{
    "_id": "BG3.11",
    "chapter": 3,
    "verse": 11,
    "slok": "देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः |\nपरस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||३-११||",
    "transliteration": "devānbhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ .\nparasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||3-11||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।3.11।। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "3.11 With this do ye nourish the gods and may those gods nourish you; thus nourishing one another, ye shall attain to the highest good.",
        "ec": "3.11 देवान् the gods? भावयत nourish (ye)? अनेन with this? ते those? देवाः gods? भावयन्तु may nourish? वः you? परस्परम् one another? भावयन्तः nourishing? श्रेयः good? परम् the highest? अवाप्स्यथ shall attain.Commentary Deva literally means the shining one. By this sacrifice you nourish the gods such as Indra. The gods shall nourish you with rain? etc. the highest good is the attainment of the knowledge of the Self which frees one from the round of births and deaths. The highest good may mean the attainment of heaven also. The fruit depends upon the motive of the aspirant."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "3.11 Worship the Powers of Nature thereby, and let them nourish you in return; thus supporting each other, you shall attain your highest welfare."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।3.11।। वैदिक सिद्धार्न्त के अनुसार सर्वशक्तिमान् ईश्वर एक है। उसकी यह सर्वशक्ति प्रकृति में अनेक प्रकार से व्यक्त होकर सदैव कार्य करती है। विभिन्न प्रकार से व्यक्त परिच्छिन्न शक्तियों के विभिन्न नियामक हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन सबके नाम भी वेदों में बताये हैं जैसे अग्नि वायु इन्द्र आदि।इस श्लोक के सर्वमान्य और सर्वत्र उपयुक्त होने के लिये देव शब्द का अर्थ यह समझना चाहिये कि वे किसी भी कर्म क्षेत्र का वह अधिष्ठाता देवता जो कर्म करने वाले कर्मचारी या कर्त्ता को फल प्रदान करता हो। वह देवता और कोई नहीं उस कर्म क्षेत्र की उत्पादन क्षमता ही होगी। जब हम किसी क्षेत्र विशेष में पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करते हैं तब उस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता प्रगट होकर हमें फल प्रदान करती है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है यदि हम समझने का प्रयत्न करें कि अपने देश को भारतमाता कहने का हमारा क्या तात्पर्य है। राष्ट्र की शक्ति को एक रूप देने में हमारा तात्पर्य उस राष्ट्र के सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों की उत्पादन क्षमता से ही होता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि कहीं पर भी निर्माण की जो क्षमता अव्यक्त रूप में रहती है उसे व्यक्त करने के लिये आवश्यक है केवल मनुष्य का परिश्रम। इस अव्यक्त क्षमता को कहते हैं देव। इन देवों को यज्ञ कर्म से प्रसन्न कर उनका आह्वान किये जाने पर वे प्रगट होकर यज्ञकर्ता को फल प्रदान कर प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर उन्नति कर मनुष्य परम श्रेय को प्राप्त करेगा  यह ब्रह्माजी का दिव्य उद्देश्य इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया।इस सेवाधर्म  का पालन प्रकृति में सर्वत्र होता दिखाई देता है। एक मात्र मनुष्य ही है जिसे स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतन्त्रता दी गई है इस सार्वभौमिक सेवाधर्मयज्ञ भावना का पालन करने पर वह शुभफल प्राप्त करता है परन्तु जिस सीमा तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुआ वह कर्म करेगा उतना ही वह दुख पायेगा क्योंकि प्रकृति के सामंजस्य में वह विरोध उत्पन्न करता है।