{
    "_id": "BG2.19",
    "chapter": 2,
    "verse": 19,
    "slok": "य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |\nउभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||२-१९||",
    "transliteration": "ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||2-19||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.19।। जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं,  क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.19 He who takes the Self to be the slayer and he who thinks It is slain, neither of them ï1knowsï1. It slays not, nor is It slain.",
        "ec": "2.19 यः he who? एनम् this (Self)? वेत्ति knows? हन्तारम् slayer? यः he who? च and? एनम् this? मन्यते thinks? हतम् slain? उभौ both? तौ those? न not? विजानीतः know? न not? अयम् this? हन्ति slays? न not? हन्यते is slain.Commentary -- The Self is nondoer (Akarta) and as It is immutable? It is neither the agent nor the object of the act of slaying. He who thinks I slay or I am slain with the body or the Ahamkara (ego)? he does not really comprehend the true nature of the Self. The Self is indestructible. It exists in the three periods of time. It is Sat (Existence). When the body is destroyed? the Self is not destroyed. The body has to undergo change in any case. It is inevitable. But the Self is not at all affected by it. Verses 19? 20? 21? 23 and 24 speak of the immortality of the Self or Atman. (Cf.XVIII.17)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.19 He who thinks that the Spirit kills, and he who thinks of It as killed, are both ignorant. The Spirit kills not, nor is It killed."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.19।। आत्मा नित्य अविकारी होने से न मारी जाती है और न ही वह किसी को मारती है । शरीर के नाश होने से जो आत्मा को मरी मानने हैं या जो उसको मारने वाली समझते हैं वे दोनों ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते और व्यर्थ का विवाद करते हैं। जो मरता है वह शरीर है और मैं मारने वाला हूँ  यह भाव अहंकारी जीव का है। शरीर और अहंकार को प्रकाशित करने वाली चैतन्य आत्मा दोनों से भिन्न है। संक्षेप में इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा न किसी क्रिया का कर्त्ता है और न किसी क्रिया का विषय अर्थात् उस पर किसी प्रकार की क्रिया नहीं की जा सकती।आत्मा किस प्रकार अविकारी है  इसका उत्तर अगले श्लोक में दिया गया है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.19. Whosoever views This to be the slayer and whosoever believes  This to be the slain,  both these do not understand :  This does not slay,  nor is This slain."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.19 He who deems It (the self) a slayer, and he who thinks of It as slain - both are ignorant. For, the self neither slays nor is slain."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.19 He who thinks of this One as the killer, and he who thinks of this One as the killed  both of them do not know. This One does not kill, nor is It killed."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।2.19।।