{
    "_id": "BG4.6",
    "chapter": 4,
    "verse": 6,
    "slok": "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् |\nप्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||४-६||",
    "transliteration": "ajo.api sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro.api san .\nprakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya sambhavāmyātmamāyayā ||4-6||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.6 Though I am unborn, of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing My own Nature, I am born by My own Maya.",
        "ec": "4.6 अजः unborn? अपि also? सन् being? अव्ययात्मा of imperishable nature? भूतानाम् of beings? ईश्वरः the Lord? अपि also? सन् being? प्रकृतिम् Nature? स्वाम् My own? अधिष्ठाय governing? संभवामि come into being? आत्ममायया by My own Maya.Commentary Man is bound by Karma. So he takes birth. He is under the clutches of Nature. He,is deluded by the three alities of Nature whereas the Lord has Maya under His perfect control. He rules over Nature? and so He is not under the thraldom of the alities o Nature. He appears to be born and embodied through His own Maya or illusory power? but is not so in reality. His embodiment is ? as a matter of fact? apparent? It cannot affect in the least His true divine nature. (Cf.IX.8)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.6 have no beginning. Though I am imperishable, as well as Lord of all that exists, yet by My own will and power do I manifest Myself."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.6।। परमेश्वर अपनी निर्बाध स्वतन्त्रता और पूर्ण स्वेच्छा से एक विशिष्ट देह को धारण करके जगत् में उस काल की मोहित पीढी का मार्गदर्शन करने आते हैं। अज्ञानी के समान देहादि के बन्धन में रहना उनके लिये वास्तविकता न होकर एक नाटक की भूमिका के समान है। र्मत्य जीव अविद्या का शिकार बनता है जबकि ईश्वर स्वमाया के स्वामी बने रहते हैं। कार का चालक कार से बंधा रहता है और उसका स्वामी स्वतन्त्र। वाहन का स्वामी अपने प्रयोजन के लिये वाहन का उपयोग करता है और गन्तव्य स्थान पर पहुँचने पर उसे छोड़कर अपने कार्य में व्यस्त हो जाता है। परन्तु बेचारा चालक चोर आदि लोगों से उसको सुरक्षित रखने के लिये एक सेवक के समान उस कार से बंधा रहता है। सृष्टि की रक्षा के खेल में भगवान् इन उपाधियों तथा तज्जनित परिच्छिन्नताओं को साधन रूप में स्वीकारते हैं किन्तु स्वयं उनके दास अथवा शिकार नहीं बन जाते।इस प्रकार स्वस्वरूप में अज और अविनाशी तथा प्राणिमात्र के ईश्वर होते हुये भी भगवान् अपनी माया को पूर्णत अपने वश में रखकर स्वेच्छा से जन्म लेते हैं जीव के समान पूर्व कर्मों के अवश्यंभावी फलों को भोगने के लिये नहीं। उन्हें न स्वस्वरूप का विस्मरण है और न माया का बन्धन है।आप अपने सेवक से स्कूटर में पेट्रोल भरवाकर लाने के लिये कहकर फिर उसे काम करते देखिये तो इस श्लोक में कथित अर्थ को आप समझ सकते हैं। स्कूटर के विषय में अनजान उस बेचारे के लिये वह भारी मशीन एक बोझ और दुख का कारण ही बन जाती है। स्कूटर के भार के कारण उसे खींचकर ले जाना कठिन होता है। इसके विपरीत यदि आप स्कूटर पर बैठकर उसे चला रहे हों अथवा उसे धक्का भी देना पड़े तो भी आप उसे सहर्ष और सरलता से ले जा सकते हैं। स्कूटर तो वही है परन्तु आपके हाथों में वह आपका दास है और अनुचर को तो वह स्वयं इधरउधर खींचकर ले जाने वाला भार है।इसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपनी उपाधियों के कार्यों के विषय में कुछ नहीं जानता और इसलिये उनकी दास बना रहता है। ईश्वर के लिये जगत् कोई समस्या नहीं क्योंकि वे प्रकृति को सर्वथा अपने वश में रखते हैं। ईश्वर के पूर्ण स्वातन्त्र्य को इन दो पंक्तियों में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्त किया गया है।ईश्वर का यह जन्म कब और किसलिये होता है  इस पर कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.6. Though  [I am]  unborn and the changeless Self;  though I am the the Lord of  [all]  beings; yet presiding over My own nature I take birth by My own Trick-of-illusion."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.6 Though I am birthless and of immutable nature, though I am the Lord of all beings, yet by employing My own Nature (Prakrti) I am born out of My own free will."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.6 Though I am birthless, undecaying by nature, and the Lord of beings, (still) by subjugating My Prakriti, I take birth by means of My own Maya."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.6।।न तर्ह्यनादिर्भवानित्यत आह  अजोऽपीति। अव्यय आत्मा देहोऽपीत्यव्ययात्मा।अनन्तं विश्वतोमुखम् 11।11 इति रूपविशेषणमुत्तरत्रएतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् भागं.1।3।5 इति चजगृहे भाग.1।3।1 इति तु व्यक्तिः। युक्तयस्तूक्ताः मा.भा.2।24पृ139 आत्माऽनादित्वं तु सर्वसमम्। कथमनादिनित्यस्य जनिः प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु तथैव तेषां जात इव प्रतीये इत्यर्थः। न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह  स्वामिति।द्रव्यं कर्म च भाग.2।10।142 इति ह्युक्तम्। सा हि तत्रोक्ता। ततः सर्वसृष्टेः। आत्ममायया आत्मज्ञानेन प्रकृतेः पृथगभिधानात्।केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया इति ह्यभिधानम्। सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकया। अजात एव जात इव प्रतीये वा। उक्तं च  महदादेश्च माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता। विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि। जातवत्प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् इति। ईश्वर ईशेभ्योऽपि वरः। तच्चोक्तम्  ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान्। वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् इति ब्रह्मवैवर्ते।समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः इति च।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.6।।ईश्वरस्य कारणाभावाज्जन्मैवायुक्तमतीतानेकजन्मवत्त्वं तु दूरोत्सारितमिति शङ्कते  कथमिति। वस्तुतो जन्माभावे़ऽपि मायावशाज्जन्म संभवतीत्युत्तरमाह  उच्यत इति। पारमार्थिकजन्मायोगे कारणं पूर्वार्धेनानूद्य प्रातिभासिकजन्मसंभवे कारणमाह  प्रकृतिमिति। प्रकृतिशब्दस्य स्वरूपविषयत्वं प्रत्यादेष्टुमात्ममाययेत्युक्तम्। वस्तुतो जन्माभावे कारणानुवादभागं विवृणोति  अजोऽपीत्यादिना। प्रातिभासिकजन्मसंभवे कारणकथनपरमुत्तरार्धं विभजते  प्रकृतिमित्यादिना। प्रकृतिशब्दस्य स्वरूपशब्दपर्यायत्वं वारयति  मायामिति। तस्याः स्वातन्त्र्यं निराकृत्य भगवदधीनत्वमाह  ममेति। तस्याश्चाधिकरणद्वारेणावच्छिन्नत्वं सूचयति  वैष्णवीमिति। मायाशब्दस्यापि प्रज्ञानामसु पाठाद्विज्ञानशक्तिविषयत्वमाशङ्क्याह  त्रिगुणात्मिकामिति। तस्याः कार्यलिङ्गकमनुमानं सूचयति  यस्या इति। जगतो मायावशवर्तित्वमेव स्फुटयति  ययेति। यथा लोके कश्चिज्जातो देहवानालक्ष्यते एवमहमपि मायामाश्रित्य स्ववशया संभवामि जन्मव्यवहारमनुभवामि तेन मायामयमीश्वरस्य जन्मेत्याह  तां प्रकृतिमित्यादिना। संभवामीत्युक्तमेव विभजते   देहवानिति। अस्मदादेरिव तवापि परमार्थत्वाभिमानो जन्मादिविषये स्यादित्याशङ्क्य प्रागुक्तस्वरूपपरिज्ञानवत्त्वादीश्वरस्य मैवमित्याह  न परमार्थत इति। आवृतज्ञानवतो लोकस्य जन्मादिविषये परमार्थत्वाभिमानः संभवतीत्याह  लोकवदिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.6।। मैं अजन्मा और अविनाशी-स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।",
        "hc": "4.6।। व्याख्या--[यह छठा श्लोक है और इसमें छः बातोंका ही वर्णन हुआ है। अज, अव्यय और ईश्वर--ये तीन बातें भगवान्की हैं, (टिप्पणी प0 217) प्रकृति और योगमाया--ये दो बातें भगवान्की शक्तिकी हैं और एक बात भगवान्के प्रकट होनेकी है।] 'अजोऽपि सन्नव्ययात्मा'-- इन पदोंसे भगवान् यह बताते हैं कि साधारण मनुष्योंकी तरह न तो मेरा जन्म है और न मेरा मरण ही है। मनुष्य जन्म लेते हैं और मर जाते हैं; परन्तु मैं 'अजन्मा' होते हुए भी प्रकट हो जाता हूँ और 'अविनाशी' होते हुए भी अन्तर्धान हो जाता हूँ। प्रकट होना और अन्तर्धान होना--दोनों ही मेरी अलौकिक लीलाएँ हैं।\n\nसम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे और मरनेके बाद भी अप्रकट (अव्यक्त) हो जानेवाले हैं, केवल बीचमें ही प्रकट (व्यक्त) हैं (गीता 2। 28)। परन्तु भगवान् सूर्यकी तरह सदा ही प्रकट रहते हैं। तात्पर्य है कि जैसे सूर्य उदय होनेसे पहले भी ज्यों-का-त्यों रहता है और अस्त होनेके बाद भी ज्यों-का-त्यों रहता है अर्थात् सूर्य तो सदा ही रहता है; किन्तु स्थानविशेषके लोगोंकी दृष्टिमें उसका उदय और अस्त होना दीखता है। ऐसे ही भगवान्का प्रकट होना और अन्तर्धान होना लोगोंकी दृष्टिमें है, वास्तवमें भगवान् सदा ही प्रकट रहते हैं। दूसरे प्राणी जैसे कर्मोंके परतन्त्र होकर जन्म लेते हैं, भगवान्का जन्म वैसे नहीं होता। कर्मोंकी परतन्त्रतासे जन्म होनेपर दो बातें होती हैं--आयु और सुख-दुःखका भोग। भगवान्में ये दोनों ही नहीं होते।