{
    "_id": "BG4.2",
    "chapter": 4,
    "verse": 2,
    "slok": "एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |\nस कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||४-२||",
    "transliteration": "evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ .\nsa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa ||4-2||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.2।। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.2 This, handed down thus in regular succession, the royal sages knew. This Yoga, by long lapse of time, has been lost here, O Parantapa (burner of the foes).",
        "ec": "4.2 एवम् thus? परम्पराप्राप्तम् handed down in regular succession? इमम् this? राजर्षयः the royal sages? विदुः knew? सः this? कालेन by lapse of time? इह here? महता by long? योगः Yoga? नष्टः destroyed? परन्तप O Parantapa.Commentary The royal sages Men who were kings and at the same time sages also? learnt this Yoga.Arjuna could burn or harass his foes? like the sun? by the heat of his valour and power. Hence the name Parantapa."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.2 The Divine Kings knew it, for it was their tradition. Then, after a long time, at last it was forgotten."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.2।। वेदों में प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गों का उपदेश है। इस योग का परम्परागत रूप से राजर्षियों को ज्ञान था परन्तु लगता है इस योग का भी अपना दुर्भाग्य और सौभाग्य है  इतिहास के किसी काल में मानव मात्र की सेवा के लिये यह ज्ञान उपलब्ध होता है और किसी अन्य समय अनुपयोगी सा बनकर निरर्थक हो जाता है तब अध्यात्म का स्वर्ण युग समाप्त होकर भोगप्रधान आसुरी जीवन का अन्धा युग प्रारम्भ होता है किन्तु आसुरी भौतिकवाद से ग्रस्त काल में भी वह पीढ़ी अपने ही अवगुणों से पीड़ित होने के लिये उपेक्षित नहीं रखी जाती। क्योंकि उस समय कोई महान् गुरु अध्यात्म क्षितिज पर अवतीर्ण होकर तत्कालीन पीढ़ी को प्रेरणा साहस उत्स्ााह और आवश्यक नेतृत्व प्रदान करके दुख पूर्ण पगडंडी से बाहर सांस्कृतिक पुनरुत्थान के राजमार्ग पर ले आता है।महाभारत काल का उचित मूल्यांकन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान् ठीक ही कहते हैं कि दीर्घकाल के अन्तराल से वह योग यहाँ नष्ट हो गया है।यह देखकर कि इन्द्रिय संयम से रहित दुर्बल व्यक्तियों के हाथों में जाकर यह योग नष्टप्राय हो गया जिसके बिना जीवन का परम् पुरुषार्थ प्राप्त नहीं किया जा सकता। भगवान् आगे कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.2. Thus the regal sages knew this,  received in regualr succession.  By the passage of long time,  this Yoga has been however lost,  O scorcher of enemies !"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.2 Thus handed down in succession, the royal sages knew this (Karma Yoga). But with long lapse of time, O Arjuna, that Yoga was lost to the world."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.2 The king-sages knew this (yoga) which was received thus in regular succession. That Yoga, O destroyer of foes, in now lost owing to a long lapse of time."