस्तु को हम सर्वाधिक महत्त्व देते हैं उसकी प्राप्ति के लिए सर्व प्रथम प्रयत्न करते हैं। इसलिए जो पुरुष परमात्मा को ही सर्वोच्च लक्ष्य समझकर निरन्तर साधनारत रहता है वह शीघ्र ही अपने अनन्त सनातन शान्त और आनन्द स्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "6.14. Being calm-minded, fearless, firm in the vow of celibacy;  controlling mind fully; let  the master of Yoga remain, fixing his mind in Me and having Me [alone] as his supreme goal."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "6.14 Serene and fearless, firm in the vow of celibacy, holding the mind in check and fixing the thought on Me, he should sit in Yoga, intent on Me."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "6.14 He should remain seated with a placid mind, free from fear, firm in the vow of a celibate, and with the mind fixed on Me by controlling it through concentration, having Me as the supreme Goal."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।6.12  6.14।।योगं समाधियोगं युञ्ज्यात्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।6.14।।योगं युञ्जानस्य विशेषणान्तराणि दर्शयति  किञ्चेति। अन्तःकरणस्य प्रशान्ती रागद्वेषादिदोषराहित्यं तस्याश्च प्रकर्षो रागादिहेतोरपि निवृत्तिः विगतभयत्वं सर्वकर्मपरित्यागे शास्त्रीयनिश्चयवशान्निःसंदिग्धबुद्धित्वम्। भिक्षाभुक्त्यादीत्यादिशब्देन त्रिषवणस्नानशौचाचमनादि गृह्यते। विशेषणान्तरमाह  किञ्चेति। उपसंहृत्य योगनिष्ठो भवेदिति शेषः। मनोवृत्त्युपसंहारे ध्यानमपि न सिध्येत्तस्य तद्वृत्त्यावृत्तिरूपत्वादित्याशङ्क्याह  मच्चित्त इति। विषयान्तरविषयमनोवृत्त्युपसंहारेणात्मन्येव तन्नियमनान्न ध्यानानुपपत्तिरित्यर्थः। मच्चित्तत्वेनैव मत्परत्वस्य सिद्धत्वान्मत्पर इति पृथग्विशेषणमनर्थकमित्याशङ्क्याह  भवतीति। अन्तःकरणशुद्धिर्योगस्यावान्तरफलम्।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।6.14।। जिसका अन्तःकरण शान्त है, जो भय-रहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है, ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे।",
        "hc": "।।6.14।। व्याख्या--'प्रशान्तात्मा'--जिसका  अन्तःकरण राग-द्वेषसे रहित है, वह 'प्रशान्तात्मा' है। जिसका सांसारिक विशेषता प्राप्त करनेका, ऋद्धि-सिद्धि आदि प्राप्त करनेका उद्देश्य न होकर केवल परमात्मप्राप्तिका ही दृढ़ उद्देश्य होता है, उसके राग-द्वेष शिथिल होकर मिट जाते हैं। राग-द्वेष मिटनेपर स्वतः शान्ति आ जाती है, जो कि स्वतःसिद्ध है। तात्पर्य है कि संसारके सम्बन्धके कारण ही हर्ष, शोक, राग-द्वेष आदि द्वन्द्व होते हैं और इन्हीं द्वन्द्वोंके कारण शान्ति भङ्ग होती है। जब ये द्वन्द्व मिट जाते हैं, तब स्वतःसिद्ध शान्ति प्रकट हो जाती है। उस स्वतःसिद्ध शान्तिको प्राप्त करनेवालेका नाम ही 'प्रशान्तात्मा' है।'