दूसरे लोग जन्मते हैं तो शरीर पहले बालक होता है, फिर बड़ा होकर युवा हो जाता है फिर वृद्ध हो जाता है, और फिर मर जाता है। परन्तु भगवान्में ये परिवर्तन नहीं होते। वे अवतार लेकर बाललीला करते हैं और किशोर-अवस्था (पंद्रह वर्षकी अवस्था) तक बढ़नेकी लीला करते हैं। किशोर-अवस्थातक पहुँचनेके बाद फिर वे नित्य किशोर ही रहते हैं। सैकड़ों वर्ष बीतनेपर भी भगवान् वैसे ही सुन्दर-स्वरूप रहते हैं। इसीलिये भगवान्के जितने चित्र बनाये जाते हैं, उसमें उनकी दाढ़ी-मूछें नहीं होतीं। (अब कोई बना दे तो अलग बात है!) इस प्रकार दूसरे प्राणियोंकी तरह न तो भगवान्का जन्म होता है, न परिवर्तन होता है और न मृत्यु ही होती है।'भूतानामीश्वरोऽपि सन्'-- प्राणिमात्रके एकमात्र ईश्वर (महान् शासक) रहते हुए ही भगवान् अवतारके समय छोटे-से बालक बन जाते हैं; परन्तु बालक बन जानेपर भी उनके ईश्वरभाव (शासकत्व) में कोई कमी नहीं आती; जैसे--भगवान् श्रीकृष्णने छठीके दिन ही पूतना राक्षसीको मार दिया। पूतनाका शरीर ढाई योजनका और महान् भयंकर था। यदि उनमें ईश्वरभाव न होता तो छठीके दिन पूतनाको कैसे मार देते? भगवान्ने तीन महीनेकी अवस्थामें शकटासुरको, एक वर्षकी अवस्थामें तृणावर्तको और पाँच वर्षकी अवस्थामें अघासुरको मार दिया। इस तरह भगवान्ने बाल्यावस्थामें ही अनेक राक्षसोंको मार दिया। सात वर्षकी अवस्थामें ही उन्होंने गोवर्धन पर्वतको एक अँगुलीपर उठा लिया !सम्पूर्ण प्राणियोंके ईश्वर होते हुए भी भगवान् अवतारके समय छोटे-से-छोटे बन जाते हैं और छोटा-सा-छोटा काम भी कर देते हैं। वास्तवमें यही भगवान्की भगवत्ता है। भगवान् अर्जुनके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं, फिर भी भगवान्का अर्जुनपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसा-का-वैसा ही है। सारथि होनेपर भी वे अर्जुनको गीताका महान् उपदेश देते हैं। भगवान् श्रीराम पिता दशरथकी आज्ञाको टालते नहीं और चौदह वर्षके लिये वनमें चले जाते हैं, फिर भी भगवान्का दशरथपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसा-का-वैसा ही है।\n\n'प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय'-- जो सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंसे अलग है,वह भगवान्की शुद्ध प्रकृति है। यह शुद्ध प्रकृति भगवान्का स्वकीय सच्चिदानन्दघनस्वरूप है। इसीको संधिनी-शक्ति, संवित्-शक्ति और आह्लादिनी-शक्ति कहते हैं (टिप्पणी प0 218.1)। इसीको चिन्मयशक्ति, कृपाशक्ति आदि नामोंसे कहते हैं। श्रीराधाजी, (टिप्पणी प0 218.2) श्रीसीताजी आदि भी यही हैं। भगवान्को प्राप्त करानेवाली 'भक्ति' और 'ब्रह्मविद्या' भी यही है।प्रकृति भगवान्की शक्ति है। जैसे, अग्निमें दो शक्तियाँ रहती हैं-- प्रकाशिका और दाहिका। प्रकाशिका-शक्ति अन्धकारको दूर करके प्रकाश कर देती है तथा भय भी मिटाती है। दाहिका-शक्ति जला देती है तथा वस्तुको पकाती एवं ठण्डक भी दूर करती है। ये दोनों शक्तियाँ अग्निसे भिन्न भी नहीं हैं और अभिन्न भी नहीं हैं। भिन्न इसलिये नहीं हैं कि वे अग्निरूप ही हैं अर्थात् उन्हें अग्निसे अलग नहीं किया जा सकता, और अभिन्न इसलिये नहीं हैं कि अग्निके रहते हुए भी मन्त्र, औषध आदिसे अग्निकी दाहिका-शक्ति कुण्ठित की जा सकती है। ऐसे ही भगवान्में जो शक्ति रहती है, उसे भगवान्से भिन्न और अभिन्न--दोनों ही नहीं कह सकते।जैसे दियासलाईमें अग्निकी सत्ता तो सदा रहती है, पर उसकी प्रकाशिका और दाहिका-शक्ति छिपी हुई रहती है; ऐसे ही भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें सदा रहते हैं, पर उनकी शक्ति छिपी हुई रहती है। उस शक्तिको अधिष्ठित करके, अर्थात् अपने वशमें करके उसके द्वारा भगवान् प्रकट होते हैं। जैसे, जबतक अग्नि अपनी प्रकाशिका और दाहिका-शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होती, तबतक सदा रहते हुए भी अग्नि नहीं दीखती, ऐसे ही जबतक भगवान् अपनी शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होते, तबतक भगवान् हरदम रहते हुए भी नहीं दीखते।राधाजी, सीताजी, रुक्मिणीजी आदि सब भगवान्की निजी दिव्य शक्तियाँ हैं। भगवान् सामान्यरूपसे सब जगह रहते हुए भी कोई काम नहीं करते। जब करते हैं, तब अपनी दिव्य शक्तिको लेकर ही करते हैं। उस दिव्य शक्तिके द्वारा भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं। उनकी लीलाएँ इतनी विचित्र और अलौकिक होती हैं कि उनको सुनकर, गाकर और याद करके भी जीव पवित्र होकर अपना उद्धार कर लेते हैं। निर्गुण-उपासनामें वही शक्ति 'ब्रह्मविद्या' हो जाती है, और सगुण-उपासनामें वही शक्ति 'भक्ति' हो जाती है। जीव भगवान्का ही अंश है। जब वह दूसरोंमें मानी हुई ममता हटाकर एकमात्र भगवान्की स्वतःसिद्धवास्तविक आत्मीयताको जाग्रत् कर लेता है, तब भगवान्की शक्ति उसमें भक्तिरूपसे प्रकट हो जाती है। वह भक्ति इतनी विलक्षण है कि निराकार भगवान्को भी साकाररूपसे प्रकट कर देती है, भगवान्को भी खींच लेती है। वह भक्ति भी भगवान् ही देते हैं।भगवान्की भक्तिरूप शक्तिके दो रूप हैं--विरह और मिलन। भगवान् विरह भी भेजते हैं (टिप्पणी प0 218.3) और मिलन भी। जब भगवान् विरह भेजते हैं, तब भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है। व्याकुलताकी अग्निमें संसारकी आसक्ति जल जाती है और भगवान् प्रकट हो जाते हैं।ज्ञानमार्गमें भगवान्की शक्ति पहले उत्कट जिज्ञासाके रूपमें आती है (जिससे तत्त्वको जाने बिना साधकसे रहा नहीं जाता) और फिर ब्रह्मविद्या-रूपसे जीवके अज्ञानका नाश करके उसके वास्तविक स्वरूपको प्रकाशित कर देती है। परन्तु भगवान्की वह दिव्य शक्ति, जिसे भगवान् विरहरूपसे भेजते हैं, उससे भी बहुत विलक्षण है। भगवान् कहाँ हैं? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?--इस प्रकार भक्त व्याकुल हो जाता है, तो यह व्याकुलता सब पापोंका नाश करके भगवान्को साकाररूपसे प्रकट कर देती है। व्याकुलतासे जितना जल्दी काम बनता है, उतना विवेक-विचारपूर्वक किये गये साधनसे नहीं।विशेष बातभगवान् अपनी प्रकृतिके द्वारा अवतार लेते हैं और तरह-तरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जैसे अग्नि स्वयं कुछ नहीं करती, उसकी प्रकाशिका-शक्ति प्रकाश कर देती है, दाहिका-शक्ति जला देती है; ऐसे ही भगवान् स्वयं कुछ नहीं करते, उनकी दिव्य शक्ति ही सब काम कर देती है। शास्त्रोंमें आता है कि सीताजी कहती हैं-- 'रावणको मारना आदि सब काम मैंने किया है, रामजीने कुछ नहीं किया।' जैसे मनुष्य और उसकी शक्ति (ताकत) है, ऐसे ही भगवान् और उनकी शक्ति है। उस शक्तिको भगवान्से अलग भी नहीं कह सकते और एक भी नहीं कह सकते। मनुष्यमें जो शक्ति है, उसे वह अपनेसे अलग करके नहीं दिखा सकता, इसलिये वह उससे अलग नहीं है। मनुष्य रहता है, पर उसकी शक्ति घटती-बढ़ती रहती है, इसलिये वह मनुष्यसे एक भी नहीं है। यदि उसकी मनुष्यसे एकता होती तो वह उसके स्वरूपके साथ बराबर रहती, घटती-बढ़ती नहीं। अतः भगवान् और उनकी शक्तिको भिन्न अथवा अभिन्न कुछ भी नहीं कह सकते। दार्शनिकोंने भिन्न भी नहीं कहा और अभिन्न भी नहीं कहा। वह शक्ति अनिर्वचनीय है। भगवान् श्रीकृष्णके उपासक उस शक्तिको श्रीजी-(राधाजी-) के नामसे कहते हैं। जैसे पुरुष और स्त्री दो होते हैं ,ऐसे श्रीकृष्ण और श्रीजी दो नहीं हैं। ज्ञानमें तो द्वैतका अद्वैत होता है अर्थात् दो होकर भी एक हो जाता है, और भक्तिमें अद्वैतका द्वैत होता है अर्थात् एक होकर भी दो हो जाता है। जीव और ब्रह्म एक हो जायँ तो 'ज्ञान' होता है और एक ही ब्रह्म दो रूप हो जाय तो 'भक्ति' होती है। एक ही अद्वैत-तत्त्व प्रेमकी लीला करनेके लिये, प्रेमका आस्वादन करनेके लिये, सम्पूर्ण जीवोंको प्रेमका आनन्द देनेके लिये श्रीकृष्ण और श्रीजी-- इन दो रूपोंसे प्रकट होता है (टिप्पणी प0 219)। दो रूप होनेपर भी दोनोंमें बड़ा कौन है और कौन छोटा, कौन प्रेमी है और कौन प्रेमास्पद? इसका पता ही नहीं चलता। दोनों ही एक-दूसरेसे बढ़कर विलक्षण दीखते हैं। दोनों एक-दूसरेके प्रति आकृष्ट होते हैं। श्रीजीको देखकर भगवान् प्रसन्न होते हैं और भगवान्को देखकर श्रीजी। दोनोंकी परस्पर प्रेम-लीलासे रसकी वृद्धि होती है। इसीको रास कहते हैं।भगवान्की शक्तियाँ अनन्त हैं, अपार हैं। उनकी दिव्य शक्तियोंमें ऐश्वर्य-शक्ति भी है और माधुर्य-शक्ति भी। ऐश्वर्य-शक्तिसे भगवान् ऐसे विचित्र और महान् कार्य करते हैं, जिनको दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। ऐश्वर्य-शक्तिके कारण उनमें जो महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता दीखती है, वह उनके सिवाय और किसीमें देखने-सुननेमें नहीं आती। माधुर्य-शक्तिमें भगवान् अपने ऐश्वर्यको भूल जाते हैं। भगवान्को भी मोहित करनेवाली माधुर्य-शक्तिमें एक मधुरता, मिठास होती है, जिसके कारण भगवान् बड़े मधुर और प्रिय लगते हैं। जब भगवान् ग्वालबालोंके साथ खेलते हैं, तब माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है। अगर उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाय तो सारा खेल बिगड़ जाय; ग्वालबाल डर जायँ और भगवान्के साथ खेल भी न सकें। ऐसे ही भगवान् कहीं मित्ररूपसे, कहीं पुत्ररूपसे और कहीं पतिरूपसे प्रकट हो जाते हैं, तो उस समय उनकी ऐश्वर्य-शक्ति छिपी रहती है और माधुर्यशक्ति प्रकट रहती है। तात्पर्य है कि भगवान् भक्तोंके भावोंके अनुसार उनको आनन्द देनेके लिये ही अपनी ऐश्वर्यशक्तिको छिपाकर माधुर्यशक्ति प्रकट कर देते हैं।