{
    "_id": "BG3.26",
    "chapter": 3,
    "verse": 26,
    "slok": "न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |\nजोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ||३-२६||",
    "transliteration": "na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām .\njoṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||3-26||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.26।। ज्ञानी पुरुष, कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर, उनसे भी वैसा ही कराये।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.26 Let no wise man unsettle the mind of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion.",
        "ec": "3.26 न not? बुद्धिभेदम् unsettlement in the mind? जनयेत् should produce? अज्ञानाम् of the ignorant? कर्मसङ्गिनाम् of the persons attached to actions? जोषयेत् should engage? सर्वकर्माणि all actions? विद्वान् the wise? युक्तः balanced? समाचरन् performing.Commentary An ignorant may says to himelf? I shall do this action and thery enjoy its fruit. A wise man should not unsettle his belief. On the contrary he himself should set an example by performing his duties diligently but without attachment. The wise man should also persuade the ignorant never to neglect their duties. If need be? he should place before them in vivid colours the happiness they would enjoy here and hereafter by discharging such duties. When their hearts get purified in course of time? the wise man could sow the seeds of Karma Yoga (selfless service without deire) in them."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.26 But a wise man should not perturb the minds of the ignorant, who are attached to action; let him perform his own actions in the right spirit, with concentration on Me, thus inspiring all to do the same."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.26।। यह संभव है कि आत्मानुभूति के पश्चात् ज्ञानी पुरुष जब कार्य क्षेत्र में प्रवेश करे तो तत्त्वज्ञान का सर्वोच्च उपदेश देना प्रारम्भ कर दे जिसे समझने की योग्यता लोगों में न हो। उस पीढ़ी के लोग उस विद्वान पुरुष के कथन का विपरीत अर्थ लगाकर यह समझ सकते हैं कि कर्म का संन्यास सत्य की प्राप्ति का सीधा मार्ग है। ऐसे गुरुओं को यहाँ सावधान किया गया है क्यांेकि इससे लोगों का कर्म करने में उत्साह कम हो सकता है।जीवन गतिशील है। कोई भी निष्क्रिय होकर बैठ नहीं सकता। जीवन की निरन्तर अग्रगामी कर्मरूपी गतिशील धारा के प्रवाह के मध्य में यदि कोई मार्गदर्शक गुरु दोनों हाथ उठाकर अपनी पीढ़ी के लोगों को अकस्मात रुकने का आदेश दें तो उस प्रवाह में वे स्वयं ही छिन्नभिन्न होकर रह जायेंगे। अनेक धर्मोपदेशकों ने यह गलती की और उन्हें उसका मूल्य भी चुकाना पड़ा। यहाँ श्रीकृष्ण मार्गदर्शन करते हुये कहते हैं कि ऐसे धर्मोपदेशकों को चाहिये कि वे समय की गति को पहचान कर कार्य करें जीवनी शक्ति का विरोध करके नहीं।समाज के मार्गदर्शन की पद्धति इस श्लोक में बताई गई है जो समस्त नेतृत्व वर्ग के लिये उपयोगी है। वे सामाजिक राजनैतिक अथवा सांस्कृतिक किसी भी क्षेत्र में क्यों न कार्य कर रहे हों। यदि किसी काल में कोई समाज किसी विशेष दिशा में आगे बढ़ रहा हो तो नेता को अपनी पीढ़ी के साथ मिलकर स्वयं के उदाहरण के द्वारा धीरेधीरे लोगों को सही दिशा में ले जाने का प्रयत्न करना चाहिये।यदि कोई व्यक्ति हरिद्वार जाने के लिये कार को तेज गति से परन्तु विपरीत दिशा में चला रहा हो तो उसकी दिशा सुधारने का उपाय यह नहीं कि अचानक उसे रोक दें किन्तु उसकी दिशा मात्र को बदलें। कार के रुक जाने मात्र से वह किसी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकेगा।