{
    "_id": "BG3.12",
    "chapter": 3,
    "verse": 12,
    "slok": "इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः |\nतैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||३-१२||",
    "transliteration": "iṣṭānbhogānhi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ .\ntairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||3-12||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.12।। यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.12 The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering (in return) to them, is verily a thief.",
        "ec": "3.12 इष्टान् desired? भोगान् objects? हि so? वः to you? देवाः the gods? दास्यन्ते will give? यज्ञभाविताः nourished by sacrifice? तैः by them? दत्तान् give? अप्रदाय without offering? एभ्यः to them? यः who? भुङ्क्ते enjoys? स्तेनः thief? एव verily? सः he.Commentary When the gods are pleased with you sacrifices? they will bestow on you all the desired objects such as children? cattle? property? etc. He who enjoys what has been given to him by the gods? i.e.? he who gratifies the cravings of his own body and the senses without offering anything to the gods in return is a veritable thief. He is really a dacoit of the property of the gods."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.12 For, fed, on sacrifice, nature will give you all the enjoyment you can desire. But he who enjoys what she gives without returning is, indeed, a robber.'"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.12।। देवताओं को सन्तुष्ट करने पर वे हमें सन्तुष्ट करते हैं कर्मकाण्ड के इस अबाध्य सिद्धान्त को श्रीकृष्ण दोहराते हैं। देव और यज्ञ इन दो शब्दों के पारम्परिक अर्थ के स्थान पर पूर्वश्लोकों के विवरण में बताये हुये अर्थ को हम यदि स्वीकार करें तभी इस श्लोक का अर्थ सत्य प्रमाणित होता है उत्पादनक्षमता (देव) का त्याग और अर्पण की भावना से आचरित कर्म (यज्ञ) के द्वारा पोषण करने पर वह हमें इष्ट फल प्रदान करेगा। यह जीवन का नियम है।जब हम सबको यज्ञ से फल प्राप्त होता है तब उसे आपस में बांटकर उपभोग करने का हमें पूर्ण अधिकार है। किसी भी प्राणी को सामूहिक प्रयत्न में सहयोग दिये बिना दूसरे के कर्मों का लाभ नहीं उठाना चाहिये। पूँजीवादी जीवन व्यवस्था में एक यह दुष्प्रवृत्ति दिखाई देती है कि लाखों कर्मचारियों के सामूहिक कर्मों का अधिक से अधिक लाभ अकेला व्यक्ति उठाना चाहता है। इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति अन्तत सभी कर्मक्षेत्रों में अव्यवस्था को जन्म देती है। परिणाम यह होता है कि जीवन के सामंजस्य में अव्यवस्था फैलाने से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिये संकट उत्पन्न हो जाता है। इस श्लोक के दूसरी पंक्ति में कही हुई बात को आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में इस प्रकार कहते हैं समाज का वह व्यक्ति जो उत्पादन किये बिना भोग करता है राष्ट्र के लिये भारस्वरूप है।यज्ञ (निस्वार्थ सेवा) किये बिना जो देवताओं से भोग प्राप्त करता है भगवान् श्रीकृष्ण उसे सामाजिक चोर की संज्ञा देते हैं। गीताकालीन सम्मानित नैतिक आदर्शों को देखते हुये चोर शब्द का प्रयोग कठोर किन्तु शक्तिशाली है जो भोगी एवं सामाजिक अपराधी व्यक्ति के भ्रष्ट एवं अनादर पूर्ण स्वभाव की ओर संकेत करता है।परन्तु"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.12. The devas, gratified with necessary action will grant you the things sacrificed.  [Hence] whosoever enjoys their gifts without offering them to these devas-he is surely a thief."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.12 The gods, pleased by the sacrifice, will bestow on you the enjoyments you desire. He who enjoys the bounty of the gods without giving them anything in return, is but a thief."