{
    "_id": "BG2.50",
    "chapter": 2,
    "verse": 50,
    "slok": "बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते |\nतस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||२-५०||",
    "transliteration": "buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte .\ntasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||2-50||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.50 Endowed with wisdom (evenness of mind), one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote thyself to Yoga; Yoga is skill in action.",
        "ec": "2.50 बुद्धियुक्तः endowed with wisdom? जहाति casts off? इह in this life? उभे both? सुकृतदुष्कृते good and evil deeds? तस्मात् therefore? योगाय to Yoga? युज्यस्व devote thyself? योगः Yoga? कर्मसु in actions? कौशलम् skill.Commentary Work performed with motive towards fruits only can bind a man. It will bring the fruits and the performer of the action will have to take birth again in this mortal world to enjoy them. If work is performed with evennes of mind (the Yoga of wisdom? i.e.? united to pure Buddhi? intelligence or reason) with the mind resting in the Lord? it will not bind him it will not bring any fruit it is no work at all. Actions which are of a binding nature lose that nature when performed with eanimity of mind? or poised reason. The Yogi of poised reason attributes all actions to the Divine Actor within (Isvara or God)."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.50 When a man attains to Pure Reason, he renounces in this world the results of good and evil alike. Cling thou to Right Action. Spirituality is the real art of living."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.50।। भावनाओं की दुर्बलताओं से ऊपर उठकर जो पुरुष समत्व बुद्धियुक्त हो जाता है वह पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँचीऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा। यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है।इस सम्पूर्ण प्रकरण में गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय स्थूल देह और मन के स्तर पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक पुरुषत्व को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल बौद्धिक क्षमताओं के कारण ही मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जब तक मनुष्य प्रकृति के इस विशिष्ट उपहार का सम्यक् प्रकार से उपयोग नहीं करता तब तक वह अपने मनुष्यत्व के अधिकार से वंचित ही रह जाता है।अर्जुन से मानसिक उन्माद त्यागकर वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनकर रहने के लिये भगवान् कहते हैं। उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है। इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है।किसी भी विषय के शास्त्रीय ग्रन्थ में यदि भिन्नभिन्न अध्यायों में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें दी गई हों तो समझने में कठिनाई और भ्रांति होगी। फिर धर्म के इस शास्त्रीय ग्रन्थ में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें कैसे बताई हुई हैं  उपर्युक्त परिभाषा को ठीक से समझने पर इस समस्या का स्वयं समाधान हो जायेगा। योग की पूर्वोक्त परिभाषा यहाँ भी संग्रहीत है अन्यथा मन के समभाव का अर्थ अकर्मण्यता एवं शिथिलता उत्पन्न करने वाली मन की समता को ही कोई समझ सकता है। इस श्लोक में ऐसी त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करते हुये कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कम्र्ायोग है।इस श्लोक के स्पष्टीकरण से श्रीकृष्ण का उद्देश्य ज्ञात होता है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकर मनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।योग शब्द का इस अथ मेंर् प्रयोग कर व्यास जी हमारे मन में उसके प्रति व्याप्त भ्राँति को दूर कर देते हैं।समत्व भाव एवं कर्म में कुशलता की क्या आवश्यकता है  उत्तर में कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.50. Whosoever is endowed with determining faculty-he casts off both of these viz., the good action and the bad action.  Therefore strive for Yoga; Yoga is proficiency is action."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.50 A man with evenness of mind discards here and now good and evil. Therefore endeavour for Yoga. Yoga is skill in action."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.50 Possessed of wisdom, one rejects here both virtue and vice. Therefore devote yourself to (Karma-) yoga. Yoga is skilfulness in action."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।2.50।।ज्ञानफलमाह  बुद्धियुक्त इति। सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति न बृहत्फलमुपासनादिनिमित्तम्। न हास्य कर्म क्षीयते बृ.उ.1।4।15 अविदित्वाऽस्िमँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति बृ.उ.3।8।