{
    "_id": "BG3.40",
    "chapter": 3,
    "verse": 40,
    "slok": "इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते |\nएतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||३-४०||",
    "transliteration": "indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate .\netairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||3-40||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.40।। इन्द्रियाँ,  मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं;  यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.40 The senses, the mind and the intellect are said to be its seat; through these it deludes the embodied by veiling his wisdom.",
        "ec": "3.40 इन्द्रियाणि the senses? मनः the mind? बुद्धिः the intellect? अस्य its? अधिष्ठानम् seat? उच्यते is called? एतैः by these? विमोहयति deludes? एषः this? ज्ञानम् wisdom? आवृत्य having enveloped? देहिनम् the embodied.Commentary If the abode of the enemy is known it is ite easy to kill him. So Lord Krishna like a wise army general points out to Arjuna the abode of desire so that he may be able to attack it and kill it ite readily."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.40 It works through the senses, the mind and the reason; and with their help destroys wisdom and confounds the soul."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.40।। मन की शान्ति और सन्तोष को लूट ले जाने वाले शत्रु काम के पहचाने जाने पर एक सैनिक के समान राजकुमार अर्जुन की अपने शत्रु के निवास स्थान के विषय में जानने की इच्छा थी। अध्यात्म के उपदेशक के रूप में भगवान् को यह बताना आवश्यक था कि यह काम कौन से स्थान पर रहकर अपनी अत्यन्त दुष्ट योजनाएँ बनाता है। कामना का निवास स्थान है इन्द्रियाँ मन और बुद्धि।बड़े विस्तृत क्षेत्र में अपराध करने वाले दस्यु दल के सरदार के एक से अधिक रहने के स्थान होते हैं जहाँ से वह पूरे दल का संचालन करता है। यहाँ भी कामनारूप शत्रु के स्थानों का स्पष्ट निर्देश किया गया है।बिना किसी नियन्त्रण एवं संयम के इन्द्रियां यदि विषयों में संचार करती हैं तो वे इच्छा के निवास के लिए प्रथम उपयुक्त स्थान हैं। इन्द्रियों के माध्यम से विषय की संवेदनाएँ मन में पहुंचने पर वह भी कामनाजन्य दुखों की उत्पत्ति के लिए उपयुक्त क्षेत्र का कार्य करता है। और अन्त में पूर्व विषयोपभोग की स्मृति से रंजित आसक्तियों से युक्त बुद्धि कामना का तीसरा सुरक्षित वासस्थान है।अविद्या से मोहित जीव शरीर के साथ तादात्म्य करके विषयोपभोग चाहता है। अविवेकपूर्वक मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य करके भावनाओं एवं विचारों की सन्तुष्टि की वह इच्छा करता है।इन स्थानों पर इच्छा को खोजना माने शत्रु का सामना करना है। अन्त में शत्रु नाश कैसे करना है इसका वर्णन आगे के श्लोकों में किया गया है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.40. It basis is said to be the sense-organs, the mind and the intellect.  With these it deludes the embodied by concealing knowledge."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.40 The senses, the mind and the intellect are said to be its instruments. By these it overpowers the embodied self after enveloping Its knowledge."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.40 The organs, mind, and the intellect are said to be its abode. This one diversely deludes the embodied being by veiling Knowledge with the help of these."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.40  3.41।।वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह  इन्द्रियाणीति। एतैर्ज्ञानमावृत्त्य बुद्ध्यादिभिर्हि विषयगैर्ज्ञानमावृतं भवति। हृताधिष्ठानो  हि शत्रुर्नश्यति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.40।।कामस्य निराश्रयस्य कार्यकरकत्वाभावं मत्वा प्रश्नपूर्वकमाश्रयं दर्शयति   किमधिष्ठान इति। कामस्य नित्यवैरित्वेन परिजिहीर्षितस्य किमित्यधिष्ठानं ज्ञाप्यते तत्राह  ज्ञाते हीति। इन्द्रियादीनां कामाधिष्ठानत्वं प्रकटयति  एतैरिति। नन्वेताभिरिति वक्तव्ये कथमेतैरित्युच्यते तत्राह  इन्द्रियादिभिरिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.40।। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वास-स्थान कहे गये हैं। यह काम इन- (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-) के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको मोहित करता है।",
        "hc": "3.40।। व्याख्या--'इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते'-- काम पाँच स्थानोंमें दीखता है (1) पदार्थोंमें (गीता 3। 34), (2) इन्द्रियोंमें, (3) मनमें, (4) बुद्धिमें और (5) माने हुए अहम् (मैं) अर्थात् कर्तामें (गीता 2। 51)। इन पाँच स्थानोंमें दीखनेपर भी काम वास्तवमें माने हुए 'अहम्'-(चिज्जडग्रन्थि-) में ही रहता है। परन्तु उपर्युक्त पाँच स्थानोंमें दिखायी देनेके कारण ही वे इस कामके वास-स्थान कहे जाते हैं।समस्त क्रियाएँ शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिसे ही होती हैं। ये चारों कर्म करनेके साधन हैं। यदि इनमें काम रहता है तो वह परमार्थिक कर्म नहीं होने देता। इसलिये कर्मयोगी निष्काम, निर्मम और अनासक्त होकर शरीर, इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करता है (गीता 5। 11)।वास्तवमें काम अहम्-(जड-चेतनके तादात्म्य-) में ही रहता है। अहम् अर्थात् 'मैं'-पन केवल माना हुआ है। मैं अमुक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदायवाला हूँ- यह केवल मान्यता है। मान्यताके सिवाय इसका दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। इस माने हुए सम्बन्धमें ही कामना रहती है। कामनासे ही सब पाप होते हैं। पाप तो फल भुगताकर नष्ट हो जाते हैं, पर 'अहम्' से कामना दूर हुए बिना नये-नये पाप होते रहते हैं। इसलिये कामना ही जीवको बाँधनेवाली है। महाभारतमें कहा है--'कामबन्धनमेवैकं नान्यदस्तीह बन्धनम्।'\nकामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते।।(शान्तिपर्व 251। 7)'जगत्में कामना ही एकमात्र बन्धन है, दूसरा कोई बन्धन नहीं है। जो कामनाके बन्धनसे छूट जाता है, वह ब्रह्मभाव प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।''एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्'-- कामनाके कारण मनुष्यको जो करना चाहिये, वह नहीं करता और जो नहीं करना चाहिये, वह कर बैठता है। इस प्रकार कामना देहाभिमानी पुरुषको मोहित कर देती है।\n\nदूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि कामनासे क्रोध उत्पन्न होता है-- 'कामात् क्रोधोऽभिजायते' (2। 62) और क्रोधसे सम्मोह (अत्यन्त मूढ़भाव) उत्पन्न होता है-- 'क्रोधाद्भवति सम्मोहः' (2। 63)। इससे यह समझना चाहिये कि कामनामें बाधा पहुँचनेपर तो क्रोध उत्पन्न होता है, पर यदि कामनामें बाधा न पहुँचे, तो कामनासे लोभ और लोभसे सम्मोह उत्पन्न होता है (टिप्पणी प0 197.1)। तात्पर्य यह कि कामनासे पदार्थन मिले तो 'क्रोध' उत्पन्न होता है और पदार्थ मिले तो 'लोभ' उत्पन्न होता है। उनसे फिर 'मोह' उत्पन्न होता है। कामना रजोगुणका कार्य है और मोह तमोगुणका कार्य। रजोगुण और तमोगुण पास-पास रहते हैं (टिप्पणी प0 197.2)। अतः काम क्रोध लोभ और मोह पासपास ही रहते हैं। काम इन्द्रियों मन और बुद्धिके द्वारा देहाभिमानी पुरुषको मोहित (बेहोश) कर देता है। इस प्रकारकाम रजोगुणका कार्य होते हुए भी तमोगुणका कार्यमोह हो जाता है।कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य पहले इन्द्रियोंसे भोग भोगनेकी कामना करता है। पहले तो भोग-पदार्थ मिलते नहीं और मिल भी जायँ तो टिकते नहीं। इसलिये उन्हें किसी तरह प्राप्त करनेके लिये वह मनमें तरह-तरहकी कामनाएँ करता है। बुद्धिमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये तरह-तरहके उपाय सोचता है। इस प्रकार कामना पहले इन्द्रियोंको संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें लगाती है। फिर इन्द्रियाँ मनको अपनी ओर खींचती हैं और उसके बाद इन्द्रियाँ और मन मिलकर बुद्धिको भी अपनी ओर खींच लेते हैं। इस तरह काम देहाभिमानीके ज्ञानको ढककर इन्द्रियोँ, मन और बुद्धिके द्वारा उसे मोहित कर देता है तथा उसे पतनके गड्ढेमें डाल देता है।यह सिद्धान्त है कि नौकर अच्छा हो, पर मालिक तिरस्कारपूर्वक उसे निकाल दे तो फिर उसे अच्छा नौकर नहीं मिलेगा। ऐसे ही मालिक अच्छा हो, पर नौकर उसका तिरस्कार कर दे तो फिर उसे अच्छा मालिक नहीं मिलेगा। इसी प्रकार मनुष्य परमात्मप्राप्ति किये बिना शरीरको सांसारिक भोग और संग्रहमें ही खो देता है तो फिर उसे मनुष्यशरीर नहीं मिलेगा। अच्छी वस्तुका तिरस्कार होता है अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे और अन्तःकरण अशुद्ध होता है कामनासे। इसलिये सबसे पहले कामनाका नाश करना चाहिये।\n\n'देहिनम् विमोहयति'--पदोंका तात्पर्य यह है कि यह काम देहाभिमानी पुरुषको ही मोहित करता है। शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेवाला ही देहाभिमानी होता है। भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ही देह (शरीर) और देही (शरीरी--आत्मा) का विवेचन किया है (गीता 2। 11--30)। देह और देही दोनों अलग-अलग हैं-- यह सबका अनुभव है। यह काम ज्ञानको ढककर देहाभिमानी(देहसे अपना सम्बन्ध माननेवाले) को बाँधता है देही(शुद्ध स्वरूप) को नहीं। जो देहके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता उसे यह बाँध नहीं सकता। देहको'मैं' 'मेरा' और 'मेरे लिये' माननेसे ही मनुष्य उत्पत्ति-विनाशशील जड वस्तुओंको महत्त्व देता है; जिससे उसमें जडताका राग उत्पन्न हो जाता है। राग उत्पन्न होनेपर जडतासे सम्बन्ध हो जाता है। जडतासे सम्बन्ध होनेपर ही कामनाकी उत्पत्ति होती है। कामना उत्पन्न होनेपर जीव मोहित होकर संसार-बन्धनमें बँध जाता है।\n\n सम्बन्ध-- अब आगेके तीन श्लोकोंमें भगवान् कामको मारनेका प्रकार बताते हुए उसे मारनेकी आज्ञा देते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.40।।अधितिष्ठति एभिः अयं कामः आत्मानम् इति इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः अस्य अधिष्ठानम्। एतैः इन्द्रियमनोबुद्धिभिः कामाधिष्ठानभूतैः विषयप्रवणैः देहिनं प्रकृतिसंसृष्टं ज्ञानम् आवृत्य विमोहयति  विविधं मोहयति आत्मज्ञानविमुखं विषयानुभवपरं करोति इत्यर्थः।",
        "et": "3.40 The senses, the mind and the intellect are the instruments of desire in so far as it overpowers the self through them. By means of these, viz., the senses, the mind and the intellect, which have been reduced to the position of servants through attachment to sense objects, desire deludes the embodied soul caught up in Prakrti by covering up Its knowledge. Here 'deluding' means making the self a victim of manifold illusions, by turning It away from the knowledge of Its true nature, and making It indulge in sensuous experiences."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.40।।इन्द्रियाणीति।  आदाविन्द्रियेषु  व्यापृतेषु  सत्सु तिष्ठति।  यथा चक्षुषा शत्रुः दृष्टः इन्द्रियप्रदेशेएव क्रोधमात्मनो जनयति।  ततो मनसि संकल्पे ततो बुद्धौ निश्चये एतद्द्वारेण मोहं जनयन् ज्ञानंनाशयति।",
