{
    "_id": "BG3.27",
    "chapter": 3,
    "verse": 27,
    "slok": "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः |\nअहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||३-२७||",
    "transliteration": "prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ .\nahaṅkāravimūḍhātmā kartāhamiti manyate ||3-27||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं, अहंकार से मोहित हुआ पुरुष,  \"मैं कर्ता हूँ\"  ऐसा मान लेता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.27 All actions are wrought in all cases by the alities of Nature only. He whose mind is deluded by egoism thinks, \"I am the doer.\"",
        "ec": "3.27 प्रकृतेः of nature? क्रियमाणानि are performed? गुणैः by the alities? कर्माणि actions? सर्वशः in all cases? अहङ्कारविमूढात्मा one whose mind is deluded by egosim? कर्ता doer? अहम् I? इति thus? मन्यते thinks.Commentary Prakriti or Pradhana or Nature is that state in which the three Gunas? viz.? Sattva? Rajas and Tamas exist in a state of eilibrium. When this eilibrium is disturbed? creation begins body? senses? mind? etc.? are formed. The man who is deluded by egoism identifies the Self with the body? mind? the life force and the senses and ascribes to the Self all the attributes of the body and the senses. He? therefore? thinks through ignorance? I am the doer. In reality the Gunas of Nature perform all actions. (Cf.III.29V.9IX.9?10XIII.21?24?30?32XVIII.13?14)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.27 Action is the product of the Qualities inherent in Nature. It is only the ignorant man who, misled by personal egotism, says: I am the doer.'"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.27।। भगवान् श्रीकृष्ण निरन्तर इस बात पर बल देते हैं कि अनासक्त अथवा निष्काम कर्म ही आदर्श है। यह कहना सरल परन्तु करना कठिन होता है। बुद्धि से यह बात समझ में आने पर भी उसे कार्यान्वित करना सरल काम नहीं। हम सबके साथ कठिनाई यह है कि हम जानते नहीं कि कर्म में आसक्ति को त्याग कर फिर कर्म भी किस प्रकार करते रहें। यहाँ भगवान् विवेक की वह पद्धति बता रहें हैं जिसके द्वारा इस अनासक्ति को हम प्राप्त कर सकते हैं।आत्म अज्ञान बुद्धि और मन के स्तर पर क्रमश इच्छा और विचार के रूप में व्यक्त होता है। ये विचार मन की सात्त्विक राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तियों के अनुरूप होकर शरीर के स्तर पर कर्म के रूप में व्यक्त होते हैं। इन तीनों गुणों में से जिस गुण का आधिक्य विचारों में होता है मनुष्य के कर्म भी ठीक उसी प्रकार के ही होते हैं। जैसे सत्त्व के कारण शुभ कर्म और रजोगुण तथा तमोगुण से क्रमश उत्पन्न होते हैं  कामक्रोध से प्रेरित तथा क्रूर पाशविक कर्म। इस प्रकार हम देखते हैं कि इन वासनाओं का ही जगत् में व्यक्त होने वाला स्थूल रूप कर्म कहलाता है।जहाँ मन है वहाँ कर्म भी है। कर्म मन से ही उत्पन्न होते हैं और मन से ही शक्ति प्राप्तकर मन की सहायता से ही किये जाते हैं। परन्तु मन के साथ अविद्याजनित मिथ्या तादात्म्य के कारण मनुष्य स्वयं को ही कर्ता मानता है। कर्तृत्व की भावना होने पर फल की चिन्ता व्याकुलता एवं आसक्ति होना स्वाभाविक ही है।स्वप्न में अपने ही संस्कारों से एक जगत् उत्पन्न करके मनुष्य उसके साथ तादात्म्य स्थापित करता है उसे ही स्वप्नद्रष्टा कहते हैं। स्वप्न के दुख स्वप्नद्रष्टा के लिए होते हैं और किसी के लिए नहीं। स्वप्नजगत् के साथ तादात्म्य को त्यागने पर द्रष्टा के सब दुख समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार वासना इच्छा कर्म अथवा फल स्वयं किसी भी प्रकार की आसक्ति को जन्म नहीं देते किन्तु जब हमारा तादात्म्य मन के साथ हो जाता है तो कर्तृत्व और आसक्ति दोनों की ही उत्पत्ति होती है। जिस क्षण इस विवेक का उदय होता है आसक्ति का अस्तित्व वहाँ नहीं रह पाता। जीवन शान्तिमय हो जाता है।परन्तु ज्ञानी पुरुष आसक्त नहीं होते क्योंकि"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.27. The actions are performed part by part,  by the Strands of the Prakrti;  [yet] the person, having his self  (mind) deluded with egoity,  imagines 'I am [alone] the doer'."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.27 Actions are being performed in every way by the Gunas of Prakrti. He whose nature is deluded by egoism, thinks, 'I am the doer.'"
