{
    "_id": "BG4.5",
    "chapter": 4,
    "verse": 5,
    "slok": "श्रीभगवानुवाच |\nबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन |\nतान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||४-५||",
    "transliteration": "śrībhagavānuvāca .\nbahūni me vyatītāni janmāni tava cārjuna .\ntānyahaṃ veda sarvāṇi na tvaṃ vettha parantapa ||4-5||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.5।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं, (परन्तु) हे परन्तप ! उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.5 The Blessed Lord said  Many births of Mine have passed as well as of thine, O Arjuna; I know them all but thou knowest not, O Parantapa (scorcher of foes).",
        "ec": "4.5 बहूनि may? मे My? व्यतीतानि have passed away? जन्मानि births? तव thy? च and? अर्जुन O Arjuna? तानि them? अहम् I? वेद know? सर्वाणि all? न not? त्वम् thou? वेत्थ knowest? परन्तप O Parantapa.Commentary You have no intuitional knowledge. The eye of wisdom has not been opened in you on account of your past actions. So your power of vision is limited and therefore you do not know your previous births. But I know them because I am omniscient."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.5 Lord Shri Krishna replied: I have been born again and again, from time to time; thou too,O Arjuna! My births are known to Me, but thou knowest not thine."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.5।। हिन्दू शास्त्रों के आचार्य सदैव शिष्यों के मन में उठने वाली सभी संभाव्य शंकाओं का निरसन करने को तत्पर रहते हैं। हम उनमें असीम घैर्य और शिष्यों की कठिनाइयों को समझने की क्षमता के साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने का प्रयत्न करते हैं कि किस प्रकार वे अनन्त स्वरूप हैं और सृष्टि के प्रारम्भ में कैसे उन्होंने सूर्य देवता को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।पुराणों में वर्णित अवतार का सिद्धान्त इस प्रकरण में विस्तारपूर्वक बताया गया है। अनेक विदेशियों को हिन्दू दर्शन का यह प्रकरण और हिन्दुओं का अवतारवाद में विश्वास अत्यन्त भ्रामक प्रतीत हो सकता है। अनेक विद्वानों ने इस प्रकार के मत प्रगट भी किये हैं परन्तु मैक्समूलर के समान संभवत किसी ने इतनी तीब्र आलोचना नहीं की होगी। अवतार के विषय में वे कहते हैं यह आध्यात्मिक बकवास है।परन्तु यदि हम सृष्टिसम्बन्धी वेदान्त के सिद्धान्त को जानते हुये इस पर विचार करें तो अवतारवाद को समझना कठिन नहीं होगा। एक अन्य स्थान पर मनुष्य के पतन के प्रकरण में यह विस्तार पूर्वक बताया गया है कि सत्वगुणप्रधान उपाधि के माध्यम से व्यक्त होकर अनन्तस्वरूप परमार्थ सत्य ब्रह्म सर्वशक्तिमान् ईश्वर के रूप में प्रकट होता है। इसी अध्याय में आगे श्रीकृष्ण बतायेंगे कि किस प्रकार वे स्वेच्छा और पूर्ण स्वातन्त्र्य से उपाधियों को धारण करके मनुष्यों के मध्य रहते हुए कार्य करते हैं जो उनकी दृष्टि से लीलामात्र है। उन्हें कभी भी अपने दिव्य स्वरूप का विस्मरण नहीं होता।किसी एक भी प्राणी का जन्म केवल संयोग ही नहीं है। डार्विन के विकास के सिद्धान्त के अनुसार भी प्रत्येक व्यक्ति जगत में विकास की सीढी पर उन्नति करने के फलस्वरूप आया है। प्रत्येक देहधारी का जीवन उस जीव के दीर्घ आत्मचरित्र को दर्शाता है। असंख्य और विभिन्न प्रकार के शरीरों में वास करने के पश्चात् ही जीव वर्तमान विकसित स्थिति को प्राप्त करता हुआ है। प्रत्येक नवीन देह में जीव को पूर्व जन्मों का विस्मरण हो जाता है किन्तु वह पूर्व जन्मों में अर्जित वासनाओं से युक्त रहता है। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति एक जीव के समान नहीं समझनी चाहिये। वे अपनी सर्वज्ञता के कारण अर्जुन के और स्वयं के अतीत को जानते हैं अत उन्होंन्ो कहा मैं उन सबको जानता हूँ और तुम नहीं जानते।आपके लिये धर्मअधर्म के अभाव में जन्म की क्या आवश्यकता है आपका जन्म कैसे सम्भव है इसका उत्तर है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.5. The Bhagavat said  O Arjuna,  many births of Mine,  as well as of yours have passed.  All of them I do know,  but you do not,  O scorcher of foes !"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.5 The Lord said  Many births of Mine have passed, O Arjuna, and so is it with you also. I know them all, but you do not know them."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.5 The Blessed Lord said  O Arjuna, many lives of Mine have passed, and so have yours. I know them all, (but) you know not, O scorcher of enemies!"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.5।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.5।।भगवत्यज्ञानान्मनुष्यत्वशङ्कां वारयितुं प्रतिवचनमवतारयति  या वासुदेव इति। अन्यथाप्रश्ने कथमाशङ्कान्तरं परिहर्तुं भगवद्वचनमित्याशङ्क्य प्रश्नप्रतिवचनयोरेकार्थत्वमाह  यदर्थो हीति। यस्य शङ्कितस्य विरोधस्य परिहारार्थो यस्य प्रश्नस्तमेव परिहारं वक्तुं भगवद्वचनमित्यर्थः। अतीतानेकजन्मवत्त्वं ममैव नासाधारणं किंतु सर्वप्राणिसाधारणमित्याह  तव चेति। तानि प्रमाणाभावान्न प्रतिभान्तीत्याशङ्क्याह  तानीति। ईश्वरस्यानावृतज्ञानत्वादित्यर्थः। किमिति तर्हि तानि मम न प्रतीयन्ते तवावृतज्ञानत्वादित्याह   न त्वमिति। परान्परिकल्प्य तत्परिभवार्थं प्रवृत्तत्वात्तव ज्ञानावरणं विज्ञेयमित्याह  परंतपेति। अर्जुनस्य भगवता सहातीतानेकजन्मवत्त्वे तुल्येऽपि ज्ञानवैषम्ये हेतुमाह  धर्मेति। आदिशब्देन रागलोभादयो गृह्यन्ते। ईश्वरस्यातीतानागतवर्तमानसर्वार्थविषयज्ञानवत्त्वे हेतुमाह  अहमिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.5।। श्रीभगवान् बोले -- हे परन्तप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, पर तू नहीं जानता।",
        "hc": "4.5।। व्याख्या--[तीसरे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको अपना भक्त और प्रिय सखा कहा था, इसलिये पीछेके श्लोकमें अर्जुन अपने हृदयकी बात निःसंकोच होकर पूछते हैं। अर्जुनमें भगवान्के जन्म-रहस्यको जाननेकी प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, इसलिये भगवान् उनके सामने मित्रताके नाते अपने जन्मका रहस्य प्रकट कर देते हैं। यह नियम है कि श्रोताकी प्रबल जिज्ञासा होनेपर वक्ता अपनेको छिपाकर नहीं रख सकता। इसलिये सन्त-महात्मा भी अपनेमें विशेष श्रद्धा रखनेवालोंके सामने अपने-आपको प्रकट कर सकते हैं--] (टिप्पणी प0 215) गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं।\nआरत अधिकारी जहँ पावहिं।।                          (मानस 1। 110। 1)'बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन'--समय-समयपर मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। परन्तु मेरा जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आगे छठे श्लोकमें करेंगे) और तेरा (जीवका) जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके उन्नीसवें और तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें एवं छब्बीसवें श्लोकमें करेंगे)। तात्पर्य यह कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म होनेपर भी वे अलग-अलग प्रकारके हैं।दूसरे अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं (भगवान्) और तू तथा ये राजालोग (जीव) पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे--ऐसा नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् और उनका अंश जीवात्मा--दोनों ही अनादि और नित्य हैं।