विगतभीः'--शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेसे ही रोगका, निन्दाका, अपमानका, मरने आदिका भय पैदा होता है। परन्तु जब मनुष्य शरीरके साथ 'मैं' और 'मेरे'-पनकी मान्यताको छोड़ देता है, तब उसमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता। कारण कि उसके अन्तःकरणमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि इस शरीरको जीना हो तो जीयेगा ही, इसको कोई मार नहीं सकता और इस शरीरको मरना हो तो मरेगा ही, फिर इसकोकोई बचा नहीं सकता। यदि यह मर भी जायगा तो बड़े आनन्दकी बात है; क्योंकि मेरी चित्तवृत्ति परमात्माकी तरफ होनेसे मेरा कल्याण तो हो ही जायगा! जब कल्याणमें कोई सन्देह ही नहीं, तो फिर भय किस बातका? इस भावसे वह सर्वथा भयरहित हो जाता है।'ब्रह्मचारिव्रते स्थितः'--यहाँ 'ब्रह्मचारिव्रत' का तात्पर्य केवल वीर्यरक्षासे ही नहीं है, प्रत्युत ब्रह्मचारीके व्रतसे है। तात्पर्य है कि जैसे ब्रह्मचारीका जीवन गुरुकी आज्ञाके अनुसार संयत और नियत होता है, ऐसे ही ध्यानयोगीको अपना जीवन संयत और नियत रखना चाहिये। जैसे ब्रह्मचारी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच विषयोंसे तथा मान, बड़ाई और शरीरके आरामसे दूर रहता है, ऐसे ही ध्यानयोगीको भी उपर्युक्त आठ विषयोंमेंसे किसी भी विषयका भोगबुद्धिसे, रसबुद्धिसे सेवन नहीं करना चाहिये, प्रत्युत निर्वाहबुद्धिसे ही सेवन करना चाहिये। यदि भोगबुद्धिसे उन विषयोंका सेवन किया जायगा, तो ध्यानयोगकी सिद्धि नहीं होगी। इसलिये ध्यायोगीको ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित रहना बहुत आवश्यक है।व्रतमें स्थित रहनेका तात्पर्य है कि किसी भी अवस्था, परिस्थिति आदिमें किसी भी कारणसे कभी किञ्चिन्मात्र भी सुखबुद्धिसे पदार्थोंका सेवन न हो, चाहे वह ध्यानकाल हो, चाहे व्यवहारकाल हो। इसमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंका ब्रह्मचर्य आ जाता है।'मनः संयम्य मच्चित्तः'--मनको संयत करके मेरेमें ही लगा दे अर्थात् चित्तको संसारकी तरफसे सर्वथा हटाकर केवल मेरे स्वरूपके चिन्तनमें, मेरी लीला, गुण, प्रभाव, महिमा आदिके चिन्तनमें ही लगा दे। तात्पर्य है कि सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिको लेकर मनमें जो कुछ संकल्प-विकल्परूपसे चिन्तन होता है, उससे मनको हटाकर एक मेरेमें ही लगाता रहे।मनमें जो कुछ चिन्तन होता है, वह प्रायः भूतकालका होता है और कुछ भविष्यकालका भी होता है तथा वर्तमानमें साधक मन परमात्मामें लगाना चाहता है। जब भूतकालकी बात याद आ जाय, तब यह समझे कि वह घटना अभी नहीं है और भविष्यकी बात याद आ जाय, तो वह भी अभी नहीं है। वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर जितने संकल्प-विकल्प हो रहे हैं, वे उन्हीं वस्तु, व्यक्ति आदिके हो रहे हैं, जो अभी नहीं हैं। हमारा लक्ष्य परमात्माके चिन्तनका है, संसारके चिन्तनका नहीं। अतः जिस संसारका चिन्तन हो रहा है, वह संसार पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा और अभी भी नहीं है। परन्तु जिन परमात्माका चिन्तन करना है, वे परमात्मा पहले भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। इस तरह सांसारिक वस्तु आदिके चिन्तनसे मनको हटाकर परमात्मामें लगा देना चाहिये। कारण कि भूतकालका कितना ही चिन्तन किया जाय, उससे लाभ तो कुछ होगा नहीं और भविष्यका चिन्तन किया जाय तो वह काम अभी कर सकेंगे नहीं तथा भूत-भविष्यका चिन्तन होता रहनेसे जो अभी ध्यान करते हैं, वह भी होगा नहीं तो सब ओरसे रीते ही रह जायँगे।'