{
    "_id": "BG12.14",
    "chapter": 12,
    "verse": 14,
    "slok": "सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |\nमय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ||१२-१४||",
    "transliteration": "santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ .\nmayyarpitamanobuddhiryo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||12-14||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।12.14।। जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "12.14 Ever content, steady in meditation, self-controlled, possessed of firm conviction, with the mind and intellect dedicated to Me, he, My devtoee, is dear to Me.",
        "ec": "12.14 सन्तुष्टः contented? सततम् ever? योगी Yogi? यतात्मा selfcontrolled? दृढनिश्चयः possessed of firm,conviction? मयि अर्पितमनोबुद्धिः with mind and intellect dedicated to Me? यः who? मद्भक्तः My devotee? सः he? मे to Me? प्रियः dear.Commentary He knows that all that comes to him is the fruit of his own actions in the past and so he is ever contented. He does not endeavour to attain the finite or perishable objects. He fixes his mind and intellect on the Supreme Being or the Absolute? attains eternal satisfaction and stands adamant like yonder rock? amidst the vicissitudes of time.Contentment ever dwells in the heart of My devotee. Like the ocean which is ever full? his heart is ever full as he has no cravings. He is ever cheerful and joyous. He has a feeling of fullness whether or not he gets the means for the bare sustencance of his body. He is satisfied with a little thing and he does not care whether it is good or not. He never grumbles? complains or murmurs when he does not obtain food and clothing which are necessary for the maintenance of the body. His mind is ever filled with Me through constant and steady meditation.Yogi He who has evenness of mind always. He has controlled all the senses and desires. With a firm determination he has fixed his mind and intellect on Me in a spirit of perfect selfsurrender. He is endowed with a firm conviction regarding the essential nature of the Self. He who has the knowledge through Selfrealisation? I am Asanga Akarta Suddha Satchidananda Svayamprakasa Advitiya Brahman (unattached? nondoer? pure? ExistenceKnowledgeBliss Absolute? selfluminous? nondual Brahman) is a sage of firm determination. He has given to Me exclusively his mind (the faculty that wills and doubts) and the intellect (the faculty that determines). He is dear to Me as life itself. Such a comparison falls far short of the reality.The same thing which was said by Lord Krishna to Arjuna in chapter VII. 17? I am very dear to the wise and he is very dear to Me? is here described in detail."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "12.14 Always contented, self-centred, self-controlled, resolute, with mind and reason dedicated to Me, such a devotee of Mine is My beloved."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।12.14।। प्रस्तुत अध्याय के इस अन्तिम प्रकरण में? भगवान् श्रीकृष्ण छ खण्डों में ज्ञानी भक्त के लक्षण बताते हैं? जो साधकों के लिए सम्यक् आचरण एवं जीवन पद्धति के साधन हैं। अर्जुन की समझ के लिए एक सच्चे भक्त का चित्रण करने में योगेश्वर श्रीकृष्ण पूर्णतया सफल हुए हैं। जिस प्रकार एक कुशल चित्रकार स्वयं के द्वारा बनाये जा रहे चित्र को बारबार विभिन्न् कोणों से देखते हुए उसे और अधिक स्पष्ट और सुन्दर बनाने का प्रयत्न करता है? उसी प्रकार इन सात श्लोकों के खण्ड में भगवान् श्रीकृष्ण? एक ज्ञानी भक्त के मन की सुन्दरता? बुद्धि की समता और जगत् में उसके व्यवहार का अत्यन्त स्पष्ट और सुन्दर चित्रण करते हैं। इस दृष्टि से? सम्भवत द्वितीय अध्याय में वर्णित स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों के प्रकरण के अतिरिक्त? सम्पूर्ण गीता में प्रस्तुत खण्ड के तुल्य अन्य कोई भाग नहीं है।