{
    "_id": "BG4.1",
    "chapter": 4,
    "verse": 1,
    "slok": "श्रीभगवानुवाच |\nइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |\nविवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||४-१||",
    "transliteration": "śrībhagavānuvāca .\nimaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam .\nvivasvānmanave prāha manurikṣvākave.abravīt ||4-1||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।4.1।। श्रीभगवान् ने कहा ---  मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया);  विवस्वान् ने मनु से कहा;  मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "4.1 The Blessed Lord said  I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku.",
        "ec": "4.1 इमम् this? विवस्वते to Vivasvan? योगम् Yoga? प्रोक्तवान् taught? अहम् I? अव्ययम् imperishable? विवस्वान् Vivasvan? मनवे to Manu? प्राह taught? मनुः Manu? इक्ष्वाकवे to Ikshvaku? अब्रवीत् taught.Commentary Vivasvan means the sun. Ikshvaku was the son of Manu. Ikshvaku was the reputed ancestor of the solar dynasty of Kshatriyas.This Yoga is said to be imperishable because the result or fruit? i.e.? Moksha? that can be attained through it is imperishable.If the rulers of dominions possess a knowledge of the Yoga taught by Me in the preceding two discourses? they can protect the Brahmanas and rule their kingdom with justice. So I taught this Yoga to the Sungod in the beginning of evolution."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "4.1 \"Lord Shri Krishna said: This imperishable philosophy I taught to Viwaswana, the founder of the Sun dynasty, Viwaswana gave it to Manu the lawgiver, and Manu to King Ikshwaku!"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।4.1।। जैसा कि इस अध्याय की प्रस्तावना में कहा गया है भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि अब तक उनके द्वारा दिया गया उपदेश नवीन न होकर सनातन वेदों में प्रतिपादित ज्ञान की ही पुर्नव्याख्या है। स्वस्वरूप की स्मृति से स्फूर्त होकर भगवान् घोषणा करते हैं कि उन्होंने ही सृष्टि के प्रारम्भ में इस ज्ञान का उपदेश सूर्य देवता (विवस्वान्) को दिया था। विवस्वान् ने अपने पुत्र मनु जो भारत के प्राचीन स्मृतिकार हुए  को यह ज्ञान सिखाया। मनु ने इसका उपदेश राजा इक्ष्वाकु को दिया जो सूर्यवंश के पूर्वज थे। इस वंश के राजाओं ने दीर्घकाल तक अयोध्या पर शासन किया।वेद शब्द संस्कृत के विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। अत वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा ज्ञान का साधन (प्रमाण)। वेदों का प्रतिपाद्य विषय है जीव के शुद्ध ज्ञान स्वरूप तथा उसकी अभिव्यक्ति के साधनों का बोध।जैसे हम विद्युत् को नित्य कह सकते हैं क्योंकि उसके प्रथम बार आविष्कृत होने के पूर्व भी वह थी और यदि हमें उसका विस्मरण भी हो जाता है तब भी विद्युत् शक्ति का अस्तित्व बना रहेगा इसी प्रकार हमारे नहीं जानने से दिव्य चैतन्य स्वरूप आत्मा का नाश नहीं होता। इस अविनाशी आत्मा का ज्ञान वास्तव में अव्यय है।आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि विश्व का निर्माण सूर्य के साथ प्रारम्भ होना चाहिये। शक्ति के स्रोत के रूप में सर्वप्रथम सूर्य की उत्पत्ति हुई और उसकी उत्पत्ति के साथ ही यह महान् आत्मज्ञान विश्व को दिया गया।वेदों का विषय आत्मानुभूति होने के कारण वाणी उसका वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ है। कोई भी गम्भीर अनुभव शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। अत स्वयं की बुद्धि से ही शास्त्रों का अध्ययन करने से उनका सम्यक् ज्ञान तो दूर रहा विपरीत ज्ञान होने की ही सम्भावना अधिक रहती है। इसलिये भारत में यह प्राचीन परम्परा रही है कि अध्यात्म ज्ञान के उपदेश को आत्मानुभव में स्थित गुरु के मुख से ही श्रवण किया जाता है। गुरुशिष्य परम्परा से यह ज्ञान दिया जाता रहा है। यहाँ इस ब्रह्मविद्या के पूर्वकाल के विद्यार्थियों का परिचय कराया गया है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "4.1. The Bhagavat said  This changeless Yoga  I had properly taught thus to Vivasvat;  Vivasvat correctly told it ot Manu;  and Manu declared to Iksvaku."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "4.1 The Lord said  I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; Vivasvan taught it to Manu; Manu declared it to Iksvaku."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "4.1 The Blessed Lord said  I imparted this imperishable Yoga to Vivasvan, Vivasvan taught this to Manu, and Manu transmitted this to Iksavaku."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह  इममिति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।