{
    "_id": "BG3.31",
    "chapter": 3,
    "verse": 31,
    "slok": "ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः |\nश्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ||३-३१||",
    "transliteration": "ye me matamidaṃ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ .\nśraddhāvanto.anasūyanto mucyante te.api karmabhiḥ ||3-31||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.31।। जो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त:) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानपूर्वक पालन करते हैं, वे कर्मों से (बन्धन से) मुक्त हो जाते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.31 Those men who constantly practise this teaching of Mine with faith and without cavilling, they too are freed from actions.",
        "ec": "3.31 ये those who? मे My? मतम् teaching? इदम् this? नित्यम् constantly? अनुतिष्ठन्ति practise? मानवाः men? श्रद्धावन्तः full of faith? अनसूयन्तः not cavilling? मुच्यन्ते are freed? ते they? अपि also? कर्मभिः from actions.Commentary Sraddha is a mental attitude. It means faith. It is faith in ones own Self? in the scriptures and in the teachings of the spiritual preceptor. It is compund of the higher emotion of faith? reverence and humility."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.31 Those who always act in accordance with My precepts, firm in faith and without cavilling, they too are freed from the bondage of action."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.31।। कर्मयोग के सिद्धान्त का मात्र ज्ञान होने से नहीं किन्तु उसके अनुसार आचरण करने पर ही वह हमारा कल्याण कर सकेगा। यह श्रीकृष्ण का मत है। अध्यात्म ज्ञान तो एक ही है परन्तु आचार्यों सम्प्रदाय संस्थापकों एवं भिन्नभिन्न धर्म प्रथाओं के मतों में अनेक भेद हैं जिसका कारण यह है कि वे सभी तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करना चाहते थे जिससे सभी साधक परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर सकें।बैलगाड़ी हांकने वाले चालक के चाबुक के नीचे काम करने वाले पशु के समान ही मनुष्य को बोझ उठाते हुये जीवन नहीं जीना चाहिये। परिश्रम केवल शरीर को सुदृढ़ बनाता है कर्म हमारे चरित्र की वक्रता को दूर कर आन्तरिक व्यक्तित्व को आभा प्रदान करते हैं। यदि हम अपने परिश्रमपूर्वक किये गये कर्मों में अपने मन और मस्तिष्क का भी पूर्ण उपयोग करें। असूया (गुणों में दोष दर्शन) का त्याग करके एवं श्रद्धापूर्वक कर्मयोग का पालन करने से ही यह संभव हो सकेगा।श्रद्धा  संस्कृत में श्रद्धा का भाव गम्भीर है जिसे अंग्रेजी भाषा के किसी एक शब्द द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।श्रीशंकराचार्य श्रद्धा को पारिभाषित करते हुए कहते हैं कि शास्त्र और गुरु के वाक्यों में वह विश्वास जिसके द्वारा सत्य का ज्ञान होता है श्रद्धा कहलाता है।यहाँ किसी प्रकार के अन्धविश्वास को श्रद्धा नहीं कहा गया है वरन् उसे बुद्धि की वह सार्मथ्य बताया गया है जिससे सत्य का ज्ञान होता है। बिना विश्वास के किसी कार्य में प्रवृत्ति नहीं होती तथा विचारों की परिपक्वता के बिना विश्वास में दृढ़ता नहीं आती है।अनसूयन्त (गुणों में दोष को नहीं देखने वाले)  सामान्यत जगत् में हम जो कुछ ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे समझने के लिये उसकी आलोचना भी की जाती है उसके विरुद्ध तर्क दिये जाते हैं। