{
    "_id": "BG2.31",
    "chapter": 2,
    "verse": 31,
    "slok": "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |\nधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||२-३१||",
    "transliteration": "svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi .\ndharmyāddhi yuddhācchreyo.anyatkṣatriyasya na vidyate ||2-31||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.31।। और स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है,  क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.31 Further, having regard to thy duty, shouldst not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.",
        "ec": "2.31 स्वधर्मम् own duty? अपि also? च and? अवेक्ष्य looking at? न not? विकम्पितुम् to waver? अर्हसि (thou) oughtest? धर्म्यात् than righteous? हि indeed? युद्धात् than war? श्रेयः higher? अन्यत् other? क्षत्रियस्य of a Kshatriya? न not? विद्यते is.Commentary Lord Krishna now gives to Arjuna wordly reasons for fighting. Up to this time? He talked to Arjuna on the immortality of the Self and gave him philosophical reasons. Now He says to Arjuna? O Arjuna Fighting is a Kshatriyas own duty. You ought not to swerve from that duty. To a Kshatriyta (one born in the warrior or ruling class) nothing is more welcome than a righteous war. A warrior should fight."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.31 Thou must look at thy duty. Nothing can be more welcome to a soldier than a righteous war. Therefore to waver in this resolve is unworthy, O Arjuna!"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.31।। क्षत्रिय का कार्य समाज का राष्ट्र का नेतृत्व करना है और क्षत्रिय होने के नाते अर्जुन का कर्तव्य हो जाता है कि समाज पर आये अधर्म के संकट से उसकी रक्षा करे। उसका कर्तव्य है कि समाज के आह्वान पर युद्ध भूमि में विचलित न होकर शत्रुओं से युद्ध करके राष्ट्र की संस्कृति का रक्षण करे।क्षत्रियों के लिए इससे बढ़कर कोई और श्रेयष्कर कार्य नहीं हो सकता कि उनको धर्मयुक्त युद्ध में अपना शौर्य दिखाने का स्वर्ण अवसर मिले। यहाँ अधर्मियों ने ही पहले आक्रमण किया है। अत अर्जुन का युद्ध से विरत होना उचित नहीं। महाभारत के उद्योग पर्व में स्पष्ट कहा है निरपराध व्यक्ति की हत्या का पाप उतना ही बड़ा है जितना कि नाश करने योग्य व्यक्ति का नाश न करने का है।युद्ध का औचित्य सिद्ध करते हुए भगवान् अन्य कारण बताते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.31. Further,  considering your own duty, you should not waver. Indeed,  for a Ksatriya there exists no duty superior to fighting a righteous war."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.31 Further, considering also your own duty, it does not befit you to waver. For, to a Ksatriya, there is no greater good than a righteous war."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.31 Even considering your own duty you should not waver, since there is nothing else better for a Ksatriya than a righteous battle."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।2.31।