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.27 While actions are being done in every way by the gunas (alities) of Nature, one who is deluded by egoism thinks thus: 'I am the doer.'"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.27।।विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह  प्रकृतेरिति। प्रकृतेर्गुणैरिन्द्रियादिभिः। प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि तत्सम्बन्धीनि च। न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.27।।अज्ञानां कर्मसङ्गिनामित्युक्तं तेनोत्तरश्लोकस्य संगतिमाह  अविद्वानिति। कर्तृत्वमात्मनो वास्तवमित्यभ्युपगमाद्विद्वान्कथं कुर्वन्नेव तस्याभावं पश्यतीत्याशङ्क्याह  प्रकृतेरिति। कर्मस्वविदुषः सक्तिप्रकारं प्रकटयन्व्याकरोति  प्रकृतेरित्यादिना। प्रधानशब्देन मायाशक्तिरुच्यते अविद्ययेत्युभयतः संबध्यते।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।",
        "hc": "।।3.27।। व्याख्या--'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः'-- जिस समष्टि शक्तिसे शरीर, वृक्ष आदि पैदा होते और बढ़ते-घटते हैं, गङ्गा आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं, मकान आदि पदार्थोंमें परिवर्तन होताहै, उसी समष्टि शक्तिसे मनुष्यकी देखना, सुनना, खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ होती हैं। परन्तु मनुष्य अहंकारसे मोहित होकर, अज्ञानवश एक ही समष्टि शक्तिसे होनेवाली क्रियाओंके दो विभाग कर लेता है-- एक तो स्वतः होनेवाली क्रियाएँ; जैसे-- शरीरका बनना, भोजनका पचना इत्यादि; और दूसरी, ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ; जैसे-- देखना, बोलना, भोजन करना इत्यादि। ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाओंको मनुष्य अज्ञानवश अपनेद्वारा की जानेवाली मान लेता है।प्रकृतिसे उत्पन्न गुणों-(सत्त्व, रज और तम-) का कार्य होनेसे बुद्धि, अहंकार, मन, पञ्चमहाभूत, दस इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके शब्दादि पाँच विषय-- ये भी प्रकृतिके गुण कहे जाते हैं। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ (चाहे समष्टिकी हों या व्यष्टिकी) प्रकृतिके गुणों द्वारा ही की जाती हैं, स्वरूपके द्वारा नहीं।    'अहंकारविमूढात्मा'-- 'अहंकार' अन्तःकरणकी एक वृत्ति है। 'स्वयं' (स्वरूप) उस वृत्तिका ज्ञाता है। परन्तु भूलसे स्वयं को उस वृत्तिसे मिलाने अर्थात् उस वृत्तिको ही अपना स्वरूप मान लेनेसे यह मनुष्य विमूढात्मा कहा जाता है।   जैसे शरीर 'इदम्' (यह) है ऐसे ही अहंकार भी इदम् (यह) है। 'इदम्'(यह) कभी 'अहम्' (मैं) नहीं हो सकता-- यह सिद्धान्त है। जब मनुष्य भूलसे 'इदम्' को 'अहम्' 'अर्थात्' 'यह' को 'मैं' मान लेता है, तब वह 'अहंकारविमूढात्मा' कहलाता है। यह माना हुआ अहंकार उद्योग करनेसे नहीं मिटता; क्योंकि उद्योग करनेमें भी अहंकार रहता है। माना हुआ अहंकार मिटता है-- अस्वीकृतिसे अर्थात् 'न मानने' से।विशेष बात'अहम्' दो प्रकारका होता है (1) वास्तविक (आधाररूप) 'अहम्' (टिप्पणी प0 161) जैसे मैं हूँ (अपनी सत्तामात्र)।(2) अवास्तविक (माना हुआ) 'अहम्' जैसे मैं शरीर हूँ। 'वास्तविक अहम्' स्वाभाविक एवं नित्य और 'अवास्तविक अहम्' अस्वाभाविक एवं अनित्य होता है। अतः 'वास्तविक अहम्' विस्मृत तो हो सकता है, पर मिट नहीं सकता; और 'अवास्तविक अहम्' प्रतीत तो हो सकता है, पर टिक नहीं सकता। मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह 'वास्तविक अहम्'-(अपने स्वरूप-) को विस्मृत करके 'अवास्तविक अहम्'-(मैं शरीर हूँ-) को ही सत्य मान लेता है।    