युक्तः'--ध्यान करते समय सावधान रहे अर्थात् मनको संसारसे हटाकर भगवान्में लगानेके लिये सदा सावधान, जाग्रत् रहे। इसमें कभी प्रमाद, आलस्य आदि न करे। तात्पर्य है कि एकान्तमें अथवा व्यवहारमें भगवान्में मन लगानेकी सावधानी सदा बनी रहनी चाहिये; क्योंकि चलते-फिरते, काम-धन्धा करते समय भी सावधानी रहनेसे एकान्तमें मन अच्छा लगेगा और एकान्तमें मन अच्छा लगनेसे व्यवहार करते समय भी मन लगानेमें सुविधा होगी। अतः ये दोनों एक-दूसरेके सहायक हैं अर्थात् व्यवहारकी सावधानी एकान्तमें और एकान्तकी सावधानी व्यवहारमें सहायक है।'आसीत मत्परः'--केवल भगवत्परायण होकर बैठे अर्थात् उद्देश्य, लक्ष्य, ध्येय केवल भगवान्का ही रहे। भगवान्के सिवाय कोई भी सांसारिक वासना, आसक्ति, कामना, स्पृहा, ममता आदि न रहे।इसी अध्यायके दसवें श्लोकमें 'योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः' पदोंसे ध्यानयोगका जो उपक्रम किया था, उसीको यहाँ'युक्त आसीत मत्परः' पदोंसे कहा गया है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।6.14।।कायशिरोग्रीवं समम् अचलं सापाश्रयतया स्थिरं धारयन् दिशश्च अनवलोकयन् स्वं नासिकाग्रं संप्रेक्ष्य प्रशान्तात्मा अत्यन्तनिर्वृतमनाः विगतभीः ब्रह्मचर्ययुक्तो मनः संयम्य मच्चित्तो युक्तः अवहितो मत्पर आसीत माम् एव चिन्तयन् आसीत।",
        "et": "6.13 - 6.14 Keeping the trunk, head and neck erect and motionless; well seated in order to be steady; looking not in any direction but gazing at the tip of the nose; serene, i.e., holding the mind extremely peaceful; fearless; firm in the vow of celibacy; holding the mind in check; and fixing his thoughts on Me - he should sit in Yoga, i.e., remain concentrated and intent on Me, i.e., he should concentrating on Me only."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।6.10  6.15।।ननु जितात्मनः इत्युक्तम् तत्कथं तज्जय  इत्याशङ्क्य आरुरुक्षोः कश्चिदुपायः कायसमत्वादिकः (SN कायसमुद्धारकः) चित्तसंयम उपदिश्यते  योगीत्यादि अधिगच्छतीत्यन्तम्।  आत्मानं च चित्तं च युञ्जीत एकाग्रीकुर्यात्।  सततमिति  न परिमितं कालम्।  एकाकित्वादिषु सत्सु एतद्युज्यते ( N युञ्जीत) नान्यथा।  आसनस्थैर्यात् कालस्थैर्ये (S  कालस्थैर्यम्) चित्तस्थैर्यम्।  चित्तक्रियाः संकल्पात्मनः अन्याश्चेन्द्रियक्रिया येन यताः नियमं नीताः।  धारयन् यत्नेन।  नासिकाग्रस्यावलोकने  सति  दिशामनवलोकनम्।  मत्परमतया युक्त आसीत (N आसीत्) इत्यर्थः (S omits इत्यर्थः)।  एवमात्मानं युञ्जतः समादधतः शान्तिर्जायते यस्यां संस्थापर्यन्तकाष्ठा मत्प्राप्तिः (K  प्राप्तिर्योगोऽस्तीति)।",