हिन्दू धर्म के अनुयायियों पर सदाचार और नीतिशास्त्र के नियमों को ईश्वर के किसी पुत्र अथवा पैगम्बर ने अपनी स्वैच्छिक आज्ञाओं के रूप में नही थोपा है। इन आचारों एवं नीतियों की नियमावली को उन ईश्वरीय ज्ञानी? संत पुरुषों के व्यवहार को देखकर बनाया गया है? जिन्होंने आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त की थी और समाज में वैसा ही जीवन वास्तव में जिया था। ज्ञानी पुरुषों का सद्व्यवहार उनका स्वभाव बन चुका होता है? जो साधकों को अपनाने के लिए एक सूचक साधन बन जाता है। सर्वप्रथम? ज्ञानी भक्त के बाह्याचरण का अनुकरण करने से एक निष्ठावान साधक को उसकी आन्तरिक दिव्यता का भी अनुभव प्राप्त हो सकता है। इन भक्तजनों के लक्षण ही हमारे धर्म में विधान किये गये सदाचार और नीति के नियम हैं।इस खण्ड के प्रारम्भिक दो श्लोकों में ग्यारह आदर्श गुणों का वर्णन किया गया है। उनमें से प्रत्येक गुण उत्तम भक्त के नैतिक पक्ष को उजागर करता है। जिस भक्त ने यह पहचान लिया है कि भूतमात्र में एक ही आत्मा व्याप्त है? जो उसका स्वयं का ही स्वरूप है? तो ऐसा आत्मैकत्वदर्शी पुरुष किसी से भी द्वेष नहीं कर सकता? क्योंकि उसकी ज्ञान दृष्टि में कोई वस्तु परमात्मा से भिन्न है ही नहीं  कोई भी जीवित पुरुष अपने ही दाहिने हाथ से द्वेष नहीं कर सकता? क्योंकि वह उसमें भी व्याप्त है। कोई भी व्यक्ति अपने से ही द्वेष या घृणा नहीं करता।प्राणीमात्र के प्रति उसका भाव मैत्रीपूर्ण होता है? और सबके लिए उसके मन में करुणा होती है। सबको वह अभय प्रदान करता है। वह? अहंकार और वस्तुओं में ममत्व भाव से रहित होता है। सुख और दुख से सम तथा किसी के द्वारा अपशब्द कहे अथवा पीड़ित किये जाने पर भी अविकारी भाव से रहता है। शरीर धारणमात्र के लिए भी वस्तुओं के न होने पर वह सदा सन्तुष्ट एवं निजानन्द में मग्न रहता है। वह आत्मसंयमी तथा तत्त्व के स्वरूप के विषय में दृढ़ निश्चय वाला होता है। भगवान् कहते हैं कि? अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पित करने वाला मेरा भक्त? मुझे प्रिय है।भगवान् ने पहले भी सातवें अध्याय में कहा था कि? ज्ञानी को मैं और मुझे ज्ञानी भक्त अत्यन्त प्रिय है। उसी कथन को यहाँ और अधिक विस्तार से स्पष्ट किया गया है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "12.14. Who remains well-content and is a man of  Yoga at all times; who is self-controlled and is firmly resolute; and who has offered to Me his mind and intellect-that devotee of Mine is dear to Me."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "12.14 He who is content, who ever meditates and is self-restrained and who is firm in his convictions, who has his mind and reason dedicated to Me - he is dear to Me."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "12.14 He who is ever content, who is a yogi, who has self-control, who has firm conviction, who has dedicated his mind and intellect to Me-he who is such a devotee of Mine is dear to Me."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।12.14।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।12.14।।अक्षरोपासकस्य ज्ञानवतो विशेषणान्तराण्याह -- संतुष्ट इति। सततमिति सर्वत्र संबध्यते। कार्यकरणसंघातः स्वभावशब्दार्थः। स्थिरत्वं कुतर्कादिनानभिभवनीयत्वम्। मद्भक्तो मद्भजनपरो ज्ञानवानिति यावत्। ज्ञानवतो भगवत्प्रियत्वे प्रमाणमाह -- प्रियो हीति। किमर्थं तर्हि पुनरुच्यते तत्राह -- तदिहेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।12.14।।सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट,योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।",
