{
    "_id": "BG3.2",
    "chapter": 3,
    "verse": 2,
    "slok": "व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |\nतदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||३-२||",
    "transliteration": "vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṃ mohayasīva me .\ntadekaṃ vada niścitya yena śreyo.ahamāpnuyām ||3-2||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.2।। आप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.2 With this apparently perplexing speech, Thou confusest, as it were, my understanding; therefore tell me that one way for certain by which I may attain bliss.",
        "ec": "3.2 व्यामिश्रेण perplexing? इव as it were? वाक्येन with speech? बुद्धिम् understanding? मोहयसि (Thou) confusest? इव as it were? मे my? तत् that? एकम् one? वद tell? निश्चित्य for certain? येन by which? श्रेयः bliss (the good or the highest)? अहम् I? आप्नुयाम् may attain.Commentary Arjuna says to Lord Krishna? Tecah me one of the two? knowledge or action? by which I may attain to the highest good or bliss or Moksha. (Cf.V.I)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.2 Thy language perplexes me and confuses my reason. Therefore please tell me the only way by which I may, without doubt, secure my spiritual welfare."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.2।। पहले से ही मोहितमन अर्जुन में सामान्य मनुष्य होने के नाते वह सूक्ष्म बुद्धि नहीं थी जिसके द्वारा विवेकपूर्वक भगवान् के सूक्ष्म तर्कों को समझ कर वह निश्चित कर सके कि परम श्रेय की प्राप्ति के लिए कर्म मार्ग सरल था अथवा ज्ञान मार्ग। इसलिए वह यहाँ भगवान् से नम्र निवेदन करता है आप उस मार्ग को निश्चित कर आदेश करिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।अर्जुन को इसमें संदेह नहीं था कि जीवन केवल धन के उपार्जन परिग्रह और व्यय के लिए नहीं है। वह जानता था कि उसका जीवन श्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए था जिसके लिए भौतिक उन्नति केवल साधन थी साध्य नहीं। अर्जुन मात्र यह जानना चाहता था कि वह उपलब्ध परिस्थितियों का जीवन की लक्ष्य प्राप्ति और भविष्य निर्माण में किस प्रकार सदुपयोग करे।प्रश्न के अनुरूप भगवान् उत्तर देते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.2. You appear to perplex  my intellect with Your speech that looks confusing.  Hence tell me,  with certainty, that particular thing by which I may attain the good (emancipation)."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.2 You confuse my mind with statements that seem to contradict each other; tell me for certain that one way by which I could reach the highest good."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.2  You bewilder my understanding, as it were, by a seemingly conflicting statement! Tell me for certain one of these by which I may attain the highest Good."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.2।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.2।।