        "et": "3.40 Indriyani etc.  In the beginning, it stands on the sense organs at work.  For example, when an enemy is sighted with eyes, he generates wrath about himself at the very place of the perceiver's  sense-organ,  then in the mind i.e., fancy,  then in the intellect, i.e., resolve; and producing delusion in this way, it destroys knowledge.\t\t\t\t\t\t\t\t\t\n [The Lord]  speaks of the means for avoiding this foe as :"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.40।।ज्ञानको आच्छादित करनेवाला होनेके कारण जो सबका वैरी है वह काम कहाँ रहनेवाला है अर्थात् उसका आश्रय क्या है क्योंकि शत्रुके रहनेका स्थान जान लेनेपर सहजमें ही उसका नाश किया जा सकता है। इसपर कहते हैं  इन्द्रियाँ मन और बुद्धि यह सब इस कामके अधिष्ठान अर्थात् रहनेके स्थान बतलाये जाते हैं। यह काम इन आश्रयभूत इन्द्रियादिके द्वारा ज्ञानको आच्छादित करके इस जीवात्माको नाना प्रकारसे मोहित किया करता है।",
        "sc": "।।3.40।। इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च अस्य कामस्य अधिष्ठानम् आश्रयः उच्यते। एतैः इन्द्रियादिभिः आश्रयैः विमोहयति विविधं मोहयतिएष कामः ज्ञानम् आवृत्य आच्छाद्य देहिनं शरीरिणम्।।यतः एवम्",
        "et": "3.40 Indriyani, the organs; manah, mind; and buddhih, the intellect; ucyate, are said to be; asya, its, desire's; adhisthanam, abode. Esah, this one, desire; vimohayati, diversely deludes; dehinam, the embodied being; avrtya, by veiling; jnanam, Knowledg; etaih, with the help of these, with the organs etc. which are its abodes. [The activities of the organs etc. are the media for the expression of desire. Desire covers the Knoweldge of the Self by stimulating these.]"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.40  3.41।।इन्द्रियाणि इत्यादिकमपृष्टं किमर्थमुच्यत इत्यत आह  वधार्थमिति। एतदर्थमेव ह्यर्जुनेन बलवान् पृष्टः क्रियाद्वयश्रवणात् किं प्रतीन्द्रियादीनां करणत्वमिति न प्रतीयते। सन्निधानाद्विमोहनं प्रतीत्यन्यथा च प्रतीयतेऽत आह  एतैरिति। तदुपपादयति  बुद्ध्यादिभिरिति। इन्द्रियादित्वेनोक्तानमपिबुद्ध्यादित्वेन ग्रहणं प्राधान्यज्ञापनार्थम्। तस्मात्त्वमितीन्द्रियाणां निग्रहः कामहननायोपदिश्यते। तदुपपादयति  हृतेति। नश्यति नाशयितुं शक्यो भवति।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.40  3.41।।अधुना तस्याधिष्ठानं वदन् जयोपायमाह  इन्द्रियाणीति द्वाभ्याम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.40।।ज्ञाते हि शत्रोरधिष्ठाने सुखेन स जेतुं शक्यत इति तदधिष्ठानमाह  इन्द्रियाणि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धग्राहकाणि श्रोत्रादीनिं वचनादानगमनविसर्गानन्दजनकानि वागादीनि च मनः संकल्पात्मकं बुद्धिरध्यवसायात्मिका च अस्य कामस्याधिष्ठान्माश्रयं उच्यते। यत एत एतैरिन्द्रियादिभिः स्वस्वव्यापारवद्भिराश्रयैर्विमोहयति विविधं मोहयति। एष कामो ज्ञानं विवेकज्ञानमावृत्याच्छाद्य देहिनं देहाभिमानिनम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.40।।इदानीं तस्याधिष्ठानं कथयञ्जयोपायमाह  इन्द्रियाणीति द्वाभ्याम्। विषयदर्शनश्रवणादिभिः संकल्पेनाध्यवसायेन च कामस्याविर्भावादिन्द्रियाणि च मनश्च बुद्धिश्चास्याधिष्ठानमुच्यते। एतैरिन्द्रियादिभिर्दर्शनादिव्यापारवद्भिराश्रयभूतैर्विवेकज्ञानमावृत्य देहिनं विमोहयति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.40।।सुखेन शत्रुं नाशयितुं तदधिष्ठानं किमित्यर्जुनाकाङ्क्षायामाह  इन्द्रियाणीति। इन्द्रियादीन्यस्य कामस्याधिष्ठानमाश्रय उच्यते। एतैराश्रयैर्विवेकेज्ञानमावृत्य जीवं विधिधं मोहयति। यत्तु ज्ञानं चिदात्मकमिति तन्न उक्तयुक्तेः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.40।।एवमावरणप्रकार उक्तः अथावरणोपकरणान्यनन्तरं नियन्तव्यत्वोपदेशायोच्यन्त इत्यभिप्रायेणाह  कैरिति।