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.12 'Being nourished by sacrifices, the gods will indeed give you the coveted enjoyments. He is certainly a theif who enjoys what have been given by them without offering (these) to them.'"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.12।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.12।।इतश्चाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह  किञ्चेति। कथमस्माभिर्भाविताः सन्तो देवा भावयिष्यन्त्यस्मानिति तदाह  इष्टानिति। यज्ञानुष्ठानेन पूर्वोक्तरीत्या स्वर्गापवर्गयोर्भावेऽपि कथं स्त्रीपशुपुत्रादिसिद्धिरित्याशङ्क्य पूर्वार्धं व्याकरोति  इष्टानभिप्रेतानिति। पश्वादिभिश्च यज्ञानुष्ठानद्वारा भोगो निवर्तनीयोऽन्यथा प्रत्यवायप्रसङ्गादित्युत्तरार्धं व्याचष्टे  तैरिति। आनृण्यमकृत्वेत्यर्थः। अथमर्थः  देवानामृषीणां पितृ़णां च यज्ञेन ब्रह्मचर्येण प्रजया च संतोषमनापाद्य स्वकीयं कार्यकरणसंघातमेव पोष्टुं भुञ्जानस्तस्करो भवतीति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.12।। यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है।",
        "hc": "3.12।। व्याख्या--'इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः'--यहाँ भी 'इष्टभोग' शब्दका अर्थ इच्छित पदार्थ नहीं हो सकता। कारण कि पीछेके (ग्यारहवें) श्लोकमें परम कल्याणको प्राप्त होनेकी बात आयी है और उसके हेतुके लिये वह (बारहवाँ) श्लोक है। भोगोंकी इच्छा रहते परम कल्याण कभी हो ही नहीं सकता। अतः यहाँ 'इष्ट' शब्द यज् धातुसे निष्पन्न होनेसे तथा 'भोग' (टिप्पणी प0 132.1) शब्दका अर्थ आवश्यक सामग्री होनेसे उपर्युक्त पदोंका अर्थ होगा वे देवता तुमलोगोंको यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे।यहाँ 'यज्ञभाविताः देवाः' पदोंका तात्पर्य है कि देवता तो अपना अधिकार समझकर मनुष्योंको आवश्यक सामग्री प्रदान करते ही हैं केवल मनुष्योंको ही अपना कर्तव्य निभाना है।'तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते'  ब्रह्माजीने देवताओंके लिये 'ते देवाः' पदोंका प्रयोग किया है क्योंकि उनके सामने मनुष्य थे देवता नहीं। परन्तु यहाँ 'एभ्यः'पद (जो इदम् शब्दसे बनता है) का प्रयोग हुआ है जो समीपताका द्योतक है। भगवान्के लिये सभी समीप ही हैं (गीता 7। 26)। इससे सिद्ध होता है कि अब यहाँसे भगवान्के वचन आरम्भ होते हैं।\n\n  यहाँ 'भुङ्क्ते' (टिप्पणी प0 132.2) पदका तात्पर्य केवल भोजन करनेसे ही नहीं है प्रत्युत शरीरनिर्वाहकी समस्त आवश्यक सामग्री (भोजन, वस्त्र, धन, मकान आदि) को अपने सुख के लिये काममें लानेसे है।  यह शरीर माता-पितासे मिला है और इसका पालन-पोषण भी उन्हींके द्वारा हुआ है। विद्या गुरुजनोंसे मिली है। देवता सबको कर्तव्य-कर्मकी सामग्री देते हैं। ऋषि सबको ज्ञान देते हैं। पितर मनुष्यकी सुख-सुविधाके उपाय बताते हैं। पशु-पक्षी, वृक्ष, लता आदि दूसरोंके सुखमें स्वयंको समर्पित कर देते हैं। (यद्यपि पशु-पक्षी आदिको यह ज्ञान नहीं रहता कि हम परोपकार कर रहे हैं, तथापि उनसे दूसरोंका उपकार स्वतः होता रहता है) इस प्रकार हमारे पास जो कुछ भी सामग्री--बल, योग्यता, पद, अधिकार, धन, सम्पत्ति आदि है वह सब-की-सब हमें दूसरोंसे ही मिली है। इसलिये इनको दूसरोंकी ही सेवामें लगाना है।शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी पदार्थ हमें संसारसे मिले हैं। ये कभी अपने नहीं हैं और अपने होंगे भी नहीं। अतः इनको अपना और अपने लिये मानकर इनसे सुख भोगना ही बन्धन है। इस बन्धन से छूटनेका यही सरल उपाय है कि जिनसे ये पदार्थ हमें मिले हैं, इन्हें उन्हींका मानते हुए उन्हींकी सेवामें निष्कामभावपूर्वक लगा दें। यही हमारा परम कर्तव्य है।साधकोंके मनमें प्रायः ऐसी भावना पैदा हो जाती है कि अगर हम संसारकी सेवा करेंगे तो उसमें हमारी आसक्ति हो जायगी और हम संसारमें फँस जायँगे! परन्तु भगवान्के वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि फँसनेका कारण सेवा नहीं है, प्रत्युत अपने लिये कुछ भी लेनेका भाव ही है। इसलिये लेनेका भाव छोड़कर देवताओंकी तरह दूसरोंको सुख पहुँचाना ही मनुष्यमात्रका परम कर्तव्य है।