{
    "_id": "BG4.3",
    "chapter": 4,
    "verse": 3,
    "slok": "स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः |\nभक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||४-३||",
    "transliteration": "sa evāyaṃ mayā te.adya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ .\nbhakto.asi me sakhā ceti rahasyaṃ hyetaduttamam ||4-3||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.3।। वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.3 That same ancient Yoga has been today taught to thee by Me, for thou art My devotee and My friend; it is the supreme secret.",
        "ec": "4.3 सः that? एव even? अयम् this? मया by Me? ते to thee? अद्य today? योगः Yoga? प्रोक्तः has been taught? पुरातनः ancient? भक्तः devotee? असि thou art? मे My? सखा friend? च and? इति thus? रहस्यम् secret? हि for? एतत् this? उत्तमम् best.Commentary This Yoga contains profound and subtle teachings. Hence it is the supreme secret which is revealed by the Lord."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.3 It is the same ancient Path that I have now revealed to thee, since thou are My devotee and My friend. It is the supreme Secret."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.3।। यहाँ भगवान् अब तक के उपदिष्ट ज्ञान के प्राचीनता की घोषणा करके रूढ़िवादी विचारकों की शंका का निर्मूलन कर देते हैं।शिष्य के प्रति स्नेह भाव होने पर ही कोई गुरु उत्साह और कुशलता पूर्वक उपदेश दे सकता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच ऐसा ही सम्बन्ध था और भगवान् को यह विश्वास था कि उनके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का वह अनुसरण करेगा। गुरु और शिष्य के बीच इस प्रकार की व्यापारिक व्यवस्था न हो कि तुम शुल्क दो और मैं पढ़ाऊँगा। प्रेम और स्वातन्त्र्य मित्रता और आपसी समझ के वातावरण में ही मन और बुद्धि विकसित होकर खिल उठते हैं। आत्मानुभव का ज्ञान प्रदान करने के लिए आवश्यक गुणों को अर्जुन में देखकर ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने इस योग का ज्ञान उसे दिया।यहाँ इस ज्ञान को रहस्य कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो फिर भी अनुभवी पुरुष के उपदेश के बिना वह आत्मा के अस्तित्व का कभी आभास भी नहीं पा सकता। समस्त बुद्धि वृत्तियों को प्रकाशित करने वाली आत्मा स्वयं बुद्धि के परे होती है। इसलिये मनुष्य की विवेक सार्मथ्य कभी भी नित्य अविकारी आत्मा को विषय रूप में नहीं जान सकती। यही कारण है कि सत्य के विज्ञान को यहाँ उत्तम रहस्य कहा गया है।किसी के मन में यह शंका न रह जाये कि भगवान् के वाक्यों में परस्पर विरोध है इसलिये अर्जुन मानो आक्षेप करता हुआ प्रश्न पूछता है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.3. The self-same ancient Yoga has been taught now by Me to you on the ground that you are My devotee and friend too.  This is the highest secret."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.3 It is the same ancient Yoga which is now taught to you by Me, as you are My devotee and My friend. For, this is a supreme mystery."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.3 That ancient Yoga itself, which is this, has been taught to you by Me today, considering that you are My devotee and friend, For, this (Yoga) is a profound secret."