10 इत्यादिश्रुतिभ्यः। अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र। उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया। नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित्प्रयोजनम्। न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः।इष्टाश्च केचिद्विषयाः स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति छां.उ.8।2।1प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां छां.उ.8।14।1 स्त्रीभिर्वा यानैर्वा छां.उ.8।12।3 अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते बृ.उ.1।4।15 कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् तै.उ.3।10।5 स एकधा भवति छां.उ.7।26।2 इत्यादिश्रुतिभ्यः। बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात्कर्मसुखेन विरोधः अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् श्रुतेश्च।न च शरीरपातात् पूर्वमेव। स तत्र पर्येति छां.उ.8।12।3 एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य तै.उ.3।10।5 इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात्। न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः।मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं दुःखतरं भवेत् इत्यादिनिन्दनान्मोक्षधर्मे। परिहारे पृथग्भोगाभिधानाच्च शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्चजगद्व्यापारवर्जं ब्र.सू.4।4।17 इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्चइदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः 14।3 इति च। उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य।न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः। आसं दुःखी नासमिति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य। अनेन रूपेणेति च भेदाभावात्। न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः। उपाधिनाशे मानं वा।मग्नस्य हि परेऽज्ञाने इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च।यावदात्मभावित्वात्৷৷. ब्र.सू.2।3।30 इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽनन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम्।दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन। प्रतिशाखं च स एकधा छां.उ.7।26।2 इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते। विरोधे तु युक्तिमतामेव बलंवत्त्वम्। युक्तयश्चात्रोक्ताःमग्नस्य हि इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववदेकीभावः। उक्तं च  यथोदकं शुद्धे शुद्धं कठो.4।15 यथा नद्यः मुं.उ.3।2।8 इत्यादौ। तत्राप्यन्योन्यात्मत्वे वृद्ध्यसम्भवः। अस्ति चेषत्समुद्रेऽपि द्वारि। महत्त्वादन्यत्रादृष्टिः।ता एवापो ददौ तस्य च ऋषिः शंसितव्रतः इति महाकौर्मे। समर्थानां भेदज्ञानाच्च।नैव तत्प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः। यत्ते पदं ते कैवल्यम् इति निषेधाच्च नारदीये। सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षवर्मेषु। बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात्।अतो यत्र नान्यत्पश्यति छां.7।24।1 इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि। अन्यथा कथमैश्वर्यादि स्यात्। न च तन्मायामयमित्युक्तम्। अन्यथा कथं तत्रैव स एकधा इत्यादि ब्रूयात्। न चन ह वै सशरीरस्य छां.उ.8।12।1 इत्यादिविरोधः।  वैलक्षण्यात्तच्छरीराणाम्। अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानि ईश्वरशक्त्या। तथा चोक्तम्शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव हि इति नारायणरामकल्पे। वदन्ति च लौकिकाद्वैलक्षण्येऽभावशब्दंअप्रहर्षमनानन्दंसुखदुःखबाह्यः इत्यादिषु। निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि। तथा हि श्रुतिः अशारीति्ँहितच्छरीरमभवत्। नहि तानि शीर्णानि भवन्तिसर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथयन्ति च 14।2 इति वचनात्। साम्यात्प्रयोगः। प्रयोगाच्चअनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।म.भा.12।337।29देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् भाग.7।1।34 इत्यादिदृष्टदेहेष्वेव। न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिःबहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति। योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात्। ये त्वत्रैव भगवन्तं विशन्ति तेऽपि पश्चात्तत्रैव यान्ति। योग्यत्वं चात्र विवक्षितम्। युधिष्ठिरप्रश्ने इतरनिन्दनाच्च। सायुज्यं य ग्रहवत्। तदुक्तेश्चभुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः। तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान्भोगांस्तु भुञ्जते इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः सोऽस्त्येव सर्वात्मना।अदुःखम्सर्वदुःखविवर्जिताः अशोकमहिम्। बृ.उ.5।10यत्र गत्वा न शोचन्ति इत्यादिभ्यः विशेषवचनाभावाच्च।येषां त्वीषद्दृश्यते न सायुज्यं प्राप्ताः। सामीप्याद्येव तेषाम्। अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात्। तद्भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति। तच्चोक्तम्सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकारादनन्तरम्। प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः इति व्यासयोगे। अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः।परब्रह्मत्वमिच्छामि परब्रह्मञ्जनार्दन इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात्।