\n\n'तान्यहं वेद सर्वाणि'--संसारमें ऐसे 'जातिस्मर' जीव भी होते हैं, जिनको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान होता है। ऐसे महापुरुष 'युञ्जान योगी' कहलाते हैं, जो साधना करके सिद्ध होते हैं। साधनामें अभ्यास करते-करते इनकी वृत्ति इतनी तेज हो जाती है कि ये जहाँ वृत्ति लगाते हैं, वहींका ज्ञान इनको हो जाता है। ऐसे योगी कुछ सीमातक ही अपने पुराने जन्मोंको जान सकते हैं, सम्पूर्ण जन्मोंको नहीं। इसके विपरीत भगवान् 'युक्तयोगी' कहलाते हैं, जो साधना किये बिना स्वतःसिद्ध, नित्य योगी हैं। जन्मोंको जाननेके लिये उन्हें वृत्ति नहीं लगानी पड़ती, प्रत्युत उनमें अपने और जीवोंके भी सम्पूर्ण जन्मोंका स्वतः-स्वाभाविक ज्ञान सदा बना रहता है। उनके ज्ञानमें भूत, भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है, प्रत्युत उनके अखण्ड ज्ञानमें सभी कुछ सदा वर्तमान ही रहता है (गीता 7। 26)। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु ,व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें पूर्णरूपसे विद्यमान रहते हुए भी इनसे सर्वथा अतीत रहते हैं।[मैं उन सबको जानता हूँ-- भगवान्के इस वचनसे साधकोंको एक विशेष आनन्द आना चाहिये कि हम भगवान्की जानकारीमें हैं, भगवान् हमें निरन्तर देख रहे हैं! हम कैसे ही क्यों न हों, पर हैं भगवान्के ज्ञानमें।]'न त्वं वेत्थ परंतप'--जन्मोंको न जाननेमें मूल हेतु है-- अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण, महत्त्व होना। इसीके कारण मनुष्यका ज्ञान विकसित नहीं होता। अर्जुनके अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका, व्यक्तियोंका महत्त्व था, इसीलिये वे कुटुम्बियोंके मरनेके भयसे युद्ध नहीं करना चाहते थे। पहले अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये कुटुम्बी प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं--इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन राज्य, भोग और सुख चाहते थे। अतः नाशवान् पदार्थोंकी कामना होनेके कारण वे अपने पूर्वजन्मोंको नहीं जानते थे।ममता-आसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना 'परिग्रह' कहलाताहै। परिग्रहका सर्वथा त्याग करना अर्थात् अपना सुख, आराम आदिके लिये किसी भी वस्तुका संग्रह न करना 'अपरिग्रह' कहलाता है। अपरिग्रहकी दृढ़ता होनेपर पूर्वजन्मोंका ज्ञान हो जाता है-- 'अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः।'(पातञ्जलयोगदर्शन 2। 39)संसार (क्रिया और पदार्थ) सदैव परिवर्तनशील और असत् है; अतः उसमें अभाव (कमी) होना निश्चित है। अभावरूप संसारसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण मनुष्यको अपनेमें भी अभाव दीखने लग जाता है। अभाव दीखनेके कारण उसमें यह कामना पैदा हो जाती है कि अभावकी तो पूर्ति हो जाय, फिर नया और मिले। इस कामनाकी पूर्तिमें ही वह दिन-रात लगा रहता है। परन्तु कामनाकी पूर्ति होनेवाली है नहीं। कामनाओँके कारण मनुष्य बेहोश-सा हो जाता है। अतः ऐसे मनुष्यको अनेक जन्मोंका ज्ञान तो दूर रहा, वर्तमान कर्तव्यका भी ज्ञान (क्या कर रहा हूँ और क्या करना चाहिये) नहीं होता।\n सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हो चुके हैं। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपने जन्म-(अवतार-) की विलक्षणता बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.5।।श्रीभगवानुवाच  अनेन जन्मनः सत्यत्वम् उक्तम्बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि इति वचनात् तव च इति दृष्टान्ततया उपादानाच्च।आत्मनः अवतारप्रकारं देहयाथात्म्यं जन्महेतुं च आह",