'कर्ताहमिति मन्यते'-- यद्यपि सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिजन्य गुणोंके द्वारा ही किये जाते हैं, तथापि अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य कुछ कर्मोंका कर्ता अपनेको मान लेता है। कारण कि वह अहंकारको ही अपना स्वरूप मान बैठता है। अहंकारके कारण ही मनुष्य शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिमें 'मैं'-पन कर लेता है और उन-(शरीरादि) की क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है। यह विपरीत मान्यतामनुष्यने स्वयं की है, इसलिये इसको मिटा भी वही सकता है। इसको मिटानेका उपाय है-- इसे विवेक-विचारपूर्वक न मानना; क्योंकि मान्यतासे ही मान्यता कटती है।एक 'करना' होता है, और एक 'न करना'। जैसे 'करना' क्रिया है, ऐसे ही 'न करना' भी क्रिया है। सोना, जागना, बैठना, चलना, समाधिस्थ होना आदि सब क्रियाएँ हैं। क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है। 'स्वयं'-(चेतन स्वरूप-) में करना और न करना-- दोनों ही नहीं हैं; क्योंकि वह इन दोनोंसे परे है। वह अक्रिय और सबका प्रकाशक है। यदि 'स्वयं' में भी क्रिया होती, तो वह क्रिया (शरीरादिमें परिवर्तनरूपक्रियाओं) का ज्ञाता कैसे होता? करना और न करना वहाँ होता है, जहाँ 'अहम्' (मैं) रहता है। 'अहम्' न रहनेपर क्रियाके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। करना और न करना--दोनों जिससे प्रकाशित होते हैं, उस अक्रिय तत्त्व (अपने स्वरूप) में मनुष्यमात्रकी स्वाभाविक स्थिति है। परन्तु 'अहम्' के कारण मनुष्य प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्रकृति-(जड-) से माना हुआ सम्बन्ध ही 'अहम्' कहलाता है।विशेष बातजिस प्रकार समुद्रका ही अंश होनेके कारण लहर और समुद्रमें जातीय एकता है अर्थात् जिस जातिकी लहर है, उसी जातिका समुद्र है, उसी प्रकार संसारका ही अंश होनेके कारण शरीरकी संसारसे जातीय एकता है। मनुष्य संसारको तो 'मैं' नहीं मानता, पर भूलसे शरीरको 'मैं' मान लेता है।जिस प्रकार समुद्रके बिना लहरका अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार संसारके बिना शरीरका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला मनुष्य जब शरीरको 'मैं' (अपना स्वरूप) मान लेता है, तब उसमें अनेक प्रकारकी कामनाएँ उत्पन्न होने लगती हैं; जैसे-- मुझे स्त्री, पुत्र, धन आदि पदार्थ मिल जायँ, लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा आदर-सम्मान करें, मेरे अनुकूल चलें इत्यादि। उसका इस ओर ध्यान ही नहीं जाता कि शरीरको अपना स्वरूप मानकर मैं पहलेसे ही बँधा बैठा हूँ अब कामनाएँ करके और बन्धन बढ़ा रहा हूँ-- अपनेको और विपत्तिमें डाल रहा हूँ।साधनकालमें 'मैं (स्वयं) प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा अतीत हूँ ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक ऐसा मान लेता है, तब उसे वैसा ही अनुभव हो जाता है। इस प्रकार जैसे वह गलत मान्यता करके बँधा था, ऐसे ही सही मान्यता करके मुक्त हो जाता है; क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे मिट जाती है-- यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवान्ने पाँचवें अध्यायके आठवें श्लोकमें-- 'नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्' पदोंमें 'मन्येत' पदसे प्रकट किया है कि 'मैं कर्ता हूँ'-- इस अवास्तविक मान्यताको मिटानेके लिये 'मैं कुछ भी नहीं करता'--ऐसी वास्तविक मान्यता करना होगी। 