न मोक्षसदृशं किञ्चिदधिकं वा सुखं क्वचित्। ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् इत्यादेश्च। ब्रह्मादिपदादप्यधिकतमं  सुखं मोक्षं इति सिद्धम्। अतो योगाय युज्यस्व। ज्ञानोपायाय। तद्धि कर्मकौशलम्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।2.50।।पूर्वोक्तसमत्वबुद्धियुक्तस्य स्वधर्मानुष्ठाने प्रवृत्तस्य किं स्यादित्याशङ्क्याह   समत्वेति।  बुद्धियुक्तः स्वधर्माख्यं कर्मानुतिष्ठन्निति शेषः। बुद्धियोगस्य फलवत्त्वे फलितमाह   तस्मादिति।  पूर्वार्धं व्याचष्टे   बुद्धीत्यादिना।  ननु समत्वबुद्धिमात्रान्न पुण्यपापनिवृत्तिर्युक्ता परमार्थदर्शनवतस्तन्निवृत्तिप्रसिद्धेरिति तत्राह   सत्त्वेति।  उत्तरार्धं व्याचष्टे   तस्मादिति।  स्वधर्ममनुतिष्ठतो यथोक्तयोगार्थं किमर्थं मनो योजनीयमित्याशङ्क्याह   योगो हीति।  तर्हि यथोक्तयोगसामर्थ्यादेव दर्शितफलसिद्धेरनास्था स्वधर्मानुष्ठाने प्राप्तेत्याशङ्क्याह   स्वधर्माख्येष्विति।  ईश्वरार्पितचेतस्तया कर्मसु वर्तमानस्यानुष्ठाननिष्ठस्य या यथोक्ता बुद्धिस्तत्तेषु कौशलमिति योजना। कर्मणां बन्धस्वभावत्वात्तदनुष्ठाने बन्धानुबन्धः स्यादित्याशङ्क्य कौशलमेव विशदयति   तद्धीति।  समत्वबुद्धेरेवं फलत्वे स्थिते फलितमुपसंहरति   तस्मादिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.50।। बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।",
        "hc": "।।2.50।। व्याख्या--'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते'-- समतायुक्त मनुष्य जीवित अवस्थामें ही पुण्य-पापका त्याग कर देता है अर्थात् उसको पुण्य-पाप नहीं लगते, वह उनसे रहित हो जाता है। जैसे संसारमें पुण्य-पाप होते ही रहते हैं, पर सर्वव्यापी परमात्माको वे पुण्य-पाप नहीं लगते, ऐसे ही जो समतामें निरन्तर स्थित रहता है, उसको पुण्यपाप नहीं लगते (गीता 2। 38)।\nसमता एक ऐसी विद्या है जिससे मनुष्य संसारमें रहता हुआ ही संसारसे सर्वथा निर्लिप्त रह सकता है। जैसे कमलका पत्ता जलसे ही उत्पन्न होता है, और जलमें ही रहता है, पर वह जलसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही समतायुक्त पुरुष संसारमें रहते हुए भी संसारसे निर्लिप्त रहता है। पुण्य-पाप उसका स्पर्श नहीं करते अर्थात् वह पुण्य-पापसे असङ्ग हो जाता है।\nवास्तवमें यह स्वयं (चेतन-स्वरूप) पुण्य-पापसे रहित ही। केवल असत् पदार्थों--शरीरादिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही पुण्य-पाप लगते हैं। अगर यह असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध न जोड़े, तो यह आकाशकी तरह निर्लिप्त रहेगा, इसको पुण्य-पापनहीं लगेंगे।\n  'तस्माद्योगाय युज्यस्व'-- इसलिये तुम योगमें लग जाओ अर्थात् निरन्तर समतामें स्थित रहो। वास्तवमें समता तुम्हारा स्वरूप है। अतः तुम नित्य-निरन्तर समतामें ही स्थित रहते हो। केवल राग-द्वेषके कारण तुम्हारेको उस समताका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर तुम हरदम समतामें स्थित न रहते, तो सुख और दुःखका ज्ञान तुम्हें कैसे होता; क्योंकि ये दोनों ही अलग-अलग हैं। जब इन दोनोंका तुम्हें ज्ञान होता है तो तुम इनके आने-जानेमें सदा समरूपसे रहते हो। इसी समताका तुम अनुभव करो।\n  'योगः कर्मसु कौशलम्'-- कर्मोंमें योग ही कुशलता है अर्थात् कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें और उन कर्मोंके फलके प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना ही कर्मोंमें कुशलता है। उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंमें योगके सिवाय दूसरी कोई महत्त्वकी चीज नहीं है।\nइन पदोंमें भगवान्ने योगकी परिभाषा नहीं बतायी है, प्रत्युत योगकी महिमा बतायी है। अगर इन पदोंका अर्थ\n\n'कर्मोंमें कुशलता ही योग है'--ऐसा किया जाय तो क्या आपत्ति है? अगर ऐसा अर्थ किया जायगा तो जो बड़ी कुशलतासे, सावधानीपूर्वक चोरी करता है, उसका वह चोरीरूप कर्म भी योग हो जायगा। अतः ऐसा अर्थ करना अनुचित है। कोई कह सकता है कि हम तो विहित कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानते हैं। परन्तु ऐसा माननेसे मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंके फलमें बँध जायगा, जिससे उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी। अतः यहाँ 'कर्मोंमें योग ही कुशलता है'--ऐसा अर्थ लेना ही उचित है। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी जिसके अन्तःकरणमें समता रहती है, वह कर्म और उनके फलमें बँधेगा नहीं। इसलिये उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंको करते हुए सम रहना ही कुशलता है, बुद्धिमानी है।\nदूसरी बात, पीछेके दो श्लोकोंमें तथा इस श्लोकके पूर्वार्धमें भी योग (समता) का ही प्रसङ्ग है, कुशलताका प्रसङ्ग ही नहीं है। इसलिये भी कर्मोंमें योग ही कुशलता है-- यह अर्थ लेना प्रसङ्गके अनुसार युक्तियुक्त है।सम्बन्ध-- अब पीछेके श्लोकको पुष्ट करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उदाहरण देते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।2.50।।बुद्धियोगयुक्तः तु कर्म कुर्वाण उभे सुकृतदुष्कृते अनादिकालसञ्चिते अनन्ते बन्धेहेतुभूते जहाति। तस्माद् उक्ताय बुद्धियोगाय युज्यस्व। योगः कर्मसु कौशलं कर्मसु क्रियमाणेषु अयं बुद्धियोगः कौशलम् अतिसामर्थ्यम् अतिसामर्थ्यसाध्यः इत्यर्थः।",