        "et": "6.14 See Comment under 6.15"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।6.14।।तथा  प्रशान्तात्मा  अच्छी प्रकारसे शान्त हुए अन्तःकरणवाला विगतभी  निर्भय और ब्रह्मचारियोंके व्रतमें स्थित हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्य गुरुसेवा भिक्षाभोजन आदि जो ब्रह्मचारीके व्रत हैं उनमें स्थित हुआ उनका अनुष्ठान करनेवाला होकर और मनका संयम करके अर्थात् मनकी वृत्तियोंका उपसंहार करके तथा मुझमें चित्तवाला अर्थात् मुझ परमेश्वरमें ही जिसका चित्त लग गया है ऐसा मच्चित्त होकर तथा समाहितचित्त होकर और मुझे ही सर्वश्रेष्ठ माननेवाला अर्थात् मैं ही जिसके मतमें सबसे श्रेष्ठ हूँ ऐसा होकर बैठे। कोई स्त्रीप्रेमी स्त्रीमें चित्तवाला हो सकता है परंतु वह स्त्रीको सबसे श्रेष्ठ नहीं समझता। तो किसको समझता है वह राजाको या महादेवको स्त्रीकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझता है परंतु यह साधक तो चित्त भी मुझमें ही रखता है और मुझे ही सबसे अधिक श्रेष्ठ भी समझता है।",
        "sc": "।।6.14।। प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्तः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सोऽयं प्रशान्तात्मा विगतभीः विगतभयः ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ब्रह्मचारिणो व्रतं ब्रह्मचर्यं गुरुशुश्रूषाभिक्षान्नभुक्त्यादि तस्मिन् स्थितः तदनुष्ठाता भवेदित्यर्थः। किञ्च मनः संयम्य मनसः वृत्तीः उपसंहृत्य इत्येतत् मच्चित्तः मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सोऽयं मच्चित्तः युक्तः समाहितः सन् आसीत उपविशेत्। मत्परः अहं परो यस्य सोऽयं मत्परो भवति। कश्चित् रागी स्त्रीचित्तः न तु स्त्रियमेव परत्वेन गृह्णाति किं तर्हि राजानं महादेवं वा। अयं तु मच्चित्तो मत्परश्च।।अथेदानीं योगफलमुच्यते",
        "et": "6.14 Dharayan, holding; kaya-siro-girvam, the body (torso), head and neck; samam, erect; and acalam, still-movement is possible for one (even while) holding these erect; therefore it is specified, 'still'-; sthirah, being steady, i.e. remaining steady; sampreksya, looking svam nasikagram, at tip of his own nose -looking at it intently, as it were; ca, and; anavalokayan, not looking; disah, around, i.e. not glancing now and then in various directions-. The words 'as it were' are to be understood because what is intended here is not an injunction for looking at the tip of one's own nose! What then? It is the fixing the gaze of the eyes by withdrawing it from external objects; and that is enjoined with a veiw to concentrating the mind. [What is sought to be presented here as the primary objective is the concentration of mind. If the gaze be directed outward, then it will result in interrupting that concentration. Therefore the purpose is to first fix the gaze of the eyes within.] If the intention were merely the looking at the tip of the nose, then the mind would remain fixed there itself, not on the Self! In, 'Making the mind fixed in the Self' (25), the Lord will speak of concentrating the mind verily on the Self. Therefore, owing to the missing word iva (as it were), it is merely the withdrawl of the gaze that is implied by sampreksya (looking).