{
    "_id": "BG3.14",
    "chapter": 3,
    "verse": 14,
    "slok": "अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः |\nयज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||३-१४||",
    "transliteration": "annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasambhavaḥ .\nyajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||3-14||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.14।। समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.14 From food come forth beings; from rain food is produced; from sacrifice arises rain and sacrifice is born of action.",
        "ec": "3.14 अन्नात् from food? भवन्ति come forth? भूतानि beings? पर्जन्यात् from rain? अन्नसम्भवः production of food? यज्ञात् from sacrifice? भवति arises? पर्जन्यः rain? यज्ञः sacrifice? कर्मसमुद्भवः born of action.Commentary Here Yajna means Apurva or the subtle principle or the unseen form which a sacrifice assumes between the time of its performance and the time when its fruits manifest themselves."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.14 All creatures are the product of food, food is the product of rain, rain comes by sacrifice, and sacrifice is the noblest form of action."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.14।। No commentary."
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.14. From food arise the things that are born;  from the rain-cloud the food arises;  from the sacrifice the rain-cloud arises;  the sacrifices arises from action;"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.14 From food arise all beings (i.e., their bodies); from rain food is produced; from sacrifice comes rain; and sacrifice springs from activity."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.14 From food are born the creatures; the origin of food is from rainfall; rainfall originates from sacrifice; sacrifice has action as its origin."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.14।।हेत्वन्तरमाह  अन्नादिति। यज्ञः पर्जन्यत्वात्तत्कारणमुच्यते। पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति तद्व्यापाद्यं कर्मविधये। न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम्। मेघचक्राभिमानी पर्जन्यः। तच्च यज्ञाद्भवति।अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठति। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः 3।76 इति (मनु) स्मृतेश्च। उभयवचनाच्चादित्यात्समुद्राच्चाविरोधः। अतश्च यज्ञात्पर्जन्योद्भवः सम्भवति। यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः। कर्म इतरक्रिया।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.14।।देवयज्ञादिकं कर्माधिकृतेन कर्तव्यमित्यत्र हेत्वन्तरमितःशब्दोपात्तमेव दर्शयति  जगदिति। ननु भुक्तमन्नं रेतोलोहितपरिणतिक्रमेण प्रजारूपेण जायते तच्चान्नं वृष्टिसंभवं प्रत्यक्षदृष्टं तत्कथं कर्मणो जगच्चक्रप्रवर्तकत्वमिति शङ्कते  कथमिति। पारंपर्येण कर्मणस्तद्धेतुत्वं साधयति  उच्यत इति। उक्तेऽर्थे स्मृत्यन्तरं संवादयति  अग्नाविति। तत्र हि देवताभिध्यानपूर्वकं तदुद्देशेन प्रहिताहुतिरपूर्वतां गता रश्मिद्वारेणादित्यमारुह्य वृष्ट्यात्मना पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नभावमापद्य संस्कृतोपभुक्ता शुक्रशोणितरूपेण परिणता प्रजाभावं प्राप्नोतीत्यर्थः। यज्ञः कर्मसमुद्भव इत्ययुक्तं स्वस्यैव स्वोद्भवे कारणत्वायोगादित्याशङ्क्याह  ऋत्विगिति। द्रव्यदेवतयोः संग्राहकश्चकारः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.14 -- 3.15।। सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न  वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।",
