{
    "_id": "BG3.37",
    "chapter": 3,
    "verse": 37,
    "slok": "श्रीभगवानुवाच |\nकाम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः |\nमहाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ||३-३७||",
    "transliteration": "śrībhagavānuvāca .\nkāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ .\nmahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam ||3-37||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.37।। श्रीभगवान् ने कहा -- रजोगुण में उत्पन्न हुई यह 'कामना' है,  यही क्रोध है; यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है, इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.37 The Blessed Lord said  It is desire, it is anger both of the ality of Rajas, all-devouring, all-sinful; know this as the foe here (in this world).",
        "ec": "3.37 कामः desire? एषः this? क्रोधः anger? एषः this? रजोगुणसमुद्भवः born of the Rajoguna? महाशनः alldevouring? महापाप्मा allsinful? विद्धि know? एनम् this? इह here? वैरिणम् the foe.Commentary Bhagavan Bhaga means the six attributes? viz.? Jnana (knowledge)? Vairagya (dispassion)? Kirti (fame)? Aishvarya (divine manifestations and excellences)? Sri (wealth)? and Bala (might). He who possesses these six attributes and who has a perfect knowledge of the origin and the end of the universe is Bhagavan or the Lord.The cause of all sin and wrong action in this world is desire. Anger is desire itself. When a desire is not gratified? the man becomes angry against those who stand as obstacles on the path of fulfilment.The desire is born of the ality of Rajas. When desire arises? it generates Rajas and urges the man to work in order to possess the object. Therefore? know that this desire is mans foe on this earth. (Cf.XVI.21)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.37 Lord Shri Krishna: It is desire, it is aversion, born of passion. Desire consumes and corrupts everything. It is man's greatest enemy."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.37।। यह काम यह क्रोध  काम अर्थात् इच्छा ही मनुष्य के ह्रदय में स्थित राक्षस है। आत्म अज्ञान ही बुद्धि में इच्छा रूप में व्यक्त होता है। इस श्लोक में काम और क्रोध इन दोनों को भिन्न नहीं समझना चाहिये। किसी परिस्थिति विशेष में काम ही क्रोध का रूप ले लेता है। मन का वह विक्षेप जो किसी वस्तु को प्राप्त करने की अत्यन्त अधीरता के रूप में व्यक्त होता है काम कहलाता है। सामान्यत इच्छा अपने से भिन्न किसी अप्राप्त वस्तु के लिये ही होती हैं। जगत् में असंख्य व्यक्तियों और परिस्थितियों के मध्य सदैव इच्छा का पूर्ण होना सम्भव नहीं होता और इस प्रकार हमारे और इच्छित वस्तु के बीच कोई विघ्न आता है तो प्रतिहत इच्छा ही क्रोध का रूप ले लेती है।इस प्रकार काम अथवा क्रोध ही वह राक्षस है जो हमें परिस्थितियों के साथ समझौता करने को विवश कर देता है। आदर्शों को भुलाकर हमें पापाचरण में प्रवृत्त करता है। हमारी निम्न कोटि की इच्छायें जितनी प्रबल होगी उतना ही पापपूर्णं हमारा जीवन होगा। कामनाएं हमारे विवेक को आच्छादित कर देती हैं। काम के उत्पन्न होने पर उससे ही असंख्य प्रकार की दुखदायक वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन सब के वश में होना अज्ञान और उनके ऊपर शासन करना ज्ञान है।अब भगवान् दृष्टांतों के द्वारा समझाते हैं कि किस प्रकार हमारा शत्रु यह काम हमारे विवेक को आच्छादित करता है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.37. The Bhagavat said  This desire,  this wrath,  born of the Rajas-Strand, is a swallower of festival [and] a mighty bestower of  sins.  Know this to be the enemy here."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.37 The Lord said  It is desire, it is wrath, born of the Guna of Rajas; it is a great devourer, an impeller to sin. Know this to be the foe here."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.37 The Blessed Lord said  This desire, this anger, born of the ality of rajas, is a great devourer, a great sinner. Know this to be the enemy here."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.37।।यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः। क्रोधोऽप्येष एव तज्जन्यत्वात्।कामात्क्रोधोऽभिजायते 2।62 इति ह्युक्तम्। यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधः तत्रापि भक्तिनिमित्तानिन्दाकामनिमित्त एव। ये त्वन्यथा वदन्ति ते सङ्गरान्न सूक्ष्मं जानन्ति। उक्तं चऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते च कथञ्चन इति। महाशनः महद्धि कामभोग्यम्। महाब्रह्महत्यादिकारणत्वात् महापाप्मा। सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद्वैरीं।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.37।।