        "et": "2.50 He, who is established in evenness of mind in the performance of actions, relinishes good and evil Karmas which have accumulated from time immemorial causing bondage endlessly. Therefore acire this aforesaid evenness of mind (Buddhi Yoga). Yoga is skill in action. That is, this evenness of mind when one is engaged in action, is possible through great skill, i.e., ability."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।2.50।।No commentary.",
        "et": "2.50 Buddhiyuktah etc.  Both indicates the mutual exclusion  [of the good and bad actions].  Therefore [strive] for Yoga etc. : Working in that manner alone constitutes the supreme proficiency, by [working] in which manner the good action and the bad action perish.  This is the idea here."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.50।।समत्वबुद्धिसे युक्त होकर स्वधर्माचरण करनेवाला पुरुष जिस फलको पाता है वह सुन    समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिके और ज्ञानप्राप्तिके द्वारा सुकृतदुष्कृतको  पुण्यपाप दोनोंको यहीं त्याग देता है इसी लोकमें कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।  इसलिये तू समत्वबुद्धिरूप योगकी प्राप्तिके लिये यत्न कर  चेष्टा कर।  क्योंकि योग ही तो कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् स्वधर्मरूप कर्ममें लगे हुए पुरुषका जो ईश्वरसमर्पित बुद्धिसे उत्पन्न हुआ सिद्धिअसिद्धिविषयक समत्वभाव है वही कुशलता है।  यही इसमें कौशल है कि स्वभावसे ही बन्धन करनेवाले जो कर्म हैं वे भी समत्व बुद्धिके प्रभावसे अपने स्वभावको छोड़ देते हैं अतः तू समत्वबुद्धिसे युक्त हो।",
        "sc": "।।2.50।।   बुद्धियुक्तः  कर्मसमत्वविषयया बुद्ध्या युक्तः बुद्धियुक्तः सः  जहाति  परित्यजति  इह  अस्मिन् लोके उभे  सुकृतदुष्कृते  पुण्यपापे सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण यतः  तस्मात्  समत्वबुद्धि योगाय युज्यस्व  घटस्व।  योगो  हि  कर्मसु कौशलम्  स्वधर्माख्येषु कर्मसु वर्तमानस्य या सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वबुद्धिः ईश्वरार्पितचेतस्तया तत् कौशलं कुशलभावः। तद्धि कौशलं यत् बन्धनस्वभावान्यपि कर्माणि समत्वबुद्ध्या स्वभावात् निवर्तन्ते। तस्मात्समत्वबुद्धियुक्तो भव त्वम्।।यस्मात्",
        "et": "2.50 Listen to the result that one possessed of the wisdom of eanimity attains by performing one's own duties: Buddhi-yuktah, possessed of wisdom, possessed of the wisdom of eanimity; since one jahati, rejects; iha, here, in this world; ubhe, both; sukrta-duskrte, virtue and vice (righteousness and unrighteousness), through the purification of the mind and acisition of Knowledge; tasmat, therefore; yujyasva, devote yourself; yogaya, to (Karma-) yoga, the wisdom of eanimity. For Yoga is kausalam, skilfulness; karmasu, in action. Skilfulness means the attitude of the skilful, the wisdom of eanimity with regard to one's success and failure while engaged in actions (karma)  called one's own duties (sva-dharma)  with the mind dedicated to God.\nThat indeed is skilfulness which, through eanimity, makes actions that by their very nature bind give up their nature! Therefore, be you devoted to the wisdom of eanimity."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।2.50।।बुद्धियुक्तः प्रेक्षावान् काम्यं सुकृतं दुष्कृतं च जह्यादिति योगस्वरूपनिरूपणपरतां निराकर्तुमाह   ज्ञाने ति। कथं कर्मणो ज्ञानादतीवावरत्वमित्यतः काम्यकर्मिणः कृपणाः दीनाः इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति मुं.उ.1।2।10 इत्युक्तम् तथापि कथं दूरेणावरमित्यपेक्षायां कर्मफलाद्विलक्षणं ज्ञानफलमाहेत्यर्थः। प्रतीतेऽर्थेनुपपत्तिं तूत्तरत्र दर्शयिष्यति। अत्र दुष्कृतवत्सुकृतस्यापि सर्वात्मना हानं प्रतीयते तत्सङ्कोचेन व्याचष्टे   सुकृत मिति। अप्रियं सुकृतं कीदृशं इत्यत आह    मानुष्ये ति। व्यावर्त्यमाह   ने ति। बृहत् प्राङ्मुक्तेर्ज्ञानादिगुणवृद्धिलक्षणं तदनन्तरं चानन्दवृद्धिरूपं फलं यस्य तत् बृहत्फलं तथाभूतं सुकृतमेव नास्ति कारणाभावादित्यत आह   उपासने ति। आदिपदेन निवृत्तं कर्म। कुतः सङ्कोच इत्यत आह   न हास्ये ति। यजते ददाति तप्यतेऽनेनेति शेषः। अत्राविदित्वेति विशेषणाज्ज्ञानिनः सुकृताक्षयः प्रतीयते। उत्तरत्र वाऽस्याः श्रुतेरुपयोगः। ननु नास्त्यकृतः कृतेन मुं.उ.3।2।12 इत्यादिश्रवणात्सत्प्रतिपक्षा एताः श्रुतय इत्यत आह   अत  इति। विशेषश्रुतेर्बलवत्त्वादिति भावः। श्रुतिः श्रवणम्। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मुं.उ.2।2।8 इति ज्ञानिनोऽपि कर्मक्षयः प्रतीयत इति चेत् न निरवकाशश्रुतिविरोधेनास्य दुष्कृतविषयत्वात्। तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय मुं.उ.3।1।2 इति ज्ञानिनोऽपि उभयक्षयश्रुतिरस्तीत्यत आह   उभये ति। उक्तैव युक्तिः। युक्तिविरुद्धं च ज्ञानिनः सर्वसुकृतहानम्। तथा हि उपासनादिजनितं सुकृतं ज्ञानिनः किमिष्टं उतानिष्टम्। आद्ये किं तदिच्छया क्षीयते उत ज्ञानस्वभावात् आद्यं दूषयति   नही ति। येन ज्ञानी तत्क्षयमिच्छेत् इति शेषः। द्वितीयं निराकरोति   न चे ति। ज्ञानस्यापुरुषार्थताप्रसङ्गादिति भावः नान्त्यः  अनिष्टत्वे कारणाभावात्।