व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह  य एनमिति। कुतः उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति न हन्यते। न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया। स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान्। ध्यायतीव बृ.उ.4।3।7 इति श्रुतेश्च।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।2.19।।अविनाशि तु तद्विद्धि इत्यत्र पूर्वार्धेन तत्पदार्थसमर्थनमुत्तरार्धेन निरीश्वरवादस्य परिणामवादस्य वा निराकरणमात्मनि जन्मादिप्रतिभानस्यौपचारिकत्वप्रदर्शनार्थमन्तवन्त इत्यादि वचनमिति केचित्। अस्तु नामायमपि पन्थाः। पूर्वोक्तस्य गीताशास्त्रार्थस्योत्प्रेक्षामात्रमूलत्वं निराकर्तुं मन्त्रद्वयं भगवानानीतवानिति श्लोकद्वयस्य संगतिं दर्शयति   शोकमोहादीति।  तत्र प्रथममन्त्रस्य संगतिमाह   यत्त्विति।  प्रत्यक्षनिबन्धनत्वादमुष्या बुद्धेर्मृषात्वमयुक्तमित्याक्षिपति   कथमिति।  प्रत्यक्षस्याज्ञानप्रसूतत्वेनाभासत्वात्तत्कृता बुद्धिर्न प्रमेति परिहरति   य एनमिति। हन्ता चेन्मन्यते हन्तुम् इत्याद्यामृचमर्थतो दर्शयित्वा व्याचष्टे   य   एनमिति।  हन्तारं हतं वात्मानं मन्यमानस्य कथमज्ञानमित्याशङ्क्याह   हन्ताहमिति।  हन्तृत्वादिज्ञानमज्ञानमित्यत्र हेतुमाह   यस्मादिति।  आत्मनो हननं प्रति कर्तृत्वकर्मत्वयोरभावे हेतुं दर्शयति   अविक्रियत्वादिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.19।। जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है, वे दोनों ही इसको नहीं जानते; क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।",
        "hc": "2.19।। व्याख्या-- 'य एनं (टिप्पणी प0 59) वेत्ति हन्तारम्'-- जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है; वह ठीक नहीं जानता। कारण कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर कैसा ही चतुर क्यों न हो, पर किसी औजारके बिना वह कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं--ऐसा जो अनुभव करता है, वह शरीरीके अकर्तापनका अनुभव करता है (13। 29)। तात्पर्य यह हुआ है कि शरीरमें कर्तापन नहीं है, पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके, सम्बन्ध जोड़कर शरीरसे होनेवाले क्रियाओंमें अपनेको\n\nकर्ता मान लेता है। अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो यह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है।\n 'यश्चैनं मन्यते हतम्'-- जो इसको मरा मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं है, ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है; क्योंकि इसमें कभी कोई विकृति नहीं आती। जिसमें विकृति आती है, परिवर्तन होता है अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील होता है, वही मर सकता है।\n 'उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते'-- वे दोनों ही नहीं जानते अर्थात् जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको मरनेवाला मानता है वह भी ठीक नहीं जानता।\nयहाँ प्रश्न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला और मरनेवाला दोनों मानता है, क्या वह ठीक जानता है? इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे नित्यनिरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। अतः इस शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये।\nअर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको मरने-मारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है।\n\nसम्बन्ध -- यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है इसके उत्तरमें कहते हैं"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।2.19।। एनम्  उक्तस्वभावम् आत्मानं प्रति हन्तारं  हननहेतुकम् अपि  यो  मन्यते  यः च एनं  केन अपि हेतुना  हतं मन्यते उभौ तौ न विजानीतः।  उक्तैः हेतुभिः अस्य नित्यत्वाद् एव  अयं  हननहेतुः न भवति अत एव च अयम् आत्मा  न हन्यते।  हन्तिधातुः अपि आत्मकर्मकःशरीरवियोगकरणवाची।न हिंस्यात् सर्वा भूतानिब्राह्मणो न हन्तव्यः (क0 स्मृ0 8।2) इत्यादीनि अपि शास्त्राणि अविहितशरीरवियोगकरणविषयाणि।",