संप्रति प्रतिवचनं प्रस्तौति  शृण्विति। तस्य वैरित्वं स्फोरयति  सर्वेति। अप्रस्तुतं किमिति प्रस्तूयते तत्राह  यं त्वमिति। भगवच्छब्दार्थं निर्धारयितुं पौराणिकं वचनमुदाहरति  ऐश्वर्यस्येति। समग्रस्येत्येतत्प्रत्येकं विशेषणैः संबध्यते अथशब्दस्तथाशब्दपर्यायः समुच्चयार्थः। मोक्षशब्देन तदुपायो ज्ञानं विवक्ष्यते। उदाहृतवचसस्तात्पर्यमाह  ऐश्वर्यादीति। स वाच्यो भगवानिति संबन्धः। तत्रैव पौराणिकं वाक्यान्तरं पठति  उत्पत्तिमिति। भूतानामिति प्रत्येकमुत्पत्त्यादिभिः संबध्यते। कारणार्थौ चोत्पतिप्रलयशब्दौ क्रियामात्रस्य पुरुषान्तरगोचरत्वसंभवात्। आगतिर्गतिश्चेत्यागामिन्यौ संपदापदौ सूच्येते। वाक्यान्तरस्यापि तात्पर्यमाह  उत्पत्त्यादीति। वेत्तीत्युक्तः साक्षात्कारो विज्ञानमित्युच्यते समग्रैश्वर्यादिसंपत्तिसमुच्चयार्थश्चकारः। उक्तलक्षणो भगवान्किमुक्तवानिति तदाह  काम इति। कामस्य सर्वलोकशत्रुत्वं विशदयति  यन्निमित्तेति। तथापि कथं तस्यैव क्रोधत्वं तदाह  स एष इति। कामक्रोधयोरेव हेयत्वद्योतनार्थं कारणं कथयति  रजोगुणेति। कारणद्वारा कामादेरेव हेयत्वमुक्त्वा कार्यद्वारापि तस्य हेयत्वं सूचयति  रजोगुणस्येति। कामस्य पुरुषप्रवर्तकत्वमेव न रजोगुणजनकत्वमित्याशङ्क्याह  कामो हीति। तत्रैवानुभवानुसारिणीं लोकप्रसिद्धिं प्रमाणयति  तृष्णया हीति। तस्य योग्यायोग्यविभागमन्तरेण बहुविषयत्वं दर्शयति  महाशन इति। बहुविषयत्वप्रयुक्तं कर्म निर्दिशति  अत इति। सर्वविषयत्वेऽपि कुतोऽस्य पापत्वमित्याशङ्क्याह  कामेनेति। कामस्योक्तविशेषणवत्त्वे फलितमाह  अत इति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.37।। श्रीभगवान् बोले - रजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।",
        "hc": "3.37।। व्याख्या--'रजोगुणसमुद्भवः'-- आगे चौदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि तृष्णा (कामना) और आसक्तिसे रजोगुण उत्पन्न होता है और यहाँ यह कहते हैं कि रजोगुणसे काम उत्पन्न होता है। इससे यह समझना चाहिये कि रागसे काम उत्पन्न होता है और कामसे राग बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक पदार्थोंको सुखदायी माननेसे राग उत्पन्न होता है, जिससे अन्तःकरणमें उनका महत्त्व दृढ़ हो जाता है। फिर उन्हीं पदार्थोंका संग्रह करने और उनसे सुख लेनेकी कामना उत्पन्न होती है। पुनः कामनासे पदार्थोंमें राग बढ़ता है। यह क्रम जबतक चलता है, तबतक पाप-कर्मसे सर्वथा निवृत्ति नहीं होती।\n\n'काम एष क्रोध एषः'-- मेरी मनचाही हो-- यही काम है (टिप्पणी प0 188.1)। उत्पत्ति-विनाशशील जड-पदार्थोंके संग्रहकी इच्छा, संयोगजन्य सुखकी इच्छा, सुखकी आसक्ति--ये सब कामके ही रूप हैं।\nपाप-कर्म कहीं तो 'काम' के वशीभूत होकर और कहीं 'क्रोध' के वशीभूत होकर किया गया दीखता है। दोनोंसे अलग-अलग पाप होते हैं। इसलिये दोनों पद दिये। वास्तवमें काम अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना, प्रियता, आकर्षण ही समस्त पापोंका मूल है (टिप्पणी प0 188.2)। कामनामें बाधा लगनेपर काम ही क्रोधमें परिणत हो जाता है। इसलिये भगवान्ने एक कामनाको ही पापोंका मूल बतानेके लिये उपर्युक्त पदोंमें एकवचनका प्रयोग किया है।\n\nकामनाकी पूर्ति होनेपर 'लोभ' उत्पन्न होता होता है (टिप्पणी प0 188.3) और कामनामें बाधा पहुँचानेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर)क्रोध उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला अपनेसे अधिक बलवान् हो तो 'क्रोध' उत्पन्न न होकर 'भय' उत्पन्न होता है। इसलिये गीतामें कहीं-कहीं कामना और क्रोधके साथ-साथ भय की भी बात आयी है; जैसे-- 'वीतरागभयक्रोधाः' (4। 10) और 'विगतेच्छाभयक्रोधः' (5। 28)।कामनासम्बन्धी विशेष बात\n\nकामना सम्पूर्ण पापों, सन्तापों, दुःखों आदिकी जड़ है। कामनावाले व्यक्तिको जाग्रत्में सुख मिलना तो दूर रहा, स्वप्नमें भी कभी सुख नहीं मिलता-- 'काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं' (मानस 7। 90। 1)। जो चाहते हैं, वह न हो और जो नहीं चाहते, वह हो जाय-- इसीको दुःख कहते हैं। यदि 'चाहते' और 'नहीं चाहते' को छोड़ दें, तो फिर दुःख है ही कहाँ ! नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा ही कामना कहलाती है। अविनाशी परमात्माकी इच्छा कामनाके समान प्रतीत होती हुई भी वास्तवमें 'कामना' नहीं है; क्योंकि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंकी कामना कभी पूरी नहीं होती, प्रत्युत बढ़ती ही रहती है, पर परमात्माकी इच्छा (परमात्मप्राप्ति होनेपर) पूरी हो जाती है। दूसरी बात, कामना अपनेसे भिन्न वस्तुकी होती है और परमात्मा अपनेसे अभिन्न हैं। इसी प्रकार सेवा (कर्मयोग), तत्त्वज्ञान (ज्ञानयोग) और भगवत्प्रेम-(भक्तियोग-) की इच्छा भी 'कामना' नहीं है। परमात्मप्राप्तिकी इच्छा वास्तवमें जीवनकी वास्तविक आवश्यकता (भूख) है। जीवको आवश्यकता तो परमात्माकी है, पर विवेकके दब जानेपर वह नाशवान् पदार्थोंकी कामना करने लगता है।एक शङ्का हो सकती है कि कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा? इसका समाधान यह है कि संसारका कार्य वस्तुओंसे, क्रियाओंसे चलता है, मनकी कामनासे नहीं। वस्तुओंका सम्बन्ध कर्मोंसे होता है, चाहे वे कर्म पूर्वके (प्रारब्ध) हों अथवा वर्तमानके (उद्योग)। कर्म बाहरके होते हैं और कामनाएँ भीतरकी। बाहरी कर्मोंका फल भी (वस्तु, परिस्थिति आदिके रूपमें) बाहरी होता है।कामना सम्बन्ध फल-(पदार्थ, परिस्थिति आदि-) की प्राप्तिके साथ है ही नहीं। जो वस्तु कर्मके अधीन है, वह कामना करनेसे कैसे प्राप्त हो सकती है? संसारमें देखते ही हैं कि धनकी कामना होनेपर भी लोगोंकी दरिद्रता नहीं मिटती। जीवन्मुक्त महापुरुषोंको छोड़कर शेष सभी व्यक्ति जीनेकी कामना रखते हुए ही मरते हैं। कामना करें या न करें, जो फल मिलनेवाला है, वह तो मिलेगा ही। तात्पर्य यह है कि जो होनेवाला है वह तो होकर ही रहेगा और जो नहीं होनेवाला है वह कभी नहीं होगा, चाहे उसकी कामना करें या न करें। जैसे कामना न करनेपर भी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, ऐसे ही कामना न करनेपर अनुकूल परिस्थिति भी आयेगी ही। रोगकी कामना किये बिना भी रोग आता है और कामना किये बिना भी नीरोगता रहती है। निन्दा-अपमानकी कामना न करनेपर भी निन्दा-अपमान होते हैं और कामना किये बिना भी प्रशंसा-सम्मान होते हैं। जैसे प्रतिकूल परिस्थिति कर्मोंका फल हैं, ऐसे ही अनकूल परिस्थिति भी कर्मोंका ही फल है, इसलिये वस्तु, परिस्थिति आदिका प्राप्त होना अथवा न होना कर्मोंसे सम्बन्ध रखता है, कामनासे नहीं।