{
    "_id": "BG2.17",
    "chapter": 2,
    "verse": 17,
    "slok": "अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |\nविनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ||२-१७||",
    "transliteration": "avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṃ tatam .\nvināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ||2-17||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।2.17।। उस वस्तु को तुम अविनाशी जानों,  जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। इस अव्यय का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "2.17 Know that to be indestructible, by Which all this is pervaded. None can cause the destruction of That, the Imperishable.",
        "ec": "English Commentary By Swami Sivananda2.17 अविनाशि indestructible? तु indeed? तत् That? विद्धि know (thou)? येन by which? सर्वम् all? इदम् this? ततम् is pervaded? विनाशम् destruction? अव्ययस्य अस्य of this Imperishable? न not? कश्चित् anyone? कर्तुम् to do? अर्हति is able.Commentary -- Brahman or Atman pervades all the objects like ether. Even if the pot is broken? the ether that is within and without the pot cannot be destroyed. Even so? if the bodies and all other objects perish? Brahman or the Self that pervades them cannot perish. It is the living Truth? Sat.Brahman has no parts. There cannot be either increase or diminution in Brahman. People are ruined by loss of wealth. But Brahman does not suffer any loss in that way. It is inexhaustible. Therefore? none can bring about the disappearance or destruction of the Self. It always exists. It is always allfull and selfcontained. It is Existence Absolute. It is immutable."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "2.17 The Spirit, which pervades all that we see, is imperishable. Nothing can destroy the Spirit."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।2.17।। समस्त जगत् को जो व्याप्त किये हुये है और इस दृश्यमान अनुभव में आने वाले जगत् का जो अधिष्ठान है वह सत् है। मिट्टी के बने अनेक प्रकार के पात्र होते हैं जिनके विभिन्न उपयोगों के कारण अथवा उनमें रखी वस्तुओं के कारण उनके विभिन्न नाम होते हैं परंतु विविध आकारों के होने पर भी वे सब एक मिट्टी के ही बने होते हैं जो सब आकारों में व्याप्त होती है और जिसके बिना किसी भी पात्र का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। उन सब की उत्पत्ति स्थिति और लय मिट्टी में ही है। अत उनमें मिट्टी ही वास्तव में सत्य है।\nइसी प्रकार यह नित्य परिवर्तनशील जगत् नित्य अविनाशी तत्त्व से व्याप्त है और भगवान् कहते हैं कि इस तत्त्व का विनाश कदापि सम्भव नहीं है।\n\nतब फिर असत् क्या है जिसका अस्तित्व नित्य नहीं है सुनो"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "2.17. And  know That to be destructionsless,  by Which all this (universe) is pervaded; no one is capable of causing destruction to this changeless One."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "2.17 Know That to be indestructible by which all this is pervaded. None can cause the destruction of This Immutable."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "2.17 But know That to be indestructible by which all this is pervaded. None can bring about the destruction of this Immutable."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya।।2.17।।किं बहुना यद्देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव। वेदाद्यन्यदपीत्याह अविनाशीति। नापि शापादिना विनाश इत्याह विनाशमिति। अव्ययं च तत्।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri।।2.17।।