        "hc": "।।12.14।। व्याख्या--'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्'--अनिष्ट करनेवालोंके दो भेद हैं -- (1) इष्टकी प्राप्तिमें अर्थात् धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी प्राप्तिमें बाधा पैदा करनेवाले और (2) अनिष्ट पदार्थ, क्रिया, व्यक्ति, घटना आदिसे संयोग करानेवाले। भक्तके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सिद्धान्तके प्रतिकूल चाहे कोई कितना ही, किसी प्रकारका व्यवहार करे -- इष्टकी प्राप्तिमें बाधा डाले, किसी प्रकारकी आर्थिक और शारीरिक हानि पहुँचाये, पर भक्तके हृदयमें उसके प्रति कभी किञ्चिन्मात्र भी द्वेष नहीं होता। कारण कि वह प्राणिमात्रमें अपने प्रभुको ही व्याप्त देखता है, ऐसी स्थितिमें वह विरोध करे तो किससे करे --'निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।' (मानस 7। 112 ख)।\nइतना ही नहीं वह तो अनिष्ट करनेवालोंकी सब क्रियाओंको भी भगवान्का कृपापूर्ण मङ्गलमय विधान ही मानता है!\n\nप्राणिमात्र स्वरूपसे भगवान्का ही अंश है। अतः किसी भी प्राणीके प्रति थोड़ा भी द्वेषभाव रहना भगवान्के प्रति ही द्वेष है। इसलिये किसी प्राणीके प्रति द्वेष रहते हुए भगवान्से अभिन्नता तथा अनन्यप्रेम नहीं हो सकता। प्राणिमात्रके प्रति द्वेषभावसे रहित होनेपर ही भगवान्में पूर्ण प्रेम हो सकता है। इसलिये भक्तमें प्राणिमात्रके प्रति द्वेषका सर्वथा अभाव होता है।\n\n'मैत्रः करुण एव च' (टिप्पणी प0 648) --  भक्तके अन्तःकरणमें प्राणिमात्रके प्रति केवल द्वेषका अत्यन्त अभाव ही नहीं होता, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवद्भाव होनेके नाते उसका सबसे मैत्री और दयाका व्यवहार भी होता है। भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं -- 'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता 5। 29)। भगवान्का स्वभाव भक्तमें अवतरित होनेके कारण भक्त भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् होता है -- 'सुहृदः सर्वदेहिनाम्' (श्रीमद्भागवत 3। 25। 21)। इसलिये भक्तका भी सभी प्राणियोंके प्रति बिना किसी स्वार्थके स्वाभाविक ही मैत्री और दयाका भाव रहता है --\n'हेतु रहित जग जुग उपकारी।'\n'तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। (मानस 7। 47। 3)अपना अनिष्ट करनेवालोंके प्रति भी भक्तके द्वारा मित्रताका व्यवहार होता है; क्योंकि उसका भाव यह रहता है कि अनिष्ट करनेवालेने अनिष्टरूपमें भगवान्का विधान ही प्रस्तुत किया है। अतः उसने जो कुछ किया है, मेरे लिये ठीक ही किया है। कारण कि भगवान्का विधान सदैव मङ्गलमय होता है। इतना ही नहीं, भक्त यह मानता है कि मेरा अनिष्ट करनेवाला (अनिष्टमें निमित्त बनकर) मेरे पूर्वकृत पापकर्मोंका नाश कर रहा है; अतः वह विशेषरूपसे आदरका पात्र है।साधकमात्रके मनमें यह भाव रहता है और रहना ही चाहिये कि उसका अनिष्ट करनेवाला उसके पिछले पापोंका फल भुगताकर उसे शुद्ध कर रहा है। जब सामान्य साधकमें भी अनिष्ट करनेवालेके प्रति मैत्री और करुणाका भाव रहता है, फिर सिद्ध भक्तका तो कहना ही क्या है? सिद्ध भक्तका तो उसके प्रति ही क्या, प्राणिमात्रके प्रति मैत्री और दयाका विलक्षण भाव रहता है।पातञ्जलयोगदर्शनमें चित्त-शुद्धिके चार हेतु बताये गये हैं --,'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।' (1। 33)'सुखियोंके प्रति मैत्री, दुःखियोंके प्रति करुणा, पुण्यात्माओंके प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और पापात्माओंके प्रति उपेक्षाके भावसे चित्तमें निर्मलता आती है।'\n\nपरन्तु भगवान्ने इन चारों हेतुओँको दोमें विभक्त कर दिया है -- 'मैत्रः च करुणः।' तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्तका सुखियों और पुण्यात्माओंके प्रति 'मैत्री' का भाव तथा दुःखियों और पापात्माओंके प्रति 'करुणा' का भाव रहता है।\n\nदुःख पानेवालेकी अपेक्षा दुःख देनेवाले पर (उपेक्षाका भाव न होकर) दया होनी चाहिये; क्योंकि दुःख पानेवाला तो (पुराने पापोंका फल भोगकर) पापोंसे छूट रहा है, पर दुःख देनेवाला नया पाप कर रहा है। अतः दुःख देनेवाला दयाका विशेष पात्र है।\n\n'निर्ममः'-- यद्यपि भक्तका प्राणिमात्रके प्रति स्वाभाविक ही मैत्री और करुणाका भाव रहता है, तथापि उसकी किसीके प्रति किञ्चिन्मात्र भी ममता नहीं होती। प्राणियों और पदार्थोंमें ममता (मेरेपनका भाव) ही मनुष्यको संसारमें बाँधनेवाली होती है। भक्त इस ममतासे सर्वथा रहित होता है। उसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें भी बिलकुल ममता नहीं होती। साधकसे भूल यह होती है कि वह प्राणियों और पदार्थोंसे तो ममताको हटानेकी चेष्टा करता है, पर अपने शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ममता हटानेकी ओर विशेष ध्यान नहीं देता। इसीलिये वह सर्वथा निर्मम नहीं हो पाता।