{
    "_id": "BG4.13",
    "chapter": 4,
    "verse": 13,
    "slok": "चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः |\nतस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ||४-१३||",
    "transliteration": "cāturvarṇyaṃ mayā sṛṣṭaṃ guṇakarmavibhāgaśaḥ .\ntasya kartāramapi māṃ viddhyakartāramavyayam ||4-13||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.13।। गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ, तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.13 The fourfold caste has been created by Me according to the differentiation of Guna and Karma; though I am the author thereof know Me as non-doer and immutable.",
        "ec": "4.13 चातुर्वर्ण्यम् the fourfold caste? मया be Me? सृष्टम् has been created? गुणकर्मविभागशः according to the differentiation of Guna and Karma? तस्य thereof? कर्तारम् the author? अपि also? माम् Me? विद्धि know? अकर्तारम् nondoer? अव्ययम् immutable.Commentary The four castes (Brahmana? Kshatriya? Vaishya and Sudra) are classified according to the differentiation of Guna and Karma. In a Brahmana? Sattva predominates. He possesses selfrestraint? purity? serenity? straightforwardness? devotion? etc. In a Kshatriya? Rajs predominates. He possesses prowess? splendour? firmness? dexterity? generosity and the nature of a ruler. In a Vaishya? Rajas predominates and Tamas is subordinate to Rajas. He does the duty of ploughing? protection of cattle and trade. In a Sudra Tamas predominates and Rajas is subordinate to Tamas. He does service to the other three castes. Human temperaments and tendencies vary according to the Gunas.Though the Lord is the author of the caste system? yet He is not the author as He is the nondoer. He is not subject to Samsara. Really Maya does everything. Maya is the real author. Society can exist in a flourishing state if the four castes do their duties properly. Otherwise there will be chaos? rupture and fighting. (Cf.XVIII.41)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.13 The four divisions of society (the wise, the soldier, the merchant, the labourer) were created by Me, according to the natural distribution of Qualities and instincts. I am the author of them, though I Myself do no action, and am changeless."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.13।। कुछ काल से इस श्लोक का अत्यन्त दुरुपयोग करके इसे विवादास्पद विषय बना दिया गया है। वर्ण शब्द का अर्थ है रंग। योगशास्त्र में प्रकृति के तीन गुणों सत्त्व रज और तम को तीन रंगों से सूचित किया जाता है। जैसाकि पहले बता चुके हैं इन तीन गुणों का अर्थ है मनुष्य के विभिन्न प्रकार के स्वभाव। सत्त्व रज और तम का संकेत क्रमश श्वेत रक्त और कृष्ण वर्णों से किया जाता है। मनुष्य अपने मन में उठने वाले विचारों के अनुरूप ही होता है। दो व्यक्तियों के विचारों में कुछ साम्य होने पर भी दोनों के स्वभाव में सूक्ष्म अन्तर देखा जा सकता है।इन स्वभावों की भिन्नता के आधार पर अध्यात्म की दृष्टि से अध्ययन करने के लिए मनुष्यों का चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है इसको ही वर्ण कहते हैं। जैसे किसी बड़े नगर अथवा राज्य में व्यवसाय की दृष्टि से लोगों का वर्गीकरण चिकित्सक वकील प्राध्यापक व्यापारी राजनीतिज्ञ ताँगा चालक आदि के रूप में करते हैं उसी प्रकार विचारों के भेद के आधार पर प्राचीन काल में मनुष्यों को वर्गीकृत किया जाता था। किसी राज्य के लिये चिकित्सक और तांगा चालक उतने ही महत्व के हैं जितने कि वकील और यान्त्रिक। इसी प्रकार स्वस्थ सामाजिक जीवन के लिये भी इन चारों वर्णों अथवा जातियों को आपस में प्रतियोगी बनकर नहीं वरन् परस्पर सहयोगी बनकर रहना चाहिये। एक वर्ण दूसरे का पूरक होने के कारण आपस में द्वेषजन्य प्रतियोगिता का कोई प्रश्न ही नहीं होना चाहिये।तदोपरान्त भारत में मध्य युग की सत्ता लोलुपता के कारण साम्प्रदायिकता की भावना उभरने लगी जिसने आज अत्यन्य कुरूप और भयंकर रूप धारण कर लिया है। उस काल में शास्त्रीय विषयों में सामान्य जनों के अज्ञान का लाभ उठाते हुए अर्धपण्डितों ने शास्त्रों के कुछ अंशों को बिना किसी सन्दर्भ के उद्घृत करते हुए अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना प्रारम्भ कर दिया।हिन्दुओं के पतनोन्मुखी काल में ब्राह्मण वर्ग को इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का अर्ध भाग अत्यन्त अनुकूल लगा और वे इसे दोहराने लगे मैंने चातुर्र्वण्य की रचना की। इसका उदाहरण देदेकर समाज के वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन को दैवी प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया। जिन लोगों ने ऐसे प्रयत्न किये उन्हें ही हिन्दू धर्म का विरोधी समझना चाहिये। वेदव्यासजी ने इसी श्लोक की प्रथम पंक्ति में ही इसी प्रकार के वर्गीकरण का आधार भी बताया कि गुणकर्म विभागश अर्थात् गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्र्वण्य बनाया हुआ है।