निष्फलत्वादनिष्टमित्यत आह   इष्टा श्चेति। केचिदित्यलौकिकाः। मुक्तावलौकिका विषया इष्टा भवन्ति। तत्प्राप्तिः सुकृतफलमिति भावः। मुक्तो विषयानिच्छतीत्येतत्कुतः इत्यत आह    स यदी ति। यज्ञो यशस्वी। ब्राह्मणानां सकाशात्। मुक्तो यद्यत्कामयते तत्कर्मास्मात्परमात्मनः सृजते। इष्टविषयप्राप्तिः सुकृतफलमित्येतदपि अनया श्रुत्योच्यते। उपासनादिकमेव ज्ञानी करोति। कृतेन वा सुकृतं न जायते इत्येतदप्यनया निराकृतम्। ननु मुक्तः किमर्थं विषयानिच्छेत् न तावत्सुखार्थम् ज्ञानेनावरणरूपाविद्यानिवृत्तौ आत्मनः स्वरूपसुखस्य व्यक्तत्वात्। पृथक्सुखस्यानङ्गीकारात्। नापि दुःखनिवृत्त्यर्थम् अविद्यानिवृत्त्यैव तत्सिद्धेरिति। मैवम् नाविद्यैवात्मस्वरूपावरणम् किन्त्वीश्वरेच्छाऽपि। तथा च वक्ष्यति। तथा च ज्ञानेनाविद्यायां निवृत्तायामशेषानिष्टनिवृत्तिर्भवति। स्वरूपसुखं च बहुतरं व्यज्यते। न तु सर्वम्। ज्ञानोत्तरमनुष्ठितेन निवृत्तकर्मणा प्रसन्नः परमेश्वरो मुक्तौ विषयानुत्पाद्य तद्भोगेन ज्ञानानभिव्यक्तमपि स्वरूपसुखं व्यक्तीकरोति। अत्र च भाष्यकृतैव तत्र तत्र प्रमाणान्युक्तानि। अनेनैवाभिप्रायेण श्रुत्यादिषु मुक्तैर्ज्ञानमात्रसाध्यत्वं ज्ञानकर्मसमुच्चयसाध्यत्वं चोच्यते। ननु ज्ञानमात्रसाध्यं यत्स्वरूपसुखं तदेव बहुतरमस्ति अतः कर्मसाध्यविषयभोगाभिव्यङ्ग्यसुखाङ्गीकारः किमर्थं इत्यत आह   बहुत्वेऽपी ति। कर्मसुखेऽङ्गीकृत इति शेषः। शरीरेन्द्रियरहितस्य मुक्तस्य कथं विषयानुभवे शक्तिः इत्यत आह   अनुभवे ति। तदुक्तंब्राह्मेण जैमिनिः ब्र.सू.4।4।6 इति। किञ्च कामरूप्यनुसञ्चरन् तै.उ.3।10।5 इत्यादिलीलाविग्रहग्रहणश्रुतेश्च मुक्तस्य विषयानुभवो युज्यत इत्याह   श्रुतेश्चे ति।ननु यदेतदुदाहृतासु श्रुतिषु विषयेच्छादिकं श्रूयते तच्चरमशरीरपातात्पूर्वकालीनं किं न स्यात् इत्यत आह   न चे ति। अस्माच्छरीरादुत्थाय ৷৷. स तत्र पर्येति छा.उ.8।12।3 अस्माल्लोकात्प्रेत्य ৷৷. एतमानन्दमयमात्मानं तै.उ.3।10।5 इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात्। इत्यादीति क्रियाविशेषणम्। अद्वैतवादिनस्त्वाहुः ब्रह्मैकमेव तत्त्वम्। तदेवोपाधिभेदभिन्नं जीवभावं प्रतिपद्यते गगनमिव घटाद्युपाधिभिन्नं घटाकाशादित्वम्। तत्र यस्य जीवस्य ज्ञानं उत्पन्नं स ब्रह्मणैकीभवति घटनाशे इव महाकाशेनेति। तत्रैके जीवब्रह्मभेदस्योपाधेश्च मिथ्यात्वं मन्यन्ते। अन्ये च सत्यत्वम्। यदा च स ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूतस्तदा सकलस्य क्रियाकारकलक्षणफलभेदस्य प्रविलयात्कुतो विषयभोगः यदर्थं सुकृतस्यावस्थानं इति तद्दूषयति   न चे ति। एवशब्देन भेदाभेदौ निराकरोति।परमात्मानमासाद्य तद्भूता यतयोऽमलाः। अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो म.भा.12।301।78 इति भीष्मेण तस्मिन्भूतास्तद्भूता इत्यभिप्रायेणोक्ते मुक्तास्तद्ब्रह्मैव भूता इत्यर्थान्तरमाशङ्क्य युधिष्ठिरेणआजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत वा वाऽनघ म.भा.12।301।80 इति विकल्प्य पृष्टम्। यदि ज्ञानिनो मुक्तौ ब्रह्मणैकीभवन्ति तदैवं वाच्यम्  किं ते संसारानुभूतं दुःखं स्मरन्ति उत न इति। आद्यस्य दूषणमुक्तम्  मोक्षे दोषो महानेषः प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन्। यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे। म.भा.12।301।82 पूर्वं सिद्धिं गतानृषीन्प्राप्य परेऽपि यतयो यदि तत्र मुक्त्तौ विज्ञाने विज्ञानेन प्रागनुभूतदुःखस्मरणेन युक्ता वर्तन्ते तर्हि मोक्षे महानेषः प्रसिद्धो दोष इति। दोषं च भाष्यकारः स्फुटीकरिष्यति। द्वितीयोऽपि दूषितः   मग्नस्ये ति। पूर्वानुभूतस्मरणाद्यभावे परेऽज्ञाने मग्नस्य चेतनस्य दुःखतरं दुःखातिशयो न भवेत्किं भवेदेव। तदेवं मोक्षधर्मेऽस्य पक्षस्य निन्दितत्वान्न ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूत इत्यर्थः। ननु पूर्वपक्षस्थेन युधिष्ठिरेण निन्दितत्वेऽपि कथं भीष्माचार्येणोक्तमसत्स्यात् परिहारे तदुक्तदोषस्योद्धारसम्भवादित्यत आह   परिहार   इ ति। न मयैतदुक्तं किन्तु त्वमन्यथा गृहीत्वा दूषितवानसीत्याशयेन परिहारे भीष्मेण परमात्मनः पृथक्त्वेन मुक्तानां भोगाभिधानाच्च न ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूत इत्यर्थः। तथा हि भीष्मवचनम्  तथापि अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ्मयेरितम्। ৷৷. इन्द्रियाणि च बुध्यन्ते स्वदेहं देहिनो नृप।।करणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः म.भा.12।301।8586 इति।।यद्यपीदं दुर्बोधं तथापि स्वः स्वरूपभूतो देहो यस्य तं स्वदेहं परमात्मानं मुक्तमन्यान्देहान्विषयांश्च मुक्तस्य इन्द्रियाणि बुध्यन्ते। किं तानि कर्तृ़णि नेत्याह   करणानी ति कस्तर्हि पूर्वार्धस्यार्थः इत्यत उक्तम्   सूक्ष्म इति । इतश्च न ज्ञानिनो ब्रह्मैक्यमित्याह   शुकादीना मिति। अनेन वाक्यत्रयेण मुक्तानां ब्रह्मभेदे क्रमेण प्रत्यक्षानुमानागमा उपन्यस्ताः। तत्र प्रत्यक्षं न बाधकम्। शुकादयो यद्यपि ज्ञानिनस्तथापीदानीमविनष्टोपाधित्वात्तन्निमित्तभेदवत्तया दृश्यन्ते। प्रारब्धकर्मक्षयादुपाधिनाशे ब्रह्मैव संवृता भूताः न पृथक् द्रक्ष्यन्त इत्यत आह   उपाधिनाशे   इ ति। जीवास्तावद्ब्रह्मणः प्रतिबिम्बा इति समर्थितम् तत्र यदि तदीयस्योपाधेर्नाशोऽङ्गीक्रियते तदा तेषां नाशः प्रसज्यते। दर्पणाद्युपाधिनाशे मुखादिप्रतिबिम्बस्य नाशदर्शनादित्यर्थः।