        "et": "2.19 With regard to \"This\" viz., the self, whose nature has been described above, he who thinks of It as the slayer, i.e., as the cause of slaying, and he who thinks 'This' (self) as slain by some cause or other - both of them do not know. As this self is eternal for the reasons mentioned above, no possible cause of destruction can slay It and for the same reason, It cannot be slain. Though the root 'han' (to slay) has the self for its object, it signifies causing the separation of the body from the self and not destruction of the self. Scriptural texts like 'You shall not cause injury to beings' and 'The Brahmana shall not be killed'?  (K. Sm. 8.2) indicate unsanctioned actions, causing separation of the body from the self. [In the above otes, slaughter in an ethical sense is referred to, while the text refers to killing or separating the self from the body in a metaphsyical sense. This is made explicit in the following verse]."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।2.19।।अन्तवन्त इति।   देहाः  निरुपाख्याताकले (S निरुपाख्यकाले) स्थूलविनाशयोगिनः तदन्यथानुपपत्तेरेव च विनाशिनः प्रतिक्षणमवस्थान्तरभागिनः।  यदुक्तम्  अन्ते पुराणतां (S पुराणं दृष्ट्वा) दृष्ट्वा प्रतिक्षणं नवत्वहानिरनुमीयते इति।  मुनिनापि  कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे।वर्तते सर्वभावेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते।।(M Santi. Moksa. Ch. 308 verse 121 ) इति।पृथगर्थानामति पृथगर्थक्रियाकारित्वादिति यावत्।  देहा अन्तवन्तः विनाशिनश्च।  आत्मा तु नित्यः यतोऽप्रमेयः।  प्रमेयस्य तु जडस्य परिणामित्वम् न तु अजडस्य चिदेकरूपस्य स्वभावान्तरायोगात्।  एवं देहा नित्यमन्तवन्त इति शोचितुमशक्याः।  आत्मा नित्यमविनाशी तेन न शोचनार्हः।  तन्त्रेण अयमेकः कृत्यप्रत्ययो द्वयोरर्थयोर्मुनिना दर्शितः अशोच्यान् इति।",
        "et": "2.19 Ya enam etc.  Whosoever  veiws This i.e., the Self and the body,  to be the slayer and the slain, ignorance is in him.  That is why he is in bondage.\t\t\n The same  [point the Lord] clarifies -"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.19।।जो तू मानता है कि मेरेद्वारा युद्धमें भीष्मादि मारे जायँगे मैं ही उनका मारनेवाला हूँ  यह तेरी बुद्धि ( भावना ) सर्वथा मिथ्या है।  कैसे    जिसका वर्णन ऊपरसे आ रहा है इस आत्माको जो मारनेवाला समझता है अर्थात् हननक्रियाका कर्ता मानता है और जो दूसरा ( कोई ) इस आत्माको देहके नाशसे मैं नष्ट हो गया  ऐसे नष्ट हुआ मानता है  अर्थात् हननक्रियाका कर्म मानता है।  वे दोनों ही अहंप्रत्ययके विषयभूत आत्माको अविवेकके कारण नहीं जानते।  अभिप्राय यह कि जो शरीरके मरनेसे आत्माको मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ  इस प्रकार जानते हैं वे दोनों ही आत्मस्वरूपसे अनभिज्ञ हैं।  क्योंकि यह आत्मा विकाररहित होनेके कारण न तो किसीको मारता है और न मारा जाता है अर्थात् न तो हननक्रियाका कर्ता होता है और न कर्म होता है।",