जिस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट रहती है उस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती और जिस समय ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट रहती है, उस समय माधुर्य-शक्ति प्रकट नहीं होती। ऐश्वर्य-शक्ति केवल तभी प्रकट होती है, जब माधुर्यभावमें कोई शङ्का पैदा हो जाय। जैसे, माधुर्य-शक्तिके प्रकट रहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ों को ढूँढ़ते हैं। परन्तु 'बछड़े कहाँ गये?' यह शङ्का पैदा होते ही ऐश्वर्य-शक्ति प्रकट हो जाती है और भगवान् तत्काल जान जाते हैं कि बछड़ोंको ब्रह्माजी ले गये हैं।भगवान्में एक सौन्दर्य-शक्ति भी होती है, जिससे हरेक प्राणी उनमें आकृष्ट हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्यको देखकर मथुरापुरवासिनी स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं-- गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं\n    लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।\nदृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप\n    मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य।।(श्रीमद्भा0 10। 44। 14)'इन भगवान् श्रीकृष्णका रूप सम्पूर्ण सौन्दर्यका सार है, सृष्टिमात्रमें किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है। इनका रूप किसीके सँवारने-सजाने अथवा गहने-कपड़ोंसे नहीं, प्रत्युत स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखते-देखते तृप्ति भी नहीं होती; क्योंकि यह नित्य नवीन ही रहता है। समग्र यश, सौन्दर्य और ऐश्वर्य इस रूपके आश्रित है। इस रूपके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। गोपियोंने पता नहीं कौन-सा तप किया था, जो अपने नेत्रोंके दोनोंसे सदा इनकी रूप-माधुरीका पान किया करती हैं शुकदेवजी कहते हैं!' निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना\n            मञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।\nप्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाः\n           पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम्।।  \nपिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।\nजिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः।।  (श्रीमद्भा0 10। 43। 20 21)'परीक्षित् ! मञ्चोंपर जितने लोग बैठे थे, वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जन-समुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे, उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंद्वारा उनकी मुख-माधुरीका पान करते-करते तृप्त ही नहीं होते थे; मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओँसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों!' भगवान् श्रीरामके सौन्दर्यको देखकर विदेह राजा जनक भी विदेह अर्थात् देहकी सुध-बुधसे रहित हो जाते हैं--  मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।(मानस 1। 215। 4)\n\nऔर कहते हैंसहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।।(मानस 1। 216। 2)वनमें रहनेवाले कोल-भील भी भगवान्के विग्रहको देखकर मुग्ध हो जाते हैं-- करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।\nचित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।(मानस 2। 135। 3)प्रेमियोंकी तो बात ही क्या, वैरभाव रखनेवाले राक्षस खर-दूषण भी भगवान्के विग्रहकी सुन्दरताको देखकर चकित हो जाते हैं और कहते हैं-- नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।\nहम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।(मानस 3। 19। 2) तात्पर्य है कि भगवान्के दिव्य सौन्दर्यकी ओर प्रेमी, विरक्त, ज्ञानी, मूर्ख, वैरी, असुर और राक्षसतक सबका मन आकृष्ट हो जाता है।\n'सम्भवाम्यात्ममायया'--जो मनुष्य भगवान्से विमुख रहते हैं, उनके सामने भगवान् अपनी योगमायामें छिपे रहते हैं और साधारण मनुष्य-जैसे ही दीखते हैं। मनुष्य ज्यों-ज्यों भगवान्के सम्मुख होता जाता है, त्यों-त्यों भगवान् उसके सामने प्रकट होते जाते हैं। इसी योगमायाका आश्रय लेकर भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं (टिप्पणी प0 220)।\n\nभगवद्विमुख मूढ़ पुरुषके आगे दो परदे रहते हैं--एक तो अपनी मूढ़ताका और दूसरा भगवान्की योग-मायाका (गीता 7। 25)। अपनी मूढ़ता रहनेके कारण भगवान्का प्रभाव साक्षात् सामने प्रकट होनेपर भी वह उसे समझ नहीं सकता; जैसे--द्रौपदीका चीर-हरण करनके लिये दुःशासन अपना पूरा बल लगाता है, उसकी भुजाएँ थक जाती हैं, पर साड़ीका अन्त नहीं आता-- द्रुपद सुता निरबल भइ ता दिन तजि आये निज धाम।\nदुस्सासन की भुजा थकित भई बसनरूप भए स्याम।। --इस प्रकार भगवान्ने सभाके भीतर अपना ऐश्वर्य साक्षात् प्रकट कर दिया। परन्तु अपनी मूढ़ताके कारण दुःशासन, दुर्योधन, कर्ण आदिपर इस बातका कोई असर ही नहीं पड़ा कि द्रौपदीके द्वारा भगवान्को पुकारनेमात्रसे कितनी विलक्षणता प्रकट हो गयी! एक स्त्रीका चीरहरण भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं! इस तरफ उनकी दृष्टि ही नहीं गयी। भगवान्का प्रभाव सामने देखते हुए भी वे उसे जान नहीं सके।यदि जीव अपनी मूढ़ता (अज्ञान) दूर कर दे तो उसे अपने स्वरूपका अथवा परमात्मतत्त्वका बोध तो हो जाता है, पर भगवान्के दर्शन नहीं होते (टिप्पणी प0 221.1)। भगवान्के दर्शन तभी होते है, जब भगवान् अपनी योगमायाका परदा हटा देते हैं। अपना अज्ञान मिटाना तो जीवके हाथकी बात है, पर योग-मायाको दूर करना उसके हाथकी बात नहीं है। वह सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् अपनी शक्तिसे उसका अज्ञान भी मिटा सकते हैं और दर्शन भी दे सकते हैं। भगवान् जितनी लीलाएँ करते हैं, सब योगमायाका आश्रय लेकर ही करते हैं। इसी कारण उनकी लीलाको देख सकते हैं, उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि वे योग-मायाका आश्रय न लें तो उनकी लीलाको कोई देख ही नहीं सकता, उसका आस्वादन कोई कर ही नहीं सकता।अवतार-सम्बन्धी विशेष बात\n\nअवतारका अर्थ है--नीचे उतरना। सब जगह परिपूर्ण रहनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा अपने अनन्य भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेके लिये अत्यधिक कृपासे एक स्थान-विशेषमें अवतार लेते हैं और छोटे बन जाते हैं। दूसरे लोगोंका प्रभाव या महत्त्व तो बड़े हो जानेसे होता है, पर भगवान्का प्रभाव या महत्त्व छोटे हो जानेसे होता है। कारण कि अपार, असीम, अनन्त होकर भी भगवान् छोटे-से बन जाते हैं-- यह उनकी विलक्षणता ही है। जैसे, भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं; परन्तु एक पर्वतको धारण करनेसे भगवान् 'गिरिधारी' नामसे प्रसिद्ध हो गये! अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके रोम-रोममें स्थित है, (टिप्पणी प0 221.2) ऐसे परमेश्वर एक पर्वतको उठा लें--यह कोई बड़ी बात नहीं, प्रत्युत छोटी बात है। परन्तु छोटी बातमें ही भगवान्की बड़ी बात होती है। इस प्रकार अवतार लेनेमें ही भगवान्की विशेषता है।साधारण आदमी जिस स्थितिपर है, उसी स्थितिपर आकर भगवान् वैसी लीला करते हैं। बिलकुल भोलेभाले साधारण बालककी तरह बनकर लीला करते हैं। ग्वाल-बालोंसे खेलते समय वे दूसरे ग्वालबालसे हार भी जाते हैं। जो ग्वालबाल जीत जाता है, वह सवार बन जाता है और भगवान् घोड़ा बन जाते हैं। यह उनकी विशेष महत्ता है।\n\nभगवान्के प्रभावको जाननेवाले ज्ञानी महात्मालोग तो उनके स्वरूपमें मस्त रहते हैं; पर भक्तोंको उनकी साधारण अज्ञ बालककी तरह भोलीभाली लीला बड़ी विचित्र और मीठी लगती है। वहाँ ज्ञानियोंका ज्ञान नहीं चलता। ज्ञानियोंके शिरोमणि ब्रह्माजी भी भगवान्की लीलाको देखकर चकरा गये! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, योगी-तपस्वी, संत-महात्मा भी उनकी लीलाओंके रहस्यको नहीं जान सकते और इस विषयमें मूक हो जाते हैं। भगवान् ही कृपा करके जिन प्यारे अन्तरङ्ग भक्तोंको जनाना चाहते हैं, वे ही उनकी लीलाके तत्त्वको जान पाते हैं--'सोइ जानइ जेहि देहु जनाई' (मानस 2। 127। 2)। गायें चराते समय, ग्वालबालोंसे खेलते समय भी भगवान् बड़े-बड़े प्रभावशाली कार्य कर देते हैं। बड़े-बड़े बलवान् राक्षसोंको भी चुटकियोंमें ही खत्म कर देते हैं। छोटे-से बालक बननेपर भी उनका प्रभाव वैसा-का-वैसा ही रहता है।जैसे कोई बहुत बड़ा विद्वान् किसी बालकको वर्णमाला सिखाता है, तो वह बालकका हाथ पकड़कर उससे 'क ख ग ৷৷'. लिखवाता है और मुँहसे भी वैसा बोलता है; परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह विद्वान् स्वयं वर्णमाला सीखता है। वह तो बालककी स्थितिमें आकर उसे सिखाता है, जिससे वह सुगमतापूर्वक सीख जाय। ऐसे ही अनन्तब्रह्माण्ड-नायक भगवान् हमलोगोंके बीच हमारे सामने आते हैं और हमारी तरह ही बनकर हमें शिक्षा देते हैं। उनकी बड़ी अलौकिक विचित्र-विचित्र लीलाएँ होती हैं, जिनका श्रवण, पठन और गायन करनेसे भी लोगोंका उद्धार हो जाता है।\n\n सम्बन्ध-- अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने अवतारका अवसर बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.6।।अजत्वाव्ययत्वसर्वेश्वरत्वादिसर्वं पारमेश्वरं प्रकारम् अजहद् एव स्वां प्रकृतिम् अधिष्ठाय आत्ममायया संभवामि प्रकृतिः स्वभावः स्वम् एव स्वभावम् अधिष्ठाय स्वेन एव रूपेण स्वेच्छया संभवामि इत्यर्थः।