वर्ण शब्द की यह सम्पूर्ण परिभाषा न केवल हमारी वर्तमान विपरीत धारणा को ही दूर करती है बल्कि उसे यथार्थ रूप में समझने में भी सहायता करती है। जन्म से कोई व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता। शुभ संकल्पों एवं श्रेष्ठ विचारों के द्वारा ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया जा सकता है। केवल शरीर पर तिलक चन्दन आदि लगाने से अथवा कुछ धार्मिक विधियों के पालन मात्र से हम ब्राह्मण होने का दावा नहीं कर सकते। परिभाषा के अनुसार उसके विचारों एवं कर्मों का सात्त्विक होना अनिवार्य है। रजोगुणप्रधान विचारों तथा कर्मों का व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता है। जिसके केवल विचार ही तामसिक नहीं बल्कि जो अत्यन्त निम्न स्तर का जीवन शारीरिक सुखों के लिय्ो ही जीता है उस पुरुष को शूद्र समझना चाहिये। गुण और कर्म के आधार पर किये गये इस वर्गीकरण से इस परिभाषा की वैज्ञानिकता सिद्ध होती है।सत्त्व (ज्ञान) रज (क्रिया) और तम (जड़त्व) इन तीन गुणों से युक्त है जड़ प्रकृति अथवा माया। चैतन्य स्वरूप आत्मा के इसमें व्यक्त होने पर ही सृष्टि उत्पन्न होकर उसमें ज्ञान क्रिया रूप व्यवहार सम्भव होता है। उसके बिना जगत् व्यवहार संभव ही नहीं हो सकता। इस चैतन्य स्वरूप के साथ तादात्म्य करके श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे चातुर्र्वण्यादि के कर्ता हैं क्योंकि उसके बिना जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है और न कोई क्रिया संभव है। जैसे समुद्र तरंगों लहरों फेन आदि का कर्त्ता है अथवा स्वर्ण सब आभूषणों का कर्त्ता है वैसे ही भगवान् का कर्तृत्व भी समझना चाहिये।इसी श्लोक में भगवान् स्वयं को कर्त्ता कहते हैं परन्तु दूसरे ही क्षण कहते हैं कि वास्तव में वे अकर्त्ता हैं। कारण यह है कि अनन्त सर्वव्यापी चैतन्य आत्मा में किसी प्रकार की क्रिया नहीं हो सकती। देशकाल से परिच्छिन्न वस्तु ही क्रिया कर सकती हैं। आत्मस्वरूप की दृष्टि से भगवान् अकर्त्ता ही है।शास्त्रों की अध्ययन प्रणाली से अनभिज्ञ विद्यार्थियों को वेदान्त के ये परस्पर विरोधी वाक्य भ्रमित करने वाले होते हैं। परन्तु हम अपने दैनिक संभाषण में भी इस प्रकार के वाक्य बोलते हैं और फिर भी उसके तात्पर्य को समझ लेते हैं। जैसे हम कहते हैं कार मे बैठकर मैं गन्तव्य तक पहुँचा। अब यह तो सपष्ट है कि बैठने से मैं अन्य स्थान पर कभी नहीं पहुँच सकता  तथापि कोई अन्य व्यक्ति हमारे वाक्य की अधिक छानबीन नहीं करता। इस प्रकार के वाक्यों में कार की गति का आरोप बैठे यात्री पर किया जाता है। वह अपनी दृष्टि से तो स्थिर बैठा है परन्तु वाहन की दृष्टि से गतिमान् प्रतीत होता है। इसी प्रकार विभिन्न स्वभावों की उत्पत्ति मन्ा और बुद्धि का धर्म है फिर भी उसका आरोप चैतन्य आत्मा पर करके उसे ही कर्त्ता कहते हैं  किन्तु स्वस्वरूप से सर्वव्यापी अविकारी आत्मा अकर्त्ता ही है।वास्तव में मैं अकर्त्ता हूँ इसलिये"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.13. The four-fold caste-structure has been created by Me,  according to the division of [their respective]  alities and actions.  Though I am the creator of this,  know Me as a changeless non-creator."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.13 The system of four stations was created by Me according to distinction of Gunas and Karma. Though I am their creator, know Me as non-agent and immutable."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.13 The four castes have been created by Me through a classification of the gunas and duties. Even though I am the agent of that (act of classification), still know Me to be a non-agent and changeless."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.13।।अहमेव हि कर्तेत्याह  चातुर्वर्ण्यमिति चतुर्वर्णसमुदायः। सात्त्विको ब्राह्मणः सात्त्विकराजसः क्षत्रियः राजसतामसो वैश्यः तामसः शूद्र इति गुणविभागः। कर्मविभागस्तुशमो दमः 18।42 इत्यादिना वक्ष्यते। क्रियायां वैलक्षण्यात्कर्ताऽप्यकर्ता। तथा हि श्रुतिः   विश्वकर्मा विमनाः ऋक्सं.8।3।17 इत्यादि।तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः भाग.6।4।46 इति च। साधितं चैतत्पुरस्तात् पृ.142।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.13।।