इसी प्रकार मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिये। यदि वह गलत दिशा में भी जा रहा हो तो केवल कर्म से ही वह सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। विद्वान् पुरुष अज्ञानी को कर्म की प्रवृत्ति से विचलित न करे बल्कि स्वयं कुशलतापूर्वक कर्म का आचरण करे जिससे सामान्य जन उसका सरलता से अनुसरण कर सकें।किस प्रकार अज्ञानी पुरुष कर्म में आसक्त होता है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.26. Let the wise master of Yoga fulfil (or destroy) all actions by performing them all, and let him not creat any disturbance in the mind of the ingnorant persons attached to action."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.26 He should not bewilder the minds of the ignorant who are attached to work; rather himself performing work with devotion, he should cause others to do so."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.26  The enlightened man should not create disturbance in the beliefs of the ignorant, who are attached to work. Working, while himself remaining deligen [Some translate yuktah as, 'in the right manner'. S. takes it in the sense of Yoga-yuktah, merged in yoga.-Tr.], he should make them do [Another reading is yojayet, meaning the same as josayet.-Tr.] all the duties."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.26।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.26।।वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकमवतारयति  एवमिति। कर्तव्यं कर्मेति शेषः। पूर्वार्धमेवं व्याख्यायोत्तरार्धं प्रश्नपूर्वकमवतार्य व्याचष्टे  किंतु कुर्यादिति। सर्वकर्माणि कारयेत्तेषु प्रीतिं कुर्वन्निति शेषः। कथं कारयेदित्याकाङ्क्षायामाह  तदेवेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.25 -- 3.26।। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।",
        "hc": "3.26।। व्याख्या--'सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो तथा कुर्वन्ति भारत'-- जिन मनुष्योंकी शास्त्र, शास्त्र-पद्धति और शास्त्र-विहित शुभकर्मोंपर पूरी श्रद्धा है एवं शास्त्रविहित कर्मोंका फल अवश्य मिलता है-- इस बातपर पूरा विश्वास है; जो न तो तत्त्वज्ञ हैं और न दुराचारी हैं; किन्तु कर्मों, भोगों एवं पदार्थोंमें आसक्त हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये यहाँ 'सक्ताः अविद्वांसः' पद आये हैं। शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी केवल कामनाके कारण ऐसे मनुष्य अविद्वान् (अज्ञानी) कहे गये हैं। ऐसे पुरुष शास्त्रज्ञ तो हैं, पर तत्त्वज्ञ नहीं। ये केवल अपने लिये कर्म करते हैं, इसीलिये अज्ञानी कहलाते हैं।ऐसे अविद्वान् मनुष्य कर्मोंमें कभी प्रमाद, आलस्य आदि न रखकर सावधानी और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म करते हैं; क्योंकि उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि कर्मोंको करनेमें कोई कमी आ जानेसे उनके फलमें भी कमी आ जायगी। भगवान् उनके इस प्रकार कर्म करनेकी रीतिको आदर्श मानकर सर्वथा आसक्तिरहित विद्वान्के लिये भी इसी विधिसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं।\n\n'कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्'-- जिसमें कामना, ममता, आसक्ति, वासना, पक्षपात, स्वार्थ आदिका सर्वथा अभाव हो गया है और शरीरादि पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी लगाव नहीं रहा, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके लिये यहाँ 'असक्तः विद्वान्' पद आये हैं (टिप्पणी प0 158)।बीसवें 'श्लोकमें''लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्' कहकर फिर इक्कीसवें श्लोकमें जिसकी व्याख्या की गयी, उसीको यहाँ 'लोकसंग्रहं चिकीर्षुः'पदोंसे कहा गया है।