        "sc": "।।2.19।।   य एनं  प्रकृतं देहिनं  वेत्ति  विजानाति  हन्तारं  हननक्रियायाः कर्तारं  यश्च एनम्  अन्यो  मन्यते हतं  देहहननेन हतः अहम् इति हननक्रियायाः कर्मभूतम्  तौ उभौ न विजानीतः  न ज्ञातवन्तौ अविवेकेन आत्मानम्। हन्ता अहम्   हतः अस्मि अहम्  इति देहहननेन आत्मानमहंप्रत्ययविषयं यौ विजानीतः तौ आत्मस्वरूपानभिज्ञौ इत्यर्थः। यस्मात् न  अयम्  आत्मा  हन्ति  न हननक्रियायाः कर्ता भवति  न  च  हन्यते  न च कर्म भवतीत्यर्थः अविक्रियत्वात्।।कथमविक्रय आत्मेति द्वितीयो मन्त्रः",
        "et": "2.19 But the ideas that you have, 'Bhisma and others are neing killed by me in war; I am surely their killer'  this idea of yours is false. How? Yah, he who; vetti, thinks; of enam, this One, the embodied One under consideration; as hantaram, the killer, the agent of the act of killing; ca, and; yah, he who, the other who; manyate, thinks; of enam, this One; as hatam, the killed  (who thinks) 'When the body is killed, I am myself killed; I become the object of the act of killing'; ubhau tau, both of them; owing to non-discrimination, na, do not; vijanitah, know the Self which is the subject of the consciousness of 'I'. The meaning is: On the killing of the body, he who thinks of the Self ( the content of the consciousness of 'I' ) [The Ast. omits this phrase from the precedig sentence and includes it in this place. The A.A. has this phrase in both the places.-Tr.] as 'I am the killer', and he who thinks, 'I have been killed', both of them are ignorant of the nature of the Self. For, ayam, this Self; owing to Its changelessness, na hanti, does not kill, does not become the agent of the act of killing; na hanyate, nor is It killed, i.e. It does not become the object (of the act of killing).\nThe second verse is to show how the Self is changeless:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।2.19।। य एन मिति। पुनरात्मनित्यत्वं किमित्युच्यत इति अतो नास्य नित्यत्वप्रतिपादने तात्पर्यम् किन्तु निष्टङ्कितं चेदात्मनो नित्यत्वं तर्हि का गतिस्तद्धननव्यवहारस्येत्याशङ्क्य तस्य भ्रान्तत्वमनेनोच्यत इत्याह   व्यवहार स्त्विति। व्यवहारोऽत्र ज्ञानम्। तथापिनायं हन्ति न हन्यते इति पुनरुक्तिरेवेति चेत् न ज्ञानानां प्रामाण्यस्य बाधकैकापोद्यत्वात्। कुतो बाधकादस्य भ्रान्तत्वमित्याशङ्क्य स्वपक्षसाधकानामेवोक्तहेतूनामेतद्बाधनेऽपि व्यापारप्रदर्शनार्थत्वादस्येत्याह   कुत  इति। नन्वत्र हननमेकमेव तत्कथमुभाविति कथं चनायं हन्ति न हन्यते इति अथैकस्या अपि क्रियायाः कारकभेदादेव मुक्तिस्तर्हि करणाधिकरणोक्तिरपि प्रसज्यत इति उच्यते आत्मनो नित्यत्वमिवास्वातन्त्र्यमपि प्राक्प्रतिपादितम्। यथोक्तं  तात्पर्यनिर्णये   तत्र हननव्यवहारवत्स्वातन्त्र्यव्यवहारस्यापि भ्रान्तत्वमनेनोच्यते इति उभावित्याद्युपपद्यते। अतएव भाष्यकारो व्यवहारस्त्विति सामान्येनाह न तु हननव्यवहार इति निष्कृष्य। ननु नित्यत्वे बिम्बनित्यत्वादयो हेतव उक्ताः अस्वान्तत्र्ये तु न कोऽपि तत्कथमुक्तहेतुभ्य इत्युक्तं इति चेत् न प्रतिबिम्बत्वस्योक्तत्वात् तस्य कथमस्वातन्त्र्ये हेतुत्वमित्यत आह   नही ति। क्रियेति वदताहन्तारं हन्ति इति पदद्वयमुपलक्षणार्थमिति सूचितम्। ननु प्रतिबिम्बस्यापि लोके क्रिया दृश्यते जीवस्य च क्रियाभावेकर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ब्र.