और"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "3.11. 'With this you must gratify the devas and let the devas gratify you; [thus] gratifying one another, you shall attain the highest good.'"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "3.11 By this, please the gods, and the gods will support you. Thus nourishing one another, may you obtain the highest good."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "3.11 'You nourish the gods with this. Let those gods nourish you. Nourishing one another, you shall attain the supreme Good.'"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।3.10  3.11।।अत्रार्थवादमाह  सहयज्ञा इति।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।3.11।।कथं पुनरभीष्टफलविशेषहेतुत्वं यज्ञस्य विज्ञायते नहि देवताप्रसादादृते स्वर्गादिरभ्युदयो लभ्यते नापि सम्यग्दर्शनमन्तरेण निःश्रेयसं सेद्धुं पारयतीति शङ्कते  कथमिति। तत्र श्लोकेनोत्तरमाह  देवानिति। मुमुक्षुत्वबुभुक्षुत्वविभागेन श्रेयसि विकल्पः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।3.10 -- 3.11।। प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके (उनसे, प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।",
        "hc": "।।3.11।। व्याख्या--'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः' ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं; अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है, उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते, उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वे 'प्रजापति' कहलाते हैं।\n\nसृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्य-कर्मोंकी योग्यता और विवेक-सहित मनुष्योंकी रचना की है (टिप्पणी प0 128)। अनुकूल और प्रतिकूल-परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्-असत् विचार करनेमें पशु, पक्षी वृक्ष, आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है; किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेक-शक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोक-हितार्थ कर्म हो सकते हैं।देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य, तथा अन्य पशु, पक्षी, वृक्ष आदि सभी प्राणी प्रजा हैं। इनमें भी योग्यता, अधिकार और साधनकी विशेषताके कारण मनुष्यपर अन्य सब प्राणियोंके पालनकी जिम्मेवारी है। अतः यहाँ 'प्रजाः' पद विशेषरूपसे मनुष्योंके लिये ही प्रयुक्त हुआ है।कर्मयोग अनादिकालसे चला आ रहा है। चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'पुरातनः' पदसे भी भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग बहुत कालसे प्रायः लुप्त हो गया था, जिसको मैंने तुम्हें फिरसे कहा है। उसी बातको यहाँ भी 'पुरा' पदसे वे दूसरी रीतिसे कहते हैं कि 'मैंने ही नहीं प्रत्युत ब्रह्माजीने भी सर्गके आदिकालमें कर्तव्यसहित प्रजाको रचकर उनको उसी कर्मयोगका आचरण करनेकी आज्ञा दी थी। तात्पर्य यह है कि कर्मयोग(निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करने) की परम्परा अनादिकालसे ही चली आ रही है। यह कोई नयी बात नहीं है।'चौथे अध्यायमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) परमात्मप्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं, वे सभी 'यज्ञ' के नामसे कहे गये हैं; जैसे--द्रव्ययज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ, प्राणायाम आदि। प्रायः 'यज्ञ' शब्दका अर्थ हवनसे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियाके लिये ही प्रसिद्ध है; परन्तु गीतामें 'यज्ञ' शब्द शास्त्रविधिसे की जानेवाली सम्पूर्ण विहित क्रियाओंका वाचक भी है। अपने वर्ण, आश्रम, धर्म, जाति, स्वभाव, देश, काल आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्म 'यज्ञ' के अन्तर्गत आते हैं। दूसरेके हितकी भावनासे किये जानेवालेसब कर्म भी 'यज्ञ' ही हैं। ऐसे यज्ञ-(कर्तव्य-) का दायित्व मनुष्यपर पर ही है।'