यत्तु वृत्तिकारैरुक्तं श्रौतेन स्मार्तेन च कर्मणा समुच्चयो गृहस्थानां श्रेयःसाधनमितरेषां स्मार्तेनैवेति भगवतोक्तमर्जुनेन च निर्वारितमिति तदेतदनुवदति  अथेति। तत्रापि तत्किमित्याद्युपालम्भवचनमनुपपन्नं कर्ममात्रसमुच्चयवादिनो भगवतो नियोजनाभावादिति दूषयति  तत्किमिति। इतश्च प्रश्नः समुच्चयानुसारी न भवतीत्याह  किञ्चेति। भगवतो विविक्तार्थवादित्वादयुक्तं व्यामिश्रेणेत्यादिवचनमित्याशङ्क्याह  यद्यपीति। यदि भगवद्वचनं संकीर्णमिव ते भाति तर्हि तेन त्वदीयबुद्धिव्यामोहनमेव तस्य विवक्षितमिति किमिति मोहयसीवेत्युच्यते तत्राह  ममेति। ज्ञानकर्मणी मिथो विरोधाद्युगपदेकपुरुषाननुष्ठेयतया भिन्नकर्तृके कथ्येत तथाच तयोरन्यतरस्मिन्नेव त्वं नियुक्तो नतु ते बुद्धिव्यामोहनमभिमतमिति भगवतो मतमनुवदति  त्वं त्विति। तदेकमित्यादिश्लोकार्थेनोत्तरमाह  तत्रेति। उक्तं भागवतमतं सप्तम्या परामृश्यते। एकमित्युक्तप्रकारोक्तिः। एकमित्युक्तमेव स्फुटयति  बुद्धिमिति। निश्चयप्रकारं प्रकटयति  इदमिति। योग्यत्वं स्पष्टयति  बुद्धीति। अस्य क्षत्रियस्य सतोऽन्तःकरणस्य देहशक्तेः समरसमारम्भावस्थायाश्चेदमेव ज्ञानं कर्म वानुगुणमिति निर्धार्य ब्रूहीत्यर्थः। निश्चित्यान्यतरोक्तौ तेन श्रोतुः श्रेयोवाप्तिं फलमाह   येनेति। तदेकमित्यादिवाक्यस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा समुच्चयस्य शास्त्रार्थत्वाभावे तात्पर्यमाह  यदि हीति। गुणभूतमपीत्यादिना प्रधानभूतमपि वेति विवक्षितं। नतूभयप्राप्त्यसंभवमात्मनो मन्यमानस्यार्जुनस्यान्यतरविषया शुश्रूषा भविष्यति नेत्याह  नहीति। यथोक्तभगवद्वचनाभावे द्वयप्राप्त्यसंभवबुद्ध्या नान्यतरप्रार्थना संभवतीत्याह  येनेति। नहि तथाविधं भगवद्वचनं भवतेष्टं भगवतः समुच्चयवादित्वाङ्गीकारादतस्तदभावादुक्तबुद्ध्या न युक्तान्यतरप्रार्थनेत्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.1 -- 3.2।। अर्जुन बोले -- हे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।",
        "hc": "।।3.2।। व्याख्या-- 'जनार्दन'-- इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव प्रकट करते हैं कि हे श्री कृष्ण! आप सभीकी याचना पूरी करनेवाले हैं; अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।'ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ৷৷. नियोजयसि केशव'-- मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल हो या सर्वथा प्रतिकूल, पालन करनेका निश्चय ही शूरवीरता है, शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको सह नहीं सकता, तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है अर्थात् तब भलाईकी वेशमें बुराई आती है। जो बुराई भलाईके वशमें आती है, उसका त्याग करना बड़ा कठिन होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसा-त्यागरूप भलाईके वशेमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्य-कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?भगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें 'बुद्धिर्योगे' पदसे समबुद्धि-(समता-) की ही बात कही थी; परन्तु अर्जुनने उसको ज्ञान समझ लिया। अतः वे भगवान्से कहते हैं कि हे जनार्दन! आपने पहले कहा कि 'मैंने सांख्यमें यह बुद्धि कह दी, इसीको तुम योगके विषयमें सुनो। इस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनको छोड़ देगा।' परन्तु कर्मबन्धन तभी छूटेगा, जब ज्ञान होगा। आपने यह भी कह दिया कि 'बुद्धियोग' अर्थात् ज्ञानसे कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं (2। 