कर्मयोगके सिद्धान्तमें प्राप्त सामग्री, सामर्थ्य, समय तथा समझदारीका सदुपयोग करनेका ही विधान है। प्राप्त सामग्री आदिसे अधिककी (नयी-नयी सामग्री आदिकी) कामना करना कर्मयोगके सिद्धान्तके विरुद्ध है। अतः प्राप्त सामग्री आदिको ही दूसरोंके हितमें लगाना है। अधिककी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। युक्तिसंगत बात है कि जिसमें जितनी शक्ति होती है, उससे उतनी ही आशा की जाती है, फिर भगवान् अथवा देवता उससे अधिककी आशा कैसे कर सकते हैं?'स्तेन एव सः'--यहाँ 'सः स्तेनः' पदोंमें एकवचन देनेका तात्पर्य यह है कि अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाला मनुष्य सबको प्राप्त होनेवाली सामग्री (अन्न, जल ,वस्त्र आदि) का भाग दूसरोंको दिये बिना ही अकेला स्वयं ले लेता है। अतः वह चोर ही है।जो मनुष्य दूसरोंको उनका भाग न देकर स्वयं अकेले ही भोग करता है, वह तो चोर है ही, पर जो मनुष्य किसी भी अंशमें अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है अर्थात् सामग्रीको सेवामें लगाकर बदलेमें मान-बड़ाई आदि चाहता है, वह भी उतने अंशमें चोर ही है। ऐसे मनुष्यका अन्तःकरण कभी शुद्ध और शान्त नहीं रह सकता।\n\nयह व्यष्टि शरीर किसी भी प्रकारसे समष्टि संसारसे अलग नहीं है और अलग हो सकता भी नहीं; क्योंकि समष्टिका अंश ही व्यष्टि कहलाता है। इसलिये व्यष्टि-(शरीर) को अपना मानना और समष्टि-(संसार-) को अपना न मानना ही राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंका कारण है एवं यही अहंकार, व्यक्तित्व अथवा विषमता है (टिप्पणी प0 133)। कर्मयोगके अनुष्ठानसे ये सब (राग-द्वेष आदि) सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं। कारण कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, वह सब अपने लिये नहीं, प्रत्युत संसारमात्रकेलिये कर रहा हूँ। इसमें भी एक बड़ी मार्मिक बात यह है कि कर्मयोगी अपने कल्याणके लिये भी कोई कर्म न करके संसारमात्रके कल्याणके उद्देश्यसे ही सब कर्म करता है। कारण कि सबके कल्याणसे अपना कल्याण अलग मानना भी व्यक्तित्व और विषमताको जन्म देना है जो साधककी उन्नतिमें बाधक है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब-का-सब हमें संसारसे मिला है। संसारसे मिली वस्तुको केवल अपनी स्वार्थसिद्धिमें लगाना ईमानदारी नहीं है। 'कर्तव्यसम्बन्धी विशेष बात'\n\nहिन्दू-संस्कृतिका एकमात्र उद्देश्य मनुष्यका कल्याण करना है। इसी उद्देश्यसे ब्रह्माजी (सृष्टिके आदिमें) मनुष्यको निःस्वार्थभावसे अपने-अपने कर्तव्यके द्वारा एक-दूसरेको सुख पहुँचानेकी आज्ञा देते हैं (गीता 3। 10)।परिवारमें भाई, बहनें, माताएँ आदि सब-के-सब कर्म करते ही हैं; परन्तु उनसे बड़ी भारी भूल यह होती है कि वे कामना, ममता, आसक्ति, स्वार्थ आदिके वशीभूत होकर कर्म करते हैं। अतः लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही लाभ उन्हें नहीं होते, प्रत्युत हानि ही होती है। स्वार्थके वशीभूत होकर अपने लिये कर्म करनेसे ही लोकमें लड़ाई, खटपट, ईर्ष्या आदि होते हैं और परलोकमें दुर्गति होती है। दूसरोंकी सेवा करके बदलेमें कुछ भी चाहनेसे वस्तुओं और व्यक्तियोंके साथ मनुष्यका सम्बन्ध जुड़ जाता है। किसी भी कर्मके साथ स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लेनेसे वह कर्म तुच्छ और बन्धनकारक हो जाता है। स्वार्थी मनुष्यको संसारमें कोई अच्छा नहीं कहता। चाहनेवालेको कोई अधिक देना नहीं चाहता। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि घरमें भी रागी तथा भोगी व्यक्तिसे वस्तुएँ छिपायी जाती हैं। इसके विपरीत हमारे पास जितनी समझ, समय, सामर्थ्य और सामग्री है, उतनेसे ही हम दूसरोंकी सेवा करें तो उससे कल्याण तो होता ही है, इसके सिवाय वस्तु, आराम, मानबड़ाई आदरसत्कार आदि न चाहनेपर भी प्राप्त होने लगते हैं। परन्तु कर्मयोगीमें मान-बड़ाई आदिकी इच्छा नहीं होती; क्योंकि इनकी इच्छा और सुखभोग ही बन्धनकारक होता है। मुझे सुख कैसे मिले?'