        "et": "4.5 The Lord said  By this, the reality of the Lord's birth is declared in the sentence, 'Many births of Mine have passed.' 'So is it with you' is added by way of illustration.\n\nThe mode of incarnation, the reality of His body and the cause of His birth are explained in the following verse."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.5  4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्।  श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति।  आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः।  अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः।  कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्।  यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।",
        "et": "4.5 See Comment under 4.9"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.5।।भगवान् श्रीवासुदेवके विषयमें मूर्खोंकी जो ऐसी शङ्का है कि ये ईश्वर नहीं हैं सर्वज्ञ नहीं हैं तथा जिस शङ्काको दूर करनेके लिये ही अर्जुनका यह प्रश्न है उसका निवारण करते हुए श्रीभगवान् बोले  हे अर्जुन  मेरे और तेरे पहले बहुत जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ तू नहीं जानता क्योंकि पुण्यपाप आदिके संस्कारोंसे तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है। परंतु मैं तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाववाला हूँ इस कारण मेरी ज्ञानशक्ति आवरणरहित है इसलिये हे परन्तप  मैं ( सब कुछ ) जानता हूँ।",
        "sc": "।।4.5।। बहूनि मे मम व्यतीतानि अतिक्रान्तानि जन्मानि तव च हे अर्जुन। तानि अहं वेद जाने सर्वाणि न त्वं वेत्थ न जानीषे धर्माधर्मादिप्रतिबद्धज्ञानशक्तित्वात्। अहं पुनः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वात् अनावरणज्ञानशक्तिरिति वेद अहं हे परंतप।।कथं तर्हि तव नित्येश्वरस्य धर्माधर्माभावेऽपि जन्म इति उच्यते",
        "et": "4.5 O Arjuna, bahuni, many; janmani, lives; me, of Mine; vyatitani, have passed; tava ca, and so have yours. Aham, I; veda know; tani, them; sarvani, all; (but) tvam, you; va vetta, know not, due to your power of understanding being obstructed by righteousness, unrighteousness, etc. However, parantapa, O scorcher of foes; aham, I know, possessing as I do unobstructed power of knowledge, because by nature I am enternal, pure, enlightened and free.\n'In that case, how, in spite of the absence of righteousness and unrighteousness, can there be any birth for You who are the eternal God?'\nThat is beng answered:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.5।।अत एव ज्ञाताशयो भगवान्तव च न त्वं वेत्सि इति परिहरति। अन्यथाऽनुपयुक्तं तन्न वक्तव्यमेव।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.5।।रूपान्तरेणोपदिष्टवानित्यवतारस्वरूपतः संशयं परिहरन् श्रीभगवानुवाच  बहूनीति। मे जन्मान्यवतारा बहवो व्यतीताः। अनेनावताराणां हेतुभूतमात्मानमवतारिणं सर्वदा सर्वांशपरिपूर्णमुपदिशति। तान्यहं जानामि न तु त्वं इति नित्यसिद्धज्ञानादिशक्तिमत्त्वं स्वस्योपदिष्टम्।तव च जन्मानि इति नराद्यवताराभिप्रायेणोक्तम्। दृष्टान्तवद्वेति केचित्। अनेन सर्वज्ञासर्वज्ञत्वाभ्यां जीवेश्वरयोरेवं भेदतः स्वरूपं ब्रह्मवाद इति दर्शितम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.5।।तत्र सर्वज्ञत्वेन प्रथमस्य परिहारं कथयति श्रीभगवान्  जन्मानि लीलादेहग्रहणानि लोकदृष्ट्यभिप्रायेणादित्यस्योदयवन्मे मम बहूनि व्यतीतानि। तव चाज्ञानिनः कर्मार्जितानि देहग्रहणानि। तवचेत्युपलक्षणमितरेषामपि जीवानां जीवैक्याभिप्रायेण वा। हे अर्जुन श्लेषेण अर्जुनवृक्षनाम्रा संबोधयन्नावृतज्ञानत्वं सूचयति। तानि जन्मान्यहं सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो वेद जानामि। सर्वाणि मदीयानि त्वदीयान्यन्यदीयानि च। न त्वमज्ञो जीवस्तिरोभूतज्ञानक्तिर्वेत्थ न जानासि स्वीयान्यपि किं पुनः परकीयाणि। हे परंतप परं शत्रुं भेददृष्ट्या परिकल्प्य हन्तुं प्रवृत्तोऽसीति विपरीतदर्शित्वाद्भ्रान्तोऽसीति सूचयति। तदनेन संबोधनद्वयेनावरणविक्षेपौ द्वावप्यज्ञानधर्मौ दर्शितौ।