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह  इममिति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.2।।यथोक्ते योगे परंपरागते विशिष्टजनसंमतिमुदाहरति  एवमिति। तस्य कथं संप्रति वक्तव्यत्वं तदाह  स कालेनेति। पूर्वार्धं व्याकरोति  एवमित्यादिना। ऐश्वर्यसंपत्ती राजत्वं येषां तेषामेव सूक्ष्मार्थनिरीक्षणक्षमत्वमृषित्वम्। इहेति भगवतोऽर्जुनेन सह संव्यवहारकालो गृह्यते। परंतपेति संबोधनं विभजते  आत्मन इति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.2।। हे परंतप ! इस तरह परम्परासे प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया।",
        "hc": "।।4.2।। व्याख्या--'एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः'--सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंने कर्मयोगको भलीभाँति जानकर उसका स्वयं भी आचरण किया और प्रजासे भी वैसा आचरण कराया। इस प्रकार राजर्षियोंमें इस कर्मयोगकी परम्परा चली। यह राजाओं-(क्षत्रियों-) की खास (निजी) विद्या है, इसलिये प्रत्येक राजाको यह विद्या जाननी चाहिये। इसी प्रकार परिवार, समाज, गाँव आदिके जो मुख्य व्यक्ति हैं, उन्हें भी यह विद्या अवश्य जाननी चाहिये।प्राचीनकालमें कर्मयोगको जाननेवाले राजालोग राज्यके भोगोंमें आसक्त हुए बिना सुचारुरूपसे राज्यका संचालन करते थे। प्रजाके हितमें उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती थी। सूर्यवंशी राजाओंके विषयमें महाकवि कालिदास लिखते हैं प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।\nसहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः।।(रघुवंश 1। 18)'वे राजालोग अपनी प्रजाके हितके लिये प्रजासे उसी प्रकार कर लिया करते थे, जिस प्रकार सहस्रगुना बनाकर बरसानेके लिये ही सूर्य पृथ्वीसे जल लिया करते हैं।'तात्पर्य यह कि वे राजालोग प्रजासे कर आदिके रूपमें लिये गये धनको प्रजाके ही हितमें लगा देते थे, अपने स्वार्थमें थोड़ा भी खर्च नहीं करते थे। अपने जीवन-निर्वाहके लिये वे अलग खेती आदि काम करवाते थे। कर्मयोगका पालन करनेके कारण उन राजाओंको विलक्षण ज्ञान और भक्ति स्वतः प्राप्त थी। यही कारण था कि प्राचीनकालमें बड़े-बड़े ऋषि भी ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उन राजाओंके पास जाया करते थे। श्रीवेदव्यासजीके पुत्र शुकदेवजी भी ज्ञान-प्राप्तिके लिये राजर्षि जनकके पास गये थे। छान्दोग्योपनिषद्के पाँचवें अध्यायमें भी आता है कि ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये छः ऋषि एक साथ महाराज अश्वपतिके पास गये थे (टिप्पणी प0 210.1)।\nतीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनक आदि राजाओंको और यहाँ सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंको कर्मयोगी बताकर भगवान् अर्जुनको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि गृहस्थ और क्षत्रिय होनेके नाते तुम्हें भी अपने पूर्वजोंके (वंश-परम्पराके) अनुसार कर्मयोगका पालन अवश्य करना चाहिये (गीता 4। 15)। इसके अलावा अपने वंशकी बात (कर्मयोगकी विद्या) अपनेमें आनी सुगम भी है, इसलिये आनी ही चाहिये।\n\n'स कालेनेह महता योगो नष्टः'--परमात्मा नित्य हैं और उनकी प्राप्तिके साधन--कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि भी परमात्माके द्वारा निश्चित किये होनेसे नित्य हैं। अतः इनका कभी अभाव नहीं होता--'नाभावो विद्यते सतः' (गीता 2। 