मनुष्यलोके चातुर्वर्ण्यं चातुराश्रम्यमित्यनेन द्वारेण कर्माधिकारनियमे कारणं पृच्छति  मानुष एवेति। आदिशब्देनावस्थाविशेषा विवक्ष्यन्ते। प्रकारान्तरेण वृत्तानुवादपूर्वकं चोद्यमुत्थापयति   अथवेत्यादिना। प्रश्नद्वयं परिहरति  उच्यत इति। तर्हि तव कर्तृत्वभोक्तृत्वसंभवादस्मदादितुल्यत्वेनानीश्वरत्वमित्याशङ्क्याह  तस्येति। ईश्वरस्य विषमसृष्टिं विदधानस्य सृष्टिवैषम्यनिर्वाहकं कथयति  गुणेति। गुणविभागेन कर्मविभागस्तेन चातुर्वर्ण्यस्य सृष्टिमेवोपदिष्टां स्पष्टयति  तत्रेत्यादिना। प्रश्नद्वयप्रतिविधानं प्रकृतमुपसंहरति  तच्चेदमिति। मनुष्यलोके परं वर्णाश्रमादिपूर्वके कर्मण्यधिकारस्तत्रैव वर्णादेरीश्वरेण सृष्टत्वान्न लोकान्तरेषुतत्र वर्णाद्यभावादीश्वरमेव चातुर्वर्ण्याश्रमादिविभागभागिनोऽधिकारिणोऽनुवर्तन्ते तेनैव वर्णादेस्तद्व्यापारस्य च सृष्टत्वात्तदनुवर्तनस्य युक्तत्वादित्यर्थः। तस्येत्यादि द्वितीयभागापोह्यं चोद्यमनुद्रवति  हन्तेति। यदि चातुर्वर्ण्यादिकर्तृत्वादीश्वरस्य प्रागुक्तो नियमोऽभिमतस्तर्हि तद्विषयसृष्ट्यादेस्तन्निष्ठव्यापारस्य च धर्मादेर्निवर्तकत्वात्तत्फलस्य कर्तृगामित्वात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोस्त्वयि प्रसङ्गात् नित्यमुक्तत्वादि ते न स्यादित्यर्थः। मायया कर्तृत्वं परमार्थतश्चाकर्तृत्वमित्यभ्युपगमान्नित्यमुक्तत्वादि सिध्यतीत्युत्तरमाह  उच्यत इति। मायावृत्यादिसंव्यवहारेण चातुर्वर्ण्यादेस्तत्कर्मणश्च यद्यपि कर्ताहं तथापि तथाविधं मां परमार्थतोऽकर्तारं विद्धीति योजना। अकर्तृत्वादेवाभोक्तृत्वसिद्धिरित्याह  अतएवेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.13 -- 4.14।। मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस-(सृष्टि-रचना आदि-) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय रमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।",
        "hc": "4.13।। व्याख्या--'चातुर्वर्ण्यं' (टिप्पणी प0 235.1) 'मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'--पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार भगवान् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं (टिप्पणी प0 235.2)। मनुष्यके सिवाय देव, पितर, तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं है।'चातुर्वर्ण्यम्' पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते, अपितु पशु, पक्षी, वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं; जैसे-- पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण, बाज आदि क्षत्रिय, चील आदि वैश्य और कौआ आदि शूद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण नीम आदि क्षत्रिय इमली आदि वैश्य और बबूल (कीकर) आदि शूद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ 'चातुर्वर्ण्यम्' पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये; क्योंकि वर्ण-विभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है।\n\nचारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है--इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं; और दूसरे, मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ, इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबसे सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्य-कर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता 18। 46)।'तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्'--यहाँ 'अकर्तारम्' पद कर्म करते हुए भी कर्तृत्वाभिमानका अभाव बतानेके लिये आया है। सृष्टिकी रचना, पालन, संहार आदि सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंसे सर्वथा अतीत, निर्लिप्त ही रहते हैं।सृष्टि-रचनामें भगवान् ही उपादान कारण हैं और वे ही निमित्त कारण हैं। मिट्टीसे बने पात्रमें मिट्टी उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। मिट्टीसे पात्र बननेमें मिट्टी व्यय (खर्च) हो जाती है और उसे बनानेमें कुम्हारकी शक्ति भी खर्च होती है; परन्तु सृष्टि-रचनामें भगवान्का कुछ भी व्यय नहीं होता। वे ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं। इसलिये उन्हें 'अव्ययम्' कहा गया है।जीव भी भगवान्का अंश होनेसे अव्यय ही है। विचार करें कि शरीरादि सब वस्तुएँ संसारकी हैं और संसारसे ही मिली हैं। अतः उन्हें संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे अपना क्या व्यय हुआ? हम तो (स्वरूपतः) अव्यय ही रहे। इसलिये यदि साधक शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, सम्पत्ति आदि मिले हुए सांसारिक पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने, तो फिर उसे अपनी अव्ययताका अनुभव हो जायगा।यहाँ 'विद्धि' पदसे भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको समझनेकी आज्ञा दी है। कर्म करते हुए भी कर्म, कर्म-सामग्री और कर्मफलसे अपना कोई सम्बन्ध न रहना ही कर्मोंकी दिव्यता है।'न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा'--विश्वरचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्का उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। उनके कर्मोंमें विषमता, पक्षपात आदि दोष लेशमात्र भी नहीं हैं। उनकी कर्म-फलमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति, ममता या कामना नहीं है। इसलिये वे कर्म भगवान्को लिप्त नहीं करते।उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु मात्र कर्मफल है। भगवान् कहते हैं कि जैसे मेरी कर्मफलमें स्पृहा नहीं है, ऐसे ही तुम्हारी भी कर्मफलमें स्पृहा नहीं होनी चाहिये। कर्मफलमें स्पृहा न रहनेसे सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी तुम कर्मोंसे बँधोगे नहीं।