\nFurther, prasantatma, with a placid mind, with a mind completely at peace; vigata-bhih, free from fear sthitah, firm; brahmacari-vrate, in the vow of a celibate, the vow cosisting in serivce of the teacher, eating food got by beggin, etc.-firm in that, i.e. he should follow these; besides, mat-cittah, with the mind fixed on Me who am the supreme God; samyamya, by controlling; manah, the mind, i.e. by stopping the modifications of the mind; yuktah, through concentration, i.e. by becoming concentrated; asita, he should remain seated; matparah, with Me as the supreme Goal. Some passionate person may have his mind on a woman, but he does not accept the woman as his supreme Goal. What then? He accepts the king or Sive as his goal. But this one (the yogi) not only has his mind on Me but has Me as his Goal.\nAfter that, now is being stated the result of Yoga:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।6.12  6.14।।उपविश्यासन इत्यत्रापि योगशब्द एवमेव व्याख्येय इत्याह  योगमिति। स्थानविवेकार्थं युञ्ज्यादित्युक्तम् कुर्यादिति यावत्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।6.14।।प्रशान्तात्मेति। मैत्र्यादिचित्तपरिकर्मवित्त्वात् अविद्यादिपञ्चक्लेशभयरहितः। सबीजयोगिनस्तस्य सम्प्रज्ञातसमाधिप्रकारमाह  मनः संयम्य मच्चित्त इति। मनश्च तादृशं संयतं वासुदेवाधिष्ठितं चित्तरूपेण परिणमते इति तच्चित्तं तदधिष्ठातरि मयि यस्य स इति युक्तस्य भक्तिसम्बन्धिंत्वमुक्तम्। तदाह  युक्तः सन्मत्पर आसीत।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।6.14।।किंच  निदाननिवृत्तरूपेण प्रकर्षेण शान्तो रागादिदोषरहित आत्मान्तःकरणं यस्य स प्रशान्तात्मा शास्त्रीयनिश्चयदार्ढ्याद्विगता भीः सर्वकर्मपरित्यागेन युक्तत्वायुक्तत्वशङ्का यस्य स विगतभीः ब्रह्मचारिव्रते ब्रह्मचर्यगुरुशुश्रूषाभिक्षाभोजनादौ स्थितः सन् मनः संयम्य विषयाकारवृत्तिशून्यं कृत्वा मयि परमेश्वरे प्रत्यक्चिति सगुणे निर्गुणे वा चित्तं यस्य स मच्चित्तो मद्विषयकधारावाहिकचित्तवृत्तिमान्। पुत्रादौ प्रिये चिन्तनीये सति कथमेवं स्यादत आह  मत्परः अहमेव परमानन्दरूपत्वात्परः पुरुषार्थः प्रियो यस्य स तथा।तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरो यदयमात्मा इति श्रुतेः। एवं विषयाकारसर्ववृत्तिनिरोधेन भगवदेकाकारचित्तवृत्तिर्युक्तः संप्रज्ञातसमाधिमानासीतोपविशेद्यथाशक्ति नतु स्वेच्छया व्युत्तिष्ठेदित्यर्थः। भवति कश्चिद्रागी स्त्रीचित्तो नतु स्त्रियमेव परत्वेनाराध्यत्वेन गुह्णाति किं तर्हि राजानं वा देवं वा। अयं तु मच्चित्तो मत्परश्च सर्वाराध्यत्वेन मामेव मन्यत इति भाष्यकृतां व्याख्या।।व्याख्यातृत्वेऽपि मे नात्र भाष्यकारेण तुल्यता। गुञ्जायाः किं नु हेम्नैकतुलारोहेऽपि तुल्यता।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।6.14।। प्रशान्तेति। प्रशान्त आत्मा चित्तं यस्य विगता भीर्भयं यस्य ब्रह्मचारिव्रते ब्रह्मचर्ये स्थितः सन् मनः संयम्य प्रत्याहृत्य। मय्येव चित्तं यस्य अहमेव परः पुरुषार्थो यस्य स मत्परः एवं युक्तो भूत्वा आसीत तिष्ठेत्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।6.14।।