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुन को सावधान करते हैं कि केवल उग्र वादविवाद अथवा गहन अध्ययन मात्र में ही इस ज्ञान का उपयोग नहीं है। वास्तविक जीवन में उतारने से ही इस ज्ञान की सत्यता का अनुभव किया जा सकता है।वे भी कर्म से मुक्त होते हैं  ऐसे वाक्यों को पढ़कर अनेक विद्यार्थी स्तब्ध रह जाते हैं। अब तक भगवान् कुशलतापूर्वक कर्म करने का उपदेश दे रहे थे और अब अचानक कहते हैं कि वे भी कर्म से मुक्त हो जाते हैं। स्वाभाविक है कि जो पुरुष शास्त्रीय शब्दों के अर्थों को नहीं जानता उसे इन वाक्यों में विरोधाभास दिखाई देता है।नैर्ष्कम्य शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते समय हमने देखा कि आत्मअज्ञान ही इच्छा विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अत आनन्दस्वरूप आत्मा को पहचानने पर अविद्याजनित इच्छायें और कर्मों का अभाव हो जाता है। इसलिये यहाँ बताई हुई कर्मों से मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य है  अज्ञान के परे स्थित आत्मस्वरूप की प्राप्ति।केवल कर्मों के द्वारा परमात्मस्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकती। संसदमार्ग स्वयं संसद नहीं है किन्तु वहाँ तक पहुँचने पर संसद भवन दूर नहीं रह जाता। इसी प्रकार यहाँ कर्मयोग को ही परमार्थ प्राप्ति का मार्ग कहकर उसकी प्रशंसा की गई है क्योंकि उसके पालन से अन्तकरण शुद्ध होकर साधक नित्यमुक्त स्वरूप का ध्यान करने योग्य बन जाता है।परन्तु इसके विपरीत"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.31. Those who constantly follow this doctrine of Mine-such men, with faith and without finding fault [in it],  are freed from [the results of] all actions."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.31 Those men who, full of faith, ever practise this teaching of Mine and those who receive it without cavil - even they are released from Karma."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.31 Those men who ever follow this teaching of Mine with faith and without cavil, they also become freed from actions."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.31  3.32।।फलमाह  ये म इति। ये त्वेवं निवृत्तकर्मिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा किम्वपरोक्षज्ञानिनः न तु साधनान्तरमुच्यते।निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये। अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते। सर्वं तदन्तराऽधाय मुक्तये साधनं भवेत्। न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् इति ह्युक्तं नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अत एव समुच्चयनिमयो निराकृतः।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.31।।प्रकृतं भगवतो मतमुक्तप्रकारमनुसृत्यैवानुतिष्ठतां क्रममुक्तिफलं कथयति  यदेतदिति। शास्त्राचार्योपदिष्टेऽदृष्टार्थे विश्वासवत्त्वं श्रद्दधानत्वं गुणेषु दोषाविष्करणमसूया अपिर्यथोक्ताया मुक्तेरमुख्यत्वद्योतनार्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.31।। जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।",