पीछेके (तेरहवें) श्लोकमें भगवान्ने बताया कि सृष्टि-रचनादि समस्त कर्मोंका कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूँ अर्थात् मुझमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है और इस श्लोकमें बताते हैं कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है अर्थात् मुझमें भोक्तृत्वाभिमान भी नहीं है। अतः साधकको भी इन दोनोंसे रहित होना चाहिये। फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्तृत्व और भोक्तृत्व--दोनों ही नहीं रहते। कर्तृत्व-भोक्तृत्व ही संसार है। अतः इनके न रहनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध ही है।'इति मां योऽभिजानाति'--मनुष्यमें जब कामनाएँ उत्पन्न होती हैं, तब उसकी दृष्टि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंपर रहती है। उत्पत्तिविनाशशील (अनित्य) पदार्थोंपर दृष्टि रहनेसे वह नित्य भगवान्को तत्त्वसे नहीं जान सकता। पर कामनाओंके मिटनेसे जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब भगवान्की ओर स्वतः दृष्टि जाती है। भगवान्की ओर दृष्टि जानेपर मनुष्य जान जाता है कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं, इसलिये उनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं। भगवान् तो जीवोंको कर्म-बन्धनसे रहित करनेके लिये ही उन्हें मनुष्यशरीर देते हैं पर इस बातको न समझनेके कारण जीव कर्मोंसे नयेनये सम्बन्ध मानकर और बन्धन उत्पन्न कर लेता है। इसलिये कर्तापन और फलेच्छा न होनेपर भी वे केवल कृपा करके जीवोंको कर्मबन्धनसे रहित करके उनका उद्धार करनेके लिये ही सृष्टि-रचनाका कार्य करते हैं। भगवान्को इस तरह जान लेनेसे मनुष्य भगवान्की ओर खिंच जाता है-- 'उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।'\nताहि भजनु तजि भाव न आना।।(मानस 5। 34। 2)'कर्मभिर्न स बध्यते'--भगवान्के कर्म तो दिव्य हैं ही, सन्त-महात्माओंके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं। वास्तवमें सन्त-महात्मा ही नहीं, मनुष्यमात्र अपने कर्मोंको दिव्य बना सकता है। जब कर्मोंमें मलिनता (कामना, ममता, आसक्ति आदि) होती है, तब वे कर्म बाँधनेवाले हो जाते हैं। जब मलिनताके दूर हो जानेपर कर्म दिव्य हो जाते हैं, तब वे उसे नहीं बाँधते। इतना ही नहीं, वे कर्म उस कर्ताको और दूसरोंको भी (उसके अनुसार आचरण करनेसे) मुक्त करनेवाले हो जाते हैं। अपने कर्मोंको दिव्य बनानेका सरल उपाय है--संसारसे मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर (संसारकी और संसारके लिये मानते हुए) संसारकी सेवामें लगा देना।विचार करना चाहिये कि हमारे पास शरीर आदि जितनी भी बाह्य वस्तुएँ हैं, उन सबको हम साथ लाये नहीं और जायँगे तब साथ ले जा सकते नहीं, उनके रहते हुए उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं, उन्हें इच्छानुसार रख सकते नहीं अर्थात् उनपर हमारा कोई आधिपत्य नहीं है। इसी प्रकार जन्म-जन्मान्तरोंसेसाथ आये सूक्ष्म और कारण-शरीर भी परिवर्तनशील और प्रकृतिके कार्य हैं, इसलिये उनके साथ भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तुएँ अपने लिये भी नहीं हैं; क्योंकि उनके मिलनेपर भी 'और मिले' यह इच्छा रहती है। यदि वे वस्तुएँ अपने लिये होतीं तो और मिलनेकी इच्छा नहीं रहती। ऐसा होनेपर भी उन वस्तुओँको अपनी और अपने लिये मानना कितनी बड़ी भूल है? उन वस्तुओंमें जो अपनापन दीखता है, वह वास्तवमें केवल उनका सदुपयोग करनेके लिये है, उनपर अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।सेवा करनेके लिये तो सब अपने हैं, पर लेनेके लिये कोई अपना नहीं है। संसारकी तो बात ही क्या है, भगवान् भी लेनेके लिये अपने नहीं हैं अर्थात् भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है, प्रत्युत अपने-आपको ही भगवान्के समर्पित करना है। कारण कि जो वस्तु हमें चाहिये और हमारे हितकी है, वह भगवान्ने हमें पहलेसे ही बिना माँगे दे रखी है; और ज्यादा दे रखी है, कम नहीं। हमारी जरूरतको जितना भगवान् समझते हैं, उतना हम समझ भी नहीं सकते; क्योंकि भगवान्की उदारता अपार है। उनके सामने हमारी समझ तो बहुत ही अल्प है। इसलिये उनसे माँगना किस बातका? जो कुछ हमें मिला है, उसीका हमें सदुपयोग करना है। वस्तुओँको अपनी और अपने लिये न मानकर निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितमें लगा देना ही वस्तुओँका सदुपयोग है। इससे कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और महान् आनन्दस्वरूप परमात्माका अनुभव हो जाता है।\n\n सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें अपना उदाहरण देकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हुए अर्जुनको निष्कामभावपूर्वक अपना कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.13।।चातुर्वर्ण्यप्रमुखं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं कृत्स्नं जगत् सत्त्वादिगुणविभागेन तदनुगुणशमादिकर्मविभागेन च प्रविभक्तं मया सृष्टम्। सृष्टिग्रहणं प्रदर्शनार्थम् मया एव रक्ष्यते मया एव च उपसंह्रियते। तस्य विचित्रसृष्टयादेः कर्तारम् अपि अकर्तारं मां विद्धि।कथम् इति अत्र आह",
