{
    "_id": "BG2.20",
    "chapter": 2,
    "verse": 20,
    "slok": "न जायते म्रियते वा कदाचिन्\nनायं भूत्वा भविता वा न भूयः |\nअजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो\nन हन्यते हन्यमाने शरीरे ||२-२०||",
    "transliteration": "na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ .\najo nityaḥ śāśvato.ayaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||2-20||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है,  शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.20 It is not born, nor does It ever die; after having been, It again ceases not to be; unborn, eternal, changeless and ancient, It is not killed when the body is killed.",
        "ec": "2.20 न not? जायते is born? म्रियते dies? वा or? कदाचित् at any time? न not? अयम् this (Self)? भूत्वा having been? भविता will be? वा or? न not? भूयः (any) more? अजः unborn? नित्यः eternal? शाश्वतः changeless? अयम् this? पुराणः ancient? न not? हन्यते is killed? हन्यमाने being killed? शरीरे in body.Commentary This Self (Atman) is destitute of the six types of transformation or BhavaVikaras such as birth? existence? growth? transformation? decline and death. As It is indivisible (Akhanda). It does not diminish in size. It neither grows nor does It decline. It is ever the same. Birth and death are for the physical body only. Birth and death cannot touch the immortal? allpervading Self."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.20 It was not born; It will never die, nor once having been, can It cease to be. Unborn, Eternal, Ever-enduring, yet Most Ancient, the Spirit dies not when the body is dead."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.20।। इस श्लोक में बताया गया है कि शरीर में होने वाले समस्त विकारों से आत्मा परे है। जन्म अस्तित्व वृद्धि विकार क्षय और नाश ये छ प्रकार के परिर्वतन शरीर में होते हैं जिनके कारण जीव को कष्ट भोगना पड़ता है। एक र्मत्य शरीर के लिये इन समस्त दुख के कारणों का आत्मा के लिये निषेध किया गया है अर्थात् आत्मा इन विकारों से सर्वथा मुक्त है।शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश। जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अत यहाँ कहा है कि आत्मा अज और नित्य है।आत्मा में क्रिया के कर्तृत्व और विषयत्व का निषेध तथा उसके बाद तर्क के द्वारा उसके अविकारत्व को सिद्ध करने के बाद भगवान् इस विषय का उपसंहार करते हुये कहते हैं"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.20. This is neither born; nor ever dies; nor, having not been at one time, will This come to be again.  This is unborn, destructionless,  eternal and ancient and is not slain [even]  when the body is slain."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.20 It (the self) is never born; It never dies; having come into being once, It never ceases to be. Unborn, eternal, abiding and primeval, It is not slain when the body is slain."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.20 Never is this One born, and never does It die; nor is it that having come to exist, It will again cease to be. This One is birthless, eternal, undecaying, ancient; It is not killed when the body is killed."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।2.20।।अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह  न जायत इति। नचेश्वरज्ञानवद्भूत्वा भविता। तद्धि तदैक्षत छां.उ.6।2।3देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः। अविलुप्तावबोधात्मा इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम्। कुतः अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात्। शाश्वतः सदेकरूपः। पुरं देहमणतीति पुराणः। तथापि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।2.20।।तदेव साधयितुं न जायते म्रियते वा विपश्चिदित्यादिमन्त्रान्तरमवतारयति   कथमिति।  सर्वविक्रियाराहित्यप्रदर्शनेन हेतुं विशदयन्मन्त्रमेव पठति   न जायत इति।  जन्ममरणविक्रियाद्वयप्रतिषेधं साधयति   नायमिति।  अयमात्मा भूत्वा नाभविता न वा भूत्वा भूयो भवितेति योजना। न केवलं विक्रियाद्वयमेवात्र निषिध्यते किंतु सर्वमेव विक्रियाजातमित्याह   अज इति।  वाच्यमर्थमुक्त्वा विवक्षितमर्थमाह   जनिलक्षणेति।  विकल्पार्थत्वं व्यावर्तयति   वेति।  निष्पन्नमर्थं निर्दिशति   नेत्यादिना।  संबन्धमेवाभिनयति   न   कदाचिदिति।  अन्त्यविक्रियाभावे हेतुत्वेन नायमित्यादि व्याचष्टे   यस्मादिति।  उक्तमेव व्यनक्ति   यो हीति।  आत्मनि तु भूत्वा पुनर्भवनाभावान्नास्ति मृत्युरित्यर्थः। आत्मनो जन्माभावेऽपि हेतुरिहैव विवक्षित इत्याह   वाशब्दादिति।  अभूत्वेति च्छेदः। देहवदिति व्यतिरेकोदाहरणम्। उक्तमेवार्थं साधयति   यो हीति।  जन्माभावे तत्पूर्विकास्तित्वविक्रियापि नात्मनोऽस्तीत्याह   यस्मादिति।  प्राणवियोगादात्मनो मृतेरभावे सावशेषनाशाभाववन्निरवशेषनाशाभावोऽपि सिध्यतीत्याह   यस्मादिति।  ननुजन्मनाशयोर्निषेधे तदन्तर्गतानां विक्रियान्तराणामपि निषेधसिद्धेस्तन्निषेधार्थं न पृथक्प्रयतितव्यमिति तत्राह   यद्यपीति।  