        "hc": "।।3.31।। व्याख्या--'ये मे मतमिदं ৷৷. श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो'-- किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिका कोई भी मनुष्य यदि कर्म-बन्धनसे मुक्त होना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्तको मानकर इसका अनुसरण करना चाहिये। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, कर्म आदि कुछ भी अपना नहीं है-- इस वास्तविकताको जान लेनेवाले सभी मनुष्य कर्म-बन्धनसे छूट जाते हैं। भगवान् और उनके मतमें प्रत्यक्षकी तरह निःसन्देह दृढ़ विश्वास और पूज्यभावसे युक्त मनुष्यको 'श्रद्धावन्तः' पदसे कहा गया है।शरीरादि जड पदार्थोंको अपने और अपने लिये न माननेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है--इस वास्तविकतापर श्रद्धा होनेसे जडताके माने हुए सम्बन्धका त्याग करना सुगम हो जाता है।श्रद्धावान् साधक ही सत्- शास्त्र, सत्-चर्चा और सत्सङ्गकी बातें सुनता है और उनको आचरणोंमें लाता है।मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः परमात्माको ही प्राप्त करनेकी एकमात्र उत्कट अभिलाषा होनेपर साधकमें श्रद्धा, तत्परता, संयतेन्द्रियता आदि स्वतः आ जाते हैं। अतः साधकको मुख्यरूपसेपरमात्मप्राप्तिकी अभिलाषा ही तीव्र बनाना चाहिये।पीछेके (तीसवें) श्लोकमें भगवान्ने अपना जो मत बताया है, उसमें दोष-दृष्टि न करनेके लिये यहाँ 'अन-सूयन्तः' पद दिया गया है। गुणोंमें दोष देखनेको 'असूया' कहते हैं। असूया-(दोषदृष्टि-) से रहित मनुष्योंको यहाँ अनसूयन्तः कहा गया है।\n\nजहाँ श्रद्धा रहती है, वहाँ भी किसी अंशमें दोषदृष्टि रह सकती है। इसलिये भगवान्ने 'श्रद्धावन्तः' पदके साथ 'अनसूयन्तः' पद भी देकर मनुष्यको दोषदृष्टिसे सर्वथा रहित (पूर्ण श्रद्धावान्) होनेके लिये कहा है। इसी प्रकार गीता-श्रवणका माहात्म्य बताते हुए भी भगवान्ने श्रद्धावाननसूयश्च (गीता 18। 71) पद देकर श्रोताके लिये श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होनेकी बात कही है। 'भगवान्का मत तो उत्तम है, पर भगवान् कितनी आत्मश्लाघा, अभिमानकी बात कहते हैं कि सब कुछ मेरे ही अर्पण कर दो' अथवा 'यह मत तो अच्छा है, पर कर्मोंके द्वारा भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? कर्म तो जड और बाँधनेवाले होते हैं' आदि-आदि भाव आना ही भगवान्के मतमें दोष-दृष्टि करना है। साधकको भगवान् और उनके मत दोनोंमें ही दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये।     वास्तवमें सब कुछ भगवान्का ही है; परन्तु मनुष्य भूलसे भगवान्की वस्तुओंको अपनी मानकर बँध जाता है और ममता-कामनाके वशमें होकर दुःख पाता रहता है। अतः इस अपनेपनका त्याग करवाकर मनुष्यका उद्धार करनेके लिये (कि वह सदाके लिये सुखी हो जाय) भगवान् अपनी सहज करुणासे सब कुछ अपने अर्पण करनेकी बात करते हैं। अतः इस विषयमें दोष-दृष्टि करना अनुचित है। यह तो भगवान्का परम सौहार्द, कारुण्य, वात्सल्य ही है कि अपनेमें कोई अपूर्णता (कमी) और आवश्यकता न होनेपर भी केवल मनुष्यके कल्याणार्थ वे समस्त कर्मोंको अपने अर्पण करनेके लिये कहते हैं।भगवान्का मत ही लोकमें 'सिद्धान्त' कहलाता है। सर्वोपरि सिद्धान्तको ही यहाँ 'मतम्' पदसे कहा गया है। भगवान्ने अपनी सहज सरलता एवं निरभिमानताके कारण सर्वोपरि सिद्धान्तको 'मत' नामसे कहा है। यह मत या सिद्धान्त त्रिकालमें एक-जैसा रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, चाहे कोई श्रद्धा करे या न करे।यहाँ 'नित्यम्' पद 'मतम्' का विशेषण नहीं, प्रत्यत 'अनुतिष्ठन्ति' पदका ही विशेषण है। कारण कि भगवान् नित्य हैं; अतः उनसे सम्बन्धित समस्त वस्तुएँ भी नित्य ही हैं। भगवान्का मत भी नित्य है। भगवान्का मत सर्वोपरि सिद्धान्त है और सिद्धान्त वही होता है, जो कभी मिटता नहीं। अतः भगवान्का मत तो नित्य है ही, उसका अनुष्ठान नित्य होना चाहिये। इसलिये यहाँ क्रियाविशेषण नित्यम् पद देनेका तात्पर्य है-- भगवान्के मतपर नित्य-निरन्तर (सदा) स्थित रहना तथा इसके अनुसार अनुष्ठान करना।\n\n प्रश्न-- भगवान्का मत क्या है? और उसका सदा अनुष्ठान कैसे किया जाय?