        "hc": "3.14।। व्याख्या--'अन्नाद्भवन्ति भूतानि'--प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है, वह 'अन्न'(टिप्पणी प0 136.2) कहलाता है। जिस प्राणीका जो खाद्य है, जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति, भरण और पुष्टि होती है, उसे ही यहाँ 'अन्न' नामसे कहा गया है; जैसे--मिट्टीका कीड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन्न है।जरायुज (मनुष्य, पशु आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि), अण्डज (पक्षी, सर्प, चींटी आदि) और स्वेदज (जूँ आदि)--ये चारों प्रकारके प्राणी अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्नसे ही जीवित रहते हैं (टिप्पणी प0 137.1)।'पर्जन्यादन्नसम्भवः'--समस्त खाद्य पदार्थोंकी उत्पत्ति जलसे होती है। घास-फूस, अनाज आदि तो जलसे होते ही हैं, मिट्टीके उत्पन्न होनेमें भी जल ही कारण है। अन्न, जल, वस्त्र, मकान आदि शरीर-निर्वाहकी सभी सामग्री स्थूल या सूक्ष्मरूपसे जलसे सम्बन्ध रखती है और जलका आधार वर्षा है।'यज्ञाद्भवति पर्जन्यः'--'यज्ञ' शब्द मुख्यरूपसे आहुति देनेकी क्रियाका वाचक है। परन्तु गीताके सिद्धान्त और कर्मयोगके प्रस्तुत प्रकरणके अनुसार यहाँ 'यज्ञ' शब्द सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंका उपलक्षक है। यज्ञमें त्यागकी ही मुख्यता होती है। आहुति देनेमें अन्न, घी आदि चीजोंका त्याग है, दान करनेमें वस्तुका त्याग है, तप करनेमें अपने सुख-भोगका त्याग है, कर्तव्य-कर्म करनेमें अपने स्वार्थ, आराम आदिका त्याग है। अतः 'यज्ञ' शब्द यज्ञ (हवन), दान, तप आदि सम्पूर्ण शास्त्रविहित क्रियाओंका उपलक्षक है।बृहदारण्यक-उपनिषद्में एक कथा आती है। प्रजापति ब्रह्माजीने देवता, मनुष्य और असुर--इन तीनोंको रचकर उन्हें 'द' इस अक्षरका उपदेश दिया। देवताओंके पास भोग-सामग्रीकी अधिकता होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दमन करो' समझा। मनुष्योंमें संग्रहकी प्रवृत्ति अधिक होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दान करो' समझा। असुरोंमें हिंसा-(दूसरोंको कष्ट देने-) का भाव अधिक होनेके कारण उन्होंने 'द' का अर्थ 'दया करो' समझा। इस प्रकार देवता, मनुष्य और असुर--तीनोंको दिये गये उपदेशका तात्पर्य दूसरोंका हित करनेमें ही है। वर्षाके समय मेघ जोद 'द द' की गर्जना करता है, वह आज भी ब्रह्माजीके उपदेश (दमन करो, दान करो, दया करो) के रूपसे कर्तव्य-कर्मोंकी याद दिलाता है (बृहदारण्यक0 5। 2। 13)।अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करनेसे वर्षा कैसे होगी? वचनकी अपेक्षा अपने आचरणका असर दूसरोंपर स्वाभाविक अधिक पड़ता है--'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः' (गीता 3। 21)। मनुष्य अपने-अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करेंगे तो उसका असर देवताओंपर भी पड़ेगा, जिससे वे भी अपने कर्तव्यका पलन करेंगे, वर्षा करेंगे। (गीता 3। 