यच्चोक्तं शुकादयोऽविनष्टोपाधित्वाद्ब्रह्मणः पृथक् दृश्यन्त इति तदसदित्याह   न चे ति। वस्तुत एकीभूतस्योपाधिनाऽपि पृथक्ज्ञाने न मानं पश्यामः। गगनादिदृष्टान्तस्यासम्मतत्वात् सत्योपाधिभेदमतस्य चेदं दूषणम्। किञ्चोपाधिक एव जीवब्रह्मणोर्भेदः वास्तवं त्वैक्यमिति वदन्प्रष्टव्यः  किं ब्रह्म निर्दुःखं स्वरूपमेवानुसन्धत्ते न जीवगतं दुःखं तत्तु जीव एवानुसन्धत्त इति पक्षः उत तदपीति। आद्यं दूषयति   न चैकीभूतस्ये ति। हस्तपादाद्युपाधिभेदेऽपि भोक्तुरेकत्वदर्शनादिति भावः। द्वितीयं निराकरोति   आस मिति लङत्र सर्वकालोपलक्षणार्थः। जीवरूपेण दुःख्यासं स्वरूपेण तु नेति व्यवस्थयाऽनुसन्धानान्न विरोध इत्यत आह   अनेने ति। इति च युक्तमिति शेषः। कुतः इत्यत आह   भेदे ति। उपाधेरभेदकत्वस्योक्तत्वादिति भावः। अपरे तु ब्रह्मणैक्यमापन्नस्य मुक्तस्य पूर्वदुःखानुस्मरणमस्ति न वा नेतिपक्षेमग्नस्य हि इत्युक्तो दोषः। आद्ये  किमसौ पृथक् स्मरति उत ब्रह्मात्मक एव। प्रथमस्य दूषणं  न चैकीभूतस्ये ति द्वितीयस्य  आसं  इत्यादीनि व्याचक्षते। अनेनमोक्षे दोषो महानेषः इत्युक्तो दोषः प्रदर्शितो भवति। ननुउपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य इति यदुक्तं तदसत् भेदे हि बिम्बप्रतिबिम्बयोरेतत्स्यात्न चैवं किन्तु बिम्बमेव प्रतिबिम्बं तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानात्।नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन। नोपरक्तं न वारिस्थं न मध्यनभसो गतम् मनुः4।38 इति स्मृतावुद्यदादाविव वारिस्थ प्रतिबिम्बेऽपि आदित्यशब्दप्रयोगदर्शनात्। भेदस्तु दर्पणाद्युपाधिकृतः। तथाचोपाधिनाशे भेद एव नश्यति प्रतिबिम्बस्य कुतो नाशः एवं जीवस्यापीत्याशङ्क्य प्रत्यभिज्ञानं तावदसिद्धमित्याह   न चे ति। न पश्यामो न प्रत्यभिजानीमः प्रत्युत प्रत्यग्भावादिना तयोर्भेदमेव पश्याम इति चार्थः। यच्चोक्तंजीवब्रह्मणोर्बिम्बप्रतिबिम्बयोरौपाधिको भेदः इति तन्नास्माकमनिष्टम्। किन्तु परस्यैव। जीवोपाधिनाशे प्रमाणाभावेन नित्यत्वात्तन्निमित्तस्यापि भेदस्य मुक्तौ स्थितेरित्याशयवानाह   उपाधिनाश  इति। न पश्याम इत्यनुवर्तते। न केवलं उपाधिनाशे प्रमाणाभावः किन्तु तन्नाशाङ्गीकारे बाधकमस्तीत्याह   मग्नस्ये ति। उपाध्यभावे स्मरणादिविलोपात्। न केवलमेतावत् उपाधिनित्यत्वे प्रमाणं चास्तीत्याह   यावदि ति। अस्तु तर्हि उदाहृतस्मृतिवाक्यं बिम्बप्रतिबिम्बयोरैक्ये प्रमाणमित्यत आह   अत  इति प्रत्यक्षेण भेदस्य प्रतीयमानत्वात्। प्रतीयमानमपीत्यनेन प्रत्यभिज्ञायामिव वचनस्वरूपेऽपि न विवादोऽस्तीत्याह वारिस्थमिति। न परस्य मुख्यं सम्भवतीत्यनौपचारिकैः सह पाठेऽपि बाधकवशादौपचारिकतब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः इत्यादौ दृष्टमिति। एवंशुकादीनां इत्युक्तं प्रत्यक्षमुपपादितम्।अधुनाऽऽस्तां तावदुपपादनसापेक्षं प्रत्यक्षं तन्निरपेक्षं चास्तीत्याह   दृष्टा श्चेति। ते निवृत्तसकलकर्माणो मुक्ताः। एतच्च मोक्षधर्मे स्पष्टमुक्तम् प्राङ्मुक्तेश्वरभेदे स्मृतिरुदाहृता श्रुतिं चोदाहरति   प्रतिशाखमि ति। ननु भेद इवाभेदेऽपिपरेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति इत्यादिवाक्यानि सन्ति तत्कथं निर्णयः इत्यतः सामान्यन्यायं तावदाह   विरोधे  त्विति। बलवद्विरोधेन दुर्बलं बाध्यते इति भावः। ततः किं प्रकृते इत्यत आह   युक्तय  इति।  अत्र  भेदपक्षे उपलक्षणमेतत्। प्रत्यक्षानुकूल्यं च भेदवाक्यानां प्राबल्याय ग्राह्यम्। तर्ह्येकीभवन्तीत्यस्य का गतिः इत्यत आह   अत  इति। उभयत्रैकीभाववादेन तद्वादिवाक्यं गृह्यते। स्थानैक्यविषयमैक्यवाक्यमित्यर्थः। इयं च रूढलक्षणेति न प्रयोजनमन्वेषणीयमिति दृष्टान्तोक्तिः। न केवलमियं गतिर्न्यायप्राप्ता किन्तु श्रौती चेत्याह   उक्तं चे ति। उदकेऽप्यैक्यादसम्मतो दृष्टान्त इत्यत आह   तत्रापी ति। नास्त्येव समुद्रे वृद्धिरनुपलम्भादित्यत आह   अस्ती ति। समुद्रेऽपि वृद्धिरिति शेषः। अनुपलम्भस्यासिद्धिमाह   द्वारी ति। नदीनां द्वारि दृश्यते चेति शेषः। अन्यत्र कुतो न दृश्यते इत्यत आह   महत्त्वादि ति सामुद्रस्योदकस्य महत्त्वात्। न केवलं वृद्धिलिङ्गादनुमानादुदकभेदः सिद्धः किं तर्हि प्रत्यक्षादपीत्याह   ता  इति। या इन्द्रकमण्डलोरादाय स्वकमण्डलूदके क्षिप्तास्ता एवापस्तस्येन्द्रस्य ददौ वसिष्ठ इति महाकौर्मवचनात्समर्थानां वसिष्ठादीनां जले भेददर्शनाच्च। भेदादर्शने विभज्य कथं दद्यादिति। इतश्च मुक्तभेदवाक्यमेव प्रबलम् अभेदनिषेधात्मकत्वादित्याह   नैवे ति। कैवल्यं सर्वोत्तमत्वम्। इतोऽपि भेदपक्षो बलवानिति वक्तुमाह    से ति। पूर्वोत्तरपक्षबलाबलचिन्ता विचारः। निर्णयो जीवेशभेदावधारणम्।बहवः पुरुषा ब्रह्मन् इत्यादिनेति शेषः। न हि भिन्नयोर्मुक्तावभेदः सम्भवतीति भावः। ततः किमित्यत आह   बलवानि ति। निर्णयश्चेति सम्बन्धः। वाक्यमात्रादेकीभवन्तीत्यादेः।कथं तर्हि यत्रेत्यादिभूमलक्षणमुच्यते इत्यत आह   अत  इति सविचारनिर्णयविरोधादेव। विद्यमानस्याप्यन्यस्य भगवदधीनसत्तादित्ववाचि। इतश्चैवमित्याह   अन्यथे ति। यद्यन्यदेव न स्यात्तर्हि कथमीश्वरस्य सर्वेश्वरत्वसार्वज्ञादिकं श्रुत्यादिसिद्धं स्यात् मायामयमेव तच्छ्रुत्यादावुच्यते इत्यत आह   न चे ति। बाधकान्तरमाह   अन्यथे ति। यदि भूमाऽद्वितीयः स्यात् कथं तर्हि तज्ज्ञानान्याच्चय स एकधा छां.उ.7।26।