16)। ये आचरणमें आते हुए न दीखनेपर भी नित्य रहते हैं। इसीलिये यहाँ आये 'नष्टः' पदका अर्थ लुप्त, अप्रकट होना ही है, अभाव होना नहीं।पहले श्लोकमें कर्मयोगको 'अव्ययम्' अर्थात् अविनाशी कहा गया है। अतः यहाँ 'नष्टः' पदका अर्थ यदि कर्मयोगका अभाव माना जाय तो दोनों ओरसे विरोध उत्पन्न होगा कि यदि कर्मयोग अविनाशी है तो उसका अभाव कैसे हो गया ?और यदि उसका अभाव हो गया तो वह अविनाशी कैसे? इसके सिवाय आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान् कर्मयोगको पुनः प्रकट करनेकी बात कहते हैं। यदि उसका अभाव हो गया होता तो पुनः प्रकट नहीं होता। भगवान्के वचनोंमें विरोध भी नहीं आ सकता। इसलिये यहाँ 'इह नष्टः' पदोंका तात्पर्य यह है कि इस अविनाशी कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका और इसके तत्त्वको जाननेवाले तथा उसे आचरणमें लानेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंका इस लोकमें अभाव-सा हो गया है।जहाँसे जो बात कही जाती है, वहाँसे वह परम्परासे जितनी दूर चली जाती है, उतना ही उसमें स्वतः अन्तर पड़ता चला जाता है--यह नियम है। भगवान् कहते हैं कि कल्पके आदिमें मैंने यह कर्मयोग सूर्यसे कहा था, फिर परम्परासे इसे राजर्षियोंने जाना। अतः इसमें अन्तर पड़ता ही गया और बहुत समय बीत जानेसे अब यह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है। यही कारण है कि वर्तमानमें इस कर्मयोगकी बात सुनने तथा देखनेमें बहुत कम आती है।कर्मयोगका आचरण लुप्तप्राय होनेपर भी उसका सिद्धान्त (अपने लिये कुछ न करना) सदैव रहता है; क्योंकि इस सिद्धान्तको अपनाये बिना किसी भी योग-(ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि-) का निरन्तर साधन नहीं हो सकता। कर्म तो मनुष्यमात्रको करने ही पड़ते हैं। हाँ, ज्ञानयोगी विवेकके द्वारा कर्मोंको नाशवान् मानकर कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है; और भक्तियोगी कर्मोंको भगवान्के अर्पण करके कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करता है। अतः ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको कर्मयोगका सिद्धान्त तो अपनाना ही पड़ेगा; भले ही वे कर्मयोगका अनुष्ठान न करें। तात्पर्य यह कि वर्तमानमें कर्मयोग लुप्तप्राय होनेपर भी सिद्धान्तके रूपमें विद्यमानही है।\nवास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें 'कर्म' लुप्त नहीं हुए हैं, प्रत्युत (कर्मोंका प्रवाह अपनी ओर होनेसे) 'योग' ही लुप्त हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे संसारके पदार्थ कर्म करनेसे मिलते हैं, ऐसे ही परमात्मा भी कर्म करनेसे मिलेंगे--यह बात साधकोंके अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे बैठ गयी है कि 'परमात्मा नित्यप्राप्त हैं'--इस वास्तविकताकी ओर उनका ध्यान ही नहीं जा रहा है। कर्म सदैव संसारके लिये होते हैं और 'योग' सदैव अपने लिये होता है। 'योग' के लिये कर्म करना नहीं होता वह तो स्वतःसिद्ध है (टिप्पणी प0 210.2)। अतः योग के लिये यह मान लेना कि वह कर्म करनेसे होगा यही योग का लुप्त होना है।मनुष्यशरीर कर्मयोगका पालन करनेके लिये अर्थात् दूसरोंकी निःस्वार्थ सेवा करनेके लिये ही मिला है। परन्तु आज मनुष्य रातदिन अपनी सुखसुविधा सम्मान आदिकी प्राप्तिमें ही लगा हुआ है। स्वार्थके अधिक बढ़ जानेके कारण दूसरोंकी सेवाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। इस प्रकार जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला है उसे भूल जाना ही कर्मयोगका लुप्त होना है।