{
    "_id": "BG2.32",
    "chapter": 2,
    "verse": 32,
    "slok": "यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |\nसुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||२-३२||",
    "transliteration": "yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāramapāvṛtam .\nsukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam ||2-32||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.32।। और हे पार्थ ! अपने आप प्राप्त हुए और स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.32 Happy are the Kshatriyas, O Arjuna! who are called upon to fight in such a battle that comes of itself as an open door to heaven.",
        "ec": "2.32 यदृच्छया of itself? च and? उपपन्नम् come? स्वर्गद्वारम् the gate of heaven? अपावृतम् opened? सुखिनः happy? क्षत्रियाः Kshatriyas? पार्थ O Partha? लभन्ते obtain? युद्धम् battle? ईदृशम् such.Commentary The scriptures declare that if a Kshatriya dies for a righteous cause on the battlefield? he at once goes to heaven."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.32 Blessed are the soldiers who find their opportunity. This opportunity has opened for thee the gates of heaven."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.32।। क्षत्रिय शब्द का तात्पर्य यहाँ जन्म से निश्चित की हुई क्षत्रिय जाति से नहीं है। यह व्यक्ति के मन की कतिपय विशिष्ट वासनाओं की ओर संकेत करता है। क्षत्रिय प्रवृति का व्यक्ति वह है जिसमें सार्मथ्य और उत्साह का ऐसा उफान हो कि वह दुर्बल और दरिद्र लोगों की रक्षा के साथ संस्कृति के शत्रुओं से राष्ट्र का रक्षण कर सके। हिन्दू नीतिशास्त्र के अनुसार ऐसे नेतृत्व के गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को स्वयं ही संस्कृति का विनाशक और आक्रमणकारी नहीं होना चाहिये। किन्तु अधर्म का प्रतिकार न करने की कायरतापूर्ण भावना भी हिन्दुओं की परम्परा नहीं है। जब भी कभी ऐसा सुअवसर प्राप्त हो तो क्षत्रियों का कर्तव्य है कि वे इसे स्वर्ण अवसर समझ कर राष्ट्र का रक्षण करें। इस प्रकार के धर्मयुद्ध स्वर्ग की प्राप्ति के लिए खुले हुए द्वार के समान होते हैं।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने तर्क प्रस्तुत करते हुए वेदान्त के सर्वोच्च सिद्धांत से उतर कर भौतिकवादियों के स्तर पर आये और उससे भी नीचे के स्तर पर आकर वे जगत् के एक सामान्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से भी परिस्थिति का परीक्षण करते हैं। इन विभिन्न दृष्टिकोणों से वे अर्जुन को यह सिद्ध कर दिखाते हैं कि उसका युद्ध करना उचित है।निश्चय ही युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है और अब यदि इसे छोड़कर तुम भागते हो तब"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.32. O son of  Prtha !  By good fortune,  Ksatriyas,  desirous of happiness,  get a war of this type [to fight], which has come on its own accord and which is an open door to the heaven."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.32 Happy are the Ksatriyas, O Arjuna, to whom a war like this comes of its own accord; it opens the gate to heaven."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.32 O son of Partha, happy are the Ksatriyas who come across this kind of a battle, which presents itself unsought for and which is an open gate to heaven."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।2.32।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।2.32।।युद्धस्य गुर्वाद्यनेकप्राणिहिंसात्मकस्याहिंसाशास्त्रविरोधान्नास्ति कर्तव्यतेति शङ्कते   कुतश्चेति।  अग्नीषोमीयहिंसादिवद्युद्धमपि क्षत्रियस्य विहितत्वादनुष्ठेयं सामान्यशास्त्रतो विशेषशास्त्रस्य बलीयस्त्वादित्याह   उच्यत इति।  तथापि युद्धे प्रवृत्तानामैहिकामुष्मिकस्यापि सुखाभावादुपरतिरेव ततो युक्ता प्रतिभातीत्याशङ्क्याह   यदृच्छयेति।  