\n\n'निरहंकारः' -- शरीर, इन्द्रियाँ आदि जड-पदार्थोंको अपना स्वरूप माननेसे अहंकार उत्पन्न होता है।भक्तकी अपने शरीरादिके प्रति किञ्चिन्मात्र भी अहंबुद्धि न होनेके कारण तथा केवल भगवान्से अपने नित्य सम्बन्धका अनुभव हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणमें स्वतः श्रेष्ठ, दिव्य, अलौकिक गुण प्रकट होने लगते हैं। इन गुणोंको भी वह अपने गुण नहीं मानता, प्रत्युत (दैवी सम्पत्ति होनेसे) भगवान्के ही मानता है। 'सत्'-(परमात्मा-)के होनेके कारण ही ये गुण 'सद्गुण' कहलाते हैं। ऐसी दशामें भक्त उनको अपना मान ही कैसे सकता है! इसलिये वह अहंकारसे सर्वथा रहित होता है।\n\n'समदुःखसुखः' -- भक्त सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम रहता है अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलता उसके हृदयमें रागद्वेष, हर्षशोक आदि विकार पैदा नहीं कर सकते।गीतामें सुखदुःख पद अनुकूलता-प्रतिकूलताकी परिस्थिति-(जो सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें हेतु है) के लिये तथा अन्तःकरणमें होनेवाले हर्ष-शोकादि विकारोंके लिये भी आया है।अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी बनाकर ही उसे बाँधती है। इसलिये सुख-दुःखमें सम होनेका अर्थ है -- अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अपनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंका न होना।भक्तके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, सिद्धान्त आदिके अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिका संयोग या वियोग होनेपर उसे अनुकूलता और प्रतिकूलताका 'ज्ञान' तो होता है, पर उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि कोई 'विकार' उत्पन्न नहीं होता। यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिये कि किसी परिस्थितिका ज्ञान होना अपने-आपमें कोई दोष नहीं है, प्रत्युत उससे अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न होना ही दोष है। भक्त राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। जैसे, प्रारब्धानुसार भक्तके शरीरमें कोई रोग होनेपर उसे शारीरिक पीड़ाका ज्ञान (अनुभव) तो होगा; किन्तु उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका विकार नहीं होगा।'क्षमी' --  अपना किसी तरहका भी अपराध करनेवालेको किसी भी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे क्षमा कर देनेवालेको 'क्षमी' कहते हैं।भक्तके लक्षणोंमें पहले 'अद्वेष्टा' पद देकर भगवान्ने भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति द्वेषका अभाव बताया, अब यहाँ 'क्षमी' पदसे यह बताते हैं कि भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति ऐसा भाव रहता है कि उसको भगवान् अथवा अन्य किसीके द्वारा भी दण्ड न मिले। ऐसा क्षमाभाव भक्तकी एक विशेषता है।\n'संतुष्टः सततम्' (टिप्पणी प0 650.1)  -- जीवको मनके अनुकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके संयोगमें और मनके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके वियोगमें एक संतोष होता है। विजातीय और अनित्य पदार्थोंसे होनेके कारण यह संतोष स्थायी नहीं रह पाता। स्वयं नित्य होनेके कारण जीवको नित्य परमात्माकी अनुभूतिसे ही वास्तविक और स्थायी संतोष होता है।\n\nभगवान्को प्राप्त होनेपर भक्त नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहता है; क्योंकि न तो उसका भगवान्से कभी वियोग होता है और न उसको नाशवान् संसारकी कोई आवश्यकता ही रहती है। अतः उसके असंतोषका कोई कारण ही नहीं रहता। इस संतुष्टिके कारण वह संसारके किसी भी प्राणी-पदार्थके प्रति किञ्चिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं रखता (टिप्पणी प0 650.2)।'