11)। इस विषयमें एक कहानी है। चार किसान-बालक थे। आषाढ़का महीना आनेपर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलानेका समय आ गया है; वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समयपर अपने कर्तव्यका पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेतमें जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरोंने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि बात क्या है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्यका पालन करनेमें पीछे क्यों रहें?ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लग गये। मोरोंकी आवाज सुनकर मेघोंने विचार किया कि आज हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगनेपर उन्होंने सोचा कि हम अपने कर्तव्यसे क्यों हटें? और उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। मेघोंकी गर्जना सुनकर इन्द्रने सोचा कि बात क्या है? जब उसको मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं, तब उसने सोचा कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें मैं पीछे क्यों रहूँ?ऐसा सोचकर इन्द्रने भी मेघोंको वर्षा करनेकी आज्ञा दे दी। 'यज्ञः कर्मसमुद्भवः'--निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम 'यज्ञ' है। ब्रह्मचारीके लिये अग्निहोत्र करना 'यज्ञ' है। ऐसे ही स्त्रियोंके लिये रसोई बनाना 'यज्ञ' है (टिप्पणी प0 137.2)। आयुर्वेदका ज्ञाता केवल लोगोंके हितके लिये वैद्यक-कर्म करे तो उसके लिये वही यज्ञ है। इसी तरह विद्यार्थी अपने अध्ययनको और व्यापारी अपने व्यापारको (यदि वह केवल दूसरोंके हितके लिये निष्कामभावसे किया जाय) 'यज्ञ' मान सकते हैं। इस प्रकार वर्ण, आश्रम, देश, कालकीमर्यादा रखकर निष्कामभावसे किये गये सभी शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म 'यज्ञ' रूप होते हैं। यज्ञ किसी भी प्रकारका हो, क्रियाजन्य ही होता है।संखिया, भिलावा आदि विषोंको भी वैद्यलोग जब शुद्ध करके औषधरूपमें देते हैं, तब वे विष भी अमृतकी तरह होकर बड़े-बड़े रोगोंको दूर करनेवाले बन जाते हैं। इसी प्रकार कामना, ममता, आसक्ति, पक्षपात, विषमता, स्वार्थ, अभिमान आदि--ये सब कर्मोंमें विषके समान हैं। कर्मोंके इस विषैले भागको निकालदेनेपर वे कर्म अमृतमय होकर जन्म-मरणरूप महान् रोगको दूर करनेवाले बन जाते हैं। ऐसे अमृतमय कर्म ही 'यज्ञ' कहलाते हैं।'कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि'--वेद कर्तव्य-कर्मोंको करनेकी विधि बताते हैं (गीता 4। 32)। मनुष्यको कर्तव्य-कर्म करनेकी विधिका ज्ञान वेदसे होनेके कारण ही कर्मोंको वेदसे उत्पन्न कहा गया है। 'वेद' शब्दके अन्तर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके साथ-साथ स्मृति, पुराण, इतिहास (रामायण, महाभारत) एवं भिन्न-भिन्न सम्प्रदायके आचार्योंके अनुभव-वचन आदि समस्त वेदानुकूल सत्-शास्र को ग्रहण कर लेना चाहिये।'ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्'--यहाँ 'ब्रह्म' पद वेदका वाचक है। वेद सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट हुए हैं (गीता 17।23)। इस प्रकार परमात्मा सबके मूल हुए।परमात्मासे वेद प्रकट होते हैं। वेद कर्तव्य-पालनकी विधि बताते हैं। मनुष्य उस कर्तव्यका विधिपूर्वक पालन करते हैं। कर्तव्य-कर्मोंके पालनसे यज्ञ होता है, और यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न होता है अन्नसे प्राणी होते हैं और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्य कर्तव्य-कर्मोंके पालनसे यज्ञ करते हैं (टिप्पणी प0 138)। इस तरह यह सृष्टि-चक्र चल रहा है।'तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्'--यहाँ ब्रह्म पद अक्षर-(सगुण-निराकार परमात्मा-) का वाचक है। अतः सर्वगत (सर्वव्यापी) परमात्मा हैं, वेद नहीं।