स्वशब्दैः मध्यवर्तिविक्रियानिषेधवाचकैरिति यावत्। आर्थिकेऽपि निषेधे निषेधस्य सिद्धतया शाब्दो निषेधो न पृथगर्थवानित्याशङ्क्याह   अनुक्तानामिति।  नित्यशब्देन शाश्वतशब्दस्य पौनरुक्त्यं परिहरन्व्याकरोति   शाश्वत इत्यादिना।  अपक्षयो हि स्वरूपेण वा स्याद्गुणापचयतो वेति विकल्प्य क्रमेण दूषयति   नेत्यादिना।  पुराणपदस्यागतार्थत्वं कथयति   अपक्षयेति।  तदेव स्फुटयति   यो हीति।  न म्रियते वेत्यनेन चतुर्थपादस्य पौनरुक्त्यमाशङ्क्य व्याचष्टे   तथेत्यादिना।  ननु हिंसार्थो हन्तिः श्रूयते तत्कथं विपरिणामो निषिध्यते तत्राह   हन्तिरिति।  हिंसार्थत्वसंभवे किमित्यर्थान्तरं हन्तेरिष्यते तत्राह   अपुनरुक्तताया   इति।  हिंसार्थत्वे मृतिनिषेधेन पौनरुक्त्यं स्यात्तन्निषेधार्थं विपरिणामार्थत्वमेष्टव्यमित्यर्थः। पूर्वावस्थात्यागेनावस्थान्तरापत्तिर्विपरिणामस्तदर्थश्चेदत्र हन्तिरिष्यते तदा निष्पन्नमर्थमाह   नेति।  न जायत इत्यादिमन्त्रार्थमुपसंहरति   अस्मिन्निति।  षण्णां विकाराणामात्मनि प्रतिषेधे फलितमाह   सर्वेति।  आत्मनः सर्वविक्रियाराहित्येऽपि किमायातमित्याशङ्क्याह   यस्मादिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.20।। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।",
        "hc": "2.20।। व्याख्या --[शरीरमें छः विकार होते हैं--उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना  (टिप्पणी प0 60.1) । यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है--यही बात भगवान् इस श्लोकमें बता रहे हैं]  (टिप्पणी प0 60.2) ।\n 'न जायते म्रियते वा कदाचिन्न'-- जैसे शरीर उत्पन्न होता है, ऐसे यह शरीरी कभी भी, किसी भी समयमें उत्पन्न नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवान्ने इस शरीरीको अपना अंश बताते हुए इसको 'सनातन' कहा है  'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः'  (15। 7)।यह शरीरी कभी मरता भी नहीं। मरता वही है, जो पैदा होता है, और  'म्रियते' का प्रयोग भी वहीं होता है, जहाँ पिण्ड-प्राणका वियोग होता है। पिण्ड-प्राणका वियोग शरीरमें होता है। परन्तु शरीरीमें संयोग-वियोग दोनों ही नहीं होते। यह ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसका मरना होता ही नहीं।\nसभी विकारोंमें जन्मना और मरना--ये दो विकार ही मुख्य हैं अतः भगवान्ने इनका दो बार निषेध किया है जिसको पहले  'न जायते' कहा उसीको दुबारा  अजः  कहा है और जिसको पहले  'न म्रियते'  कहा उसीको दुबारा  'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'  कहा है।\n 'अयं भूत्वा भविता वा न भूयः'--  यह अविनाशी नित्य-तत्त्व पैदा होकर फिर होनेवाला नहीं है अर्थात् यह स्वतःसिद्ध निर्विकार है। जैसे, बच्चा पैदा होता है, तो पैदा होनेके बाद उसकी सत्ता होती है। जबतक वह गर्भमें नहीं आता, तबतक 'बच्चा है' ऐसे उसकी सत्ता (होनापन) कोई भी नहीं कहता। तात्पर्य है कि बच्चेकी सत्ता पैदा होनेके बाद होती है; क्योंकि उस विकारी सत्ताका आदि और अन्त होता है। परन्तु इस नित्य-तत्त्वकी सत्ता स्वतःसिद्ध और निर्विकार है क्योंकि इस अविकारी सत्ताका आरम्भ और अन्त नहीं होता।\n 'अजः'--इस शरीरीका कभी जन्म नहीं होता। इसलिये यह  'अजः'-- अर्थात् जन्मरहित कहा गया है।\n 'नित्यः'-- यह शरीरी नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; अतः इसका कभी अपक्षय नहीं होता। अपक्षय तो अनित्य वस्तुमें होता है, जो कि निरन्तर रहनेवाली नहीं है। जैसे, आधी उम्र बीतनेपर शरीर घटने लगता है, बल क्षीण होने लगता है, इन्द्रियोंकी शक्ति कम होने लगती है। इस प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिका तो अपक्षय होता है, पर शरीरीका अपक्षय नहीं होता। इस नित्यह नित्य-तत्त्व निरन्तर एकरूप, एकरस रहनेवाला है। इसमें अवस्थाका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् यह कभी बदलता नहीं। इसमें बदलनेकी योग्यता है ही नहीं।\n 'पुराणः'--  यह अविनाशी तत्त्व पुराण (पुराना) अर्थात् अनादि है। यह इतना पुराना है कि यह कभी पैदा हुआ ही नहीं। उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें भी देखा जाता है कि जो वस्तु पुरानी हो जाती है, वह फिर बढ़ती नहीं, प्रत्युत नष्ट हो जाती है; फिर यह तो अनुत्पन्न तत्त्व है, इसमें बढ़नारूप विकार कैसे हो सकता है? तात्पर्य है कि बढ़नारूप विकार तो उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें ही होता है, इस नित्य-तत्त्वमें नहीं।\n 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'-- शरीरका नाश होनेपर भी इस अविनाशी शरीरीका नाश नहीं होता। यहाँ 'शरीरे' पद देनेका तात्पर्य है कि यह शरीर नष्ट होनेवाला है। इस नष्ट होनेवाले शरीरमें ही छः विकार होते हैं, शरीरीमें नहीं।\nइन पदोंमें भगवान्ने शरीर और शरीरीका जैसा स्पष्ट वर्णन किया है, ऐसा स्पष्ट वर्णन गीतामें दूसरी जगह नहीं आया है।\nअर्जुन युद्धमें कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे विशेष शोक कर रहे थे। उस शोकको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि शरीरके मरनेपर भी इस शरीरीका मरना नहीं होता अर्थात् इसका अभाव नहीं होता। इसलिये शोक करना अनुचित है। सम्बन्ध-- उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि यह शरीरी न तो मारता है और न मरता ही है। इसमें मरनेका निषेध तो बीसवें श्लोकमें कर दिया, अब मारनेका निषेध करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।2.20।।उक्तैः एव हेतुभिः नित्यत्वाद् अपरिणामित्वाद् आत्मनो जन्ममरणादयः सर्व एव अचेतनदेहधर्मा न सन्ति इति उच्यते।तत्र  न जायते म्रियत  इति वर्तमानतया सर्वेषु देहेषु सर्वैः अनुभूयमाने जन्ममरणे  कदाचिद्  अपि आत्मानं न स्पृशतः।  नायं भूत्वा भवति वा न भूयः  अयं कल्पादौ भूत्वा भूयः कल्पान्ते च न भविता इति न। केषुचित् प्रजापतिप्रभृतिदेहेषु आगमेन उपलभ्यमानं कल्पादौ जननं कल्पान्ते च मरणम् आत्मानं न स्पृशति इत्यर्थः।अतः सर्व देहगत आत्मा  अजः  अत एव  नित्यः   शाश्वतः  प्रकृतिवदविशदसततपरिणामैः अपि न अन्वीयते। अतः पुराणः पुरातनः अपि नवः सर्वदा अपूर्ववद् अनुभाव्य इत्यर्थः। अतः  शरीरे हन्यमाने  अपि  न हन्यते अयम्  आत्मा।",