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह  इममिति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.3।।किमिति वर्तमाने काले प्रकृतो योगः संप्रदायरहितोऽभूदित्याशङ्क्याधिकार्यभावादित्याह  दुर्बलानिति। तदेव दौर्बल्यं प्रकृतोपयोगित्वेन व्याकरोति  अजितेन्द्रियानिति। यद्यपि कामक्रोधादिप्रधानान्पुरुषान्प्रतिलभ्य कामक्रोधादिभिरभिभूयमानो योगो नष्टो विच्छिन्नसंप्रदायः संजातस्तथापि योगादृते पुरुषार्थो लोकस्य लभ्यते चेत् किमनेन योगोपदेशेनेत्याशङ्क्य यथोक्तयोगाभावे परमपुरुषार्थाप्राप्तेर्मैवमित्याह  लोकं चेति। पूर्वो योगो विच्छिन्नसंप्रदायोऽधुना त्वन्यो योगो मदर्थमुच्यतेभगवतेत्याशङ्क्याह  स एवेति। कस्मादन्यस्मै यस्मै कस्मैचित्पुरातनो योगो नोक्तो भगवतेत्याशङ्क्याह  भक्तोऽसीति। उक्तमधिकारिणं प्रति योगस्य वक्तव्यत्वे हेतुमाह  रहस्यं हीति। अनादिवेदमूलत्वाद्योगस्य पुरातनत्वम्। भक्तिः शरणबुद्ध्या प्रीतिस्तया युक्तो निजरूपमवेक्ष्य भक्तो विवक्षितः। समानवयाः स्निग्धः सहायः सखेत्युच्यते। एतदिति कथं योगो विशेष्यते तत्राह  ज्ञानमिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.3।। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।",
        "hc": "4.3।। व्याख्या-- 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता 11। 41 42), पर भक्त अभी (गीता 2। 7 में) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए, तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए, मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपनेआपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं।\n\nअर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया (टिप्पणी प0 211)।साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं), पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है, पर वैभवको चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है; परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते, अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव-(नारायणी सेना-) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया, तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म, द्रोण, युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गया!'स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः'-- इन पदोंका यह तात्पर्य नहीं है कि मैंने कर्मयोगको पूर्णतया कह दिया है, प्रत्युत यह तात्पर्य है कि जो कुछ कहा है, वह पूर्ण है। आगे भगवान्के जन्मके विषयमें अर्जुनद्वारा किये गये प्रश्नका उत्तर देकर भगवान्ने पुनः उसी कर्मयोगका वर्णन आरम्भ किया है।भगवान् कहते हैं कि सृष्टिके आदिमें मैंने सूर्यके प्रति जो कर्मयोग कहा था, वही आज मैंने तुमसे कहा है। बहुत समय बीत जानेपर वह योग अप्रकट हो गया था, और मैं भी अप्रकट ही था। अब मैं भी अवतार लेकर प्रकट हुआ हूँ और योगको भी पुनः प्रकट किया है। अतः अनादिकालसे जो कर्मयोग मनुष्योंको कर्मबन्धनसे मुक्त करता आ रहा है, वह आज भी उन्हें कर्मबन्धनसे मुक्त कर देगा।'रहस्यं ह्येतदुत्तमम्'-- जिस प्रकार अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके सामने 'सर्वगुह्यतम' बात प्रकट की कि 'तू' मेरी शरणमें आ जा मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा', उसी प्रकार यहाँ 'उत्तम रहस्य' प्रकट करते हैं कि 'मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ'।भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि तेरा सारथि बनकर तेरी आज्ञाका पालन करनेवाला होकर भी मैं आज तुझे वही उपदेश दे रहा हूँ, जो उपदेश मैंने सृष्टिके आदिमें सूर्यको दिया था। मैं साक्षात् वही हूँ और अभी अवतार लेकर गुप्तरीतिसे प्रकट हुआ हूँ-- यह बहुत रहस्यकी बात है। इस रहस्यको आज मैं तेरे सामने प्रकट कर रहा हूँ; क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है।साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है, साधककी दृष्टि भी उपदेशकी ओर अधिक एवं उपदेष्टाकी ओर कम जाती है। इस प्रसङ्गको पढ़ने-सुननेपर उपदिष्ट 'योग' पर तो दृष्टि जाती है, पर उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि नारायण हैं--इसपर प्रायः दृष्टि नहीं जाती। जो बात साधारणतः पकड़में नहीं आती, वह रहस्यकी होती है। भगवान् यहाँ 'रहस्यम्' पदसे अपना परिचय देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि सर्वथा भगवान्की ओर ही रहनी चाहिये।अपने-आपको 'आदि उपदेष्टा 'कहकर भगवान् मानो अपनेको मानवमात्रका 'गुरु' प्रकट करते हैं। नाटक खेलते समय मनुष्य जनताके सामने अपने असली स्वरूपको प्रकट नहीं करता, पर किसी आत्मीय जनके सामने अपनेको प्रकट भी कर देता है। ऐसे ही मनुष्य-अवतारके समय भी भगवान् अर्जुनके सामने अपना ईश्वरभाव प्रकट कर देते हैं अर्थात् जो बात छिपाकर रखनी चाहिये, वह बात प्रकट कर देते हैं। यही उत्तम रहस्य है।कर्मयोगको भी उत्तम रहस्य माना जा सकता है। जिन कर्मोंसे जीव बँधता है '(कर्मणा बध्यते जन्तुः)' उन्हीं कर्मोंसे उसकी मुक्ति हो जाय यह उत्तम रहस्य है। पदार्थोंको अपना मानकर अपने लिये कर्म करनेसे बन्धन होता है, और पदार्थोंको अपना न मानकर (दूसरोंका मानकर) केवल दूसरोंके हितके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक सेवा करनेसे मुक्ति होती है। अनुकूलता-प्रतिकूलता, धनवत्ता-निर्धनता, स्वस्थता-रुग्णता आदि कैसी ही परिस्थिति क्यों न हो, प्रत्येक परिस्थितिमें इस कर्मयोगका पालन स्वतन्त्रतापूर्वक हो सकता है। कर्मयोगमें रहस्यकी तीन बातें मुख्य हैं (1) मेरा कुछ नहीं है। कारण कि मेरा स्वरूप सत् (अविनाशी) है और जो कुछ मिला है, वह सब असत् (नाशवान्) है, फिर असत् मेरा कैसे हो सकता है? अनित्यका नित्यके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है? (2) मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये। कारण कि स्वरूप-(सत्-) में कभी अपूर्ति या कमी होती ही नहीं फिर किस वस्तुकी कामना की जाय? अनुत्पन्न अविनाशी तत्त्वके लिये उत्पन्न होनेवाली नाशवान् वस्तु कैसे काममें आसकती है? (3) अपने लिये कुछ नहीं करना है। इसमें पहला कारण यह है कि स्वयं चेतन परमात्माका अंश है और कर्म जड है। स्वयं नित्य-निरन्तर रहता है, पर कर्मका तथा उसके फलका आदि और अन्त होता है। इसलिये अपने लिये कर्म करनेसे आदि-अन्तवाले कर्म और फलसे अपना सम्बन्ध जुड़ता है। कर्म और फलका तो अन्त हो जाता है, पर उनका सङ्ग भीतर रह जाता है, जो जन्म-मरणका कारण होता है-- 'कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु' (गीता 13। 21)। दूसरा कारण यह है कि 'करने' का दायित्व उसीपर आता है जो कर सकता है अर्थात् जिसमें करनेकी योग्यता है और जो कुछ पाना चाहता है। निष्क्रिय निर्विकार अपरिवर्तनशील और पूर्ण होनेके कारण चेतन स्वरूप शरीरके सम्बन्धके बिना कुछ कर ही नहीं सकता इसलिये यह विधान मानना पड़ेगा कि स्वरूपको अपने लिये कुछ नहीं करना है।\n\nतीसरा कारण यह है कि स्वरूप सत् है और पूर्ण है; अतः उसमें कभी कमी आती ही नहीं, आनेकी सम्भावना भी नहीं-- 'नाभावो विद्यते सतः' (गीता 2। 16)। कमी न आनेके कारण उसमें कुछ पानेकी इच्छा भी नहीं होती। इससे स्वतः सिद्ध होता है कि स्वरूपपर 'करने' का दायित्व नहीं है अर्थात् उसे अपने लिये कुछ नहीं करना है।