सर्वव्यापी होनेपर भी परमात्मा विशेषरूपसे 'यज्ञ' (कर्तव्य-कर्म) में सदा विद्यमान रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्मका पालन किया जाता है, वहाँ परमात्मा रहते हैं। अतः परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले मनुष्य अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा उन्हें सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं-- 'स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः' (गीता 18। 46)। 'शङ्का'--परमात्मा जब सर्वव्यापी हैं, तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है? क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं?  समाधान--परमात्मा तो सभी जगह समानरूपसे नित्य विद्यमान हैं। वे अनित्य और एकदेशीय नहीं हैं। इसीलिये उन्हें यहाँ 'सर्वगत' कहा गया है। यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य यह है कि यज्ञ उनका उपलब्धि-स्थान है। जमीनमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही उपलब्ध होता है; सब जगहसे नहीं। पाइपमें सर्वत्र जल रहनेपर भी जल वहींसे प्राप्त होता है, जहाँ टोंटी या छिद्र होता है। ऐसे ही सर्वगत होनेपर भी परमात्मा यज्ञसे ही प्राप्त होते हैं।अपने लिये कर्म करनेसे तथा जडता (शरीरादि) के साथ अपना सम्बन्ध माननेसे सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा (आड़) आ जाती है। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये अपने कर्तव्यका पालनकरनेसे यह बाधा हट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्माका स्वतः अनुभव हो जाता है। यही कारण है कि भगवान् अर्जुनको, जो कि अपने कर्तव्यसे हटना चाहते थे, अनेक युक्तियोंसे कर्तव्यका पालन करनेपर विशेष जोर दे रहे हैं। सम्बन्ध--सृष्टिचक्रके अनुसार चलने अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। अतः जो मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता उसकी ताड़ना भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.14।।अन्नात् सर्वाणि भूतानि भवन्ति पर्जन्याद् अन्नसंभवः इति सर्वलोकसाक्षिकम्। यज्ञात् पर्जन्यो भवति इति च शास्त्रेण अवगम्यते  अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।। (मनु0 3।76) इत्यादिना। यज्ञः च द्रव्यार्जनादिकर्तृपुरुषव्यापाररूपकर्मसमुद्भवः।",
        "et": "3.14 From food arise all beings; from rain food is produced. These two facts are matters of common experience. 'From sacrifice comes rain' this is known from the scriptures such as, 'The oblations offered in fire reach the sun, and from the sun comes rain' (Manu, 6.76), and sacrifice is born out of activities in the form of collecting materials, etc., by the agent. And activity arises from 'Brahman', the body born of Prakrti."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.14  3.15।।अन्नादिति।  कर्मेति।  अन्नात् अविभागभोग्यस्वभावात् कथंचित् मायाविद्याकालाद्यनेकापरपर्यायात् (S  N   विद्याप्रकृतिकाला  ) भूतानि विचित्राणि भवन्ति।  तच्च अन्नं पर्जन्यात् अविच्छिन्नसंवित्स्वभावात् आत्मनः भोक्तृतन्त्रात्मलाभत्वात् भोग्यतायाः।  स च पर्जन्यो भोक्ता यज्ञात्  भोगक्रियात्मनः  भोगक्रियायत्तत्वात् भोक्तृत्वस्य।  भोगक्रिया च कर्मणः क्रियाशक्तिस्वातन्त्र्यबलात्।  तच्च स्वातन्त्र्यम् अविच्छिन्नमपि (S अविच्छन्नमपि अविच्छन्नस्यापि अनवच्छिन्नानन्त  ) अनवच्छिन्नानन्तस्वातन्त्र्यपूर्णसमुच्चलन्महेश्वरभावपरमात्मब्रह्मणः संस्पर्शवशात् (S K  ब्रह्मसंस्पर्श  )।  