        "et": "2.20 As the self is eternal for the reasons mentioned (above), and hence free from modifications, it is said that all the attributes of the insentient (body) like birth, death etc., never touch the self. In this connection, as the statement, 'It is never born, It never dies' is in the present tense, it should be understood that the birth and death which are experienced by all in all bodies, do not touch the self. The statement 'Having come into being once, It never ceases to be' means that this self, having emerged at the beginning of a Kalpa (one aeon of manifestation) will not cease to be at the end of the Kalpa (i.e., will emerge again at the beginning of the next Kalpa unless It is liberated). This is the meaning - that birth at the beginning of a Kalpa in bodies such as those of Brahman and others, and death at the end of a Kalpa as stated in the scriptures, do not touch the self. Hence, the selves in all bodies, are unborn, and therefore eternal. It is abiding, not connected, like matter, with invisible modifications taking place. It is primeval; the meaning is that It existed from time immemorial; It is even new i.e., It is capable of being experienced always as fresh. Therefore, when the body is slain the self is not slain."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।2.20।।य एनमिति।  एनमात्मानं देहं च यो हन्तारं हतं च वेत्ति तस्याज्ञानम्।  अत एव स बद्धः ( S सम्बन्धः)।",
        "et": "2.20  Na jayate etc.  Having not been at one time, This etc. :  this Self will come to be, having not been at any time non-existent, but only having been  existent.  Therefore This is not born, This does not die too.  For, having been [at one time], This will never be non-existent [at another time];  but certainly This will be [always] existent."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.20।।आत्मा निर्विकार कैसे है  इसपर दूसरा मन्त्र ( इस प्रकार है )    यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता अर्थात् उत्पत्तिरूप वस्तुविकार आत्मामें नहीं होता और यह मरता भी नहीं।   वा शब्द यहाँ च के अर्थमें है।  मरता भी नहीं इस कथनसे विनाशरूप अन्तिम विकारका प्रतिषेध किया जाता है।  कदाचित् शब्द सभी विकारोंके प्रतिषेधके साथ सम्बन्ध रखता है।  जैसे यह आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है इत्यादि।  जिससे कि यह आत्मा उत्पन्न होकर अर्थात् उत्पत्तिरूप विकारका अनुभव करके फिर अभावको प्राप्त होनेवाला नहीं है इसलिये मरता नहीं क्योंकि जो उत्पन्न होकर फिर नहीं रहता वह मरता है इस प्रकार लोकमें कहा जाता है। वा शब्दसे और न शब्दसे यह भी पाया जाता है कि यह आत्मा शरीरकी भाँति पहले न होकर फिर होनेवाला नहीं है इसलिये यह जन्मता नहीं क्योंकि जो न होकर फिर होता है वहीं जन्मता है यह कहा जाता है।  आत्मा ऐसा नहीं है इसलिये नहीं जन्मता।  ऐसा होनेके कारण आत्मा अज है और मरता नहीं इसलिये नित्य है।  यद्यपि आदि और अन्तके दो विकारोंके प्रतिषेधसे ( बीचके ) सभी विकारोंका प्रतिषेध हो जाता है तो भी बीचमें होनेवाले विकारोंका भी उनउन विकारोंके प्रतिषेधार्थक खासखास शब्दोंद्वारा प्रतिषेध करना उचित है।  इसलिये ऊपर न कहे हुए जो यौवनादि सब विकार हैं उनका भी जिस प्रकार प्रतिषेध हो ऐसे भावको    शाश्वत इत्यादि शब्दोंसे कहते हैं    सदा रहनेवालेका नाम शाश्वत है शाश्वत शब्दसे अपक्षय ( क्षय होना ) रूप विकारका प्रतिषेध किया जाता है क्योंकि आत्मा अवयवरहित है इस कारण स्वरूपसे उसका क्षय नहीं होता और निर्गुण होनेके कारण गुणोंके क्षयसे भी उसका क्षय नहीं होता।  पुराण  इस शब्दसे अपक्षयके विपरीत जो वृद्धिरूप विकार है उसका भी प्रतिषेध किया जाता है।  जो पदार्थ किसी अवयवकी उत्पत्तिसे पुष्ट होता है।  वह बढ़ता है नया हुआ है ऐसे कहा जाता है परंतु यह आत्मा तो अवयवरहित होनेके कारण पहले भी नया था अतः पुराण है अर्थात् बढ़ता नहीं।  तथा शरीरका नाश होनेपर यानी विपरीत परिणामको प्राप्त हो जानेपर भी आत्मा नष्ट नहीं होता अर्थात् दुर्बलतादि अवस्थाको प्राप्त नहीं होता।  यहाँ हन्ति क्रियाका अर्थ पुनरुक्तिदोषसे बचनेके लिये विपरीत परिणाम समझना चाहिये इसलिये यह अर्थ हुआ कि आत्मा अपने स्वरूपसे बदलता नहीं।  इस मन्त्रमें लौकिक वस्तुओंमें होनेवाले छः भावविकारोंका आत्मामें अभाव दिखलाया जाता है।  आत्मा सब प्रकारके विकारोंसे रहित है यह इस मन्त्रका वाक्यार्थ है।  ऐसा होनेके कारण वे दोनों ही ( आत्मस्वरूपको ) नहीं जानते।  इस प्रकार पूर्व मन्त्रसे इसका सम्बन्ध है।",