4.1।।पूर्वाभ्यामध्यायाभ्यां निष्ठाद्वयात्मनो योगस्य गीतत्वाद् वेदार्थस्य च समाप्तत्वाद् वक्तव्यशेषाभावाद् उक्तयोगस्य कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्तये वंशकथनपूर्विका स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह  श्रीभगवानिति। तदेतद्भगवद्वचनं वृत्तानुवादद्वारेण प्रस्तौति  योऽयमिति। उक्तमेव योगं विभज्यानुवदति  ज्ञानेति। संन्यासेनेतिकर्तव्यतया सहितस्य ज्ञानात्मनो योगस्य कर्माख्यो योगो हेतुरतश्चोपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रतिष्ठापितमित्यर्थः। उक्ते योगद्वये प्रमाणमुपन्यस्यति  यस्मिन्निति। अथवा ज्ञानयोगस्य कर्मयोगोपायत्वमेव स्फुटयति  यस्मिन्निति। प्रवृत्त्या लक्ष्यते ज्ञायते कर्मयोगो निवृत्त्या च लक्ष्यते ज्ञानयोग इति विभागः। यद्यपि पूर्वस्मिन्नध्यायद्वये यथोक्तनिष्ठाद्वयं व्याख्यातं तथापि वक्ष्यमाणाध्यायेषु वक्तव्यान्तरमस्तीत्याशङ्क्याह  गीतासु चेति। कथं तर्हि समनन्तराध्यायस्य प्रवृत्तिरत आह  अत इति। वंशकथनं संप्रदायोपन्यासः संप्रदायोपदेशश्च कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्त्या योगस्तुतौ पर्यवस्यति। गुरुशिष्यपरंपरोपन्यासमेवानुक्रामति  इममिति। इममित्यस्य संनिहितं विषयं दर्शयति  अध्यायेति। योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मयोगोपायलभ्यमित्यर्थः। स्वयमकृतार्थानां प्रयोजनव्यग्राणां परार्थप्रवृत्त्यसंभवाद्भगवतस्तथाविधप्रवृत्तिदर्शनात्कृतार्थता कल्पनीयेत्याह  विवस्वत इति। अव्ययवेदमूलत्वादव्ययत्वं योगस्य गमयितव्यं किमिति भगवता कृतार्थेनापि योगप्रवचनं कृतमिति तदाह  जगदिति। कथं यथोक्तेन योगेन क्षत्रियाणां बलाधानं तदाह  तेनेति। युक्ताः क्षत्रिया इति शेषः। ब्रह्मशब्देन ब्राह्मणत्वजातिरुच्यते। यद्यपि योगप्रवचनेन क्षत्रं रक्षितं तेन च ब्राह्मणत्वं तथापि कथं रक्षणीयं जगदशेषं रक्षितमित्याशङ्क्याह  ब्रह्मेति। ताभ्यां हि कर्मफलभूतं जगदनुष्ठानद्वारा रक्षितुं शक्यमित्यर्थः। योगस्याव्ययत्वे हेत्वन्तरमाह  अव्ययफलत्वादिति। ननु कर्मफलवदुक्तयोगफलस्यापि साध्यत्वेन क्षयिष्णुत्वमनुमीयते नेत्याह  नहीति। अपुनरावृत्तिश्रुतिप्रतिहतमनुमानं न प्रमाणीभवतीति भावः। भगवता विवस्वते प्रोक्तो योगस्तत्रैव पर्यवस्यतीत्याशङ्क्याह  स चेति। स्वपुत्रायेत्युभयत्र संबध्यते। आदिराजायेतीक्ष्वाकोः सूर्यवंशप्रवर्तकत्वेन वैशिष्ट्यमुच्यते।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।4.1।। श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा।",
        "hc": "।।4.1।। व्याख्या-- 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्'--भगवान्ने जिन सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है, वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी; अतः यहाँके 'इमम् अव्ययम्, योगम्' पदोंका तात्पर्य पूर्वप्रकरणके अनुसार तथा राजपरम्पराके अनुसार 'कर्मयोग' लेना ही उचित प्रतीत होता है।यद्यपि पुराणोंमें और उपनिषदोंमें भी कर्मयोगका वर्णन आता है, तथापि वह गीतामें वर्णित कर्मयोगके समान साङ्गोपाङ्ग और विस्तृत नहीं है। गीतामें भगवान्ने विविध युक्तियोंसे कर्मयोगका सरल और साङ्गोपाङ्ग विवेचन किया है। कर्मयोगका इतना विशद वर्णन पुराणों और उपनिषदोंमें देखनेमें नहीं आता।\n\nभगवान् नित्य हैं और उनका अंश जीवात्मा भी नित्य है तथा भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध भी नित्य है। अतः भगवत्प्राप्तिके सब मार्ग (योगमार्ग, ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग आदि) भी नित्य हैं (टिप्पणी प0 206)। यहाँ 'अव्ययम्' पदसे भगवान् कर्मयोगकी नित्यताका प्रतिपादन करते हैं।परमात्माके साथ जीवका स्वतःसिद्ध सम्बन्ध (नित्य-योग) है। जैसे पतिव्रता स्त्रीको पतिकी होनेके लिये करना कुछ नहीं पड़ता; क्योंकि वह पतिकी तो है ही, ऐसे ही साधकको परमात्माका होनेके लिये करना कुछ नहीं है, वह तो परमात्माका है ही; परन्तु अनित्य क्रिया, पदार्थ, घटना आदिके साथ जब वह अपनी सम्बन्ध मान लेता है, तब उसे 'नित्ययोग' अर्थात् परमात्माके साथ अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव नहीं होता। अतः उस अनित्यके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटानेके लिये कर्मयोगी शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि मिली हुई समस्त वस्तुओंको संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें लगा देता है। वह मानता है कि जैसे धूलका छोटा-से-छोटा कण भी विशाल पृथ्वीका ही एक अंश है ,ऐसे ही यह शरीर भी विशाल ब्रह्माण्डका ही एक अंश है। ऐसा माननेसे 'कर्म' तो संसारके लिये होंगे पर 'योग' (नित्ययोग) अपने लिये होगा अर्थात् नित्ययोगका अनुभव हो जायगा।\n\nभगवान् 'विवस्वते प्रोक्तवान्' पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता 3। 19) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए-- 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।' उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात बता रहा हूँ, वह कोई आजकी नयी बात नहीं है। जो योग सृष्टिके आदिसे अर्थात् सदासे है, उसी योगकी बात मैं तुम्हें बता रहा हूँ।