श्रेष्ठ मनुष्य (आसक्तिरहित विद्वान्) के सभी आचरण स्वाभाविक ही यज्ञके लिये, मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये होते हैं। जैसे भोगी मनुष्यकी भोगोंमें, मोही मनुष्यकी कुटुम्बमें और लोभी मनुष्यकी धनमें रति होती है, ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यकी प्राणिमात्रके हितमें रति होती है। उसके अन्तःकरणमें 'मैं लोकहित करता हूँ'-- ऐसा भाव भी नहीं होता, प्रत्युत उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक लोकहित होता है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेके कारण उस ज्ञानी महापुरुषके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि भी 'लोकसंग्रह' पदमें आये 'लोक' शब्दके अन्तर्गत आते हैं।दूसरे लोगोंको ऐसे ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहकी इच्छावाले दीखते हैं, पर वास्तवमें उनमें लोकसंग्रहकी भी इच्छा नहीं होती। कारण कि वे संसारसे प्राप्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, पद, अधिकार, धन, योग्यता, सामर्थ्य आदिको साधनावस्थासे ही कभी किञ्चिन्मात्र भी अपने और अपने लिये नहीं मानते, प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही मानते हैं, जो कि वास्तवमें है। वही प्रवाह रहनेके कारण सिद्धावस्थामें भी उनके कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ स्वतःस्वाभाविक, किसी प्रकारकी इच्छाके बिना संसारकी सेवामें लगे रहते हैं।इस श्लोकमें 'यथा' और 'तथा' पद कर्म करनेके प्रकारके अर्थमें आये हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अज्ञानी (सकाम) पुरुष अपने स्वार्थके लिये सावधानी और तत्परतापूर्वक कर्म करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी लोकसंग्रह अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करे। ज्ञानी पुरुषको प्राणिमात्रके हितका भाव रखकर सम्पूर्ण लौकिक और वैदिक कर्तव्य-कर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये। सबका कल्याण कैसे हो?-- इस भावसे कर्तव्य-कर्म करनेपर लोकमें अच्छे भावोंका प्रचार स्वतः होता है।अज्ञानी पुरुष तो फलकी प्राप्तिके लिये सावधानी और तत्परतासे विधिपूर्वक कर्तव्य-कर्म करता है, पर ज्ञानी पुरुषकी फलमें आसक्ति नहीं होती और उसके लिये कोई कर्तव्य भी नहीं होता। अतः उसके द्वारा कर्मकी उपेक्षा होना सम्भव है। इसीलिये भगवान् कर्म करनेके विषयमें ज्ञानी पुरुषको भी अज्ञानी (सकाम) पुरुषकी ही तरह कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।इक्कीसवें श्लोकमें तो विद्वान्को 'आदर्श' बताया गया था पर यहाँ उसे 'अनुयायी' बताया है। तात्पर्य यह है कि विद्वान् चाहे आदर्श हो अथवा अनुयायी, उसके द्वारा स्वतः लोगसंग्रह होता है। जैसे भगवान् श्रीराम प्रजाको उपदेश भी देते हैं और पिताजीकी आज्ञाका पालन करके वनवास भी जाते हैं। दोनों ही परिस्थितियोंमें उनके द्वारा लोकसंग्रह होता है; क्योंकि उनका कर्मोंके करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं था।जब विद्वान् आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्म करता है, तब आसक्तियुक्त चित्तवाले पुरुषोंके अन्तःकरणपर भी विद्वान्के कर्मोंका स्वतः प्रभाव पड़ता है, चाहे उन पुरुषोंको यह महापुरुष निष्कामभावसे कर्म कर रहा है'-- ऐसा प्रत्यक्ष दीखे या न दीखे। मनुष्यके निष्कामभावोंका दूसरोंपर स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है-- यह सिद्धान्त है। इसलिये आसक्तिरहित विद्वान्के भावों आचरणोंका प्रभाव मनुष्योंपर ही नहीं, अपितु पशु-पक्षी आदिपर भी पड़ता है।विशेष बातमनुष्य जबतक निष्कामभावपूर्वक विहित-कर्म नहीं करता, तबतक उसका जन्म-मरण नहीं मिट सकता। वह जबतक अपने लिये कर्म करता है, तबतक वह कृतकृत्य नहीं होता अर्थात् उसका 'करना' समाप्त नहीं होता। कारण कि 'स्वयं' नित्य रहनेवाला है और कर्म एवं उसका फल नष्ट होनेवाला है। अतः प्रत्येक मनुष्यके लिये स्वार्थ-त्यागपूर्वक (अपने लिये न करके केवल दूसरोंके हितके लिये) कर्तव्य-कर्म करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।सांसारिक पदार्थोंको मूल्यवान् समझनेके कारण ही कर्मयोग-(निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म-) के पालनमें कठिनाई प्रतीत होती है। हमें दूसरोंसे कुछ न चाहकर केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करने हैं-- इस बातको यदि स्वीकार कर लें तो आज ही कर्मयोगका पालन सुगम हो जाय।