        "sc": "।।2.20।।   न जायते  न उत्पद्यते जनिलक्षणा वस्तुविक्रिया न आत्मनो विद्यते इत्यर्थः। तथा  न म्रियते वा । वाशब्दः चार्थे। न म्रियते च इति अन्त्या विनाशलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते।  कदाचिच्छ ब्दः सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः संबध्यते  न कदाचित् जायते न कदाचित् म्रियते इत्येवम्। यस्मात्  अयम्  आत्मा  भूत्वा  भवनक्रियामनुभूय पश्चात्  अभविता  अभावं गन्ता  न भूयः  पुनः तस्मात् न म्रियते। यो हि भूत्वा न भविता स म्रियत इत्युच्यते लोके। वाशब्दात् न शब्दाच्च अयमात्मा अभूत्वा वा भविता देहवत् न भूयः। तस्मात् न जायते। यो हि अभूत्वा भविता स जायत इत्युच्यते। नैवमात्मा। अतो न जायते। यस्मादेवं तस्मात्  अजः  यस्मात् न म्रियते तस्मात्  नित्य श्च। यद्यपि आद्यन्तयोर्विक्रिययोः प्रतिषेधे सर्वा विक्रियाः प्रतिषिद्धा भवन्ति तथापि मध्यभाविनीनां विक्रियाणां स्वशब्दैरेव प्रतिषेधः कर्तव्यः अनुक्तानामपि यौवनादिसमस्तविक्रियाणां प्रतिषेधो यथा स्यात् इत्याह   शाश्वत  इत्यादिना। शाश्वत इति अपक्षयलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते। शश्वद्भवः शाश्वतः। न अपक्षीयते स्वरूपेण निरवयवत्वात्। नापि गुणक्षयेण अपक्षयः निर्गुणत्वात्। अपक्षयविपरीतापि वृद्धिलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते  पुराण इति। यो हि अवयवागमेन उपचीयते स वर्धते अभिनव इति च उच्यते।  अयं  तु आत्मा निरवयवत्वात् पुरापि नव एवेति  पुराणः  न वर्धते इत्यर्थः। तथा  न हन्यते । हन्तिः अत्र विपरिणामार्थे द्रष्टव्यः अपुनरुक्ततायै। न विपरिणम्यते इत्यर्थः। हन्यमाने  विपरिणम्यमानेऽपि  शरीरे । अस्मिन् मन्त्रे षड् भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मा इति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मात् उभौ तौ न विजानीतः  इति पूर्वेण मन्त्रेण अस्य संबन्धः।।य एनं वेत्ति हन्तारम् इत्यनेन मन्त्रेण हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति इति प्रतिज्ञाय न जायते इत्यनेन अविक्रियत्वं हेतुमुक्त्वा प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति",
        "et": "2.20 Na kadacit, neverl; is ayam, this One; jayate, born i.e. the Self has no change in the form of being born  to which matter is subject ; va, and ( va is used in the sense of and); na mriyate, It never dies. By this is denied the final change in the form of destruction. The word (na) kadacit), never, is connected with the denial of all kinds of changes thus  never, is It born never does It die, and so on. Since ayam, this Self; bhutva, having come to exist, having experienced the process of origination; na, will not; bhuyah, again; abhavita, cease to be thereafter, therefore It does not die. For, in common parlance, that which ceases to exist after coming into being is said to die. From the use of the word va, nor, and na, it is understood that, unlike the body, this Self does not again come into existence after having been non-existent. Therefore It is not born. For, the words, 'It is born', are used with regard to something which comes into existence after having been non-existent. The Self is not like this. Therfore It is not born.\nSince this is so, therefore It is ajah, birthless; and since It does not die, therefore It is nityah, eternal. Although all changes become negated by the denial of the first and the last kinds of changes, still changes occuring in the middle [For the six kinds of changes see note under verse 2.10.-Tr.] should be denied with their own respective terms by which they are implied. Therefore the text says sasvatah, undecaying,. so that all the changes, viz youth etc., which have not been mentioned may become negated. The change in the form of decay is denied by the word sasvata, that which lasts for ever. In Its own nature It does not decay because It is free from parts. And again, since it is without alities, there is no degeneration owing to the decay of any ality. Change in the form of growth, which is opposed to decay, is also denied by the word puranah, ancient. A thing that grows by the addition of some parts is said to increase and is also said to be new. But this Self was fresh even in the past due to Its partlessness. Thus It is puranah, i.e. It does not grow. So also, na hanyate, It is puranah, i.e. It does not grow. So also, na hanyate, It is not killed, It does not get transformed; even when sarire, the body; hanyamane, is killed, transformed. The verb 'to kill' has to be understood here in the sense of transformation, so that a tautology [This verse has already mentioned 'death' in the first line. If the verb han, to kill, is also taken in the sense of killing, then a tautology is unavoidable.-Tr.] may be avoided.