संतुष्टः' के साथ 'सततम्' पद देकर भगवान्ने भक्तके उस नित्य-निरन्तर रहनेवाले संतोषकी ओर ही लक्ष्य कराया है, जिसमें न तो कभी कोई अन्तर पड़ता है और न कभी अन्तर पड़नेकी सम्भावना ही रहती है। कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग -- किसी भी योगमार्गसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले महापुरुषमें ऐसी संतुष्टि (जो वास्तवमें है) निरन्तर रहती है।\n\n  'योगी' --  भक्तियोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त (नित्य-निरन्तर परमात्मासे संयुक्त) पुरुषका नाम यहाँ 'योगी' है।वास्तवमें किसी भी मनुष्यका परमात्मासे कभी वियोग हुआ नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और सम्भव ही नहीं। इस वास्तविकताका जिसने अनुभव कर लिया है, वही 'योगी' है।\n\n  'यतात्मा' --  जिसका मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित शरीरपर पूर्ण अधिकार है, वह 'यतात्मा' है। सिद्ध भक्तको मन-बुद्धि आदि वशमें करने नहीं पड़ते, प्रत्युत ये स्वाभाविक ही उसके वशमें रहते हैं। इसलिये उसमें किसी प्रकारके इन्द्रियजन्य दुर्गुण-दुराचारी के आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।\n\n  वास्तवमें मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ स्वाभाविकरूपसे सन्मार्गपर चलनेके लिये ही हैं; किन्तु संसारसे रागयुक्त सम्बन्ध रहनेसे ये मार्गच्युत हो जाती हैं। भक्तका संसारसे किञ्चिन्मात्र भी रागयुक्त सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये उसकी मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ सर्वथा उसके वशमें होती हैं। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंके लिये आदर्श होती है।\n\n  ऐसा देखा जाता है कि न्याय-पथपर चलनेवाले सत्पुरुषोंकी इन्द्रियाँ भी कभी कुमार्गगामी नहीं होतीं। जैसे, राजा दुष्यन्तकी वृत्ति शकुन्तलाकी ओर जानेपर उन्हें दृढ़ विश्वास हो जाता है कि यह क्षत्रिय-कन्या ही है, ब्राह्मणकन्या नहीं। कवि कालिदासके कथनानुसार जहाँ सन्देह हो, वहाँ सत्पुरुषके अन्तःकरणकी प्रवृत्ति ही प्रमाण होती है --\n\n  'सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः'।।(अभिज्ञानशाकुन्तलम् 1। 21)\n\n  जब न्यायशील सत्पुरुषकी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति भी स्वतः कुमार्गकी ओर नहीं होती, तब सिद्ध भक्त (जो न्यायधर्मसे कभी किसी अवस्थामें च्युत नहीं होता-) की मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ कुमार्गकी ओर जा ही कैसे सकती हैं!\n\n  'दृढनिश्चयः' --  सिद्ध महापुरुषकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव रहता है। उसकी बुद्धिमें एक परमात्माकी ही अटल सत्ता रहती है। अतः उसकी बुद्धिमें विपर्यय-दोष (प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारका स्थायी दीखना) नहीं रहता। उसको एक भगवान्के साथ ही अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव होता रहता है। अतः उसका भगवान्में ही दृढ़ निश्चय होता है। उसका यह निश्चय बुद्धिमें नहीं, प्रत्युत 'स्वयं' में होता है, जिसका आभास बुद्धिमें प्रतीत होता है।\n\n  संसारकी स्वतन्त्र सत्ता माननेसे अथवा संसारसे अपना सम्बन्ध माननेसे ही बुद्धिमें विपर्यय और संशयरूप दोष उत्पन्न होते हैं। विपर्यय और संशययुक्त बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती। ज्ञानी और अज्ञानी पुरुषकी बुद्धिके निश्चयमें ही अन्तर होता है; स्वरूपसे तो दोनों समान ही होते हैं। अज्ञानीकी बुद्धिमें संसारकी सत्ता और उसका महत्त्व रहता है; परन्तु सिद्ध भक्तकी बुद्धिमें एक भगवान्के सिवाय न तो संसारकी किसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता रहती है और न उसका कोई महत्त्व ही रहता है। अतः उसकी बुद्धि विपर्यय और संशयदोषसे सर्वथा रहित होती है और उसका केवल परमात्मामें ही दृढ़ निश्चय होता है।\n\n  'मय्यर्पितमनोबुद्धिः'--जब साधक एकमात्र भगवत्प्राप्तिको ही अपना उद्देश्य बना लेता है और स्वयं भगवान्का ही हो जाता है (जो कि वास्तवमें है) तब उसके मन-बुद्धि भी अपने-आप भगवान्में लग जाते हैं। फिर सिद्ध भक्तके मन-बुद्धि भगवान्के अर्पित रहें -- इसमें तो कहना ही क्या है\n\n जहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वाभाविक ही मनुष्यका मन लगता है और जिसे मनुष्य सिद्धान्तसे श्रेष्ठ समझता है, उसमें स्वाभाविक ही उसकी बुद्धि लगती है। भक्तके लिये भगवान्से बढ़कर कोई प्रिय और श्रेष्ठ होता ही नहीं। भक्त तो मन-बुद्धिपर अपना अधिकार ही नहीं मानता। वह तो इनको सर्वथा भगवान्का ही मानता है। अतः उसके मन-बुद्धि स्वाभाविक ही भगवान्में लगे रहते हैं।