चिरेण चिरतरेण कालेन च यागाद्यनुष्ठायिनः स्वर्गादिभाजो भवन्ति युध्यमानास्तु क्षत्रिया बहिर्मुखताविहीनाः सहसैव स्वर्गादिसुखभोक्तारस्तेन तव कर्तव्यमेव युद्धमिति व्याख्यानेन स्फुटयति   यदृच्छयेत्यादिना।  इहामुत्र च भाविसुखवतामेव क्षत्रियाणां स्वधर्मभूतयुद्धसिद्धेस्तादर्थ्येनोत्थानं शोकमोहौ हित्वा कर्तव्यमित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.32।। अपने-आप प्राप्त हुआ युद्ध खुला हुआ स्वर्गका दरवाजा भी है। हे पृथानन्दन ! वे क्षत्रिय बड़े सुखी (भाग्यशाली) हैं, जिनको ऐसा युद्ध प्राप्त होता है।",
        "hc": "2.32।। व्याख्या--  'यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्'-- पाण्डवोंसे जूआ खेलनेमें दुर्योधनने यह शर्त रखी थी कि अगर इसमें आप हार जायँगे,  तो आपको बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोगना होगा। तेरहवें वर्षके बाद आपको अपना राज्य मिल जायगा। परन्तु अज्ञातवासमें अगर हमलोग आपलोगोंको खोज लेंगे, तो आप-लोगोंको दुबारा बारह वर्षका वनवास भोगना पड़ेगा। जूएमें हार जानेपर शर्तके अनुसार पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोग लिया। उसके बाद जब उन्होंने अपना राज्य माँगा, तब दुर्योधनने कहा कि मैं बिना युद्ध किये सुईकी तीखी नोक-जितनी जमीन भी नहीं दूँगा। दुर्योधनके ऐसा कहनेपर भी पाण्डवोंकी ओरसे बार-बार सन्धिका प्रस्ताव रखा गया, पर दुर्योधनने पाण्डवोंसे सन्धि स्वीकार नहीं की। इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि यह युद्ध तुमलोगोंको अपने-आप प्राप्त हुआ है। अपने-आप प्राप्त हुए धर्ममय युद्ध में जो क्षत्रिय शूरवीरतासे लड़ते हुए मरता है, उसके लिये स्वर्गका दरवाजा खुला हुआ रहता है'सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्'-- ऐसा धर्ममय युद्ध जिनको प्राप्त हुआ है, वे क्षत्रिय बड़े सुखी हैं। यहाँ सुखी कहनेका तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें जो सुख है, वह सुख सांसारिक भोगोंको भोगनेमें नहीं है। सांसारिक भोगोंका सुख तो पशु-पक्षियोंको भी होता है। अतः जिनको कर्तव्य-पालनका अवसर प्राप्त हुआ है, उनको बड़ा भाग्यशाली मानना चाहिये।सम्बन्ध-- युद्ध न करनेसे क्या हानि होती है इसका आगेके चार श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।2.32।।अयत्नोपनतम् इदं निरतिशयसुखोपायभूतं निर्विघ्नम्  ईदृशं युद्धं सुखिनः  पुण्यवन्तः  क्षत्रिया लभन्ते।",
        "et": "2.32 Only the fortunate Ksatriyas, i.e., the meritorious ones, gian such a war as this, which has come unsought, which is the means for the attainment of immeasurable bliss, and  which gives an unobstructed pathway to heaven."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।2.32।।स्वधर्ममिति।  स्वधर्मस्य च अनपहार्यत्वात् (S  N अपरिहार्यत्त्वात्) युद्धविषयः कम्पो न युक्तः।",
        "et": "2.32 Yadrcchaya etc.  A war of this nature, because it is conducive to the heaven, should not be avoided even by other such Ksatriyas who are full of desires  How much less [it is to be avoided] in the case of one to whom the science of knowledge of this nature has been taught ?  This is what is intended to be conveyed [here]  And the verse does not at all end with [determining how to attain] the heaven. \n The very thing (i.e. sin), fearing which you withdraw from the battle, will befall you branching off hundredfold.  This [the Lord] says-"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.32।।और भी वह युद्ध किसलिये कर्तव्य है सो कहते हैं    हे पार्थ  अनिच्छासे प्राप्त  बिना माँगे मिले हुए ऐसे खुले हुए स्वर्गद्वाररूप युद्धको जो क्षत्रिय पाते हैं क्या वे सुखी नहीं हैं।",
        "sc": "।।2.32।।  यदृच्छया च अप्रार्थिततया उपपन्नम् आगतं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् उद्धाटितं ये एतत् ईदृशं युद्धं लभन्ते क्षत्रियाः हे पार्थ किं न सुखिनः तेएवं कर्तव्यताप्राप्तमपि",