ननु सदिति सामान्यं स्वरूपं वा। प्रथमे तस्य विशेषसापेक्षतया प्रलयदशायामशेषविशेषविनाशे विनाशः स्यात्। नचात्मादयो विशेषास्तदापि सन्तीति वाच्यम्। आत्मातिरिक्तानां विशेषाणां कार्यत्वाङ्गीकारात्प्रलयावस्थायामनवस्थानादात्मनस्तु सामान्यात्मनो धर्मित्वादुक्तदोषाद् द्वितीये तु स्वरूपस्य व्यावृत्तत्वे कल्पितत्वाद्विनाशित्वमनुवृत्तत्वे तस्यैव सामान्यतया प्रागुक्तदोषानुषक्तिरिति मन्वानश्चोदयति  किं   पुनरिति।  सामान्यविशेषभावशून्यमखण्डैकरसं सदेवेत्यादिश्रुतिप्रमितं सर्वविक्रियारहितं वस्तु प्रकृतं सद्विवक्षितमित्युत्तरमाह  उच्यत इति।  आत्मनः सदात्मनो विनाशराहित्यविज्ञाने सर्वजगद्व्यापकत्वं हेतुमाह  येनेति।  आत्मनो विनाशाभावे युक्तिमाह  विनाशमिति।  आत्मनो विनाशमिच्छता स्वतो वा परतो वा नाशस्तस्येष्यते। नाद्य इत्याह  अविनाशीति।  देहादिद्वैतमसदुच्यते ततः सतो विशेषणं स्वतो नाशराहित्यम्। तस्य द्योतको निपात इत्याह  तुशब्द इति।  आकाङ्क्षापूर्वकं विशेष्यं दर्शयति  किमित्यादिना।  विमतमविनाशि व्यापकत्वादाकाशवत् नहि प्रमितमेवोदाहरणं किंतु प्रसिद्धमपीति भावः। न द्वितीय इत्याह  विनाशमिति।  न खल्वस्य विनाशं कर्तुं कश्चिदर्हतीति संबन्धः। विनाशस्य सावशेषत्वनिरवशेषत्वाभ्यां द्वैराश्यमाश्रित्य व्याकरोति  अदर्शनमिति।  न कश्चिदस्याभावं कर्तुं शक्नोतीत्यत्र हेतुमाह  अव्ययस्येति।  ब्रह्म हि स्वरूपेण व्येति स्वसंबन्धिना वेति विकल्प्याद्यं दूषयति  नैतदिति।  नहि निरवयवस्य स्वावयवापचयरूपव्ययः संभवतीत्यत्र वैधर्म्यदृष्टान्तमाह  देहादिवदिति।  द्वितीयं निरस्यति  नापीति।  तदेव व्यतिरेकदृष्टान्तेन स्पष्टयति   यथेति।  द्विविधेऽपि व्ययायोगे फलितमाह  अत इति।  किञ्च ब्रह्म परतो न नश्यत्यात्मत्वाद्धटवदित्याह  न कश्चिदिति।  आत्मत्वहेतोरसिद्धिमुद्धरति  आत्मा हीति।  तादात्म्यश्रुतिरत्र हीति हेतू क्रियते। अस्तु तर्हि स्वयमेव ब्रह्मात्मनो नाशकमुद्बन्धनादिदर्शनान्नेत्याह  स्वात्मनीति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।2.17।। अविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता।",
        "hc": "।।2.17।। व्याख्या-- 'अविनाशि तु तद्विद्धि'-- पूर्वश्लोकमें जो सत्-असत् की बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्' की व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।\n'उस अविनाशी तत्त्वको तू समझ'--ऐसा कहकर भगवान्ने उस तत्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें तात्पर्य है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है, यह 'नहीं' है।\nयहाँ 'तत्' पदसे सत्त-त्त्वको परोक्षरीतिसे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको परोक्षरीतिसे कहा गया है।\n'येन सर्वमिदं ततम् (टिप्पणी प'0 57.1)--जिसको परोक्ष कहा है उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना, लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त (परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्त-त्त्व ही व्याप्त है। अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्त-त्त्व ही जाननेयोग्य है।\n'विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति'--यह शरीरी अव्यय  (टिप्पणी प0 57.2)  अर्थात् अविनाशी है। इस अविनाशीका कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी है-- क्योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा है। अतः इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फरक नहीं पड़ेगा अर्थात् अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही।\nयहाँ 'अस्य' पदसे सत्त-त्त्वको इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता दीखती है, वह इसी सत्त-त्त्वकी ही है। 'मेरा शरीर है और मैं शरीरधारी हूँ'--ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, उसीको लक्ष्य करके भगवान्ने यहाँ 'अस्य' पद दिया है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja।।2.17।। तद्  आत्मतत्त्वम्  अविनाशि  इति  विद्धि   येन  आत्मतत्त्वेन चेतनेन तद्व्यतिरिक्तम्  इदम्  अचेतनतत्त्वं  सर्वं ततं  व्याप्तम्। व्यापकत्वेन निरतिशयसूक्ष्मत्वाद् आत्मनो विनाशानर्हस्य तद्व्यतिरिक्तो  न कश्चित्  पदार्थो  विनाशं कर्तुम् अर्हति  तद्व्याप्यतया तस्मात् स्थूलत्वात्। नाशकं हि शस्त्रं जलाग्निवाय्वादिकं नाश्यं व्याप्य शिथिलीकरोति। मुद्गरादयः अपि हि वेगवत्संयोगेन वायुम् उत्पाद्य तद्द्वारेण नाशयन्ति अत आत्मतत्त्वम्\n\nअविनाशि।\nदेहानां तु विनाशित्वम् एव स्वभाव इत्याह",