कर्मयोगमें 'कर्म' तो संसारके लिये होते हैं और 'योग' अपने लिये होता है। परन्तु अपने लिये कर्म करनेसे 'योग' का अनुभव नहीं होता। 'योग' का अनुभव तभी होगा जब कर्मोंका प्रवाह पूरा-का-पूरा संसारकी ओर ही हो जाय। कारण कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, धन, सम्पत्ति आदि जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब-का-सब संसारसे अभिन्न है, संसारका ही है और उन्हें संसारकी सेवामें ही लगाना है। अतः पदार्थ और क्रियारूप संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही दूसरोंके लिये कर्म करना है। यही कर्मयोग है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर करनेका राग, पानेकी लालसा, जीनेकी इच्छा और मरनेका भय-- ये सब मिट जाते हैं।जैसे सूर्यके प्रकाशमें लोग अनेक कर्म करते हैं, पर सूर्यका उन कर्मोंसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता, ऐसे ही 'स्वयं'-(चेतन-) के प्रकाशमें सम्पूर्ण कर्म होते हैं, पर 'स्वयं' का उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता; क्योंकि 'स्वयं' चेतन तथा अपरिवर्तनशील है और कर्म जड तथा परिवर्तनशील हैं। परन्तु जब 'स्वयं' भूलसे उन पदार्थों और कर्मोंके साथ थोड़ा-सा भी सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् उन्हें अपने और अपने लिये मान लेता है, तो फिर वे कर्म अवश्य ही उसे बाँध देते हैं।नियत-कर्मका किसी भी अवस्थामें त्याग न करना तथा नियत समयपर कार्यके लिये तत्पर रहना भी सूर्यकी अपनी विलक्षणता है। कर्मयोगी भी सूर्यकी तरह अपने नियत-कर्मोंको नियत समयपर करनेके लिये सदा तत्पर रहता है।कर्मयोगका ठीक-ठीक पालन किया जाय तो यदि कर्मयोगीमें ज्ञानके संस्कार हैं तो उसे ज्ञानकी प्राप्ति, और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो उसे भक्तिकी प्राप्ति स्वतः हो जाती है। कर्मयोगका पालन करनेसे अपना ही नहीं, प्रत्युत संसारमात्रका भी परम हित होता है। दूसरे लोग देखें या न देखें, समझें या न समझें, मानें या न मानें अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करनेसे दूसरे लोगोंको कर्तव्य-पालनकी प्रेरणा स्वतः मिलती है और इस प्रकार सबकी सेवा भी हो जाती है।मार्मिक बातगीतामें भगवान्ने उपदेशके आरम्भमें दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक मनुष्यमात्रके अनुभव-(विवेक-) का वर्णन किया है। यह मनुष्यमात्रका ही अनुभव नहीं है, प्रत्युत जीवमात्रका भी अनुभव है; कारण कि 'मैं हूँ'--ऐसे अपनी सत्ता-(होनेपन-) का अनुभव स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंको है। वृक्ष, पर्वत आदिको भी इसका अनुभव है, पर वे इसे व्यक्त नहीं कर सकते। पशु-पक्षियोंमें तो प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है; जैसे-- पशु-पक्षी आपसमें लड़ते हैं तो अपनी सत्ताको लेकर ही लड़ते हैं। यदि अपनी अलग सत्ताका अनुभव न हो तो वे लड़ें ही क्यों? मनुष्यको तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव है ही; परन्तु वह न तो अपने अनुभवकी ओर दृष्टि डालता है और न उसका आदर ही करता है। इस अनुभवको ही विवेक या निजज्ञान कहते हैं। यह विवेक सबमें स्वतः है और भगवत्प्रदत्त है।इन्द्रियाँ मन और बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं इसलिये इनसे होनेवाला ज्ञान प्रकृतिजन्य है। शास्त्रोंको पढ़सुनकर इन इन्द्रियोंमनबुद्धिके द्वारा जो पारमार्थिक ज्ञान होता है वह ज्ञान भी एक प्रकारसे प्रकृतिजन्य ही है। परमात्मतत्त्व इस प्रकृतिजन्य ज्ञानकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण है। अतः परमात्मतत्त्वको निज-ज्ञान (स्वयंसे होनेवाला ज्ञान) से ही जाना जा सकता है। निज-ज्ञान अर्थात् विवेकको महत्त्व देने से 'मैं कौन हूँ? मेरा क्या है? जड और चेतन क्या हैं ?