कामना तात्कालिक सुखकी भी होती है और भावी सुखकी भी। भोग और संग्रहकी इच्छा तात्कालिक सुखकी कामना है और कर्मफलप्राप्तिकी इच्छा भावी सुखकी कामना है। इन दोनों ही कामनाओंमें दुःख-ही-दुःख है। कारण कि कामना केवल वर्तमानमें ही दुःख नहीं देती, प्रत्युत भावी जन्ममें कारणं होनेसे भविष्यमें भी दुःख देती है। इसलिये इन दोनों ही कामनाओंका त्याग करना चाहिये।कर्म और विकर्म (निषिद्धकर्म)--दोनों ही कामनाके कारण होते हैं। कामनाके कारण 'कर्म' होते हैं और कामनाके अधिक बढ़नेपर 'विकर्म' होते हैं। कामनाके कारण ही असत्में आसक्ति दृढ़ होती है। कामना न रहनेसे असत्से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।कामना पूरी हो जोनेपर हम उसी अवस्थामें आ जाते हैं जिस अवस्थामें हम कामना उत्पन्न होनेसे पहले थे। जैसे, किसीके मनमें कामना उत्पन्न हुई कि मेरेको सौ रुपये मिल जायँ। इसके पहले उसके मनमें सौ रुपयेपानेकी कामना नहीं थी; अतः अनुभवसे सिद्ध हुआ कि कामना उत्पन्न होने-वाली है। जबतक सौ रुपयोंकी कामना उत्पन्न नहीं हुई थी, तबतक 'निष्कामता' की स्थिति थी। उद्योग करनेपर यदि प्रारब्धवशात् सौ रुपये मिल जायँ तो वहीनिष्कामताकी स्थिति पुनः आ जाती है। परन्तु सांसारिक सुखासक्तिके कारण वह स्थिति ठहरती नहीं और नयी कामना उत्पन्न हो जाती है कि मेरेको हजार रुपये मिल जायँ। इस प्रकार नतो कामना पूरी होती है और न पूरी तृप्ति ही होती है। कोरे परिश्रमके सिवा कुछ हाथ नहीं लगता !'काम' अर्थात् सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। थोड़ा गहरा विचार करें कि वास्तवमें कामना छूटती ही नहीं अथवा टिकती ही नहीं? पता लगेगा कि वास्तवमें कामना टिकती ही नहीं ! वह तो निरन्तर मिटती ही जाती है; किन्तु मनुष्य नयी-नयी कामनाएँ करके उसे बनाये रखता है। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तुका मिटना अवश्यम्भावी है। इसलिये कामना स्वतः मिटती है। अगर मनुष्य नयी कामना न करे तो पुरानी कामना कभी पूरी होकर और कभी न पूरी होकर स्वतः मिट जाती है।कामनाकी पूर्ति सभीके और सदाके लिये नहीं है परन्तु कामनाका त्याग सभीके लिये और सदाके लिये है। कारण कि कामना अनित्य और त्याग नित्य है। निष्काम होनेमें कठिनाई क्या है? हम निर्मम नहीं होते, यही कठिनाई है। यदि हम निर्मम हो जायँ तो निष्काम होनेकी शक्ति आ जायगी और निष्काम होनेसे असङ्ग होनेकी शक्ति आ जायगी। जब निर्ममता, निष्कामता और असङ्गता आ जाती है, तब निर्विकारता, शान्ति और स्वाधीनता स्वतः आ जाती है।एक मार्मिक बातपर ध्यान दें। हम कामनाओंका त्याग करना बड़ा कठिन मानते हैं। परन्तु विचार करें कि यदि कामनाओंका त्याग करना कठिन है तो क्या कामनाओंकी पूर्ति करना सुगम है? सब कामनाओंकी पूर्ति संसारमें आजतक किसीको नहीं हुई। हमारी तो बात ही क्या भगवान्के बाप-(दशरथजी-) की भी कामना पूरी नहीं हुई! अतः कामनाओंकी पूर्ति होना असम्भव है। पर कामनाओंका त्याग करना असम्भव नहीं है। यदि हम ऐसा मानते हैं कि कामनाओंका त्याग करना कठिन है, तो कठिन बात भी असम्भव बात-(कामनाओकी पूर्ति-) की अपेक्षा सुगम ही पड़ती है; क्योंकि कामनाओंका त्याग तो हो सकता है, पर कामनाओंकी पूर्ति हो ही नहीं सकती। इसलिये कामनाओंकी पूर्तिकी अपेक्षा कामनाओंका त्याग करना सुगम ही है। गलती यही होती है कि जो कार्य कर नहीं सकते उसके लिये उद्योग करते हैं और जो कार्य कर सकते हैं उसे करते ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंका त्याग करना चाहिये, जो कि वह कर सकता है।कामनाओंके चार भेद हैं --(1) शरीर-निर्वाहमात्रकी आवश्यक कामनाको पूरा कर दे (टिप्पणी प0 190.1)।\n(2) जो कामना व्यक्तिगत एवं न्याययुक्त हो और जिसको पूरा करना हमारी सामर्थ्यसे बाहर हो, उसको भगवान्के अर्पण करके मिटा दे (टिप्पणी प0 190.2)।\n\n(3) दूसरोंकी वह कामना पूरी कर दे, जो न्याययुक्त और हितकारी हो तथा जिसको पूरी करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो। इस प्रकार दूसरोंकी कामना पूरी करनेपर हमारेमें कामनात्यागकी सामर्थ्य आती है।\n\n(4) उपर्युक्त तीनों प्रकारकी कामनाओंके अतिरिक्त दूसरी सब कामनाओंको विचारके द्वारा मिटा दे।'महाशनो महापाप्मा'-- कोई वैरी ऐसा होता है, जो भेंट-पूजा अथवा अनुनय-विनयसे शान्त हो जाता है, पर यह 'काम' ऐसा वैरी है, जो किसीसे भी शान्त नहीं होता। इस कामकी कभी तृप्ति नहीं होती-- बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषयभोग बहु घी ते।।(विनयपत्रिका 198)जैसे धन मिलनेपर धनकी बढ़ती ही चली जाती है ऐसे ही ज्यों-ज्यों भोग मिलते हैं, त्यों-ही-त्यों कामना बढ़ती ही चली जाती है। इसलिये कामनाको 'महाशनः' कहा गया है।कामना ही सम्पूर्ण पापोंका कारण है। चोरी, डकैती, हिंसा आदि समस्त पाप कामनासे ही होते हैं। इसलिये कामनाको 'महापाप्मा' कहा गया है।कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे, अपने स्वरूपसे और अपने इष्ट-(भगवान्-) से विमुख हो जाता है और नाशवान् संसारके सम्मुख हो जाता है। नाशवान्के सम्मुख होनेसे पाप होते हैं और पापोंके फलस्वरूप नरकों तथा नीच योनियोंकी प्राप्ति होती है।