प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण शान्तः आत्मान्तःकरणं यस्य सः। अनेन रम्यशब्दश्रवणादीना शान्तचित्तस्य क्षोभाभावाद्दिगव लोकनं वारितम्। व्याघ्रादिभयप्रयुक्तमपि तद्वारयति। विशेषेण गता भीर्भयं यस्मात्सः। व्याघ्रादिप्रयुक्तभयाभावेऽपि क्षुधादिजन्यभयं संभाव्याह। मनः संयम्य स्वादिष्ठान्नादौ प्रवृत्ता मनोवृत्तीरुपसंहृत्येत्यर्थः। एवंभूतः किं कुर्यादिति तत्राह। युक्तः समाहितः सन् मच्चितः मत्परश्चासीतेति मयि परमेश्वरे चित्तं यस्य सः। कश्चिद्रागी स्त्रीचित्तो नतु स्त्रियमेव परत्वेन गृह्णाति किं तर्हि राजानं वाराध्यत्वेन देवं वाराध्यत्वेन परमपुरुषार्थत्वेन च। अयं तु मच्चित्तो मत्परश्च अहमेव पर आराध्यः परमपुरुषार्थश्च यस्य सः। यत्तु तत्किं द्वितीयाद्यवस्थास्य संभवति ओमित्याह  अयुक्त इति। अयुक्तो मत्परः अहं परोऽन्तर्यामी प्रेरको यस्येत्येवंरुपः। आस्ते तस्यां दशायामैक्यभावानाभावादिति तथाचायुक्तावस्थायां भिक्षाद्याचरतीति तात्पर्यमिति तन्न। वाक्यभेदप्रसङ्गात्। यथाश्रुतार्थसंभवे आसीतेत्यस्यास्त इत्यर्थकरणानुचितत्वाच्च।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 6.14 एवं शुचिदेशासनादिरूपं बाह्यं योगोपकरणं मनसश्चैकाग्र्यमुक्तम् अथान्तरान्तरतमयोः कायमनसोः क्रमात्कर्तव्यनियमविशेषा उच्यन्ते  समं इत्यादिश्लोकद्वयेन।कायशिरोग्रीवं इति द्वन्द्वैकवद्भावः तत एव नपुंसकता। अत्र सिद्धापर(मध्यापर) नामा शरीरस्य मध्यप्रदेशः कायशब्देन विवक्षितः।समं अचलं स्थिरम् इति धारणक्रियाविशेषणानिसमं इत्यत्रार्जवं विवक्षितम् अचलशब्देन निष्कम्पत्वेऽभिहितेऽपि स्थिरमित्येतदङ्गकम्पकरश्रमहेतुभूतपश्चाद्धारणप्रयत्ननिवृत्तिहेत्त्वभिप्रायमिति दर्शयितुंसापाश्रयतया स्थिरमित्युक्तम्। अनेनाचलत्वस्य चिरानुवर्तनयोग्यत्वमुक्तं भवति। बाह्येभ्यो व्यावर्तनं नासिकाग्रे स्थापनं चेति क्रमप्रदर्शनायदिशश्चानवलोकयन्स्वं नासिकाग्रं सम्प्रेक्ष्य इति व्युत्क्रमेणोक्तम्। यद्वा शतुरत्र हेत्वर्थत्वाद्दिक्छब्दोपलक्षितबाह्यसकलपदार्थावलोकननिवृत्त्यर्थं योगारम्भक्षणे स्वनासिकाग्रप्रेक्षणमिति भावः। भोग्येतरानुपयुक्तविषयनिरीक्षणमपि निवर्तनीयमित्यभिप्रायेणदिशश्चत्युक्तम्। निमीलनेनापि बाह्यानवलोकनसिद्धौ स्वनासिकाग्रावेक्षणं निद्रादिनिवृत्त्यर्थम्।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं इत्येतावत्यभिहिते परनासिकाग्रप्रेक्षणमपि शङ्क्येतेति तद्व्यवच्छेदार्थमुक्तंस्वम् इति। मनस्यन्तर्मुखे नासाग्रसम्प्रेक्षणस्यासम्भवाच्चक्षुषो दृष्टिसन्निपातमात्रमिह विवक्षितम्। अतः सम्प्रेक्ष्येत्यत्रइवशब्दो लुप्तो द्रष्टव्यः इतिशाङ्करम्। नायनस्य तेजसः स्वच्छन्दवृत्त्या। नासाग्रसन्निपातमात्रमिह विवक्षितम्मनः संयम्य इति संयमस्याभिधानात् प्रशान्तात्मशब्दोऽयं योगोपयुक्तमनस्सन्तोषपर इत्यभिप्रायेणअत्यन्तनिर्वृतमना इत्युक्तम्।ब्रह्मचारिव्रते स्थितः इत्यनेन ब्रह्मचर्याश्रमप्रतीतिःशङ्करोक्तप्रक्रियया वा ब्रह्मचर्यगुरुशुश्रूषाभिक्षाचर्यादिधीः स्यादिति तद्व्यवच्छेदायाहब्रह्मचर्ययुक्त इति। ब्रह्मचर्यं च स्तनवति पिशितपिण्डे भोग्यताधीगर्भस्मरणालोकनालापादिरहितत्वमत्र विवक्षितम्। स्मरन्ति च  ब्रह्मचर्यं च योषित्सु भोग्यताबुद्धिवर्जनम् इत्यादि। तथास्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्। सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च। एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम् अ.