आत्मानमधितिष्ठति स्वतन्त्रमात्मानमाक्रम्य परतन्त्रं करोतीत्यर्थः। इन्द्रियशब्दोऽत्र गोबलीवर्दन्यायाद्बाह्येन्द्रियपरः। बुद्धिरत्रापुरुषार्थेषु पुरुषार्थत्वाध्यवसायः। प्रकृतानुपयुक्ताधिकरणादिव्युदासाय करणव्युत्पत्तिं दर्शयति  अधितिष्ठत्येभिरिति। एतैर्विमोहयतीति ह्युच्यत इति भावः। अधिष्ठानक्रियाकरणभूतानामिन्द्रियादीनां अवान्तरव्यापारप्रदर्शनायविषयप्रवणैरित्युक्तम्।प्रकृतिसंसृष्टमिति देहिशब्देनेन्द्रियादेरवर्जनीयत्वं गुणवश्यत्वं च सूच्यत इति भावः। विशब्दःअनात्मन्यात्मबुद्धिर्या अस्वे स्वमिति या मतिः वि.पु.6।7।11 इत्याद्युक्तभ्रान्तिवैविध्यपर इत्यभिप्रायेणाह  विविधं मोहयतीति। भ्रान्तिवैविध्यं भोग्येस्वात्मन्यभोग्यताभ्रमेण भोग्येषु च विषयेषु भोग्यताभ्रमेण विवृण्वन् प्रकृतोपयोगित्वं च दर्शयति  आत्मज्ञानेति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.40।।स कामः कुत्र तिष्ठतीति जिज्ञासार्थमाहुः  इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि मनोऽन्तःकरणं बुद्धिर्ज्ञानमस्य कामस्याधिष्ठानं स्थानमुच्यते कथ्यते। एतैः करणभूतैर्ज्ञानमावृत्य एष कामो देहिनं विशेषेण मोहयति। स्वयं तु मोहयत्येव पुनरेतैः स्वाश्रयभूतैः सहितोऽधिकं मोहयतीत्युपसर्गेण व्यज्यते।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.40।।किंच  इन्द्रियाणीति। अयमर्थः  इन्द्रियमनोबुद्धयो हि कामेनाधिष्ठिता बाह्यार्थप्रवणा भवन्ति। तैश्च तथाभूतैरयं कामो ज्ञानं चिदाकाशरूपमादर्शतलप्रख्यम्। यत्र योगिनो व्यवहितं विप्रकृष्टमतीतमनागतं वा पश्यन्ति। यथोक्तमाचार्यैःविश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतम्। पश्यन्त्यात्मनि इति निजान्तर्गतं शरीरान्तर्गतं आत्मनि हार्दाकाशाख्ये ब्रह्मणि तत् मलेनादर्शमिवावृत्य देहिनं देहाभिमानिनं विशेषेण मोहयति। विशब्दाद्देहाभिमानशून्यं योगिनमपि व्युत्थानावस्थायां किंचिन्मोहयतीति गम्यत इति। अक्षरयोजना स्पष्टा।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The senses, the mind and the intelligence are the sitting places of this lust. Through them lust covers the real knowledge of the living entity and bewilders him.",
        "ec": " The enemy has captured different strategic positions in the body of the conditioned soul, and therefore Lord Kṛṣṇa is giving hints of those places, so that one who wants to conquer the enemy may know where he can be found. Mind is the center of all the activities of the senses, and thus when we hear about sense objects the mind generally becomes a reservoir of all ideas of sense gratification; and, as a result, the mind and the senses become the repositories of lust. Next, the intelligence department becomes the capital of such lustful propensities. Intelligence is the immediate next-door neighbor of the spirit soul. Lusty intelligence influences the spirit soul to acquire the false ego and identify itself with matter, and thus with the mind and senses. The spirit soul becomes addicted to enjoying the material senses and mistakes this as true happiness. This false identification of the spirit soul is very nicely explained in the Śrīmad-Bhāgavatam (10.84.13) : yasyātma-buddhiḥ kuṇape tri-dhātuke sva-dhīḥ kalatrādiṣu bhauma ijya-dhīḥ yat-tīrtha-buddhiḥ salile na karhicij janeṣv abhijñeṣu sa eva go-kharaḥ “A human being who identifies this body made of three elements with his self, who considers the by-products of the body to be his kinsmen, who considers the land of birth worshipable, and who goes to the place of pilgrimage simply to take a bath rather than meet men of transcendental knowledge there is to be considered like an ass or a cow.”"
    }
}