--केवल इसी चाहनाके कारण मनुष्य कर्तव्यच्युत और पतित हो जाता है। अतः 'दूसरोंको सुख कैसे मिले?'--ऐसा भाव कर्मयोगीको सदा ही रखना चाहिये। घरमें माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र आदि जितने व्यक्ति हैं, उन सभीको एक-दूसरेके हितकी बात सोचनी चाहिये। प्रायः सेवा करनेवालेसे एक भूल हो जाती है कि वह 'मैं सेवा करता हूँ', 'मैं वस्तुएँ देता हूँ'--ऐसा मानकर झूठा अभिमान कर बैठता है। वस्तुतः सेवा करनेवाला व्यक्ति सेव्यकी वस्तु ही सेव्यको देता है। जैसे माँका दूध उसके अपने लिये न होकर बच्चेके लिये ही है, ऐसे ही मनुष्यके पास जितनी भी सामग्री है वह उसके अपने लिये न होकर दूसरोंके लिये ही है। अतः मनुष्यको प्राप्त सामग्रीमें ममता करने अर्थात् उसे अपनी और अपने लिये माननेका अधिकार नहीं है। ममता करनेपर भी प्राप्त सामग्री तो सदा रहेगी नहीं, केवल ममतारूप बन्धन रह जायगा। इसी कारण भगवान् कहते हैं कि वस्तुओंको अपनी मानकर स्वयं उसका भोग करनेवाला मनुष्य चोर ही है।देवता, ऋषि, पितर, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि सभीका स्वभाव ही परोपकार करनेका है। मनुष्य सदा इनसे सहयोग पानेके कारण इनका ऋणी है। इस ऋणसे मुक्त होनेके लिये ही पञ्चमहायज्ञ-(ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ-) का विधान है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो बुद्धिपूर्वक सभीको अपने कर्तव्य-कर्मोंसे तृप्त कर सकता है। अतः सबसे ज्यादा जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। इसीको ऐसी स्वतन्त्रता मिली है, जिसका सदुपयोग करके यह परमj श्रेयकी प्राप्ति कर सकता है।देवता आदि तो अपने कर्तव्यका पालन करते ही हैं। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नही करता तो देवताओंमें ही नहीं प्रत्युत त्रिलोकीभरमें हलचल उत्पन्न हो जाती है और परिणामस्वरूप अतिवृष्टि अनावृष्टि भूकम्प दुर्भिक्ष आदि प्राकृतिक प्रकोप होने लगते हैं। भगवान् भी (गीता 3। 2324 में) कहते हैं कि यदि मैं सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो समस्त लोक नष्टभ्रष्ट हो जायँ। जिस तरह गतिशील बैलगाड़ीका कोई एक पहिया भी खण्डित हो जाय तो उससे पूरी बैलगाड़ीको झटका लगता है इसी तरह गतिशील सृष्टिचक्रमें यदि एक व्यक्ति भी कर्तव्यच्युत होता है तो उसका विपरीत प्रभाव सम्पूर्ण सृष्टिपर पड़ता है। इसके विपरीत जैसे शरीरका एक भी पीड़ित (रोगी) अङ्ग ठीक होनेपर सम्पूर्ण शरीरका स्वतः हित होता है ऐसे ही अपने कर्तव्यका ठीकठीक पालन करनेवाले मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिका स्वतः हित होता है।प्रजापति ब्रह्माजीने देवता और मनुष्य दोनोंको अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेकी आज्ञा दी है। देवता आदि सब मर्यादासे चलते हैं। केवल मनुष्य ही अपनी बेसमझीसे मर्यादाको भंग करता है। कारण कि उसे दूसरोंकी सेवा करनेके लिये जो सामग्री मिली है उसपर वह अपना अधिकार समझ बैठता है। अनन्त जन्मोंके कर्मबन्धनसे छुटकारा पानेके लिये मनुष्यको स्वतन्त्रता मिली है किन्तु वह उसका सदुपयोग करके कर्म और कर्मफलमें ममताआसक्ति कर बैठता है। फलस्वरूप नया बन्धन उत्पन्न करके वह स्वयं फँस जाता है और आगे अनेक जन्मोंतक दुःख पानेकी तैयारी कर लेता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि उसे जो कुछ सामग्री मिली है उससे वह त्रिलोकीकी सेवा करे अर्थात् उस सामग्रीको वह भगवान् देवता ऋषि पितर मनुष्य आदि समस्त प्राणियोंकी सेवामें लगा दे।