संयोगजन्य सुखकी कामनासे ही संसार सत्य प्रतीत होता है और प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरादि पदार्थ स्थिर दिखायी देते हैं। सांसारिक पदार्थोंको स्थिर माननेसे ही मनुष्य उनसे सुख भोगता है और उनकी इच्छा करता है। सुख-भोगके समय संसारकी क्षणभङ्गुरताकी ओर दृष्टि नहीं जाती और मनुष्य भोगको तथा अपनेको भी स्थिर देखता है। जो प्रतिक्षण मर रहा है-- नष्ट हो रहा है, उस संसारसे सुख लेनेकी इच्छा कैसे हो सकती है? पर 'संसार प्रतिक्षण मर रहा है' इस जानकारीका तिरस्कार करनेसे ही सांसारिक सुखभोगकी इच्छा होती है। चलचित्र-(सिनेमा-) में पके हुए अंगूर देखनेपर भी उन्हें खानेकी इच्छा नहीं होती, यदि होती है तो सिद्ध हुआ कि हमने उसे स्थिर माना है। परिवर्तनशील संसारको स्थिर माननेसे वास्तवमें जो स्थिर तत्त्व है, उस परमात्मतत्त्व की तरफ अथवा अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं। उधर दृष्टि न जानेसे मनुष्य उससे विमुख होकर नाशवान् सुख-भोगमें फँस जाता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तविक तत्त्वसे विमुख हुए बिना कोई सांसारिक भोग भोगा ही नहीं जा सकता और रागपूर्वक सांसारिक भोग भोगनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो ही जाता है।भोगबुद्धिसे सांसारिक भोग भोगनेवाला मनुष्य हिंसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। वह अपनी भी हिंसा (पतन) करता है और दूसरोंकी भी। जैसे, कोई मनुष्य धनका संग्रह करके उससे भोगोंको भोगता है, तो उसे देखकर निर्धनोंके हृदयमें धन और भोगोंके अभावका विशेष दुःख होता है, यह उनकी हिंसा हुई। भोगोंको भोगकर वह स्वयं अपनी भी हिंसा (पतन) करता है; क्योंकि स्वयं परमात्माका चेतन अंश होते हुए भी जड-(धन-) को महत्त्व देनेसे वह वस्तुतः जडका दास हो जाता है, जिससे उसका पतन हो जाता है। संसारके सब भोगपदार्थ सीमित होते हैं; अतः मनुष्य जितना भोग भोगता है, उतना भोग दूसरोंके हिस्सेसे ही आता है। हाँ, शरीर-निर्वाहमात्रके लिये पदार्थोंको स्वीकार करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। शरीर-निर्वाहमें भी शास्त्रोंमें केवल अपने लिये भोग भोगनेका निषेध है। अपने माता, पिता, गुरु, बालक, स्त्री, वृद्ध आदिको शरीर-निर्वाहके पदार्थ पहले देकर फिर स्वयं लेने चाहिये।\n\nभोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला पुरुष अपना तो पतन करता है, भोग्य वस्तुओंका दुरुपयोग करके उनका नाश करता है, और अभावग्रस्त पुरुषोंकी हिंसा करता है; परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुषके विषयमें यह बात लागू नहीं होती। उसके द्वारा हिंसारूप पाप नहीं होता; क्योंकि उसमें भोगबुद्धि नहीं होती और उसके द्वारा निष्कामभावसे निर्वाहमात्रके लिये शास्त्रविहित क्रियाएँ होती हैं (गीता 4। 21 18। 17)। उस महापुरुषके उपयोगमें आने-वाली वस्तुओंका विकास होता है, नाश नहीं अर्थात् उसके पास आनेपर वस्तुओंका सदुपयोग होता है, जिससे वे सार्थक हो जाती हैं। जबतक संसारमें उस महापुरुषका कहलानेवाला शरीर रहता है, तबतक उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक प्राणियोंका उपकार होता रहता है। शरीर-निर्वाहमात्रकी आवश्यकता 'महाशनः' और 'महापाप्मा' नहीं है। कारण कि शरीर-निर्वाहमात्रकी आवश्यकताकामना नहीं है। आवश्यकताकी पूर्ति होती है; जैसे-- भूख लगी और भोजन करनेसे तृप्ति होगयी। परन्तु कामनाकी वृद्धि होती है।'विद्ध्येनमिह वैरिणम्'-- यद्यपि वास्तवमें सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग होनेपर ही सुख-शान्तिका अनुभव होता है, तथापि मनुष्य अज्ञानवश पदार्थोंसे सुखका होना मान लेता है। इस प्रकार मनुष्यने पदार्थोंकी कामनाको सुखका कारण मानकर उसे अपना मित्र और हितैषी मान रखा है। इस मान्यताके कारण कामना कभी मिटती नहीं। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि इस कामनाको अपना मित्र नहीं, प्रत्युत वैरी जानो। कामना मनुष्यकी वैरी इसलिये है कि यह मनुष्यके विवेकको ढककर उसे पापोंमें प्रवृत्त कर देती है।संसारके सम्पूर्ण पापों, दुःखों, नरकों आदिके मूलमें एक कामना ही है। इस लोक और परलोकमें जहाँ कहीं कोई दुःख पा रहा है ,उसमें असत्की कामना ही कारण है। कामनासे सब प्रकारके दुःख होते हैं और सुख कोई-सा भी नहीं होता।विशेष बातकामको नष्ट करनेका मुख्य और सरल उपाय है-- दूसरोंकी सेवा करना, उन्हें सुख पहुँचाना। अन्य शरीरधारी तो दूसरे हैं ही, अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राण भी दूसरे ही हैं। अतः इनका निर्वाह भी सेवाबुद्धिसे करना है, भोगबुद्धिसे नहीं। इनसे सुख नहीं लेना है।\n\nकर्मयोगमें स्थूलशरीरसे होनेवाली 'क्रिया', सूक्ष्म-शरीरसे होनेवाला 'चिन्तन' और कारण-शरीरसे होनेवाली 'स्थिरता'--तीनों ही अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत संसारके लिये ही हैं। कारण कि स्थूल-शरीरकी स्थूल-संसारके साथ, सूक्ष्म-शरीरकी सूक्ष्म-संसारके साथ और कारण-शरीरकी कारण-संसारके साथ एकता है। अतः शरीर, पदार्थ और क्रियासे दूसरोंकी सेवा करना तो उचित है, पर अपनेमें सेवकपनका अभिमान करना अनुचित है। सूक्ष्म-शरीरसे परहित-चिन्तन करना तो उचित है, पर उससे सुख लेना अनुचित है। कारणशरीरसे स्थिर होना तो उचित है, पर स्थिरताका सुख लेना अनुचित है (टिप्पणी प0 192)। इस प्रकार सुख न लेनेसे फलकी आसक्ति मिट जाती है, फलकी आसक्ति मिटनेपर कर्मकी आसक्ति सुगमतापूर्वक मिट जाती है।मेरा आदेश चले; अमुक व्यक्ति मेरी आज्ञामें चले; अमुक वस्तु मेरे काम आ जाय; मेरी बात रह जाय--ये सब कामनाके ही स्वरूप हैं। उत्पत्ति-विनाशशील (असत्) संसारसे कुछ लेनेकी कामना महान् अनर्थ करनेवाली है। दूसरोंकी न्याययुक्त कामना-(जिसमें दूसरेका हित हो और जिसे पूर्ण करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो-) को पूरी करनेसे अपनेमें कामनाके त्यागका बल आ जाता है। दूसरोंकी कामना पूरी न भी कर सकें तो भी हृदयमें पूरी करनेका भाव रहना ही चाहिये।