तच्च ( omits तच्च) उच्चलदच्छानाछादितैश्वर्यं ( N  इच्छादितैश्वर्यम्) ब्रह्म अक्षरात् प्रशान्ताशेषैश्वर्यतरङ्गात् संविन्मात्रात्।  इत्येवं सुव्यवस्थितो (S  स्थितोऽयम् भोगक्रियायाम्) यज्ञः षडरं चक्रं वाहयन् तत्र (K omits  तत्र S  N substitute तत्तु) अरात्रयसंधानादपवर्गम् अरात्रयतन्त्रणात् व्यवहारमासूत्रयति इति विद्याविद्योल्लासतरंगसुभगं ब्रह्म (  तरङ्गं ब्रह्म) यज्ञे एव प्रतिष्ठितम्।अन्ये तु अन्नं तावद्वीर्यलोहितक्रमेण भूतकारणम् अन्नं च वृष्टिद्वारेण पर्जन्यात् सोऽपि अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् (S  omits सम्यक् K omits the entire quotation ) इति आदित्यमेति।  ततो वृष्टिर्यज्ञात् यज्ञः क्रियातः सा च ज्ञानपूर्विका ज्ञानमक्षरात् इति।अपरे तु अन्नं अद्यमानं विषयपञ्चकम्  तत्  आश्रित्य भूतानि इन्द्रियाणि विषयाश्चात्मनः स्फुरितरूपाः।  अत आत्मैव विषयोपभोगेन पोष्यते।  अतश्च सर्वगतं (S अतः सर्वगम्) ब्रह्म कर्मणि प्रतिष्ठितं तन्मयत्वात् तस्य इति ।",
        "et": "3.14 See Comment under 3.15"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.14।।इसलिये भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये क्योंकि कर्म जगत्चक्रकी प्रवृत्तिका कारण है। कैसे सो कहते हैं  भक्षण किया हुआ अन्न रक्त और वीर्यके रूपमें परिणत होनेपर उससे प्रत्यक्षही प्राणी उत्पन्न होते है। पर्जन्यसे अर्थात् वृष्टिसे अन्नकी उत्पत्ति होती है और यज्ञसे वृष्टि होती है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यमें स्थित होती है सूर्यसे वृष्टि होती है वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात पायी जाती है। ऋत्विक् और यजमानके व्यापारका नाम कर्म है और उस कर्मसे जिसकी उत्पत्ति होती है वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसमुद्भव है अर्थात् वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है।",
        "sc": "।।3.14।।  अन्नात् भुक्तात् लोहितरेतःपरिणतात् प्रत्यक्षं भवन्ति जायन्ते भूतानि। पर्जन्यात् वृष्टेः अन्नस्य संभवः अन्नसंभवः। यज्ञात् भवति पर्जन्यः अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः (मनु0 3.76) इति स्मृतेः। यज्ञः अपूर्वम्। स च यज्ञः कर्मसमुद्भवः ऋत्विग्यजमानयोश्च व्यापारः कर्म तत् समुद्भवः यस्य यज्ञस्य अपूर्वस्य स यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।तञ्चैवंविधं कर्म कुतो जातमित्याह",
        "et": "3.14 It is a matter of direct perception that annat, from food, which is eaten and is transformed into blood and semen; bhavanti, are born; bhutani, the creatures. Anna-sambhavah, the origin of food; is parjanyat, from rainfall. Parjanyah, rainfall; bhavati, originates; from yajnat, from sacrifice. This accords with the Smrti, 'The oblations properly poured into fire reaches the sun. From the sun comes rain, from rain comes food, and from the sun comes rain, from rain comes food, and from that the creatures' (Ma.Sm.3.76). (Here) sacrifice means its unie [Also termed as the unseen result (adrsta).-Tr.] result. And that sacrifice, i.e. the unie result, which arises (samudbhavah) from action (karma) undertaken by the priest and the sacrificer, is karma-samudbhavah; it has action for its origin."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.14।।