\n\n'यः मद्भक्तः स मे प्रियः' (टिप्पणी प0 651) -- भगवान्को तो सभी प्रिय हैं; परन्तु भक्तका प्रेम भगवान्के सिवाय और कहीं नहीं होता। ऐसी दशामें 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता 4। 11) -- इस प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान्को भी भक्त प्रिय होता है।\n\n सम्बन्ध--सिद्ध भक्तके लक्षणोंका दूसरा प्रकरण, जिसमें छः लक्षणोंका वर्णन है, आगेके श्लोकमें आया है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।12.14।।अद्वेष्टा सर्वभूतानां विद्विषताम् अपकुर्वताम् अपि सर्वेषां भूतानाम् अद्वेष्टा मदपराधानुगुणम् ईश्वरप्रेरितानि एतानि भूतानि द्विषन्ति अपकुर्वन्ति च इति अनुसंदधानः? तेषु द्विषत्सु अपकुर्वत्सु च सर्वभूतेषु मैत्रीं मतिं कुर्वन् मैत्रः? तेषु एव दुःखितेषु करुणां कुर्वन् करुणः? निर्ममः -- देहेन्द्रियेषु तत्सम्बन्धिषु च निर्ममः? निरहंकारः  -- देहात्माभिमानरहितः? तत एव समदुःखसुखः सुखदुःखागमयोः सांकल्पिकयोः हर्षोद्वेगरहितः? क्षमी स्पर्शप्रभवयोः अवर्जनीययोः अपि तयोः विकाररहितः? संतुष्टः यद्दच्छोपनतेन,येन केन अपि देहधारणद्रव्येन संतुष्टः? सततं योगी सततं प्रकृतिवियुक्तात्मानुसंधानपरः? यतात्मा नियमितमनोवृत्तिः? दृढनिश्चयः -- अध्यात्मशास्त्रोदितेषु अर्थेषु दृढनिश्चयः? मय्यर्पितमनोबुद्धिः भगवान् वासुदेव एव अनभिसंहितफलेन अनुष्ठितेन कर्मणाआराध्यते आराधितश्च मम आत्मापरोक्ष्यं साधयिष्यति इति मय्यर्पितमनोबुद्धिः? एवंभूतो मद्भक्तः एवंभूतेन कर्मयोगेन मां भजमानो यः स मे प्रियः।",
        "et": "12.13 - 12.14 In these and succeeding verses the Lord mentions the nature of the Karma Yogi who adores Him through his works. In other words the Bhakti element in Karma Yoga is emphasised. He never hates any being even though they hate him and do him wrong. For he thinks that the Lord impels these beings to hate him and do him wrong for atoning for his transgressions. He is 'friendly', evincing a friendly disposition towards all beings whether they hate him or do him wrong. He is 'compassionate', evincing compassion towards their sufferings. He is free from the 'feeling of mine,' i.e., he is not possessive with regard to his body, senses and all things associated with them. He is free from the feeling of 'I', i.e., is free from the delusion that his body is the self. Therefore, 'pain and pleasure are the same to him,' i.e., he is free from distress and delight resulting from pain and pleasure arising from his deeds. He is 'enduring', unaffected even by those two (i.e., pleasure and pain) due to the inevitable contact of sense-objects. He is 'content', namely, satisfied with whatever chance may bring him for the sustenance of his body. He 'ever meditates,' i.e., is constantly intent on contemplating on the self as separate from the body. He is 'self-restrained', namely, he controls the activities of his mind. He is of 'firm conviction' regarding the meanings taught in the science of the self. His 'mind and reason are dedicated to Me' i.e., his mind and reason are dedicated to Me in the form 'Bhagavan Vasudeva alone is propitiated by disinterested activities, and when duly propitiated, He wil bring about for me the direct vision of the self.' Such a devotee of mine, i.e., who works in this manner as a Karma Yogin, is dear to Me."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।12.13 -- 12.14।।अद्वेष्टेति।  सन्तुष्ट इति।  मैत्री अमत्सरता यस्य (N यस्मात् for यस्य) अस्तीति ( omits इति)।  एवं करुणः (S?N करुणा)।  ममामी इत्यादिः ( ममापीत्यादि) ममकारः अहमुदारः अहं तेजस्वी अहं सहनः (S??N तेजस्वी असहनः) इत्यादिः अहंकारः एतौ यस्य न स्तः।  क्षमा अपकारिणं शत्रुं प्रत्य [प्य] द्वेषबुद्धिः।  सततं योगी? व्यवहारावस्थायामपि प्रशान्तान्तःकरणत्वात्।",