स्वरूपं तु  आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्। (यजुर्वे0 31।18)क्षयन्तमस्य रजसः पराके। (साम0 17।1।4।2)य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः (छा0 उ0 1।6।6) तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयोऽमृतो हिरण्मयः। (तै0 उ0 1।6।1)सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि। (यजुर्वे0 32।2)भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः। (छा0 उ0 3।14।2)माहारजनं वासः (बृ0 उ0 2।3।6) इत्यादिश्रुतिसिद्धम्।आत्ममायया आत्मीयया मायया।माया वयुनं ज्ञानम् (वे0 नि0 ध0 व0 22) इति ज्ञानपर्यायः अत्र मायाशब्दः। तथा च अभियुक्तप्रयोगः  मायया सततं वेत्ति प्राणिनां च शुभाशुभम् इति। आत्मीयेन ज्ञानेन आत्मसंकल्पेन इत्यर्थः।अतः अपहतपाप्मत्वादिसमस्तकल्याणगुणात्मकत्वं सर्वम् ऐश्वरं स्वभावम् अजहद् एव स्वम् एव रूपं देवमनुष्यादिसजातीयस्थानं कुर्वन् आत्मसंकल्पेन देवादिरूपः संभवामि।तद् इदम् आह  अजायमानो बहुधा विजायते (यजुर्वेद 31।19) इति श्रुतिः। इतरपुरुषसाधारणं जन्म अकुर्वन् देवादिरूपेण स्वसंकल्पेन उक्तप्रक्रियया जायत इत्यर्थः।बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि (गीता 4।5)तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (गीता 4।7)जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। (गीता 4।9) इति पूर्वापराविरोधाच्च।जन्मकालम् आह",
        "et": "4.6 Without forsaking any of the My special alities, as supreme rulership, birthless, imperishability etc., I am born by My free will. Prakrti means one's own nature. The meaning is that by employment of My own Nature and taking a form of My choice, I incarnate by My own will (Maya).\n\nThe character of My own Nature becomes evident from the following Srutis:  'Him who is of sun-like colour, beyond darkness (Tamas)' (Sve. U., 3.8), 'Him who abides beyond Rajas (active matter)' (Sama 17.1.4.2); 'This Golden Person who is within the sun' (Cha. U. 1.6.6); 'Within the heart, there is the Person consisting of mind, immortal and golden' (Tai. U. 1.6.1); 'All mortal creatures have come from the self-luminous Person' (Yaj., 32.2); 'Whose form is light, whose will is truth, who is the self of ethereal space, who contains all actions, contains all desires, contains all odours, contains all tastes' (Cha. U., 3.14.2); 'Like a raiment of golden colour' (Br. U., 4.3.6).\n\n'Atma-mayaya' means through the Maya which belongs to Myself. Here the term Maya is identical with knowledge as stated in the lexicon of Yaska:  'Maya is wisdom, knowledge.' Further there is the usage of competent people:  'By Maya, He knows the good and bad of his creatures.' Hence by My own knowledge means 'by My will.' Hence, without abandoning My essential attributes which belong to Me the Lord of all, such as being free of sins, having auspicious attributes etc., and creating My own form similar to the configuration of gods, men etc., I incarnate in the form of gods etc. The Sruti teaches the same thing:  'Being unborn, He is born in various forms' (Tai. A., 3.12.7). The purport is that His birth is ite unlike that of ordinary beings. The dissimilarity consists in that He is born out of His own will unlike ordinary beings whose birth is necessitated by their Karma. Thus constured, there is no contradiction also between what was taught earlier and what is taught later as in the statements:  'Many births of Mine have passed, O Arjuna, and similarly yours also. I know them all' (4.5); 'I incarnate Myself' (4.7); and 'He who thus knows in truth My birth and work' (4.9). [All this elaboration is meant to refute the doctrine of mere apparency of incarnations as taught by the Advaitins. Ramanuja, as stated in his Introduction to the Bhasya, upholds the absolute reality of incarnations.]\n\nSri Krsna now specifies the times of His incarnations."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.5  4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्।  श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति।  आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः।  अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः।  कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्।  यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।",
        "et": "4.6 See Comment under 4.9"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.6।।तो फिर आप नित्य ईश्वरका पुण्यपापसे सम्बन्ध न होनेपर भी जन्म कैसे होता है इसपर कहा जाता है  यद्यपि मैं अजन्मा  जन्मरहित अव्ययात्मा  अक्षीण ज्ञानशक्तिस्वभाववाला और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका नियमन करनेवाला ईश्वर भी हूँ तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको जिसके वशमें सब जगत् बर्तता है और जिससे मोहित हुआ मनुष्य वासुदेवरूप अपनेआपको नहीं जानता उस अपनी प्रकृतिको अपने वशमें रखकर केवल अपनी लीलासे ही शरीरवालासा जन्म लिया हुआसा हो जाता हूँ अन्य लोगोंकी भाँति वास्तवमें जन्म नहीं लेता।",
        "sc": "।।4.6।। अजोऽपि जन्मरहितोऽपि सन् तथा अव्ययात्मा अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावोऽपि सन् तथा भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानाम् ईश्वरः ईशनशीलोऽपि सन् प्रकृतिं स्वां मम वैष्णवीं मायां त्रिगुणात्मिकाम् यस्या वशे सर्वं जगत् वर्तते यया मोहितं सत् स्वमात्मानं वासुदेवं न जानाति तां प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय वशीकृत्य संभवामि देहवानिव भवामि जात इव आत्ममायया आत्मनः मायया न परमार्थतो लोकवत्।।तच्च जन्म कदा किमर्थं च इत्युच्यते",
        "et": "4.6 Api, san ajah, though I am birthless; and avyayatma, undecaying by nature, though I am naturally possessed of an undiminishing power of Knowledge; and so also api san, though; isvarah, the Lord, natural Ruler; bhutanam, of beings, from Brahma to a clump of grass; (still) adhisthaya, by subjugating; svam, My own; prakrtim, Prakrti, the Maya of Visnu consisting of the three gunas, under whose; spell the whole world exists, and deluded by which one does not know one's own Self, Vasudeva;-by subjugating that Prakrti of Mine, sambhavami, I take birth, appear to become embodeid, as though born; atma-mayaya, by means of My own Maya; but not in reality like an ordinary man.\nIt is being stated when and why that birth occurs:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.6।।प्रश्नस्य परिहृतत्वात्अजोऽपि इति किमर्थं इत्यत आह  न तर्हीति। यदि जन्मानि व्यतीतानि तर्हीत्यर्थः। अनादिर्देहतोऽपि। उपलक्षणं चैतत्। मरणरहितः सर्वभूतानां ईश्वरश्चेत्यपि द्रष्टव्यम्। तथा चोक्तविरोध इति भावः ननु देहतोऽप्यनादित्वादेराक्षेपेऽजत्वादिमात्रं कथमुच्यते इत्यतोअव्ययात्मा इत्येतावता देहतोऽप्यविनाशमाचष्टे। तत्साहचर्यात्अजोऽपि इत्येतदपि तथैव व्याख्येयमिति भावेनाह  अव्यय इति। अपिपदात्परं अस्येत्यध्याहार्यम्। स्यादेवं व्याख्यानं यदि भगवद्विग्रहस्याप्यव्ययत्वं गीताचार्याभिमतं स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह  अनन्तमिति। इति च रूपविशेषणमिति वर्तते। एवं तर्हि कथं तत्रैवजगृहे पौरुषं रूपं भाग.1।3।9 इति ग्रहणमुच्यते गृहीतस्य च त्यागो नियत एवेत्यत आह  जगृह इति।व्यक्तिः इत्युच्यत इति शेषः। कुत एवं कल्प्यते इत्यत आह  युक्तय इति। युज्यत एभिरिति युक्तयः प्रमाणानि असम्भावनापरिहारार्था अचिन्त्यशक्तित्वाद्या युक्तयो वा। उक्ता द्वितीये। अस्तु भगवद्विग्रहस्याप्यव्ययत्वम् अत्र तु स्वरूपस्यैवोच्यत इति किं न स्यात् इत्यत आह  आत्मेति। आत्मनः स्वरूपस्य देहस्याप्यव्ययत्वोपपादनेनाजत्वमपि साहचर्यात्तस्यैवेति योऽभिप्रायस्तं प्रकटयितुमव्ययत्वमुपक्रम्यानादित्वमित्युक्तम्। सर्वसमं जीवानामप्यस्ति अतस्तद्विषयो नाक्षेपः परिहारो वा सम्भवतीति भावः। आत्मशब्दोऽप्यन्यथा व्यर्थः। अस्मत्पक्षे स्वरूपदेहयोरुपादानार्थः। अत एवदेहोऽपि भाग.11।13।17 इत्युक्तम्। एवं तर्हिप्रकृतिं स्वामधिष्ठाय इति कथमुक्तं इत्यतस्तदन्यथा व्याख्यातुमाह  कथमिति। स्वरूपतो देहतश्चानादिनित्यस्यसम्भवामि इति जनिः कथमुच्यते व्याहतत्वादित्यत आहेतिशेषः।अधिष्ठाय इत्यतः परमितिशब्दश्च। कथमनेन परिहारः इत्यतो व्याचष्टे  प्रकृत्येति। वसुदेवादिषु प्रादुर्भूतत्वादिति शेषः। अनेन जन्मभ्रान्तेर्निमित्तमुक्तम्। यथोक्तं स्त्रीपुम्प्रसङ्गादित्यादि। भ्रान्तेरुपादानमाह  तयैवेति। तमोरूपया यदि मातापितृसम्बन्धोऽङ्गीकृतस्तर्हि तन्निमित्तं दुःखादिकमपि प्रसज्जत इत्याशङ्कानिरासायस्वां इतिपदं व्याख्याति  न त्विति। प्रकृतेर्भगवदधीनत्वं कुतः इत्यत आह  द्रव्यमिति। अत्र वाक्ये प्रकृतिर्न श्रूयत इत्यत आह  सा हीति। द्रव्यपदेनेति शेषः।