49)। अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है, उत्तम है, तो फिर मेरेको शास्त्रविहित यज्ञ, दान, तप, आदि शुभ कर्मोंमें भी नहीं लगाना चाहिये, केवल ज्ञानमें ही लगाना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत आप मेरेको युद्ध-जैसे अत्यन्त क्रूर कर्ममें, जिसमें दिनभर मनुष्योंकी हत्या करनी पड़े, क्यों लगा रहे हैं?पहले अर्जुनके मनमें युद्ध करनेका जोश आया हुआ था और उन्होंने उसी जोशमें भरकर भगवान्से कहा कि 'हे अच्युत! दोनों सेनाओंके बीचमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये, जिससे मैं यह देख लूँ कि यहाँ मेरे साथ दो हाथ करनेवाला कौन है।' परन्तु भगवान्ने जब दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणके सामने तथा राजाओंके सामने रथ खड़ा करके कहा कि 'तू इन कुरुवंशियोंको देख', तब अर्जुनका कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया। मोह जाग्रत् होनेसे उनकी वृत्ति युद्धसे, कर्मसे उपरत होकर ज्ञानकी तरफ हो गयी; क्योंकि ज्ञानमें युद्ध-जैसे घोर कर्म नहीं करने पड़ते। अतः अर्जुन कहते हैं कि आप मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं?यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लिया गया है। अगर यहाँ 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'समबुद्धि' (समता) लिया जाय तो व्यामिश्र वचन सिद्ध नहीं होगा। कारण कि दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको योग-(समता-) में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा दी है। व्यामिश्र वचन तभी सिद्धि होगा, जब अर्जुनकी मान्यतामें दो बातें हों और तभी यह प्रश्न बनेगा कि अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है, तो फिर मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं? दूसरी बात, भगवान्ने आगे अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें दो निष्ठाएँ कही हैं--ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे। इससे भी अर्जुनके प्रश्नोंमें 'बुद्धिः' पदका अर्थ 'ज्ञान' लेना युक्तिसंगत बैठता है।कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक पूछनेपर ही अपने प्रश्नका सही उत्तर प्राप्त कर सकता है। आक्षेपपूर्वक शंका करनेसे सही उत्तर प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। अर्जुनकी भगवान्पर पूर्ण श्रद्धा है; अतः भगवान्के कहनेपर अर्जुन अपने कल्याणके लिये युद्ध-जैसे घोर कर्ममें भी प्रवृत्त हो सकते हैं--ऐसा भाव उपर्युक्त प्रश्नसे प्रकट होता है।\n\n'व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे'-- इन पदोंमें अर्जुनका भाव है कि कभी तो आप कहते हैं कि कर्म करे 'कुरु कर्माणि' (2। 48) और कभी आप कहते हैं कि ज्ञानका आश्रय लो 'बुद्धौ शरणमन्विच्छ' (2। 49)। आपके इन मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धि मोहित-सी हो रही है अर्थात् मैं यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरेको कर्म करने चाहिये या ज्ञानकी शरण लेनी चाहिये।यहाँ दो बार 'इव' पदके प्रयोगसे भगवान्पर अर्जुनकी श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान्के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान्के वचनोंको ठीक-ठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुए-से लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहतिसी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहति करते, तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता ही कौन?