'मैं शरीर हूँ; मैं कर्ता हूँ' आदि असत्य मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो जाती हैं कि उन्हें छोड़ना कठिन मालूम देता है; फिर 'मैं शरीर नहीं हूँ; मैं अकर्ता हूँ' आदि सत्य मान्यताएँ दृढ़ कैसे नहीं होंगी ?और एक बार दृढ़ हो जानेपर फिर कैसे छूटेंगी?"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.27।।प्रकृतेः गुणैः सत्त्वादिभिः स्वानुरूपं क्रियमाणानि कर्माणि प्रति अहंकारविमूढात्मा अहं कर्ता इति मन्यते। अहंकारेण विमूढ आत्मा यस्य असौ अहंकारविमूढात्मा अहंकारो नाम अनहमर्थे प्रकृतौ अहम् इति अभिमानः तेन अज्ञातात्मस्वरूपो गुणकर्मसु अहं कर्ता इति मन्यते इत्यर्थः।",
        "et": "3.27 It is the Gunas of Prakrti like Sattva, Rajas etc., that perform all the activities appropriate to them. But the man, whose nature is deluded by his Ahankara, thinks, 'I am the doer of all these actions.' Ahankara is the mistaken conception of 'I' applied to the workings of Prakrti which is not the 'I'. The meaning is that it is because of this (Ahankara), that one who is ignorant of the real nature of the self, thinks, 'I am the doer' with regard to the activities that are really being done by the Gunas of Prakrti."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.27।।अज्ञानामित्युक्तम्।  तदज्ञत्वं दर्शयति  प्रकृतेरिति।  प्रकृतिसंबन्धिभिः गुणैः सत्त्वाद्यैः किल कर्माणि क्रियन्ते।  मूढश्च अहं कर्ता इत्यध्यवस्य(S omits अध्यवस्य) मिथ्यैव आत्मानं बध्नाति।",
        "et": "3.27 Prakreh  etc.  Indeed the actions are performed by the Strands,  Sattva etc.,  belonging to the Prakrti.  But the fool unnecessarily binds himself  by wrongly comprehending 'I' am the doer'."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.27।।मूर्ख अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें किस प्रकार आसक्त होता है सो कहते हैं  सत्त्व रजस् और तमस्  इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है उसका नाम प्रधान या प्रकृति है उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा  कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा  देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उनउन कर्मोंका मैं कर्ता हूँ  ऐसा मान बैठता है।",
        "sc": "।।3.27।। प्रकृतेः प्रकृतिः प्रधानं सत्त्वरजस्तमसां गुणानां साम्यावस्था तस्याः प्रकृतेः गुणैः विकारैः कार्यकरणरूपैः क्रियमाणानि कर्माणिलौकिकानि शास्त्रीयाणि च सर्वशः सर्वप्रकारैः अहंकारविमूढात्मा कार्यकरणसंघातात्मप्रत्ययः अहंकारः तेन विविधं नानाविधं मूढः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं कार्यकरणधर्मा कार्यकरणाभिमानी अविद्यया कर्माणि आत्मनि मन्यमानः तत्तत्कर्मणाम् अहं कर्ता इति मन्यते।।यः पुनर्विद्वान्",