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.5।।इति पृष्टवन्तमर्जुनं रूपान्तरेणोपदिष्टवानित्यभिप्रायेणोत्तरं श्रीभगवानुवाच  बहूनीति। मम बहूनि जन्मानि तव च व्यतीतानि। तानि सर्वाण्यहं वेद जानामि अलुप्तविद्याशक्तित्वात्। त्वं तु न जानासि अविद्यावृतत्वात्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.5।।मूर्खाणां शङ्कां परिहरन् श्रीभगवानुवाच। बहूनि मे तवान्यस्य च जन्मानि व्यतीतानि तानि सर्वाण्यहं शुद्धबुद्धक्तस्वभावत्वादनावरणज्ञानशक्तिर्वेद जानामि। त्वं तु न वेत्थ। धर्माधर्मादिप्रतिबद्धज्ञानशक्तित्वान्न  जानासि। इत्येतत्सूचनार्थमेव संबोधनद्वयम्। हे अर्जुन शुद्धधर्मवत्त्वाच्छुद्ध हे परंतप परमात्मानमन्यान्वा अधर्मेण तापयतीति तथेति विवक्षणात्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।4.5।।एषूत्तरं क्रमाद्भगवानुवाचबहूनीत्यादिभिः। नहि पूर्वजन्मनामेकत्वबहुत्वे पृष्टे न च तज्ज्ञानाज्ञाने इति शङ्कायामाह  अनेनेति। कथं जन्मनः सत्यत्वमुक्तं बहुत्वातीतत्वतज्ज्ञानादि हि वाचनिकतया प्रतीयत इत्यत्राह  बहूनीति।अयमभिप्रायः  इदानीन्तनस्त्वं तदानीन्तनाय कथमुक्तवान् इति प्रश्ने जन्मान्तरेणाहमुक्तवान् तच्चेदानीमनुसन्धाय वदामीति साक्षादुत्तरमुच्येत तस्य च प्रश्नस्यान्यपरत्वस्य पूर्वं सहेतुकमुक्तत्वादवश्यं प्रष्टव्येष्वर्थेषु यत्परत्वमत्र व्याकर्तुं शक्यं तत्पराण्येव बहूनीत्यादिविशेषणानि सत्यत्वे हि बहुत्वातीतत्वादीनि स्वरसानि जन्मानीति चोक्तम् न जन्मप्रतिभासा इतितव च इत्यपृष्टस्यार्थस्य उपादानमप्येतत्सत्यत्वदृष्टान्ताभिप्रायमन्तरेण न घटते न चार्जुनस्य जन्म मिथ्या तस्य वा तथात्वप्रतिभासः तत्सम्भवे वा कृष्णजन्मनि कुतोऽस्य संशयः इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.5।।अत्रोत्तरमाह भगवान्  बहूनीति। मे जन्मानि बहूनि सन्ति। कीदृशानि अव्यतीतानि नित्यानीत्यर्थः। हे अर्जुन तव च जन्मानि बहूनि व्यतीतानि तानि सर्वाणि तव जन्मान्यहं वेद जानामि यतो यदर्थं यत्र यत्रोत्पादितोऽसि। हे परन्तप उत्कृष्टतपोबलयुक्त तानि मदीयानि त्वं न वेत्थ न जानासि। परन्तपेति सम्बोधनेन तपोबलेन न भगवान् ज्ञायते किन्तु तत्कृपयैवेति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.5।।स्वदेहस्याजत्वं साधयितुं स्वस्य सर्वज्ञत्वं तावदाह  बहूनीति। स्पष्टार्थः श्लोकः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The Personality of Godhead said: Many, many births both you and I have passed. I can remember all of them, but you cannot, O subduer of the enemy!",
        "ec": " In the Brahma-saṁhitā (5.33) we have information of many, many incarnations of the Lord. It is stated there: advaitam acyutam anādim ananta-rūpam ādyaṁ purāṇa-puruṣaṁ nava-yauvanaṁ ca vedeṣu durlabham adurlabham ātma-bhaktau govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi “I worship the Supreme Personality of Godhead, Govinda [Kṛṣṇa], who is the original person – absolute, infallible, without beginning. Although expanded into unlimited forms, He is still the same original, the oldest, and the person always appearing as a fresh youth. Such eternal, blissful, all-knowing forms of the Lord are usually not understood by even the best Vedic scholars, but they are always manifest to pure, unalloyed devotees.” It is also stated in Brahma-saṁhitā (5.39): rāmādi-mūrtiṣu kalā-niyamena tiṣṭhan nānāvatāram akarod bhuvaneṣu kintu kṛṣṇaḥ svayaṁ samabhavat paramaḥ pumān yo govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi “I worship the Supreme Personality of Godhead, Govinda [Kṛṣṇa], who is always situated in various incarnations such as Rāma, Nṛsiṁha and many subincarnations as well, but who is the original Personality of Godhead known as Kṛṣṇa, and who incarnates personally also.” In the Vedas also it is said that the Lord, although one without a second, manifests Himself in innumerable forms. He is like the vaidūrya stone, which changes color yet still remains one. All those multiforms are understood by the pure, unalloyed devotees, but not by a simple study of the Vedas ( vedeṣu durlabham adurlabham ātma-bhaktau ). Devotees like Arjuna are constant companions of the Lord, and whenever the Lord incarnates, the associate devotees also incarnate in order to serve the Lord in different capacities. Arjuna is one of these devotees, and in this verse it is understood that some millions of years ago when Lord Kṛṣṇa spoke the Bhagavad-gītā to the sun-god Vivasvān, Arjuna, in a different capacity, was also present. But the difference between the Lord and Arjuna is that the Lord remembered the incident whereas Arjuna could not remember. That is the difference between the part-and-parcel living entity and the Supreme Lord. Although Arjuna is addressed herein as the mighty hero who could subdue the enemies, he is unable to recall what had happened in his various past births. Therefore, a living entity, however great he may be in the material estimation, can never equal the Supreme Lord. Anyone who is a constant companion of the Lord is certainly a liberated person, but he cannot be equal to the Lord. The Lord is described in the Brahma-saṁhitā as infallible ( acyuta ), which means that He never forgets Himself, even though He is in material contact. Therefore, the Lord and the living entity can never be equal in all respects, even if the living entity is as liberated as Arjuna. Although Arjuna is a devotee of the Lord, he sometimes forgets the nature of the Lord, but by the divine grace a devotee can at once understand the infallible condition of the Lord, whereas a nondevotee or a demon cannot understand this transcendental nature. Consequently these descriptions in the Gītā cannot be understood by demonic brains. Kṛṣṇa remembered acts which were performed by Him millions of years before, but Arjuna could not, despite the fact that both Kṛṣṇa and Arjuna are eternal in nature. We may also note herein that a living entity forgets everything due to his change of body, but the Lord remembers because He does not change His sac-cid-ānanda body. He is advaita, which means there is no distinction between His body and Himself. Everything in relation to Him is spirit – whereas the conditioned soul is different from his material body. And because the Lord’s body and self are identical, His position is always different from that of the ordinary living entity, even when He descends to the material platform. The demons cannot adjust themselves to this transcendental nature of the Lord, which the Lord Himself explains in the following verse."
    }
}