\n\n'तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्'-- मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा--इनमेंसे आप निश्चय करके मेरे लिये एक बात कहिये, जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये--'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (2। 7) और अब भी मैं वही बात कर रहा हूँ।\n\n सम्बन्ध-- अब आगेके तीन (तीसरे चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके 'व्यामिश्रेणेव वाक्येन' (मिले हुएसे वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.2।।अतो व्यामिश्रवाक्येन मां मोहयसि इव इति मे प्रतिभाति तथा हि आत्मावलोकनसाधनभूतायाः सर्वेन्द्रियव्यापारोपरतिरूपाया ज्ञाननिष्ठायाः तद्विपर्ययरूपं कर्म साधनं तद् एव कुरु इति वाक्यं विरुद्धं व्यामिश्रम् एव तस्माद् एकम् अमिश्ररूपं वाक्यं वद येन वाक्येन अहम् अनुष्ठेयरूपं निश्चित्य आत्मनः श्रेयः प्राप्नुयाम्।",
        "et": "3.2 Conseently, it appears to me as if 'you confuse me with statements that seem to contradict each other.' For, firm devotion to knowledge which forms the means for the vision of the self and which is of the nature of stopping the operations of the senses on the one hand, and on the other exhortation to action which is of a nature opposite to it, i.e., knowledge, as a means to the same vision of that Atman - these statements are contradictory and confusing. Therefore tell me clearly the path following which I can take a determined course and win the Supreme Being."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.1  3.2।।ज्यायसीति।  व्यामिश्रेणेति।  कर्म उक्तं ज्ञानं च।  तत्र न द्वयोः प्राधान्यं युक्तम् अपि तु ज्ञानस्य।  तद्बलेन क्षपणीयत्वं यदि कर्मणां बुद्धियुक्तो जहातीमे (II 52) इत्यादिनयेन मूलत एव तर्हि (K तत्) कर्मणां (S K कर्मणा) किं प्रयोजनमिति प्रश्नाभिप्रायः।",
        "et": "3.1-2 Jyayasi etc. and Vyamisrena etc.  Action has been taught and knowledge too.  Now it is proper  [to attach] importance not to both, but only to knowledge.  Now if with the strenght of knowledge the action is to be destroyed from its very root,  according to the instruction  'The man of wisdom casts  off  [both the good and the bad action]',  then what is the autility of action ?  This is idea of  [Arjuna's] estion.\n But the Bhagavat gives the answer :"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.2।।तथा  यद्यपि भगवान् स्पष्ट कहनेवाले हैं तो भी मुझ मन्दबुद्धिको भगवान्के वाक्य मिले हुएसे प्रतीत होते हैं उन मिले हुएसे वचनोंसे आप मानो मेरी बुद्धिको मोहित कर रहे हैं। वास्तवमें आप तो मेरी बुद्धिका मोह दूर करनेके लिये प्रवृत्त हुए हैं फिर मुझे मोहित कैसे करते  इसीलिये कहता हूँ कि आप मेरी बुद्धिको मोहितसी करते हैं। आप यदि अलगअलग अधिकारियोंद्वारा किये जाने योग्य ज्ञान और कर्मका अनुष्ठान एक पुरुषद्वारा किया जाना असम्भव मानते हैं तो उन दोनोंमेंसे ज्ञान या कर्म यही एक बुद्धि शक्ति और अवस्थाके अनुसार अर्जुनके लिये योग्य है  ऐसा निश्चय करके मुझसे कहिये जिस ज्ञान या कर्म किसी एकसे में कल्याणको प्राप्त कर सकूँ। यदि कर्मनिष्ठामें गौणरूपसे भी ज्ञानको भगवान्ने कहा होता तो दोनोंमेंसे एक कहिये इस प्रकार एकहीको सुननेकी अर्जुनकी इच्छा कैसे होती क्योंकि ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे मैं तुझसे एक ही कहूँगा दोनों नहीं  ऐसा भगवान्ने कहीं नहीं कहा कि जिससे अर्जुन अपने लिये दोनोंकी प्राप्ति असम्भव मानकर एकके लिये ही प्रार्थना करता।",