        "et": "3.27 Karmani kriyamanani, while actions, secular and scriptural, are being done; sarvasah, in ever way; gunaih, by the gunas, (i.e.) by the modifications in the form of body and organs; (born) prakrteh, of Nature-Nature, (otherwise known as) Pradhana [Pradhana, Maya, the Power of God.], being the state of eilibrium of the three alities of sattva, rajas and tamas; ahankara-vimudha-atma, one who is deluded by egoism; manyate, thinks; iti, thus; 'Aham karta, I am the doer.'\nAhankara is self-identification with the aggregate of body and organs. He whose atma, mind, is vimudham, diluded in diverse ways, by that (ahankara) is ahankara-vimudha-atma. He who imagines the characteristics of the body and organs to be his own, who has self-identification with the body and the organs, and who, through ignorance, believes the activities to be his own-, he thinks, 'I am the doer of those diverse activities.'"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.27  3.28।।प्रकृतेः क्रियमाणानि इति श्लोकद्वयस्यास्फुटत्वात्तात्पर्यमाह  विद्वदिति। यथायोगं सम्बन्धः न यथाक्रमम्। कर्मभेदं कर्मवैलक्षण्यं आह प्रपञ्चयतीत्यर्थः।सक्ताः कर्मणि 3।25 इत्यादिनोक्तत्वात्। व्यवहितत्वादन्वयं दर्शयन् गुणशब्दस्यानेकार्थत्वात् विवक्षितमर्थमाह  प्रकृतेरिति। आदिपदेन शरीरमनसोर्ग्रहणम्। कथमिन्द्रियादीनां द्रव्याणां प्रकृतिगुणत्वमित्यत आह  प्रकृतिमिति। गुणभूतान्यप्रधानानि। प्रकारान्तरेण व्याचष्टे  तदिति। प्रकृतिकार्याणि चेत्यर्थः। गुणशब्दः कार्यार्थ इत्युक्तं भवति। ननु जीवस्यापि कर्तृत्वात्अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते इति कथमुच्यते इत्यत आह  न हीति। स्वातन्त्र्येणेति शेषः।।गुणानां कर्मणां चान्योन्यं यो विभागस्तस्मिन्वक्तव्ये एकवचनेनालं कथं द्विवचनं केन वाऽस्यान्वयः इति शङ्काविभागशब्दस्यार्थं वदन्परिहरति  कर्मेति।जीवेश्वरप्रकृतिलक्षणसम्बन्धिभेदात् कर्मणामिन्द्रियादीनां च भेदोऽत्र विवक्षितो ग्रन्थान्तरादवगन्तव्यः। गुणा गुणेष्विति पदद्वयस्य विवक्षितमर्थमाह  गुणा इति।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.27  3.28।।कर्म कुर्वतोर्विद्वदविदुषोर्विशेषं स्पष्टं सन्दर्शयति  प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृते योगे साङ्खयरीत्या विशेषदर्शनमिति नाप्रकृतप्रसङ्गः। तथाहि ब्रह्मवादिसाङ्ख्ये जगतः कर्त्ता भोक्ता सर्वधर्माश्रयः पुरुषोत्तम एवांशतोऽक्षरः कालः प्रकृतिः पुरुष आत्मा भवति स (इममेव) आत्मानं द्वेधापातयत् (ततः) पतिश्च पत्नी चाभवत् बृ.उ.1।4।3 इति श्रुतेः। तत्र कर्त्री प्रकृतिस्तत्संसृष्टतया पुरुषश्च भोक्ता। वस्तुतः पुष्करपलाशवत्प्राकृतधर्मैरवशस्तथापि तद्गुणैः परिणतगुणैरिन्द्रियैरिन्द्रियनिष्ठैर्वा गुणैः क्रियमाणानि कर्मामि कर्त्ताऽहं पुरुष इति मन्यते विपरीतमतिः। गुणेः कर्माणि क्रियन्ते न केवलेनात्मनेति। विभागतत्त्ववित्तु न सज्जते। इन्द्रियनिष्ठा गुणा विषयगुणेषु वर्तन्ते इति मननात्साङ्ख्ययोगयोरेक एवार्थः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.27।।विद्वदविदुषोः कर्मानुष्ठानसाम्येऽपि कर्तृत्वाभिमानतदभावाभ्यां विशेषं दर्शयन्सक्ताः कर्मणीति (25) श्लोकार्थं विवृणोति द्वाभ्याम्  प्रकृतिर्माया सत्त्वरजस्तमोगुणमयी मिथ्याज्ञानात्मिका पारमेश्वरी शक्तिः।मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति श्रुतेः। तस्याः प्रकृतेर्गुणैर्विकारैः कार्यकारणरूपैः क्रियमाणानि लौकिकानि वैदिकानि च कर्माणि सर्वशः सर्वप्रकारैरहंकारेण कार्यकारणसंघातात्मप्रत्ययेन विमूढः स्वरूपविवेकासमर्थ आत्मान्तःकरणं यस्य सोऽहंकारविमूढात्माऽनात्मन्यात्माभिमानी तानि कर्माणि कर्ताहमिति करोम्यहमिति मन्यते कर्त्रध्यासेन। कर्ताहमिति तृन्प्रत्ययः। तेनन लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् इति षष्ठीप्रतिषेधः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.27।।ननु विदुषापि चेत्कर्म कर्तव्यं तर्हि विद्वदविदुषोः को विशेष इत्याशङक्योभयोर्विशेषं दर्शयति  प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृतेर्गुणैः प्रकृतिकार्यैरिन्द्रियैः सर्वप्रकारेण क्रियमाणानि यानि कर्माणि तान्यहमेव कर्ता करोमीति मन्यसे। तत्र हेतुः। अहंकारेणेन्द्रियादिष्वात्माध्यासेन विमूढ आत्मा बुद्धिर्यस्य सः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.27।।सक्ताः कर्मणीत्येतं श्लोकं व्याचष्टे  प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृतेः प्रधानस्य मायाशक्तेर्गुणैर्विकारैः कार्यकारणरुपैः क्रियमाणानि कर्माणि सर्वाणि सर्वशः सर्वप्रकारैः कार्यकरणसंघातेऽहंप्रत्ययोऽहंकारस्तेन विमूढः स्वात्मस्वरुपविवेकासमर्थः आत्मान्तःकरणं यस्य सोऽविद्यया कर्मणाभहंकर्तेति मन्यते।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 3.27 लोकस्य सङ्ग्रहणमेकीकृत्य स्वीकरणं स्वानुष्ठाने समानाभिप्रायतया सयूथ्यतापादनमित्यर्थः। कर्मवासना उत्तरोत्तरपुण्यपापारम्भकपूर्वपूर्वपुण्यपापांशविशेषः उत्तरोत्तरशरीरप्रेरणसमर्थस्मृतिहेतुः पूर्वपूर्वशरीरप्रेरणानुभवविशेषजनितसंस्कारो वा वादित्रवादनादिसंस्कारवत्। बुद्धिभेदो बुद्धेरन्यथाकरणम् तच्च प्रकृतविषयं दर्शयति  कर्मयोगादन्यदित्यादिना।युक्तः इत्यनेन लोकसङ्ग्रहार्थं कुर्वतः स्वापेक्षितविलम्बाभावाय प्रागुक्तनिरपेक्षत्वबुद्धियोगो विवक्षित इतिबुद्ध्या युक्त इत्युक्तम्।जोषयेत् इत्यस्यार्थ  प्रीतिं जनयेदिति।जुषी प्रीतिसेवनयोः इति धातुः। कर्मसङ्गिनः पुरुषान् सर्वकर्माणि जोषयेदित्यन्वयः।।प्रकृतेः इत्यादिश्लोकचतुष्टयस्यार्थमाह  कर्मयोगमिति।विदुषोऽविदुषश्चेति व्युत्क्रमेण श्लोकद्वयार्थः। तृतीये त्वेतद्विशदीकरणमुखेनाविचालनमुक्तम्।कर्मयोगापेक्षितं कर्मयोगेति कर्तव्यताभूतमित्यर्थः।प्रकृतेर्गुणैः इत्युक्ते प्रसिद्धिप्रकर्षादिसिद्धं विशेषं प्रस्तुतानुपयुक्तशब्दादिप्राकृतगुणव्यवच्छेदायाहसत्त्वादिभिरिति। वक्ष्यमाणसात्विकादिकर्मविभागंसर्वशः इति प्रकारवाचिपदसूचितमाह  स्वानुरूपमिति।कर्ता इति तृजन्तयोगात् षष्ठीप्राप्तिः स्यादिति तत्परिहाराय कर्मसु कर्तृत्वाहन्त्वोक्तिभ्रमव्युदासाय चकर्माणि प्रतीत्युक्तम्। तृन्नन्तत्वविवक्षायां त्वियं फलितोक्तिः।अहङ्कारविमूढात्मेति  समानांशत्रयस्य बह्वर्थपरस्य अत्रार्थं विवक्षन् विगृह्णातिअहङ्कारेणेति। नात्राहम्भावमात्रमुच्यते तस्यात्मस्वभावान्तर्गतत्वात् नापि अहङ्काराख्यमचिद्द्रव्यं तस्यापि देहात्मभ्रमं द्वारीकृत्य कार्यकरत्वे सति अव्यवहितस्यैव वक्तुमुचितत्वात् नापि गर्वः उत्कृष्टपरिभवादिहेतुत्वेनानिर्देशात्। अतोऽहङ्कार इति देहात्मभ्रम एवात्र विवक्षित इत्यभिप्रायेणाह  अहङ्कारो नाम अनहमर्थे प्रकृतावहमभिमान इति। एतेनाहङ्कारशब्दस्याभूततद्भावे च्विप्रत्ययेन व्युप्तत्तिर्दर्शिता।अज्ञातात्मस्वरूप इति। विमूढ आत्मा स्वरूपं यस्य स विमूढात्मादिशो विमुह्येयुः इतिवद्विमूढशब्दोऽत्र मोहविषयसमानाधिकरण इति भावः।