\n\n'अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्' (टिप्पणी प0 129.1)--ब्रह्माजी मनुष्योंसे कहते हैं कि तुमलोग अपने-अपने कर्तव्य-पालनके द्वारा सबकी वृद्धि करो, उन्नति करो! ऐसा करनेसे तुमलोगोंको कर्तव्य-कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री प्राप्त होती रहे, उसकी कभी कमी न रहे।अर्जुनकी कर्म न करनेमें जो रुचि थी, उसे दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंसे भी तुम्हें कर्तव्य-कर्म करनेकी शिक्षा लेनी चाहिये। दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करनेसे ही तुम्हारी लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो सकती है।\n\nनिष्कामभावसे केवल कर्तव्य-पालनके विचारसे कर्म करनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है और सकामभावसे कर्म करनेपर मनुष्य बन्धनमें पड़ जाता है। प्रस्तुत प्रकरणमें निष्कामभावसे किये जानेवाले कर्तव्य-कर्मका विवेचन चल रहा है। अतः यहाँ 'इष्टकाम' पदका अर्थ इच्छित भोग-सामग्री' (जो सकामभावका सूचक है) लेना उचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ इस पदका अर्थ है--यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री (टिप्पणी प0 129.2)।कर्मयोगी दूसरोंकी सेवा अथवा हित करनेके लिये सदा ही तत्पर रहता है। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीके विधानके अनुसार दूसरोंकी सेवा करनेकी सामग्री, सामर्थ्य और शरीर-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुओंकी उसे कभी कमी नहीं रहती। उसको ये उपयोगी वस्तुएँ सुगमतापूर्वक मिलती रहती हैं। ब्रह्माजीके विधानके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी सामग्री जिस-जिसको, जो-जो भी मिली हुई है, वह कर्तव्य-पालन करनेके लिये उस-उसको पूरी-की-पूरी प्राप्त है। कर्तव्य-पालनकी सामग्री कभी किसीके पास अधूरी नहीं होती। ब्रह्माजीके विधानमें कभी फरक नहीं पड़ सकता; क्योंकि जब उन्होंने कर्तव्य-कर्म करनेका विधान निश्चित किया है, तब जितनेसे कर्तव्यका पालन हो सके उतनी सामग्री देना भी उन्हींपर निर्भर है।वास्तवमें मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये है ही नहीं--'एहि तन कर फल बिषय न भाई' (मानस 7। 44। 1)। इसीलिये 'सांसारिक सुखोंको भोगो'--ऐसी आज्ञा या विधान किसी भी सत्-शास्र नहीं है। समाज भी स्वच्छन्द भोग भोगनेकी आज्ञा नहीं देता। इसके विपरीत दूसरोंको सुख पहुँचानेकी आज्ञा या विधान शास्त्र और समाज दोनों ही देते हैं। जैसे, पिताके लिये यह विधान तो मिलता है कि वह पुत्रका पालन-पोषण करे, पर यह विधान कहीं भी नहीं मिलता कि पुत्र से पिता सेवा ले ही। इसी प्रकार पुत्र, पत्नी आदि अन्य सम्बन्धोंके लिये भी समझना चाहिये।कर्मयोगी सदा देनेका ही भाव रखता है, लेनेका नहीं; क्योंकि लेनेका भाव ही बाँधनेवाला है। लेनेका भाव रखनेसे कल्याणप्राप्तिमें बाधा लगनेके साथ ही सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें भी बाधा उपस्थित हो जाती है। प्रायः सभीका अनुभव है कि संसारमें लेनेका भाव रखनेवालेको कोई देना नहीं चाहता। इसलिये ब्रह्माजी कहते हैं कि बिना कुछ चाहे, निःस्वार्थभावसे कर्तव्य-कर्म करनेसे ही मनुष्य अपनी उन्नति (कल्याण) कर सकता है।