\n\n प्रश्न-- भगवान्ने सृष्टिके आदिकालमें सूर्यको कर्म-योगका उपदेश क्यों दिया\n\n उत्तर-- (1) सृष्टिके आरम्भमें भगवान्ने सूर्यको ही कर्मयोगका वास्तविक अधिकारी जानकर उन्हें सर्वप्रथम इस योगका उपदेश दिया।\n\n(2) सृष्टिमें जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है, उसे ही उपदेश दिया जाता है; जैसे-- ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिमें प्रजाओँको उपदेश दिया (गीता 3। 10)। उपदेश देनेका तात्पर्य है-- कर्तव्यका ज्ञान कराना। सृष्टिमें सर्वप्रथम सूर्यकी उत्पत्ति हुई, फिर सूर्यसे समस्त लोक उत्पन्न हुए। सबको उत्पन्न करनेवाले (टिप्पणी प0 207.1) सूर्यको सर्वप्रथम कर्मयोगका उपदेश देनेका अभिप्राय उनसे उत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टिको परम्परासे कर्मयोग सुलभ करा देना था।\n\n(3) सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। उनसे ही सबको ज्ञान प्राप्त होता है एवं उनके उदित होनेपर प्रायः समस्त प्राणी जाग्रत् हो जाते हैं और अपने-अपने कर्मोंमें लग जाते हैं। सूर्यसे ही मनुष्योंमें कर्तव्य-परायणता आती है। सूर्यको सम्पूर्ण जगत्की आत्मा भी कहा गया है-- 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' (टिप्पणी प0 207.2)। अतः सूर्यको जो उपदेश प्राप्त होगा, वह सम्पूर्ण प्राणियोंको भी स्वतः प्राप्त हो जायगा। इसलिये भगवान्ने सर्वप्रथम सूर्यको ही उपदेश दिया।वास्तवमें नारायणके रूपमें उपदेश देना और सूर्यके रूपमें उपदेश ग्रहण करना जगन्नाट्यसूत्रधार भगवान्की एक लीला ही समझनी चाहिये, जो संसारके हितके लिये बहुत आवश्यक थी। जिस प्रकार अर्जुन महान् ज्ञानी नर-ऋषिके अवतार थे; परन्तु लोकसंग्रहके लिये उन्हें भी उपदेश लेनेकी आवश्यकता हुई, ठीक उसी प्रकार भगवान्ने स्वयं ज्ञानस्वरूप सूर्यको उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप संसारका महान् उपकार हुआ है, हो रहा है और होता रहेगा।'विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्'-- कर्मयोग गृहस्थोंकी खास विद्या है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-- इन चारों आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही मुख्य है; क्योंकि गृहस्थ-आश्रमसे ही अन्य आश्रम बनते और पलते हैं। मनुष्य गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए ही अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करके सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर सकता है। उसे परमात्मप्राप्तिके लिये आश्रम बदलनेकी जरूरत नहीं है। भगवान्ने सूर्य, मनु, इक्ष्वाकु आदि राजाओंका नाम लेकर यह बताया है कि कल्पके आदिमें गृहस्थोंने ही कर्मयोगकी विद्याको जाना और गृस्थाश्रममें रहते हुए ही उन्होंने कामनाओंका नाश करके परमात्म-तत्त्वको प्राप्त किया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन भी गृहस्थ थे। इसलिये भगवान् अर्जुनके माध्यमसे मानो सम्पूर्ण गृहस्थोंको सावधान (उपदेश) करते हैं कि तुमलोग अपने घरकी विद्या 'कर्मयोग' का पालन करके घरमें रहते हुए ही परमात्माको प्राप्त कर सकते हो, तुम्हें दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है।\n\nगृहस्थ होनेपर भी अर्जुन प्राप्त कर्तव्य-कर्म-(युद्ध-) को छोड़कर भिक्षाके अन्नसे जीविका चलानेको श्रेष्ठ मानते हैं (गीता 2। 5) अर्थात् अपने कल्याणके लिये गृहस्थ-आश्रमकी अपेक्षा संन्यास-आश्रमको श्रेष्ठ समझते हैं। इसलिये उपर्युक्त पदोंसे भगवान् मानो यह बताते हैं कि तुम भी राजघरानेके श्रेष्ठ गृहस्थ हो, कर्मयोग तुम्हारे घरकी खास विद्या है, इसलिये इसीका पालन करना तुम्हारे लिये श्रेयस्कर है। संन्यासीके द्वारा जो परमात्मतत्त्व प्राप्त किया जाता है, वही तत्त्व कर्मयोगी गृहस्थाश्रममें रहकर भी स्वाधीनतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। अतः कर्मयोग गृहस्थोंकी तो मुख्य विद्या है, पर संन्यास आदि अन्य आश्रमवाले भी इसका पालन करके परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है। अतः कर्मयोगका पालन किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, देश, काल आदिमें किया जा सकता है। किसी विद्यामें श्रेष्ठ और प्रभावशाली पुरुषोंका नाम लेनेसे उस विद्याकी महिमा प्रकट होती है, जिससे दूसरे लोग भी वैसा करनेके लिये उत्साहित होते हैं। जिन लोगोंके हृदयमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व है, उनपर ऐश्वर्यशाली राजाओंका अधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिये भगवान् सृष्टिके आदिमें होनेवाले सूर्यका तथा मनु आदि प्रभावशाली राजाओंके नाम लेकर कर्मयोगका पालन करनेकी प्रेरणा करते हैं।