\n\n उत्तर-- मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं है--यह भगवान्का मत है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, धन, सम्पत्ति, पदार्थ आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और संसार भी प्रकृतिका कार्य है। इसलिये इन वस्तुओंकी संसारसे एकता है तथा परमात्माका अंश होनेसे 'स्वयं' की परमात्मासे एकता है। अतः ये वस्तुएँ व्यक्तिगत (अपनी) नहीं हैं प्रत्युत इनके उपयोगका अधिकार व्यक्तिगत है। इसके सिवाय सद्गुण, सदाचार, त्याग, वैराग्य, दया, क्षमा आदि भी व्यक्तिगत नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्के हैं। ये दैवी सम्पत्ति अर्थात् भगवत्प्राप्तिकी सम्पत्ति (पूँजी) होनेसे भगवान्के ही हैं। यदि ये सद्गुण, सदाचार आदि अपने होते तो इनपर हमारा पूरा अधिकार होता और हमारी सम्मतिके बिना किसी दूसरेको इनकी प्राप्ति न होती। इनको अपना माननेसे तोअभिमान ही होता है, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है।जो वस्तु अपनी नहीं है, ,उसे अपनी माननेसे और उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेसे ही बन्धन होता है। शरीरादि वस्तुएँ 'अपनी' तो हैं ही नहीं, 'अपने लिये' भी नहीं हैं। यदि ये अपने लिये होतीं, तो इनकी प्राप्तिसे हमें पूर्ण तृप्ति या संतोष हो जाता, पूर्णताका अनुभव हो जाता। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ कितनी ही क्यों न मिल जायँ, कभी तृप्ति नहीं होती। तृप्ति या पूर्णताका अनुभव उस वस्तु-(भगवान्-) के मिलनेपर होता है, जो वास्तवमें अपनी है। अपनी वास्तविक वस्तुके मिलनेपर फिर स्वप्नमें भी कुछ पानेकी इच्छा नहीं रहती। जैसे, संसारमें सभी पुत्रवती स्त्रियाँ माताएँ ही हैं, पर बालकको उन सभी माताओंके मिलनेसे संतोष नहीं होता प्रत्युत अपनी माताके मिलनेसे ही संतोष होता है। इसी तरह जबतक और पानेकी इच्छा रहती है, तबतक यही समझना चाहिये कि अपनी वस्तु मिली ही नहीं। मिली हुई वस्तुओंको भूलसे भले ही अपनी मान लें, पर वास्तवमें वे अपनी हैं नहीं और इसलिये उनसे अपनी तृप्ति भी नहीं होती। अतः मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं है।शरीरादि प्राप्त वस्तुओंको न तो हम अपने साथ लाये थे और न अपने साथ ले ही जा सकते हैं तथा वर्तमानमें भी ये हमारेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रही हैं। वर्तमानमें जो ये अपनी प्रतीत होती हैं, वह भी सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंके हितमें लगानेके लिये, न कि अपना अधिकार जमानेके लिये। अतः हमें प्राप्त वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपनी माननेका नहीं। भगवान्ने मनुष्यको ये वस्तुएँ इतनी उदारतापूर्वक और इस ढंगसे दी हैं कि मनुष्यको ये वस्तुएँ अपने ही दीखने लगती हैं। इन वस्तुओंको अपनी मान लेना भगवान्की उदारताका दुरुपयोग करना है। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, पर जिन्हें भूलसे अपनी मान लिया है, उस भूलको मिटानेके लिये साधक अध्यात्मचित्तसे गहरा विचार करके उन्हें भगवान्के अर्पण कर दे अर्थात् भूलसे माना हुआ अपनापन हटा ले।जिसका एकमात्र उद्देश्य अध्यात्मतत्त्व-(परमात्मा-) की प्राप्तिका है, ऐसा साधक यदि गम्भीरतापूर्वक विचार करे तो उसे स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगा कि मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, प्रत्युत बिछुड़नेवाली होती है। शरीर, पद, अधिकार, शिक्षा, योग्यता, धन, सम्पत्ति, जमीन आदि जो कुछ मिला है, संसारसे ही मिला है और संसारके लिये ही है। मिली हुई वस्तुओंको चाहे संसार-(कार्य-) का माने, चाहे प्रकृति-(कारण-) का माने और चाहे भगवान्-(स्वामी-) का माने, पर सार (मुख्य) बात यही है कि वे अपनी नहीं हैं। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, वे अपने लिये कैसे हो सकती हैं?\n\nसाधकको न तो कोई 'वस्तु' अपनी माननी है और न कोई 'कर्म' ही अपने लिये करना है। अपने लिये किये गये कर्म बाँधनेवाले होते हैं (गीता 3। 9) अर्थात् यज्ञ-(निष्कामभावपूर्वक परहितके लिये किये जानेवाले कर्तव्य-कर्म) के अतिरिक्त अन्य (अपने लिये किये गये) कर्म मनुष्यको बाँधनेवाले होते हैं। यज्ञके लिये कर्म करने-वाले साधकके सम्पूर्ण कर्म, सञ्चित-कर्म भी विलीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)। भगवान् समस्त लोकोंके महान् ईश्वर (स्वामी) हैं--    'सर्वलोकमहेश्वरम्' (गीता 5। 29)। जब मनुष्य अपनेको वस्तुओंका स्वामी मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक स्वामीको भूल जाता है; क्योंकि वह अपनेको जिनवस्तुओंका स्वामी मानता है, उसे उन्हीं वस्तुओंका चिन्तन होता है। अतः भगवान्को ही विश्वका एकमात्र स्वामी मानते हुए साधकको संसारमें सेवककी तरह रहना चाहिये। सेवक अपने स्वामीके समस्त कार्य करते हुए भी अपनेको कभी स्वामी नहीं मानता। अतः साधकको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको अपना न मानकर केवल भगवान्का मानते हुए अपने कर्तव्यका पालन कर देना चाहिये; कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाना चाहिये। अपनेमें स्वामीपनेका अभिमान नहीं करना चाहिये।सर्वस्व भगवदर्पण करनेके बाद लाभ-हानि, मान-अपमान, सुख-दुःख आदि जो कुछ आये, उनको भी साधक भगवान्का ही माने और उनसे अपना कोई प्रयोजन न रखे। कर्तव्यमात्र प्राप्त परिस्थितिके अनुरूपहोता है। परिस्थितिके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे। यही भगवान्के मतका सदा अनुसरण करना है।    'मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः'-- भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें तो सर्वस्व मेरे अर्पण करके कर्तव्य-कर्म करनेकी स्पष्ट आज्ञा दे रहा हूँ, अतः मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम्हारे मुक्त होनेमें कोई सन्देह नहीं है; परन्तु जिनको मैं इस प्रकार स्पष्ट आज्ञा नहीं देता हूँ, वे भी अगर इस मत-(मिले हुएको अपना न मानकर कर्तव्य-कर्मका पालन करना) के अनुसार चलेंगे, तो वे भी मुक्त हो जायेंगे। कारण कि यह मत ही ऐसा है कि चाहे मुझे माने, या न माने केवल इस मतका पालन करनेसे ही मनुष्य मुक्त हो जाता है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.31।।ये मानवाः आत्मनिष्ठशास्त्राधिकारिणःअयम् एव शास्त्रार्थः इत्येतत् मे मतं निश्चित्य तथा अनुतिष्ठन्ति ये च अननुतिष्ठन्तः अपि अस्मिन् शास्त्रार्थे श्रद्दधाना भवन्ति ये च अश्रद्दधाना अपिएवं शास्त्रार्थो न संभवति इति न अभ्यसूयन्ति अस्मिन् महागुणे शास्त्रार्थे दोषदर्शिनो न भवन्ति इत्यर्थः ते सर्वे बन्धहेतुभिः अनादिकालप्रारब्धैः कर्मभिः मुच्यन्ते। ते अपि कर्मभिः इति अपिशब्दाद् एषां पृथक्करणम्। इदानीम् अननुतिष्ठन्तः अपि अस्मिन् शास्त्रार्थे श्रद्दधाना अनभ्यसूयवः च श्रद्धया च अनसूयया च क्षीणपापा अचिरेण इमम् एव शास्त्रार्थम् अनुष्ठाय मुच्यन्ते इत्यर्थः।भगवदभिमतम् औपनिषद्म् अर्थम् अननुतिष्ठताम् अश्रद्दधानानाम् अभ्यसूयतां च दोषम् आह",