सू.2।3।33 इत्यादिविरोध इत्यत आह    स ही ति। बिम्बक्रियया बिम्बाधीनक्रियया। तथा च पूर्वं स्वातन्त्र्याभावापेक्षया क्रियाप्रतिषेध इति ज्ञातव्यम्। ननूपाधिक्रिययापि प्रतिबिम्बे क्रिया भवति तत्कथमुच्यते बिम्बक्रिययैवेतिमैवम् स्वातन्त्र्यप्रतिषेधे तात्पर्यात् जीवस्य पृथगुपाध्यभावाच्च। जीवस्येश्वराधीनक्रियत्वे श्रुतिं चाह   ध्यायती वेति। ईश्वरो जीवं ध्यायतीत्यर्थः। इवशब्दोऽल्पार्थे।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।2.19।।आत्मनो हन्तिकर्तृकर्मत्वज्ञानिनं निन्दति। य एनमिति हन्तेः सावयवशरीरवियोगकरणवाचित्वान्नायमात्मा हन्ति न हन्यते।न हिंस्यात् सर्वाभूतानि इत्यादिरपि शरीरदृष्ट्यभिप्रायेणोपपद्यते।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।2.19।।नन्वेयंअशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यादिना भीष्मादिबन्धुविच्छेदनिबन्धने शोकेऽपनीतेऽपि तद्वधकर्तृत्वनिबन्धनस्य पापस्य नास्ति प्रतीकारः। नहि यत्र शोको नास्ति तत्र पापं नास्तीति नियमः द्वेष्यब्राह्मणवधे शोकाविषये पापाभावप्रसङ्गात्। अतोऽहं कर्ता त्वं प्रेरक इति द्वयोरपि हिंसानिमित्तपातकापत्तेरयुक्तमिदं वचनंतस्माद्युध्यस्व भारत इत्याशङ्क्य काठकपठितयर्चा परिहरति भगवान्  एनं प्रकृतं देहिनमदृश्यत्वादिगुणकं यो हन्तारं हननक्रियायाः कर्तारं वेत्ति अहमस्य हन्तेति विजानाति यश्चान्य एनं मन्यते हतं हननक्रियायाः कर्मभूतं देहहननेन हतोऽहमिति विजानाति तावुभौ देहाभिमानित्वादेनमविकारिणमकारकस्वभावमात्मानं न विजानीतो न विवेकेन जानीतः शास्त्रात्। कस्मात्। यस्मान्नायं हन्ति न हन्यते। कर्ता कर्म च न भवतीत्यर्थः। अत्र य एनं वेत्ति हन्तारं हतं चेत्येतावति वक्तव्ये पदानामावृत्तिर्वाक्यालंकारार्था। अथवा य एनं वेत्ति हन्तारं तार्किकादिरात्मनः कर्तृत्वाभ्युपगमात् तथा यश्चैनं मन्यते हतं चार्वाकादिरात्मनो विनाशित्वाभ्युपगमात् तावुभौ न विजानीत इति योज्यम्। वादिभेदख्यापनाय पृथगुपन्यासः। अतिशूरातिकातरविषयतया वा पृथगुपदेशः।हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् इति पूर्वार्धे श्रौतः पाठः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।2.19।।तदेवं भीष्मादिमृत्युनिमित्तः शोको निवारितः। यच्चात्मनो हन्तृत्वनिमित्तं दुःखमुक्तंएतान्न हन्तुमिच्छामि इत्यादिना तदपि तद्वदेव निर्निमित्तमित्याह   य एनमिति।  एनमात्मानम्। आत्मनो हननक्रियायां कर्मत्वं कर्तृत्वमपि नास्तीत्यर्थः। तत्र हेतुर्नायमिति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.19।।   अहमेतेषां हन्ता मयैते हन्यन्त इत्यर्जुनबुद्धेर्मृषात्वबोधनाय ऋचावुदाहरति   य इति।  युत्तु नन्वेवमशोच्यानित्यादिना बन्धुविच्छेदनिबन्धने शोकेऽपनीतेऽपि तद्वधकर्तृत्वनिबन्धनपापस्य नास्ति प्रतीकारः शोकाविषयेऽपि द्वेष्यब्राह्मणवधे पापस्य सत्त्वात्। अतः कर्तुर्मम प्रेरकस्य तव च हिंसानिमित्तपापापत्तेरयुक्तमिदं वचनं तस्मादित्यादीत्याशङ्कां काठकपठितयर्चा परिहरति य इति तद्विचार्यम्। ऋषि हन्त्रादेः पापं न जायते इति परिहारस्यानुक्तेः वधनिबन्धनबन्धुविच्छेदस्यात्मनित्यवप्रतिपादकपूर्वग्रन्थेन नाशाभावोक्त्या प्रतिषिद्धत्वेन तन्निबन्धनपापस्यापि निवारितत्वाच्छङ्काया अनुत्थानात्। यस्मादेवं प्रागुक्तन्यायेन नित्यो विभुरसंसारी सर्वदैकरुपश्चात्मा तस्मात्तन्नाशशङ्क्या स्वधर्मे युद्धे प्राक्प्रवृत्तस्य तव तस्मादुपरतिर्न युक्तेति स्वपूर्वोक्तिविरोधात् द्वेष्यब्राह्मणवधे