विशेष बातक्रियाओँ और पदार्थोंमें राग होनेसे अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे कर्मयोग नहीं हो पाता। गृहस्थमें रहते हुए भी सांसारिक भोगोंसे अरुचि (उपरति अथवा कामनाका अभाव) होती है। किसी भी भोगको भोगें, अन्तमें उस भोगसे अरुचि अवश्य उत्पन्न होती है --यह नियम है। आरम्भमें भोगकी जितनी रुचि (कामना) रहती है, भोग भोगते समय वह उतनी नहीं रह जाती, प्रत्युत क्रमशः घटते-घटते समाप्त हो जाती है; जैसे--मिठाई खानेके आरम्भमें उसकी जो रुचि होती है, वह उसे खानेके साथ-साथ घटती चली जाती है और अन्तमें उससे अरुचि हो जाती है। परन्तु मनुष्य भूल यह करता है कि वह उस अरुचिको महत्त्व देकर उसे स्थायी नहीं बनाता। वह अरुचिको ही तृप्ति (फल) मान लेता है। परन्तु वास्तवमें अरुचिमें थकावट अर्थात् भोगनेकी शक्तिका अभाव ही होता है।जिस रुचि या कामनाका किसी भी समय अभाव होता है वह रुचि या कामना वास्तवमें स्वयंकी नहीं होती। जिससे कभी भी अरुचि होती है, उससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता। जिससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध है, उस सत्-स्वरूप परमात्मतत्त्वकी ओर चलनेमें कभी अरुचि नहीं होती, प्रत्युत रुचि बढ़ती ही जाती है--यहाँतक कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर भी 'प्रेम' के रूपमें वह रुचि बढ़ती ही रहती है। 'स्वयं' भी सत्-स्वरूप है, इसलिये अपने अभावकी रुचि भी किसीकी नहीं होती।कर्म, करण (शरीर इन्द्रियाँ मन आदि) और उपकरण (पदार्थ अर्थात् कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री)--ये तीनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं, फिर इनसे मिलनेवाला फल कैसे नित्य होगा? वह तो नाशवान् ही होगा। अविनाशीकी प्राप्तिसे जो तृप्ति होती है, वह नाशवान् फलकी प्राप्तिसे कैसे हो सकती है? इसलिये साधकको कर्म, करण और उपकरण--तीनोंसे ही सम्बन्ध-विच्छेद करना है। इनसे सम्बन्ध-विच्छेद तभी होगा, जब साधक अपने लिये कुछ नहीं करेगा, अपने लिये कुछ नहीं चाहेगा और अपना कुछ नहीं मानेगा; प्रत्युत अपने कहलानेवाले कर्म, करण और उपकरण--इन तीनोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये इन्हें संसारका ही मानकर संसारकी ही सेवामें लगा देगा।कर्म करते हुए भी कर्मयोगीकी कर्मोंमें कामना, ममता और आसक्ति नहीं होती, प्रत्युत उनमें प्रीति और तत्परता होती है। कामना, ममता तथा आसक्ति अपवित्रता करनेवाली हैं और प्रीति तथा तत्परता पवित्रता करनेवाली हैं। कामना, ममता तथा आसक्तिपूर्वक किसी भी कर्मको करनेसे अपना पतन और पदार्थोंका नाश होता है तथा उस कर्मकी बार-बार याद आती है अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु प्रीति तथा तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे अपनी उन्नति और पदार्थोंका सदुपयोग होता है, नाश नहीं; तथा उस कर्मकी पुनः याद भी नहीं आती अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्यप्राप्त स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।कोई भी मनुष्य क्यों न हो, वह सुगमतापूर्वक मान सकता है कि जो कुछ मेरे पास है, वह मेरा नहीं है, प्रत्युत किसीसे मिला हुआ है; जैसे--शरीर माता-पितासे मिला है, विद्या-योग्यता गुरुजनोंसे मिली है, इत्यादि। तात्पर्य यह कि एक-दूसरेकी सहायतासे ही सबका जीवन चलता है। धनी-से-धनी व्यक्तिका जीवन भी दूसरेकी सहायताके बिना नहीं चल सकता। हमने किसीसे लिया है तो किसीको देना, किसीकी सहायता करना, सेवा करना हमारा भी परम कर्तव्य है। इसीका नाम कर्मयोग है। इसका पालन मनुष्यमात्र कर सकता है और इसके पालनमें कभी लेशमात्र भी असमर्थता तथा पराधीनता नहीं है।कर्तव्य उसे कहते हैं, जिसे सुखपूर्वक कर सकते हैं जिसे अवश्य करना चाहिये अर्थात् जो करनेयोग्य है और जिसे करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है। जो नहीं कर सकते, उसे करनेकी जिम्मेवारी किसीपर नहीं है और जिसे नहीं करना चाहिये, उसे करना ही नहीं है। जिसे नहीं करना चाहिये उसे न करनेसे दोअवस्थाएँ स्वतः आती हैं निर्विकल्प अवस्था अर्थात् कुछ न करना अथवा जिसे करना चाहिये उसे करना।कर्तव्य सदा निष्कामभावसे एवं परहितकी दृष्टिसे किया जाता है। सकामभावसे किया गया कर्म बन्धनकारक होता है, इसलिये उसे करना ही नहीं है। निष्कामभावसे किया जानेवाला कर्म फलकी कामनासे रहित होता है, उद्देश्यसे रहित नहीं। उद्देश्यरहित चेष्टा तो पागलकी होती है। फल और उद्देश्य--दोनोंमें अन्तर होता है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है, पर उद्देश्य नित्य होता है। उद्देश्य नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवका होता है, जिसके लिये मनुष्यजन्म हुआ है। अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे उस परमात्माका अनुभव नहीं होता। सकामभाव, प्रमाद, आलस्य आदि रहनेसे अपने कर्तव्यका पालन कठिन प्रतीत होता है।\n\nवास्तवमें कर्तव्य-कर्मका पालन करनेमें परिश्रम नहीं है। कर्तव्य-कर्म सहज, स्वाभाविक होता है; क्योंकि यह स्वधर्म है। परिश्रम तब होता है, जब अहंता, आसक्ति, ममता, कामनासे युक्त होकर अर्थात् 'अपने लिये' कर्म करते हैं। इसलिये भगवान्ने राजस कर्मको परिश्रमयुक्त बताया है (गीता 18। 24)।