        "et": "4.13 The whole universe beginning with Brahma and ending with a cluster of grass, with the system of four stations divided according to Sattva and other Gunas and by actions like self-control corresponding to the Gunas, was created by Me. The mention of 'creation' is for illustration. The universe is protected by Me alone and is withdrawn by Me alone. Know Me to be the creator of his manifold actions of creation etc., but at the same time to be non-agent.\n\nSri Krsna explains here how this is possible."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.13  4.14।।चातुर्वर्ण्यमिति।  न मामिति।  मम किल कथमाकाशकल्पस्य कर्मभिः लेपः  आकाशप्रतिमत्वं कामनाभावात्।  इति (S इत्यनेन)  ज्ञानप्रकारेण यो भगवन्तमेवाश्रयते सर्वत्र सर्वदा आनन्दघनं परमेश्वरमेव न वासुदेवात्परमस्ति किंचित् इति रीत्या ( N K नीत्या) विमृशति तस्य किं कर्मभिः बन्धः।",
        "et": "4.13 See Comment under 4.14"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.13।।मनुष्यलोकमें ही वर्णाश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है अन्य लोकोंमें नहीं यह नियम किस कारणसे है यह बतानेके लिये ( अगला श्लोक कहते हैं )   अथवा वर्णाश्रम आदि विभागसे युक्त हुए मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं ऐसा आपने कहा सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते इसपर कहते हैं  ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र  इन ) चारों वर्णोंका नाम चातुर्वर्ण्य है। सत्त्व रज तम  इन तीनों गुणोंके विभागसे तथा कर्मोंके विभागसे यह चारों वर्ण मुझ ईश्वरद्वारा रचे हुए  उत्पन्न किये हुए हैं। ब्राह्मण इस पुरुषका मुख हुआ इत्यादि श्रुतियोंसे यह प्रमाणित है। उनमेंसे सात्त्विक  सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मणके शम दम तप इत्यादि कर्म हैं। जिसमें सत्त्वगुण गौण है और रजोगुण प्रधान है उस क्षत्रियके शूरवीरता तेज प्रभृति कर्म हैं। जिसमें तमोगुण गौण और रजोगुण प्रधान है ऐसे वैश्यके कृषि आदि कर्म हैं। तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है उस शूद्रका केवल सेवा ही कर्म है। इस प्रकार गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये हैं यह अभिप्राय है। ऐसी यह चार वर्णोंकी अलगअलग व्यवस्था दूसरे लोकोंमें नहीं है इसलिये ( पूर्वश्लोकमें ) मानुषे लोके यह विशेषण लगाया गया है। यदि चातुर्वर्ण्यकी रचना आदि कर्मके आप कर्ता हैं तब तो उसके फलसे भी आपका सम्बन्ध होता ही होगा इसलिये आप नित्यमुक्त और नित्यईश्वर भी नहीं हो सकते इसपर कहा जाता है   यद्यपि मायिक व्यवहारसे मैं उस कर्मका कर्ता हूँ तो भी वास्तवमें मुझे तू अकर्ता ही जान तथा इसीलिये मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ।",
        "sc": "।।4.13।। चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्यं मया ईश्वरेण सृष्टम् उत्पादितम् ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिश्रुतेः। गुणकर्मविभागशःगुणविभागशः कर्मविभागशश्च। गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि। तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो दमस्तपः इत्यादीनि कर्माणि सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य क्षत्रियस्य शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि तमउपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि रजउपसर्जनतमःप्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषैव कर्म इत्येवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् इत्यर्थः। तच्च इदं चातुर्वर्ण्यं न अन्येषु लोकेषु अतः मानुषे लोके इति विशेषणम्। हन्त तर्हि चातुर्वर्ण्यस्य सर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात् तत्फलेन युज्यसे अतः न त्वं नित्यमुक्तः नित्येश्वरश्च इति उच्यते  यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारमपि सन्तं मां परमार्थतः विद्धि अकर्तारम्। अत एव अव्ययम् असंसारिणं च मां विद्धि।।येषां तु कर्मणां कर्तारं मां मन्यसे परमार्थतः तेषाम् अकर्ता एवाहम् यतः",
        "et": "4.13 Catur-varnyam-meaning the same as catvarah varnah, the four castes; srstam, have been created; maya, by Me who am God, which accords with such Vedic texts as, 'The Brahmanas were His face৷৷.' (Rg. 10.90.12); guna-karma-vibhagasah, through a classification of the gunas and duties. [A.G. writes: guna-vibhagena karma-vibhagah, classification of the duties, determined by the classification of the gunas.-Tr] By the gunas are meant sattva, rajas and tamas (see note under 2.45; also see Chapter 14).\nAs to that, the control of the mind and body, austerity, etc. are the duties of the Brahmanas, who are sattvika, i.e. have a predominance of the ality of sattva (purity, goodness, etc.). Courage, valour, etc. are the duties of the Ksatriyas, in whom sattva becomes secondary and rajas (passion, attachment, etc.) preponderates. Agriculture etc. are the duties of the Vaisya, in whom tamas (indolence, ignorance, etc.) is secondary and rajas is predominant. Service is the only duty of the Sudra, in whom rajas is secondary and tamas predominates (see chapters 14, 16,17 and 18). In this way, the four castes have been created by Me through a classification of the gunas and duties. This is the idea. And these four castes do not prevail in the other worlds. Hence the specification, 'in the human world'.