        "et": "3.31 There are those persons who are alified to understand the Sastras and decide for themselves what is My doctrine, and follow them accordingly; there are others who are full of faith in the meaning of the Sastras without however practising it. And there are still others who, even though devoid of faith, do not cavil at it, saying that the true meaning of the Sastras cannot be this, i.e., they do not find any blemish pertaining to the Sastras which possess great alities. All these persons are freed from Karmas which are there from beginningless time and which cause bondage. By the term, api (even) in 'te pi karmabhih' ('even they from Karmas'), these men are divided into three groups. The meaning is that those who, even if they do not act upon the meaning but still believe in this meaning of the Sastras and do not cavil at it, will be cleansed of their evil by their faith and freedom from fault-finding. For, if they have faith they will, before long, take to the practice of this very meaning of the Sastras and be freed.\n\nSri Krsna now speaks of the evil that will befall those who do not practice this instruction of the Upanisads, i.e., those who are faithless and who cavil at it."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.31  3.32।।ये म इति।  ये त्वेतदिति।  एतच्च मतमाश्रित्य यः कश्चित् यत्किंचित् करोति तत्तस्य न बन्धकम्।  एतस्मिंस्तु ज्ञाने ये न श्रद्धालवः ( श्रद्धालवाः) ते विनष्टाः अविरतं जन्ममरणादि ( S omitsआदि) भयभावितत्त्वात्।",
        "et": "3.31 See Comment under 3.32"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.31।।कर्म करने चाहिये ऐसा जो यह मत प्रमाणसहित कहा गया वह यथार्थ है ( ऐसा मानकर )  जो श्रद्धायुक्त मनुष्य गुरुस्वरूप मुझ वासुदेवमें असूया न करते हुए ( मेरे गुणोंमें दोष न देखते हुए ) मेरे इस मतके अनुसार चलते हैं वे ऐसे मनुष्य भी पुण्यपापरूप कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं।",
        "sc": "।।3.31।। ये मे मदीयम् इदं मतं नित्यम् अनुतिष्ठन्ति अनुवर्तन्ते मानवाः मनुष्याः श्रद्धावन्तः श्रद्दधानाः अनसूयन्तः असूयां च मयि परमगुरौ वासुदेवे अकुर्वन्तः मुच्यन्ते तेऽपि एवंभूताः कर्मभिः धर्माधर्माख्यैः।।",
        "et": "3.31 Ye, those; manavah, men; who (nityam, ever;) anutisthanti, follow accordingly; me matam, My teaching- this teaching of Mine, viz that 'duty must be performed', which has been stated with valid reasoning; sraddhavantah, with faith; and anasuyantah, without cavil, without detracing Me, Vasudeva, the Teacher [Here Ast. adds 'parama, supreme'-Tr.]; te api, they also, who are such; mucyante, become freed; karmabhih, from actions called the righteous and the unrighteous."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.31  3.32।।अन्यथाप्रतीतिं निराकर्तुं तावदुत्तरश्लोकद्वयप्रतिपाद्यमाह  फलमिति। केचिद्विद्वांसः कुर्वन्तीत्येतावता मया कार्यं न वा इत्याशङ्क्य स्वोक्तकरणाकरणयोः फलमाहेत्यर्थः।मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः इत्यपिशब्देन ज्ञानमिव निवृत्तं कर्मापि मोक्षसाधनमुच्यते इत्यन्यथा प्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे  ये त्विति। कैमुत्यद्योतनार्थोऽपिशब्दो न समुच्चयार्थ इत्यर्थः। प्रासङ्गिकं चैतत्। समुच्चये यद्यपिशब्दः स च द्वेधा ज्ञानमिव कर्मापि पृथक्साधनं ज्ञानकर्मसमुच्चय एवेति। तत्राद्यपक्षं निराकरोति  न त्विति।