जैसे भगवान्के द्वारा प्राणिमात्रका हित होता है, ऐसे ही भगवान्की शक्ति भी प्राणिमात्रके हितमें निरन्तर लगी हुई है। जिस प्रकार आकाशवाणी-केन्द्रके द्वारा प्रसारित विशेष शक्तियुक्त ध्वनि सब जगह फैल जाती है, पर रेडियोके द्वारा जिस नंबरपर उस ध्वनिसे एकता (सजातीयता) होती है, उस नंबरपर वह ध्वनि पकड़में आ जाती है। इसी प्रकार जब कर्मयोगी स्वार्थभावका त्याग करके केवल संसारमात्रके हितके भावसे ही समस्त कर्म करता है, तब भगवान्की सर्वव्यापी हितैषिणी शक्तिसे उसकी एकता हो जाती है और उसके कर्मोंमें विलक्षणता आ जाती है। भगवान्की शक्तिसे एकता होनेसे उसमें भगवान्की शक्ति ही काम करती है और उस शक्तिके द्वारा ही लोगोंका हित होता है। इसलिये कर्तव्य-कर्म करनेमें न तो कोई बाधा लगती है और न परिश्रमका अनुभव ही होता है।कर्मयोगमें पराश्रयकी भी आवश्यकता नहीं है। जो परिस्थिति प्राप्त हो जाय, उसीमें कर्मयोगका पालन करना है। कर्मयोगके अनुसार किसीके कार्यमें आवश्यकता पड़नेपर सहायता कर देना 'सेवा' है; जैसे--किसीकी गाड़ी खराब हो गयी और वह उसे धक्का देनेकी कोशिश कर रहा है; अतः हम भी इस काममें उसकी सहायता करें, तो यह 'सेवा' है। जो जानबूझकर कार्यको खोज-खोजकर सेवा करता है ,वह कर्म करता है, सेवा नहीं; क्योंकि ऐसा करनेसे उसका उद्देश्य पारमार्थिक न रहकर लौकिक हो जाता है। सेवा वह है, जो परिस्थितिके अनुरूप की जाय। कर्मयोगी न तो परिस्थिति बदलता है और न परिस्थिति ढूँढता है। वह तो प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करता है। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।4.1।।श्री भगवानुवाच  यः अयं तव उदितो योगः स केवलं युद्धप्रोत्साहनाय इदानीम् उदित इति न मन्तव्यम्। मन्वन्तरादौ एव निखिलजगदुद्धरणाय परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया इमं योगम् अहम् एव विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् च मनवे मनुः इक्ष्वाकवे इति एवं सम्प्रदायपरम्परया प्राप्तम् इमं योगं पूर्वे राजर्षयो विदुः। स महता कालेन तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्याद् विनष्टप्रायः अभूत्।",
        "et": "4.1 - 4.2 The Lord said  This Karma Yoga declared to you should not be considered as having been taught now merely, for creating encouragement in you for war. I Myself had taught this Yoga to Vivasvan at the commencement of Manu's age as a means for all beings to attain release, which is man's supreme end. Vivasvan taught it to Manu, and Manu to Iksvaku. The royal sages of old knew this Yoga transmitted by tradition. Because of long lapse of time and because of the dullness of the intellect of those who heard it, it has been almost lost."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।4.1  4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्।  एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S  परम्परायातमपि K  परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति।  भक्तोऽसि मे सखा चेति।  त्वं भक्तः मत्परमः सखा च।  चशब्देन अन्वाचय उच्यते।  तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।",
        "et": "4.1 See Comment under 4.3"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।4.1।।कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें ( दूसरे और तीसरेमें ) कहा गया है जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है आगे सारी गीतामें भी भगावन्को योग शब्दसे यही ( ज्ञानयोग ) विवक्षित है इसलिये वेदके अर्थको ( ज्ञानयोगमें ) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस ( ज्ञाननिष्ठारूप योग ) की स्तुति करते हैं श्रीभगवान् बोले  जगत्प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था ( क्योंकि ) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं। इस योगका फल अविनाशी है इसलिये यह अव्यय है क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता। उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा।",
        "sc": "।।4.1।। इमम् अध्यायद्वयेनोक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परिपालयितृ़णां क्षत्रियाणां बलाधानाय तेन योगबलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम्। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते जगत् परिपालयितुमलम्। अव्ययम् अव्ययफलत्वात्। न ह्यस्य योगस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति। स च विवस्वान् मनवे प्राह। मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत्।।",