        "et": "2.17 Know that the self in its essential nature is imperishable. The whole of insentient matter, which is different (from the self), is pervaded by the self. Because of pervasiveness and extreme subtlety, the self cannot be destroyed; for every entity other than the self is capable of being pervaded by the self, and hence they are grosser than It. Destructive agents like weapons, water, wind, fire etc., pervade the substances to be destroyed and disintegrate them. Even hammers and such other instruments rouse wind through violent contact with the objects and thery destroy their objects. So, the essential nature of the self being subtler than anything else, It is imperishable.\n\n(The Lord) now says that the bodies are perishable:"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta।।2.17।।तदेतत्संक्षिप्याह\nनासत इति। अथ च लोकवृत्तेनेदमाह असतः नित्यविनाशिनः शरीरस्य न भावः अनवरतमवस्थाभिः परिणामित्वात्। नित्यसतश्च परमात्मनो नास्ति कदाचिद्विनाशः अपरिणामधर्मत्वात्। तथा च वेदः\n\nअविनाशी वा अरेऽप्यमात्मानुच्छित्तिधर्मा (बृ. उप. 4.5.14) इति। अनयोः सदसतोः अन्तः प्रतिष्ठापदं यत्रानयोर्विश्रान्तिः।",
        "et": "2.17 Avinasi etc  [Here]  tu is in the sense of ca 'and'.  So, 'and' the Soul is not of perishing nature."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।2.17।।तो जो निस्सन्देह सत् है और सदैव रहता है वह क्या है इसपर कहा जाता है\n\nनष्ट न होना जिसका स्वभाव है वह अविनाशी है। तु शब्द असत्से सत्की विशेषता दिखानेके लिये है।\nउसको तू ( अविनाशी ) जान समझ किसको जिस सत् शब्दवाच्य ब्रह्मसे यह आकाशसहित सम्पूर्ण विश्व आकाशसे घटादिके सदृश व्याप्त है।\nइस अव्ययका अर्थात् जिसका व्यय नहीं होता जो घटताबढ़ता नहीं उसे अव्यय कहते हैं उसका विनाशअभाव ( करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है )।\nक्योंकि यह सत् नामक ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण देहादिकी तरह अपने स्वरूपसे नष्ट नहीं होता अर्थात् इसका व्यय नहीं होता।\nतथा इसका कोई निजी पदार्थ नहीं होनेके कारण निजी पदार्थोंके नाशसे भी इसका नाश नहीं होता जैसे देवदत्त अपने धनकी हानिसे हानिवाला होता है ऐसे ब्रह्म नहीं होता।\nइसलिये कहते हैं कि इस अविनाशी ब्रह्मका विनाश करनेके लिये कोई भी समर्थ नहीं है। कोई भी अर्थात् ईश्वर भी अपने आपका नाश नहीं कर सकता।\nक्योंकि आत्मा ही स्वयं ब्रह्म है और अपने आपमें क्रियाका विरोध है।",
        "sc": "।।2.17।।\n अविनाशि  न विनष्टुं शीलं यस्येति। तु शब्दः असतो विशेषणार्थः।  तत् विद्धि  विजानीहि। किम्  येन सर्वम् इदं  जगत्  ततं  व्याप्तं सदाख्येन ब्रह्मणा साकाशम् आकाशेनेव घटादयः।  विनाशम्  अदर्शनम् अभावम्। अव्ययस्य न व्येति उपचयापचयौ न याति इति अव्ययं तस्य अव्ययस्य। नैतत् सदाख्यं ब्रह्म स्वेन रूपेण व्येति व्यभिचरति निरवयवत्वात् देहादिवत्। नाप्यात्मीयेन आत्मीयाभावात्।\nयथा देवदत्तो धनहान्या व्येति न तु एवं ब्रह्म व्येति। अतः अव्ययस्य  अस्य  ब्रह्मणः विनाशं  न कश्चित् कर्तुमर्हति  न कश्चित् अत्मानं विनाशयितुं शक्नोति ईश्वरोऽपि। आत्मा हि ब्रह्म स्वात्मनि च क्रियाविरोधात्।।\nकिं पुनस्तदसत् यत्स्वात्मसत्तां व्यभिचरतीति उच्यते",