निष्कामत्वादिनाऽनुष्ठितानि यज्ञादीनि निवृत्तानि। आदिपदेन नित्यनैमित्तिकानां ग्रहणम्। अपरोक्षा च सा ईशदृष्टिश्च तादर्थ्ये चतुर्थी। मुक्तौ मुक्तिसाधने किञ्चित्सहकारि कर्मापि मुक्तिसाधनमुच्यत इत्यत उक्तंसर्वमिति। तत्सर्वं निवृत्तादिकम्। अन्तरा मध्ये। ज्ञानमाधाय। मुक्तये मुक्तेः। अहल्यायै जारेति यथा। साक्षात् साधनत्वेन श्रुतमपि कर्म यथा व्यवहितं जातं किमपि ज्ञानं तथा नेत्युक्तम्  न किञ्चिदिति। द्वितीयमपि प्रकारमतिदेशेन निराचष्टे  अत एवेति।अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते इत्युक्तत्वादेवेत्यर्थः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.31।।एवं कर्मानुष्ठाने गुणमाह  ये मे मतमिति। तेऽपि कर्मभिरेव कृत्वा कर्मतो वा मुक्तिं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.31।।फलाभिसंधिराहित्येन भगवदर्पणबुद्ध्या विहितकर्मानुष्ठानं सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण मुक्तिफलमित्याह। इदं फलाभिसंधिराहित्येन विहितकर्माचरणरूपं मम मतं नित्यं नित्यवेदबोधितत्वेनानादिपंरपरागतं आवश्यकमिति वा सर्वदेति वा मानवा मनुष्याः ये केचित् मनुष्याधिकारित्वात्कर्मणां श्रद्धावन्तः शास्त्राचार्योपदिष्टेर्थेऽननुभूतेऽप्येवमेवैतदिति विश्वासः श्रद्धा तद्वन्तः। अनसूयन्तः गुणेषु दोषाविष्करणसूया सा च दुःखात्मके कर्मणि मां प्रवर्तयन्नकारुणिकोऽयमित्येवंरूपा। प्रकृते प्रसक्तां तामसूंयामपि गुरौ वासुदेवे सर्वसुहृद्यकुर्वन्तो येऽनुतिष्ठन्ति तेऽपि सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण सम्यक् ज्ञानिवन्मुच्यन्ते कर्मभिर्धर्माधर्माख्यैः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.31।।एवं कर्मानुष्ठाने गुणमाह  ये मे मतमिति। मद्वाक्ये श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः दुःखात्मके कर्मणि प्रवर्तयतीति दोषदृष्टिमकुर्वन्तश्च। ये मे मदीयमिदं मतमनुतिष्ठन्ति तेऽपि शनैः कर्मकुर्वाणाः सम्यग्ज्ञानिवत्कर्मभिर्मुच्यन्ते।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.31।।येऽन्येऽपि मानवाः मम परमेश्वरस्य मतं फलाभिसंधिराहित्येन चित्तशोधकं कर्मानुष्ठेयमित्येवंरुपं सप्रमाणमुक्तमीश्वरेण सर्वज्ञेनाप्ततमेनोक्तं यत्तत्तथ्यमेवेति निश्चयः श्रद्धा तद्युक्ता अतएवानुसूयन्तो मयि परम गुरौ वासुदेवेऽसूयादुःखात्मके कर्मण्यस्मान् प्रेरयतीति सुखसाधने तस्मिन्दोषारोपणमकुर्वन्तोऽनुतिष्ठन्ति अनुवर्तन्ते तेऽप्येवंभूताः सत्त्वशुद्धद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्त्या धर्माधर्माख्यैः कर्मभिर्मुच्यन्ते।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.31।।ये मे मतम् इति श्लोके मे मतभित्यौपनिषदपुरुषस्य सिद्धान्ताभिमानप्रदर्शनान्मोक्षसाधनत्वोपदेशमात्रस्य कृतकरत्वाच्च तत्प्राशस्त्यपरोऽयं श्लोक इत्यभिप्रायेणाह  अयमेव साक्षादिति। ज्ञानयोगनिरपेक्ष इत्यर्थः। सारभूतः प्रधानभूतःसारो बले स्थिरांशे च न्याय्ये क्लीबं वरे त्रिषु अमरः33।170 इति नैघण्टुकाः। प्राधान्यं चात्र मोक्षसाधने ज्यायस्त्वम्। मानवशब्दस्यात्रानधिकृतशूद्रादिसङ्ग्राहकत्वादधिकृतदेवादिप्रतिक्षेपकत्वाच्च तदुभयपरिहारायय इति प्रमाणसिद्धानुवादेनाधिकारिमात्रोपलक्षकोऽयं शब्द इत्यभिप्रायेणोक्तंये मानवा आत्मनिष्ठशास्त्राधिकारिण इति।नित्यमनुतिष्ठन्ति इत्युक्तं नित्यमनुष्ठानं निर्णयपूर्वकमेव प्रामाणिकत्वनिश्चयशून्यस्यानुष्ठानंकदाचिद्भज्येतापीत्यभिप्रायेणोक्तम्अयमेव शास्त्रार्थ इत्यादि। एतत्  अयमेवेत्युक्तम् यद्वा एतन्मे मतं शास्त्रार्थ इति निश्चित्येत्यन्वयः शासितुर्मतमेव हि शास्त्रार्थ इति भावः।श्रद्धावन्तः इति पदमनुष्ठानात् पूर्वावस्थापरमित्याह  ये चाननुतिष्ठन्तोऽपीति। ततोऽप्यर्वाचीनावस्थानसूयेत्याह  ये चाश्रद्दधाना इति। गुणेषु दोषाविष्करणमसूयेत्यसूयालक्षणाभिप्रायेणाह  अपन्निति। अपिशब्दो वर्गत्रयसमुच्चयपर इतिते सर्व इत्युक्तम्। ननु सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्च नेष्यते श्रद्धावन्त इत्यादौ चभवन्ति इत्यध्याहारश्चानुचितः यच्छब्दस्य चैकत्र प्रयुक्तस्यावृत्तिरनुपपन्नेत्यत्राहतेऽपीति।