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।2.31।।श्लोकान्तरमवतारयन्वृत्तं कीर्तयति   इहेति।  पूर्वश्लोकः सप्तम्यर्थः यत्पारमार्थिकं तत्त्वं तदपेक्षायामेव केवलं शोकमोहयोरसंभवो न भवति किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येति संबन्धः। स्वकीयं क्षात्रधर्ममनुसंधाय ततश्चलनं परिहर्तव्यमित्यर्थः। यद्धि क्षत्रियस्य धर्मादनपेतं श्रेयःसाधनं तदेव मयानुवर्तितव्यमित्याशङ्क्याह   धर्मादिति।  जातिप्रयुक्तं स्वाभाविकं स्वधर्ममेव विशिनष्टि    क्षत्रियस्येति।  पुनर्नकारोपादानमन्वयार्थम्। प्रचलितुमयोग्यत्वे प्रतियोगिनं दर्शयति   स्वाभाविकादिति।  स्वाभाविकत्वमशास्त्रीयत्वमिति शङ्कां वारयितुं तात्पर्यमाह   आत्मेति।  आत्मनः स्वस्यार्जुनस्य स्वाभाव्यं क्षत्रियस्वभावप्रयुक्तं वर्णाश्रमोचितं कर्म तस्मादित्यर्थः। धर्मार्थं प्रजापरिपालनार्थं च प्रयतमानस्य युद्धादुपरिरंसा श्रद्धातव्येत्याशङ्क्याह   तच्चेति।  ततोऽपि श्रेयस्करं किंचिदनुष्ठातुं युद्धादुपरतिरुचितेत्याशङ्क्याह   तस्मादिति।  तस्माद्युद्धात्प्रचलनमनुचितमिति शेषः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.31।। अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।",
        "hc": "।।2.31।। व्याख्या -- [पहले दो श्लोकोंमें युद्धसे होनेवाले लाभका वर्णन करते हैं।]       'स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि'-- यह स्वयं परमात्माका अंश है। जब यह शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब यह 'स्व' को अर्थात् अपने-आपको जो कुछ मानता है, उसका कर्तव्य 'स्वधर्म' कहलाता है। जैसे, कोई अपने-आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र मानता है, तो अपने-अपने वर्णोचित कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपने को शिक्षक या नौकर मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या किसीका पुत्र मानता है, तो पुत्र या पिताके प्रति किये जानेवाले कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है।   यहाँ क्षत्रियके कर्तव्य-कर्मको 'धर्म' नामसे कहा गया है  (टिप्पणी प0 71.2) । क्षत्रियका खास कर्तव्य-कर्म है--युद्धसे विमुख न होना। अर्जुन क्षत्रिय हैं; अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि अगर स्वधर्मको लेकर देखा जाय तो भी क्षात्रधर्मके अनुसार तुम्हारे लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अपने कर्तव्यसे तुम्हें कभी विमुख नहीं होना चाहिये।\n  'धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते'-- धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है अर्थात् क्षत्रियके लिये क्षत्रियके कर्तव्यका अनुष्ठान करना ही खास काम है (गीता 18। 43)। [ऐसे ही ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रके लिये भी अपने-अपने कर्तव्यका अनुष्ठान करनेके सिवाय दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।]\nअर्जुनने सातवें श्लोकमें प्रार्थना की थी कि आप मेरे लिये निश्चित श्रेयकी बात कहिये। उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि श्रेय (कल्याण) तो अपने धर्मका पालन करनेसे ही होगा। किसी भी दृष्टिसे अपने धर्मका त्याग कल्याणकारक नहीं है। अतः तुम्हें अपने युद्धरूप धर्मसे विमुख नहीं होना चाहिये।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।2.31।।