वास्तवमें महत्ता पदार्थकी नहीं, प्रत्युत आचरण-(उसके उपयोग-) की ही होती है। आचरणकी महत्ता भी तब है, जब अन्तःकरणमें पदार्थकी महत्ता न हो। कोई भी पदार्थ व्यक्तिगत नहीं है; केवल उपयोगके लिये ही व्यक्तिगत है। पदार्थको व्यक्तिगत माननेसे ही परहितके लिये उसका त्याग कठिन प्रतीत होता है। कोई भीपदार्थ या क्रिया बन्धन-कारक नहीं, उनका सम्बन्ध ही बन्धनकारक है।विद्वान् पुरुषोंसे भी लोकसंग्रहके लिये सब कर्म होते हैं। परन्तु ऐसा होते हुए भी उनमें 'मैं लोगसंग्रह कर रहा हूँ'-- यह अभिमान नहीं रहता। कारण यह है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, विद्या, योग्यता, पद आदि सब संसारके हैं और संसारसे मिले हैं। संसारसे मिली सामग्रीको संसारकी ही सेवामें लगा देना ईमानदारी है। उस सामग्रीको बहुत सच्चाईसे, ईमानदारीसे संसारके अर्पण कर देना है। यह अर्पण करनाकोई बड़ा काम नहीं है। जैसे किसीने हमारे पास धरोहररूपसे रुपये रखे और कुछ समय बाद उसके माँगनेपर हमने उसके रुपये उसे वापस कर दिये, तो कौन-सा बड़ा काम किया? हाँ, हमारा दायित्व समाप्त हो गया, हम ऋणमुक्त हो गये। इसी प्रकार संसारकी वस्तु संसारके अर्पण कर देनेसे हमारा दायित्व समाप्त हो जाता है, हम ऋणमुक्त हो जाते हैं जन्ममरणके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं। इसलिये सांसारिक पदार्थोंको संसारकी सेवामें लगाकर कोई दानपुण्य नहीं करना है प्रत्युत उन पदार्थोंसे अपना पिण्ड छुड़ाना है।  'न बुद्धिभेदं ৷৷. विद्वानयुक्तः समाचरन्'-- पचीसवें श्लोकमें असक्तः विद्वान् पदोंसे जिसका वर्णन हुआ है, उसी आसक्तिरहित विद्वान्को यहाँ 'युक्तः विद्वान्' पदोंसे कहा गया है।जिसके अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक समता है जिसकी स्थिति निर्विकार है, जिसकी समस्त इन्द्रियाँ अच्छी तरह जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण समान हैं, ऐसा तत्त्वज्ञ महापुरुष ही 'युक्तः विद्वान्' कहलाता है (गीता 6। 8)।पीछेके (पचीसवें) श्लोकमें 'सक्ताः अविद्वांसः' पदोंसे जिनका वर्णन हुआ है, उन्हीं शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी पुरुषोंको यहाँ 'कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानम्' पदोंसे कहा गया है।शास्त्रविहित कर्मोंको अपने लिये (सुख-भोग, मान, बड़ाई आदिकी प्राप्तिके लिये) करनेके कारण इन पुरुषोंको 'कर्मसङ्गी' और 'अज्ञानी' कहा गया है।श्रेष्ठ पुरुषपर विशेष जिम्मेवारी होती है; क्योंकि दूसरे लोग स्वाभाविक ही उसका अनुसरण करते हैं। इसलिये भगवान् उपर्युक्त पदोंसे विद्वानको आज्ञा देते हैं कि उसे ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिये और ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये, जिसे अज्ञानी (कामनायुक्त) पुरुषोंका वर्तमान स्थितिसे पतन हो जाय। अज्ञानी पुरुष अभी जिस स्थितिमें हैं, उस स्थितिसे उन्हें विचलित करना (नीचे गिराना) ही उनमें 'बुद्धिभेद' उत्पन्न करना है। अतः विद्वान्को सबके हितका भाव रखते हुए अपने वर्णाश्रम-धर्मके अनुसार शास्त्रविहत शुभ-कर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये, जिससे दूसरे पुरुषोंको भी निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा मिलती रहे। समाज एवं परिवारके मुख्य व्यक्तियोंपर भी यही बात लागू होती है। उनको भी सावधानीपूर्वक अपने कर्तव्य-कर्मोंका अच्छी तरह आचरण करते रहना चाहिये, जिससे समाज और परिवारपर अच्छा प्रभाव पड़े।बुद्धिभेद पैदा करनेके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-- 1-'कर्मोंमें क्या रखा है? कर्मोंसे जो जीव बँधता है; कर्म निकृष्ट हैं' कर्म छोड़कर ज्ञानमें लगना चाहिये' आदि उपदेश देना अथवा इस प्रकारके अपने आचरणों और वचनोंसे दूसरोंमें कर्तव्यकर्मोंके प्रति अश्रद्धाअविश्वास उत्पन्न करना।2- जहाँ देखो वहीं स्वार्थ है स्वार्थके बिना कोई रह नहीं सकता सभी स्वार्थके लिये कर्म करते हैंमनुष्य कोई कर्म करे तो फलकी इच्छा रहती ही है फलकी इच्छा न रहे तो सभी कर्म करेगा ही क्यों आदि उपदेश देना।