तादात्म्य--अहंता (अपनेको शरीर मानना), ममता (शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना) और कामना (अमुक वस्तु मिल जाय-- ऐसा भाव--) इन तीनोंसे ही जीव संसारमें बँधता है। तादात्म्यसे परिच्छिन्नता, ममतासे विकार और कामनासे अशान्ति पैदा होती है। कामनाके त्यागसे ममता और ममताके त्यागसे तादात्म्य मिटता है। कर्मयोगी सिद्धान्तसे इनमें किसीके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता; क्योंकि वह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहम्, पदार्थ आदि किसीको भी अपना और अपने लिये नहीं मानता, वह इन शरीरादिको केवल संसारका और संसारकी सेवाके लिये ही मानता है, जो कि वास्तवमें है।किसीको भी दुःख न देनेका भाव होनेपर सेवाका आरम्भ हो जाता है। अतः साधकके अन्तःकरणमें किसीको भी दुःख न हो'--यह भाव निरन्तर रहना चाहिये। भूलसे अपने कारण किसीको दुःख हो भीजाय तो उससे क्षमा माँग लेनी चाहिये। वह क्षमा न करे तो भी कोई डर नहीं। कारण कि सच्चे हृदयसे क्षमा माँगनेवालेकी क्षमा भगवान्की ओरसे स्वतः होती है। सेवा करनेमें साधक सदा सावधान रहे कि कहीं सेवाके बदलेमें कुछ लेनेका भाव उसमें न आ जाय। इस प्रकार सेवा करनेसे 'कामरूप' वैरी सुगमतापूर्वक नष्ट हो जाता है।\n\n सम्बन्ध-- 'यह पाप है'--ऐसी जानकारी होनेपर भी मनुष्य पापमें प्रवृत्त हो जाता है; अतः इस जानकारीका प्रभाव आचरणमें न आनेका क्या कारण है ? इसका विवेचन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.37।।श्रीभगवानुवाच  अस्य उद्भवाभिभवरूपेण वर्तमानगुणमयप्रकृतिसंसृष्टस्य प्रारब्धज्ञानयोगस्य रजोगुणसमुद्भवः प्राचीनवासनाजनितः शब्दादिविषयः अयं कामो महाशनः शत्रुः सर्वविषयेषु एनम् आकर्षति। एष एव प्रतिहतगतिः प्रतिहननहेतुभूतचेतनान् प्रति क्रोधरूपेण परिणतो महापाप्मा परहिंसादिषु प्रवर्तयति एनं रजोगुणसमुद्भवं सहजं ज्ञानयोगविरोधिनं वैरिणं विद्धि।",
        "et": "3.37 The Lord said  The highly ravenous desire is born of the Guna Rajas originating from old subtle impressions. It has for its objects sound and other sense contacts. It is a foe to him who is practising Jnana Yoga, as he is joined with Prakrti constituted of the Gunas which rise and subside periodically. It attracts him towards the objects of the senses. It is this desire alone which, when hampered, develops into anger towards those persons who are the cause of such hindrance. It is a powerful cause of sin. It incites the aspirant to do harm to others. Know this, which is born of the Guna called Rajas, as the natural enemy of Jnana Yogins."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.37।।अत्र उत्तरं सत्यपि धर्मे हृदिस्थे आगन्तुकावरणकृतोऽयं (N  काचरणकृ  ) विप्लवो न तु तदभवकृतः (N तदभावप्लुतः) इत्याशयेन।काम एष इति।  द्वाभ्यामेतच्छब्दाभ्यामनयोरत्यन्तावैषम्यं (S अत्यन्तवैषम्यम्) सूच्यते।  एतौ च कामक्रोधौ नित्यसंबन्धिनौ अन्योन्याविनाभावेन वर्तेते इत्येकरुपतयैव व्याचष्टे।  एष च महस्य सुखस्य अशनः ग्रासकारकः महतः पापस्य हेतुत्त्वाच्च क्रोध एव पापदायी।  एनं च वैरिणं प्राज्ञो जानीयात्।",
        "et": "3.37 Kama esah etc.  A total absence of difference among these two (desire and wrath)  is indicated by the word esah  'this'  twice uttered.  These desire and wrath are ever interrelated and remain in an inseparable mutual co-existence.   Hence [the Lord]  well describes them only  as identical.  This is  a swallower i.e.,  a devouer of the morsel  of festival i.e.,   the happiness.   The wrath alone is a bestower of sins as it is the cause of great sins.  This is man of intelligence  should view to be an enemy."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.37।।यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है वहीं यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है इसलिये क्रोध भी यही है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है। तथा रजोगुणके कार्य  सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है इत्यादि। तथा यह काम बहुत खानेवाला है। इसलिये महापापी भी है क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है। इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान।",
        "sc": "।।3.37।।  ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीरणा (विष्णु पु0 6।5।74) ऐश्वर्यादिषट्कं यस्मिन् वासुदेवे नित्यमप्रतिबद्धत्वेन सामस्त्येन च वर्तते उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति (विष्णु प0 6।5।78) उत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवः वाच्यः भगवान् इति।।काम एषः सर्वलोकशत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्। स एष कामः प्रतिहतः केनचित् क्रोधत्वेन परिणमते। अतः क्रोधः अपि एष एव रजोगुणसमुद्भवः रजश्च तत् गुणश्च रजोगुणः सः समुद्भवः यस्य सः कामः रजोगुणसमुद्भवः रजोगुणस्य वा समुद्भवः। कामो हि उद्भूतः रजः प्रवर्तयन् पुरुषं प्रवर्तयति तृष्णया हि अहं कारितः इति दुःखिनां रजःकार्ये सेवादौ प्रवृत्तानां प्रलापः श्रूयते। महाशनः महत् अशनं अस्येति महाशनः अत एव महापाप्मा कामेन हि प्रेरितः जन्तुः पापं करोति। अतः विद्धि एनं कामम् इह संसारे वैरिणम्।।कथं वैरी इति दृष्टान्तैः प्रत्याययति",