शोकाभावे द्वेष्यत्वस्य हेतोः पापासाधकत्वेन दृष्टान्तस्य वैषम्यात् संघातवधनिबन्धनपापाभावस्याग्रिमग्रन्थेन क्षत्रधर्मबोधकेन वक्ष्यमाणत्वाच्च। नत्वेवाद्येकोनविंशतिश्लोकैरशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यतस्य विवरणं क्रियतेस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यष्टभिः श्लोकैःप्रज्ञावादांश्च भाषस इत्यस्य मोहद्वयस्य पृथग्प्रयत्ननिराकर्तव्यत्वादिति स्वपूर्वग्रन्थविरोधाच्चेत्यास्तां तावत्। य एनमात्मानं हननक्रियायाः कर्तारं यश्च तस्याः कर्म जानाति तौ द्वौ देहात्मबुद्धिमत्त्वेन भ्रान्तौ न विजानीतः। यतोऽयमात्मा देहभिन्नोऽविक्रियत्वाद्धननक्रियायाः कर्ता ततएव कर्म च न भवतीत्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।2.19।।अथअविनाशि तु 2।17 इति श्लोकेनोक्तंनैनं छिन्दन्ति 2।23 इति प्रपञ्चयिष्यमाणं शस्त्रादीनामात्मनश्च हन्तृत्वहन्तव्यत्वायोग्यत्वं तद्विपर्ययवेदिनिन्दया द्रढयति  य एनमिति। सामानाधिकरण्यभ्रमनिरासायोक्तं  प्रतीति।हन्तारम् इत्यस्य तृन्नन्तत्वात्एनम् इति द्वितीयान लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् अष्टा.2।3।69 इति कृद्योगषष्ठीनिषेधात्।हननहेतुमिति। प्रत्ययस्यात्र हेतुमात्रविवक्षेति भावः।न कश्चित्कर्तुमर्हति 2।17 इति पूर्वोक्तवत्पदार्थविवक्षया पुल्लिङ्गत्वोपपत्तिरिति ज्ञापनायोक्तम्  कमपीति। छेदनादिहेतुषु कञ्चिदपीत्यर्थः। ननु हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते 1।प्रतिज्ञान्तरभ्रमव्युदासायाह  उक्तैरिति।अस्य नित्यत्वादिति। तत्कार्यशक्तमपि न हि तदयोग्ये प्रवर्तत इति भावः।एनम् इति पूर्ववाक्यादनुकृष्योक्तम्।अतएव चेति। अयोग्यतया हेत्वभावे तत्क्रियाविषयत्वरूपफलाभाव इति भावः।अयं हननहेतुः अयमात्मा इत्युभयत्र अयंशब्दप्रयोगात्तन्त्रेणोच्चारितोऽयं शब्दोहन्ति हन्यते इत्यनयोर्विवक्षाभेदात्कर्तृकर्मसमर्पक इति भावः। कथं तर्हिमनुष्यं हन्ति इत्यादिप्रयोगः। न ह्यसौ शरीरमात्रहननविषयः मृतशरीरघातकेषुपितृहा मातृहा इत्यादिप्रयोगोपक्रोशाद्यभावात्। मनुष्यादिशब्दाश्चात्मपर्यवसिता इति नः सिद्धान्तः।मां जिघांसति इत्यादिप्रयोगेषु व्यक्तमेव हन्तेरात्मकर्मकत्वम्। अतो हिंसायोगश्चेतन एव हन्तिधातोः कर्मभूतः। तथा सतिनायं हन्ति न हन्यते इत्युक्तमुभयमपि नोपपद्यते इत्याशङ्क्याह  हन्तिधातुरिति।आत्मकर्मकः इत्यनेन शङ्कासूचनम् सत्यमात्मकर्मक एव स्वतो हन्तिधातुः न तु तत्स्वरूपप्रच्युतिप्रतिपादकः किन्तु मारणपरः। तथैव हि लोकवेदयोः प्रयोगः। मारणं च शरीरादिविश्लेषणात्मकम्।मृङ् प्राणत्यागे इति चानुशिष्यत इति भावः। एवं लोकप्रयोगो निर्व्यूढः। न हिंस्यात्सर्वा भूतानि इति शास्त्रप्रयोगस्य कोऽर्थः। स चास्तु यः कश्चित् स तावत् सामान्यतो विशेषतश्च निषिद्धत्वादकर्तव्य इत्याशङ्क्याह  न हिंस्यादिति। पराभिमतप्रक्रिययोत्सर्गापवादन्यायाद्वा स्वमतेन विहितशरीरवियोगकरणस्य पशुशत्रुप्रभृतीनामपि हिततमत्वेन हिंसात्वस्यैवाभावाद्वेति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.19।।ननु तथापि जीवस्य भगवदंशत्वे कथं हननमत आह  य एनमिति। य एनं हन्तारं वेत्ति यश्च एनं हतं मन्यते तावुभावपि न विजानीतः। अयं न हन्ति न वा हन्यते। मदिच्छयैव सर्वं भवतीति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.19।।ननुनासतो विद्यते भावः इति न्यायेनासतो मात्रादेर्मिथ्यात्वेन निःस्वरूपत्वात्कर्तृत्वं न संभवति। अतः सत एव कर्तृत्वं बन्धमोक्षभाक्त्वं च वाच्यम्। अन्यथाऽन्तःकरणे बन्ध आत्मनश्च मोक्ष इति तयोर्वैयधिकरण्यं स्यात्। तथा येन सर्वमिदं ततमिति सतो देहाद्युपादानत्वं चोक्तम्। तथा च हननक्रियां प्रत्येकस्यैव कर्तृत्वं कर्मत्वं चापतति तच्च विरुद्धम्। स्वात्मनि स्वव्यापारायोगात्। नहि वह्निर्वह्निं दहतीति युक्तमित्याशङ्क्याह   य एनमिति।  