अपि च इदं प्रारब्धं युद्धं प्राणिमारणम् अपि अग्नीषोमीयादिवत्  स्वधर्मम् अवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि धर्म्यात्  न्यायतः प्रवृत्तात्  युद्धाद् अन्यत् न हि क्षत्रियस्य श्रेयो विद्यते। शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।(गीता 18।43) इति हि वक्ष्यते।अग्नीषोमीयादिषु च न हिंसा पशोः निहीनतरच्छागादिदेहपरित्यागपूर्वककल्याणदेहस्वर्गादिप्रापकत्वश्रुतेः संज्ञपनस्य।न वा उ वेतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः। यत्र यान्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु (यजुर्वेद 4।6।9।43) इति हि श्रूयते।इह च युद्धे मृतानां कल्याणतरदेहादिप्राप्तिः उक्ता वासांसि जीर्णानि (गीता 2।22) इत्यादिना। अतः चिकित्सककर्म आतुरस्थ इव अस्य रक्षणम् एव अग्नीषोमीयादिषु संज्ञपनम्।",
        "et": "2.31 Further, even though there is killing of life in this war which has begun, it is not fit for you to waver, considering your own duty, as in the Agnisomiya and other sacrifices involving slaughter. To a Ksatriya, there is no greater good than a righteous war, begun for a just cause. It will be declared in the Gita:  'Valour, non-defeat (by the enemies), fortitude, adroitness and also not fleeing from battle, generosity, lordliness - these are the duties of the Ksatriya born of his very nature.' (18.43).\n\nIn Agnisomiya etc., no injury is caused to the animal to be immolated; for, according to the Vedic Text, the victim, a he-goat, after abandoning an inferior body, will attain heaven etc., with a beautiful body. The Text pertaining to immolation declares:  'O animal, by this (immolation) you will never die, you are not destroyed. You will pass through happy paths to the realm of the gods, where the virtuous only reach and not the sinful. May the god Savitr give you a proper place.' (Yaj. 4.6.9.46). Likewise the attainment of more beautiful bodies by those who die here in this war has been declared in the Gita, 'As a man casts off worn-out garments and takes others that are new ৷৷.' (2.22). Hence, just as lancing and such other operations of a surgeon are for curing a patient, the immolation of the sacrificial animal in the Agnisomiya etc., is only for its good."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।2.31।।देहीति।  अतो नित्यमात्मनोऽविनाशित्वम्।",
        "et": "2.31 Sva-Dharmam etc. Because one's duty cannot be avoided, wavering with regard to fighting the war is not proper [on the part of Arjuna]."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.31।।यहाँ यह कहा गया कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक या मोह करना नहीं बन सकता।  केवल इतना ही नहीं कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक और मोह नहीं बन सकते किंतु    क्षत्रियके लिये जो युद्धरूप स्वधर्म है उसे देखकर भी तुझे कम्पित होना उचित नहीं है अभिप्राय यह कि अपने स्वाभाविक धर्मसे विचलित होना ( हटना ) भी तुझे उचित नहीं है।  क्योंकि वह युद्ध पृथ्वीविजयद्वारा धर्मपालन और प्रजारक्षणके लिये किया जाता है इसलिये धर्मसे ओतप्रोत परम धर्म्य है अतः उस धर्ममय युद्धके सिवा दूसरा कुछ क्षत्रियके लिये कल्याणप्रद नहीं है।",