        "et": "3.37 Esah, this; kamah, desire, is the enemy of the whole world, because of which the creatures incur all evil. This desire when obstructed in any way turns into anger. Therefore, krodhah, anger, is also identical with this (desire). It is rajoguna-samudbhavah, born of the ality of rajas; or, it is the origin of the ality of rajas. For, when desire comes into being, it instigates a person by arousing rajas. People who are engaged in service etc., which are effects of rajas, and who are stricken with sorrow are heard to lament, 'I have been led to act by desire indeed!' It is mahaasanah, a great devourer, whose food is enormous. And hence, indeed, it is maha-papma, a great sinner. For a being commits sin when goaded by desire. Therefore, viddhi, know; enam, this desire; to be vairinam, the enemy; iha, here in this world.\nWith the help of examples the Lord explains how it is an enemy:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.37।।बलवद्विषयश्चेत् प्रश्नः तर्हि परिहारो न सङ्गच्छत इत्यतः परिहारं व्याचष्टे  यस्त्विति। प्रवर्तकः पापेषु पुरुषः त्वया पृष्ट इति शेषः। एवं योजनायां क्रोधस्यापि कामसाम्यं स्यात् तथा चोत्तरत्र कामस्यैवानुवृत्तिर्विरुद्ध्येतेत्यतःक्रोध एषः इत्येतदन्यथा व्याचष्टे  क्रोधोऽपीति। किं काम एव मुख्यया वृत्त्यैवमुच्यते नेति ब्रूमः किन्तूपचारेण इति भावेनाह   तदिति। तदेव कुतः इत्यत आह  कामादिति। नायमस्ति नियमः यदा गुरुनिन्दादिश्रवणे निन्दकाय क्रुद्ध्यति तदा कामाभावेऽपि क्रोधोदयदर्शनात् इत्यत आह  यत्रापीति। भक्तिनिमित्तश्चासावनिन्दाकामश्चेति विग्रहः।सङ्गात्सञ्जायते कामः 2।62 इत्येतद्दर्शयितुं भक्तिनिमित्तेत्युक्तम्।काम एव (एषः) केनचित् प्रतिहतः क्रोधत्वेन परिणमते इति परेषां (शङ्करादीनां) व्याख्यानं दूषयति  ये त्विति। एकान्तःकरणोपादानत्वलक्षणादानन्तर्यलक्षणाच्च सङ्करात्सूक्ष्मं कामक्रोधयोरत्यन्तभेदम्। न हि गुणो गुणस्योपादानं किन्तु निमित्तमेव प्रागन्वये प्रमाणमुक्तं इदानीं व्यतिरेकेऽप्याह  उक्तं चेति। महाशन इति कामे दुर्घटत्वाद्गौणमित्याह  महाशन इति। भोग्यं विषयः। यस्मात्कामभोग्यं महत्तस्मादसौ महाशन इत्यर्थः।काम एषः इति पापकारणत्वेनोक्त्वा कथं महापाप्मेत्युच्यते इत्यतो न कर्मधारयोऽयम् किन्तु महान्पाप्मा यस्मादिति बहुव्रीहिरिति भावेनाह  महाब्रह्मेति। महच्छब्दात्परतः पापशब्दोऽध्याहार्यः। वधादिकर्तृत्वाभावात्कथं वैरित्वं इत्यत आह  सर्वेति सर्वः सम्पूर्णः पुरुषार्थो मोक्षः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.37।।तत्रोत्तरम्  काम एष इति। रागपूर्वावतारः कामः तत्तदिच्छास्वरूप एवात्र हेतुः प्रवर्त्तकः द्वेषपूर्वावतारश्च तत्परिणामभूतः क्रोध एवाऽवसेयः। रजोगुणसमुद्भवः काम एव क्रोधस्तमोगुणसमुद्भव इति यद्यपि युक्तं वक्तुं तथापि परिणामे तमसो हेतुत्वादेवं नोक्तं अतएव कामानुज इत्युच्यते। कामश्च तदग्रजो बुद्धिनाशनो दुष्पूरो महापाप इति तेन बलादेव नियोजितः सर्वकर्मकारीति प्रायो राजसं तामसं रागं द्वेषं तद्धेतुकं पापं वैरिणमित्युत्तरपक्षार्थः। अत्र क्रोधस्याप्युपक्रमे यत्कामस्यैव वैरित्वकथनं तत्पार्थस्य युद्धोपस्थितौ तत्तद्बन्धुजीवनादिकामत्वाभिप्रायेणेति बोध्यम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.37।।एवमर्जुनेनः पृष्टेअथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुषः इतिआत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय इत्यादिश्रुतिसिद्धमुत्तरं श्रीभगवानुवाच। यस्त्वया पृष्टो हेतुर्बलादनर्थमार्गे प्रवर्तकः स एष कामएव महान् शत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्। ननु क्रोधोऽप्यभिचारादौ प्रवर्तको दृष्ट इत्यत आह  क्रोध एषः। काम एव केनचिद्धेतुना प्रतिहतः क्रोधत्वेन परिणमते अतः क्रोधोऽप्येष काम एव। एतस्मिन्नेव महावैरिणि निवारिते सर्वपुरुषार्थप्राप्तिनित्यर्थः। तन्निवारणोपायज्ञानाय तत्कारणमाह  रजोगुणसमुद्भवः दुःखप्रवृत्तिबलात्मको रजोगुण एव समुद्भवः कारणं यस्य। अतः कारणानुविधायित्वात्कार्यस्य सोऽपि तथा। यद्यपि तमोगुणोऽपि तस्य कारणं तथापि दुःखे प्रवृत्तो च रजसएव प्राधान्यात्तस्यैव निर्देशः। एतेन सात्विक्या वृत्त्या रजसि क्षीणे सोऽपि क्षीयत इत्युक्तम्। अथवा तस्य कथमनर्थमार्गे प्रवर्तकत्वमित्यत आह  रजोगुणस्य प्रवृत्त्यादिलक्षणस्य समुद्भवो यस्मात्। कामो हि विषयाभिलाषात्मकः स्वयमुद्भूतो रजः प्रवर्तयन्पुरुषं दुःखात्मके कर्मणि प्रवर्तयति तेनायमवश्यं हन्तव्य इत्यभिप्रायः। ननु सामदानभेदण्डाश्चत्वार उपायस्तत्र प्रथमत्रिकस्यासंभवे चतुर्थो दण्डः प्रयोक्तव्यो नतु हठादेवेत्याशङ्क्य त्रयाणामसंभवं वक्तुं विशिनष्टि  महाशनो महापाप्मेति। महदशनमस्येति महाशनःयत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।। इति स्मृतेः। अतो न दानेन संधातुं शक्यः। नापि सामभेदाभ्याम्। यतो महापाप्माऽत्युग्रः। तेन हि बलात्प्रेरितोऽनिष्टफलमपि जानन्पापं करोति। अतो विद्धि जानीहि एनं काममिह संसारे वैरिणम्। तदेतत्सर्वं विवृतं वार्तिककारैरात्मैवेदमग्र आसीदिति श्रुतिव्याख्यानेप्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यथोक्तस्याधिकारिणः। स्वातन्त्र्ये सति संसारसृतौ कस्मात्प्रवर्तते।।नतु निःशेषविध्वस्तसंसारानर्थवर्त्मनि। निवृत्तिलक्षणे वाच्यं केनायं प्रेर्यतेऽवशः।।