        "sc": "।।3.2।। व्यामिश्रेणेव यद्यपि विविक्ताभिधायी भगवान् तथापि मम मन्दबुद्धेः व्यामिश्रमिव भगवद्वाक्यं प्रतिभाति। तेन मम बुद्धिं मोहयसि इव मम बुद्धिव्यामोहापनयाय हि प्रवृत्तः त्वं तु कथं मोहयसि अतः ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसि इव मे मम इति। त्वं तु भिन्नकर्तृकयोः ज्ञानकर्मणोः एकपुरुषानुष्ठानासंभवं यदि मन्यसे तत्रैवं सति तत् तयोः एकं बुद्धिं कर्म वा इदमेव अर्जुनस्य योग्यं बुद्धिशक्त्यवस्थानुरूपमिति निश्चित्य वद ब्रूहि येन ज्ञानेन कर्मणा वा अन्यतरेण श्रेयः अहम् आप्नुयां प्राप्नुयाम् इति यदुक्तं तदपि नोपपद्यते।।यदि हि कर्मनिष्ठायां गुणभूतमपि ज्ञानं भगवता उक्तं स्यात्  तत् कथं तयोः एकं वद इति एकविषयैव अर्जुनस्य शुश्रूषा स्यात्। न हि भगवता पूर्वमुक्तम् अन्यतरदेव ज्ञानकर्मणोः वक्ष्यामि नैव द्वयम् इति येन उभयप्राप्त्यसंभवम् आत्मनो मन्यमानः एकमेव प्रार्थयेत्।।प्रश्नानुरूपमेव प्रतिवचनं श्रीभगवानुवाच",
        "et": "3.2 'Though the Lord speaks lucidly, still, to me who am of a dull understanding, the Lord's utterance appears to be conflicting.' 'Mohayasi, You bewilder; me, any; buddhim, understanding; iva, as it were; vyamisrena iva, by that seemingly conflicting; vakyena, statement! You have surely undertaken to dispel the confusion of my understanding; but why do You bewildered (it)? Hence I say, \"You bewildered my understanding, as it were.\"'\nHowever, if You [In some readings, 'tvam tu, however, you', is substituted by 'tatra, as to that'.-Tr.] think that it is impossible for a single person to pursue both Knowledge and action, which can be undertaken (only) by different persons then, that being the case, vada, tell me; niscitya, for certain; tadekam, one of these, either Knowledge or action: \"This indeed is fit for Arjuna, according to his understanding, strength and situation\"; yena, by which, by one of either Knowledge or action; aham, I; apnuyam, may attain; sreyah, the highest Good.'\nEven if Knowledge had been spoken of at all by the Lord as being subsidiary to steadfastness in action, how then could there be the desire in Arjuna to know of only one of them, as expressed in 'Tell me one of these two?' Certainly the Lord did not say, 'I shall speak of only one among Knowledge and action, but surely not of both', owing to which, Arjuna, considering it impossible for himself to acire both, should have prayed for one only!\nThe answer was in accordance witht the estion:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.2।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.2।।ननुधर्म्याद्धि युद्धात् 2।