        "sc": "।।2.31।।  स्वधर्ममपि स्वो धर्मः क्षत्रियस्य युद्धं तमपि अवेक्ष्य त्वं न विकम्पितुं प्रचलितुम् नार्हसि क्षत्रियस्य स्वाभाविकाद्धर्मात् आत्मस्वाभाव्यादित्यभिप्रायः। तच्च युद्धं पृथिवीजयद्वारेण धर्मार्थं प्रजारक्षणार्थं चेति धर्मादनपेतं परं धर्म्यम्। तस्मात् धर्म्यात् युद्धात् श्रेयः अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते हि यस्मात्।।कुतश्च तत् युद्धं कर्तव्यमिति उच्यते",
        "et": "2.31 Api, even; aveksya, considering; svadharmam, your own duty, the duty of a Ksatriya, viz battle  considering even that  ; na arhasi, you ought not; vikampitum, to waver, to deviate from the natural duty of the Ksatriya, i.e. from what is natural to yourself. And hi, since that battle is not devoid of righteousness, (but) is supremely righteous  it being conducive to virtue and meant for protection of subjects through conest of the earth ; therefore, na vidyate, there is nothing; anyat, else; sreyah, better; ksatriyasya, for a ksatriya; than that dharmyat, righteous; yuddhat, battle."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।2.31।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।2.31।।किञ्च यदुक्तंवेपथुश्च शरीर मे 1।29 इत्यादिधर्मविरुद्धमात्मलक्षमं तदप्ययुक्तमित्याह  स्वधर्ममिति। धर्मनिष्ठस्य नैतदुचितमित्याह  धर्म्यादिति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।2.31।।तदेवं स्थूलसूक्ष्मशरीरद्वयतत्कारणाविद्याख्योपाधित्रयाविवेकेन मिथ्याभूतस्यापि संसारस्य सत्यत्वात्मधर्मत्वादिप्रतिभासरूपं सर्वप्राणिसाधारणमर्जुनस्य भ्रमं निराकर्तुमुपाधित्रयविवेकेनात्मस्वरूपमभिहितवान्। संप्रति युद्धाख्ये स्वधर्मे हिंसादिबाहुल्येनाधर्मत्वप्रतिभासरूपमर्जुनस्यैव करुणादिदोषनिबन्धनमसाधारणं भ्रमं निराकर्तुं हिंसादिमत्त्वेऽपि युद्धस्य स्वधर्मत्वेनाधर्मत्वाभावं बोधयति भगवान्  न केवलं परमार्थतत्त्वमेवावेक्ष्य किंतु स्वधर्ममपि क्षत्रियधर्ममपि युद्धापराङगमुखत्वरूपमवेक्ष्य शास्त्रतः पर्यालोच्य विकम्पितुं विचलितुं धर्मादावधर्मत्वभ्रान्त्या निवर्तितुं नार्हसि। तत्रैवं सतियद्यप्येते न पश्यन्ति इत्यादिनानरके नियतं वासो भवति इत्यन्तेन युद्धस्य पापहेतुत्वं त्वया यदुक्तंकथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादिना गुरुवधब्रह्मवधाद्यकरणं यदभिसंहितं तत्सर्वं धर्मशास्त्रापर्यालोचनादेवोक्तम्। कस्मात्। हि यस्मात् धर्म्यादपराङ्मुखत्वधर्मादनपेताद्युद्धादन्यत्क्षत्रियस्य श्रेयः श्रेयःसाधनं न विद्यते। युद्धमेव हि पृथिवीजयद्वारेण प्रजारक्षणब्राह्मणशुश्रूषादिक्षात्रधर्मनिर्वाहकमिति तदेव क्षत्रियस्य प्रशस्ततरमित्यभिप्रायः। तथाचोक्तं पराशरेण  क्षत्रियो हि प्रजा रक्षञ्शस्त्रपाणिः प्रदण्डवान्। निर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत्।। मनुनापि  समोत्तमाधमै राजा चाहूतः पालयन्प्रजाः। न निवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन्।।संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम्। शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञः श्रेयस्करं परम्।। इत्यादिना। राजशब्दश्च क्षत्रियजातिमात्रवाचीति स्थितमवेष्ट्यधिकरणे। तेन भूमिपालस्यैवायं धर्म इति न भ्रमितव्यम्। उदाहृतवचनेऽपि क्षत्रियो हीति क्षात्रं धर्ममिति च स्पष्टं लिङ्गम्। तस्मात्क्षत्रियस्य युद्धं प्रशस्तो धर्म इति साधु भगवताभिहितम्अपशवोऽन्ये गोअश्वेभ्यः पशवो गोअश्वाः इतिवत्प्रशंसालक्षणया युद्धादन्यच्छ्रेयःसाधनं न विद्यत इत्युक्तमिति न दोषः। एतेन युद्धात्प्रशस्ततरं किंचिदनुष्ठातुं ततो निवृत्तिरुचितेति निरस्तम्न च श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे इत्येतदपि।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।2.31।।यच्चोक्तमर्जुनेनवेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते इति तदप्ययुक्तमित्याह   स्वधर्ममिति।  आत्मनो नाशाभावादेवैतेषां हननेऽपि विकम्पितुं नार्हसि। किंच स्वधर्ममप्यवेक्ष्य विकम्पितुं नार्हसीति संबन्धः। यच्चोक्तंन च श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे इत्यादि तत्राह   धर्म्यादिति।  धर्मादनपेतान्न्याय्याद्युद्धादन्यत्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.31।।   इत्थमात्मतत्त्वापेक्षायां शोकमोहौ न संभवत् इत्युक्तम्। न केवलमात्मतत्त्वापेक्षायामेव किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येत्याह   स्वधर्ममपीति।  यत्तु कैश्चित्सर्वप्राणिसाधारणं भ्रमं निराकृत्यार्जुनस्यैवासाधारणं भ्रमं निराकरोतीत्युक्तं तत्पूर्वोक्तयुक्त्या निरसनीयम्। स्वधर्मं क्षत्रियस्य धर्मयुद्धं धर्मशास्त्रादवेक्ष्य विचार्य शोकमोहाभिभूतः स्वधर्माच्चालितुं नार्हसि। यस्मात्पृथिवीजयद्वारा युद्धस्य यज्ञादिधर्मार्थत्वेन ब्राह्मणादिप्रजारक्षणार्थत्वेन च धर्मादनपेताद्युद्धादन्यच्छ्रेयःसाधनं युद्धसदृशं क्षत्रियस्य न भवतीत्यर्थः। अतो मोक्षरुपश्रेयोर्थिनो ते युद्धेन स्वधर्मेणं जयं लब्ध्वा यज्ञाद्यनुष्ठानप्रजापालनादिभ्योऽन्यत्तत्साधनं न भवतीत्याशयः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।2.31।।अथस्वधर्मम् इत्यादिनामरणादतिरिच्यते 2।34 इत्यन्तेन धर्माधर्मधीरपोद्यते।अपिचेति समुच्चेतव्यहेत्वन्तरपरप्रकरणभेदद्योतनार्थः।धर्म्याद्धि युद्धात् इति वाक्यशेषप्रदर्शितंस्वधर्मम् इत्यस्य विशेष्यमाह  इदं युद्धमिति। स्वो धर्मः स्वस्य वा धर्मः स्वधर्मः।विकम्पितुं इत्येतत्सामर्थ्यसिद्धमुक्तंप्रारब्धमिति। अधर्मधीहेतुं सामान्यनिषेधमनुवदतिप्राणिमारणमपीति। प्रबलं विशेषशास्त्रं निषेधशास्त्रात् निषेधस्याप्रसक्तिं वा स्मारयति  अग्नीषोमीयादिवदिति। धर्मयुद्धव्यतिरिक्तस्य कस्यचिदन्यस्य श्रेयसः क्षत्ित्रये स्वरूपनिषेधभ्रमं व्युदरयन् क्षत्ित्रयस्य प्रशस्यतरं धर्म्ययुद्धादन्यन्नास्तीत्येतदर्थमन्वयमाह  धर्म्यादिति। धर्म्यत्वं धर्मादनपेतत्वम्। तद्धेतुर्न्यायतः प्रवृत्तत्वम्। तच्च निरायुधनिवृत्तशरणागतादिषु शस्त्रप्रयोगाद्यभावात्।हिशब्दसूचितं वक्ष्यमाणमाह  शौर्यमिति। ननुअग्नीषोमीयादिवत् इत्येतदेव न सम्प्रतिपन्नं तस्यापि हिंसात्वेन अधर्मत्वस्यावर्जनीयत्वात् न च निषिद्धत्वमुपाधिःन हिंस्यात् मनुः4।