मनुष्य सेवाके द्वारा पशुपक्षीसे लेकर मनुष्य देवता पितर ऋषि सन्तमहात्मा और भगवान्तकको अपने वशमें कर सकता है। परन्तु सेवाभावको भूलकर मनुष्य स्वयं भोगोंके वशमें हो गया जिसका परिणाम नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें पड़ जाना है। यही कर्मयोगका छिपना है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.2।।श्री भगवानुवाच  यः अयं तव उदितो योगः स केवलं युद्धप्रोत्साहनाय इदानीम् उदित इति न मन्तव्यम्। मन्वन्तरादौ एव निखिलजगदुद्धरणाय परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया इमं योगम् अहम् एव विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् च मनवे मनुः इक्ष्वाकवे इति एवं सम्प्रदायपरम्परया प्राप्तम् इमं योगं पूर्वे राजर्षयो विदुः। स महता कालेन तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्याद् विनष्टप्रायः अभूत्।",
        "et": "4.1 - 4.2 The Lord said  This Karma Yoga declared to you should not be considered as having been taught now merely, for creating encouragement in you for war. I Myself had taught this Yoga to Vivasvan at the commencement of Manu's age as a means for all beings to attain release, which is man's supreme end. Vivasvan taught it to Manu, and Manu to Iksvaku. The royal sages of old knew this Yoga transmitted by tradition. Because of long lapse of time and because of the dullness of the intellect of those who heard it, it has been almost lost."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.1  4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्।  एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S  परम्परायातमपि K  परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति।  भक्तोऽसि मे सखा चेति।  त्वं भक्तः मत्परमः सखा च।  चशब्देन अन्वाचय उच्यते।  तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।",
        "et": "4.2 See Comment under 4.3"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.2।।इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने  जो कि राजा और ऋषि दोनों थे  जाना। हे परंतप  ( अब ) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है। अर्थात् उसकी सम्प्रदायपरम्परा टूट गयी है। अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह पपातप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है।",
        "sc": "।।4.2।। एवं क्षत्रियपरम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयः राजानश्च ते ऋषयश्च राजर्षयः विदुः इमं योगम्। स योगः कालेन इह महता दीर्घेण नष्टः विच्छिन्नसंप्रदायः संवृत्तः। हे परंतप आत्मनः विपक्षभूताः परा इति उच्यन्ते तान् शौर्यतेजोगभस्तिभिः भानुरिव तापयतीति परंतपः शत्रुतापन इत्यर्थः।।दुर्बलानजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगमिममुपलभ्य लोकं च अपुरुषार्थसंबन्धिनम्",