अन्नात् इत्यादेः सङ्गतिमाह  हेत्वन्तरमिति।अत्र इत्यनुवर्तते अत्र पर्जन्यो मेघ आदित्यश्च विवक्षितौ तत्रादित्यस्य पूर्वसिद्धस्य कथंयज्ञाद्भवति पर्जन्यः इति यज्ञः कारणत्वेनोच्यते इत्यत आह  यज्ञ इति। यद्यपि यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्याग इति वक्ष्यति तथाप्यत्र परित्यज्यमानं द्रव्यं गृह्यते तस्य पर्जन्यान्नत्वात्पर्जन्योपभोग्यत्वात् उपभुक्तेन च तस्य बलाद्युपचयाद्यज्ञस्तस्य पर्जन्यस्य कारणमुच्यते। ननु पर्जन्यो देवतात्मा यज्ञेन पर्जन्यत्वं प्राप्तः स यज्ञो विवक्षितोऽत्रास्तु तथा सति यज्ञात्पर्जन्योद्भवो मुख्य एव सम्पत्स्यत इति नेत्याह  पूर्वेति तस्य पर्जन्यपदप्राप्तिहेतोः। यज्ञस्येति शेषः। ननु तदा चक्रं प्रवृत्तमेव अतः कथं पूर्वयज्ञस्य चक्राप्रवेशः इत्यत आह  तद्धीति। तच्चक्रमापाद्यं ह्यत्र विवक्षितम् न तु प्रागापादितम् कुतः कर्मविधये ह्येतदुच्यते। यदि विहितं कर्म करिष्यसि तर्हि जगच्चक्रप्रवृत्तिर्भविष्यति अन्यथा तद्विघातः अतस्त्वया कर्म कर्तव्यमिति। कर्मविध्युपयोगिता चापाद्यस्यैव न त्वापादितस्य। आपाद्ये च यज्ञव्यक्तिविशेषस्य पर्जन्यपदप्राप्तिहेतोर्न प्रवेश इत्यर्थः। प्राक् पर्जन्येन कर्म कृतं तेन च यज्ञादिद्वारा चक्रं प्रवृत्तम् अतस्त्वयाऽपि कर्म कर्तव्यमित्येवं प्रागापादितचक्रोक्तिरपि कर्मविध्युपयोगिनी भवतीति चेत् मैवम्। अत इति कोऽर्थः त्वत्कर्मणाऽपि चक्रप्रवृत्तिसम्भवादितिवा कर्मत्वादिति वा। नाद्यः इदानीन्तनपुरुषकर्मजेन यज्ञेन पर्जन्योत्पत्त्यसम्भवेन चक्राप्रवृत्तेः। न हि सर्वेऽपि कर्मकारिणः पर्जन्यत्वं प्राप्नुवन्ति। द्वितीयं दूषयति  न त्विति। फलरहितेन कर्मत्वसामान्येनेदानीं कर्म कार्यं न भवति स्वयं क्लेशरूपत्वादिति। प्रकारान्तरेणापियज्ञाद्भवति पर्जन्यः इत्येतद्दर्शयितुमाह  मेघेति। चक्रं समूहः। ततः किम् इत्यत आह  तच्चेति। मेघचक्रम्। कुतः इत्यत आह  अग्नाविति। ननुस्वकीयमुदकं नद्यः इति समुद्राद्वृष्टिरुच्यते अत आदित्याद्वृष्ट्यङ्गीकारे तद्विरोधः स्यादित्यत आह  उभयेति। वृष्ट्यङ्गीकारादिति शेषः। वार्षिका मेघा इह वृष्टिशब्देनोच्यन्ते। ततोऽपि किम् इत्यत आह  अतश्चेति। प्राक् पर्जन्यस्य भवनं गौणमङ्गीकृत्य व्याख्यातम् इदानीं त्वभिमन्यमानगतस्य भवनस्याभिमानिनी लक्षणामाश्रित्येति भेदः। यद्वा अभिमानिगतस्य पर्जन्यशब्दस्य अभिमन्यमाने लक्षणामाश्रित्य द्वितीयं व्याख्यानम्। तात्पर्यनिर्णये तु मेघसन्ततौ पर्जन्यशब्दो यौगिकोऽङ्गीकृतः। ननु यज्ञः कर्मात्मकः तत्कथमुच्यतेयज्ञः कर्मसमुद्भवः इति तत्राह  यज्ञ इति। इतरक्रिया यज्ञाङ्गभूता। अपूर्वाङ्गीकारे रूढित्यागेन लक्षणाश्रयणं स्यात्।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.14।।उत्पत्तिशिष्टत्वेन तत्रापि तदावश्यकतां दर्शयति द्वाभ्यां  अन्नादिति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.14।।न केवलं प्रजापतिवचनादेव कर्म कर्तव्यमपि तु जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपीत्याह  अन्नादित्यादित्रिभिः। अन्नाद्भुक्ताद्रेतोलोहितरूपेण परिणताद्भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति जायन्ते। अन्नस्य संभवो जन्म। अन्नमंभवः पर्जन्याद्वृष्टेः। प्रत्यक्षसिद्धमेवैतत्। अत्र कर्मोपयोगमाह  यज्ञात्कारीर्यादेरग्निहोत्रादेश्चापूर्वाख्यात् धर्माद्भवति पर्जन्यः। यथा चाग्निहोत्राहुतेर्वृष्टिजनकत्वं तथा व्याख्यातमष्टाध्यायीकाण्डे जनकयाज्ञवल्क्यसंवादरूपायां षट्प्रश्नयाम्। मनुना चोक्तम्अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।। इति। सच यज्ञो धर्माख्यः सूक्ष्मः कर्मसमुद्भवः ऋत्विग्यजमानव्यापारसाध्यः। यज्ञस्य हि अपूर्वस्य विहितं कर्म कारणम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.14।। जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपि कर्म कर्तव्यमित्याह  अन्नादिति त्रिभिः। अन्नाच्छुकशोणितरुपेण परिणताद्भूतान्युत्पद्यन्ते। अन्नस्य च संभवः पर्जन्यादृष्टेः। स च पर्जन्यो यज्ञाद्भवति। स च यज्ञः कर्मसमुद्भवः। कर्मणा यजमानादिव्यापारेण सम्यङ्निष्पद्यत इत्यर्थः।अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः इति स्मृतेः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.14।। जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादप्यधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह  अन्नादिति। अन्नाद्भुक्ताद्रेतआदिरुपेण परिणतात् भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति पर्जन्याद्वृष्टेरन्नस्य संभव उत्पत्तिः यज्ञादपूर्वात्पर्यन्यो भवति। तदुक्तंअग्नौ प्रास्ताहुतिः सभ्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः इति। यज्ञः कर्मणः ऋत्विग्यजमानव्यापारात्समुद्भवो यस्य सः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.14।।उक्तस्यैवार्थस्य प्रमाणप्रदर्शनपूर्वकप्रपञ्चनंअन्नाद्भवन्ति इत्यादिना क्रियत इत्यादरार्थत्वादपौनरुक्त्यमित्यभिप्रायेणाह  पुनरपीति। यद्यपि लोकदृष्ट्या साक्षाद्यज्ञमूलत्वं दर्शयितुमशक्यम् तथापि शास्त्रदृष्टिसमुच्चितवेषेणैतदुच्यत इत्यदोषः। विभजिष्यते च लोकशास्त्रदृष्ट्योर्विषयांशः। पर्जन्यशब्देनात्र पर्जन्यकार्यं वर्षं लक्ष्यते। अन्नादित्यादौवृष्टेरन्नं ततः प्रजाः मनुः3।76 इत्ययमंशी लोकसिद्धत्वादनुपात्तः।कर्मसमुद्भवः इत्युक्ते पुण्यपापरूपकर्मसमुद्भव इति धीः स्यात् तद्व्युदासायद्रव्यार्जनेत्याद्युक्तम्। अत्र मुख्यार्थसम्भवात् यज्ञशब्देनापूर्वलक्षणां वदन्तो निरस्ता इति भावः। आदिशब्देन द्रव्यस्यार्जितस्य पचनादि गृह्यते।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.14।।ननु रसरूपस्य भगवतोऽन्नादेव केवलात् कथं भोगः सेत्स्यति इत्यत आह  अन्नादिति। अन्नाद्भूतानि सजीवशरीराणि भवन्ति तैर्भगवद्भोगः सम्यक् सिद्ध्यति। नन्वन्नादेव भूतोत्पत्तिश्चेत्तदा वृष्ट्यादेः किं प्रयोजनं इत्यत आह  पर्जन्यादिति। पर्जन्यादन्नस्य सम्भव उत्पत्तिर्भवतीत्यर्थः। ननु पर्जन्यश्चेदन्नोत्पादकस्तदा किं यज्ञेन इत्यत आह  यज्ञादिति। यज्ञाद्भगवदर्थात् पर्जन्यो भवति। ननु भगवदात्मकत्वमेव यज्ञस्य चेत्तदाऽन्यदेवाद्यर्थं कर्मकरणोपदेशः कथं इत्यत आह  यज्ञ इति। यज्ञात्मकभगवद्रूपं कर्मणा सम्यगुपपद्यते। अयमर्थः  भगवदंशत्वेन भगवद्विभूतित्वेन कर्मकरणाद्यज्ञात्मकभगवत्प्राकट्यमित्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.14।।जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपि कर्म कर्तव्यमित्याह  अन्नादिति। अन्नाद्रेतोरूपेण परिणताद्भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति। अन्नं च पर्जन्यात्। एतत्प्रसिद्धमेव। यज्ञाद्भवति पर्जन्यःअग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः। इति स्मृतेः। यज्ञो देवताराधनजो धर्मः कर्मभ्यो यागहोमदानादिभ्यः समुद्भवतीति कर्मसमुद्भवः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "All living bodies subsist on food grains, which are produced from rains. Rains are produced by performance of yajña [sacrifice], and yajña is born of prescribed duties.",