तस्याप्रकृतिवाचित्वं कुतः इत्यत आह  तत इति। सर्वसृष्टिकारणानि ह्यत्र निर्दिश्यन्ते। तच्च प्रकृतेरेव सम्भवति। न पृथिव्यादेरित्यर्थः। आत्ममाययाऽऽत्माविद्ययेति प्रतीतिनिरासायाह  आत्मेति। कुतो हेतोरेवं जीवविलक्षणं ते जन्म इत्याशङ्कानिरासार्थमेतत्। अन्यथाप्रतीतिरप्यनेन परिहृता सर्वज्ञस्याविद्यायोगात्। प्रकृतिरत्र माया किं न स्यात् इत्यत आह  प्रकृतेरिति। मायाशब्दस्य ज्ञानवाचित्वं कुतः इत्यत आह  केतुरिति इति प्रज्ञायाः नामधेयानीति वाक्यशेषात्। प्राक्प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय इत्यनेनैव भ्रमनिमित्तत्वमुपादानत्वं च प्रकृतेरुक्तमिति मायाशब्दो न प्रकृतिवाची पुनरुक्तिप्रसङ्गादित्युक्तम् इदानीं तस्य निमित्तमात्रपरत्वे मायाशब्दस्य प्रकृत्यर्थतायामपि न दोषः उपादानप्रतिपादनार्थत्वादिति भावेनाह  सृष्टीति प्रकृत्येति शेषः। तेषां वसुदेवादीनां सृष्ट्वा तत्र प्रादुर्भूतः विमोहिकया मायाख्यया। अत्रागमसम्मतिमाह  उक्तं चेति। आत्मचिद्बलादजात एव। नन्वीशनशीलानामपि ब्रह्मादीनामुत्पत्तिमरणदर्शनेन विरोधाभावादीश्वरोऽपिसम्भवामि इति कथमुच्यतेस्थेशभासपिसकसो वरच् अष्टा.3।2।175 इत्येतद्विहायान्यथा व्याचष्टे  ईश्वर इति। कुत एतदित्यत आह  ईशेभ्य इति। एतदागमवलादेव समासाकारलोपावनुमन्तव्यौ। अजत्वादेः सम्भवेन शाब्दो व्याघातः अस्य तु व्याप्त्येति ज्ञापनाय क्रममुल्लङ्घ्य व्याख्यातम्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.6।।नन्वनादेरविनाशिनस्तव जीववत्कथं जन्मोक्तं इत्यत आह  अजोऽपीति। सत्यमेवं तथाप्यजोऽपि सन्नव्ययात्माऽपि सन् कर्मपारतन्त्र्यरहितोऽपि सन् स्वमायया सम्भवामि। स्वतन्त्रमायानिबन्धनं मम जन्मेति। मायाशब्दः क्वचिच्छास्त्रे हरिसामर्थ्यवाचकः।क्वाप्यविद्या मृषावाचिकृपाकपटवित्तवाक्। इति निरूपणादत्रात्मनां भक्तानामुपरि कृपयाऽऽत्मनो वा कृपयाऽऽविर्भवामि।मया सह वर्त्तमानमाया इति तृतीयस्कन्धसुबोधिनीव्याख्यातया वाऽप्रच्युतज्ञानबलैश्वर्यादिशक्त्यैव सर्वभवनसामर्थ्यरूपमायया सम्भवामि।विजातीयनिवारणायात्मपदम्। मायात्वोक्तिःशक्तिर्मे मोहिनी त्वतः एवेति वयमवोचाम्। ननु तथापि स्वरूपवैपरीत्यं जन्मभावेन जीवस्यैव तवायातमित्याशङ्क्याह  प्रकृतिमिति। प्रकृतिं स्वामसाधारणस्वरूपं स्वभावं वा सच्चिदानन्दमात्रं नित्यसिद्धज्ञानक्रियाशक्त्याश्रयं षड्गुणाश्रयमधिष्ठाय अपरित्यज्य सन्नेव प्रादुर्भवामि न तु जीववत्स्वरूपादपि प्रच्युतः। जीवस्तु व्युच्चरणानन्तरं मायया पराभिध्यानात्तिरोहितानन्दषड्गुणः संसरतीति जन्ममरणपर्यावर्त्तमनुभवति अहं तु न तथा जन्मादिमान् अजत्वश्रुतेरव्ययत्वाच्च। एतेनैव षड्भावविकारा निराकृताः। यद्यपि जीवात्मनि न विकाराः षट् किन्तु प्रकृतिपरिणामभूते देहे एव तथापिआविर्भावतिरोभावजन्मनाशविकल्पवत् शरीरं जगज्जीवात्मनि प्रत्याययति विकारान् संसृतिं च करोति प्राकृतत्वात्। अत एवोक्तं सूत्रकारेण  पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ब्र.सू.3।2।5 इति। अत्र भाष्यकारः  अस्य जीवस्यैश्वर्यादि तिरोहितं तत्र हेतुः पराभिध्यानात् परस्य भगवतोऽभिध्यानं स्वस्यैतस्य च सर्वतो भोगेच्छा तस्मादीश्वरेच्छया जीवस्य व्युच्चरितस्य भगवद्धर्मतिरोभावः। ऐश्वर्यतिरोभावाद्दीनत्वं पराधीनत्वं च। वीर्यतिरोभावात् सर्वदुःखसहनम्। यशस्तिरोभावात् सर्वहीनत्वम्। श्रीतिरोभावाज्जन्मादिसर्वापद्विषयत्वम्। ज्ञानतिरोभावाद्देहादिष्वहम्बुद्धिः। सर्वविपरीतज्ञानं च अपस्मारसहितस्येव। वैराग्यतिरोभावाद्विषयासक्तिः। बन्धश्चतुर्णां कार्यो विपर्ययो द्वयोस्तिरोभावादेव। नान्यथा हि युक्तोऽयमर्थः। एकस्यैकांशप्राकट्येऽपि तथाभावात् आनन्दांशस्तु पूर्वमेव तिरोहितः येन जीवभावः अत एव काममयः अकामरूपत्वादानन्दस्य। निद्रा च सुतरां तिरोभावकर्त्री भगवच्छक्तिः। अतोऽस्मिन् प्रस्तावे जीवस्य धर्मतिरोभाव उक्तः। अन्यथा भगवत ऐश्वर्यादिलीला निर्विषया स्यात्। तस्माज्जीवरूपपर्यालोचनया न किञ्चिदाशङ्कनीयम् इति। जीवस्य देहिनो जन्मनाशावुक्तौ ब्रह्मणो भगवत आविर्भावतिरोभावाविन्याशयेनैव नित्यापरिच्छिन्नतनौ प्राकट्यमिति सम्भव उक्तः। अनेन योऽहमिह दृश्यमानः पुरुषोत्तमोऽवतारी स एवान्यत्र प्रादुर्भवामि स्वत इत्युक्तं तथा चाजोऽपि जन्मवान् बालोऽपि किशोरः एकोऽप्यनेक इत्यादि विरुद्धधर्मा श्रयत्वान्नानुपपत्तिः। विशेषस्तु भाष्यादेरवगन्तव्यः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.6।।नन्वतीतानेकजन्मवत्त्वमात्मनः स्मरसि चेत्तर्हि जातिस्मरो जीवस्त्वं परजन्मज्ञानमपि योगिनः सार्वात्म्याभिमानेनशास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् इति न्यायेन संभवति। तथाचाह वामदेवो जीवोऽपिअहं मनुरभंव सूर्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः इत्यादि दाशतय्याम्। अतएव न मुख्यः सर्वज्ञस्त्वम्। तथाच कथमादित्यं सर्वज्ञमुपदिष्टवानस्यनीश्वरःसन्। नहि जीवस्य मुख्यं सार्वज्ञ्यं संभवति व्यष्ट्युपाधेः परिच्छिन्नत्वेन सर्वसंबन्धित्वाभावात्। समष्ट्युपाधेरपि विराजः स्थूलभूतोपाधित्वेन सूक्ष्मभूतपरिणामविषयं मायापरिणामविषयं च ज्ञानं न संभवति। एवं सूक्ष्मभूतोपाधेरपि हिरण्यगर्भस्य तत्कारणमायापरिणामाकाशादिसर्गक्रमादिविषयज्ञानाभावः सिद्ध एव। तस्मादीश्वर एवकारणोपाधित्वादतीतानागतवर्तमानसर्वार्थविषयज्ञानवान्मुख्यः सर्वज्ञः। अतीतानागतवर्तमानविषयं मायावृत्तित्रयमेकैव वा सर्वविषया मायावृत्तिरित्यन्यत्। तस्य च नित्येश्वरस्य सर्वज्ञस्य धर्माधर्माद्यभावेन जन्मैवानुपपन्नम्। अतीतानेकजन्मवत्त्वं तु दूरोत्सारितमेव। तथाच जीवत्वे सार्वज्ञ्यानुपपत्तिरीश्वरत्वे च देहग्रहणानुपपत्तिरिति शङ्काद्वयं परिहरन्ननित्यत्वपक्षस्यापि परिहारमाह  अपूर्वदेहेन्द्रियादिग्रहणं जन्म पूर्वगृहीतदेहेन्द्रियादिवियोगो व्ययः। यदुभयं तार्किकैः प्रेत्यभाव इत्युच्यते। तदुक्तम्जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च इति। तदुभयं च धर्माधर्मवशाद्भवति। धर्माधर्मवशत्वं चाज्ञस्य जीवस्य देहाभिमानिनः कर्माधिकारित्वाद्भवति। तत्र यदुच्यते सर्वज्ञेश्वरस्य सर्वकारणस्येदृग्देहग्रहणं नोपपद्यत इति तत्तथैव कथम्। यदि तस्य शरीरं स्थूलभूतकार्यं स्यात्तदा व्यष्टिरूपत्वे जाग्रदवस्थाऽस्मदादितुल्यत्वं समष्टिरूपत्वे च विराट्जीवत्वम्। तस्य तदुपाधित्वात्। अथ सूक्ष्मभूतकार्यं तदा व्यष्टिरूपत्वे स्वप्नावस्थाऽस्मदादितुल्यत्वं समष्टिरूपत्वे च हिरण्यगर्भजीवत्वम्। तस्य तदुपाधित्वात्। तथाच भौतिकं शरीरं जीवानाविष्टं परमेश्वरस्य न संभवत्येवेति सिद्धम्। नच जीवाविष्ट एव तादृशे शरीरे तस्य भूतावेशवत्प्रवेश इति वाच्यम्। तच्छरीरावच्छेदेन तज्जीवस्य भोगाभ्युपगमेऽन्तर्यामिरूपेण सर्वशरीरप्रवेशस्य विद्यमानत्वेन शरीरविशेषाभ्युपगमवैयर्थ्यात्। भोगाभावे च जीवशरीरत्वानुपपत्तेः। अतो न भौतिकं शरीरमीश्वरस्येति पूर्वार्धेनाङ्गीकरोति  अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्निति। अजोऽपि सन्नित्यपूर्वदेहग्रहणं अव्ययात्मापि सन्निति पूर्वदेहविच्छेदं भूतानां भवनधर्माणां सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामीश्वरोऽपि सन्निति धर्माधर्मवशत्वं निवारयति। कथं तर्हि देहग्रहणमित्युत्तरार्धेनाह  प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवामि प्रकृर्तिं मायाख्यां विचित्रानेकशक्तिमघटमानघटनापटीयसीं स्वां स्वोपाधिभूतामधिष्ठाय चिदाभासेन वशीकृत्य संभवामि। तत्परिणामविशेषैरेव देहवानिव जातइव च भवामि। अनादिमायैव मदुपाधिभूता यावत्कालस्थायित्वेन च नित्या जगत्कारणत्वसंपादिका मदिच्छयैव प्रवर्तमाना विशुद्धसत्त्वमयत्वेन मम मूर्तिः। तद्विशिष्टस्य चाजत्वमव्ययत्वमीश्वरत्वं चोपपन्नम्। अतोऽनेन नित्येनैव देहेन विवस्वन्तं च त्वां च प्रति इमं योगमुपदिष्टवानहमित्युपपन्नम्। तथाच श्रुतिःआकाशशरीरं ब्रह्मेति आकाशोऽत्राव्याकृतं आकाशएव तदोतं च प्रोतं च इत्यादौ तथा दर्शनात्आकाशस्तल्लिङ्गात् इति न्यायाच्च। आकाश इति होवाच इत्याकाशशब्दः परमात्मा। कुतः। तस्य परमात्मनो लिङ्गं सर्वाणि भूतानीत्यादि तस्मात्।  तर्हि भौतिकविग्रहाभावात्तद्धर्ममनुष्यत्वादिप्रतीतिः कथमिति चेत् तत्राह  आत्ममाययेति। मन्माययैव मयि मनुष्यत्वादि प्रतीतिर्लोकानुग्रहाय न वस्तुवृत्त्येतिभावः। तथाचोक्तं मोक्षधर्मेमाया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नतु मां द्रष्टुमर्हसि।। इति। सर्वभूतगुणैर्युक्तं कारणोपाधिं मां चर्मचक्षुषा द्रष्टुं नार्हसीत्यर्थः। उक्तंच भगवता भाष्यकारेण। सच भगवान् ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः सदा संपन्नस्त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं स्वां मायां प्रकृतिं वशीकृत्याजोऽव्ययो भूतानामीश्वरो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वाभावोऽपि सन् स्वमायया देहवानिव जातइव च लोकानुग्रहं कुर्वँल्लँक्ष्यते स्वप्रयोजनाभावेऽपि भूतानुजिघृक्षयेति। व्याख्यातृभिश्चोक्तं स्वेच्छाविनिर्मितेन मायामयेन दिव्येन रूपेण संबभूवेति।नित्यो यः कारणोपाधिर्मायाख्योऽनेकशक्तिमान्। सएव भगवद्देह इति भाष्यकृतां मतम्।। अन्येतु परमेश्वरे देहदेहिभावं न मन्यन्ते किंतु यश्च नित्यो विभुः सच्चिदानन्दघनो भगवान्वासुदेवः परिपूर्णो निर्गुणः परमात्मा स एव तद्विग्रहो नान्यः कश्चिद्भौतिको मायिको वेति अस्मिन्पक्षे योजना।आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःअविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा इत्यादिश्रुतेः।