\n\n 'शङ्का'--जो कुछ सामग्री प्राप्त हुई है वह सबकीसब दूसरोंकी सेवामें लगा देनेपर कर्मयोगीकी जीवननिर्वाह कैसे हो सकेगा समाधान वास्तवमें यह शंका शरीरके साथ अपनी एकता माननेसे अर्थात शरीरको ही अपना स्वरूप माननेसे पैदा होती है परन्तु कर्मयोगी शरीरसे अपना कोई सम्बन्ध मानता ही नहीं प्रत्युत उसे संसारका और संसारके लिये ही मानकर उसीकी सेवामें लगा देता है। उसकी दृष्टि अविनाशी स्वरूपपर रहती है नाशवान् शरीरपर नहीं। जिसकी दृष्टि शरीरपर रहती है वही ऐसी शंका कर सकता है कि कर्मयोगीका जीवननिर्वाह कैसे होगाजबतक भोगेच्छा रहती है तभीतक जीनेकी इच्छा तथा मरनेका भय रहता है। भोगेच्छा कर्मयोगीमें रहती ही नहीं क्योंकि उसके सम्पूर्ण कर्म अपने लिये न होकर दूसरोंकी सेवाके लिये ही होते हैं। अतः कर्मयोगी अपने जीनेकी परवाह नहीं करता। उसके मनमें यह प्रश्न ही नहीं उठता कि मेरा जीवननिर्वाह कैसे होगा वास्तवमें जिसके हृदयमें जगत्की आवश्यकता नहीं रहती उसकी आवश्यकता जगत्को रहती है। इसलिये जगत् उसके निर्वाहका स्वतः प्रबन्ध करता है।जिनका जीवन परोपकारके लिये ही समर्पित है ऐसे पशुपक्षी कीटपतंग वृक्षलता आदि सभी साधारण प्राणियोंके भी जीवननिर्वाहका जब प्रबन्ध है तब शरीरसहित मिली हुई सब सामग्रीको प्राणियोंके हितमें व्यय करनेवाले मनुष्यके जीवननिर्वाहका प्रबन्ध न हो यह कैसे सम्भव हैसबका पालन करनेवाले भगवान्की असीम कृपासे जीवननिर्वाहकी सामग्री समस्त प्राणियोंको समानरूपसे मिली हुई है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सबके सामने है। माताके शरीरमें जहाँ रक्तहीरक्त रहता है वहाँ भी बच्चेके जीवननिर्वाहके लिये मीठा और पुष्टिकर दूध स्वतः पैदा हो जाता है। अतः चाहे प्रारब्धसे मानो चाहे भगवत्कृपासे मनुष्यके जीवननिर्वाहकी सामग्री उसको मिलती ही है। इसमें संदेह चिन्ता शोक एवं विचार होना ही नहीं चाहिये। भगवान्के राज्यमें जब पापीसेपापी एवं नास्तिकसेनास्तिक पुरुषका भी जीवननिर्वाह होता है तब कर्मयोगीके जीवननिर्वाहमें क्या बाधा आ सकती है अतः यह प्रश्न उठाना ही भूल है।\n\n सम्बन्ध-- नवें श्लोकमें भगवान्नेयज्ञके लिये किये जानेवाले कर्म बाँधनेवाले नहीं होते ऐसा बताकर यज्ञके लिये कर्म करनेकी आज्ञा दी। उस आज्ञाको ब्रह्माजीके वचनोंद्वारा पुष्ट करके नवें श्लोकमें कहे हुए अपने वचनोंसे एकवाक्यता करते हुए आगेके श्लोकमें यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करने और न करनेके फलका स्पष्ट विवेचन करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.12।।यज्ञभाविताः यज्ञेन आराधिताः मदात्मका देवा इष्टान् भोगान् वो दास्यन्ते परमपुरुषार्थलक्षणं मोक्षं साधयतां ये इष्टा भोगाः तान् पूर्वपूर्वयज्ञभाविता देवा दास्यन्ते। उत्तरोत्तराराधनापेक्षितान् सर्वान् भोगान् वो दास्यन्ति इत्यर्थः।स्वाराधनार्थता तैः दत्तान् भोगान् तेभ्यः अप्रदाय यो भुङ्क्ते चोर एव सः। चौर्यं हि नाम अन्यदीये तत्प्रयोजनाय एव परिक्लृप्ते वस्तुनि स्वकीयताबुद्धिं कृत्वा तेन स्वात्मपोषणम्। अतः अस्य न परमपुरुषार्थानर्हतामात्रम् अपि तु निरयगामित्वं च भविष्यति इत्यभिप्रायः।तद् एव विवृणोति",
        "et": "3.12 'Pleased by the sacrifice,' i.e., propitiated by the sacrifice, the gods, who have Me as their Self, will bestow on you the enjoyments you desire. Whatever objects are desired by persons keen on attaining release, the supreme end of human endeavour, all those will be granted by gods previously worshipped through many sacrifices. That is, whatever is solicited with more and more propitiation, all those enjoyments they will bestow on you. Whoever enjoys the objects of enjoyment granted by them for the purpose of worshipping them, without giving them their due share in return - he is verily a thief. What is called 'theft' is indeed taking what belongs to another as one's own and using it for oneself, when it is really designed for the purpose of another. The purport is that such a person becomes unfit not only for the supreme end of human endeavour, but also will go down towards purgatory (Naraka).\n\nSri Krsna expands the same:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.12।।न केवलमित्थमपवर्गे यावत्सिद्धिलाभेऽपि अयं मार्गः  अभ्यसनीय  इत्याह  इष्टानिति।  यज्ञतर्पितानि हि इन्द्रियाणि स्थितिं बध्नन्ति यत्रक्वापि ध्येयादौ इति।  अत एव तद्व्यापारे सति तेषां विषयाणां स्मृतिसंकल्पध्यानादिना भावाः विषयाः इन्द्रियैरेव दत्ताः।  यदि तेषामेवोपभोगाय विषया (S K omit विषयाः)  न दीयन्ते तर्हि स्तेनत्वं चौर्यं स्यात् छद्मचारित्वात्।  उक्तं हि पूर्वमेव भगवता मूढाचारः स उच्यते (II 6 ) इति।  अतो़ऽयं वाक्यार्थः  यः सुखोपायं सिद्धिम् अपवर्गं वा प्रेप्सति तेन इन्द्रियकौतुकनिवृत्तिमात्रफलतयैव भोगा यथोपनतमासेव्या इति।",