\n\n'देवान् भावयतानेन'--यहाँ 'देव' शब्द उपलक्षक है; अतः इस पदके अन्तर्गत मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर आदि समस्त प्राणियोंको समझना चाहिये। कारण कि कर्मयोगीका उद्देश्य अपने कर्तव्य-कर्मोंसे प्राणिमात्रको सुख पहँचाना रहता है। इसलिये यहाँ ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उन्नतिके लिये मनुष्योंको अपने कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञके पालनका आदेश देते हैं। अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेसे मनुष्यका स्वतः कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। कर्तव्य-कर्मका पालन करनेके उपदेशके पूर्ण अधिकारी मनुष्य ही हैं। मनुष्योंको ही कर्म करनेकी स्वतन्त्रता मिली हुई है; अतः उन्हें इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करना चाहिये।'ते देवा भावयन्तु वः' जैसे वृक्ष, लता आदिमें स्वाभाविक ही फूल-फल लगते हैं; परन्तु यदि उन्हें खाद और पानी दिया जाय तो उनमें फूल-फल विशेषतासे लगते हैं। ऐसे ही यजन-पूजनसे देवताओंकी पुष्टि होती है, जिससे देवताओंके काम विशेष न्यायप्रद होते हैं। परन्तु जब मनुष्य अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा देवाताओंका यजन-पूजन नहीं करते, तब देवताओंको पुष्टि नहीं मिलती, जिससे उनमें अपने कर्तव्यका पालन करनेमें कमी आ जाती है। उनके कर्तव्य-पालनमें कमी आनेसे ही संसारमें विप्लव अर्थात् अनावृष्टि-अतिवृष्टि आदि होते हैं।'परस्परं भावयन्तः' इन पदोंका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे तो हम उसकी सेवा करें, प्रत्युत यह समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे या न करे, हमें तो अपने कर्तव्यके द्वारा उसकी सेवा करनी ही है। दूसरा क्या करता है, क्या नहीं करता; हमें सुख देता या दुःख, इन बातोंसे हमें कोई मतलब नहीं रखना चाहिये; क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। दूसरोंसे कर्तव्यका पालन करवाना अपने अधिकारकी बात भी नहीं है। हमें सबका हित करनेके लिये केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और उसके द्वारा सबको सुख पहुँचाना है। सेवा करनेमें अपनी समझ सामर्थ्य, समय और सामग्रीको अपने लिये थोड़ी-सी भी बचाकर नहीं रखनी है। तभी जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होगा।हमारे जितने भी सांसारिक सम्बन्धी--माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई आदि हैं, उन सबकी हमें सेवा करनी है। अपना सुख लेनेके लिये ये सम्बन्ध नहीं हैं। हमारा जिनसे जैसा सम्बन्ध है, उसीके अनुसार उनकी सेवा करना, मर्यादाके अनुसार उन्हें सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। उनसे कोई आशा रखना और उनपर अपना अधिकार मानना बहुत बड़ी भूल है। हम उनके ऋणी हैं और ऋण उतारनेके लिये उनके यहाँ हमारा जन्म हुआ है। अतः निःस्वार्थभावसे उन सम्बन्धियोंकी सेवा करके हम अपना ऋण चुका दें--यह हमारा सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है। सेवा तो हमें सभीकी करनी है; परन्तु जिनकी हमारेपर जिम्मेवारी है, उन सम्बन्धियोंकी सेवा सबसे पहले करनी चाहिये।शरीर, इन्द्रयाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदि अपने नहीं हैं और अपने लिये भी नहीं हैं--यह सिद्धान्त है। अतः अपने-अपने कर्तव्यका पालन करनेसे स्वतः एक-दूसरेकी उन्नति होती है।'कर्तव्य और अधिकारसम्बन्धी मार्मिक बात'कर्मयोग तभी होता है, जब मनुष्य अपने कर्तव्यके पालनपूर्वक दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है। जैसे, माता-पिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है और माता-पिताका अधिकार है। जो दूसरेका अधिकार होता है, वही हमारा कर्तव्य होता है। अतः प्रत्येक मनुष्यको अपने कर्तव्य-पालनके द्वारा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनी है तथा दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है। दूसरेका कर्तव्य देखनेसे मनुष्य स्वयं कर्तव्यच्युत हो जाता है; क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है। तात्पर्य है कि दूसरेका हित करना है--यह हमारा कर्तव्य है और दूसरेका अधिकार है। यद्यपि अधिकार कर्तव्यके ही अधीन है तथापि मनुष्यको अपना अधिकार देखना ही नहीं हैं, प्रत्युत अपने अधिकारका त्याग करना है। केवल दूसरेके अधिकारकी रक्षाके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना है। दूसरेका कर्तव्य देखना तथा अपना अधिकार जमाना लोक और परलोकमें महान् पतन करनेवाला है। वर्तमान समयमें घरोंमें, समाजमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते! इसलिये ब्रह्माजी देवताओं और मनुष्योंको उपदेश देते हैं कि एक-दूसरेका हित करना तुमलोगोंका कर्तव्य है।'