        "et": "4.2 Rajarsayah, the king-sages, those who were kings and sages (at the same time); viduh, knew; imam, this Yoga; which was evam parampara-praptam, received thus through a regular succession of Ksatriyas. Sah, that; yogah, Yoga; nastah, is lost, has go its traditional line snapped; iha, now; mahata kalena, owing to a long lapse of time. parantapa, O destroyer of foes. By para are meant those against oneself. He who, like the sun, 'scorches' (tapayati) them by the 'rays' of the 'heat' of his prowess is parantapa, i.e. scorcher of antagonists.\nNoticing that the Yoga has got lost by reaching people who are weak and have no control of their organs, and that the world has become associated with goals that do not lead to Liberation,"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.1  4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह  बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह  पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच  इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह  स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.2।।एवमादित्यमारभ्य गुरुशिष्यपरम्परया प्राप्तमिमं योगं। राजानश्च ते ऋषयश्चेति राजर्षयः प्रभुत्वे सति सूक्ष्मार्थनिरीक्षणक्षमा निमिप्रमुखाः स्वपित्रादिप्रोक्तं  विदुः। तस्मादनादिवेदमूलत्वेनानन्तफलत्वेनानादिगुरुशिष्यपरंपराप्राप्तत्वेन च कृत्रिमत्वशङ्कानास्पदत्वान्महाप्रभावोऽयं योग इति श्रद्धातिशयाय स्तूयते  स एवं महाप्रयोजनोऽपि योगः कालेन महता दीर्घेण धर्मह्रासकरेण इह इदानीमावयोर्व्यवहारकाले द्वापरान्ते दुर्बलानजितेन्द्रियाननधिकारिणः प्राप्य कामक्रोधादिभिरभिभूयमानो नष्टः विच्छिन्नसंप्रदायो जातः। तं विना पुरुषार्थाप्राप्तेः। अहो दौर्भाग्यं लोकस्येति शोचति भगवान्। हे परंतप परं कामक्रोधादिरूपं शत्रुगणं शौर्येण बलवता विवेकेन तपसा च भानुरिव तापयतीति परंतपः शत्रुतापनः। जितेन्द्रिय इत्यर्थः। उर्वश्युपेक्षणाद्यद्भुतकर्मदर्शनात्। तस्मात्त्वं जितेन्द्रियत्वादत्राधिकारिति सूचयति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.2।। एवमिति। राजानश्च त ऋषयश्चान्येऽपि राजर्षयो निमिप्रमुखाः स्वपुत्रादिभिरिक्ष्वाकुप्रमुखैः प्रोक्तमिमं योगं विदुर्जानन्तिस्म। अद्यतनानामज्ञाने कारणमाह। हे परंतप शत्रुतापन स योगः कालवशादिह लोके नष्टो विच्छिन्नः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.2।।एवं क्षत्रियपरंपरया प्राप्तमागतमिमं योगं राजानश्च ते ऋषयश्च प्रभुत्वे सति सूक्ष्मार्थदर्शनसमर्थाः निमिप्रभृतयो विदुः। यत्तु जनकाजातशत्रुकैकयप्रभृयो राजानः ऋषयश्च सनकवसिष्ठाद्याः सूक्ष्मार्थदर्शिन इति पक्षान्तरप्रदर्शनं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु अभ्यर्हितस्य पूर्वनिपातादि। स योगो महता कालेनेह लोके नष्टः संप्रदायविच्छेदेनादर्शनं गतः। परान्शत्रून्कामादीन् तापयातीति परंतपः। दुर्बलानजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगं मत्त उपलभ्य जीतेन्द्रियस्त्वं पुनर्लोके स्थापयेति सूचयन्संबोधयति परंतपेति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 4.2 अथ चतुर्थसङ्गतिं वक्तुं तृतीयाध्यायार्थं सङ्ग्रहेणोद्गृह्णाति  तृतीयेऽध्याय इति।सहेतुकमिति  ज्ञानयोगकर्मयोगयोः सप्रमादत्वनिष्प्रमादत्वादिहेतुपूर्वकमित्यर्थः। एतेनअसक्त्या लोकरक्षायै गुणेष्वारोप्य कर्तृताम्। सर्वेश्वरे वा न्यस्योक्ता तृतीये कर्मकार्यता गी.