31 इति कर्मणः श्रेयस्त्वत्तो नोदितमिति चेत्तत्राह  व्यामिश्रेणेति। तर्हि तव वाक्यं व्यामिश्रं नैकान्तिकं सन्देहोत्पादकमिव क्वचित् कर्मप्रशंसा क्वचित् कर्मत्यागप्रशंसा। एकमिति। एतेन मे बुद्धिं मोहयसीव तदेकं निश्चित्य वद।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.2  3.3।।ननु नाहं कंचिदपि प्रतारयामि कि पुनस्त्वामतिप्रियम्। त्वं तु किं मे प्रतारणाचिन्हं पश्यसीति चेत्तत्राह  तव वचनं व्यामिश्रं न भवत्येव ममत्वेकाधिकारिकत्वभिन्नाधिकारिकत्वसंदेहाद्व्यामिश्रं संकीर्णार्थमिव ते यद्वाक्यं मांप्रति ज्ञानकर्मनिष्ठाद्वयप्रतिपादकं तेन वाक्येन त्वं मे मम मन्दबुद्धेर्वाक्यतात्पर्यापरिज्ञानाद्बुद्धिमन्तःकरणं मोहयसीव भ्रान्त्या योजयसीव। परमकारुणिकत्वात्त्वं न मोहयस्येव। मम तु स्वाशयदोषान्मोहो भवतीतीवशब्दार्थः। एकाधिकारित्वे विरुद्धयोः समुच्चयानुपपत्तेरेकार्थत्वाभावेन च विकल्पानुपपत्तेः प्रागुक्तेर्यद्यधिकारिभेदं मन्यसे तदैकं मांप्रति विरुद्धयोर्निष्ठयोरुपदेशायोगात्तज्ज्ञानं वा कर्म वैकमेवाधिकारं मे निश्चित्य वद। येनाधिकारनिश्चयपुरःसरमुक्तेन त्वया मया चानुष्ठितेन ज्ञानेन कर्मणा वैकेन श्रेयो मोक्षमहमाप्नुयां प्राप्तुं योग्यः स्याम्। एवं ज्ञानकर्मनिष्ठयोरेकाधिकारित्वे विकल्पसमुच्चययोरसंभवादधिकारिभेदज्ञानायार्जुनस्य प्रश्न इति स्थितम्।इहेतरेषां कुमतं समस्तंश्रुतिस्मृतिन्यायबलान्निरस्तम्। पुनः पुनर्भाष्यकृतातियत्नादतो न तत्कर्तुमहं प्रवृत्तः।।भाष्यकारमतसारदर्शिना ग्रन्थमात्रमिह योज्यते मया। आशयो भगवतः प्रकाश्यते केवलं स्ववचसो विशुद्धये।। एवमधिकारिभेदेऽर्जुनेन पृष्टे तदनुरुपं प्रतिवचनं श्रीभगवानुवाच  अस्मिन्नधिकारित्वाभिमते लोके शुद्धाशुद्धान्तःकरणभेदेन द्विविधे जने द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिर्ज्ञानपरता कर्मपरता च पुरा पूर्वाध्याये मया तवात्यन्तहितकारिणा प्रोक्ता प्रकर्षेण स्पष्टत्वलक्षणेनोक्ता। तथा चाधिकार्यैक्यशङ्कया माग्लासीरिति भावः। हे अनघ अपापेति संबोधयन्नुपदेशयोग्यतामर्जुनस्य सूचयति। एकैव निष्ठा साध्यसाधनावस्थाभेदेन द्विप्रकारा नतु द्वे एव स्वतन्त्रे निष्ठे इति कथयितुं निष्ठेत्येकवचनम्। तथाच वक्ष्यतिएकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति इति। तामेव निष्ठां द्वैविध्येन दर्शयति  सांख्येति। संख्या सम्यगात्मबुद्धिस्तां प्राप्तवतां ब्रह्मचर्यादेव कृतसंन्यासानां वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थानां ज्ञानभूमिमारूढानां शुद्धान्तःकरणानां सांख्यानां ज्ञानयोगेन ज्ञानमेव युज्यते ब्रह्मणानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तातानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः इत्यादिना। अशुद्धान्तःकरणानां तु ज्ञानभूमिमनारूढानां योगिनां कर्माधिकारयोगिनां कर्मयोगेन कर्मैव युज्यतेऽन्तःकरणशुद्ध्यानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तान्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानभूमिकारोहणार्थंधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना। अतएव न ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो विकल्पो वा किंतु निष्कामकर्मणा शुद्धान्तःकरणानां सर्वकर्मसंन्यासेनैव ज्ञानमिति चित्तशुद्ध्यशुद्धिरूपावस्थाभेदेनैकमेव त्वांप्रति द्विविधा निष्ठोक्ताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु इति। अतो भूमिकाभेदेनैकमेव प्रत्युभयोपयोगान्नाधिकारभेदेऽप्युपदेशवैयर्थ्यमित्यभिप्रायः। एतदेव दर्शयितुमशुद्धचित्तस्य चित्तशुद्धिपर्यन्तं कर्मानुष्ठानंन कर्मणामनारम्भात् इत्यादिभिःमोघं पार्थ स जीवति इत्यन्तैस्त्रयोदशभिर्दर्शयति। शुद्धचित्तस्य तु ज्ञानिनो न किंचिदपि कर्मापेक्षितमिति दर्शयतियस्त्वात्मरतिरेव इति द्वाभ्याम्।