        "et": "2.17 Tu, but  this word is used for distinguishing (reality) from unreality; tat viddhi, know That; to be avinasi, indestructible, by nature not subject to destruction; what? (that) yena, by which, by which Brahman called Reality; sarvam, all; idam, this, the Universe together with space; is tatam, pervaded, as pot etc. are pervaded by space. Na kascit, none; arhati, can; kartum, bring about; vinasam, the destruction, disappearance, nonexistence; asya, of this avyayasya, of the Immutable, that which does not undergo growth and depletion. By Its very nature this Brahman called Reality does not suffer mutation, because, unlike bodies etc., It has no limbs; nor (does It suffer mutation) by (loss of something) belonging to It, because It has nothing that is Its own. Brahman surely does not suffer loss like Devadatta suffering from loss of wealth. Therefore no one can bring about the destruction of this immutable Brahman. No one, not even God Himself, can destroy his own Self, because the Self is Brahman. Besides, action with regard to one's Self is self-contradictory.\nWhich, again, is that 'unreal' that is said to change its own nature? This is being answered:"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha।।2.17।।अविनाशि तु इति श्लोके सर्वगतस्य नित्यत्वमुच्यते तत्प्रकृतानुपयुक्तमित्याशङ्क्य पूर्वार्धं तावत्प्रकृतोपयोगं सूचयन्व्याचष्टे  किं बहुने ति। वाक्यानामुपासनार्थत्वात् सम्प्रदायस्य च मूलानिश्चयात् प्रकृतिब्रह्मणो स्वरूपस्यैवासिद्धेः जीवादन्यस्यानादिनित्यस्याभावात् पुनरन्यस्य व्याप्त्यसिद्धिरित्याशङ्क्य किं बहुना प्रकृत्यादिस्वरूपसाधनेन किञ्चेदमिदं नित्यमिति बहुना प्रत्येकमुक्तेन  यद्देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेवे त्येवं सङ्ग्राहकसङ्गृहीतं वेदादिकं जीवादन्यदप्यस्ति तद्व्याप्तिग्रहणस्थलं भविष्यतीत्याह भगवानित्यर्थः। वेदशब्देन वर्णा गृह्यन्ते।  आदि पदेनाकाशादयः। एतेषां च प्रत्यभिज्ञानादिना नित्यत्वसिद्धिः। ननु कालावयवाः क्षणादयः सर्वगता अपि न नित्याः सत्यं नह्यत्र व्याप्तिरुच्यते किन्तु बहूक्तिपरिहारायोपलक्षणमात्रमिति। तुशब्दार्थं एवेति। तथाप्युत्तरार्धः पुनरुक्त इत्यत आह  नापी ति। पूर्वं स्वाभाविको नाशो निषिद्धः अविनाशीति ताच्छीलिकप्रत्ययात्। अत्र तु नैमित्तिकः कश्चित्कर्तुं नार्हतीति वचनात्। प्रागनुक्तस्य वेदादेरव्ययत्वस्य कथमनुवाद इति अत आह  अव्ययमि ति। विधानमेवेदं कैमुत्येन शापादिना विनाशस्याभावं साधयितुमिति भावः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya।।2.17।।क्षयविनाशौ निराकरोति अविनाशीति। पुनः तदात्मवस्तु अविनाशि विद्धि। किम्भूतं येन सर्वमिदं देहादि विश्वं ततं व्याप्तं असदपि विनश्यदवस्थमपि सदिति व्यवह्रियते। अव्ययस्य क्षयरहितस्यास्योपलभ्यमानस्य तदुत्तरतोप्यदृश्यमानं विनाशं कर्त्तुं कश्चिज्जनः शस्त्राग्न्यादिभिश्च नार्हति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati।।2.17।।नन्वेतादृशस्य सतो ज्ञानाद्भेदे परिच्छिन्नत्वापत्तेर्ज्ञानात्मकत्वमभ्युपेयं तच्चानाध्यासिकम् अन्यथा जडत्वापत्तेः। तथाचानाध्यासिकज्ञानरूपस्य सतो धात्वर्थत्वादुत्पत्तिविनाशवत्त्वं घटज्ञानमुत्पन्नं घटज्ञानं नष्टमिति प्रतीतेश्च। एवंचाहं घटं जानामीति प्रतीतेस्तस्य साश्रयत्वं सविषयत्वं चेति देशकालवस्तुपरिच्छिन्नत्वात्स्फुरणस्य कथं तद्रूपस्य सतो देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्यत्वमित्याशङ्क्याह विनाशो देशतः कालतो वस्तुतो वा परिच्छेदः सोऽस्यास्तीति विनाशि परिच्छिन्नं तद्विलक्षणमविनाशि सर्वप्रकारपरिच्छेदशून्यं तु एव तत् सद्रूपं स्फुरणं त्वं विद्धि जानीहि। किं तत्। येन सद्रूपेण स्फुरणेनैकेन नित्येन विभुना सर्वमिदं दृश्यजातं स्वतः सत्तास्फूर्तिशून्यं ततं व्याप्तं स्वसत्तास्फूर्त्यध्यासेन रज्जुशकलेनेव सर्पधारादि स्वस्मिन्समावेशितं तदविनाश्येव विद्धीत्यर्थः। कस्मात्। यस्मात् विनाशं परिच्छेदं अव्ययस्यापरिच्छिन्नस्यापरोक्षस्य सर्वानुस्यूतस्य स्फुरणरूपस्य सतः कश्चित् कोऽप्याश्रयो वा विषयो वा इन्द्रियसंनिकर्षादिरूपो हेतुर्वा न कर्तुमर्हति समर्थो न भवति कल्पितस्याकल्पितपरिच्छेदकतायोगात् आरोपमात्रे चेष्टापत्तेः। अहं घटं जानामीत्यत्र ह्यहंकार आश्रयतया भासते घटस्तु विषयतया। उत्पत्तिविनाशवती काचिदहंकारवृत्तिस्तु सर्वतो विप्रसृतस्य सतः स्फुरणस्य व्यञ्जकतया आत्ममनोयोगस्य परैरपि