\n'Well, in that caste, by virtues of Your being he agent of the acts of creation of the four castes,etc. You become subject tothe conseence of those actions? Therefore you are not eternally free and the eternal Lord!'\nThis is being answered: Api, even though; I am kartaram, the agent; tasya, of that act, from the empirical standpoint of maya; still, from the highest standpoint, viddhi, know; mam, Me; to be akartaram, a non-agent; and therefore, also know Me to be avyayam, changeless, not subject to the cycle of births and deaths.\n'In reality, however, I am not the agent of those actions of which you think I am the agent.'\nBecause"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.13।।चातुर्वर्ण्यमित्यस्य सङ्गतिं सूचयन् तात्पर्यमाह   अहमेव हीति। यस्मादहमेव चातुर्वर्ण्यस्य कर्ता त्रैविद्याश्च तदन्तर्भूताः तस्मात्स्वपितरं मां परित्यज्यान्यदेवता यजन्तः कथं महाफलभाजो भवेयुःइत्याहेत्यर्थः।विचित्रा तद्धितगतिः इति वचनादतिरिक्तार्थसम्भवेचतुर्वर्णादिभ्यः स्वार्थ उपसङ्ख्यानम् वार्ति.7।3।31 इति नादरणीयमिति भावेनाह  चतुर्वर्णेति। वर्णाश्चत्वारो गुणास्त्रयः तत्कथं तेषु गुणविभागः इत्यत आह  सात्त्विक इति। राजसस्थसात्त्विकेष्वेवायं विभाग इति ज्ञातव्यम्। निर्देशप्राथम्यात्क्षत्ित्रये रजसः सत्त्वमधिकम्। तत एव वैश्ये तमसो रजस्तच्च समत्वयुतं रजोपेक्षया तमोऽधिकं शूद्र इत्यसौ तामसः। सत्त्वं तु तमसोऽप्यधिकम्। कर्मविभागः कीदृशः इत्यत आह  कर्मेति। यदि चातुर्वर्ण्यं त्वया सृष्टं तर्हि कर्तृत्वात् जीववत्तवापि कर्मलेपः प्रसज्यत इत्यतः कर्मलेपाभावं वक्तुं हेतुस्तावदुच्यतेतस्य इति तदेतद्व्याहतमित्यत आह  क्रियायामिति। कथं वैलक्षण्यमित्यतः श्रुत्यैव दर्शयति  तथा हीति। विश्वकर्माऽपि विमनास्तत्राभिनिवेशरहित इत्यर्थः। प्रकारान्तरेण वैलक्षण्यं पुराणेन दर्शयति  तनुरिति। क्रियाया मिथ्यात्वात्कर्ताऽप्यकर्तेति परव्याख्यां प्रत्याख्याति  साधितं चेति। एतत्क्रियायाः सत्यत्वं पुरस्तात् द्वितीये।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.13।।ननु केचित्सकामतया देवान्प्रपद्यन्ते केचिदतिकामितया देवान्प्रपद्यन्ते केचिन्निष्कामतया त्वां न सर्वे एकमेवेति कर्मवैचित्र्यं तत्कर्तृ़णां च ब्राह्मणादीनाम् उत्तमादिवैचित्र्यं कुर्वतस्तव कथं वैषम्यनैर्घृण्ये न स्याताम् इत्याशङ्क्याह  चातुर्वर्ण्यमिति। चतुर्वर्णात्मकं जगन्मया सृष्टंचत्वारो जज्ञिरे वर्णाः पुरुषादाश्रमैः सह इतिभगवद्वाक्यात्। परं गुणकर्मविभागश इति गुणाः सत्त्वादयः तदनुगुणकर्माणि तैर्विभागस्तेषां कृतः स्थूलः। दैवासुरविभागस्तु पूर्वत एव कृतः सूक्ष्मः। तत्र सत्त्वप्रधाना विप्रास्तेषां च शमदमादीनि कर्माणि सत्त्वरजःप्रधानाः क्षत्ित्रयास्तेषां शौर्यादि रजस्तमःप्रधाना वैश्यास्तेषां कृषिवाणिज्यादि तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां द्विजशुश्रूषेत्येवं सृष्टं मयैव। जीवेषु चतुर्वणेष्वपि प्रकृत्या सह संसृष्टत्वाद्गुणकर्माणि सहैवेन्द्रियैर्दत्तानिबुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् जनानामसृजद्विभुः। मात्रार्थं च भवार्थं च स्वात्मनेऽकल्पनाय च भाग.10।87।2 इति वाक्यात्। तानि तु तैर्यथा कृतानि तथैव च फलदानि ब्रह्मणो वरदानादिति पूर्वं उक्तंदेवान् भावयतावेन 3।11 इत्यादिना। अतः कर्त्तारमपि जनकमपि मां तत्त्वतोऽकर्त्तारमेव विद्धि यतः अव्ययमिति अहङ्कारादिरहितमित्यर्थः। तथाच सूत्रंवैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति। ब्र.सू.2।1।34 अत्र भाष्यकारः  जीवानां कर्मानुरोधात्सुखदुःखे प्रयच्छति इति वादिबोधनायोक्तं सापेक्षत्वात् इति। वस्तुतस्तु आत्मसृष्टैर्वैषम्यनैर्घृण्यसम्भवोऽपि न वृष्टिवद्भगवान् बीजवत्कर्म तथाहि दर्शयति एष ह्येव साधु कर्म कारयति यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति एष उ एव वाऽसाधु कर्म कारयति यमधो निनीषति कौ.उ.3।3।9 पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापःपापेन (वा) बृ.उ.4।4।5 इति च सापेक्षमपि कुर्वन्नीश्वरमाहात्म्यमिति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.13।।शरीरारम्भकगुणवैषम्यादपि न सर्वे समानस्वभावा इत्याह  चत्वारो वर्णा एव चातुर्वर्ण्यं स्वार्थे ष्यञ्। मयेश्वरेण सृष्टमुत्पादितम्। गुणकर्मविभागशः गुणविभागशः कर्मविभागश्च। तथाहि सत्वप्रधान ब्राह्मणास्तेषां च सात्विकानि शमदमादीनि कर्माणि। सत्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां च तादृशानि शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि। तमउपसर्जनरजःप्रधाना वैश्यास्तेषां च कृष्यादीनि तादृशानि कर्माणि। तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां च तामसीनि त्रैवर्णिकशुश्रूषादीनि कर्माणीति मानुषे लोके व्यवस्थितानि।  