3-' फलकी इच्छा रखकर (अपने लिये) कर्म करनेसे (फल भोगनेके लिये) बार-बार जन्म लेना पड़ता है' आदि उपदेश देना। इस प्रकारके उपदेशोंसे कामनावाले पुरुषोंका कर्मफलपर विश्वास नहीं रहता। फलस्वरूप उनकी (फलमें) आसक्ति तो छूटती नहीं; शुभ-कर्म जरूर छूट जाते हैं। बन्धनका कारण आसक्तिही है, कर्म नहीं। इस प्रकार लोगोंमें बुद्धि-भेद उत्पन्न न करके तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने वर्णाश्रम-धर्मके अनुसार स्वयं कर्तव्य-कर्म करे और दूसरोंसे भी वैसे ही करवाये। उसे चाहिये कि वह अपने आचरणों और वचनोंके द्वारा अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम पैदा न करते हुए उन्हें वर्तमान स्थितिसे क्रमशः ऊँचे उठाये। जिन शास्त्रविहित शुभ-कर्मोंको अज्ञानी पुरुष अभी कर रहे हैं, उनकी वह विशेषरूपसे प्रशंसा करे और उनके कर्मोंमें होनेवाली त्रुटियोंसे उन्हें अवगत कराये, जिससे वे उन त्रुटियोंको दूर करके साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म कर सकें। इसके साथ ही ज्ञानी पुरुष उन्हें यह उपदेश दें कि यज्ञ, दान, पूजा पाठ आदि शुभ-कर्म करना तो बहुत अच्छा है, पर उन कर्मोंमें फलकी इच्छा रखना उचित नहीं; क्योंकि हीरेको कंकड़-पत्थरोंके बदले बेचना बुद्धिमत्ता नहीं है। अतः सकामभावका त्याग करके शुभ-कर्म करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है। इस प्रकार सकामभावसे निष्कामभावकी ओर जाना बुद्धिभेद नहीं है, प्रत्युत वास्तविकता है।इसी तरह उपासनाके विषयमें भी तत्त्वज्ञ पुरुषको बुद्धिभेद पैदा नहीं करना चाहिये। जैसे, प्रायः लोग कह दिया करते हैं कि नाम-जप करते समय भगवान्में मन नहीं लगा तो नाम-जप करना व्यर्थ है। परन्तु तत्त्वज्ञ पुरुषको ऐसा न कहकर यह उपदेश देना चाहिये कि नाम-जप कभी व्यर्थ हो ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान्के प्रति कुछ-न-कुछ भाव रहनेसे ही नाम-जप होता है। भावके बिना नाम-जपमें प्रवृत्ति ही नहीं होती। अतः नाम-जपका किसी भी अवस्थामें त्याग नहीं करना चाहिये। जो यह कहा गया है कि 'मनुवाँ तो चहुँ दिसि फिरै यह तो सुमिरन नाहिं' इसका भी यही अर्थ है कि मन न लगनेसे यह 'सुमिरन' (स्मरण) नहीं है, 'जप' तो है ही। हाँ, मन लगाकर ध्यानपूर्वक नाम-जप करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है।  कोई भी मनुष्य सर्वथा गुण-रहित नहीं होता। उसमें कुछ-न-कुछ गुण रहते ही हैं। इसलिये तत्त्वज्ञ महापुरुषको चाहिये कि अगर किसी व्यक्तिको (उसकी उन्नतिके लिये) कोई शिक्षा देनी हो, कोई बात समझानी हो, तो उस व्यक्तिकी निन्दा या अपमान न करके उसके गुणोंकी प्रशंसा करे। गुणोंकी प्रसंशा करते हुए आदरपूर्वक उसे जो शिक्षा दी जायगी, उस शिक्षाका उसपर विशेष असर पड़ेगा। समाज और परिवारके मुख्य व्यक्तियोंको भी इसी रीतिसे दूसरोंको शिक्षा देनी चाहिये। 'समाचरन्' और 'जोषयेत्' पदोंसे भगवान् विद्वान्को दो आज्ञाएँ देते हैं-- (1) स्वयं सावधानीपूर्वक शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोंको अच्छी तरह करे और (2) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी पुरुषोंसे भी वैसे ही कर्म करवाये। लोगोंको दिखानेके लिये कर्म करना 'दम्भ' है, जो पतन करनेवाली आसुरी-सम्पत्तिका लक्षण है (गीता 16। 4)। अतः भगवान् लोगोंको दिखानेके लिये नहीं, प्रत्युत लोकसंग्रहके लिये ही कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि कर्म करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी वह समस्त कर्तव्य-कर्मोंको सुचारुरूसे करता रहे, जिससे कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंकी निष्काम-कर्मोंके प्रति महत्त्वबुद्धि जाग्रत् हो और वे भी निष्कामभावसे कर्म करने लगें। तात्पर्य यह है कि उस महापुरुषके आसक्तिरहित आचरणोंको देखकर अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करनेकी चेष्टा करने लगेंगे।इस प्रकार ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंको आदरपूर्वक समझाकर उनसेनिषिद्धकर्मोंका स्वरूपसे (सर्वथा) त्याग करवाये, और विहित-कर्मोंमेंसे सकाम-भावका त्याग करनेकी प्रेरणा करे। सम्बन्ध-- ज्ञानी और अज्ञानीमें क्या अन्तर है-- इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.26।।अज्ञानाम् आत्मन्यकृत्स्नवित्तया ज्ञानयोगोपादानाशक्तानां मुमुक्षूणां कर्मसङ्गिनाम् अनादिकर्मवासनया कर्मणि एव नियतत्वेन कर्मयोगाधिकारिणांकर्मयोगाद् अन्यथात्मावलोकनम् अस्ति इति न बुद्धिभेदं जनयेत्। किं तर्हि आत्मनि कृत्स्नवित्तया ज्ञानयोगशक्तः अपि पूर्वोक्तरीत्याकर्मयोग एव ज्ञानयोगनिरपेक्ष आत्मावलोकनसाधनम् इति बुद्ध्या युक्तः कर्म एव आचरन् सर्वकर्मसु अकृत्स्नविदां प्रीतिं जनयेत्।अथ कर्मयोगम् अनुतिष्ठतो विदुषः अविदुषश्च विशेषं प्रदर्शयन् कर्मयोगापेक्षितम् आत्मनः अकर्तृत्वानुसन्धानप्रकारम् उपदिशति",