ज्ञानहेतुत्वाभ्युपगमात् तदुत्पत्तिविनाशेनैव च तदुपहिते स्फुरणरूपे सत्युत्पत्तिविनाशप्रतीत्युपपत्तेर्नैकस्य स्फुरणस्य स्वत उत्पत्तिविनाशकल्पनाप्रसङ्गः ध्वन्यवच्छेदेन शब्दवद्धटाद्यवच्छेदेनाकाशवच्च। अहंकारस्तु तस्मिन्नध्यस्तोऽपि तदाश्रयतया भासते तद्वृत्तितादात्म्याध्यासात् सुषुप्तावहंकाराभावेऽपि तद्वासनावासिताज्ञानभासकस्य चैतन्यस्य स्वतःस्फुरणात् अन्यथैतावन्तं कालमहं किमपि नाज्ञासिषमिति सुषुप्तोत्थितस्य स्मरणं न स्यात्। नचोत्थितस्य ज्ञानाभावानुमितिरियमिति वाच्यम्। सुषुप्तिकालरूपपक्षाज्ञानाल्लिङ्गासंभवाच्चास्मरणादेर्व्यभिचारित्वात् स्मरणाजनकनिर्विकल्पकाद्यभावासाधकत्वाच्च। ज्ञानसामग्र्यभावस्य चान्योन्याश्रयग्रस्तत्वात्। तथाच श्रुतिःयद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तद्द्रष्टव्यं न पश्यति नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् इत्यादिः। सुषुप्तौ स्वप्रकाशस्फुरणसद्भावं तन्नित्यतया दर्शयति। एवं घटादिर्विषयोऽपि तदज्ञातावस्थाभासके स्फुरणे कल्पितः। य एव प्रागज्ञातः स एवेदानीं मया ज्ञात इति प्रत्यभिज्ञानात्। अज्ञातज्ञापकत्वं हि प्रामाण्यं सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। यथार्थानुभवः प्रमेति वदद्भिस्तार्किकैरपि ज्ञातज्ञापिकायाः स्मृतेर्व्यावर्तकमनुभवपदं प्रयुञ्जानैरेतदभ्युपगमात्। अज्ञातत्वं च घटादेर्न चक्षुरादिना परिच्छिद्यते तत्रासामर्थ्यात्तज्ज्ञानोत्तरकालमज्ञानस्यानुवृत्तिप्रसङ्गाच्च। नाप्यनुमानेन लिङ्गाभावात्। नहीदानीं ज्ञातत्वेन प्रागज्ञातत्वमनुमातुं शक्यं धारावाहिकानेकज्ञानविषये व्यभिचारात्। इदानीमेव ज्ञातत्वं तु प्रागज्ञातत्वे सतीदानीं ज्ञातत्वरूपं साध्याविशिष्टत्वादसिद्धम्। नचाज्ञातावस्थाज्ञानमन्तरेण ज्ञानं प्रति घटादेर्हेतुता ग्रहीतुं शक्यते पूर्ववर्तित्वाग्रहात् घटं न जानामीति सार्वलौकिकानुभवविरोधश्च। तस्मादज्ञातं स्फुरणं भासमानं स्वाध्यस्तं घटादिकं भासयतीति घटादीनामज्ञाते स्फुरणे कल्पितत्वसिद्धिः। अन्यथा घटादेर्जडत्वेनाज्ञातत्वतद्भानयोरनुपपत्तेः स्फुरणं चाज्ञातं स्वाध्यस्तेनैवाज्ञानेनेति स्वयमेव भगवान्वक्ष्यतिअज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः इत्यत्र। एतेन विभुत्वं सिद्धम्। तथाच श्रुतिःमहद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एव इतिसत्यं ज्ञानमनन्तम् इति च ज्ञानस्य महत्त्वमनन्तत्वं च दर्शयति। महत्त्वं स्वाध्यस्तसर्वसंबन्धित्वं अनन्तत्वं त्रिविधपरिच्छेदशून्यत्वमिति विवेकः। एतेन शून्यवादोऽपि प्रत्युक्तः निरधिष्ठानभ्रमायोगान्निरवधिबाधायोगाच्च। तथाच श्रुतिःपुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इति सर्वबाधावधिं पुरुषं परिशिनष्टि। उक्तंच भाष्यकारैःसर्वं विनश्यद्वस्तुजातं पुरुषान्तं विनश्यति पुरुषो विनाशहेत्वभावान्न विनश्यति इति। एतेन क्षणिकवादोऽपि परास्तः। अबाधितप्रत्यभिज्ञानादन्यदृष्टान्यस्मरणाद्यनुपपत्तेश्च। तस्मादेकस्य सर्वानुस्यूतस्य स्वप्रकाशस्फुरणरूपस्य सतः\n\nसर्वप्रकारपरिच्छेदशून्यत्वादुपपन्नं नाभावो विद्यते सत इति।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami।।2.17।।तत्र सत्स्वभावमविनाशि वस्तु सामान्येनोक्तं विशेषतो दर्शयति  अविनाशीति।  येन सर्वमिदमागमापायधर्मकं देहादिततं तत्साक्षित्वेन व्याप्तम्। तत्तु आत्मस्वरूपमविनाशि विनाशशून्यं विद्धि जानीहि। तत्र हेतुमाह  विनाशमिति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।2.17।।किं तत्सदित्याकाङ्क्षायामाह  अविनाशि त्विति।  न विनष्टुं शीलमस्येति तत् जानीहि। तुशब्दोऽसतो व्यावृत्त्यर्थः। किं येनेदं सर्वं व्याप्तं निरवयवत्वात् स्वरुपेण देहादिवत् आत्मीयाभावात् धनादिहान्या देवदत्तवच्च न व्येतीत्यव्ययं तस्यास्याव्ययस्य ब्रह्मणः स्वस्वरुपस्य विनाशमभावं बाधं न कश्चित् ईश्वरोऽपि कर्तुमर्हति शक्नोति। स्वात्मनि क्रियाविरोधात्। ननु नन्वेतादृशस्य सतो ज्ञानाद्भेदेपरिच्छिन्नत्वापत्तेर्ज्ञानात्मकत्वसभ्युपेयं तच्चानाध्यासिकं अन्यथा जडत्वापत्तेः। तथा चानाध्यासिकज्ञानरुपस्य सतो धात्वर्थत्वादुत्पत्तिविनाशवत्त्वं घटज्ञानमुत्पन्नं घटज्ञानं नष्टमिति प्रतीतेश्च। एवं चाहं घटं जानामीति प्रतीतेस्तस्य साश्रयत्वं सविषयत्वं चेति देशकालवस्तुपरिच्छिन्नत्वास्फुरणस्य कथं तद्रूपस्य सतो देशकालवस्तुपरिच्छिन्नशून्यत्वमित्याशङक्याह  अविनाशि।  