अनर्थपरिपाकत्वमपि जानन्प्रवर्तते। पारतन्त्र्यमृते दृष्टा प्रवृत्तिर्नेदृशी क्वचित्।।तस्माच्छ्रेयोर्थिनः पुंसः प्रेरकोऽनिष्टकर्मणि। वक्तव्यस्तन्निरासार्थमित्यर्था स्यात्परा श्रुतिः।।अनाप्तपुरुषार्थोऽयं निःशेषानर्थसंकुलः। इत्यकामयतानाप्तान्पुमर्थान्साधनैर्जडः। जिहासति तथानर्थानविद्वानात्मनि श्रितान्। अविद्योद्भूतकामः सन्नथो खल्विति च श्रुतिः। अकामतः क्रियाः काश्चिद्दृश्यन्ते नेह कस्यचित्। यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्।।काम एष क्रोध एष इत्यादिवचनं स्मृतेः। प्रवर्तको नापरोऽतः कामादन्यः प्रतीयते इतिअकामतः इति मनुवचनम्। अन्यत्स्पष्टम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.37।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच  काम एष इति। यस्त्वया पृष्टो हेतुरेष काम एव। ननु क्रोधोऽपि पूर्वं त्वयोक्तःइन्द्रियस्येन्द्रियस्य इत्यत्र। सत्यम्। नासौ ततः पृथक् किंतु क्रोधोऽप्येष एव काम एव केनचित्प्रतिहतः क्रोधात्मना परिणमते। अतः पूर्वं पृथक्त्वेनोक्तोऽपि क्रोधः कामज एवेत्यभिप्रायेण कामेनैकीकृत्योच्यते। रजोगुणात्समुद्भवतीति तथा। अनेन सत्त्ववृद्ध्या रजसि क्षयं नीते सति कामोऽपि क्षीयत इति सूचितम्। एनं काममिह मोक्षमार्गे वैरिणं विद्धि। अयं च वक्ष्यमाणक्रमेण हन्तव्य एव। यतो नासौ दानेन संधातुं शक्य इत्याह। महाशनः महदशनं यस्य। दुष्पूर इत्यर्थः। न च साम्ना संधातुं शक्यः यतो महापाप्मा अत्युग्रः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.37।।एवं पृष्टः श्रीभगवान्ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा इत्युक्तं समग्रमैश्वर्यादिषट्कं नित्यमप्रतिबन्धेन यस्मिन्वासुदेवे वर्ततेउत्पत्तिं निधनं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति। इत्युत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवो भगवानितिशब्दवाच्य उवाचोत्तरमुक्तवान्  काम इति। यस्त्वया वैरी पृष्टः एष कामः शत्रुर्यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिर्लोकस्य। ननु क्रोधोऽप्यनर्थहेतुर्लोके दृश्यते इत्यत आह। स एव कामः कुतश्चिन्निमित्तात्प्रतिहितः क्रोधत्वेन परिणमतेऽहः क्रोधोऽप्येष एव शत्रोः पुत्रत्वादप्ययं शत्रुरित्याह। रजोगुणः समुद्भवो यस्य सः। यद्वा कथं शत्रुतां करोतीत्यह आह। रजोगुणस्य समुद्भवः कारणं कामो रजः प्रवर्तयन्पुरुषं प्रवर्तयति। ननु विषयभोगेन तृप्तिं नीतः शत्रुत्वं जिहास्यतीति चेत् तत्राह। महदशनमस्य सः। तदुक्तम्  न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाभ्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।।यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् इति। ननु लोके यथा स्वेनापराधिनः कश्चिच्छत्रुत्वं भजति तथायमप्यतोऽपराधं तस्य न करिष्यामीतिचेत्तत्राह। महाशनत्वान्महापाप्माऽत्युग्रो विनैवापराधं स्वेनोपकृतश्च नाशयतीत्यर्थः। अतः काममेव परमं वैरिणं विद्धि। ज्ञात्वा च तत्परिहाराय यतस्वेति भावः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.37।।अथइन्द्रियस्य इत्यादिना सङ्ग्रहेणोक्तमेवार्थं प्रश्नस्योत्तरतया प्रपञ्चयन् भगवानुवाच  काम एष इति। विषयानुभववासनाबीजानां कामक्रोधाद्यङ्कुरोत्पादने रजोगुणः सलिलसेकः कामादिर्ह्यस्मिन्मते ज्ञानविशेषरूप आत्मधर्मः रजस्तु प्रकृतिगुणः अन्यधर्मस्य कथमन्यत्र कार्यकरत्वमित्यत्रोक्तंगुणमयप्रकृतिसंसृष्टस्येति। औष्ण्याश्रयदहनसंयोगाद्यथा करतलादौ स्फोटादिः तथा गुणाश्रयप्रकृतिसंसर्गादात्मनि कामादिरिति भावः। तर्हि गुणत्रयमयप्रकृतिसंसर्गात् सत्त्वादिकार्यज्ञानादिरपि युगपदेव किं न स्यात् इत्यत्रोक्तं  उद्भवाभिभवादिरूपेण वर्तमानेति। पूर्वश्लोकोक्तायंशब्दस्यात्रापेक्षयाऽस्येति विपरिणत्याऽनुषङ्गः। रजोगुणप्रचुरस्यास्य कथं ज्ञानयोगप्रारम्भमात्रत्वमपीति चोद्यमुद्भवाभिभवक्रमेण मात्रया मध्ये कदाचित्सत्त्वोन्मेषसम्भावनया निरस्तमित्यभिप्रेत्यज्ञानयोगारब्धस्येत्युक्तम्। आरब्ध इतिभुक्ता ब्राह्मणाः इतिवत्कर्तरि क्तः।एषः इति पदेन पापाचरणे प्रयोजकः प्रश्नविषयः परामृश्यते। तेनैवसदृशं चेष्टते 3।33इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे 3।34 इति श्लोकद्वयोक्तार्थोऽप्यत्र स्मारित इत्यभिप्रेत्यप्राचीनेत्यादिविशेषणद्वयमुक्तम्। पूर्वोक्तरागद्वेषाववस्थान्तरापन्नावत्र कामक्रोधशब्देन व्यपदिश्येते इति भावः। महाशनत्वविवरणंविषयेष्वेनमाकर्षतीति महदशनं भोग्यं यस्य स महाशनः।एषः इति निर्देशस्यावृत्त्या वाक्यभेदः। तत्र च वाक्यद्वयस्यैकमेव मुखभेदेन प्रतिपाद्यम्। अन्यथा कः पापाचरणे प्रयोजकः इति प्रश्नेकाम एष क्रोधश्चइत्यादिप्रकारेण निर्देष्टव्यम्। अनन्तरं चविद्ध्येताविह वैरिणौ इति वक्तव्यम्। उत्तरत्र च षट्स्वपि श्लोकेषुतेन एतेन कामरूपेण अस्य एनं यः कामरूपम् इति सर्वत्रैकवचननिर्देशः काममात्रनिर्देशश्च क्रियते न तु कामात्क्रोधस्य पृथक्त्वेनाभिधानम्। ततश्च काम एवावस्थाभेदेन क्रोधतयाऽत्र विवक्षितः तदवस्थाद्वयविषयतया च वाक्यभेद उचितः।महाशनो महापाप्मा इति पदद्वयमपि बाहुल्यानुसारेणौचित्यात् क्रमेण तदुभयविषयमित्येतदखिलमभिप्रेत्याहएष एवेति।प्रतिहतगतिः इति क्रोधाख्ये परिणामे हेतुरुक्तः। एकस्यैव शब्दादिविषयकामावस्थातः क्रोधावस्थाया विषयतो भेदप्रदर्शनार्थमतिप्रसङ्गपरिहारार्थं चोक्तंप्रतिहतेत्यादि। महापाप्मतां विवृणोतिपरहिंसादिषु प्रवर्तयतीति। महान् पाप्मा कार्यतया यस्यास्तीति स महापाप्मा।क्रुद्धो हन्याद्गुरूनपि     इति हि प्रसिद्धम्। एतच्छ्लोकोक्तं रजोगुणाख्यं पूर्वोक्तप्रकृतिशब्दव्यपदेशार्हं वासनाख्यं कारणं चोपस्थाप्य तदुभयकार्यताविशिष्टंएनं इत्यन्वादेशः परामृशतीत्यभिप्रायेणरजोगुणसमुद्भवं सहजमिति पदद्वयमुक्तम्।