        "et": "12.13-14 Advesta  etc.  Santustah etc.  [Friend] :  he who has friend-liness  (or goodwill)  i.e. unselfishness.  In the same manner  'compassionate'  [is  to be interpreted].  'These are mine'  etc., is the sence of  'mine'  (or sense of possessiveness);  'I am generous',  'I am powerful',   'I am victorious' etc., is the sense of  'I'  (or egotism).  In whom these two are absent that man is free from the senses of  'mine'   and  of  'I'.  Forbearance :  a thought  that entertains no enmity even towards an enemy who has  [actually] injured.  A man of Yoga at all times :  because his internal organ remains  completely iet even at the stage of his mundane dealings."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।12.14।।तथा जो सदा ही सन्तुष्ट है अर्थात् देह स्थितिके कारणरूप पदार्थोंकी लाभ हानिमें जिसके जो कुछ होता है वही ठीक है ऐसा अलम् भाव हो गया है? इस प्रकार जो गुणयुक्त वस्तुके लाभमें और उसकी हानिमें सदा ही सन्तुष्ट रहता है। तथा जो समाहितचित्त? जीते हुए स्वभाववाला और दृढ़ निश्चयवाला है अर्थात् आत्मतत्त्वके विषयमें जिसका निश्चय स्थिर हो चुका है। तथा जो मुझमें अर्पण किये हुए मनबुद्धिवाला है अर्थात् जिस संन्यासीका संकल्प विकल्पात्मक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि ये दोनों मुझमें समर्पित हैं -- स्थापित हैं। जो ऐसा मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है। ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्यारा हूँ और वह मुझे प्रिय है इस प्रकार जो सप्तम अध्यायमें सूचित किया गया था उसीका यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है।",
        "sc": "।।12.14।। -- संतुष्टः सततं नित्यं देहस्थितिकारणस्य लाभे अलाभे च उत्पन्नालंप्रत्ययः। तथा गुणवल्लाभे विपर्यये च संतुष्टः। सततं योगी समाहितचित्तः। यतात्मा संयतस्वभावः। दृढनिश्चयः दृढः स्थिरः निश्चयः अध्यवसायः यस्य आत्मतत्त्वविषये स दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिः संकल्पविकल्पात्मकं मनः? अध्यवसायलक्षणा बुद्धिः? ते मय्येव अर्पिते स्थापिते यस्य संन्यासिनः सः मय्यर्पितमनोबुद्धिः। यः ईदृशः मद्भक्तः सः मे प्रियः। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः (गीता 7।17) इति सप्तमे अध्याये सूचितम्? तत् इह प्रपञ्चते।।",
        "et": "12.14 Santustah satatam, he who is ever content: who has the sense of contentment irrespective of getting or not getting what is needed for the maintenance of the body; who is similarly ever-satisfied whether he gets or not a good thing. Yogi, who is a yogi, a man of concentrated mind; yata-atma, who has self-control, whose body and organs are under control; drdha-niscayah, who has firm conviction-with regard to the reality of the Self; arpita-mano-buddhih, who has dedicated his mind and intellect; mayi, to Me-(i.e.) a monk whose mind (having hte characteristics of reflection) and intellect (possessed of the faculty of taking decisions) are dedicated to, fixed on, Me alone; sah yah, he who is; such a modbhaktah, devotee of Mine; is priyah, dear; me, to Me. It was hinted in the Seventh Chapter, 'For I am very much dear to the man of Knowledge, and he too is dear to Me' (7.17). That is being elaborated here."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।12.14।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।12.14।।