2 इत्यादिभेदे श्रुतिर्ब्रूयात् न तद्भ्रूमज्ञानफलम् किन्तु सगुणविद्योपासनफलमित्यत उक्तम्   तत्रैवे ति भूमप्रकरण एव। ननु नारदेन श्वेतद्वीपे भगवतो भिन्ना दृष्टास्ते मुक्ता एव न भवन्ति सशरीरत्वात् सशरीराणामपि मुक्तत्वाङ्गीकारे न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति छां.उ.8।12।1 इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यत आह    न चे ति। कुतो नेत्यत आह    वैलक्षण्या दिति। किं तदस्मदादिशरीरेभ्यस्तेषां वैलक्षण्यं इत्यत आह   अभौतिकानी ति अजडानीत्यर्थः। तर्हि किमात्मकानि इत्यत आह   नित्योपा धीति। विकारित्वाद्विनाशः स्यादित्यत उक्तम्   ईश्वरशक्त्ये ति। कुत एतदित्यत आह   तथा चे ति। नित्योपाधिरेव षोडशी कला। एतदुक्तं भवति  यच्छ्रुतौ सशरीरस्य दुःखानपहतिवचनं तत्कर्माधीनजडशरीराभिप्रायम् श्वेतद्वीपे नारदेन दृष्टानि तु शरीराणि चिन्मयानि जडान्यपि न कर्माधीनानि अतो न दुःखकारणानि। तथा च न तेषां सशरीराणामपि मुक्तत्वे श्रुतिविरोध इति।यदि मुक्ताः सशरीरास्तर्हि कथं तेषु अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः छा.उ.8।12।1 इति शरीराभाववचनमित्यत आह   वदन्ति चे ति। लौकिकाद्वैलक्षण्ये सति तद्वदत्रापीति शेषः। इतश्चाशरीरत्वोक्तिर्युक्तेत्याह   निरुक्ती ति। निरुक्तिलभ्यार्थस्य तत्राभावादित्यर्थः। काऽसौ निरुक्तिरित्यतः प्रक्रियासम्पादनगौरवपरिहाराय श्रुतिमेव तत्परां दर्शयति   तथाही ति। अशारि शीर्णमभवदिति हेतोस्तच्छरीरशब्दमभवदित्यर्थः। कथं निरुक्तिलभ्योऽर्थस्तेषु नास्ति इत्यत आह   नही ति। एवं तर्हि कथं तेषुशरीरं जायते तेषां इति शरीरशब्दप्रयोगः इत्यत आह   साम्यादि ति। अस्मदादिशरीरैः करचरणादिमत्त्वसाम्याद्गौण इत्यर्थः। कुतोऽयमशरीरशब्दस्याभिप्रायः सर्वथा विग्रहराहित्यमेव किन्न स्यात् इत्यत आह   प्रयोगाच्चे ति। नारदादिभिर्दृष्टदेहेष्वेव मुक्तेष्वेतद्वाक्यद्वये देहाभावप्रयोगादन्यथाऽनुपपत्त्याऽयमर्थः सिद्धः। न केवलं सम्भवमात्रेणेति चार्थः। इत्यादीति क्रियाविशेषणम्। प्रयोगादित्यनेन सम्बध्यते। सन्तु नारदेन दृष्टाः श्वेतद्वीपवासिनो मुक्ताः तथापि नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः यत एतेषां श्वेतद्वीपप्राप्तिरूपा निर्गुणमुक्तेरन्या गौणी मुक्तिः। निर्गुणायामेव मुक्तौ वयमैक्यं ब्रूम इत्यत आह   न चे ति। श्वेतद्वीपप्राप्तिव्यतिरिक्तमुक्तिनिषेधादियमेव मुक्तिरित्यर्थः।ननु शिशुपालादयः श्वेतद्वीपगमनेन विनैवात्र भगवन्तं प्रविश्य मुच्यन्ते तत्कथमेतत् इत्यत आह   ये त्वि ति। ते न तदा मुच्यन्ते इति शेषः। तर्हि कदेत्यत आह   तेऽपी ति। ततो मुच्यन्त इति शेषः। ननुकेचिदत्रैव मुच्यन्ते इत्याद्युक्त्वामहाज्ञाना गच्छन्ति क्षीरसागरम् इति महायोग्यतावतामेव श्वेतद्वीपगमनोक्तेः कथमयं नियमः इत्यत आह   योग्यत्व मिति। अत्र निवास इति शेषः। अस्ति सर्वेषां श्वेतद्वीपप्राप्तिः। महाज्ञानत्वलक्षणं योग्यत्वं त्वत्र निवासे विवक्षितमित्यर्थः। नन्विदं वाक्यं श्वेतद्वीपप्राप्तिं विना सगुणमुक्तिर्नास्तीत्येतत्परम् निर्गुणमुक्तिस्त्वन्याऽस्तीत्यत आह   युधिष्ठिरे ति। सायुज्यं तावत्प्रसिद्धम् सैव निर्गुणमुक्तिः तत्रात्मनो ब्रह्मणैकत्वमित्यत आह   सायुज्यं चे ति। यथा ग्रहस्य पुरुषान्तरं प्रविश्य भोगः तथा मुक्तस्येश्वरं प्रविश्य भोग एव सायुज्यं न त्वैक्यमित्यर्थः। कुत एतत् सायुज्यशब्दसामर्थ्यादागमवाक्याच्चेत्याह   तदुक्ते श्चेति। उत्तमायां मुक्तौ सायुज्यलक्षणायामीश्वरं प्रविश्येति शेषः। ईश्वरानन्दव्युदासाय    बाह्या निति। बाह्येष्वपि विभागो वचनान्तरादवसेयः। सुकृतमप्यप्रियमित्यादिनोक्तमर्थमुपसंहरति   अत  इति। यथा सुकृतत्यागे सङ्कोचस्तथाऽनिष्टत्यागेऽप्यस्ति किमिति जिज्ञासायामाह   स  इति। प्राचुर्याभिप्रायाण्येतानि वचनानि किं न स्युः इत्यत आह   विशेषे ति।सङ्कर्षणादयः समष्टिजीवास्तावन्मुक्ताः तेषां च बललक्ष्मणादिरूपेषु दुःखं दृश्यते तदेव विशेषप्रमाणमित्यत आह   येषा मिति। न सायुज्यं प्राप्ताः न मुक्ता इत्यर्थः। सायुज्ययोग्यानां तदभावे मुक्त्यभावात्। तेषां मुक्तत्वोक्तेस्तर्हि का गतिः इत्यत आह   सामीप्यादी ति। मुक्तत्वोक्तौ बीजमिति शेषः। कुतस्ते न मुक्ताः इत्यत आह   अत  इति। दुःखदर्शनात्तद्धेतुभूतप्रारब्धकर्मभावान्न मुक्ताः। कदा तर्हि मुच्यन्ते इत्यत आह   तदि ति। अत्रागमसम्मतिमाह   तच्चोक्त मिति। सोऽस्त्येवेत्याद्युक्तमुपसंहरति    अत  इति। तत्किमनिष्टनिवृत्तिमात्रं मुक्तिः इत्यतोऽनुमानागमाभ्यां परमसुखं चेत्याह   परब्रह्मत्व मिति। मुक्तत्वं ब्रह्मादिभिर्दुःखहीनैरपि मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थमेतदिति न ब्रह्मण एकान्तित्वविरोधः।समासान्तविधेरनित्यत्वाद्वाङ्मनोगोचरं इत्युक्तम्।महत् इत्येतत्सुखं इत्यनेन सम्बध्यते।  ब्रह्मादिपदादप्यधिकतममि ति। ब्रह्मणो ब्रह्मपदादप्यधिकं शेषस्य शेषपदादप्यधिकमित्यादि ज्ञेयम्।एवं ज्ञानफलप्रदर्शनत्वेन पूर्वार्धो व्याख्यातः। उक्तविधया योगस्वरूपनिरुपणपरः किं न स्यात् इत्यतोऽस्मदुक्तार्थे तृतीयपादसङ्गतेः अन्यथा तदसङ्गतेरित्यभिप्रेत्य तं पठति   अत  इति। न दूरस्थहेतुपरामर्शोऽयमिति ज्ञापयितुं तस्मादिति पठितव्येअतः इत्युक्तम्। ज्ञानस्य महाफलत्वात्  योगाय युज्यस्वे ति कथं हेतुहेतुमद्भाव इत्यतोयोगाय इत्येतद्व्याचष्टे   ज्ञाने ति। ननुसमत्वं योग उच्यते 2।48 इति योगो व्याख्यातःयोगः कर्मसु कौशलम् इति पुनर्व्याख्यायते इत्यतः स्तुतिरियं योगस्य क्रियत इति भावेनाह   तद्धी ति। तद्योग इति शेषः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।2.50।।