एवं तर्हि विषमस्वभावचातुर्वर्ण्यस्रष्टृत्वेन तव वैषम्यंदुर्वारमित्याशङ्क्य नेत्याह  तस्य विषमस्वभावस्य चातुर्वर्ण्यस्य व्यवहारदृष्ट्या कर्तारमपि मां परमार्थदृष्ट्या विद्ध्यकर्तारमव्ययं निरहंकारत्वेनाक्षीणमहिमानम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.13।।ननु केचित्सकामतया प्रवर्तन्ते केचिन्निष्कामतयेति कर्मवैचित्र्यम् तत्कर्तृ़णां च ब्राह्मणादीनामुत्तममध्यमादिवैचित्र्यं कुर्वतस्तव कथं वैषम्यं नास्तीत्याशङ्क्याह  चातुर्वर्ण्यमिति। चत्वारो वर्णा एव चातुर्वर्ण्यम्। स्वार्थे ष्यञ्प्रत्ययः। अयमर्थः  सत्वप्रधाना ब्राह्मणास्तेषां शमदमादीनि कर्माणि सत्वरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां च शौर्ययुद्धादीनि कर्माणि रजस्तमःप्रधाना वैश्यास्तेषां कृषिवाणिज्यादीनि कर्माणि तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां च त्रैवर्णिकशुश्रूषादिकर्माणीत्येवं गुणानां कर्मणां च विभागैश्चातुर्वर्ण्यं मयैव सृष्टमिति। सत्यम्। तथाप्येवं तस्य कर्तारमपि फलतोऽकर्तारमेव मां विद्धि। तत्र हेतुः। अव्ययमासक्तिराहित्येन श्रमरहितं नाशादिरहितम्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.13।।कस्मात्पुनः कारणात्तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते नान्यस्येत्यत आह। यद्वा मानुष एव लोके वर्णाश्रमकर्माधिकारो नान्येष्वितिनियमः किंनिमित्त इति तत्राह  चातुर्वर्ण्यमिति। यत्तु ननु च केचित्सकामतया वर्तन्ते केचिन्निष्कामतयेति कर्मवैचित्र्यं तत्कर्तृ़णां ब्राह्मणादीनां उत्तममध्यमादिवैचित्र्यं च कुर्वतस्तव कथं वैषम्यं नास्तीत्याशङ्क्याहेति तदुपेक्ष्यम्। भाष्योक्तरीत्याऽव्यवहितेन संबन्धे संभवति व्यवहितसंबन्धेनोत्थानानौचित्यात्। शरीरारम्भकगुणवैषम्यादपि न सर्वे समानस्वभावा इत्याहेति वा। अस्मिन्पक्षे गुणकर्मविभागशश्चातुर्वर्ण्यमुत्पन्नमित्येतावतैव निर्वाहे मया सृष्टमित्यस्य प्रयोजनं चिन्त्यम्। चत्वार एव वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम्। गुणाविभागशः कर्मविभागशश्च सत्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमदमादीनि कर्माणि सत्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य राजन्यस्य शौर्यादीनि तमउपसर्जनस्य रजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि रजउपसर्जनस्य तमःप्रधानस्य शूद्रस्य त्रैवर्णिकशुश्रूषैवेत्येवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मयेश्वरेण सृष्टम्। चातुर्णां वर्णानां हितं चातुर्वर्ण्यम्। गुणाश्च कर्माणि चेति गुणकर्म। द्वन्द्वैकवद्भावः।    कर्माण्यग्निहोत्रादीनि गुणाश्च द्रव्यदेवतारुपाः विभागशः साधारणासाधारणविभागेन। तथाहि दानजपादिकं सर्वसाधारणम् अग्निहोत्रादिकं त्रैवर्णिकस्यैव न शूद्रस्य राजसूयादिकं राज्ञ एव नेतरेषामिति विभागो दृश्यते। यतश्चातुर्वर्ण्यं गुणकर्म च मया सृष्ट ततोऽन्यदेवतानामपि मदुत्थत्वात्। पुत्रप्रीत्या पितुरिव तत्प्रीत्या ममैव तृप्तिरस्तीत्यर्थस्तु विभागपदेन साकाङ्क्षेण गुणकर्मणोः समासस्यौचित्यमभिप्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शित इति बोध्यम्। एवं तर्हि चातुर्वर्ण्यस्य विषमस्वभावस्य सृष्ट्यादेस्तन्निष्ठव्यापारस्य च निर्वर्तकत्वात् वैषम्यस्य कर्मफलस्य कर्तृगामित्वात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोश्च त्वयि प्रसङ्गात् संसारित्वादिकं ते स्यादित्याशङ्क्य मायया कर्तृत्वं न वस्तुत इत्यतो नित्यमुक्तस्य मम संसारित्वस्याभाव इत्याशयेनाह। तस्य चातुर्वर्ण्यस्य मायिकेन व्यवहारेण कर्तारमपि मां परमार्थतोऽकर्तारं विद्धि। अतएव कर्तृत्वाभावादभोक्तृत्वादिसिद्य्धाऽव्ययमविकारिणमक्षीणमहिमानम्। असंसारिणमितियावत्। आसक्तिराहित्येन श्रमरहितमित्यर्थस्त्वयुक्तः। फलासक्तिरहितानां जीवानां श्रमस्योपलब्धेः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।4.13।।नन्वक्षीणानन्तपापसञ्चयत्वं सर्वेषां समम् ततश्चाविवेकित्वात्क्षिप्रफलकाङ्क्षित्वमपि समानम् अतः कस्यापि मुमुक्षाविरहान्मोक्षोपायशास्त्रमप्रमाणं स्यादित्याशङ्क्य श्लोकद्वयेन तत्परिहारः क्रियत इत्यभिप्रायेणाह  यथोक्तेति। पूर्वश्लोकोक्तेषु देवतान्तराधीनेषु क्षुद्रफलेष्वपि सर्वकर्तुः स्वस्यैव हेतुत्वंचातुर्वर्ण्यं इत्यादिना दर्शितम्। व्यष्टिसृष्ट्यन्तर्गतचातुर्वर्ण्यकथनं समस्तव्यष्टिसृष्टिसङ्ग्रहार्थमित्यभिप्रायेणचातुर्वर्ण्यप्रमुखमित्युक्तम्। वैषम्यनैर्घृण्यपरिहारप्रस्तावाय व्यष्टिसृष्ट्युपादानम्।गुणकर्मविभागशः इत्येतत्प्रपञ्चयिष्यमाणसत्त्वादिविभागविषयमित्यभिप्रायेणसत्त्वादीत्युक्तम्। सत्त्वादिमूलत्वात्सर्वव्यापाराणांतदनुगुणेत्युक्तम्।तमः शूद्रे रजः क्षत्त्रे ब्राह्मणे सत्त्वमुत्तमम् म.भा.14।39।11 इत्यादिगुणविभागःब्राह्मणक्षत्ित्रयविशाम् 18।41 इत्यादिकर्मविभागः।शमादिकर्मेति  शमाद्यनुष्ठेयमित्यर्थः।शमो दमः इत्युपक्रम्यब्राह्मं कर्म स्वभाजम् 18।42 इति वक्ष्यते। एवं देवतिर्यङ्मनुष्यादिजातिषु वाराहपाद्मेशानकल्पादिषु च पुराणेषु प्रपञ्चितस्तत्तद्गुणोद्रिक्तो विषमसृष्टिप्रकारो द्रष्टव्यः। श्रुत्यादिषु सृष्ट्यादिसमस्तहेतुतयेश्वरस्य ज्ञातव्यत्वविधानादत्र सृष्टिग्रहणं रक्षादेरपि प्रदर्शनपरमित्याह  सृष्टीति। एतेन व्यष्टिसृष्ट्यादिव्यापारत्रयस्यापि स्वकर्तृकत्ववचनात्सृष्टिं ततः करिष्यामि त्वामाविश्य प्रजापते वि.