असंभवस्तु सतोऽनुपपत्तेः तुशब्दो ब्रह्मण उत्पत्तिशङ्कानिराकरणार्थः। सतो ब्रह्मण उत्पत्तेरसंभवः। कुतःनचास्य कश्चिज्जनिता इति श्रुतेः। युक्तितश्च तत्कारणानुपपत्तेः।नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः इत्यादिन्यायाच्च। नैवायमात्मा आकाशादिवज्जायते। कुतः। तद्वदस्योत्पत्तेरश्रुतेः। बुद्ध्याद्युत्पत्तिवदस्त्वनुमेयमित्यत आह। नित्यत्वाञ्चशब्दादजन्यत्वादिभ्यश्च। नित्यत्वादिकमेव कुत इत्यत आह। ताभ्यः ताः श्रुत्यःन जीवो म्रियतेस वा एष महानज आत्मा इत्याद्याः वस्तुगत्या जन्मविनाशरहितः सर्वभासकः सर्वकारणमायाधिष्ठानत्वेन सर्वभूतेश्वरोऽपि सन्नहं प्रकृतिं स्वभावं सच्चिदानन्दघनैकरसम्। मायां व्यावर्तयति  निजस्वरुपमित्यर्थः।स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि इति श्रुतेः। स्वस्वरूपमधिष्ठाय स्वरूपावस्थित एव सन् संभवामि देहदेहिभावमन्तरेणैव देहिवद्व्यवहरामि। कथं तर्ह्यदेहे सच्चिदानन्दघने देहत्वप्रतीतिरत आह  निर्गणे शुद्धे सच्चिदानन्दरसघने मयि भगवति वासुदेवे देहदेहिभावशून्ये तद्रूपेण प्रतीतिर्मायामात्रमित्यर्थः। तदुक्तंकृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।। इति।अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्।। इतिच।  केचित्तु नित्यस्य निरवयवस्य निर्विकारस्यापि परमानन्दस्यावयवावयविभावं वास्तवमेवेच्छन्ति तेनिर्युक्तिकं ब्रुवाणस्तु नास्माभिर्विनिवार्यते इति न्यायेन नापवाद्याः। यदि संभवेत्तथैवास्तु किमतिपल्लवितेनेत्युपरम्यते।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.6।। नन्वनादेस्तव कुतो जन्म अविनाशिनश्च कथं पुनर्जन्म येन बहूनि मे व्यतीतानीत्युच्यते ईश्व रस्य तव पुण्यपापविहीनस्य कथं जीववज्जन्मेत्यत आह  अजोऽपीति। सत्यमेवं तथाप्यजोऽपि सन्नहं तथाव्ययात्माप्यनश्व रस्वभावोऽपि सन् तथा ईश्व रोऽपि कर्मपारतन्त्र्यरहितोऽपि सन्स्वमायया संभवामि सम्यगप्रच्युतज्ञानबलवीर्यादिशक्त्यैव भवामि। ननु तथापि षोडशकलात्मकलिङ्गदेहशून्यस्य तव कुतो जन्मेत्यत उक्तम्। स्वां शुद्धसत्त्वात्मिकां प्रकृतिमधिष्ठायं स्वीकृत्य विशुद्धोर्जितसत्त्व मूर्त्या स्वेच्छयावतरामीत्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.6।। ईश्वरस्य तव धर्माधर्माद्यभावाज्जन्मैवायुक्तम्। व्यतीतानेकजन्म वत्त्वं तु दूरनिरस्तमित्याशङ्क्य वस्तुतो जन्माभावेऽपि स्वमायया जन्म संभवतीत्याह  अजोऽपीति। अजो जन्मरहितोऽपि सन्नव्ययात्माऽक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावोऽपि सन् कदापि मम विच्छेदाभावात् था भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामीश्वर ईशनशीलोऽपि सन् प्रकृतिं मम वैष्णवीं त्रिगुणात्मिकां मायां यस्या वशे सर्वं जगद्वर्तते यया मोहितः सन् स्वमात्मानं वासुदेवं न जानाति तामधिष्ठाय वशीकृत्य संभवामि देहवानिव जात इव। आत्मनः स्वस्य मायया मन्माययैव मयि विग्रहवत्त्वादिप्रतीतिः साधकानुग्रहार्थं न परमार्थं इति भावः। तदुक्तं मोक्षधर्मेएतत्त्वया न विज्ञेयं रुपवानिति दृश्यते। इच्छन्मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः।। नश्येयमदृश्यो भवेयमित्यर्थः।माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नतु मां द्रष्टुमर्हसि।। इति। सर्वभूतगुणैर्युक्तं कारणोपाधिकमित्यर्थः। अत्र केचित्नित्यो यः कारणोपाधिर्मायाख्योऽनेकशक्तिमान्। सएव भगवद्देह इति भाष्यकृतां मतम् इत्याचार्यानुसारिव्याख्यानानन्तरं तस्मतं संग्रहेणोक्त्वा मतान्तरं प्रदर्शयन्ति। अन्येतु परमेश्वरे देहदेहिभावं न मन्यन्ते। किंतु यश्च नित्यो विभुः सच्चिदानन्दघनो भगवान्वासुदेवः परिपूर्णो निर्गुणः परमात्मा जन्मविनाशरहितः सर्वभासकः सर्वकारणत्वेन सर्वभूतेश्वरोऽपि सन् अहं प्रकृतिं स्वभावं सच्चिदानन्दघनैकरसम्। मायां व्यावर्तयति  स्वामिति। निजरुपामित्यर्थः।स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिन्मीति इति श्रुतेः स्वस्वरुपमधिष्ठाय स्वरुपावस्थित एव सन् संभवामि देहदेहिभावमन्तरेणैव देहिवद्य्ववहरामि। कथं तर्ह्यदेहे सच्चिदानन्दघने देहित्वप्रतीतिरत आह  आत्ममाययेति। निर्गुणे शुद्धे सच्चिदानन्दरसघने मयि भगवति वासुदेवे देहदेहिभावशून्ये तद्रूपेण प्रतीतर्मायामात्रमित्यर्थः। तदुक्तंकृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।जगद्विताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।। इति।अहोभाग्यमहोभाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं  पूर्णं ब्रह्म सनातनम् इतिचेति। तत्रेदमवधेयम्  परमेश्वरे देहदेहिभावो नास्तीत्युक्तिर्मायया देहदेहिभावो न वस्तुत इत्यङ्गीकुर्वतां भाष्यकृतां मतेन प्रतिकूला। यत्तु नित्य इत्यादि तत्र यो निर्गुणःअथात आदेशो नेतिनेतिनेदं यदिदमुपासतेएकमेवाद्वितीयंसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्मअस्थूलमनण्वह्नस्वमदीर्घंयत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमायो वै भूमा तत्सुखंयतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहतदेतदपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्अपाणिपादम् इत्यादिश्रुतितात्पर्यसिद्धः परमात्मा सएव तद्विग्रहः। स च विग्रहः किं साकार उत निराकारः। आद्ये निर्गुणस्य परिणाम उत विवर्तः। नाद्यः। निर्विकारस्य विकाररुपपरिणामायोगात्। अन्यथा तस्यानित्यत्वं स्यात्। द्वितीये मायाया विवर्तसाधिकाया आवश्यकत्वेन न मायिक इत्युक्तिरनुपपन्ना। न द्वितीयः। सर्वाकारशून्यः पुनश्च विशेषाकारेण गृह्यत इति विग्रह इति वदतो व्याघातात्। किंच स विग्रहः किं हस्तपादादिमान् उत तद्रहितः। आद्ये हस्तादयोऽपि किं दृश्या उतादृश्याः। आद्ये विग्रहस्य भूतकार्यत्वाभावान्मायिकत्वमवश्यमभ्युपेयम्। न द्वितीयाः। भक्तानां तद्दर्शनाद्यनापत्तेः। नन्वदृश्या अपि मायया दृश्या इति चेत्तर्हि किं परमाण्वादिवददृश्या उत ब्रह्मरुपेण। आद्ये योगिनामक्षगोचराः स्युः। द्वितीये हस्तादयोऽवयवास्तद्वान्विग्रह इति कृतमुक्तिमात्रेण स्वशिष्यबन्धनेन। न द्वतीयः। तद्रहितो विग्रहश्चेति व्याघातात्। एतेन  एतत्पक्षानुसारेण क्लिष्टकल्पनया श्लोकयोजनापि प्रत्युक्ता। उदाहृतवचनद्वयमपि भाष्यकृतामतएव सभ्यगुपपद्यते। तस्मात्सच्चिदानन्दस्वरुपः मायावच्छिन्नःयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तियतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे। यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षयेजन्माद्यस्य यतः इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायैर्जगत्कारणत्वेन प्रतिपादितः शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः अशरीरी परमात्मा सर्वेश्वरो मायानियन्ता साधकानुग्रहार्थं स्वमायया लीलाविग्रहं गृहीत्वा जात इव विग्रहवानिव भातीति श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणाद्यनुग्रहीतं सर्वज्ञानां भाष्यकृतां मतं शरणीकरणीयमिति दिक्। अन्येतु न कर्मफलं भगवतः शरीरभतएव न भौतिकम्। तस्माद्युक्तमजोऽपि सन्निति। ननु तर्हि भगवच्छरीरस्य किमुपादानम्। अविद्येतिचेन्न। परमेश्वरे तदभावात्। जीवाविद्येति चेन्न। शुक्तिरजतादिवत्तुच्छत्वापत्तेः। चिन्मात्रं चेन्न। चितः साकारत्वायोगात्। तथात्वे वा तस्यातीन्द्रियत्वापत्तिः। तस्मात्किमालम्बोऽयं भगवद्देहो देवकीगर्भप्रवेशजननबाल्यकौमारपौगण्डयौवनादिप्रतीतिविषय इतिचेत् श्रुणु। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममाययेति। अयमर्थः  जीवात्मनो हि अनात्मभूतां प्रकृतिं तेजोबन्नात्मिकां पञ्चभूतात्मिकां वाऽधिष्ठाय संभवन्ति जन्मादींल्लभन्ते। अहं तु स्वां प्रत्यगनन्यां प्रकृतिं प्रत्यक्चैतन्यमित्यर्थः। तदेवाधिष्ठाय नतूपादानान्तरम्। आत्ममायया स्वीयमायया संभवामि। यथा कश्चिन्मायावी स्वयं स्वस्थानादप्रच्युतस्वभावोऽप्यदृश्यो भूत्वा स्थूलसूक्ष्मभूतान्युपादायैव केवलया मायया द्वितीयं मायाविनं स्वसदृशमेव सूत्रमार्गेण गगनमारोहन्तं सृजति एवमहं कूटस्थचिन्मात्रोऽग्राह्यः स्वमायया चिन्मयमात्मनः शरीरं सृजामि तस्य बालाद्यवस्थाश्च सूत्रारोहणवद्दर्शयाभीति। एतावांस्तु विशेषः  लौकिकमायावी मायामुपसंहरन् द्वितीयं मायाविनमप्युपसंहरति अहं तु तामनुपसंहरन्त्स्वविग्रहमपि नोपसंहरामीति। एंवहि सति हिरण्यमश्रुत्वादिलक्षणविग्रहयोगिनश्चेतनस्यअन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इत्यादिन्यायसिद्धं वियदाद्युपादानलक्षणं सर्वेश्वरत्वं युज्यते नान्यथेति। तस्मात्सिद्धं परमेश्वरस्य मायामयं शरीरं नित्यमिति। एकेनैव हिरण्यश्मश्रुत्वादिलक्षणेन देहेन विवस्वन्तमुपदिश्य त्वामुदिशामीत्यादिवर्णयन्ति। अत्रेदं वक्तव्यम्  नियम्यदेहातिरिक्तनियामकदेहाभावादेकेनैवत्यादि नोपपद्यते। किंच हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट आदित्यान्तर्यामिदेह एव यदि कृष्णादिदेहः स्यात्तर्हि तथैव प्रतीयेत नतु मेघश्यामत्वादिलक्षणः। ननु मायया तथेति चेद्वरं परमेश्वरस्याशरीरस्यैव साधकानुग्रहायादित्यान्तर्यामिरुपेण कृष्णादिदेहात्मना च भाययावस्थानवर्णनम् कृष्णादिविग्रहाणां परंपरया मायिकत्वकल्पनाया भाष्यविरुद्धाया हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्टस्यापि सविशेषत्वेन मायिकत्वात्। यदपि यथा कश्चिदित्यादि तदपि न। भगवता वासुदेवेनैवादौ चतुर्भुजं विग्रहं प्रदर्श्य पुनर्द्विभुजं रुपं प्रदर्शितम्। तदपि तिरोधाय पुनस्तदपि प्रकटितमिति प्रसिद्धेः। अन्यथा परमेश्वरदेहानां मोहिन्यादिरुपाणामनन्तानां युगपत्प्रतीत्यापत्तेः। तस्मादीश्वरो भक्तार्थं तत्तद्विग्रहमाविर्भावयति तिरोभावयति चेत्यवश्यमभ्युपेयम्। एतेनाहमित्याद्यपि प्रत्युक्तम्। अजोऽपीत्यादिविशेषणैर्भाष्योष्योक्तव्याख्यानेन च जीवाद्वैलक्षण्यस्य सम्यक्प्रतीतेः। क्लिष्टाप्रसिद्धकल्पनाया भाष्यविरुद्धाया अनौचित्यात्। अतएवेश्वरदेहाभिप्रायेणैवायमर्जुनस्य प्रश्न इति पूर्वोक्तं प्रत्युक्तम्। परमात्मनो वास्तवदेहस्याभावात्। तस्मात्त्वमपि कश्चिदसर्वज्ञोऽनीश्वरो जीवएव तस्य तवादित्यं प्रत्युपदेष्टृत्वं विरुद्धमिति मूर्खाणामभिप्रायेणार्जुनस्य शङ्काऽहं जीववद्धर्माधर्मादिपारतन्त्र्याभावादजोऽव्ययात्मा भूतानामीश्वर एतादृशोऽपि सन् प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वमायया संभवामीत्यनेन योऽहमीश्वरः सर्वज्ञः सर्गादावुपदेशाय योग्यं विग्रहमुपादाय सूर्यं प्रति योगमुक्तवान् सएवाहमिदानीमुक्तवानित्युक्तरमित्यलं विस्तरेण।