तस्मादसक्तः इत्यारभ्य तु बन्धहेतोरपि कर्मणो मोक्षहेतुत्वं सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारेण संभवति फलाभिसंधिराहित्यरूपकौशलेनेति दर्शयिष्यति। ततः परंतुअथ केन इति प्रश्नमुत्थाप्य कामदोषेणैव काम्यकर्मणः शुद्धिहेतुत्वं नास्ति। अतः कामराहित्येनैव कर्माणि कुर्वन्नन्तःकरणशुद्ध्य ज्ञानाधिकारी भविष्यसीति यावदध्यायसमाप्ति वदिष्यति भगवान्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.2।। ननुधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना कर्मणोऽपि श्रेष्ठत्वमुक्तमेवेत्याशङ्क्याह  व्यामिश्रेणेति। क्वचित्कर्मप्रशंसा क्वचिज्ज्ञानप्रशंसेत्येव व्यामिश्रं संदेहोत्पादकमिव यद्धाक्यं तेन मे बुद्धिं मतिमुभयत्र दोलायितां कुर्वन्मोहयसीव। परमकारुणिकस्य तव मोहकत्वं नास्त्येव तथापि भ्रान्त्या ममैवं भातीतीवशब्देनोक्तं अत उभयोर्मध्ये यद्भद्रं तदेकं निश्चित्य वदेति। यद्वा इदमेव श्रेयःसाधनमिति निश्चित्य येनानुष्ठितेन श्रेयो मोक्षमहमाप्नुयां प्राप्स्यामि तदेवैकं निश्चित्य वदेत्यर्थः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.2।।ननु त्वया सैव ज्यायसी ममेति मद्वाक्यान्निश्चिता चेत्किमर्थमधुना पृच्छसी त्याशङ्क्याह  व्यामिश्रेणेवेति।बुद्य्धा युक्तो यया इत्यादिना कर्मप्रशसां या निशा सर्वभूतानाम् इत्यादिना ज्ञानप्रशंसाकर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना मम कर्मण्येवाधिकारबोधनंत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति ज्ञाननिष्ठाधिकारबोधनमित्येवं व्यामिश्रेण किं श्रेष्ठं किमश्रेष्ठं क्व ममाधिकारः क्व नेति संदेहोत्पादकेन वाक्येन। यद्यपि विविक्ताभिधायी भगवांस्तथापि मम मन्दबुद्धेर्व्यामिश्रमिव भगवद्वाक्यं प्रतिभातीतीवशब्दार्थः। मम बुद्धेर्मोहापनयार्थं हि प्रवृत्तस्त्वं कथं मोहयस्यतो ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसीव म इति। भिन्नकर्तृकयोर्ज्ञानकर्मणोरेकपुरुषानुष्ठानासंभवं यदि त्वं मन्यसे तर्हि तयोर्मध्ये एकं ज्ञानं वा कर्म वा इदमेव तव योग्यमिति निश्चित्य वद येन ज्ञानकर्मान्यतरेण श्रेयो मोक्षमहं प्राप्नुयामित्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.2।।उक्तमर्थं हेतूकुर्वन् द्वितीयश्लोकार्थमाह  अत इति। अचेतनाया बुद्धेर्मोहनस्यौपचारिकत्वान्मामित्युक्तम्। इवशब्दद्योतितमाह  प्रतिभातीति। एतेन कारुणिकत्वात् त्वं तावन्न मोहयसि अहं तु मन्दो मुह्यामीत्युक्तं भवति। व्यामिश्रशब्दाभिप्रेतं व्याघातं तत्प्रकारं चोपपादयति  तथाहीति। तद्विपर्ययरूपं कर्म तस्याः कथं साधनं तद्विरुद्धं च कथं तदर्थिना कर्तव्यं इति व्याहतिद्वयमिहाभिप्रेतम्।एकमित्येतन्न ज्ञानकर्मणोरन्यतरविषयं तयोरेकस्यैव कर्मण उपदिष्टत्वात् तत्र च स्वस्यानुपपन्नताप्रतिभासे तथा भ्रमनिवृत्तेश्चानन्तरमपेक्षणीयत्वात् तस्याश्च व्यामिश्रत्वनिवृत्तिसाध्यत्वाद्वाक्यशब्दस्य चैतच्छ्लोकगतस्य विशेष्यसमर्पकत्वौचित्यादित्यभिप्रेत्योक्तम्  अमिश्ररूपं वाक्यमिति। पूर्वेणान्वयभ्रमव्युदासाय निश्चित्येत्यादेरर्थमाह  येनेति।