        "et": "2.32 Why, again, does that battle become a duty? This is being answered (as follows) [A specific rule is more authoritative than a general rule. Non-violence is a general rule enjoined by the scriptures, but the duty of fighting is a specific rule for a Ksatriya.]: Partha, O son of Partha; are not those Ksatiryas sukhinah, happy [Happy in this world as also in the other.] who labhante, come across; a yuddham, battle; idrsam, of this kind; upapannam, which presents itself; yadrcchaya, unsought for; and which is an apavrtam, open; svarga-dvaram, gate to heaven? [Rites and duties like sacrifices etc. yield their results after the lapse of some time. But the Ksatriyas go to heaven immediatley after dying in battle, because, unlike the minds of others, their minds remaind fully engaged in their immediate duty.]"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।2.32।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।2.32।।तदेतदुपपादयति  यदृच्छयेति। सुखिनो भाग्यवन्तः युद्धं स्वर्गद्वारभूतम्।द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ इति भागवतवाक्यात् 6।10।33।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।2.32।।ननु युद्धस्य कर्तव्यत्वेऽपि न भीष्मद्रोणादिभिर्गुरुभिः सह तत्कर्तुमुचितमतिगर्हितत्वादित्याशङ्क्याह  यदृच्छया स्वप्रयत्नव्यतिरेकेण। चोऽवधारणे। अप्रार्थनयैवोपस्थितमीदृशं भीष्मद्रोणादिवीरपुरुषप्रतियोगिकं कीर्तिराज्यलाभदृष्टफलसाधनं युद्धं ये क्षत्रियाः प्रतियोगिकत्वेन लभन्ते ते सुखभाज एव। जये सत्यनायासेनैव यशसो राज्यस्य च लाभात् पराजये वातिशीघ्रमेव स्वर्गस्य लाभादित्याह  स्वर्गद्वारमपावृतमिति। अप्रतिबद्धं स्वर्गसाधनं युद्धमव्यवधानेनैव स्वर्गजनकम्। ज्योतिष्टोमादिकं तु चिरतरेण। देहपातस्य प्रतिबन्धाभावस्य चापेक्षणादित्यर्थः। स्वर्गद्वारमित्यनेन श्येनादिवत्प्रत्यवायशङ्का परिहृता। श्येनादयो हि विहिता अपि फलदोषेण दुष्टाः। तत्फलस्य शत्रुवधस्यन हिंस्यात्सर्वा भूतानिब्राह्मणं न हन्यात् इत्यादिशास्त्रनिषिद्धस्य प्रत्यवायजनकत्वात् फले विध्यभावाच्च नविधिस्पृष्टे निषेधानवकाशः इति न्यायावतारः। युद्धस्य हि फलं स्वर्गः स च न निषिद्धः। तथाच मनुःआहवेषु मिथोन्योन्यं जिघांसन्ते महीक्षितः। युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः।। इति। युद्धं तु अग्नीषोभीयाद्यालम्भवद्विहित्वान्न निषेधेन स्प्रष्टुं शक्यते षोडशिग्रहणादिवद्ग्रहणाग्रहणयोस्तुल्यबलतया विकल्पवत्सामान्यशास्त्रस्य विशेषशास्त्रेण संकोचसंभवात्। तथाचविधिस्पृष्टे निषेधानवकाशः इति न्यायाद्युद्धं न प्रत्यवायजनकम्। नापि भीष्मद्रोणादिगुरुब्राह्मणादिवधनिमित्तो दोषस्तेषामाततायित्वात्। तदुक्तं मनुनागुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम्। जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्।।नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।। इत्यादि। ननुस्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः।। इति याज्ञवल्क्यवचनादाततायिब्राह्मणवधेऽपि प्रत्यवायोऽस्त्येव।ब्राह्मणं न हन्यात् इति हि दृष्टप्रयोजनानपेक्षत्वाद्धर्मशास्त्रम्जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत् इति च स्वजीवनार्थत्वादर्थशास्त्रम्। अत्रोच्यतेब्रह्मणे ब्राह्मणमालभेत इतिवद्युद्धविधायकमपि धर्मशास्त्रमेव।सुखदुःखे समे कृत्वा इत्यत्र दृष्टप्रयोजनानपेक्षत्वस्य वक्ष्यमाणत्वात्। याज्ञवल्क्यवचनं तु दृष्टप्रयोजनोद्देश्यककूटयुद्धादिकृतवधविषयमित्यदोषः। मिताक्षराकारस्तु  धर्मार्थसंनिपातेऽर्थग्राहिण एतदेवेति द्वादशवार्षिकप्रायश्चित्तस्यैतच्छब्दपरामृष्टस्यापस्तम्बेन विधानान्मित्रलब्ध्याद्यर्थशास्त्रानुसारेण चतुष्पाद्व्यवहारे शत्रोरपि जये धर्मशास्त्रातिक्रमो न कर्तव्य इत्येतत्परं वचनमेतत् इत्याह। भवत्वेवं न नो हानिः। तदेवं युद्धकरणे सुखोक्तेःस्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव इत्यर्जुनोक्तमपाकृतम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।