पु.372।10।11 इति। युक्तशब्दस्य पूर्वोत्तरप्रतिपन्नात्मावलोकनाभिधानादपि तदुपयुक्तावधानविषयत्वमत्रोचितमित्यभिप्रायेणअवहित इत्युक्तम्। मच्चित्तशब्दो भगवति चित्तस्यानुप्रवेशपरः। मत्परशब्दस्तु तदेकचित्तत्वपरः तदनुवृत्तिपरो वेत्यपौनरुक्त्यमाह  मामेवेति। यद्वा स्त्र्यादौ भोग्यचिन्ता राजादौ च महति परधीर्लोके विभक्ता मयि तु तदुभयमित्यपुनरुक्तिः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।6.14।।प्रशान्तात्मा भक्तिरसाभिनिविष्टचित्तः विगतभीःब्रह्मचारीश्रुत्यादिदुरापचरणरेणुभगवत्प्राप्तिसन्देहरहितः। ब्रह्मचारिव्रते स्थितः भगवदर्थेन्द्रियनिग्रहवान्। तादृशः सन् मनः संयम्य सर्वतः आकृष्य वशे कृत्वा मच्चित्तो मय्येव चित्तं यस्य। मत्परः अहमेव परः पुरुषार्थरूपो यस्य। एतादृशो भूत्वा युक्तः मद्योगस्थ आसीत तिष्ठेत्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।6.14।।एवमासने उपविष्टेन यत्कर्तव्यं तदाह  प्रशान्तात्मेति। योगयुक्तो योगी ब्रह्मचारिव्रते भैक्षचर्यायां स्थितः संन्यासीत्यर्थः। मच्चितो मयि परमे चित्तं यस्य स एवंभूतो मय्येव मनः संयम्य मत्पर आसीत स प्रशान्तात्मा भूत्वा विगतभीर्भवतीति योजना। भवति हि कश्चिदात्मनोऽन्यमीश्वरं मत्वा तच्चित्तस्तमेवाराध्यत्वेनाभिगतः तत्रैव च मनसः संयमं करोति न तु स तत्परस्तमेव परमपुरुषार्थतया प्राप्यत्वेन मन्यते किंतु तत्प्रीत्यान्यदेव फलं कामयते अयं तु मच्चित्तो मय्येव मनः संयम्य मत्परो मामेव सर्वान्तरं प्रत्यगद्वयं कामयत इति। यतो मत्परोऽतएव प्रशान्तात्मा प्रकर्षेण बाह्याभ्यन्तरविषयत्यागेन समाधिसुखास्वादत्यागेन च शान्त उपरतः आत्मा चित्तं यस्य सोऽस्मितामात्रावशेषो विगतभीर्भवति। इयमेवावस्था सत्त्वपुरुषान्यथाख्यातिरिति ब्रह्मसाक्षात्कार इति च विकल्प्यते। सर्वथा तस्यां सिद्धायां पुरुषः परमपुरुषार्थभाग्भवति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Thus, with a peaceful, unagitated mind, keeping the mind fixed upon Me, the transcendental person, the yogi should meditate upon Me and make Me the ultimate goal of life.",
        "ec": " The goal of life is to know Kṛṣṇa, who is situated within the heart of every living being as Paramātmā, the four-handed Viṣṇu form. The yoga process is practiced in order to discover and see this localized form of Viṣṇu, and not for any other purpose. The localized viṣṇu-mūrti is the plenary representation of Kṛṣṇa dwelling within one’s heart. One who has no program to realize this viṣṇu-mūrti is uselessly engaged in mock yoga practice and is certainly wasting his time. Kṛṣṇa is the ultimate goal of life, and the viṣṇu-mūrti situated in one’s heart is the object of yoga practice. To realize this viṣṇu-mūrti within the heart, one has to observe complete abstinence from sex life; therefore one has to leave home and live alone in a secluded