एतद्बुद्धियोगयुक्त एव निर्द्वन्द्वो भवतीत्याह  बुद्धियुक्त इति। उभे पुण्यपापे स्वर्णलोहबन्धनतुल्ये इहैव जहाति। तस्माद्योगायोक्तस्वरूपाय युक्तो भव। योगो हि कर्मसु कौशलं निर्बन्धनतावृत्तिसाधनमिति। गुणाविष्करणम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।2.50।।एवं बुद्धियोगाभावे दोषमुक्त्वा तद्भावे गुणमाह  इह कर्मसु बुद्धियुक्तः समत्वबुद्ध्या युक्तो जहाति परित्यजति उभे सुकृतदुष्कृते पुण्यपापे सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण। यस्मादेवं तस्मात्समत्वबुद्धियोगाय त्वं युज्यस्व घटस्य उद्युक्तो भव। यस्मादीदृशः समत्वबुद्धियोग ईश्वरार्पितचेतसः कर्मसु प्रवर्तमानस्य कौशलं कुशलभावः यद्बन्धहेतूनामपि कर्मणां तदभावो मोक्षपर्यवसायित्वं च तन्महत्कौशलम्। समत्वबुद्धियुक्तः कर्मयोगः कर्मात्मापि सन् दुष्कर्मक्षयं करोतीति महाकुशलः त्वं तु न कुशलो यतश्चेतनोऽपि सन्सजातीयदुष्टक्षयं न करोषीति व्यतिरेकोऽत्र ध्वनितः। अथवा इह समत्वबुद्धियुक्ते कर्मणि कृते सति सत्त्वशुद्धिद्वारेण बुद्धियुक्तः परमात्मसाक्षात्कारवान्सन् जहात्युभे सुकृतदुष्कृते तस्मात्समत्वबुद्धियुक्ताय कर्मयोगाय युज्यस्व। यस्मात्कर्मसु मध्ये समत्वबुद्धियुक्तः कर्मयोगः कौशलं कुशलः। दुष्टकर्मनिवारणचतुर इत्यर्थः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।2.50।।बुद्धियोगयुक्तस्तु श्रेष्ठ इत्याह   बुद्धीति।  सुकृतं स्वर्गादिप्रापकम् दुष्कृतं निरयादिप्रापकम् ते उभे इहैव जन्मनि परमेश्वरप्रसादेन जहाति त्यजति। तस्माद्योगाय तदर्थाय कर्मयोगाय युज्यस्व घटस्व। यतः कर्मसु यत्कौशलं बन्धकानामपि तेषामीश्वराराधनेन मोक्षपरत्वसंपादनचातुर्यं स एव योगः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.50।।   काम्यकर्मणोऽवरत्वमुक्त्वा निष्काम कर्मणः श्रैष्ठ्यमाह  समत्वबुद्धियुक्तः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेणोभे पुण्यपापे त्यजति सांख्यबुद्धिर्युक्त इति वा तस्माद्योगाय समत्वलक्षणकर्मयागानुष्टानार्थ षटस्व ज्ञानयोगप्राप्त्यर्थमिति वा। यस्माद्योगः समत्वलक्षणः कर्मसु सर्वेषु कौशलं बन्धकानामपि तेषामीश्वरार्पितचेतस्तया मोक्षपरत्वसंपादनचातुर्यं ज्ञानयोग इति वा। अस्मिन्पक्षे कर्मसु ज्ञानप्रतिबन्धकेषु फलाभिसंधिं विहाय ज्ञानलाभचातुर्यमिति व्याख्येयम्। तस्मात्समत्वयुक्तो भवेत्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha did not comment on this sloka"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.50।।नन्वेवं बुद्धौ किं स्यात् इत्याशङ्क्याह  बुद्धियुक्त इति। बुद्ध्या युक्त इहैव उभे सुकृतदुष्कृते जहाति।अयमर्थः  मयि बुद्ध्या युक्त इह अस्मिन्नेव जन्मनि सुकृतफलं स्वर्गादि दुष्कृतफलं नरकं तत्साधने सुकृतदुष्कृते त्यजति। सुकृतमुत्तमफलार्थं करोमि दुष्कृतं भ्रमाज्जातं तत्फलभोगो मम भविष्यतीति न विचारयति। किन्तु यथा ईश्वरः प्रेरयति तथा करोमीति करोति तेन भक्तसाधनत्वं भवतीत्यर्थः। यस्माद्बुद्ध्याऽहं प्रसन्नः सन् भक्तिं ददामि तस्मात्त्वं योगाय  म इति शेषः  युज्यस्व यत्नं कुरु। ननु योगोऽपि कृतिसाध्यत्वात् कर्म एवेति पूर्वोक्तमध्यपातित्वात् किं योगेन इत्यत आह  योग इति। कर्मसु कौशलं चातुर्यम् योग इत्यर्थः। मन्निष्ठत्वान्मद्दर्शनार्थं मनःस्थिरीकरणसाधकत्वाच्चातुर्यम्। साक्षाद्भक्त्यधिकारफलानि वा। मदाज्ञया कर्मकरणं योगः। एतदेव कर्मसु चातुर्यं यत्कृत्वाऽपि भक्तिसाधने प्रवेशनीयं तादृशो योग उत्तम इति। इदानीं तदधिकाराभावात्तथोपदिशति। अन्यथाकर्मसु इति पदं व्यर्थं स्यात्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.50।।किञ्च  बुद्धीति।  बुद्धियुक्तः समत्वबुद्धियुक्तः योगाय समत्वबुद्धियोगाय युज्यस्व घटस्व। योगः सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वबुद्धिः कर्मसु बन्धकेष्वपि कौशलं बन्धनिवर्तकत्वसंपादनम्। ननु बुद्धियुक्तः कर्मभिर्दुष्कृतं त्यजतुधर्मेण पापमपनुदति इति श्रुतेः सुकृतं तु सजातीयत्वात्तैर्दुष्परिहरमिति कथमुभे सुकृतदुष्कृते जहातीत्युच्यते सत्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारेति प्राञ्चः। अर्वाञ्चस्तु दुष्कृतत्यागमुक्तरीत्याभ्युपेत्य फलत्यागात्सुकृतत्यागोऽपि कर्मयोगिनो भवति। दुष्कृतफलवन्मोक्षप्रतिबन्धकतत्फलस्यानुत्पादात्। यत्तु आपस्तम्बोक्ताम्रवृक्षनिदर्शनेन नान्तरीयकं सुकृतफलमुक्तं न तत्फलत्वेनोपपद्यते नान्तरीयकत्वादेव। तस्मात्फलद्वारा मोक्षप्रतिबन्धके क्रियमाणे एव सुकृतदुष्कृते कर्मयोगी जहाति ज्ञानी तु संचिते अपि ते जहातीति तयोर्विशेषे इत्याहुः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "A man engaged in devotional service rids himself of both good and bad reactions even in this life. Therefore strive for yoga, which is the art of all work.",
        "ec": " Since time immemorial each living entity has accumulated the various reactions of his good and bad work. As such, he is continuously ignorant of his real constitutional position. One’s ignorance can be removed by the instruction of the Bhagavad-gītā , which teaches one to surrender unto Lord Śrī Kṛṣṇa in all respects and become liberated from the chained victimization of action and reaction, birth after birth. Arjuna is therefore advised to act in Kṛṣṇa consciousness, the purifying process of resultant action."
    }
}