त्रिविधपरिच्छेदशून्यं तु एव तत्सद्रूपं स्फुरणं विद्धि। किं तत्। येनेदं सर्वं ततं रज्जुशकलेनेव सर्पधारादि स्वस्मिन्समावेशितं यस्माद्विनाशं परिच्छेदमव्ययस्यापरिच्छिन्नस्यास्य कोऽप्याश्रयो वा विषयो वा इन्द्रियसंनिकर्षादिरुपो हेतुर्वा न कर्तुमर्हतीति। भाष्यकृद्भिः कुतो न व्याख्यातमितिचेन्मूलाक्षरैरुक्तशङ्कोत्तरस्य घटादिज्ञानस्य व्यावृत्त्यात्मकस्यात्मन्यध्यस्तत्वेऽपि तस्य स्वप्रकाशत्वान्न जडत्वं व्यावृत्त्योदेरुत्पत्त्यादिमत्त्वेऽपि तस्य न तत्त्वमित्येवमादिरुपस्याप्रतीतेः उत्तरत्रान्तवन्त इमे देहा इत्यस्य स्थानेऽन्तवत्य इमा वृत्तय इति वक्तव्यत्वापत्तेः। एतेषां नाशो भविष्यतीत्यर्जुनस्य भ्रमनिराकरणायात्मसंसृष्टदेहाद्यसत्यत्वप्रतिपादनस्यावश्यकत्वेनाश्रयत्वेत्यादेरार्थिकत्वाच्चेति गृहाण। किंच शुक्त्यध्यस्तरजतज्ञानस्य कल्पितत्वत्सदव्यस्तघटादिज्ञानस्याप्यध्यस्तत्वेन कल्पितत्वस्य सद्बुद्धिरसद्बुद्धिरित्यादिभाष्येण प्रदर्शितत्वादुक्तशङ्कानुत्थानमित्यभिप्रेत्याचार्यैरेवं न व्याख्यातमिति दिक्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।2.17।।अथ प्राप्यविशेषणतया तदनुवेशात् पुरुषार्थभूतस्य सहसैव शोकनिवृत्तिहेतोरात्मनित्यत्वस्यनासतः इति श्लोके चरमप्रतिज्ञातस्यापि बुद्धिस्थक्रमेण प्रथममुपपादनं क्रियते इत्यभिप्रायेणाह आत्मनस्त्विति।तुशब्देन जननमरणादेः सर्वलोकसाक्षिकत्वात् एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति बृ.उ.2।4।12 इति देहसमानयोगक्षेमत्वश्रवणाच्च कथमात्मनो देहाद्विशेषः। इत्यभिप्रेतम्। एवमपि विशेषोऽस्तीति श्लोकस्थतुशब्दार्थः। तच्छब्दार्थं नपुंसकतात्पर्यं प्रतिज्ञांशं तत्राप्याश्रयसाध्यधर्मयोर्भेदं च व्यनक्ति तदात्मतत्त्वमिति। न विनष्टुं शीलमस्येत्यविनाशि। हेत्वंशप्रतिपादकद्वितीयपादं व्याकुर्वन् सर्वशब्दस्य वाक्यान्वयौचित्यप्राप्तं सङ्कोचं इदन्त्वनिर्देशस्वारस्यसूचितं बाह्यानां पराक्त्वं तद्विपर्ययेणात्मनः फलितं चेतनत्वं तत एवाचेतने चेतनस्यात्मत्वेन व्याप्तिं च गमयति येनेति। चेतनसमुदायेन अचेतनसमुदायः तिलतैलदारुवह्न्यादिवद्यथांशं व्याप्त इत्यर्थः। यद्वा सर्वाचेतनानुप्रवेशयोग्यत्वमिह विवक्षितमित्युभयथापि नात्माणुत्वविरोधः।\nअत्रायं प्रयोगः आत्मा शस्त्राद्यधीनविनाशो न भवति तद्व्यापकत्वेन ततः सूक्ष्मत्वात् यथाऽऽकाशः। व्यतिरेकेण वा यो यदधीनविनाशः स ततः सूक्ष्मो न भवति यथा वायुविनाश्यो दीपः इति। इमं प्रयोगं व्यञ्जयन् प्रयोगान्तरपरतयोत्तरार्धं व्याचष्टे व्यापकत्वेनेति।विनाशानर्हस्येत्यव्ययशब्दार्थः। तस्य हेतुःनिरतिशयसूक्ष्मत्वादिति। इदं च निरतिशयसूक्ष्मत्वमचेतनापेक्षया।कश्चित् इत्यस्येश्वरोऽपीति परस्य व्याख्या स्वदर्शनविरुद्धेत्यभिप्रायेणाह तद्व्यतिरिक्तः कश्चित्पदार्थ इति। धर्मिनिर्देशोऽयम्। आत्मनो विनाशं कर्तुं नार्हतीति साध्यार्थः। तत्र हेतुमाह तद्व्याप्यतया तस्मात्स्थूलत्वादिति। तस्मात्स्थूलत्वादित्येव हेतुः।\n\nतस्यासिद्धिपरिहारायोक्तं तद्व्याप्यतयेति। व्याप्तिपूर्वं दृष्टान्तमाह नाशकमिति। घटादिनाशकमुद्गरादावनैकान्त्यमाशङ्क्य परिहरति मुद्गरेति।\nअयमभिप्रायः न तावन्मुद्गरादेः संयोगमात्रं घटादिनाशकम् मुद्गरोपरिस्थापितघटस्य नाशप्रसङ्गात्। नापि वेगमात्रम् असंयोगेऽपि ध्वंसप्रसङ्गात्। नापि तदुभयमात्रं वेगवत्तृणसंयोगेऽपि प्रसङ्गात्। न च वेगवद्द्रव्यविशेषसंयोगो नाशकः तस्यैव पृष्ठभागसंयोगे नाशादर्शनात्। अतो वेगवत्काठिन्यादिविशिष्टद्रव्यविशेषभागविशेषसंयोगविशेष एव नाशक इत्यविवादम्। तथा च वायुविशेषोत्पत्तिरपि प्रायशः प्रत्यक्षसिद्धत्वादविवादा। वायोश्च तत्तद्द्रव्यानुप्रवेशेन नाशकत्वं कठिनतरशब्दाभिघातसङ्क्षोभ्यमाणपदर्थेष्वभ्युपगतम्। एवं सति क्लृप्तकारणभावस्यात्रापि विद्यमानस्य वायुविशेषस्य नाशहेतुत्वं अवश्याभ्युपगमनीयम्। स च वायुर्घटाद्यपेक्षया सूक्ष्मः। यत्र तु वेगाभावेऽप्याक्रमणादिमात्रेण नाशकत्वम् तत्र मुद्गरावयवनुन्नघटादिद्रव्यावयवविशेषा भागान्तरं स्वस्मात् स्थूलतरमनुप्रविश्य भिन्दन्ति आक्रमणमूलान्तरवायुनिस्सरणवशाद्वा वायुपूरितभस्त्रिकाक्रमणादिष्विवेति।