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।4.6।।अथ प्रकारादिप्रश्नत्रयोत्तरमनन्तरश्लोक इत्याह  अवतारेति। अजाव्ययशब्दाभ्यां प्रकृतिपुरुषयोरिव स्वरूपतो धर्मतश्च विकारा न सन्तीत्युच्यते अजाव्ययशब्दौ कर्मकृतजन्ममरणनिवृत्तिपरौ वा तेन हेयप्रत्यनीकत्वमुक्तं भवति।भूतानामीश्वरोऽपि इति कल्याणगुणाकरत्वाप्रच्युतिरुपलक्ष्यते। यद्वा अजशब्देन स्वरूपतः शरीरद्वारा च जन्मयुक्ताचित्क्षेत्रज्ञाभ्यां व्यावर्तनम्।अव्ययात्मा इत्यात्मशब्दस्य स्वभावपरतया नञोत्ऽयन्ताभावपरतया च कदाचिज्ज्ञानसङ्कोचादिमतो मुक्ताद्व्यावृत्तिः।ईश्वरशब्देन नित्यासङ्कुचितज्ञानेभ्यो नित्यमुक्तेभ्यो व्यवच्छेदः।अव्ययात्मा इत्यत्रापि पूर्वोत्तरवत्अपि सन् इत्यनुषञ्जनीयम्। अत्र च पूर्वार्धेन तृतीयचतुर्थपादाभ्यां च प्रश्नत्रयस्य क्रमात्परिहारः। आदिशब्देनेश्वरत्वोपलक्षितसर्वज्ञत्वसत्यसङ्कल्पत्वावाप्तसमस्तकामत्वादीनि गृह्यन्ते।सर्वमिति  न कस्यचिदपि स्वभावलेशस्य हानिरिति भावः। परमेश्वरसम्बन्धि पारमेश्वरं परमेश्वरत्वप्रयुक्तमित्यर्थः।अपि सत् इत्यस्य वर्तमाननिर्देशस्य तात्पर्यमाह  अजहदेवेति। एतेन तत्तदवतारेषु तासु तास्ववस्थासु च पारमेश्वरस्वभावस्य सत एव स्वेच्छाया तिरोधानमात्रमिति सूचितम् तथा चाहुःगुणैः षड्भिस्त्वेतैः प्रथमतरमूर्तिस्तव बभौ ततस्तिस्रस्तेषां त्रियुगयुगलैर्हि त्रिभिरभुः। व्यवस्था या चैषा ननु वरद साऽऽविष्कृतिवशात् भवान् सर्वत्रैव त्वगणितमहामङ्गलगुणः।।वरदराजस्तवे16 इति। अवतारेषु हि परमेश्वरत्वं व्यपदिश्यते।ईशन्नपि महायोगी म.भा.5।68।14कृष्ण एव हि लोकानां म.भा.2।38।23व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा वा.रा.6।1।11 इत्यादिभिः। नात्र प्रकृतिशब्देनप्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि 9।8 इत्यादिष्विव त्रिगुणा प्रकृतिरुच्यते अवतारेष्वपि तद्विग्रहस्य त्रिगुणोपादानत्वाभावात्। यथोक्तंन भूतसङ्घसंस्थानो देहोऽस्य परमात्मनः म.भा.न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोस्थिसम्भवा वा.पु.पू.34।40व.पु.14।41। इति। अतोऽत्रावतारोपयुक्तान्या प्रकृतिरुच्यत इत्यभिप्रायेणाह  प्रकृतिः स्वभाव इति।प्रकृतिः पञ्चभूतेषु स्वभावे मूलकारणे इति नैघण्टुकाः। विग्रहस्यापिनित्यालिङ्गा स्वभावसंसिद्धिः र.ब्रा. इत्येकायनश्रुत्यनुसारेण निरुपाधिकस्वासाधारणविशेषणत्वात् स्वभावशब्देनोपादानम्। गोबलीवर्दन्यायाच्चात्र विग्रहाख्यस्वभावविशेषपरता स्वभावपर्यायप्रकृतिशब्देनापृथक्सिद्धिलाभेऽपिस्वां इति निर्देशो जीवसाधारणत्रिगुणप्रकृतिव्यवच्छेदार्थ इत्यभिप्रायेणोक्तं  स्वमेवेति।अन्तरधिकरणभाष्येऽप्येतद्व्याख्यातंस्वमेव स्वभावमास्थाय न संसारिणां स्वभावमित्यर्थः इति। प्रकृतिशब्दस्यात्र विग्रहपरत्वंअधिष्ठाय इत्यनेनसूचितं स्वातन्त्र्यं च दर्शयति  स्वेनैव रूपेणेति। यद्वास्वमेव स्वभावं इत्याद्येकवाक्यं सङ्कलितार्थपरम् तदधिष्ठायेत्येतदन्तं पूर्वार्धस्यार्थःस्वेनैव रूपेण इति तु तृतीयपादस्यस्वेच्छया इति चतुर्थपादस्य। अस्यां योजनायां प्रकृतिशब्दोऽवतारोपादान भूतदिव्यविग्रहमेवाह।अवतारविग्रहोपादानभूतप्रकृतेर्बहुश्रुतिसिद्धतामाह  स्वस्वरूपमिति।स्वरूपं ब्रह्मणोऽपरम् इति प्रयोगात् स्वरूपशब्दोऽत्र विग्रहपरः। आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् इत्यनेनाप्राकृतत्वं स्वासाधारणनिरतिशयदीप्तियुक्तत्वं च सिद्धम्। तत्प्रकरणे च देशविशेषवर्तित्वनित्यसूरिसेव्यत्वलक्ष्मीपतित्वादिकमपि भाव्यम्।क्षयन्तम् इत्यत्र रजश्शब्दो मूलप्रकृतिविषयः न तु लोकविषयःतमसः परस्तात् इत्यनेन तुल्यार्थत्वात्। रजोगुणकत्वाच्च रजश्शब्देनोपादानम्। व्याप्तस्य देशविशेषेक्षयन्तम् इति निवासवचनाद्विग्रहवत्त्वं सिद्धम्। एवं परमपदनिलयनित्यविग्रहसद्भावः श्रुतिद्वयेन दर्शितः। तस्यैव विग्रहस्यावतारदशां दर्शयति  य एष इति।आदित्यवर्णंहिरण्मयः इति च एक एव वर्णः प्रतियोगिभेदाधीनप्रातिकूल्यानुकूल्याभ्यां मुखभेदेन निर्दिश्यते। यथाहुर्द्रमिडाचार्याःहिरण्मय इति रूपसामान्याच्चन्द्रमुखवत् इति। यद्वा हिरण्यविकारत्वव्यवच्छेदार्थं द्रमिडभाष्यम्। तत्रमयूरकण्ठच्छविशुद्धहेम इति शिल्पशास्त्रानुसाराच्छ्यामत्वसिद्धिः। अथवा स्वेच्छया तत्र तत्र रूपभेदेऽपि न दोषः युगादिभेदे पर्यायतः सितरक्तादिविकल्पितवासुदेवादिव्यूहरूपभेदवत्। तस्यैव हृदयान्तर्वर्तित्वे श्रुतिमुदाहरति  तस्मिन्निति।मनोमय इति विशुद्धेन मनसा प्रचुरः ग्राह्य इत्यर्थः। आभ्यां श्रुतिभ्यामुपासनस्थानविशेषस्थितिर्दर्शिता। कारणवाक्येऽपि तस्य सद्भावं दर्शयति  सर्व इति।विद्युत इतिपदं विद्युद्वर्णादित्यन्यत्र व्याख्यातम्। शान्त उपासीत छां.उ.3।14।1 इति पूर्वोक्तमुपासनंस क्रतुं कुर्वीत इत्यनूद्य तच्छेषतया विधीयमानेषु पारमार्थिकेषु गुणेषु विग्रहस्य सहपाठं दर्शयति  भारूप इति। भास्वररूप इत्यर्थः। माहारजनं वासः इत्येषा श्रुतिः शारीरके व्याख्याता  तस्य ह वा एतस्य पुरुषस्य रूपं यथा माहाराजनं वासः बृ.उ.2।3।6 इत्यादिनाऽऽकारविशेषं चाभिधाय इति। सर्वासु चासु श्रुतिषु विलक्षणस्थानविशिष्टत्ववर्णविशेषपुरुषशब्दादिभिः पूर्वोपात्तपुरुषसूक्तवाक्यैकार्थत्वं सिद्धम्। षष्ठीसमासे स्वस्वामित्वलक्षणः सम्बन्धोऽत्र विवक्षित इत्याह  आत्मीययेति।माया वयुनं ज्ञानम् इति निघण्टूपादानम्। स्वेच्छावतरणप्रकरणे स एवार्थ उचित इति भावः। निघण्टुसिद्धमर्थं तन्मूलभूताभियुक्तप्रयोगेण द्रढयति  तथा चेति।मायया वेत्ति इति निर्देशादियं माया निघण्टुसिद्धं ज्ञानमेव परप्रसिद्धमायायास्तत्त्वार्थप्रकाशकत्वाभावादिति भावः। एतेन प्रकृतिशब्दस्यात्र त्रिगुणात्मकप्रकृतिविषयत्वं मायाशब्दस्य मिथ्यार्थपरत्वं चशङ्करोक्तं प्रत्युक्तम्।आत्ममायया इत्यस्य न परमार्थतो लोकवदिति व्यवच्छेदश्चायुक्तः अन्येषामपि जन्मनस्तन्मते मिथ्यात्वाद्यविशेषात्। फलितं वक्तुमाह  आत्मीयेन ज्ञानेनेति। ज्ञानमात्रस्य कथमवतारहेतुत्वम् तथा सति सर्वदावतारप्रसङ्गादित्यत्राह  आत्मसङ्कल्पेनेत्यर्थ इति।श्लोकस्य पिण्डितार्थं विशदयति  अत इति।अपहतपाप्मत्वादीत्यनेन दहरविद्यासुबालोपनिषत्प्रभृतिषु निर्दोषत्वमङ्गलगुणाकरत्वप्रतिपादकानां वाक्यानां स्मारणम्।समस्तकल्याणगुणात्मकत्वमित्यादिनासमस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ स्वशक्तिलेशाद्धृतभूतसर्गः। इच्छागृहीताभिमतोरुदेहः संसाधिताशेषजगद्धितोऽसौ वि.पु.6।5।84 इत्यादि स्मारितम्। ईश्वरस्वभावः सर्वोऽप्युभयलिङ्गत्वेन सङ्गृह्यत इत्यभिप्रायेणोक्तंसर्वमैशं स्वभावमिति। स्वमेव रूपमित्यादिनासमस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वरः। देवतिर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावन्ति स्वलीलया वि.पु.6।7।70 इत्यादि भगवत्पराशरवचनं स्मारितम्। अजत्वश्रुत्या स्मृतिरियं बाध्येतेत्यत्राह  तदिदमाहेति। अजायमानत्वजायमानत्वोक्त्या व्याहतत्वादन्यपरेयं श्रुतिरित्यत्राह  इतरेति।अजायमानः इति सामान्यनिषेधोबहुधा विजायते इति विशेषविधानसन्निधानात्सङ्कुचितविषयः। अतो विरोधे शान्ते तात्पर्यान्तरं न कल्प्यम्। न चेदं बहु स्याम् छां.उ.6।2।3तै.आ.6।2 इतिवज्जगद्रूपेण बहुभवनम् तस्य धीराः परिजानन्ति योनिम् इत्यनन्तरवाक्यैर्मुमुक्षूणामत्यन्तोपकारकावताररहस्यज्ञानस्यैव वक्तुमुचितत्वात् अस्य च तदैकार्थ्यादिति भावः। सत्यमिथ्यात्वाभ्यां विरोधपरिहारशङ्कां प्रतिक्षेप्तुंप्रकृतिं स्वामधिष्ठाय इत्यस्य विग्रहपरत्वे मायाशब्दस्य ज्ञानपरत्वे च हेत्वन्तरमाहबहूनीति।वेद सृजामिदिव्यम् इति शब्दैर्जन्मनो बुद्धिपूर्वत्वेच्छामात्रकृतत्वदिव्यत्वादीनि प्रतीयन्ते। मायादिशब्दस्याविद्यादिपरत्वे तु तदखिलं विरुध्येत। नह्यत्र जन्मशब्दो जन्मप्रतिभासवाची न च प्रध्वस्तपर्यायो व्यतीतशब्दो बाधपरः न च मायागृहीतस्य सर्ववेदित्वम्नापि मिथ्याभूते सृष्टिशब्दः न च त्रिगुणप्रसूतस्य दिव्यत्वमिति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.6।।ज्ञानार्थमेवाह  अजोऽपीति। अहं भूतानामव्ययात्माऽपि सन् विनाशरहितात्मरूपः सन्नपि ईश्वरोऽपि सन् सर्वकरणसमर्थोऽपि सन् स्वां प्रकृतिं त्रिगुणात्मिकामधिष्ठाय अजजीवरूपेण सम्भवामि आत्ममायया अन्तरङ्गया अजीवरूपेण अव्ययात्मा लीलायोग्यदेहेन सम्भवामि। अत्रायं भावः  यत्र धर्मरक्षार्थमाविर्भवामि तत्सामयिकजीवेषु कर्मयोगादिजीवेषु लीलार्थप्रकटीकृतस्वरूपेण रसात्मकभक्तिमेव कथयामि।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.6।।