162 इति सामान्यनिषेधेन तस्य साधनव्यापकत्वात्। नापि विहितेतरत्वमुपाधिः अविहिताप्रतिषिद्धेष्वपि तस्य विद्यमानत्वेन साध्यव्यभिचारात्। न च साध्यसमव्याप्तत्वाभिप्रायेण सामान्यनिषेधो विशेषविधिवाक्यविरोधात्सङ्कुचितविषयः सङ्कोचहेतोर्विरोधस्यैवाभावात् सामान्यविशेषवाक्ययोः प्रत्यवायक्रतुसाधनत्वपरत्वादेकस्यैव क्रतुप्रत्यवायसाधनत्वाविरोधात्। न च प्रत्यवायसाधनं न विधीयेत इति वाच्यम् हरीतकीभक्षणादिष्विव क्रत्वनुप्रविष्टप्रायश्चित्तार्हहिंसासाध्यदुःखस्याल्पतया क्रतुसाध्यसुखस्य च भूयस्तया तदुपपत्तेः। उक्तं च साङ्ख्यैः  सा (हिंसा) हि पुरुषस्य दोषमावक्ष्यति क्रतोश्चोपकरिष्यति इत्यादि। आह च पञ्चशिखाचार्यः  स्वल्पःसङ्करःसुपरिहरःसप्रत्यवमर्शः इति। अतोऽग्नीषोमीयवदित्यसिद्धस्यासिद्धमेव निदर्शनमुक्तमित्यत्राह  अग्नीषोमीयादिषु चेति। अधर्मसाधको हिंसात्वहेतुरसिद्धः। उपाधिश्च न पक्षव्यापकः पक्षस्याहिंसारूपत्वात् तत एव निषेधाभावाच्चेति भावः। अहिंसात्वमेवोपपादयति  निहीनतरेति। अनर्थप्रापकव्यापारत्वं हिंसालक्षणम्। अत्र तु तद्विपरीतत्वेन रक्षणत्वमेव युक्तमिति मन्त्रलिङ्गेन ज्ञापयति  न वा इति। एतदिति क्रियाविशेषणम्। सुगेभिः सुगैरित्यर्थः। पिष्टपश्वादिविधिस्तु कार्तयुगधर्मनिष्ठाधिकारिविशेषनियतःपशुयज्ञैः कथं हिंस्त्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति म.भा.12।175।33 इत्यादिवचनाच्चेति भावः।अस्त्वग्नीषोमीयादौ श्रुतिबलादहिंसात्वम् इह तु कथमित्यत्राह  इह चेति। अयमप्यर्थः श्रुतिस्मृतिसिद्ध इति भावः। ननुअहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः इत्यादिनाऽग्नीषोमीयादेरन्यस्य हिंसात्वं प्रतीयते अन्यथाऽन्यत्रेति तद्व्यवच्छेदानुपपत्तेरित्यत्राह  अत इति।अयमभिप्रायः  न तावदिह दुःखजननमात्रं हिंसा रक्षणरूपेषु चिकित्सकशल्यप्रयोगादिष्वपि प्रसङ्गात् नापि प्राणवियोजनमात्रम् अतद्रूपेषु सर्वस्वहरणनरकपीडादिषु हिंसाशब्दप्रयोगदर्शनात्। न चायमुपचारः नियामकाभावात् विपरिवर्तस्यापि दुर्वारत्वात्। अतोऽनर्थपर्यवसितस्तादात्विकदुःखजनको व्यापारो हिंसेत्येव तत्त्वम्  इति। ततश्चअन्यत्र तीर्थेभ्यः इत्येतत्पश्वादेर्भाविपुरुषार्थविशेषानभिज्ञपामरदृष्ट्योक्तम्। तस्मिन्नपि वाक्ये हिंसात्वं नास्तीत्येव तात्पर्यम्। उक्तं च मनुना  तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः 5।39 इति। तत्रापिवधः इति पामरदृष्ट्याऽनुवादः।अवधः इति तत्त्वकथनम्। यद्यपि क्रत्वनुप्रविष्टानां सोमोच्छिष्टभक्षणप्रभृतीनां हिंसालक्षणवत्तल्लक्षणान्तरेण व्यवच्छेदः शक्यः तथापि तेषां प्रत्यवायानाधायकवचनबलादेव तथात्वमङ्गीकुर्मः न पुनः क्रत्वर्थतया विधानमात्रेण। नन्वेवमुत्सर्गापवादन्यायस्य कीदृशो विषयः तादृश एव यत्र निरवकाशविशेषवाक्यंविरोधादेव सावकाशसामान्यशब्दसङ्कोच इति निस्तरङ्गमेतत्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.31।।एवमात्मस्वरूपज्ञानेन शोको न कर्त्तव्य इत्युक्त्वा स्वधर्मादपि मा शुच इत्याह  स्वधर्ममपीति। स्वधर्म क्षात्त्रमवेक्ष्य विकम्पितुं नार्हसि यतः क्षत्ित्रयाणामयमेवोत्तमो धर्म इत्याह  धर्म्यादिति। धर्म्याद्युद्धादन्यत् क्षत्ित्रयस्य श्रेयो न विद्यते। क्षत्ित्रयाणां परलोकादिकं त्वनेनैव भवति।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.31।।अर्जुनस्य अनात्मनि देहे आत्मधीरूपो मोहो निवारितः। इदानीं स्वधर्मे युद्धे अधर्मधीरूपं मोहं निवारयति   स्वधर्ममपीत्यादिना।  युद्धं क्षत्रियस्य स्वो धर्मः तमवेक्ष्यापि विकम्पितुं चलितुं नार्हसि। हि यस्मात् धर्म्यात् धर्मादनपेताद्युद्धादन्यत् क्षत्रियस्य श्रेयः प्रशस्ततरं नास्ति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Considering your specific duty as a kṣatriya, you should know that there is no better engagement for you than fighting on religious principles; and so there is no need for hesitation.",