प्रकृति और परमात्मा क्या हैं?-- यह सब जाननेकी शक्ति आ जाती है। यही विवेक कर्मयोगमें भी काम आता है-- यह मार्मिक बात है।\n\nकर्मयोगमें विवेककी दो बातें मुख्य हैं-- (1) अपने होनेपन-('मैं हूँ'-) में कोई संदेह नहीं है और (2) अभी जो वस्तुएँ मिली हुई हैं, उनपर अपना कोई आधिपत्य नहीं है;क्योंकि वे पहले अपनी नहीं थीं और बादमें भी अपनी नहीं रहेंगी। मैं (स्वयं) निरन्तर रहता हूँ और ये मिली हुई वस्तुएँ-- शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि निरन्तर बदलती रहती हैं और इनका निरन्तर वियोग होता रहता है। जैसे कर्मोंका आरम्भ और समाप्ति होती है, ऐसे ही उनके फलका भी संयोग और वियोग होता है। इसलिये कर्मों और पदार्थोंका सम्बन्ध संसारसे है, स्वयंसे नहीं। इस प्रकार विवेक जाग्रत् होते ही कामनाका नाश हो जाता है। कामनाका नाश होनेपर स्वतःसिद्ध निष्कामता प्रकट हो जाती है अर्थात् कर्मयोग पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।\n\nकामनासे विवेक ढक जाता है (गीता 3। 38 39)। स्वार्थ-बुद्धि, भोग-बुद्धि, संग्रह-बुद्धि रखनेसे मनुष्य अपने कर्तव्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाता। वह उलझनोंको उलझनसे ही अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे ही सुलझाना चाहता है और इसीलिये वह वर्तमान परिस्थितिको बदलनेका ही उद्योग करता है। परन्तु परिस्थितिको बदलना अपने वशकी बात नहीं है, इसलिये उलझन सुलझनेकी अपेक्षा अधिकाधिक उलझती चली जाती है। विवेक जाग्रत् होनेपर जब स्वार्थ-बुद्धि, भोग-बुद्धि, संग्रह-बुद्धि नहीं रहती, तब अपना कर्तव्य स्पष्ट दीखने लग जाता है और सभी प्रकारकी उलझनें स्वतः सुलझ जाती हैं।\n\nबाहरी परिस्थिति कर्मोंके अनुसार ही बनती है अर्थात् वह कर्मोंका ही फल है। धनवत्ता-निर्धनता, निन्दा-स्तुति, आदर-निरादर, यश-अपयश, लाभ-हानि, जन्म-मरण ,स्वस्थता-रुग्णता आदि सभी परिस्थितियाँ कर्मोंके अधीन हैं (टिप्पणी प0 214)। शुभ और अशुभ कर्मोंके फलस्वरूपमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति सामने आती रहती है; परन्तु उस परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर--उसे अपनी मानकर सुखी-दुःखी होना मूर्खता है। तात्पर्य यह है कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका आना तो कर्मोंका फल है, और उससे सुखी-दुःखी होना अपनी अज्ञता--मूर्खताका फल है। कर्मोंका फल मिटाना तो हाथकी बात नहीं है, पर मूर्खता मिटाना बिलकुल हाथकी बात है। जिसे मिटा सकते हैं, उस मूर्खताको तो मिटाते नहीं और जिसे बदल सकते नहीं, उस परिस्थितिको बदलनेका उद्योग करते हैं--यह महान् भूल है !इसलिये अपने विवेकको महत्त्व देकर मूर्खताको मिटा देना चाहिये और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंका सदुपयोग करते हुए उनसे ऊँचे उठ जाना अर्थात् असङ्ग हो जाना चाहिये। जो किसी भी परिस्थितिसे सम्बन्ध न जोड़कर उसका सदुपयोग करता है अर्थात् अनुकूल परिस्थितिमें दूसरोंकी सेवा करता है तथा प्रतिकूलपरिस्थितिमें दुःखी नहीं होता अर्थात् सुखकी इच्छा नहीं करता, वह संसार-बन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है।