सं.7 इति सङ्ग्रहश्लोकोऽपि व्याख्यातः। अशक्तस्य शक्तत्वेऽप्यप्रसिद्धस्य च स्वार्थनिपुणस्य कर्मयोग एव कार्यः प्रसिद्धस्य त्वशक्तस्य शक्तस्य वा स्वार्थं लोकरक्षार्थं च स एव कार्य इति तृतीयाध्यायेनाधिकारिचिन्तनं कर्मयोगस्य ज्ञानयोगाद्वैषम्यचिन्तनं च कृतमिति भावः। अथाधिकर्तव्यतयोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रामाणिकत्वं ज्ञानमिश्रत्वं स्वरूपं तद्वैविध्यं ज्ञानांशप्राधान्यं प्रासङ्गिको भगवदवतार इति षडर्था इहोच्यन्त इत्याह  चतुर्थेनेति। ननुप्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः कर्मणोऽकर्मताऽस्य च। भेदा ज्ञानस्य माहात्म्यं चतुर्थाध्याय उच्यते गी.सं.8 इति चत्वारोऽर्थाः सङ्गृहीताः तत्कथमत्र षडर्थानुकीर्तनम् उच्यते  प्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः इत्यत्र। सङ्गः प्रामाणिकत्वप्रसङ्गः।अस्य च भेदाः इत्यत्र स्वरूपमन्तरेण तद्भेदस्य दुर्ज्ञानत्वात्स्वरूपमपि विवक्षितम् चकारेण वा तत्समुच्चय इति सङ्ग्रहेऽपि षडर्था एव विवक्षिताः। स्वस्वभावोक्तिः स्वस्याकर्मवश्यावतारत्वादिस्वभावोक्तिः। कर्मणोऽकर्मता कर्मयोगस्यान्तर्गतज्ञानतया ज्ञानयोगाकारता ज्ञानस्य माहात्म्यं कर्मयोगान्तर्गतज्ञानांशस्य प्राधान्यम् एवं चतुर्थेन इत्यादिभाष्येणायमपि श्लोको व्याख्यातः। कर्तव्यता हि तृतीयाध्याये प्रोक्ता अतस्तद्दार्ढ्यभात्रमत्र पुरावृत्ताख्यानेन क्रियत इति  कर्तव्यतां द्रढयित्वेत्यस्य भावः। साक्षादध्यायार्थानां सङ्गतिं प्रदर्श्य प्रासङ्गिकं पुनराह  प्रसङ्गाच्चेति। इमं इति निर्देशपूर्वकमुपदेशपरम्पराकथनस्य तात्पर्यमाह  योऽयमित्यादिना मन्तव्यमित्यन्तेन। योगोऽत्र कर्मयोगः। अत्र ज्ञानयोगपरत्वेन परव्याख्यानं प्रकृतासङ्गतम्कुरु कर्म 4।15 इत्यादिवक्ष्यमाणविरुद्धं चेति भावः। मनोरपि जनयित्रे तदुपदेष्ट्रे च विवस्वते प्रोक्तत्वादर्जुनेन चादावित्यनुवदिष्यमाणत्वात्फलितमुक्तंमन्वन्तरादाविति।निखिलजगदुद्धरणायेति  न केवलं युद्धप्रोत्साहनार्थमर्जुनमात्रार्थं वा किन्तु समस्ताधिकारिवर्गापवर्गदानायेत्यर्थः। मन्वन्तरादावुपदेशात्तस्य निखिलजगत्साधारण्यं सूचितम्। नित्यसर्वज्ञे भगवति स्थितत्वादव्ययत्वम्। अथवा अव्ययत्वमिह फलद्वारा।इमं इति निर्देश्च पूर्वोक्तमोक्षसाधनत्वमप्यभिप्रैतीति ज्ञापनाय  परमेत्याद्युक्तम्। प्रागपि न फलान्तरार्थमुक्तमिति भावः।अहं प्रोक्तवान् इत्यनेन मन्वन्तरादौ महाकल्पारम्भे भारतसमरारम्भे वा मदन्यः कश्चिदस्य यथावज्ज्ञाता वक्ता च दुर्लभ इत्यभिप्रेतम्। प्रसङ्गादवश्यं ज्ञातव्यं स्वावतारयाथात्म्यं वक्तुं स्वस्य मन्वादिकालविरोधरूपशङ्कोत्थापनं च कृतमिति व्यञ्जनायअहमेवेत्युक्तम्।विवस्वते प्रोक्तवानिति  नह्ययमसुरादिभ्यो मयोपदिष्टो बुद्धाद्यागमार्थः किन्तु सर्ववेदात्मने विवस्वत इति भावः।विवस्वांश्च मनवे मनुरिक्ष्वाकव इति  यद्वै किञ्च मनुरवदत्तद्भेषजं तै.सं.2।2।62 इति सकलजगद्भेषजभूतवचनतया प्रसिद्धमर्यादाप्रवर्तनविशदाधिकृतकोटिनिविष्टपित्रादिक्रमेण ह्युपदेशपरम्परा प्राप्ता न तु सम्भवद्विप्रलम्भकुहकपाषण्ड्यादिसंसर्गप्रवृत्तेति भावः। एतत्सर्वंएवं सम्प्रदायपरम्परयेत्यनेन व्यक्तम्। परम्पराशब्देनेक्ष्वाकोरर्वाचीनानामपि ग्रहणात्कृतादियुगे सम्प्रदायाविच्छेदो विवक्षित इति चाभिप्रायः। इदानीं नाशस्याभिधानादत्रपूर्वे राजर्षय इत्युक्तम्।