        "et": "4.1 In the beginning of creation, with a veiw to infusing vigour into the Ksatriyas who are the protectors of the world, aham, I; proktavan, imparted; imam, this; avyayam, imperishable; yogam, Yoga, presented in the (preceding) two chapters; vivasvate, to Vivasvan, the Sun. Being endowed with this power of Yoga, they would be able to protect the Brahmana caste. The protection of the world becomes ensured when the Brahmanas and the Ksatriyas are protected.\nIt (this Yoga) is avyayam, imperishable, because its result is undecaying. For, the result-called Liberation-of this (Yoga), which is characterized by steadfastness in perfect Illumination, does not decay. And he, Vivasvan, praha, taught (this); manave, to Manu. Manu abravit, transmitted (this); iksvakave, to Iksvaku, his own son who was the first king. [First king of the Iksvaku dynasty, otherwise known as the Solar dynasty.]"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।4.1  4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह  बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह  पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।4.1  4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच  इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह  स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।4.1।।यद्यपि पूर्वमुपेयत्वेन ज्ञानयोगस्तदुपायत्वेन च कर्मयोग इति द्वौ योगौ कथितौ तथाप्येकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यतीत्यनया दिशा साध्यसाधनयोः फलैक्यादैक्यमुपचर्य साधनभूतं कर्मयोगं साध्यभूतं च ज्ञानयोगमनेकविधगुणविधानाय स्तौति वंशकथनेन भगवान्  इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मनिष्ठोपायलभ्यं विवस्वते सर्वक्षत्रियवंशबीजभूतायादित्याय प्रोक्तवान् प्रकर्षेण सर्वसंदेहोच्छेदादिरूपेणोक्तवानहं भगवान् वासुदेवः सर्वजगत्परिपालकः। सर्गादिकाले राज्ञां बलाधानेन तदधीनं सर्व जगत्पालयितुम्। कथमनेन। बलाधानमिति विशेषणेन दर्शयति। अव्ययमव्ययवेदमूलत्वादव्ययमोक्षफलत्वाच्च न व्येति स्वफलादित्यव्ययमव्यभिचारिफलम्। तथाचैतादृशेन बलाधानं शक्यमिति भावः। सच मम शिष्यो विवस्वान् मनवे वैवस्वताय स्वपुत्राय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्। यद्यपि प्रतिमन्वन्तरं स्वायंभुवमन्वादिसाधारणोऽयं भगवदुपदेशस्तथापि सांप्रतिकवैवस्वतमन्वन्तराभिप्रायेणादित्यमारभ्य संप्रदायो गणितः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।4.1।।आविर्भावतिरोभावावाविष्कर्तुं स्वयं हरिः। तत्त्वंपदविवेकार्थं कर्मयोगं प्रशंसति।।1।।एवंतावदध्यायद्वयेन कर्मयोगोपायो ज्ञानयोगोपायश्च मोक्षसाधनत्वेनोक्तः तमेव ब्रह्मार्पणादिगुणविधानेन त्वंपदार्थविवेकादिना च प्रपञ्चयिष्यन्प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन्श्रीभगवानुवाच  इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययं इमं योगं पुराहं विवस्वते आदित्याय कथितवान् स च स्वपुत्राय मनवे श्राद्धदेवाय प्राह स च मनुः स्वपुत्रायेक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।4.1।।एवमध्यायद्वयेनोक्तस्य निष्ठाद्वयात्मकस्य वेदार्थस्य समाप्तिं मन्यमानः संप्रदायप्रदर्शनेन तं स्तुवन श्रीभगवानुवाच। इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं सांख्ययोगं कर्मयोगरुपोपायसहितं ससंन्यासं इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणं राज्ञामेव योग्यमित्यन्येषां व्याख्याने तु द्वितीयाध्यायार्थस्येदंशब्देनाग्रहणप्रसङ्गः। नचेष्टापत्तिः। अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेऽप्रामाण्यशङ्का माभूदिति। विद्यावंशसंप्रदायं दर्शयति इममित्यादिनेति स्वोक्तिविरोधात्। एतेन राज्ञामेव योग्यमित्यपि प्रत्युक्तम्। अध्यायद्वयेन प्रतिपादिते वेदार्थेऽग्रे विस्तरेण वक्ष्यमाणे ब्राह्मणादियोग्यताभावप्रसङ्गात्। सर्गादौ विवस्वते सूर्यायाहं श्रीकृष्णः प्रोक्तवान्। ब्रह्मपरिपालनसमर्थबलाधानाय। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते सर्वं जगद्रक्षितं भवति। अव्ययमव्ययफलत्वादिदं भाष्यमुपलक्षणं अव्ययवेदमूलत्वात्। न व्येति स्वफलादित्यव्ययं अव्यभिचारिफलमित्यस्यापि। यत्त्वव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायमिति तत्तु स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतपेति वाक्यशेषविरोधादुपेक्ष्यम्। सच विवस्वान्मनवे श्राद्धदेवाय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।4.1।।अथ चतुर्थसङ्गतिं वक्तुं तृतीयाध्यायार्थं सङ्ग्रहेणोद्गृह्णाति  तृतीयेऽध्याय इति।सहेतुकमिति  ज्ञानयोगकर्मयोगयोः सप्रमादत्वनिष्प्रमादत्वादिहेतुपूर्वकमित्यर्थः। एतेनअसक्त्या लोकरक्षायै गुणेष्वारोप्य कर्तृताम्। सर्वेश्वरे वा न्यस्योक्ता तृतीये कर्मकार्यता गी.सं.7 इति सङ्ग्रहश्लोकोऽपि व्याख्यातः। अशक्तस्य शक्तत्वेऽप्यप्रसिद्धस्य च स्वार्थनिपुणस्य कर्मयोग एव कार्यः प्रसिद्धस्य त्वशक्तस्य शक्तस्य वा स्वार्थं लोकरक्षार्थं च स एव कार्य इति तृतीयाध्यायेनाधिकारिचिन्तनं कर्मयोगस्य ज्ञानयोगाद्वैषम्यचिन्तनं च कृतमिति भावः। अथाधिकर्तव्यतयोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रामाणिकत्वं ज्ञानमिश्रत्वं स्वरूपं तद्वैविध्यं ज्ञानांशप्राधान्यं प्रासङ्गिको भगवदवतार इति षडर्था इहोच्यन्त इत्याह  चतुर्थेनेति। ननुप्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः कर्मणोऽकर्मताऽस्य च। भेदा ज्ञानस्य माहात्म्यं चतुर्थाध्याय उच्यते गी.सं.8 इति चत्वारोऽर्थाः सङ्गृहीताः तत्कथमत्र षडर्थानुकीर्तनम् उच्यते  प्रसङ्गात्स्वस्वभावोक्तिः इत्यत्र। सङ्गः प्रामाणिकत्वप्रसङ्गः।अस्य च भेदाः इत्यत्र स्वरूपमन्तरेण तद्भेदस्य दुर्ज्ञानत्वात्स्वरूपमपि विवक्षितम् चकारेण वा तत्समुच्चय इति सङ्ग्रहेऽपि षडर्था एव विवक्षिताः। स्वस्वभावोक्तिः स्वस्याकर्मवश्यावतारत्वादिस्वभावोक्तिः। कर्मणोऽकर्मता कर्मयोगस्यान्तर्गतज्ञानतया ज्ञानयोगाकारता ज्ञानस्य माहात्म्यं कर्मयोगान्तर्गतज्ञानांशस्य प्राधान्यम् एवं चतुर्थेन इत्यादिभाष्येणायमपि श्लोको व्याख्यातः। कर्तव्यता हि तृतीयाध्याये प्रोक्ता अतस्तद्दार्ढ्यभात्रमत्र पुरावृत्ताख्यानेन क्रियत इति  कर्तव्यतां द्रढयित्वेत्यस्य भावः। साक्षादध्यायार्थानां सङ्गतिं प्रदर्श्य प्रासङ्गिकं पुनराह  प्रसङ्गाच्चेति।इमं इति निर्देशपूर्वकमुपदेशपरम्पराकथनस्य तात्पर्यमाह  योऽयमित्यादिना मन्तव्यमित्यन्तेन। योगोऽत्र कर्मयोगः। अत्र ज्ञानयोगपरत्वेन परव्याख्यानं प्रकृतासङ्गतम्कुरु कर्म 4।15 इत्यादिवक्ष्यमाणविरुद्धं चेति भावः। मनोरपि जनयित्रे तदुपदेष्ट्रे च विवस्वते प्रोक्तत्वादर्जुनेन चादावित्यनुवदिष्यमाणत्वात्फलितमुक्तंमन्वन्तरादाविति।निखिलजगदुद्धरणायेति  न केवलं युद्धप्रोत्साहनार्थमर्जुनमात्रार्थं वा किन्तु समस्ताधिकारिवर्गापवर्गदानायेत्यर्थः। मन्वन्तरादावुपदेशात्तस्य निखिलजगत्साधारण्यं सूचितम्। नित्यसर्वज्ञे भगवति स्थितत्वादव्ययत्वम्। अथवा अव्ययत्वमिह फलद्वारा।इमं इति निर्देश्च पूर्वोक्तमोक्षसाधनत्वमप्यभिप्रैतीति ज्ञापनाय  परमेत्याद्युक्तम्। प्रागपि न फलान्तरार्थमुक्तमिति भावः।अहं प्रोक्तवान् इत्यनेन मन्वन्तरादौ महाकल्पारम्भे भारतसमरारम्भे वा मदन्यः कश्चिदस्य यथावज्ज्ञाता वक्ता च दुर्लभ इत्यभिप्रेतम्। प्रसङ्गादवश्यं ज्ञातव्यं स्वावतारयाथात्म्यं वक्तुं स्वस्य मन्वादिकालविरोधरूपशङ्कोत्थापनं च कृतमिति व्यञ्जनायअहमेवेत्युक्तम्।विवस्वते प्रोक्तवानिति  नह्ययमसुरादिभ्यो मयोपदिष्टो बुद्धाद्यागमार्थः किन्तु सर्ववेदात्मने विवस्वत इति भावः।विवस्वांश्च मनवे मनुरिक्ष्वाकव इति  यद्वै किञ्च मनुरवदत्तद्भेषजं तै.सं.2।2।62 इति सकलजगद्भेषजभूतवचनतया प्रसिद्धमर्यादाप्रवर्तनविशदाधिकृतकोटिनिविष्टपित्रादिक्रमेण ह्युपदेशपरम्परा प्राप्ता न तु सम्भवद्विप्रलम्भकुहकपाषण्ड्यादिसंसर्गप्रवृत्तेति भावः। एतत्सर्वंएवं सम्प्रदायपरम्परयेत्यनेन व्यक्तम्। परम्पराशब्देनेक्ष्वाकोरर्वाचीनानामपि ग्रहणात्कृतादियुगे सम्प्रदायाविच्छेदो विवक्षित इति चाभिप्रायः। इदानीं नाशस्याभिधानादत्रपूर्वे राजर्षय इत्युक्तम्।राजर्षयो विदुः  राजानो हि विस्तीर्णागाधमनसः तत्रापि ऋषित्वादतीन्द्रियार्थदर्शनक्षमाः ते च बहवः ते चाश्वपतिजनकाम्बरीषप्रभृतयः सर्वेऽप्यविगानेनेमं कर्मयोगमनुष्ठितवन्त इति भावः। कालदैघ्र्यस्य विच्छेदहेतुत्वप्रकारमिहशब्दसूचितमाह  तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्यादिति। इह विचित्राधिकारिपूर्णे जगति कृतत्रेतादिषु युगेषु कालक्रमेण बुद्धिशक्त्यनुष्ठानादयोऽपचीयमाना दृष्टाः श्रुताश्चेति भावः।नष्टः इत्यत्रात्यन्तविच्छेदो नाभिमतः व्यासभीष्माक्रूरादेरिदानीमपि विद्यमानत्वादित्यभिप्रायेणोक्तंविनष्टप्रायोऽभूदिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।4.1।।श्रीकृष्णाय नमः।कर्मसन्न्यासयोगस्य स्वस्मिन् योगो यथा भवेत्।तदर्थं कृपया कृष्णः कौन्तेयं प्रत्युवाच ह।।1।।कर्मसन्न्यासनिरूपणप्रश्नोद्गमार्थं पूर्वानुवादमाह  इममिति त्रयेण। अहमिमं योगं पूर्वोक्तं अव्ययं सफलं मत्सम्बन्धजनकत्वात् विवस्वते प्रोक्तवान्। लोकानुग्रहार्थं सोऽपि लोक एतत्प्राकट्यार्थं मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।4.1।।अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेप्रामाण्यशङ्का माभूदिति विद्यावंशसंप्रदायमात्मनश्च भ्रमविप्रलम्भकत्वादिनिरासायेश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं च दर्शयति  इममित्यादिना। इमं सांख्ययोगं कर्मयोगरूपोपायसहितं ससंन्यासमिति भाष्यं। इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणां राज्ञामेव योग्यं विवस्वते सूर्याय मण्डलाभिमानिने सर्वेषां क्षत्रियाणामादिभूतायाहमादित्यान्तर्यमीय एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धः प्रोक्तवान् पुरा। अव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायम्। तेनानादित्वमपि। मनवे स्वपुत्राय विवस्वान्प्राह। इक्ष्वाकवे मनुः स्वपुत्रायाब्रवीत्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The Personality of Godhead, Lord Śrī Kṛṣṇa, said: I instructed this imperishable science of yoga to the sun-god, Vivasvān, and Vivasvān instructed it to Manu, the father of mankind, and Manu in turn instructed it to Ikṣvāku.",