        "ec": " Śrīla Baladeva Vidyābhūṣaṇa, a great commentator on the Bhagavad-gītā , writes as follows: ye indrādy-aṅgatayāvasthitaṁ yajñaṁ sarveśvaraṁ viṣṇum abhyarcya tac-cheṣam aśnanti tena tad deha-yātrāṁ sampādayanti, te santaḥ sarveśvarasya yajña-puruṣasya bhaktāḥ sarva-kilbiṣair anādi-kāla-vivṛddhair ātmānubhava-pratibandhakair nikhilaiḥ pāpair vimucyante. The Supreme Lord, who is known as the yajña-puruṣa, or the personal beneficiary of all sacrifices, is the master of all the demigods, who serve Him as the different limbs of the body serve the whole. Demigods like Indra, Candra and Varuṇa are appointed officers who manage material affairs, and the Vedas direct sacrifices to satisfy these demigods so that they may be pleased to supply air, light and water sufficiently to produce food grains. When Lord Kṛṣṇa is worshiped, the demigods, who are different limbs of the Lord, are also automatically worshiped; therefore there is no separate need to worship the demigods. For this reason, the devotees of the Lord, who are in Kṛṣṇa consciousness, offer food to Kṛṣṇa and then eat – a process which nourishes the body spiritually. By such action not only are past sinful reactions in the body vanquished, but the body becomes immunized to all contamination of material nature. When there is an epidemic disease, an antiseptic vaccine protects a person from the attack of such an epidemic. Similarly, food offered to Lord Viṣṇu and then taken by us makes us sufficiently resistant to material affection, and one who is accustomed to this practice is called a devotee of the Lord. Therefore, a person in Kṛṣṇa consciousness, who eats only food offered to Kṛṣṇa, can counteract all reactions of past material infections, which are impediments to the progress of self-realization. On the other hand, one who does not do so continues to increase the volume of sinful action, and this prepares the next body to resemble hogs and dogs, to suffer the resultant reactions of all sins. The material world is full of contaminations, and one who is immunized by accepting prasādam of the Lord (food offered to Viṣṇu) is saved from the attack, whereas one who does not do so becomes subjected to contamination. Food grains or vegetables are factually eatables. The human being eats different kinds of food grains, vegetables, fruits, etc., and the animals eat the refuse of the food grains and vegetables, grass, plants, etc. Human beings who are accustomed to eating meat and flesh must also depend on the production of vegetation in order to eat the animals. Therefore, ultimately, we have to depend on the production of the field and not on the production of big factories. The field production is due to sufficient rain from the sky, and such rains are controlled by demigods like Indra, sun, moon, etc., and they are all servants of the Lord. The Lord can be satisfied by sacrifices; therefore, one who cannot perform them will find himself in scarcity – that is the law of nature. Yajña, specifically the saṅkīrtana-yajña prescribed for this age, must therefore be performed to save us at least from scarcity of food supply."
    }
}