\nIn this mantra the six kinds of transformations, the material changes seen in the world, are denied in the Self. The meaning of the sentence is that the Self is devoid of all kinds of changes. Since this is so, therefore 'both of them do not know'  this is how the present mantra is connected to the earlier mantra."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।2.20।।तथापिन जायते इति पुनरुक्तमित्याशङ्क्य नेदं भगवद्वाक्यं किन्तूक्तार्थे सम्मतित्वेन मन्त्रवर्णोऽयमुदाह्रियत इत्याह   अत्रे ति। ननु जीवः स्वरूपेण भूत्वा देहसम्बन्धेन भवितैव तत्कथमुच्यतेभूत्वा भविता न इतीत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे   न चे ति। जीवो न जायते चेत्तर्हि यथेश्वरज्ञानं वृद्धिह्रासादिवर्जितं भूत्वैव कयाचिदचिन्त्यया शक्त्या भूतमिति व्यवहारालम्बनं तथा जीवेऽपि किं जननव्यवहारस्तन्निमित्त इति पृच्छायां नेत्यनेनोच्यत इत्यर्थः। नन्वीश्वरज्ञानस्योक्तप्रकारं भूत्वा भवनं कुतः सिद्धम् येन जीवस्य तथाभावासम्भावनायोदाह्रियते इत्यत आह   तद्धी ति। तदीश्वरज्ञानस्योक्तप्रकारेण भूत्वा भवनं श्रुतिस्मृतिसिद्धं हीति सम्बन्धः। तदैक्षत छां.उ.6।2।3 इति भवनमुच्यते देवदत्तोऽपश्यदितिवत्।  देशत  इति वृद्धिह्रासादिराहित्यम्। नन्वीश्वरवदित्येव कस्मान्नोक्तम् नैवं शङ्क्यं लोकदर्शनस्याधिकस्य तत्रोत्पादात्अजो नित्यः इति पुनरुक्तमित्याशङ्क्य तन्निवर्त्यामाशङ्कामुक्त्वाऽन्यथा व्याचष्टे   कुत  इति।न जायते म्रियते इत्येतत्कस्मात्कारणादित्यर्थः। अजादीत्यनेन्अजो नित्यः शाश्वतः इति व्याख्यातम्। शाश्वत इत्येतन्नित्य इत्यनेन गतार्थमित्यन्यथा व्याचष्टे   शाश्वत  इति। तथा चाजो नित्य इत्याभ्यां बिम्बोत्पत्तिनाशनिमित्तौ शाश्वत इत्यनेनोपाधिबिम्बसन्निधिजनननाशनिमित्तौ जन्मनाशौ न स्त इत्युक्तं भवति। तथाप्यज इत्युक्तत्वात्पुराणं इति पुनरुक्तिरिति चेत् न भूत्वा भविता वा नेत्युक्तम्। तत्कुतः किंनिमित्तश्च तर्हि जननव्यवहारः इत्याशङ्क्य देहान्तरप्राप्तिरस्यास्तीत्यनेनोच्यत इत्याह    पुर मिति। एवमपि न हन्यत इति पुनरुक्तिरिति चेत् न यदि पुराणस्तर्हि उपाधिभूतदेहनाशाद्दर्पणनाशात्प्रतिबिम्बनाशवदात्मनाशः स्यादित्याशङ्काऽत्र पूर्वाभिप्रायेण परिह्रियत इति भावेनाह   तथापी ति पुराणत्वेऽपि।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।2.20।।उक्तेऽर्थे प्रमाणभूताः काटकश्रुतयो दर्शयन्ति।न जायते इत्यादिनोत्पत्त्यस्तित्वनाशरूपा विकारा अन्ये चात्मनिषिद्धाः। अज इत्यादिना निगमनम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।2.20।।कस्मादयमात्मा हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति अविक्रियत्वादित्याह द्वितीयेन मन्त्रेण  जायतेऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यति इति षड्भावविकारा इति वार्ष्यायणिरिति नैरुक्ताः। तत्राद्यन्तयोर्निषेधः। क्रियते न जायते म्रियते वेति। वाशब्दः समुच्चयार्थः। न जायते न म्रियते चेत्यर्थः। कस्मादयमात्मा नोत्पद्यते यस्मादयमात्मा कदाचित्कस्मिन्नपि काले न भूत्वा अभूत्वा प्राक् भूयः पुनरपि भविता न। यो ह्यभूत्वा भवति स उत्पत्तिलक्षणां विक्रियामनुभवति। अयं तु प्रागपि सत्त्वाद्यतो नोत्पद्यतेऽतोऽजः। तथायमात्मा भूत्वा प्राक् कदाचित् भूयः पुनः न भविता। न वा शब्दाद्वाक्यविपरिवृत्तिः। यो हि प्राग्भूत्वोत्तरकाले न भवति स मृतिलक्षणां विक्रियामनुभवति अयं तूत्तरकालेऽपि सत्त्वाद्यतो न म्रियतेऽतो नित्यः। विनाशायोग्य इत्यर्थः। अत्र न भूत्वेत्यत्र समासाभावेऽपि नानुपपत्तिर्नानुयाजेष्वितिवत्। भगवता पणिनिना महाविभाषाधिकारे नञ्समासपाठात्। यत्तु कात्यायनेनोक्तंसमासनित्यताभिप्रायेण वा वचनानर्थक्यं तु स्वभावसिद्धत्वात् इति तत् भगवत्पाणिनिवचनविरोधादनादेयम्। तदुक्तमाचार्यशबरस्वामिनाअसद्वादी हि कात्यायनः इति। अत्र न जायते म्रियते वेति प्रतिज्ञा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय इति तदुपपादनं अजो नित्य इति तदुपसंहार इति विभागः। आद्यन्तयोर्विकारयोर्निषेधेन मध्यवर्तिविकाराणां तद्व्याप्यानां निषेधे जातेऽपि गमनादिविकाराणामनुक्तानामप्युपलक्षणयापक्षयश्च वृद्धिश्च स्वशब्देनैव निराक्रियते। तत्र कूटस्थनित्यत्वादात्मनो निर्गुणत्वाच्च न स्वरूपतो गुणतो वापक्षयः संभवतीत्युक्तं शाश्वत इति। शश्वत्सर्वदा भवति नापक्षीयते नापचीयत इत्यर्थः। यदि नापक्षीयते तर्हि वर्धतामिति नेत्याह  पुराण इति। पुरापि नव एकरूपो नत्वधुना नूतनां कांचिदवस्थामनुभवति। यो हि नूतनां कांचिदुपचयावस्थामनुभवति स वर्धत इत्युच्यते लोके। अयं तु सर्वदैकरूपत्वान्नापचीयते नोपचीयते चेत्यर्थः। अस्तित्वविपरिणामौ तु जन्मविनाशान्तर्भूतत्वात्पृथङ्निषिद्धौ। यस्मादेवं सर्वविकारशून्य आत्मा तस्माच्छरीरे हन्यमाने तत्संबद्धोऽपि केनाप्युपायेन न हन्यते न हन्तुं शक्यत इत्युपसंहारः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।2.20।।   न हन्यत इत्येतदेव षड्भावविकारशून्यत्वेन द्रढयति   नेति।  न जायत इति जन्मप्रतिषेधः। न म्रियते चेति विनाशप्रतिषेधः। वाशब्दौ चार्थे। नचायं भूत्वा उत्पद्य भविता भवति अस्तित्वं भजते। किंतु प्रागेव स्वतः सद्रूप इति जन्मानन्तरास्तित्वलक्षणद्वितीयविकारप्रतिषेधः। तत्र हेतुः यस्मादजः। यो हि जायते स जन्मानन्तरमस्तित्वं भजते नतु यः स्वयमेवास्ति स भूयोऽप्यन्यदस्तित्वं भजत इत्यर्थः। नित्यः सर्वदैकरुप इति वृद्धिप्रतिषेधः। शाश्वतः शश्वद्भव इत्यपक्षयप्रतिषेधः। पुराण इति विपरिणामप्रतिषेधः। पुरापि नव एव नतु परिणामतो रुपान्तरं प्राप्य नवो भवतीत्यर्थः। यद्वा न भवितेत्यस्यानुषङ्गं कृत्वा भूयोऽधिकं यथा भवति तथा न भवतीति वृद्धिप्रतिषेधः। अजो नित्य इति चोभयवृद्ध्यभावे हेतुरित्यपौनरुक्त्यम्। तदेवंजायते अस्ति वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते नश्यतीत्येवं यास्कादिभिर्वेदवादिभिरुक्ताः षड्भावविकारा निरस्ताः। यदर्थमेते विकारा निरस्तास्तं प्रस्तुतं विनाशाभावमुपसंहरति न हन्यते हन्यमाने शरीर इति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.20।।जायतेऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यति इति यास्कोक्तान्षड्भावविकारानात्मनि निराकुर्वंस्तस्याविक्रियत्वं साधयति   नेति।  कदाचित्पदं सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः पदैः संबन्धनीयम्। न कदाचिज्जायते यतोऽयमात्मा न भूत्वा भूयः पुनर्भविता न यस्माच्च भूत्वा भवनक्रियामनुभूय भूयोऽभविताऽभावं गन्ता वा न तस्मान्न कदाचिन्म्रियते च। वाशब्दश्चार्थे। यद्वा अयं ना पुरुषो भूत्वा पुनर्भविता न अस्ति विक्रिययोग्यो नच भवतीत्यर्थः। अस्मिन्पक्षे द्वितीयोऽपि वाशब्दश्चार्थे। उक्तरीत्या ना अयमिति च्छेते पूर्वनकारस्य म्रियते इत्यनेन संबन्धः। न अयमिति च्छेदे त्वस्येति बोध्यम्। भाष्यकृद्भिस्तु सुगमत्वादयमर्थस्त्यक्तः। यतो न जायतेऽतोऽजः यतो न म्रियतेऽतो नित्यः। ये त्वन्ये  अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञानधारारुपः तस्य विज्ञानवादिभिरजत्वनित्यत्वाभ्युपगमादित्याशङ्क्याह   भूत्वा भविता वा न भूय इति।  अयमित्यनुवर्तते। अयं भूत्वा भूयो भविता न भूयोऽसकृद्भूत्वा भवितेति भवनक्रियाद्वयस्य क्त्वाप्रत्ययोक्तसमानकर्तृत्वधारैव साभिप्रायेण भूत्वैव भविता नतु भूत्वा स्थित्वा विनश्यति तार्किकाणां हि विज्ञानं उत्पत्तिस्थितिनाशक्षणव्यापित्वात् त्रिक्षणावस्थायिविज्ञानवादिनां तु पूर्वस्य नाशक्षण एवोत्तरस्योत्पत्तिक्षणः सएव तस्य स्थितिक्षण श्चेति क्षणिकत्वाद्विज्ञानानां भवनक्रियाद्वयस्याव्यवधानाद्भूत्वा भवितेत्युक्तम्। तादृशोऽप्ययं नेत्यादिवर्णयन्ति तैर्विकारनिषेधोपक्रमादिविरोधस्य परिहारः प्रदर्शनीयः। एतेनाज्ञत्वान्न जायते नित्यत्वान्न म्रियते इत्यपि प्रत्युक्तम्। नायं भूत्वेत्यादेर्हेतुत्वस्य भाष्यकारैः प्रदर्शितत्वेन न जायत इत्यादेरेव हेतुत्वौचित्यात्। एवं जन्मनाशास्तित्वरुपविकारत्रयं निराकृत्यावशिष्टान्विकारान्निराकरोति   शाश्वत इत्यादिना।  शश्वद्भवः शाश्वत इत्यनेनापक्षयस्य निरवयवत्वान्निर्गुणत्वात्। पुराप्यभिनवः पुराण इत्यनेन वृद्धिरुपस्य हन्यमाने विपरिणम्यमाने शरीरे न हन्यते न विपरिणभ्यत इत्यनेन विपरिणाभस्य विकारस्य प्रतिषेधः। तथाच भाष्यम्हन्तिरत्र विपरिणामार्थो द्रष्टव्योऽपुनरुक्तातायै। अस्मिन्श्लोके षट्भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मेति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मादुभौ तौ न विजानीत इति पूर्वेण संबन्ध इति। एतेनास्तित्वपरिणामौ जन्मविनाशान्तर्भूतत्वात्पृथङ्न निषिद्धौ यस्मादेतत्सर्वविकारशून्य आत्मा तस्माच्छरीरे हन्यमाने तत्संबद्धोऽपि केनाप्युपायेन न हन्यते न हन्तुं शक्यते इत्युपसंहार इति प्रत्युक्तम्। आद्यन्तविकारयोर्निषेधे मध्यतनानां निषेधे सिद्धेऽपि तेषामुपादानमवस्थान्तरक्रियान्तरोपलक्षणार्थम्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।2.20।।अथविपश्चित् कठो.1।2।18 इत्यधीतस्य अत्रकदाचित् इत्येकपदमात्रविशेषितस्यन जायते इति कठवल्लीश्लोकस्य पौनरुक्त्यप्रत्यक्षविरोधादिदोषमाशङ्क्याह  उक्तैरेवेति। एतेन प्रतिज्ञामात्रत्वशङ्का परास्ता।नित्यत्वेनापरिणामित्वादिति  अविनाशत्वेन विकारमात्रस्यापि निरस्तत्वादित्यर्थः। तथाहि  विनाशो नाम पूर्वावस्थाप्रहाणरूपनामान्तरभजनार्हावस्थान्तरापत्तिः। यथा घटादिद्रव्यस्य कपालाद्यवस्था तदवस्थौन्मुख्यं च तस्या अपक्षयः। सैव कपालाद्यवस्थस्य तस्यैव द्रव्यस्योत्पत्तिः। एवं परिणामवृद्ध्यादिकमुदाहरणीयम्। वक्ष्यति चेममर्थम्  जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः 2।27 इत्यत्र। अतो विनाशित्वनिराकरणेन जननादिकमप्यर्थतो निरस्तम्।सर्व एवेत्यपौनरुक्त्यार्थमुक्तम्। एवकारोऽत्र अपिशब्दसमानार्थः। न केवलं हन्तव्यत्वमात्रमेव नास्ति अपितु जन्यत्वादिकमपीत्यपुनररुक्तिरिति भावः।देहधर्मा इति।हन्यमाने शरीरे इति सूचितजननमरणादिव्यवहारविषय उक्तः तत्र हेतुः  अचेतनेति। जननादयो देहधर्मा आत्मनो न सन्तीत्युच्यत इति आत्मनि देहधर्मान् प्रत्यक्षादिनाभिमन्यमानायार्जुनायन जायते इत्युपनिषन्मन्त्रेणैव यथावस्थिताकारो विविच्याभिधीयते न तु देहसंयोगवियोगलक्षणजनितमरणप्रतिक्षेपः क्रियत इत्यर्थः। वाशब्दश्चार्थः। श्लोकस्थपदानां पौनरुक्त्यपरिहाराय वर्तमानादिनिर्देशसिद्धां व्यवस्थां व्यञ्जयन्नाह  तत्रेति। ननु कदाचिदित्यनेन वर्तमानकालविवक्षायां वैयर्थ्यं लकारेणैव गतार्थत्वात्। भूतभविष्यतोः सङ्ग्रहे वर्तमाननिर्देशो न सङ्गच्छत इत्याशङ्क्योक्तम्  वर्तमानतयेत्यादि। तत्तत्कालीनैः पुरुषैस्तेषु तेषु देहेषुजायतेम्रियते इति वर्तमानतयैव हि जननमरणयोरनुभवः अतस्तदपेक्षया वर्तमाननिर्देशोपपत्तिः तेन कल्पाद्यन्तव्यतिरिक्तः समस्तः कालःकदाचिदिति सङ्गृहीत इति भावः।भूत्वा इति पूर्वकालनिर्देशाभिप्रेतमाह  कल्पादाविति। तत्र भूयश्शब्दः कल्पान्तपरः।भूत्वा भविता इत्यनयोः क्रिययोः प्रत्येकं नञन्वयभ्रमव्युदासायोक्तम्  न न भवितेति। भूत्वा न भवितेति विशिष्टं नञन्तरेण प्रतिषिध्यते। ननुनायं भूत्वा इत्यादिकं किमर्थमुच्यतेन जायते इत्यादिनैव सङ्ग्रहीतुं शक्यत्वादित्याशङ्क्याह  केषुचिदिति।