        "ec": " Herein we find the history of the Bhagavad-gītā traced from a remote time when it was delivered to the royal order of all planets, beginning from the sun planet. The kings of all planets are especially meant for the protection of the inhabitants, and therefore the royal order should understand the science of Bhagavad-gītā in order to be able to rule the citizens and protect them from material bondage to lust. Human life is meant for cultivation of spiritual knowledge, in eternal relationship with the Supreme Personality of Godhead, and the executive heads of all states and all planets are obliged to impart this lesson to the citizens by education, culture and devotion. In other words, the executive heads of all states are intended to spread the science of Kṛṣṇa consciousness so that the people may take advantage of this great science and pursue a successful path, utilizing the opportunity of the human form of life. In this millennium, the sun-god is known as Vivasvān, the king of the sun, which is the origin of all planets within the solar system. In the Brahma-saṁhitā (5.52) it is stated: yac-cakṣur eṣa savitā sakala-grahāṇāṁ rājā samasta-sura-mūrtir aśeṣa-tejāḥ yasyājñayā bhramati sambhṛta-kāla-cakro govindam ādi-puruṣaṁ tam ahaṁ bhajāmi “Let me worship,” Lord Brahmā said, “the Supreme Personality of Godhead, Govinda [Kṛṣṇa], who is the original person and under whose order the sun, which is the king of all planets, is assuming immense power and heat. The sun represents the eye of the Lord and traverses its orbit in obedience to His order.” The sun is the king of the planets, and the sun-god (at present of the name Vivasvān) rules the sun planet, which is controlling all other planets by supplying heat and light. He is rotating under the order of Kṛṣṇa, and Lord Kṛṣṇa originally made Vivasvān His first disciple to understand the science of Bhagavad-gītā . The Gītā is not, therefore, a speculative treatise for the insignificant mundane scholar but is a standard book of knowledge coming down from time immemorial. In the Mahābhārata ( Śānti-parva 348.51–52) we can trace out the history of the Gītā as follows: tretā-yugādau ca tato vivasvān manave dadau manuś ca loka-bhṛty-arthaṁ sutāyekṣvākave dadau ikṣvākuṇā ca kathito vyāpya lokān avasthitaḥ “In the beginning of the millennium known as Tretā-yuga this science of the relationship with the Supreme was delivered by Vivasvān to Manu. Manu, being the father of mankind, gave it to his son Mahārāja Ikṣvāku, the king of this earth planet and forefather of the Raghu dynasty, in which Lord Rāmacandra appeared.” Therefore, Bhagavad-gītā existed in human society from the time of Mahārāja Ikṣvāku. At the present moment we have just passed through five thousand years of the Kali-yuga, which lasts 432,000 years. Before this there was Dvāpara-yuga (800,000 years), and before that there was Tretā-yuga (1,200,000 years). Thus, some 2,005,000 years ago, Manu spoke the Bhagavad-gītā to his disciple and son Mahārāja Ikṣvāku, the king of this planet earth. The age of the current Manu is calculated to last some 305,300,000 years, of which 120,400,000 have passed. Accepting that before the birth of Manu the Gītā was spoken by the Lord to His disciple the sun-god Vivasvān, a rough estimate is that the Gītā was spoken at least 120,400,000 years ago; and in human society it has been extant for two million years. It was respoken by the Lord again to Arjuna about five thousand years ago. That is the rough estimate of the history of the Gītā, according to the Gītā itself and according to the version of the speaker, Lord Śrī Kṛṣṇa. It was spoken to the sun-god Vivasvān because he is also a kṣatriya and is the father of all kṣatriyas who are descendants of the sun-god, or the sūrya-vaṁśa kṣatriyas. Because Bhagavad-gītā is as good as the Vedas, being spoken by the Supreme Personality of Godhead, this knowledge is apauruṣeya, superhuman. Since the Vedic instructions are accepted as they are, without human interpretation, the Gītā must therefore be accepted without mundane interpretation. The mundane wranglers may speculate on the Gītā in their own ways, but that is not Bhagavad-gītā as it is. Therefore, Bhagavad-gītā has to be accepted as it is, from the disciplic succession, and it is described herein that the Lord spoke to the sun-god, the sun-god spoke to his son Manu, and Manu spoke to his son Ikṣvāku."
    }
}