अत इति उक्तहेतुद्वयेन शस्त्रादेरनाशकत्वात्। आत्मनोऽपि सूक्ष्मतरस्य तन्नाशकस्यान्यस्यादर्शनादीश्वरस्यापि तन्नाशसङ्कल्पाभावादिति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।2.17।।नन्वलौकिकत्वाद्देहनाशो मास्तु। परं तत्सम्बन्धिसमर्पितसेवाद्युपयुक्तपदार्थानां नाशः स्यात् तदर्थमुत्कटपापभयं भवतीति शोचामि इति चेत्तत्राह अविनाशि त्विति।येन भावात्मकभगवदीयदेहेनेदं सर्वं ततं व्याप्तं सेवादियोग्यं वस्तु तदलौकिकं शरीरं अविनाशि नाशरहितं विद्धि जानीहि। तुशब्दो नाशसम्भावनाव्यावृत्तिं ज्ञापयति। अस्याव्ययस्य स्वरूपस्य विनाशं कश्चित् पापाद्युपाधिजन्यकालादिः कर्तुं नार्हति न समर्थोऽस्तीत्यर्थः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।2.17।।यस्याभावो नास्ति तस्य सतः सत्त्वे किं मानमित्याशङ्क्याह  अविनाशीति।  तच्छब्देन प्रकृतं सत् परामृश्यते। येन सता इदं सर्वं वियदादि ततं व्याप्तम्। घटः सन्पटः सन्निति सर्वस्य सदभेदानुभवात्। यथा घटो मृत् शरावो मृदिति घटादीनां मृदभेदानुभवान्मृदुपादानकत्वं तद्वत्सर्वस्यापि सदुपादानकत्वं बोध्यम्। ननु मृद्वत्सदपि किं विकारवद्भवतीत्याशङ्क्याह  अविनाशीति।  तत् सत् अविनाशि विद्धि। अयमर्थः पूर्वावस्थापरित्यागोऽत्र विनाशः। मृद्धि पिण्डाकारतां त्यक्त्वा घटीभवति अतः सा विनाशशीला। विकारधाराश्रयत्वात्। ब्रह्म तु न तथा किं तर्हि रज्जुवत्स्वयमविनश्यदेव कार्याकारं भवति। स्वकीये च सत्तास्फुरणे कार्येऽर्पयति। अतोऽविनाशि। तथा च श्रुतयःअजायमानो बहुधा विजायतेजात एव न जायते को न्वेनं जनयेत्पुनः। अजायमानः जन्माख्यं विकारमलभमानोऽपि विजायते वियदादिरूपेणाविर्भवति। तथा लोकदृष्ट्या जातो घटादिः परमार्थदृष्ट्या न जायते। परिणाम्युपादानस्याभावात्। मृदादेस्तु स्वाप्नमृदादिवत्तुच्छत्वात्। अत एनं घटादिं को नु जनयेन्न कोऽपि। कुतस्तर्हि भासत इति चेत् रज्जूरगादिवदिति दत्तोत्तरमेतत्। तथाप्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति सतः सत्यत्वेन प्राणोपलक्षितस्य प्रपञ्चस्य सत्यत्वं सतो भानमेव प्रपञ्चस्य भानमिति। तथा च प्रपञ्चगते सत्तास्फूर्ति सतः सत्त्वे प्रमाणमित्यर्थः। श्रुतिश्चअन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः इति सतो जगदुपादानत्वं कार्यलिङ्गेन द्रढयति। सतोऽविनाशित्वं च विनाशहेत्वभावादित्याह  विनाशमिति।  न व्येति नापक्षीयत इत्यव्ययम्। एतेन सर्वविकारशून्यस्य विनाशो नास्तीत्यर्थः। अपक्षयो हि जन्मादिविकारवत् एव भवतीति स एवात्र सर्वविकारोपलक्षणतया बोध्यः। न कश्चिदित्यनेन तदन्यस्य विनाशहेतोरभावो दर्शितः।द्वितीयाद्वै भयं भवति इति श्रुतेः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "That which pervades the entire body you should know to be indestructible. No one is able to destroy that imperishable soul.",
        "ec": " This verse more clearly explains the real nature of the soul, which is spread all over the body. Anyone can understand what is spread all over the body: it is consciousness. Everyone is conscious of the pains and pleasures of the body in part or as a whole. This spreading of consciousness is limited within one’s own body. The pains and pleasures of one body are unknown to another. Therefore, each and every body is the embodiment of an individual soul, and the symptom of the soul’s presence is perceived as individual consciousness. This soul is described as one ten-thousandth part of the upper portion of the hair point in size. The Śvetāśvatara Upaniṣad (5.9) confirms this: bālāgra-śata-bhāgasya śatadhā kalpitasya ca bhāgo jīvaḥ sa vijñeyaḥ sa cānantyāya kalpate “When the upper point of a hair is divided into one hundred parts and again each of such parts is further divided into one hundred parts, each such part is the measurement of the dimension of the spirit soul.” Similarly the same version is stated: keśāgra-śata-bhāgasya śatāṁśaḥ sādṛśātmakaḥ jīvaḥ sūkṣma-svarūpo ’yaṁ saṅkhyātīto hi cit-kaṇaḥ “There are innumerable particles of spiritual atoms, which are measured as one ten-thousandth of the upper portion of the hair.” Therefore, the individual particle of spirit soul is a spiritual atom smaller than the material atoms, and such atoms are innumerable. This very small spiritual spark is the basic principle of the material body, and the influence of such a spiritual spark is spread all over the body as the influence of the active principle of some medicine spreads throughout the body. This current of the spirit soul is felt all over the body as consciousness, and that is the proof of the presence of the soul. Any layman can understand that the material body minus consciousness is a dead body, and this consciousness cannot be revived in the body by any means of material administration. Therefore, consciousness is not due to any amount of material combination, but to the spirit soul. In the Muṇḍaka Upaniṣad (3.1.9) the measurement of the atomic spirit soul is further explained: eṣo ’ṇur ātmā cetasā veditavyo yasmin prāṇaḥ pañcadhā saṁviveśa prāṇaiś cittaṁ sarvam otaṁ prajānāṁ yasmin viśuddhe vibhavaty eṣa ātmā “The soul is atomic in size and can be perceived by perfect intelligence. This atomic soul is floating in the five kinds of air ( prāṇa, apāna, vyāna, samāna and udāna ), is situated within the heart, and spreads its influence all over the body of the embodied living entities. When the soul is purified from the contamination of the five kinds of material air, its spiritual influence is exhibited.” The haṭha-yoga system is meant for controlling the five kinds of air encircling the pure soul by different kinds of sitting postures – not for any material profit, but for liberation of the minute soul from the entanglement of the material atmosphere. So the constitution of the atomic soul is admitted in all Vedic literatures, and it is also actually felt in the practical experience of any sane man. Only the insane man can think of this atomic soul as all-pervading viṣṇu-tattva. The influence of the atomic soul can be spread all over a particular body. According to the Muṇḍaka Upaniṣad, this atomic soul is situated in the heart of every living entity, and because the measurement of the atomic soul is beyond the power of appreciation of the material scientists, some of them assert foolishly that there is no soul. The individual atomic soul is definitely there in the heart along with the Supersoul, and thus all the energies of bodily movement are emanating from this part of the body. The corpuscles which carry the oxygen from the lungs gather energy from the soul. When the soul passes away from this position, the activity of the blood, generating fusion, ceases. Medical science accepts the importance of the red corpuscles, but it cannot ascertain that the source of the energy is the soul. Medical science, however, does admit that the heart is the seat of all energies of the body. Such atomic particles of the spirit whole are compared to the sunshine molecules. In the sunshine there are innumerable radiant molecules. Similarly, the fragmental parts of the Supreme Lord are atomic sparks of the rays of the Supreme Lord, called by the name prabhā, or superior energy. So whether one follows Vedic knowledge or modern science, one cannot deny the existence of the spirit soul in the body, and the science of the soul is explicitly described in the Bhagavad-gītā by the Personality of Godhead Himself."
    }
}