श्रेयः परमवाप्स्यथ' प्रायः ऐसी धारणा बनी हुई है कि यहाँ परम कल्याणकी प्राप्तिका कथन अतिशयोक्ति है, पर वास्तवमें ऐसा नहीं है। अगर इसमें किसीको सन्देह हो तो वह ऐसा करके खुद देख सकता है। जैसे धरोहर रखनेवालेकी धरोहर उसे वापस कर देनेसे धरोहर रखनेवालेसे तथा उस धरोहरसे हमारा किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही संसारकी वस्तु संसारकी सेवामें लगा देनेसे संसार और संसारकी वस्तुसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता। संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद होते ही चिन्मयताका अनुभव हो जाता है। अतः प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंमें अतिशयोक्तिकी कल्पना करना अनुचित है।\n\nयह सिद्धान्त है कि जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है, तबतक उसके कर्मकी समाप्ति नहीं होती और वह कर्मोंसे बँधता ही जाता है। कृतकृत्य वही होता है, जो अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। अपने लिये कुछ भी नहीं करनेसे पापका आचरण भी नहीं होता; क्योंकि पापका आचरण कामनाके कारण ही होता है (3। 37)। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकको चाहिये कि वह शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार फलकी इच्छा और आसक्तिका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करनेमें तत्पर हो जाय, फिर कल्याण तो स्वतःसिद्ध है।अपनी कामनाका त्याग करनेसे संसारमात्रका हित होता है। जो अपनी कामना-पूर्तिके लिये आसक्तिपूर्वक भोग भोगता है, वह स्वयं तो अपनी हिंसा (पतन) करता ही है, साथ ही जिनके पास भोग-सामग्रीका अभाव है, उनकी भी हिंसा करता है अर्थात् दुःख देता है। कारण कि भोग-सामग्रीवाले मनुष्यको देखकर अभावग्रस्त मनुष्यको उस भोगसामग्रीके अभावका दुःख होना स्वाभाविक है। इस प्रकार स्वयं सुख भोगनेवाला व्यक्ति हिंसासे कभी बच नहीं सकता। ठीक इसके विपरीत पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले व्यक्तिको देखकर दूसरोंको स्वतः शान्ति मिलती है, क्योंकि पारमार्थिक सम्पत्तिपर सबका समान अधिकार है। निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य कामना-आसक्तिका त्याग करके अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करता रहे तो ब्रह्माजीके कथनानुसार वह परम कल्याणको अवश्य ही प्राप्त हो जायग। इसमें कोई सन्देह नहीं है।यहाँ परम कल्याणकी प्राप्ति मुख्यतासे मनुष्योंके लिये ही बतायी है, देवताओंके लिये नहीं। कारण कि देवयोनि अपना कल्याण करनेके लिये नहीं बनायी गयी है। मनुष्य जो कर्म करता है, उन कर्मोंके अनुसार फल देने, कर्म करनेकी सामग्री देने तथा अपने-अपने शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये देवता बनाये गये हैं। वे निष्कामभावसे कर्म करनेकी सामग्री देते हों, ऐसी बात नहीं है। परन्तु उन देवताओंमें भी अगर किसीमें अपने कल्याणकी इच्छा हो जाय, तो उसका कल्याण होनेमें मना नहीं है अर्थात् अगर कोई अपना कल्याण करना चाहे, तो कर सकता है। जब पापी-से-पापी मनुष्यके लिये भी उद्धार करनेकी मनाही नहीं है, तो फिर देवताओंके लिये (जो कि पुण्ययोनि है) अपना उद्धार करनेकी मनाही कैसे हो सकती है? ऐसा होनेपर भी देवताओंका उद्देश्य भोग भोगनेका ही रहता है, इसलिये उनमें प्रायः अपने कल्याणकी इच्छा नहीं होती।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।3.11।।अनेन देवताराधनभूतेन देवान् मच्छरीरभूतान् मदात्मकान् आराधयतअहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च (गीता 9।24) इति वक्ष्यते। यज्ञेन आराधिताः ते देवा मदात्मकाः स्वाराधनापेक्षितान्नपानाद्यैः युष्मान् पुष्णन्तु। एवं परस्परं भावयन्तः परं श्रेयो मोक्षाख्यम् अवाप्स्यथ।",