जिसे मनुष्य नहीं चाहता, वह प्रतिकूल परिस्थिति पहले किये अशुभ-(पाप-) कर्मोंका फल होती है। अतः पाप-कर्म तो करने ही नहीं चाहिये। किसीको कष्ट पहुँचे, ऐसा काम तो स्वप्नमें भी नहीं करना चाहिये। परन्तु वर्तमानमें (नये) पाप-कर्म न करनेपर भी पुराने पाप-कर्मोंके फलस्वरूप जब प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, तब अन्तःकरणमें चिन्ता, शोक, भय आदि भी आ जाते हैं। इसका कारण यह है कि हमने चिन्ता-शोकको अधिक परिचित बना लिया है। जैसे बिक्री की हुई गाय पुराने स्थानसे परिचित होनेके कारण बार-बार वहीं आ जाती है। परन्तु उसे बार-बार नये स्थानपर पहुँचा दिया जाय, तो फिर वह पुराने स्थानपर आना छोड़ देती है। ऐसे ही आज और अभी यह दृढ़ विचार कर लें कि आने-जानेवाली परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर चिन्ता-शोक करना गलती है, यह गलती अब हम नहीं करेंगे, तो फिर ये चिन्ता-शोक आना छोड़ देंगे।विवेककी पूर्ण जागृति न होनेपर भी कर्मयोगीमें एक निश्चयात्मिका बुद्धि रहती है कि जो अपना नहीं है, उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना है और सांसारिक सुखोंको न भोगकर केवल सेवा करनी है। इस निश्चयात्मिका बुद्धिके कारण उसके अन्तःकरणमें सांसारिक सुखोंका महत्त्व नहीं रहता। फिर 'भोगोंमें सुख है'--ऐसे भ्रममें उसे कोई डाल नहीं सकता। अतः इस एक निश्चयको अटल रखनेसे ही उसका कल्याण हो जाता है। सत्सङ्ग-स्वाध्यायसे ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धिको बल मिलता है। अतः हरेक साधकको कम-से-कम ऐसा कल्याणकारी निश्चय अवश्य ही बना लेना चाहिये। ऐसा निश्चय बनानेमें सब स्वाधीन हैं, कोई पराधीन नहीं है। इसमें किसीकी किञ्चित् भी सहायताकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इसमें स्वयं बलवान् है।\n\n सम्बन्ध-- मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ--इसे सुनकर अर्जुनमें स्वाभाविक यह जिज्ञासा जाग्रत् होती है कि जो अभी मेरे समाने बैठे हैं, इन भगवान् श्रीकृष्णने सृष्टिके आरम्भमें सूर्यको उपदेश कैसे दिया था? अतः इसे अच्छी तरह समझनेके लिये अर्जुन आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.3।।स एव अयम् अस्खलितस्वरूपः पुरातनः योगः सख्येन अतिमात्रभक्त्या च माम् एव प्रपन्नाय ते मया प्रोक्तः सपरिकरः सविस्तरम् उक्त इत्यर्थः। मदन्येन केन अपि ज्ञातुं वक्तुं वा न शक्यम् यत इदं वेदान्तोदितम् उत्तमं रहस्यं ज्ञानम्।अस्मिन् प्रसङ्गे भगवदवतारयाथात्म्यं यथावद् ज्ञातुम् अर्जुन उवाच",
        "et": "4.3 It is the same ancient, unchanged Yoga which is now taught to you, who out of friendship and overwhelming devotion have resorted to Me whole-heartedly. The meaning is that it has been taught to you fully with all its accessories. Because it is the most mysterious knowledge declared in the Vedanta, it cannot be known or taught by anyone other than Myself.\n\nIn this connection, in order to know the truth about the Lord's descent correctly, Arjuna asked:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.1  4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्।  एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S  परम्परायातमपि K  परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति।  भक्तोऽसि मे सखा चेति।  त्वं भक्तः मत्परमः सखा च।  चशब्देन अन्वाचय उच्यते।  तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।",