        "et": "3.26 Do not bewilder the minds of ignorant aspirants by saying that there is, besides Karma Yoga, another way to the vision of the self. They cannot practise Jnana Yoga on account of their incomplete knowledge of the self, and attachment to action. They are alified for Karma Yoga because of their being fit only for activity on account of the subtle impressions of their beginningless Karma. What then follows from this?  It is this:  Even though one is alified for Jnana Yoga because of the complete knowledge of the self, one should do work, holding the view as said previously, that Karma Yoga by itself without Jnana Yoga is an independent means for the vision of the self. He should thus generate love for all types of activity among those who do not know the complete truth.\n\nSri Krsna declares (in the verses 27 to 30) the way in which the self is to be contemplated on as not being an agent as reired by Karma Yoga, after demonstrating the difference between the enlightened and unenlightened among those practising Karma Yoga."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.26।।यतस्ते न (S  स्ते सम्य  ) सम्यग्ज्ञानेन पूताः अतो बुद्धेर्भेदनं विचालनं ( N विगलनम्) तेषां परमोऽयमनर्थ इत्यनुग्रहाय भेदयेन्न धियमेषाम् तदाह (S एतदाह)  न बुद्धीति।  स्वयं चैवं बुद्ध्यमानः कर्माणि कुर्यात् न च लोकानां बुद्धिं भिन्द्यात्।",
        "et": "3.26 Na  buddhi-etc.  Himself knowing in this way, let him perform actions and let him not disturb  the minds of common men.\t\t\t\t\t\n [In the last verse]  reference is made  'of  the ignorant person'.  [The Lord]  now demonstrates  their ignorance -"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.26।।इस प्रकार लोकसंग्रह करनेकी इच्छावाले मुझ परमात्माका या दूसरे आत्मज्ञानीका लोकसंग्रहको छोड़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं रह गया है। अतः उस आत्मवेत्ताके लिये यह उपदेश किया जाता है  बुद्धिको विचलित करनेका नाम बुद्धिभेद है ( ज्ञानीको चाहिये कि ) कर्मोंमें आसक्तिवाले  विवेकरहित अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करे अर्थात् मेरा यह कर्तव्य है इस कर्मका फल मुझे भोगना है इस प्रकार जो उनकी निश्चितरूपा बुद्धि बनी हुई है उसको विचलित करना बुद्धिभेद करना है सो न करे। तो फिर क्या करे समाहितचित्त विद्वान् स्वयं अज्ञानियोंके ही ( सदृश ) उन कर्मोंका ( शास्त्रानुकूल ) आचरण करता हुआ उनसे सब कर्म करावे।",
        "sc": "।।3.26।। बुद्धेर्भेदः बुद्धिभेदः मया इदं कर्तव्यं भोक्तव्यं चास्य कर्मणः फलम् इति निश्चयरूपाया बुद्धेः भेदनं चालनं बुद्धिभेदः तं न जनयेत् न उत्पादयेत् अज्ञानाम् अविवेकिनां कर्मसङ्गिनां कर्मणि आसक्तानां आसङ्गवताम्। किं नु कुर्यात् जोषयेत् कारयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् स्वयं तदेव अविदुषां कर्म युक्तः अभियुक्तः समाचरन्।।अविद्वानज्ञः कथं कर्मसु सज्जते इत्याह",