        "et": "3.11 'By this,' i.e., by this sacrifice, you propitiate the gods who form My body and have Me as their Self. For Sri Krsna will say later on:  'For I am the only enjoyer and the only Lord of Sacrifices' (9.24). Worshipped by sacrifices, may these gods, who have Me as their Self, nourish you with food, drink etc., which are reired also for their worship. Thus, supporting each other, may you attain the highest good called Moksa (release)."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।3.11।।य(त)त्र येषां मोक्षप्राधान्यं तैरेव विषयाः सेव्या इत्युच्यते  देवानिति।  देवाः क्रीडाशीलाः (K क्रीडनशीलाः) इन्द्रियवृत्तयः करणेश्वर्यो देवता रहस्यशास्त्रप्रसिद्धाः ताः अनेन कर्मणा तर्पयत ययासंभवं विषयान् भक्षयतेत्यर्थः।  तृप्ताश्च सत्यस्ता वो (S सत्यो वो) युष्मान् आत्मन एव स्वरूपमात्रोचितान् अपवर्गान् (S  चितापवर्गान्) भावयन्तु स्वात्मस्थितियोगत्वात्।  एवमनवरतं व्युत्थानसमाधिसमयपरम्परायाम् (S  रतव्युत्थान  ) इन्द्रियतर्पणदात्मासाद्भावलक्षणे (  सद्भाव  ) परस्परभावने सति शीघ्रमेव परमं श्रेयः परस्परभेदविगलनलक्षणं ब्रह्म प्राप्स्यथ।",
        "et": "3.11 Devan etc.  Devas : Those that have a tendency of playing i.e.,  the deities who preside over the organs and who dwell in  the senses (or who are nothing but the sensitive faculty of the senses)  and who are well-known in the Rahasyasastra.  'You must gratify these deities by this action i.e.,  feed them compability with sense-objects.  Then, being satisfied, let these deities gratify (cause) you to have emancipation suitable exclusively to the intrinsic nature of the Self.  For, [then alone you attain] a capacity to remain in your own Self. Thus when the mutual gratification - you gratifying the [deities of the] senses, and they letting [you] be absorbed in the Self - in the uninterruped series of periods of being extrovert and of meditation, you shall soon undoubtedly attain the highest good i.e., the Supreme that is marked with the total disappearance of  [all] mutual differences.'\t\t\t\t\t\t\t\t\t\t\t\n This path of the said nature  is to be followed not merely for emancipation, but also for gaining all super - human powers (or success siddhi).  This [the Lord] says -"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।3.11।।कैसे  तुमलोग इस यज्ञद्वारा इन्द्रादि देवोंको बढ़ाओ अर्थात् उनकी उन्नति करो। वे देव वृष्टि आदिद्वारा तुमलोगोंको बढ़ावें अर्थात् उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरेको उन्नत करते हुए ( तुमलोग ) ज्ञानप्राप्तिद्वारा मोक्षरूप परमश्रेयको प्राप्त करोगे। अथवा स्वर्गरूप परमश्रेयको ही प्राप्त करोगे।",
        "sc": "।।3.11।। देवान् इन्द्रादीन् भावयत वर्धयत अनेन यज्ञेन। ते देवा भावयन्तु आप्याययन्तु वृष्ट्यादिना वः युष्मान्। एवं परस्परम् अन्योन्यं भावयन्तः श्रेयः परं मोक्षलक्षणं ज्ञानप्राप्तिक्रमेण अवाप्स्यथ। स्वर्गं वा परं श्रेयः अवाप्स्यथ।।किञ्च",