        "et": "4.1-3 Evam etc.  upto  uttamam.  Eventhough it has come down by regular  succession of teacher,  it is lost now.  By this  [statement]  the Bhagavat indicates the rarity  (or difficulty)  and respectability of this  knowledge.  You are My devotee and friend too :  You are a devotee having nothing but Me as your final goal and you are a friend too.  This  'too'  indicates the secondary importance  [of the friendship].  Hence, just as in the sentence  'wander  begging food  [etc]',  the importance  lies in the act of begging food,  but unimportance  in the act of bringing the cow;  in the same way, in the present case it is devotion  towards the  teacher that is important  and not the friendship also.  This is the idea intended here."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.3।।अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है यह देखकर और साथ ही लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर  वही यह पुराना योग यह सोचकर कि तू मेरा भक्त और मित्र है अब मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह ज्ञानरूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है।",
        "sc": "।।4.3।। स एव अयं मया ते तुभ्यम् अद्य इदानीं योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तः असि मे सखा च असि इति। रहस्यं हि यस्मात् एतत् उत्तमं योगः ज्ञानम् इत्यर्थः।।भगवता विप्रतिषिद्धमुक्तमिति मा भूत् कस्यचित् बुद्धिः इति परिहारार्थं चोद्यमिव कुर्वन् अर्जुन उवाच अर्जुन उवाच",
        "et": "4.3 Sah, that; puratanah, ancient; yogah, Yoga; eva, itself; ayam, which is this; proktah, has been taught; te, to you; maya, by Me; adya, today; iti, considering that; asi, you are; me, My; bhaktah, devotee; ca sakha, and friend. Hi, for; etat, this Yoga, i.e. Knowledge; is a uttamam, profound; rahasyam, secret.\nLest someone should understand that the Lord has said something contradictory, therefore, in order to prevent that (doubt), as though raising a estion,"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.1  4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह  बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह  पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच  इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह  स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.3।।य एवं पुर्वमुपदिष्टोऽप्यधिकार्यभावाद्विच्छिन्नसंप्रदायोऽभूत् यं बिना च पुरुषार्थो न लभ्यते स एवायं पुरातनोऽनादिगुरुपरंपरागतो योगोऽद्य संप्रदायविच्छेदकाले मयाऽतिस्निग्धेन ते तुभ्यं प्रकर्षेणोक्तः नत्वन्यस्मै कस्मैचित्। कस्मात्। भक्तोऽसि मे सखाचेति। इतिशब्दो हेतौ। यस्मात्त्वं मम भक्तः शरणागतत्वे सत्यत्यन्तप्रीतिमान् सखा च समानवयाः स्निग्धसहायोऽसि सर्वदा भवसि अतस्तुभ्यमुक्त इत्यर्थः। अन्यस्मै कुतो नोच्यते तत्राहि  हि यस्मादेतज्ज्ञानमुत्तमं रहस्यं अतिगोप्यम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.3।। स एवायमिति। स एवायं योगोऽद्य विच्छिन्ने संप्रदाये सति पुनश्च मया ते तुभ्यमुक्तः। यतस्त्वं मम भक्तोऽसि सखा चेति। अन्यस्मै मया नोच्यते। हि यस्मादिदमुत्तमं रहस्यम्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.3।।स आदित्यं प्रत्युक्त एव पुरातनोऽयं अध्यायद्वयनिरुपितस्ते तुभ्यं मया प्रोक्तो भक्तोऽसि मे सखा चासीति हेतोः। नन्वन्यस्मै कुतो नोच्यते इत्यत आह। रहस्यं गुह्यं हि यस्मादेतज्ज्ञानमुत्तमम्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।4.3।।स एवायमिति। सप्रत्यभिज्ञसावधारणनिर्देशफलितमुक्तंअस्खलितस्वरूप इति।