अयं भावः  कालविशेषेषु देहविशेषेषु सृष्टिप्रलयविशेषः श्रूयते। स च न देहसम्बन्धतद्वियोगमात्रम् तोयेन जीवान् विससर्ज भूम्याम् महाना.1।4 इति कण्ठोक्तेः प्राक्सृष्टेरेकत्वावधारणादेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपत्तेरेकस्यैव बहुभवनसङ्कल्पादेश्च  इति। जीवस्वरूपोत्पत्तिनाशावेवाभ्युपगन्तव्याविति जीवानामाप्रलयावस्थायित्ववादशङ्कानिरासायनायं भूत्वा इत्याद्युक्तम्। तत्र चैवमुत्तरम्  जीवानां विसृष्टिः सदेहीकरणेन विक्षेपः। प्राक्सृष्टेरेकत्वावधारणं नामरूपविभागाभावात् एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं च सूक्ष्मचिदचिद्वस्तुशरीरकस्य ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्वस्तुशरीरतया परिणामात्। अत एव बहुभवनसङ्कल्पाद्युपपत्तिश्च। अतः कल्पाद्यन्तयोरपि ज्ञानसङ्कोचविकासकरदेहविश्लेषसंश्लेषमात्रमेव न पुनः स्वरूपोत्पत्तिः  इति।अजो नित्यः इत्यनयोः पूर्वोक्तार्थस्य सङ्कलय्य निगमनरूपतया तत्तत्कालेषु जन्मादिनिषेधेन सर्वदेहगतात्माजत्वादिविवक्षया चापौनरुक्त्यमित्यभिप्रायेणाह  अतः सर्वदेहगत इति।अतएव नित्य इति उत्पत्तिरहितत्वान्नाशित्वरहित इत्यर्थः। सृष्ट्यवस्थागतस्थूलपरिणामानामात्मनि निरस्तत्वात् प्रलयाद्यवस्थागतसूक्ष्मपरिणामनिरसनपरः शाश्वतशब्द इत्यभिप्रायेणाह  प्रकृतिवदिति। पुराणशब्दमपिअक्षरसाम्यान्निर्ब्रूयात् इत्युक्तन्यायेन निर्वक्ति  पुरापि नव इति। किमिदं पुरापि नवत्वम् अनुत्पन्नस्य कदाचिदपि नवत्वायोगात्। उत्पन्नेऽपीदानीमपि नव इति वा परंस्तादपि नव इति वा वक्तव्यम्। पुरा नवत्वस्याविस्मयनीयत्वादित्याशङ्क्याह  सर्वदेति। पुराशब्दस्य कालत्रयोपलक्षणतया वा वृत्त्यन्तर्गताभिप्रायकापिशब्दसमुच्चितकालान्तरतात्पर्येण वा पुरातनोऽपि नव इति विरोधाभिप्रायेण वा निर्वाहः। नवशब्दोऽप्यत्र नवत्वसहिताश्चर्यत्वपरः। वक्ष्यति च आश्चर्यवत् 2।29 इत्यादीति भावः। यद्वा सावयवानामवयवाप्यायनादिना नवीकरणं स्यात् अयं तु निरवयवत्वेनानवीकार्यतया पुरापि नव इत्युपपादितम्। इममर्थमर्जुनस्य शङ्क्यमानविषये निगमयतीत्यभिप्रायेणाह  अत इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.20।।मारणादिसम्भावना तु जन्मादिभावे सति भवति तदेव नास्तीत्याह  न जायत इति। जन्माभावो निरूपितः।न वा कदाचिन्म्रियते अनेन मरणनिषेधो निरूपितः। अयं भूत्वा भूयः न भविता। अत्रायमर्थः  मत्क्रीडनार्थं सृष्टौ येन भावेन पूर्वं यथा विभावितः तथा तेनैव भावेन पुनर्न भविष्यति। तस्माद्यदर्थं मयोत्पादितस्तदेव मत्प्रीत्यर्थं कुर्यादन्यथा जन्मवैयर्थ्यं स्यात्। भूत्वेत्युक्तत्वात् जन्मशङ्का स्यात्तदर्थमाह  अजः न जायत इत्यर्थः मदंशत्वात्। एवम्भूत एवायमित्याह  नित्य इति। किञ्च शाश्वतः। मयि स्थित एव निरन्तरमेकभावात्मकः। किञ्च पुराणः सर्वदैवमेव मत्सेवार्थं दासरूपः पुराणोऽपि नव एवेत्यर्थः। यदर्थमेतदुक्तं तदाह  न हन्यत इति। हन्यमाने शरीरे गतोऽयं जीवस्तस्मिन्हते न हन्यते इत्यर्थः। अयमर्थः  हन्यमाने अन्तयुक्ते लौकिके देहे प्रविष्ट इत्यर्थः।हन्यमाने इत्यनेन तदर्थसृष्टत्वं ज्ञापितम्। तस्माद्भगवदिच्छानुरूपकरणान्नातिभ्रमजन्योऽपि दोषः स्यादिति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.20।।नायं हन्ति न हन्यत इत्युक्तं तत्र न हन्यत इत्येतदुपपादयति तत्रस्थेनैव द्वितीयेन मन्त्रेण   न जायत इति।  अयं आत्मा कदाचित् न जायते अभिनवो नोत्पद्यते। न वा म्रियते निरन्वयो न नश्यति। तार्किकाभिमतघटवत्। तत्र क्रमेण हेतुद्वयम्   अजो नित्य इति।  अजत्वान्न जायते। नित्यत्वाच्च न वा म्रियत इत्यर्थः। अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञानधारारूपः। तस्याविज्ञानवादिभिरजत्वनित्यत्वाभ्युपगमादित्याशङ्क्याह   भूत्वा भविता वा न भूय इति।  अयमित्यनुवर्तते। अयं भूत्वा भूयो भविता न। भूयोऽसकृत् भूत्वा भवितेति भवनक्रियाद्वयस्य क्त्वाप्रत्ययोक्तं समानकर्तृत्वं धारैक्याभिप्रायेण। भूत्वैव भविता न तु भूत्वा स्थित्वा विनश्यति। तार्किकाणां हि विज्ञानमुत्पत्तिस्थितिनाशक्षणव्यापित्वात्ित्रक्षणावस्थायि। विज्ञानवादिना तु पूर्वस्य नाशक्षण एवोत्तरस्योत्पत्तिक्षणः स एव तस्य स्थितिक्षणश्चेति क्षणिकत्वाद्विज्ञानानां भवनक्रियाद्वयस्याव्यवधानाद्भूत्वा भवितेत्युक्तम्। तादृशोऽप्ययं न यतः शाश्वतः शश्वदेकरूपः। योऽहं बाल्ये पितरावन्वभूवं सोऽहं स्थाविरे प्रणप्तृ़ननुभवामीति बाल्यस्थाविरयोरात्मैक्यप्रत्यभिज्ञानात्। न च सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानम्। सादृश्यग्रहीतुः स्थिरस्याभावात्। यद्वा जन्ममरणहीनोऽपि धर्मान्तरविशिष्टः पूर्वं भूत्वा पुनर्धर्मान्तरविशिष्टो भवति इत्यपि न। भूत्वैव भविता नत्वभूत्वेति योजना। अर्हता हि शरीरपरिमाणमात्मानमभ्युपगच्छन्तो नित्यस्यैवात्मनः क्रमेण व्युत्क्रमेण वा मशकमनुजमतंगजशरीरप्राप्तौ परिमाणभेदं मन्यमाना भूतस्यैवात्मनो विशेषणीभूतपरिमाणभवनादौपचारिकं भवनमभ्युपगच्छन्ति तदपि न। शाश्वतत्वादेव उपचयापचयवतो मध्यमपरिमाणस्य वस्तुनो नित्यत्वायोगात्। अनेनैव सुखदुःखादिधर्मान्तरोत्पत्त्यात्मनो भाक्तं भूत्वा भवनं प्रत्याख्येयम्। नहि दुःखादिधर्मिणः स्वनाशमन्तरेणात्यन्तिकदुःखोच्छेदः संभवति। घटादौ यावद्रूपनाशादर्शनात्। नन्वजत्वं नित्यत्वं शाश्वत्वं चाकाशेऽप्यस्ति अत आह   पुराण इति।  पुरा वियदादिसृष्टेः प्रागपि नव एव। एतेन अपक्षयादिधर्मराहित्यान्मुख्यमजत्वादिकं आत्मन एव वियदादेस्त्वमुख्यं तदिति दर्शितम्। अतएव शरीरे हन्यमाने न हन्यते। भाष्ये तु वाशब्दश्चार्थे। न जायते म्रियते चेत्यर्थः। तत्रोपपत्तिः  अयं न भूत्वा अनुत्पद्य न भविता घटादिवदतो न जायते। अथवा नञः पूर्वान्वयित्वं न जायते न वा म्रियत इति। यतो भूत्वा अभविता घटवद्विनाशी न अतो न म्रियत इति। शाश्वतः पुराण इत्येताभ्यामुपचयापचयौ निषिध्येते इति न हन्यते न विपरिणम्यत इति च व्याख्यातम्। केचिदेवमाहुः। न जायते म्रियत इति प्रतिज्ञा। कदाचिदित्यादिना तस्या उपपादनम्। अज इत्यादिरुपसंहार इति।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "For the soul there is neither birth nor death at any time. He has not come into being, does not come into being, and will not come into being. He is unborn, eternal, ever-existing and primeval. He is not slain when the body is slain.",