        "et": "3.11 'Bhavayata, you nourish; devan, the gods, Indra and others; anena, with this sarifice. Let te devah, those gods; bhavayantu, nourish; vah, you-make you contented with rainfall etc. Thus bhavayantah, nourishing; parasparam, one another; avapsyatha, you shall attain; the param, supreme; sreyah, Good, called Liberation, through the attainment of Knowledge;' or, 'you shall attain heaven-which is meant by param 'sreyah.' [The param sreyah (supreme Good) will either mean liberation or heaven in accordance with aspirant's hankering for Liberation or enjoyment.]\nMoreover,"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।3.10  3.11।।सहयज्ञाः इत्यादेर्न प्रकृते सङ्गतिर्दृश्यते अत आह  अत्रेति। वर्णाश्रमोचितस्य कर्मणः सर्वथा कर्तव्यत्वे स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।3.10  3.11।।किञ्च श्रुतं च सर्गप्रकरणे यज्ञोपलक्षणकर्मसहितप्रजोत्पादनं ब्रह्मणेति कर्मणोऽवश्यकर्त्तव्यतामाह  सहेति चतुर्भिः। यज्ञाधिकृताः ब्राह्मणाद्याः प्रजाः सहयज्ञाः सृष्ट्वोवाच एष यज्ञो व इष्टकामधुनिति। ज्ञानमोक्षादिहेतुत्वं प्रकारान्तरेण वरप्रदानं तदाह  अस्त्विति। न चेयं काम्यकर्मप्रशंसा कामधुक्त्वेनेष्टमात्रसाधकत्वाद्यज्ञादेर्विहितस्य नियतकर्मणः अन्यथाऽक्रामितोऽपि मोक्षः स्यात् तेन सर्वपुरुषार्थहेतुत्वमुक्तं भवति तदेवाह  देवानिति। अनेन यज्ञेन विष्ण्वादीन् देवान् भावयत्। तदा परं श्रेय आत्यन्तिकमवाप्स्यथेति भावः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।3.11।।कथमिष्टकामदोग्धृत्वं यज्ञस्येति तदाह  अनेन यज्ञेन यूयं यजमाना देवानिन्द्रादीन्भावयत हविर्भागैः संवर्धयत। तर्पयतेत्यर्थः। ते देवा युष्माभिर्भाविताः सन्तो वो युष्मान्भावयन्तु वृष्ट्यादिनान्नोत्पत्तिद्वारेण संवर्धयन्तु। एवमन्योन्यं संवर्धयन्तो देवाश्च यूयं च परं श्रेयोऽभिमतमर्थं प्राप्स्यथ। देवास्तृप्तिं प्राप्स्यन्ति यूयं च स्वर्गाख्यं परं श्रेयः प्राप्स्यथेत्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।3.11।।कथमिष्टकामदोग्धा यज्ञो भवेदित्यत्राह  देवानिति। अनेन यज्ञेन युयं देवान्भावयत हविर्भागैः संवर्धयत। ते च देवा वो यष्मान्संवर्धयन्तु वृष्ट्यादिनान्नोत्पत्तद्वारेण। एवमन्योन्यं संवर्धयन्तो देवाश्च यूयं च परस्परं श्रेयोऽभीष्टमर्थं प्राप्स्यथ।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।3.11।। कथमित्याकाङ्कक्षायामाह  अनेनेति। अनेन यज्ञेन देवानिन्द्रादीन् वर्धयत्। ते वृत्त्यादिद्वाराऽन्नदानेन युष्मान् वर्धयन्तु। एवं परस्परं वर्धयन्तोऽभीष्टं परं परलोके स्वर्गादिकमवाप्स्यथ।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "3.11 इति पूर्वापरानुगुण्याच्चात्र मोक्षार्थतोक्तिर्युक्ता।प्रपूरयितेतिदुह प्रपूरणे इति हि धातुः। ननु प्रपूरणं हि पूरणाभावेऽनुशिष्टं प्रस्थानप्रस्मरणादिष्विवात्रापि प्रशब्दस्याभावविषयत्वात् अत एव हिगां दोग्धि इत्यादिप्रयोगः सत्यम् तथापिगां दोग्धि इत्यत्रापि गोरेव पयोरेचनं न तु पयसः स्वरूपवैकल्यम् तद्वदत्रापि गोस्थानीयाद्यज्ञतः क्षीरस्थानीयाः कामा लभ्यन्ते तैस्तस्य रेचनं स्यात् फलदातुः सकाशात् फलमादाय युष्मभ्यं ददात्वित्यर्थः तेन यज्ञाराधितोऽहं युष्मभ्यं कामान् ददामीत्युक्तं भवति।।।3.11।।यज्ञेनात्मनो वृद्धिः कथम् क्षणिकक्रियारूपश्च यज्ञः कथं कालान्तरभाविफलसाधनम् नान्यः पन्थाः श्वे.उ.3।86।15 इत्यादिना ज्ञानस्यैव मोक्षप्रदत्वे सिद्धे कथं स्वर्गादिसाधनतया निर्दिष्टो यज्ञो मोक्षसाधनम् स्मरन्ति चकर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते। तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः सं.उ.98म.भा.12।241।7 इति तथानैव धर्मी न चाधर्मी ज्ञानं सन्न्यासलक्षणम् ना.प.उ.3 इति च कथं च मोक्षबहिर्भूतानां विचित्रसांसारिककामानां तदनुगुणत्वं इति शङ्कास्तबकमभिप्रेत्याह  कथमिति। तत्रदेवान् भावयत इति प्रथमस्योत्तरम् देवताराधनं ह्याराधकस्यातिशय एव अतः स एवात्मनो वृद्धिःयज देवपूजायाम् इति यज्ञपदप्रकृतिं धातुं स्मारयति  देवताराधनभूतेनेति। यज्ञस्य मोक्षहेतुत्वानुपपत्तिपरिहारायमदात्मकानिति। परमात्मसमाराधनतया कृतं कर्मैव मोक्षसाधनज्ञानाङ्गतया स्थित्वा मोक्षं साधयतीति प्रागेवोक्तम्।