        "et": "3.26 Vidvan the enlightened man; na janayet, should not create; buddhi-bhedam, disturbance in the beliefs-disturbance in the firm belief, 'This has to be done; and the result of this action is to be reaped by me'; ajnanam, of the ignorant, of the non-discriminating one; karma-sanginam, who are attached to work. But what should he do? Himself samacaran, working, performing those very activities of the ignorant; yuktah, while remaining diligent; josayet, he should make them do; sarva-karmani, all the duties.\nHow does an anillumined, ignorant person be come attached to actions? In reply the Lord says:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.26।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.26।।नन्वज्ञेषु तु सक्ततया कर्मनिष्ठेषु कृपया साङ्ख्यप्रकारभेद उपदेष्टुं युक्तो विदुषा नहिनहीत्याह  न बुद्धिभेदमिति। प्रकारभेदोपदेशे तेषां बुद्धिभेद एव भवति फलादिसङ्गितया ज्ञातत्वात्। अतो जोषयेत्प्रीणयेत्सेवयेच्च स्वयं कृत्वा परिसङ्खयातात्पर्येण शनैः शनैः शिक्षयेत्। अन्यथा बुद्धिभेदः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.26।।ननु कर्मानुष्ठानेनैव लोकसंग्रहः कर्तव्यो नतु तत्त्वज्ञानोपदेशेनेति को हेतुरत आह  अज्ञानामविवेकिनां कर्तृत्वाभिमानेन फलाभिसंधिना च कर्मसङ्गिनां कर्मण्यभिनिविष्टानां या बुद्धिरहमेतत्कर्म करिष्ये एतत्फलं च भोक्ष्य इति तस्या भेदं विचालनं अकर्त्रात्मोपदेशेन न कुर्यात् किंतु युक्तोऽवहितः सन् विद्वान् लोकसंग्रहं चिकीर्षुः अविद्वदधिकारिकाणि सर्वकर्माणि समाचरन् तेषां श्रद्धामुत्पाद्य जोषयेत् प्रीत्या सेवयेत्। अनधिकारिणामुपदेशेनं बुद्धिविचालने कृते कर्मसु श्रद्धानिवृत्तेर्ज्ञानस्य चानुत्पत्तेरुभयभ्रष्टत्वं स्यात्। तथाचोक्तंअज्ञस्यार्धप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः।। इति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.26।।ननु कृपया तत्त्वज्ञानमेवोपदेष्टुं युक्तं नेत्याह  नेति। अज्ञानामतएव कर्मसङिगनां कर्मासक्तानामकर्तात्मोपदेशेन बुद्धेर्भेदमन्यथात्वं न जनयेत्कर्मणः सकाशाद्बुद्धिचालनं न कुर्यादपि तु जोषयेत्सेवयेत्।जुषी प्रीतिसेवनयोः अज्ञान्कर्माणि कारयेत्। कथम्। युक्तोऽवहितो भूत्वा स्वयं च समाचरन्। बुद्धिचालने कृते सति कर्मसु श्रद्धानिवृत्तेर्ज्ञानस्य चानुत्पत्तेस्तेषामुभयभ्रंशः स्यादिति भावः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.26।। लोकसंग्रह चिकीर्षोस्तत्त्वविद इदमुपदिश्यते  नेति। अज्ञानामतएव कर्मसङ्गिनां फलार्थं कर्मण्यासक्तानां इदं कर्म भयावश्यं कर्तव्यं तत्फलं च भोक्तव्यमिति निश्चितरुपाया बुद्धेर्भेदनं चालनं न कर्मणेत्याद्युपदेशेन नोत्पादयेत्। किंतु विद्वान्युक्तः समाहितः सन्नविदुषां कर्म स्वयं समाचरन्सर्वकर्माणि जोषयेत्कारयेत्। अन्यथा कर्मसु तेषां श्रद्धापगमे चित्तशुद्य्धभावज्ज्ञानाप्राप्त्योभयभ्रष्टत्वं स्यादिति भावः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.26।।लोकस्य सङ्ग्रहणमेकीकृत्य स्वीकरणं स्वानुष्ठाने समानाभिप्रायतया सयूथ्यतापादनमित्यर्थः। कर्मवासना उत्तरोत्तरपुण्यपापारम्भकपूर्वपूर्वपुण्यपापांशविशेषः उत्तरोत्तरशरीरप्रेरणसमर्थस्मृतिहेतुः पूर्वपूर्वशरीरप्रेरणानुभवविशेषजनितसंस्कारो वा वादित्रवादनादिसंस्कारवत्। बुद्धिभेदो बुद्धेरन्यथाकरणम् तच्च प्रकृतविषयं दर्शयति  कर्मयोगादन्यदित्यादिना।युक्तः इत्यनेन लोकसङ्ग्रहार्थं कुर्वतः स्वापेक्षितविलम्बाभावाय प्रागुक्तनिरपेक्षत्वबुद्धियोगो विवक्षित इतिबुद्ध्या युक्त इत्युक्तम्।जोषयेत् इत्यस्यार्थ  प्रीतिं जनयेदिति।जुषी प्रीतिसेवनयोः इति धातुः। कर्मसङ्गिनः पुरुषान् सर्वकर्माणि जोषयेदित्यन्वयः।।प्रकृतेः इत्यादिश्लोकचतुष्टयस्यार्थमाह  कर्मयोगमिति।विदुषोऽविदुषश्चेति व्युत्क्रमेण श्लोकद्वयार्थः। तृतीये त्वेतद्विशदीकरणमुखेनाविचालनमुक्तम्।कर्मयोगापेक्षितंकर्मयोगेति कर्तव्यताभूतमित्यर्थः।प्रकृतेर्गुणैः इत्युक्ते प्रसिद्धिप्रकर्षादिसिद्धं विशेषं प्रस्तुतानुपयुक्तशब्दादिप्राकृतगुणव्यवच्छेदायाहसत्त्वादिभिरिति। वक्ष्यमाणसात्विकादिकर्मविभागंसर्वशः इति प्रकारवाचिपदसूचितमाह  स्वानुरूपमिति।कर्ता इति तृजन्तयोगात् षष्ठीप्राप्तिः स्यादिति तत्परिहाराय कर्मसु कर्तृत्वाहन्त्वोक्तिभ्रमव्युदासाय चकर्माणि प्रतीत्युक्तम्। तृन्नन्तत्वविवक्षायां त्वियं फलितोक्तिः।