ध.68।51 इत्यादेरर्थोऽप्युक्तो भवति। सूत्रितं चैतत्संज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तु त्रिवृत्कुर्वत उपदेशात् ब्र.सू.2।4।20 इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.13।।ननु कर्मसिद्धिरपि त्वां विना कथं भवति इत्याशङ्क्याह  चातुर्वर्ण्यमिति। चातुर्वर्ण्यं वर्णचतुष्टयं गुणकर्मविभागशः गुणकर्मविभागैः सत्त्वरजस्तमसां यानि कर्माणि तेषां विभागैर्मया सृष्टम् अतस्तस्य चातुर्वर्ण्यस्य कर्तारमव्ययमविनाशिनं ब्रह्मरूपमकर्तारं रसमार्गस्थं रसपरवशं मां तस्य चातुर्वर्ण्यस्य कर्तारमपि विद्धि। इच्छया अंशैः कर्ता न तु साक्षात्स्वयं इत्यपिशब्देन बोध्यते। अतो मदंशसम्बन्धेन तत्र सिद्धिर्भवतीति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.13।।अन्यदेवताभक्ता अपि कस्मात्पुनः कारणात्तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते नान्यस्येत्यत आह  चातुर्वर्ण्यमिति।चतुर्णां वर्णानां हितं चातुर्वर्ण्यम्। गुणाश्च कर्माणि चेति गुणकर्म। द्वन्द्वैकवद्भावः। कर्माण्यग्निहोत्रादीनि। गुणाश्च द्रव्यदेवतादिरूपाः। विभागशः साधारणासाधारणविभागेन। तथाहि दानजपादिकं सर्वसाधारणम्। अग्निहोत्रादिकं त्रैवर्णिकस्यैव न शूद्रस्य। राजसूयादिकं राज्ञ एव नेतरेषामिति विभागो दृश्यते। यतश्चातुर्वर्ण्यं गुणकर्म मया सृष्टं ततोऽन्यदेवतानामपि मदुत्थत्वात्पुत्रप्रीत्या पितुरिव तत्प्रीत्या ममैव तृप्तिरस्तीत्यर्थः। यद्वा गुणविभागशः कर्मविभागश इति योज्यम्। तथाहि सत्त्वप्रधाना ब्राह्मणास्तेषां कर्म शमदमादिकम् सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां कर्म शौर्यादि तम उपसर्जनरजःप्रधाना वैश्यास्तेषां कर्म कृष्यादि रज उपसर्जनतमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां कर्म शुश्रूषैवेति गुणकर्मविभागो दृश्यते तदा चातुर्वर्ण्यमिति स्वार्थे ष्यञ्। चत्वारो वर्णाः गुणकर्मविभागशो मया सृष्टा इत्यर्थः। अन्यदेवताभक्ता अपि मदुक्तकर्मकारित्वान्मद्भक्ता एवेति भावः। ननु यद्येवं त्वं स्वसन्ततितर्पणेन स्वाज्ञाकरणेन प्रीयसे तदर्थं च त्वया चातुर्वर्ण्यं सृष्टं तर्हि महान्संसारीं त्वमसीत्याशङ्क्याह  तस्येति। कर्तारं मायायोगात् वस्तुतोऽकर्तारम्। अतएवाव्ययमविकारिणम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "According to the three modes of material nature and the work associated with them, the four divisions of human society are created by Me. And although I am the creator of this system, you should know that I am yet the nondoer, being unchangeable.",
        "ec": " The Lord is the creator of everything. Everything is born of Him, everything is sustained by Him, and everything, after annihilation, rests in Him. He is therefore the creator of the four divisions of the social order, beginning with the intelligent class of men, technically called brāhmaṇas due to their being situated in the mode of goodness. Next is the administrative class, technically called the kṣatriyas due to their being situated in the mode of passion. The mercantile men, called the vaiśyas, are situated in the mixed modes of passion and ignorance, and the śūdras, or laborer class, are situated in the ignorant mode of material nature. In spite of His creating the four divisions of human society, Lord Kṛṣṇa does not belong to any of these divisions, because He is not one of the conditioned souls, a section of whom form human society. Human society is similar to any other animal society, but to elevate men from the animal status, the above-mentioned divisions are created by the Lord for the systematic development of Kṛṣṇa consciousness. The tendency of a particular man toward work is determined by the modes of material nature which he has acquired. Such symptoms of life, according to the different modes of material nature, are described in the Eighteenth Chapter of this book. A person in Kṛṣṇa consciousness, however, is above even the brāhmaṇas. Although brāhmaṇas by quality are supposed to know about Brahman, the Supreme Absolute Truth, most of them approach only the impersonal Brahman manifestation of Lord Kṛṣṇa. But a man who transcends the limited knowledge of a brāhmaṇa and reaches the knowledge of the Supreme Personality of Godhead, Lord Śrī Kṛṣṇa, becomes a person in Kṛṣṇa consciousness – or, in other words, a Vaiṣṇava. Kṛṣṇa consciousness includes knowledge of all different plenary expansions of Kṛṣṇa, namely Rāma, Nṛsiṁha, Varāha, etc. And as Kṛṣṇa is transcendental to this system of the four divisions of human society, a person in Kṛṣṇa consciousness is also transcendental to all divisions of human society, whether we consider the divisions of community, nation or species."
    }
}