        "et": "3.12 Istan etc.  [The deities of]  the senses, gratified by the necessry actions,  bind [the aspirant's mind] to the state of remaining firm on some object of meditation.  Therefore when they are at work, the things,  i.e.,  the objects are granted [to him]  by none but the  [deities of the]  senses, through recollection, resolution, meditation etc., of their objects.  If these objects are not offered for the enjoyment of the deities, then it would amount to the status of a theif i.e.,  to an act of thief, because he is acting deceitfully.  Indeed it has already been declared by the Bhagavat that  'He is called a man of deluded action'.  Therefore the idea in the passage  [under study] is this :  Whosoever is desirous of attaining by easy means,  the supernatural power  [like anima etc.], or of attaining emancipation, he should enjoy the objects as and when they are brought, [and enjoy]  just with the aim of simply alliviating the impatience of the [deities of the] senses."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.12।।दूसरी बात यह भी है कि  यज्ञद्वारा बढ़ाये हुए  संतुष्ट किये हुए देवता लोग तुमलोगोंको स्त्री पशु पुत्र आदि इच्छित भोग देंगे। उन देवोंद्वारा दिये हुए भोगोंको उन्हें न देकर अर्थात् उनका ऋण न चुकाकर जो खाता है  केवल अपने शरीर और इन्द्रियोंको ही तृप्त करता है वह देवताओंके स्वत्वको हरण करनेवाला चोर ही है।",
        "sc": "।।3.12।। इष्टान् अभिप्रेतान् भोगान् हि वः युष्मभ्यं देवाः दास्यन्ते वितरिष्यन्ति स्त्रीपशुपुत्रादीन् यज्ञभाविताः यज्ञैः वर्धिताः तोषिताः इत्यर्थः। तैः देवैः दत्तान् भोगान् अप्रदाय अदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा इत्यर्थः एभ्यः देवेभ्यः यः भुङ्क्ते स्वदेहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव सः देवादिस्वापहारी।।ये पुनः",
        "et": "3.12 'Yajna-bhavitah, being nourished, i.e. being satisfied, by sacrifices; devah, the gods; dasyante hi, will indeed give, will distribute; among vah, you; the istan, coveted; bhogan, enjoyments, such as wife, childeren and cattle. Sah, he; is eva, certainly; a stenah, thief, a stealer of the wealth of gods and others; yah, who; bhunkte, enjoys, gratifies only his own body and organs; with dattan, what enjoyable things have been given; taih, by them, by the gods; apradaya, without offering (these); hyah, to them, i.e. without repaying the d  [The three kinds of d -to the gods, to the rsis (sage), and to the manes-are repaid by satisfying them through sacrifices, celibacy (including study of the Vedas, etc.), and procreation, respectively. Unless one repays these d s, he incurs sin.] to them.'"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.12।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.12।।इष्टानिति। तैर्वृष्ट्यादिना दत्तानन्नादीन् अप्रदाय एभ्यो यो भुङ्क्ते स स्तेन एवेति जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवाञ्जायतेः () ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजाभिः पितृभ्य एष वानृणः     इति श्रुतेस्त्रयाणामृणी चायमित्यतस्तैः पूर्वमृणं प्रदत्तवांस्तेभ्यः पुनर्न प्रत्ययेच्चोर एवेति तदनिवेदने दोष उक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.12।।