गुणकर्मविभागयोः इत्यत्र उपसर्जनान्वयिषष्ठीत्वादपि विषयसप्तमीत्वमुचितमिति मत्वोक्तं  सत्त्वादिगुणविभागे तत्तत्कर्मविभागे चेति। विभागशब्दो द्वन्द्वात्परत्वात् प्रत्येकमन्वितः। गुणानां साक्षाद्गुणेषु वृत्त्यभावात् परोक्तप्रक्रिययेन्द्रियतद्विषयादिविवक्षायां पदद्वयोपचारात् सप्तम्यन्तो गुणशब्दो गुणकार्येष्वौपचारिक इत्यभिप्रायेणोक्तंस्वगुणेषु स्वेषु कार्येष्विति। गुणकार्याणि च विभजिष्यन्ते। यद्वा कारणस्य प्राधान्यात्कार्यस्य च तदपेक्षया गुणत्वादेवमुक्तम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.27।।ननु विद्वानपि चेत्तथा कुर्यात्तदाऽविदुषः सकाशात् को भेदः तज्ज्ञानस्य च क्वोपयोगः सम्पूर्णे काले कर्मव्यावृत्त्यासेवाद्यनवसरादित्यतोऽविदुषो विदुषश्च भेदमाह  प्रकृतेरिति। अहङ्कारेण विमूढात्मा अविद्वान् सर्वशः प्रकृतेर्गुणैरिन्द्रियैः क्रियमाणानि कर्माणिअहमेव कर्ता इति मन्यते न तु भगवदिच्छाम्। तानि च भगवाँल्लोकव्यामोहार्थं कारयति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.27।।अविद्वान्कथं कर्मसु सज्जत इत्यत आह  प्रकृतेरिति। प्रकृतेः पारमेश्वर्याः सत्वरजस्तमोगुणात्मिकायाःदेवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् इति श्रुतिप्रसिद्धायाः शक्तेर्गुणैः कार्यकारणसंघातात्मकैः क्रियमाणानि कर्माणि अहंकारेण स्वस्मिन्नध्यस्तेन विमूढः तदीयान्कर्तृत्वादीनात्मधर्मत्वेन पश्यन् आत्मनश्चासङ्गानन्दसंविद्रूपतामपश्यन्नात्मा अहंकारेण विमूढश्चासावात्मा चेति विग्रहः। अहं कर्माणि करोमि कर्मणां कर्तेति मन्यते कर्त्रध्यासेन। कर्ताहमिति तृन्प्रत्ययस्तेननलोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् इति षष्ठीनिषेधः। अन्यथा तृच्प्रत्यये कर्मणां कर्ताहमिति षष्ठ्या भाव्यम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The spirit soul bewildered by the influence of false ego thinks himself the doer of activities that are in actuality carried out by the three modes of material nature.",
        "ec": " Two persons, one in Kṛṣṇa consciousness and the other in material consciousness, working on the same level, may appear to be working on the same platform, but there is a wide gulf of difference in their respective positions. The person in material consciousness is convinced by false ego that he is the doer of everything. He does not know that the mechanism of the body is produced by material nature, which works under the supervision of the Supreme Lord. The materialistic person has no knowledge that ultimately he is under the control of Kṛṣṇa. The person in false ego takes all credit for doing everything independently, and that is the symptom of his nescience. He does not know that this gross and subtle body is the creation of material nature, under the order of the Supreme Personality of Godhead, and as such his bodily and mental activities should be engaged in the service of Kṛṣṇa, in Kṛṣṇa consciousness. The ignorant man forgets that the Supreme Personality of Godhead is known as Hṛṣīkeśa, or the master of the senses of the material body, for due to his long misuse of the senses in sense gratification, he is factually bewildered by the false ego, which makes him forget his eternal relationship with Kṛṣṇa."
    }
}