2.32।।किंच महति श्रेयसि स्वयमेवोपगते सति कुतो विकम्पस इत्याह   यद्दच्छयेति।  यदृच्छयाऽप्रार्थितमेवोपपन्नं प्राप्तमीदृशं युद्धं सुखिनः सभाग्या एव लभन्ते। यतो निरावरणं स्वर्गद्वारमेवैतत्। यद्वा य एवंविधं युद्धं लभन्ते त एव सुखिन इत्यर्थः। एतेनस्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम इति यदुक्तं तन्निरस्तं भवति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.32।।   स्वधर्मत्वाद्युद्धं प्रयत्नेनापि क्षत्रियैः संपाद्यते तव तु भाग्यवशाद्भवत्प्रयन्त्रींविनैवोपपन्नं अतः कर्तव्यमेवेत्याह   यदृच्छयेति।  अप्रार्थिततयागतं सद्यःस्वर्गप्रदं यतः उद्धाटितं स्वर्गद्वारं ये ईदृशं युद्धं क्षत्रिया लभन्ते त एव सुखिनः राज्य स्वर्गादिसुखभाजः। पार्थेति संबोधयन्स्वोत्साहसदृशे उत्साहे प्रेरयति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।2.32।।पुनरपि प्राणिमारणस्यापि युद्धस्य प्रशंसामुखेनाधर्मभ्रममुन्मूलयति  यदृच्छयेति।यदृच्छयोपपन्नं इत्यत्राहेतुत्वादिभ्रमव्युदासायाह  अयत्नोपनतमिति। प्राक्तननिरतिशय पुण्यविपाकलभ्यत्वादिदानीमयत्नोपनतत्वम्।निरतिशयसुखोपायभूतमिति। स्वर्गशब्दो हियस्मिन्नोष्णं न शीतंयन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम्। अभिलाषोपनीतं तत्सुखं स्वर्गपदास्पदम् इति निरतिशयसुखविशेषे व्युत्पन्नः। देशविशेषस्तु तादृशसुखभोगस्थानतया स्वर्गः। धर्माणां च स्वतो निरतिशयसुखसाधनत्वं स्वभावः। फलाभिसन्ध्यादिलक्षणप्रतिबन्धकवशादन्यथात्वमिति च्विप्रत्ययमप्रयुञ्जानस्य भावः। अपावृतशब्दाभिप्रेतं निर्विघ्नत्वम्।सुखिनः इत्यस्यपुण्यवन्त इति प्रतिपदम्। न हि सुखमेवेदृशयुद्धलाभहेतुः। अतोऽत्र सुखशब्देन सुखसाधनं लक्ष्यत इति भावः। यद्वाऽत्र सुखिशब्दः सुखयोग्यत्वलक्षणसम्बन्धपरः। तद्योग्यत्वं च पुण्यवत्त्वमेवेति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.32।।तस्मादेतादृशं भाग्यवन्त एव लभन्ते इत्याह  यदृच्छयेति। यदृच्छया भगवदिच्छया उपपन्नम्। अपावृतमुद्धाटितकपाटस्वर्गद्वारम्। ईदृशं युद्धं क्षत्ित्रयाः सुखिनो भाग्यवन्तो लभन्ते। प्राप्नुवन्ति एतादृशयुद्धाप्तौ भाग्यवत्त्वं भगवदिच्छयानुरूपत्वाद्भगवत्सन्निधित्वाच्चेति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.32।।किञ्च यदृच्छया अप्रार्थितमप्युपपन्नमुपस्थितं स्वर्गद्वारं अपावृतमुद्धाटितं ये क्षत्रिया लभन्ते ते सुखिनो धन्या भवन्तीति संबन्धः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "O Pārtha, happy are the kṣatriyas to whom such fighting opportunities come unsought, opening for them the doors of the heavenly planets.",
        "ec": " As supreme teacher of the world, Lord Kṛṣṇa condemns the attitude of Arjuna, who said, “I do not find any good in this fighting. It will cause perpetual habitation in hell.” Such statements by Arjuna were due to ignorance only. He wanted to become nonviolent in the discharge of his specific duty. For a kṣatriya to be on the battlefield and to become nonviolent is the philosophy of fools. In the Parāśara-smṛti, or religious codes made by Parāśara, the great sage and father of Vyāsadeva, it is stated: kṣatriyo hi prajā rakṣan śastra-pāṇiḥ pradaṇḍayan nirjitya para-sainyādi kṣitiṁ dharmeṇa pālayet “The kṣatriya’s duty is to protect the citizens from all kinds of difficulties, and for that reason he has to apply violence in suitable cases for law and order. Therefore he has to conquer the soldiers of inimical kings, and thus, with religious principles, he should rule over the world.” Considering all aspects, Arjuna had no reason to refrain from fighting. If he should conquer his enemies, he would enjoy the kingdom; and if he should die in the battle, he would be elevated to the heavenly planets, whose doors were wide open to him. Fighting would be for his benefit in either case."
    }
}