        "ec": " Out of the four orders of social administration, the second order, for the matter of good administration, is called kṣatriya. Kṣat means hurt. One who gives protection from harm is called kṣatriya ( trāyate – to give protection). The kṣatriyas are trained for killing in the forest. A kṣatriya would go into the forest and challenge a tiger face to face and fight with the tiger with his sword. When the tiger was killed, it would be offered the royal order of cremation. This system has been followed even up to the present day by the kṣatriya kings of Jaipur state. The kṣatriyas are specially trained for challenging and killing because religious violence is sometimes a necessary factor. Therefore, kṣatriyas are never meant for accepting directly the order of sannyāsa, or renunciation. Nonviolence in politics may be a diplomacy, but it is never a factor or principle. In the religious law books it is stated: āhaveṣu mitho ’nyonyaṁ jighāṁsanto mahī-kṣitaḥ yuddhamānāḥ paraṁ śaktyā svargaṁ yānty aparāṅ-mukhāḥ yajñeṣu paśavo brahman hanyante satataṁ dvijaiḥ saṁskṛtāḥ kila mantraiś ca te ’pi svargam avāpnuvan “In the battlefield, a king or kṣatriya, while fighting another king envious of him, is eligible for achieving the heavenly planets after death, as the brāhmaṇas also attain the heavenly planets by sacrificing animals in the sacrificial fire.” Therefore, killing on the battlefield on religious principles and killing animals in the sacrificial fire are not at all considered to be acts of violence, because everyone is benefited by the religious principles involved. The animal sacrificed gets a human life immediately without undergoing the gradual evolutionary process from one form to another, and the kṣatriyas killed on the battlefield also attain the heavenly planets, as do the brāhmaṇas who attain them by offering sacrifice. There are two kinds of sva-dharmas, specific duties. As long as one is not liberated, one has to perform the duties of his particular body in accordance with religious principles in order to achieve liberation. When one is liberated, one’s sva-dharma – specific duty – becomes spiritual and is not in the material bodily concept. In the bodily conception of life there are specific duties for the brāhmaṇas and kṣatriyas respectively, and such duties are unavoidable. Sva-dharma is ordained by the Lord, and this will be clarified in the Fourth Chapter. On the bodily plane sva-dharma is called varṇāśrama-dharma, or man’s steppingstone for spiritual understanding. Human civilization begins from the stage of varṇāśrama-dharma, or specific duties in terms of the specific modes of nature of the body obtained. Discharging one’s specific duty in any field of action in accordance with the orders of higher authorities serves to elevate one to a higher status of life."
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