अहङ्कारविमूढात्मेति  समानांशत्रयस्य बह्वर्थपरस्य अत्रार्थं विवक्षन् विगृह्णातिअहङ्कारेणेति। नात्राहम्भावमात्रमुच्यते तस्यात्मस्वभावान्तर्गतत्वात् नापि अहङ्काराख्यमचिद्द्रव्यं तस्यापि देहात्मभ्रमं द्वारीकृत्य कार्यकरत्वे सति अव्यवहितस्यैव वक्तुमुचितत्वात् नापि गर्वः उत्कृष्टपरिभवादिहेतुत्वेनानिर्देशात्। अतोऽहङ्कार इति देहात्मभ्रम एवात्र विवक्षित इत्यभिप्रायेणाह  अहङ्कारो नाम अनहमर्थे प्रकृतावहमभिमान इति। एतेनाहङ्कारशब्दस्याभूततद्भावे च्विप्रत्ययेन व्युप्तत्तिर्दर्शिता।अज्ञातात्मस्वरूप इति। विमूढ आत्मा स्वरूपं यस्य स विमूढात्मादिशो विमुह्येयुः इतिवद्विमूढशब्दोऽत्र मोहविषयसमानाधिकरण इति भावः।गुणकर्मविभागयोः इत्यत्र उपसर्जनान्वयिषष्ठीत्वादपि विषयसप्तमीत्वमुचितमिति मत्वोक्तं  सत्त्वादिगुणविभागे तत्तत्कर्मविभागे चेति। विभागशब्दो द्वन्द्वात्परत्वात् प्रत्येकमन्वितः। गुणानां साक्षाद्गुणेषु वृत्त्यभावात् परोक्तप्रक्रिययेन्द्रियतद्विषयादिविवक्षायां पदद्वयोपचारात् सप्तम्यन्तो गुणशब्दो गुणकार्येष्वौपचारिक इत्यभिप्रायेणोक्तंस्वगुणेषु स्वेषु कार्येष्विति। गुणकार्याणि च विभजिष्यन्ते। यद्वा कारणस्य प्राधान्यात्कार्यस्य च तदपेक्षया गुणत्वादेवमुक्तम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.26।।ननु लोकसङ्ग्रहार्थमेव चेत्कर्म कर्त्तव्यं तदा यथाकथञ्चित्कर्त्तव्यम्। यथा तेऽज्ञानेन कुर्वन्ति तथा करणं किं प्रयोजनकं इत्याकाङ्क्षायामाह  न बुद्धिभेदं जनयेदिति। कर्मसङ्गिनां बुद्धिभेदं न जनयेत्। तथाकरणे तेषां भ्रमो भवेत् भ्रमे सति कर्म न कुर्युरेव। ननु कर्मणा चित्तशुद्धौ सत्यां कथं भ्रम इत्यत आह  अज्ञानामिति। न हि अज्ञाश्चित्तशुद्ध्यर्थं कर्म कुर्वन्ति किन्तु कर्मैवेश्वरं मन्यमानाः फलरूपेणान्यं पण्डितं कर्म कुर्वाणं वीक्ष्य कुर्वन्ति अत एव कर्मसङ्गिनामित्युक्तं न तु कर्मिणाम्। विद्वान् युक्तो मां हृदि स्थाप्य मद्युक्तः स्वयं समाचरन् सम्यगाचरन् मत्सेवादि कुर्वन् अन्येषां वृत्त्यर्थं सदा कर्माणि अन्यानज्ञान् जोषयेत् कर्म कारयेदित्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.26।।विद्वान् अज्ञानां कर्मस्वासक्तानां बुद्धिभेदं बुद्धेश्चालनं न जनयेन्नोत्पादयेत् किंतु तान्सर्वाणि कर्माणि जोषयेत्सेवयेत्। कथम्। युक्त आदृतो भूत्वा समाचरन्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "So as not to disrupt the minds of ignorant men attached to the fruitive results of prescribed duties, a learned person should not induce them to stop work. Rather, by working in the spirit of devotion, he should engage them in all sorts of activities [for the gradual development of Kṛṣṇa consciousness].",
        "ec": " Vedaiś ca sarvair aham eva vedyaḥ . That is the end of all Vedic rituals. All rituals, all performances of sacrifices, and everything that is put into the Vedas, including all direction for material activities, are meant for understanding Kṛṣṇa, who is the ultimate goal of life. But because the conditioned souls do not know anything beyond sense gratification, they study the Vedas to that end. But through fruitive activities and sense gratification regulated by the Vedic rituals one is gradually elevated to Kṛṣṇa consciousness. Therefore a realized soul in Kṛṣṇa consciousness should not disturb others in their activities or understanding, but he should act by showing how the results of all work can be dedicated to the service of Kṛṣṇa. The learned Kṛṣṇa conscious person may act in such a way that the ignorant person working for sense gratification may learn how to act and how to behave. Although the ignorant man is not to be disturbed in his activities, a slightly developed Kṛṣṇa conscious person may directly be engaged in the service of the Lord without waiting for other Vedic formulas. For this fortunate man there is no need to follow the Vedic rituals, because by direct Kṛṣṇa consciousness one can have all the results one would otherwise derive from following one’s prescribed duties."
    }
}