निश्चित्य इत्यस्य न तावत्वद इत्यनेनान्वयः सर्वज्ञस्य तस्य प्रागप्यनिश्चयायोगात् व्यामिश्रवाक्येनापि परव्यामोहनमात्रस्य शङ्कितत्वात्। अतोऽर्जुनस्यैव निश्चयाकाङ्क्षा ततश्च निश्चित्य श्रेयः प्राप्नुयामित्येवान्वयः। निश्चयसापेक्षं सन्दिग्धविषयमाह  अनुष्ठेयरूपमिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.2।।किञ्च स्पष्टतया बोधाभावान्मे बुद्धिर्मोहमवाप्नोतीति यथाऽहं त्वां प्राप्नोमि तत्तथा स्पष्टमाज्ञापयेत्याह  व्यामिश्रेणेवेति। व्यामिश्रेणेव वाक्येन क्वचित्कर्म प्रशंससि क्वचिज्ज्ञानमितिरूपसन्देहोत्पादकेन वाक्येन मे बुद्धिं मोहयसीव। भगवद्वाक्यं तु व्यामिश्रं न भवति परन्तु जीवैर्न बुध्यत इतिइव इत्यनेन ज्ञापितम्।मोहयसि इत्यत्रापि इवेतिपदेन भगवत्सन्निधौ मोहोऽनुचित इति ज्ञापितम् तस्मात्कारणाद्यथा मम बुद्धिमोहोऽपगच्छति तथा एकं श्रेयोरूपं कल्याणरूपं भक्तिप्रतिपादकं वाक्यं निश्चित्य मयि दानेच्छां कृत्वा वद येनाऽहं त्वामाप्नुयां प्राप्नोमीत्यर्थः। पूर्वोक्तव्यामिश्रवाक्यमध्ये नैकस्यापि श्रेयोरूपत्वं मोहकत्वात्। सर्वथा भगवत्प्रापकश्रेयोरूपत्वं भक्तेरेव। अत एव श्रीभागवते  तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य इत्यारभ्यश्रेयो भवेदिह 11।20।31 इत्यन्तं सर्वेषां न श्रेयोरूपत्वमुक्तम्। अतः पूर्वोक्तमध्येएकं निश्चित्य वद इति व्याख्यानं न साधु।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.2।।ननु तव ज्ञाननिष्ठायामनधिकारात्मकर्मैव कुर्विति त्वां ब्रवीमीत्याशङ्क्याह  व्यामिश्रेणेति। व्यामिश्रेणाविविक्तेन। इवशब्दो विविक्तेऽपि बुद्धिदोषादविविक्ततां गृह्णामीति सूचयति तेन वाक्येनत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति क्वचिद्वेदनिष्ठां त्याजयसि।कर्मण्येवाधिकारस्ते इति तामेव च ग्राहयसि। तथानिर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्भवेति निवृत्तिमार्गमुपदिशसि।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इति प्रवृत्तिमप्युपदिशसि। नह्येकेन मया युगपदुभयं स्थितिगतिवदनुष्ठातुं शक्यम्। अतो मे मम बुद्धिं मोहयसीव वस्तुतस्तु मम मोहं नाशयितुं प्रवृत्तोऽसीतीवशब्देनोच्यते। तत्तयोर्मध्ये यदेकं प्रधानं मद्योग्यं तन्निश्चित्य वद येनानुष्ठितेनाहं श्रेयः कल्याणमाप्नुयाम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "My intelligence is bewildered by Your equivocal instructions. Therefore, please tell me decisively which will be most beneficial for me.",
        "ec": " In the previous chapter, as a prelude to the Bhagavad-gītā , many different paths were explained, such as sāṅkhya-yoga, buddhi-yoga, control of the senses by intelligence, work without fruitive desire, and the position of the neophyte. This was all presented unsystematically. A more organized outline of the path would be necessary for action and understanding. Arjuna, therefore, wanted to clear up these apparently confusing matters so that any common man could accept them without misinterpretation. Although Kṛṣṇa had no intention of confusing Arjuna by any jugglery of words, Arjuna could not follow the process of Kṛṣṇa consciousness – either by inertia or by active service. In other words, by his questions he is clearing the path of Kṛṣṇa consciousness for all students who seriously want to understand the mystery of the Bhagavad-gītā ."
    }
}