एषामिति  अधिकारिणां बुद्धिस्थानां वाक्यानां वा।अयमभिप्रायः  नात्रैकवाक्यत्वं सम्भवति अपिशब्दानन्वयात् अपिशब्दो ह्यत्रानुष्ठातृभिः सहाधिकार्यन्तरसमुच्चयपरो वा अनुष्ठातृ़णामपकर्षपरो वा स्यात्। तत्र ज्ञानयोगिनां समुच्चयः सम्भवन्नप्यत्रानपेक्षितः कर्मयोगप्रशंसाप्रकरणानुचितश्च। ज्ञानयोगिभ्यः कर्मयोगिनामपकर्षसूचनं त्वत्रात्यन्तविरुद्धम्। नित्यमनुष्ठातृ़णां श्रद्धावन्तोऽनसूयन्त इति विशेषणाभिधानं च निरर्थकम्। न हि नित्यमनुतिष्ठन्तोऽश्रद्दधाना असूयन्तश्च भवेयुः। अवस्थात्रयविषयत्वे तु समुच्चयपरतया वा अर्वाचीनावस्थापकर्षपरतया वा शक्यमपिशब्दो नेतुमिति।अनुष्ठातृ़णां श्रद्धानसूयामात्रवतां च तुल्यफलत्वेऽनुष्ठानविधायकशास्त्रवैयर्थ्यं स्यादित्याशङ्क्याह  इदानीमिति। श्रद्धानसूययोः पापनिर्हरणहेतुत्वं चधर्मः श्रुतो वा दृष्टो वा स्मृतो वा कथितोऽपि वा। अनुमोदितो वा राजेन्द्र पुनाति पुरुषं सदा म.भा.14।94।29 इत्यादिसिद्धम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.31।।अर्जुनार्थं चेद्भगवतोक्तं स्यात्तदाऽर्जुनस्य तत्रैवासक्तिः स्यात्तदाऽग्रे पुष्टिरूपसर्वत्यागोपदेशोऽनुपपन्नः स्यात् अर्जुनस्याप्यन्यत्रानधिकाराद्भगवदुक्तेषु धर्मेष्वपि न प्रवृत्तिः स्वयोग्योपदेशार्थं पुनः पुनः प्रश्नानेव कृतवान्। ननु तदर्थं नोक्तं चेत्किमर्थम् तदर्जुनद्वारा सकलसन्मार्गप्रवृत्त्यर्थमुक्तम्। तदेवाह  परं योऽन्योऽप्येवं कुर्यात्तस्यापि कर्मजो बन्धो न स्यादित्याहुः  ये मे मतमिति। ये मानवाः सद्धर्मोत्पन्ना मे मतमिदं पूर्वोक्तं श्रद्धावन्तो मदुक्तत्वादनसूयन्तोऽसहिष्णुताहीना अनुतिष्ठन्ति तेऽपि कर्मभिस्तज्जन्यफलभोगैर्मुच्यन्ते। मदाज्ञया कृतत्वान्मदुक्तिविश्वासतोऽन्यकर्माण्यपि मोक्षसाधकान्येव भवन्तीत्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.31।।ये म इति। येऽन्येऽपि त्वादृशाः मे मम मतमसक्त्या कर्मानुष्ठानं अनुतिष्ठन्त्यनुवर्तन्ते मानवाः श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः अत्र दोषमपश्यन्तः तेऽपि स्वकर्मभिर्धर्माधर्माख्यैर्मुच्यन्ते।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Those persons who execute their duties according to My injunctions and who follow this teaching faithfully, without envy, become free from the bondage of fruitive actions.",
        "ec": " The injunction of the Supreme Personality of Godhead, Kṛṣṇa, is the essence of all Vedic wisdom and therefore is eternally true without exception. As the Vedas are eternal, so this truth of Kṛṣṇa consciousness is also eternal. One should have firm faith in this injunction, without envying the Lord. There are many philosophers who write comments on the Bhagavad-gītā but have no faith in Kṛṣṇa. They will never be liberated from the bondage of fruitive action. But an ordinary man with firm faith in the eternal injunctions of the Lord, even though unable to execute such orders, becomes liberated from the bondage of the law of karma. In the beginning of Kṛṣṇa consciousness, one may not fully discharge the injunctions of the Lord, but because one is not resentful of this principle and works sincerely without consideration of defeat and hopelessness, he will surely be promoted to the stage of pure Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