पुरातनोऽद्य इति निर्देशाभ्यां कालभेदमात्रेणापि न स्वरूपे वा प्रकारे वा भेद इति सूचितम्। भक्तोऽसीति वर्तमाननिर्देशादनिवृत्ता भक्तिः सूचिता। अल्पीयसी तु भक्तिः कदाचिन्निवर्तेतापीत्यभिप्रायेणोक्तंअतिमात्रेति। भक्तोऽसि  शास्त्रदृष्टमहत्त्वानुसन्धानेन प्रीतिमानसीत्यर्थः। सखा चासि  अवतारदृष्टसौलभ्यविशेषेण प्रणयविस्रम्भवानसीत्यर्थः।ते मया इति शब्दावपिशाधि मां त्वां प्रपन्नम् 2।7 इति प्रागुक्तप्रपत्तृप्रपत्तव्ययोः प्रत्यभिज्ञापरावित्ययमपि प्रवचनहेतुरिति ज्ञापनायोक्तं  मामेव प्रपन्नाय ते मया प्रोक्त इति।प्रोक्तः इत्यत्र सोपसर्गधात्वर्थं विवृणोति  सपरिकरः सविस्तरमिति। परिकरोऽङ्गम् शब्दस्य प्रपञ्चो विस्तरः अङ्गोक्तिरप्यत्र सविस्तरेति भावः।अहं प्रोक्तवान्मयाऽद्य प्रोक्तः इत्याभ्यां सूचितमाह  मदन्येनेति। प्रलयेन वा युगादिस्वभावेन वा सम्प्रदायविच्छेदे सति पुनरहमेव सम्प्रदायप्रवर्तकः स्याम् करणायत्तज्ञानेन मदन्येन हिरण्यगर्भादिनाऽपि मदुपदेशमन्तरेण ज्ञातुं वक्तुं चाशक्यमित्यर्थः। सख्यभक्तिप्रपत्त्यादिगुणपौष्कल्ययुक्तायोपदेश्यत्वे भगवद्व्यतिरिक्तेन ज्ञातुं वक्तुं चाशक्यत्वे हेतुपरं रहस्यमित्यादीति दर्शयति  यत इति। हिशब्दोऽत्र हेतुपरः रहस्यत्वाद्योग्यायोपदेश्यम् उत्तमरहस्यत्वान्मदन्येन ज्ञातुं वक्तुं चाशक्यमिति विभागः। उत्तमरहस्यत्वे हेतुःवेदान्तोदितमिति। नपुंसकनिर्देशयोग्यं विशेष्यमुक्तंज्ञानमिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.3।।स एवं पुरातनो योगोऽयमिति प्रत्यक्षं मत्सम्बन्धजनकस्ते तुभ्यं प्रोक्तः प्रकर्षेण मत्प्रीत्यात्मकफलयुक्त उक्तः। ननु योग एव फलसाधकश्चेद्भक्तिरस्मदादिभिः किमर्थं कर्तव्या इत्याशङ्क्याह  भक्तोऽसीति। त्वं भक्तोऽसि सखा चासीति मे मदीयं रहस्यम्। एतदुत्तमं कर्मयोगादुत्तमम्। हीति निश्चयेन।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.3।।स इति। अद्य संप्रदायविच्छेदे सति। भक्तः शरणागतः सखा प्रीतिविषयः रहस्यं गोप्यमभक्तादिभ्यो न देयम्। अन्यथा निर्वीर्या विद्या भवेदित्यर्थः। तथा च मन्त्रवर्णःविद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानृजवे अप्रयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् इति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "That very ancient science of the relationship with the Supreme is today told by Me to you because you are My devotee as well as My friend and can therefore understand the transcendental mystery of this science.",
        "ec": " There are two classes of men, namely the devotee and the demon. The Lord selected Arjuna as the recipient of this great science owing to his being a devotee of the Lord, but for the demon it is not possible to understand this great mysterious science. There are a number of editions of this great book of knowledge. Some of them have commentaries by the devotees, and some of them have commentaries by the demons. Commentation by the devotees is real, whereas that of the demons is useless. Arjuna accepts Śrī Kṛṣṇa as the Supreme Personality of Godhead, and any commentary on the Gītā following in the footsteps of Arjuna is real devotional service to the cause of this great science. The demonic, however, do not accept Lord Kṛṣṇa as He is. Instead they concoct something about Kṛṣṇa and mislead general readers from the path of Kṛṣṇa’s instructions. Here is a warning about such misleading paths. One should try to follow the disciplic succession from Arjuna, and thus be benefited by this great science of Śrīmad Bhagavad-gītā ."
    }
}