मदात्मकान् इत्यस्यान्तर्यामिब्राह्मणादिसिद्धत्वसूचनायमच्छरीरभूतानित्युक्तम्। यज्ञेन देवानां भावनं हि सन्तोषवत्तया भावनमित्यभिप्रायेणोक्तंआराधयतेति। तदभिप्रायेण च ब्राह्मणं तस्मादितः प्रदानं देवा उपजीवन्ति यजुः3।2।9 इति।मदात्मकान् इत्यस्यात्रानुक्तस्य कथमुपादानं इत्यत्राह  अहं हीति। क्षणिकस्य फलप्रदानानुपपत्तिपरिहाररूपं द्वितीयं पादं व्याख्याति  यज्ञेनेत्यादिनापुष्णन्त्वित्यन्तेन। प्रस्तुताकारपरामर्शितच्छब्दार्थः  यज्ञेनाराधिता इति। देवानां फलप्रदानशक्तिसिद्ध्यर्थं पुनःमदात्मका इत्युक्तम्। एवं च क्षणिकस्यापि देवताप्रीतिरूपापूर्वद्वारा फलसाधनत्वम् महाप्रलये त्विन्द्रादिलयेऽपि परदेवताप्रीतिद्वारा पुनः फलप्रदत्वमुपपन्नमित्युक्तं भवति। चतुर्थशङ्कापरिहारमभिप्रेत्याह  स्वाराधनेति। देवैराराधकानां भावनं नामापेक्षितैः पोषणमित्यभिप्रायेणोक्तंपुष्णन्त्विति। उत्तरार्धमुक्तस्यैवार्थस्य मोक्षोपयोगित्वज्ञापकमित्यभिप्रायेणाह  एवमिति। स्वर्गादिरूपश्रेयोव्यावृत्त्यर्थं परत्वविशेषणमित्यभिप्रायेणोक्तंमोक्षाख्यमिति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।3.11।।ननु कर्मणा जगतः कथमभीष्टम् इत्याशङ्क्याह  देवानिति। अनेन यज्ञेन देवान् तत्तत्कर्माधिष्ठातृ़न् भावयत संवर्द्धयत। ते देवा वो युष्मान् भावयन्तु संवर्द्धयन्तु। अत्रायमर्थः  हविर्भागैस्तेषु यूयं देवत्वं वर्द्धयन्तु ते च भवत्सु तत्कर्मसाधनानि वर्द्धयन्तु। एवं परस्परं भावयन्तः संवर्धयन्तो यूयं देवाश्च श्रेयः स्वाभीष्टमवाप्स्यथ।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।3.11।।इष्टार्थपूरकत्वमेवाह  देवानिति। भावयत तर्पयत। अनेन देवतापूजात्मकेन यज्ञेन ते वो युष्मान्भावयन्तु वृष्ट्यादिदानेन। परस्परं भावयन्तो देवाश्च यूयं च श्रेयः परं प्राप्स्यथ।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "The demigods, being pleased by sacrifices, will also please you, and thus, by cooperation between men and demigods, prosperity will reign for all.",
        "ec": " The demigods are empowered administrators of material affairs. The supply of air, light, water and all other benedictions for maintaining the body and soul of every living entity is entrusted to the demigods, who are innumerable assistants in different parts of the body of the Supreme Personality of Godhead. Their pleasures and displeasures are dependent on the performance of yajñas by the human being. Some of the yajñas are meant to satisfy particular demigods; but even in so doing, Lord Viṣṇu is worshiped in all yajñas as the chief beneficiary. It is stated also in the Bhagavad-gītā that Kṛṣṇa Himself is the beneficiary of all kinds of yajñas: bhoktāraṁ yajña-tapasām. Therefore, ultimate satisfaction of the yajña-pati is the chief purpose of all yajñas. When these yajñas are perfectly performed, naturally the demigods in charge of the different departments of supply are pleased, and there is no scarcity in the supply of natural products. Performance of yajñas has many side benefits, ultimately leading to liberation from material bondage. By performance of yajñas, all activities become purified, as it is stated in the Vedas: āhāra-śuddhau sattva-śuddhiḥ sattva-śuddhau dhruvā smṛtiḥ smṛti-lambhe sarva-granthīnāṁ vipramokṣaḥ. By performance of yajña one’s eatables become sanctified, and by eating sanctified foodstuffs one’s very existence becomes purified; by the purification of existence finer tissues in the memory become sanctified, and when memory is sanctified one can think of the path of liberation, and all these combined together lead to Kṛṣṇa consciousness, the great necessity of present-day society."
    }
}