न केवलं पारत्रिकमेव फलं यज्ञात् किंत्वेहिकमपीत्याह  इष्टानभिलषितान्भोगान्पश्वन्नहिरण्यादीन् वो युष्मभयं देवा दास्यन्ते वितरिष्यन्ति। हि यस्मात् यज्ञैर्भावितास्तोषितास्ते। यस्मात्तेः ऋणवद्भवद्भ्योः दत्ता भोगास्तस्मात्तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽप्रदाय यज्ञेषु देवोद्देशेनाहुतीरसंपाद्य यो भुङ्क्ते देहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव स देवस्वापहारी देवर्णानपाकरणात्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.12।।एतदेव स्पष्टीकुर्वन्कर्माकरणे दोषमाह  इष्टानिति। यज्ञैर्भाविताः सन्तो देवा वृष्ट्यादिद्वारेण वः युष्मभ्यं भोगान्दास्यन्ति हि। अतो देवैर्दत्तानन्नादीनेभ्यो देवेभ्यः पञ्चयज्ञादिभिरदत्त्वा यो भुङ्क्ते स तु चोर एव ज्ञेयः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.12।। किंच ते देवा यज्ञैर्वर्धिता वो युष्मभ्यं इष्टान् भोगान् स्त्रीपुत्रपशुस्वर्णादीन् वितरिष्यन्ति। यस्तु तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा  स्वदेहादीन्येव तर्पयति स तस्कर एव देवादिस्वापहारी।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।3.12।।ते देवा भावयन्तु वः 3।11 इत्युक्तस्य पोषणस्य प्रकारोदेवान् भावयत इत्यस्य व्यतिरेके प्रत्यवायश्चोच्यते  इष्टानितिश्लोकेन।इष्टान् इत्यस्यार्थः  उत्तरोत्तराराधनापेक्षितानिति। न हि मुमुक्षुभिरुदरपूरणाद्यर्थं भोगा इष्यन्त इति भावः। बहुवचनासङ्कोचमभिप्रेत्योक्तंसर्वानिति।दास्यन्ते इति कर्त्रभिप्रायक्रियाफलात्मनेपदस्वभावानुरोधेन आत्मार्थपाचकानां चोरत्वसिद्ध्यर्थंस्वाराधनार्थतयेत्युक्तम्। ननु किमत्र चोरत्वम् न हि देवानां भोगानसौ गूढं प्रसह्य वा हरति न च तैर्दत्तस्य स्वहस्तागतस्य भोगश्चौर्यम् न हि राजादिसेवकास्तद्दत्तभोगजीविनश्चोरा इति शूलमारोप्यन्ते एवं च सति सर्वेषां यज्ञादिफलभुजामविशेषेण चोरत्वं प्रसज्यत इत्याशङ्क्याह  चौर्यं हीति। परबुद्ध्या परप्रयोजनत्वेन कल्पितस्य स्वकीयस्य परानुमत्या स्वप्रयोजनतया परिकल्पितस्यान्यदीयस्य च व्यवच्छेदायअन्यदीय इत्यादिविशेषणद्वयम्। तेन स्वात्मपोषणमिति चौर्यस्य फलम् अन्यदीये स्वकीयताबुद्धिकरणमित्येव लक्षणम्। तत्प्रयोजनतयेत्यन्यदीयत्वफलम् तेन स्वात्मपोषणानौचित्यद्योतनम्। वस्तुशब्देन चोरयितव्यावान्तरभेदविवक्षां द्योतयति।बुद्धिं कृत्वेत्यनेन चौर्यस्य नाधिकव्यापारोऽवश्यापेक्षित इति सूचितम्। बुद्धिपूर्वत्वं च द्योतितम्। एवं च सतियोऽन्यथा सन्तम् म.भा.5।52।35 इत्याद्युक्तात्मचौर्यमपि लक्षितं भवति। भगवदीये तद्गतातिशयाधानेच्छयैव परिकल्पिते प्रत्यगात्मनि स्वातिशयावहस्वतन्त्रत्वाभिमानरूपत्वात्तस्य।नन्वेवमप्यत्रोदाहरणे कथं चोरत्वम् उच्यते  देवा हि कर्मभिराराधिता अपि हविर्ग्रहणार्थमेव फलं प्रयच्छन्ति यथा राजानः षड्भागसङ्ग्रहाय स्वाराधकेभ्यः क्षेत्रादिकम् तत्र करप्रदानविमुखाः पुरुषा इव हविरादिकमप्रयच्छन्तो दण्ड्या एव  इति। चोरत्वनिर्देशफलितं व्यनक्ति  अत इति। चोरत्वादित्यर्थः।परमपुरुषार्थानर्हतेत्यनेन विहितकर्माकरणस्याधिकारित्वनिवृत्तिहेतुत्वमपि ख्यापितम्।भविष्यतीत्यनेन प्रत्यवायस्य देहान्तरभावितया योग्यानुपलम्भबाधाभावः सूचितः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.12।।ननु श्रेयसोऽनेकरूपत्वात्िकँल्लक्षण श्रेयःप्राप्तिर्भविष्यतीत्याह  इष्टानिति। वो युष्मभ्यं यज्ञभाविता देवा इष्टान् भोगान् वृष्ट्यादिकरणेनान्नाद्दीन् दास्यन्ते। यद्वा वो युष्मभ्यं इष्टान् यदेवेष्टं भवताम्। भगवत्सेवौपयिकबलाद्यर्थकान्नादिसम्पत्त्यर्थं वृष्ट्यादिकं करिष्यन्तीत्यर्थः। ननु तैरेवान्नं देयं चेत्तदा तेभ्यः किमस्य यागकरणेन इत्यत आह  तैरिति। तैर्दत्तान् अन्नादीन् एभ्यस्तद्दातृभ्योऽप्रदाय अदत्त्वा यो भुङ्क्ते भोगं करोति स स्तेन एव चोर एवेत्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.12।।किंच इष्टान्पुत्रपश्वादीन्वो युष्मभ्यम्। एभ्यो देवेभ्यस्तद्दत्तानेव व्रीहिपश्वाज्यादीनप्रदायादत्त्वा देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागात्मकं यागं नित्यनैमित्तिकरूपं वैश्वदेवाग्निहोत्रजातेष्ट्यादिरूपमकृत्वेत्यर्थः। अदत्त्वा यो भुङ्क्ते स स्तेन एव।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "In charge of the various necessities of life, the demigods, being satisfied by the performance of yajña [sacrifice], will supply all necessities to you. But he who enjoys such gifts without offering them to the demigods in return is certainly a thief.",