राजर्षयो विदुः  राजानो हि विस्तीर्णागाधमनसः तत्रापि ऋषित्वादतीन्द्रियार्थदर्शनक्षमाः ते च बहवः ते चाश्वपतिजनकाम्बरीषप्रभृतयः सर्वेऽप्यविगानेनेमं कर्मयोगमनुष्ठितवन्त इति भावः। कालदैघ्र्यस्य विच्छेदहेतुत्वप्रकारमिहशब्दसूचितमाह  तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्यादिति। इह विचित्राधिकारिपूर्णे जगति कृतत्रेतादिषु युगेषु कालक्रमेण बुद्धिशक्त्यनुष्ठानादयोऽपचीयमाना दृष्टाः श्रुताश्चेति भावः।नष्टः इत्यत्रात्यन्तविच्छेदो नाभिमतः व्यासभीष्माक्रूरादेरिदानीमपि विद्यमानत्वादित्यभिप्रायेणोक्तंविनष्टप्रायोऽभूदिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.2।।एवं परम्पराप्राप्तं मत्परम्परयाऽऽप्तमिमं योगं राजर्षयः राज्यादिकं परित्यज्य मदर्थैकप्रयोजनवन्तोऽविदुः। ननु परम्परागतं चेदिदानीं केनापि कथं न ज्ञायत इत्याशङ्क्याहुः  स कालेनेति। स योगो महता कालेन प्रमाणादिनिरासकेन महता मदिच्छारूपेण तद्व्यवधानादनवतारदशायां दर्शकाभावान्नष्टः। परन्तपेति सम्बोधनेन तवोत्कृष्टतापसंक्लेशेनाहं दर्शयामीति ज्ञापितम्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.2।।एवमिति। एवं परंपराप्राप्तमिक्ष्वाकोर्निमिनाभागादिक्रमेण राजर्षयो जनकाजातशत्रुकैकेयप्रभृतयो राजानः ऋषयश्च सनकवसिष्ठाद्याः सूक्ष्मार्थदर्शिनस्ते राजान एव ऋषय इति वा अविदुर्ज्ञातवन्तः।सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च इति लङो झेर्जुस्। नष्टोऽदर्शनं गतः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "This supreme science was thus received through the chain of disciplic succession, and the saintly kings understood it in that way. But in course of time the succession was broken, and therefore the science as it is appears to be lost.",
        "ec": " It is clearly stated that the Gītā was especially meant for the saintly kings because they were to execute its purpose in ruling over the citizens. Certainly Bhagavad-gītā was never meant for the demonic persons, who would dissipate its value for no one’s benefit and would devise all types of interpretations according to personal whims. As soon as the original purpose was scattered by the motives of the unscrupulous commentators, there arose the need to reestablish the disciplic succession. Five thousand years ago it was detected by the Lord Himself that the disciplic succession was broken, and therefore He declared that the purpose of the Gītā appeared to be lost. In the same way, at the present moment also there are so many editions of the Gītā (especially in English), but almost all of them are not according to authorized disciplic succession. There are innumerable interpretations rendered by different mundane scholars, but almost all of them do not accept the Supreme Personality of Godhead, Kṛṣṇa, although they make a good business on the words of Śrī Kṛṣṇa. This spirit is demonic, because demons do not believe in God but simply enjoy the property of the Supreme. Since there is a great need of an edition of the Gītā in English, as it is received by the paramparā (disciplic succession) system, an attempt is made herewith to fulfill this great want. Bhagavad-gītā – accepted as it is – is a great boon to humanity; but if it is accepted as a treatise of philosophical speculations, it is simply a waste of time."
    }
}