place, remaining seated as mentioned above. One cannot enjoy sex life daily at home or elsewhere and attend a so-called yoga class and thus become a yogī. One has to practice controlling the mind and avoiding all kinds of sense gratification, of which sex life is the chief. In the rules of celibacy written by the great sage Yājñavalkya it is said: karmaṇā manasā vācā sarvāvasthāsu sarvadā sarvatra maithuna-tyāgo brahmacaryaṁ pracakṣate “The vow of brahmacarya is meant to help one completely abstain from sex indulgence in work, words and mind – at all times, under all circumstances and in all places.” No one can perform correct yoga practice through sex indulgence. Brahmacarya is taught, therefore, from childhood, when one has no knowledge of sex life. Children at the age of five are sent to the guru-kula, or the place of the spiritual master, and the master trains the young boys in the strict discipline of becoming brahmacārīs. Without such practice, no one can make advancement in any yoga, whether it be dhyāna, jñāna or bhakti. One who, however, follows the rules and regulations of married life, having a sexual relationship only with his wife (and that also under regulation), is also called a brahmacārī. Such a restrained householder brahmacārī may be accepted in the bhakti school, but the jñāna and dhyāna schools do not even admit householder brahmacārīs. They require complete abstinence without compromise. In the bhakti school, a householder brahmacārī is allowed controlled sex life because the cult of bhakti-yoga is so powerful that one automatically loses sexual attraction, being engaged in the superior service of the Lord. In the Bhagavad-gītā (2.59) it is said: viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ rasa-varjaṁ raso ’py asya paraṁ dṛṣṭvā nivartate Whereas others are forced to restrain themselves from sense gratification, a devotee of the Lord automatically refrains because of superior taste. Other than the devotee, no one has any information of that superior taste. Vigata-bhīḥ. One cannot be fearless unless one is fully in Kṛṣṇa consciousness. A conditioned soul is fearful due to his perverted memory, his forgetfulness of his eternal relationship with Kṛṣṇa. The Bhāgavatam (11.2.37) says, bhayaṁ dvitīyābhiniveśataḥ syād īśād apetasya viparyayo ’smṛtiḥ. Kṛṣṇa consciousness is the only basis for fearlessness. Therefore, perfect practice is possible for a person who is Kṛṣṇa conscious. And since the ultimate goal of yoga practice is to see the Lord within, a Kṛṣṇa conscious person is already the best of all yogīs. The principles of the yoga system mentioned herein are different from those of the popular so-called yoga societies."
    }
}