यश्च तार्किकादिरेनमात्मानं हन्तारं हननक्रियायाः कर्तारं मन्यते यश्च चार्वाकादिरेनं हतं हननक्रियायाः कर्मीभूतं मन्यते तावुभावपि न जानीतः। आत्मतत्त्वमिति शेषः। यस्मान्नायं हन्ति न हन्यते। नहि यः कर्ता स आत्मा नापि देह आत्मा तयोः प्रागेवानात्मत्वावधारणात्। अयं भावः  यथायःपिण्डे वह्निसंबन्धादेव दग्धृत्वं न तु स्वतः एवं मात्राद्युदयसमनियतं कर्तृत्वं मात्रादिधर्म एव नात्मनः। आत्मनि तु कर्तृत्वप्रतीतिर्मात्रादिसंबन्धादेव। अतो मात्रादिविशिष्टस्यैव बन्धो न केवलस्य। मोक्षश्च मात्रादिवियोग एवेति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यम्। न च मात्रादेर्निःस्वरूपत्वमस्ति। सत्त्वासत्त्वाभ्यामनिर्वचनीयस्य व्यवहारयोग्यस्य ब्रह्मज्ञानैकबाध्यस्य स्वप्नमायागन्धर्वनगरादितुल्यस्य तत्स्वरूपस्याभ्युपगमात्। तस्मान्न कर्तृत्वमात्मधर्मः। यथोक्तम्आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्मा काङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम्। नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः। इति। किञ्च कर्तृत्वं रागद्वेषादिविकारवत् एव संभवति तद्वांश्च दुःखीत्यात्मनोऽनुभूयमानं साक्षित्वं बाध्येत। यथोक्तम्नर्ते स्याद्विक्रियां दुःखी साक्षिता का विकारिणः। धीविक्रियासहस्राणां साक्ष्यतोऽहमविक्रियः। इति। न च सतो देहाद्युपादानत्वेन हननक्रियाकर्मत्वं संभवति। विवर्तवादाभ्युपगमात्। नह्यध्यस्तस्य धर्मैरधिष्ठाने विकारो दृश्यते। यथोक्तं भाष्येयत्र यदध्यस्तं सत्तत्कृतेन गुणेन दोषेण वाऽणुमात्रेणापि न संबध्यते इति। विवृतं चैतद्वृद्धैःनहि भूमिरूषरवती मृगतृट्जलवाहिनीं सरितमुद्वहति। मृगवारिपूरपरिपूरवती न नदी तथोषरभुवं स्पृशति। इति। एतेन कर्तृत्वकर्मत्वयोरनात्मधर्मत्वादनात्मनश्चानेकरूपत्वादेकत्रात्मनि तदुभयविरोधोद्भावनमपि निरस्तं वेदितव्यम्। एवं चार्वाकतार्किकाभिमतौ देहात्मकर्त्रात्मवादौ।हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति च हन्यते। इति काठकोक्तेन मन्त्रेण पूर्वार्धे पाठभेदात्पठितेन परिहृतौ वेदितव्यौ।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Neither he who thinks the living entity the slayer nor he who thinks it slain is in knowledge, for the self slays not nor is slain.",
        "ec": " When an embodied living entity is hurt by fatal weapons, it is to be known that the living entity within the body is not killed. The spirit soul is so small that it is impossible to kill him by any material weapon, as will be evident from subsequent verses. Nor is the living entity killable, because of his spiritual constitution. What is killed, or is supposed to be killed, is the body only. This, however, does not at all encourage killing of the body. The Vedic injunction is mā hiṁsyāt sarvā bhūtāni: never commit violence to anyone. Nor does understanding that the living entity is not killed encourage animal slaughter. Killing the body of anyone without authority is abominable and is punishable by the law of the state as well as by the law of the Lord. Arjuna, however, is being engaged in killing for the principle of religion, and not whimsically."
    }
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