        "ec": " Qualitatively, the small atomic fragmental part of the Supreme Spirit is one with the Supreme. He undergoes no changes like the body. Sometimes the soul is called the steady, or kūṭa-stha. The body is subject to six kinds of transformations. It takes its birth from the womb of the mother’s body, remains for some time, grows, produces some effects, gradually dwindles, and at last vanishes into oblivion. The soul, however, does not go through such changes. The soul is not born, but, because he takes on a material body, the body takes its birth. The soul does not take birth there, and the soul does not die. Anything which has birth also has death. And because the soul has no birth, he therefore has no past, present or future. He is eternal, ever-existing and primeval – that is, there is no trace in history of his coming into being. Under the impression of the body, we seek the history of birth, etc., of the soul. The soul does not at any time become old, as the body does. The so-called old man, therefore, feels himself to be in the same spirit as in his childhood or youth. The changes of the body do not affect the soul. The soul does not deteriorate like a tree, nor anything material. The soul has no by-product either. The by-products of the body, namely children, are also different individual souls; and, owing to the body, they appear as children of a particular man. The body develops because of the soul’s presence, but the soul has neither offshoots nor change. Therefore, the soul is free from the six changes of the body. In the Kaṭha Upaniṣad (1.2.18) we also find a similar passage, which reads: na jāyate mriyate vā vipaścin nāyaṁ kutaścin na babhūva kaścit ajo nityaḥ śāśvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre The meaning and purport of this verse is the same as in the Bhagavad-gītā , but here in this verse there is one special word, vipaścit, which means learned or with knowledge. The soul is full of knowledge, or full always with consciousness. Therefore, consciousness is the symptom of the soul. Even if one does not find the soul within the heart, where he is situated, one can still understand the presence of the soul simply by the presence of consciousness. Sometimes we do not find the sun in the sky owing to clouds, or for some other reason, but the light of the sun is always there, and we are convinced that it is therefore daytime. As soon as there is a little light in the sky early in the morning, we can understand that the sun is in the sky. Similarly, since there is some consciousness in all bodies – whether man or animal – we can understand the presence of the soul. This consciousness of the soul is, however, different from the consciousness of the Supreme because the supreme consciousness is all-knowledge – past, present and future. The consciousness of the individual soul is prone to be forgetful. When he is forgetful of his real nature, he obtains education and enlightenment from the superior lessons of Kṛṣṇa. But Kṛṣṇa is not like the forgetful soul. If so, Kṛṣṇa’s teachings of Bhagavad-gītā would be useless. There are two kinds of souls – namely the minute particle soul ( aṇu-ātmā ) and the Supersoul ( vibhu-ātmā ). This is also confirmed in the Kaṭha Upaniṣad (1.2.20) in this way: aṇor aṇīyān mahato mahīyān ātmāsya jantor nihito guhāyām tam akratuḥ paśyati vīta-śoko dhātuḥ prasādān mahimānam ātmanaḥ “Both the Supersoul [Paramātmā] and the atomic soul [ jīvātmā ] are situated on the same tree of the body within the same heart of the living being, and only one who has become free from all material desires as well as lamentations can, by the grace of the Supreme, understand the glories of the soul.” Kṛṣṇa is the fountainhead of the Supersoul also, as it will be disclosed in the following chapters, and Arjuna is the atomic soul, forgetful of his real nature; therefore he requires to be enlightened by Kṛṣṇa, or by His bona fide representative (the spiritual master)."
    }
}