किं तर्हि योगिनां सर्वज्ञत्वप्रसिद्धेस्त्वं जातिस्मरो जीवोऽसीत्याशङ्क्याह  अज इति। देहान्निष्कृष्टस्याजत्वाव्ययत्वेनत्वेवाहं जातु नासं इत्यत्र साधिते इह तु देहविशिष्टस्यैव ते उच्येते। ईश्वरोऽपीत्यनेन देहान्निष्कृष्टस्यास्मदादेरपीश्वरत्वंतत्त्वमसिअहं ब्रह्मास्मि इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धमतो देहविशिष्टस्यैवाजत्वनित्यत्वे दृढीक्रियेतेऽन्यथानीश्वरत्वप्रसङ्गात्। नह्यादित्यान्तर्यामिणः परमेश्वरस्य हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्टो देहो जन्मव्ययवानिति वक्तुं शक्यम्। अकर्मजत्वात्। कर्मफलस्य हि परा काष्ठा हैरण्यगर्भशरीरप्राप्तिः। न चपुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत अत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानि अहमेवेदं सर्वं स्यामिति स एतं पुरुषमेधं पञ्चरात्रं यज्ञक्रतुमपश्यत् इत्यादिना शतपथे नारायणाख्यस्य परमात्मनःसहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् इतिपादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इति च पुरुषसूक्तप्रतिपाद्यस्य सर्वाणि भूतान्यतिक्रम्य स्थितस्येश्रस्यापि शरीरं पञ्चरात्राख्यकर्मविशेषफलमिति श्रूयत इति वाच्यम्। तत्र नारायणशब्देन हिरण्यगर्भस्यैव विवक्षितत्वात्। नहि परमेश्वरस्य पूर्णकामस्य सर्वानतिक्रम्य स्थितस्य पुनरत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानीति कामना भवति। ननु परमेश्वरेऽपि कामना दृष्टासोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति इतिचेच्छ्लाघनीयप्रज्ञो देवानांप्रियः यतआप्तकामस्य का स्पृहा इति श्रुतेःलोकवत्तु लीलाकैवल्यम् इति न्यायाच्च निस्पृहस्य लीलयैव ब्रह्माण्डकोटीः सृजतो भगवतो राजगोपालस्य कर्मकिंकरेण कर्मणा सार्वात्म्यं प्रार्थयता साम्यमापादयति। तस्मान्न कर्मफलं भगवतः शरीरम्। अतएव न भौतिकम्। विराट्सूत्रात्मातिरिक्तस्य भौतिकस्याभावात्। तस्माद्युक्तमजोऽपि सन्निति। ननु तर्हि भगवच्छरीरस्य किमुपादानम्। अविद्येतिचेन्न। परमेश्वरे तदभावात्। जीवाविद्याचेन्न। शुक्तिरजतादेरिव तुच्छत्वापत्तेः। चिन्मात्रं चेन्न। चितः साकारत्वायोगात्। तथात्वे वा तस्यातीन्द्रियत्वापत्तिः। तस्मात्किमालम्बो भगवद्देहो देवकीगर्भप्रववेशजननबाल्यकौमारपौगण्डयौवनादिप्रतीतिविषय इति चेच्छृणु। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममाययेति। अयमर्थः  जीवात्मनो ह्यनात्मभूतां प्रकृतिं तेजोबन्नात्मिकां पञ्चभूतात्मिकां वाधिष्ठायसंभवन्ति जन्मादींल्लभन्ते अहं तु स्वां प्रत्यगनन्यां प्रकृतिं प्रत्यक्चैतन्यमेवेत्यर्थः। तदेवाधिष्ठाय नतूपादानान्तरम्। आत्ममायया स्वीयमायया संभवामि। यथा कश्चिन्मायावी स्वयं स्वस्थानादप्रच्युतस्वभावोऽप्यदृश्यो भूत्वा स्थूलसूक्ष्मभूतान्यनुपादायैव केवलया मायया द्वितीयं मायाविनं स्वसदृशमेव सूत्रमार्गेण गगनमारोहन्तं सृजति एवमहं कूटस्थचिन्मात्रोऽग्राह्यः स्वमायया चिन्मयमात्मनः शरीरं सृजामि तस्य बाल्याद्यवस्थाश्च सूत्रारोहणवद्दर्शयामि। एतावांस्तु विशेषः  लौकिकमायावी मायामुपसंहरन् द्वितीयं मायाविनमप्युपसंहरति अहं तु तामनुपसंहरन् स्वविग्रहमपि नोपसंहरामीति। एवं हि सति हिरण्यश्मश्रुत्वादिलक्षणविग्रहयोगिनश्चैतन्यस्यअन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इत्यादिन्यायसिद्धं वियदाद्युपादानत्वलक्षणं सर्वेश्वरत्वं युज्यते नान्यथेति। तस्मात्सिद्धं परमेश्वरस्य मायामयं शरीरं नित्यमिति एकेनैव देहेन विवस्वन्तमुपदिश्य त्वामप्युपदिशामीति। अन्यत्रापिनित्यैव सा जगन्मूर्तिः इति सावधारणं प्रतिज्ञायतेदेवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा। उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते इति। नित्याया अप्याविर्भावापेक्षया सूर्यस्येव बाल्यादिकमुत्पत्त्याद्युपगम्यते। भाष्ये तु स्वां प्रकृतिं वैष्णवीं त्रिगुणात्मिकां मायामधिष्ठाय वशीकृत्य आत्ममायया संभवामि देहवान् जात इवात्मनो मायया न परमार्थतो लोकवदिति व्याख्यातम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Although I am unborn and My transcendental body never deteriorates, and although I am the Lord of all living entities, I still appear in every millennium in My original transcendental form.",
        "ec": " The Lord has spoken about the peculiarity of His birth: although He may appear like an ordinary person, He remembers everything of His many, many past “births,” whereas a common man cannot remember what he has done even a few hours before. If someone is asked what he did exactly at the same time one day earlier, it would be very difficult for a common man to answer immediately. He would surely have to dredge his memory to recall what he was doing exactly at the same time one day before. And yet, men often dare claim to be God, or Kṛṣṇa. One should not be misled by such meaningless claims. Then again, the Lord explains His prakṛti, or His form. Prakṛti means “nature,” as well as svarūpa, or “one’s own form.” The Lord says that He appears in His own body. He does not change His body, as the common living entity changes from one body to another. The conditioned soul may have one kind of body in the present birth, but he has a different body in the next birth. In the material world, the living entity has no fixed body but transmigrates from one body to another. The Lord, however, does not do so. Whenever He appears, He does so in the same original body, by His internal potency. In other words, Kṛṣṇa appears in this material world in His original eternal form, with two hands, holding a flute. He appears exactly in His eternal body, uncontaminated by this material world. Although He appears in the same transcendental body and is Lord of the universe, it still appears that He takes His birth like an ordinary living entity. And although His body does not deteriorate like a material body, it still appears that Lord Kṛṣṇa grows from childhood to boyhood and from boyhood to youth. But astonishingly enough He never ages beyond youth. At the time of the Battle of Kurukṣetra, He had many grandchildren at home; or, in other words, He had sufficiently aged by material calculations. Still He looked just like a young man twenty or twenty-five years old. We never see a picture of Kṛṣṇa in old age because He never grows old like us, although He is the oldest person in the whole creation – past, present and future. Neither His body nor His intelligence ever deteriorates or changes. Therefore, it is clear that in spite of His being in the material world, He is the same unborn, eternal form of bliss and knowledge, changeless in His transcendental body and intelligence. Factually, His appearance and disappearance are like the sun’s rising, moving before us and then disappearing from our eyesight. When the sun is out of sight, we think that the sun has set, and when the sun is before our eyes, we think that the sun is on the horizon. Actually, the sun is always in its fixed position, but owing to our defective, insufficient senses, we calculate the appearance and disappearance of the sun in the sky. And because Lord Kṛṣṇa’s appearance and disappearance are completely different from that of any ordinary, common living entity, it is evident that He is eternal, blissful knowledge by His internal potency – and He is never contaminated by material nature. The Vedas also confirm that the Supreme Personality of Godhead is unborn yet He still appears to take His birth in multimanifestations. The Vedic supplementary literatures also confirm that even though the Lord appears to be taking His birth, He is still without change of body. In the Bhāgavatam , He appears before His mother as Nārāyaṇa, with four hands and the decorations of the six kinds of full opulences. His appearance in His original eternal form is His causeless mercy, bestowed upon the living entities so that they can concentrate on the Supreme Lord as He is, and not on mental concoctions or imaginations, which the impersonalist wrongly thinks the Lord’s forms to be. The word māyā, or ātma-māyā, refers to the Lord’s causeless mercy, according to the Viśva-kośa dictionary. The Lord is conscious of all of His previous appearances and disappearances, but a common living entity forgets everything about his past body as soon as he gets another body. He is the Lord of all living entities because He performs wonderful and superhuman activities while He is on this earth. Therefore, the Lord is always the same Absolute Truth and is without differentiation between His form and self, or between His quality and body. A question may now be raised as to why the Lord appears and disappears in this world. This is explained in the next verse."
    }
}