        "ec": " The demigods are authorized supplying agents on behalf of the Supreme Personality of Godhead, Viṣṇu. Therefore, they must be satisfied by the performance of prescribed yajñas. In the Vedas, there are different kinds of yajñas prescribed for different kinds of demigods, but all are ultimately offered to the Supreme Personality of Godhead. For one who cannot understand what the Personality of Godhead is, sacrifice to the demigods is recommended. According to the different material qualities of the persons concerned, different types of yajñas are recommended in the Vedas. Worship of different demigods is also on the same basis – namely, according to different qualities. For example, the meat-eaters are recommended to worship the goddess Kālī, the ghastly form of material nature, and before the goddess the sacrifice of animals is recommended. But for those who are in the mode of goodness, the transcendental worship of Viṣṇu is recommended. But ultimately all yajñas are meant for gradual promotion to the transcendental position. For ordinary men, at least five yajñas, known as pañca-mahā-yajña, are necessary. One should know, however, that all the necessities of life that the human society requires are supplied by the demigod agents of the Lord. No one can manufacture anything. Take, for example, all the eatables of human society. These eatables include grains, fruits, vegetables, milk, sugar, etc., for the persons in the mode of goodness, and also eatables for the nonvegetarians, like meats, none of which can be manufactured by men. Then again, take for example heat, light, water, air, etc., which are also necessities of life – none of them can be manufactured by the human society. Without the Supreme Lord, there can be no profuse sunlight, moonlight, rainfall, breeze, etc., without which no one can live. Obviously, our life is dependent on supplies from the Lord. Even for our manufacturing enterprises, we require so many raw materials like metal, sulphur, mercury, manganese, and so many essentials – all of which are supplied by the agents of the Lord, with the purpose that we should make proper use of them to keep ourselves fit and healthy for the purpose of self-realization, leading to the ultimate goal of life, namely, liberation from the material struggle for existence. This aim of life is attained by performance of yajñas. If we forget the purpose of human life and simply take supplies from the agents of the Lord for sense gratification and become more and more entangled in material existence, which is not the purpose of creation, certainly we become thieves, and therefore we are punished by the laws of material nature. A society of thieves can never be happy, because they have no aim in life. The gross materialist thieves have no ultimate goal of life. They are simply directed to sense gratification; nor do they have knowledge of how to perform yajñas. Lord Caitanya, however, inaugurated the easiest performance of yajña, namely the saṅkīrtana-yajña, which can be performed by anyone in the world who accepts the principles of Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