इह वैरिणं इत्यत्र इहशब्दः प्रमादवत्तया बुभुत्सितज्ञानयोगविषय इत्यभिप्रायेणोक्तं  ज्ञानयोगविरोधिनमिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.37।।एतत्प्रश्नोत्तरमाह भगवान् प्रपञ्चवैचित्र्यार्थप्रकटितत्रिगुणमध्यस्थविक्षिप्तकरणैकस्वभावरजोगुणात्मकभगवदंशमोहितस्तत्र प्रवर्त्तते तस्मात्तद्गुणकृतविक्षेपकर्माणि तत्स्वरूपज्ञानपूर्वकं त्यजेदित्याह  काम एष इति। एष इति लौकिकः कामः। रजोगुणसमुद्भवः रजोगुणादुत्पत्तिर्यस्य सः। सर्वेषां द्वेषी शत्रुः। एष एव कामोऽवस्थान्तरापन्नः क्रोधो भवति सोऽपि रजोगुणसमुद्भवः। स महाशनो दुरापूरः। अत एव श्रीभागवते उक्तं 9।19।14  न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते।।किं पुनर्महापाप्मा महापापरूपो भगवद्भजनप्रतिबन्धकः। इह संसारे देहग्रहणानन्तरमेनं वैरिणं विद्धि।इह इतिपदादेतद्देहावसाने सति अलौकिकेऽयमेव कार्याय भविष्यतीति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.37।।अत्रोत्तरंकाममय एवायं पुरुष इत्यादिश्रुतिसिद्धं भगवानुवाच  काम एष इति। एष प्रसिद्धः कामःसोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति श्रुतेरिदं मे भूयादिदं मे भूयात् इति तीव्राभिलाषहेतुभूतश्चेतसोऽनवस्थितत्वापादको वृत्तिविशेषः। स च चेतोरूप एव।कामः संकल्पः इत्युपक्रम्यएतत्सर्वं मनः इत्युपसंहारात् स एष कामः केनचिन्निमित्तेन प्रतिहतः क्रोधरूपेण परिणमतेऽतः क्रोधोऽभिज्वलनात्माप्येष एव तमेनमिह शरीरेऽन्तःस्थितं वैरिणं विद्धि। कुतो वैरी। यतः रजोगुणसमुद्भवः रजो रञ्जनात्मकः प्राकृतो गुणः तस्य गुणौ कार्यभूतौ तृष्णासङ्गौ तावेवोद्भवो यस्य सः। रजःकार्यत्वात् दुःखैकफलोऽयमतो वैरी। यद्वा रजोगुणस्य लोभप्रवृत्त्यादिलक्षणस्य समुद्भवो यस्मात्। ननु विषयाभिलाषात्मकः कामो विषयार्पणेन शाम्यति। विषयस्य दौर्लभ्यनिश्चये स्वत एव वा निवर्तते अन्ध इव रूपदर्शनाभिलाषादित्याशङ्क्याह  महाशनो महापाप्मेति। महद्दातुमपारणीयमशनमस्य स तथा। यथोक्तंन जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते इति।यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् इति। तथा महापाप्मात्युग्रः। स हि सहस्रशः प्रबोधितोऽपि न निवर्तते तद्वदयमपि दुश्चिकित्स्यः। महाशनत्वान्नायं वैरी दानसाध्यः। नापि सामभेदसाध्यः। अत्युग्रत्वात्। अतो हन्तव्य एवेति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The Supreme Personality of Godhead said: It is lust only, Arjuna, which is born of contact with the material mode of passion and later transformed into wrath, and which is the all-devouring sinful enemy of this world.",
        "ec": " When a living entity comes in contact with the material creation, his eternal love for Kṛṣṇa is transformed into lust, in association with the mode of passion. Or, in other words, the sense of love of God becomes transformed into lust, as milk in contact with sour tamarind is transformed into yogurt. Then again, when lust is unsatisfied, it turns into wrath; wrath is transformed into illusion, and illusion continues the material existence. Therefore, lust is the greatest enemy of the living entity, and it is lust only which induces the pure living entity to remain entangled in the material world. Wrath is the manifestation of the mode of ignorance; these modes exhibit themselves as wrath and other corollaries. If, therefore, the mode of passion, instead of being degraded into the mode of ignorance, is elevated to the mode of goodness by the prescribed method of living and acting, then one can be saved from the degradation of wrath by spiritual attachment. The Supreme Personality of Godhead expanded Himself into many for His ever-increasing spiritual bliss, and the living entities are parts and parcels of this spiritual bliss. They also have partial independence, but by misuse of their independence, when the service attitude is transformed into the propensity for sense enjoyment, they come under the sway of lust. This material creation is created by the Lord to give facility to the conditioned souls to fulfill these lustful propensities, and when completely baffled by prolonged lustful activities, the living entities begin to inquire about their real position. This inquiry is the beginning of the Vedānta-sūtras, wherein it is said, athāto brahma-jijñāsā: one should inquire into the Supreme. And the Supreme is defined in Śrīmad-Bhāgavatam as janmādy asya yato ’nvayād itarataś ca, or, “The origin of everything is the Supreme Brahman.” Therefore the origin of lust is also in the Supreme. If, therefore, lust is transformed into love for the Supreme, or transformed into Kṛṣṇa consciousness – or, in other words, desiring everything for Kṛṣṇa – then both lust and wrath can be spiritualized. Hanumān, the great servitor of Lord Rāma, exhibited his wrath by burning the golden city of Rāvaṇa, but by doing so he became the greatest devotee of the Lord. Here also, in Bhagavad-gītā , the Lord induces Arjuna to engage his wrath upon his enemies for the satisfaction of the Lord. Therefore, lust and wrath, when they are employed in Kṛṣṇa consciousness, become our friends instead of our enemies."
    }
}