सन्तुष्ट इति। यथालब्धेन भगवत्सेवोपयोगिना द्रव्येण देहधारणेन सन्तुष्टः। सततं योगी यतात्मा समवृत्तिः निरुद्धचेताः। दृढो भगवदेकसेवायां निश्चयो यस्य सोऽपि न बहिरेव तन्वादिना केवलम्? किन्तु मानसोऽभ्यन्तर इति। तदाह मय्यर्पितमनोबुद्धिरिति। श्रीपुरुषोत्तमेऽर्पिते मनोबुद्धी यस्य सद्बजौकसां यथा तथा स य एवम्भूतो द्विषड्गुणयुतो निर्हेतुकमद्भक्तिमान् स मे प्रियः। यो मद्भक्त इतीरणात्पुष्टिरस्तीति निश्चीयते। नहि भगवत्प्रियत्वं स्वकृति -- (स्वल्प) -- तपस्साध्यम्। अतः प्रवाहाद्भिन्नोऽयं मार्गः? प्रवाहस्य सर्वसाधारणत्वात् भक्तेर्निर्हेतुकानुग्रहैकलभ्यत्वान्महानेव भेदोऽस्तीति मन्तव्यं वेदमर्यादामार्गतोऽपि असङ्कीर्णत्वं चनाहं वेदैर्न तपसा [11।53] इति पूर्वमुक्तं सर्वतो (ऽत्र) वैदिककर्माद्यपेक्षयाऽस्योत्तमत्वकथनात् अभेदे तूत्कर्षवैयर्थ्यादिति सर्वं श्रीमदाचार्यग्रन्थादवसेयम्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।12.14।।संतुष्ट इति। तस्यैव विशेषणान्तराणि। सततं शरीरस्थितिकारणस्य लाभेऽलाभे च संतुष्टः उत्पन्नालंप्रत्ययः। तथा गुणवल्लाभे विपर्यये च। सततमिति सर्वत्र संबध्यते। योगी समाहितचित्तः। यतात्मा संयतशरीरेन्द्रियादिसङ्घातः। दृढः कुतार्किकैरभिभवितुमशक्यतया स्थिरो निश्चयोऽहमस्म्यकर्त्रभोक्तृसच्चिदानन्दाद्वितीयब्रह्मेत्यध्यवसायो यस्य स दृढनिश्चयः। स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः। मयि भगवति वासुदेवे शुद्धे ब्रह्मणि अर्पितमनोबुद्धिः समर्पितान्तःकरणः ईदृशो यो मद्भक्तः शुद्धाक्षरब्रह्मवित्स मे प्रियः सदात्मत्वात्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।12.14।। संतुष्ट इति। सततं लाभेऽलाभे च संतुष्टः प्रसन्नचित्तो योग्यप्रमत्तो यतात्मा संयतस्वभावः दृढो मद्विषयो निश्चयो यस्य मय्यर्पिते मनोबुद्धी येन एवंभूतो यो मद्भक्तः स मे प्रियः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।12.14।।अक्षरोपासकं ज्ञानवन्तं विशेषणान्तरैर्विशिनष्टि -- संतुष्ट इति। सततमिति सर्वत्र संबध्यते। तेहस्थितिकारणस्य लाभे अलाभे च सततं संतुष्टः नित्यं जातालंप्रत्ययः। समुपसर्गेण तुष्टेः परिपक्वता बोध्यते। तथा गुणवल्लाभेऽपि तद्विपर्यये च संतुष्टः। यतः सततं योगी योगाभ्यासेन समाहितान्तःकरणः। यतः सततं संयतात्मा संयतकार्यकरणसंघातः अतएव संयतात्मेति वा। यतः सततं योगी योगाभ्यासेन समाहितान्तःकरणः। यतः सततं संयतात्मा संयतकार्यकरणसंघातः अतए दृढनिश्चय इति वा। यतः सततं मयि परमात्मनि संकल्पविकल्पात्मकं मनोऽध्यवसायलक्षणा बुद्धिश्च ते मय्येव स्थापिते यस्य स यतो मय्यर्पितमनोबुद्धिरिति वा। य ईदृशो मद्भक्तः शुद्धाक्षरात्मज्ञानवान् मद्भजनपरो मे मम प्रियः।उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः इत सप्तमाध्याये सूचितस्यार्थस्यायं प्रपञ्चः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।12.14।।स एव सन्तोषोऽत्राप्यादरार्थं सङ्ग्रहेणोक्त इत्यभिप्रायेणाह -- यदृच्छोपनतेन येनकेनापीति। अन्यत्रापि ह्युच्यते -- येनकेनचिदाच्छन्नो येनकेनचिदाशितः। यत्रक्वचनशायी स्यात्तं देवा ब्राह्मणं विदुः [म.भा.12।245।12] इति। शास्त्रीयेष्वयत्नोपनतेषु प्रभूताल्पसरसविरसादिवैषम्यं नानुसन्धेयमिति भावः। यथोक्तमजगरेण -- न सन्निपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया। प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुन्धे सुदुर्लभम् [   ] इति।सततमिति योगकालोपकारकवासनास्थैर्यार्थम्। योगशब्दश्चात्र योगदर्शनानुग्राहकप्राचीनानुसन्धानपरः? साक्षाद्योगस्य सर्वदा कर्तुमशक्यत्वादित्यभिप्रायेणाह -- सततं प्रकृतिवियुक्तेति। सततमात्मचिन्तनवदनात्मचिन्तननिवृत्तिरपि योगान्तरङ्गमिति यतात्मशब्देनोच्यत इत्याहनियमितमनोवृत्तिरिति। अन्येषां यत्र सन्देहप्रसङ्गः? तत्र ह्यस्य निश्चयो वाच्यः स चात्रानुष्ठानोपकारक एव ग्राह्यः तदाह -- अध्यात्मशास्त्रेति।मयि इत्यनेनअहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च [9।24] इत्युक्तमाराध्यत्वं फलप्रदत्वं चात्र कर्मयोगनिष्ठस्य मनोबुद्ध्यर्पणार्थम्। अपेक्षितमभिसंहितमित्यभिप्रायेणाहभगवानिति। भगवच्छब्देन सकलफलप्रदत्त्वौपयिकोभयलिङ्गत्वोक्तिः। वासुदेवशब्देन सर्वकर्माराध्यत्वौपयिकसर्वदेवतान्तर्यामित्वोक्तिः। वक्तृरूपविवक्षा वा। आराध्यत्वेन चिन्तनमत्र मनसोऽर्पणम्। फलप्रदत्वाध्यवसायो बुद्ध्यर्पणम्। यद्वा द्वयोरपि चिन्ताध्यवसायौ भाव्यौ। मनसाध्यवसायो वा मनोबुद्धिः। उद्देश्यांशं निष्कर्षतिय एवम्भूतो मद्भक्त इति। अशक्तस्य शक्यनिष्ठाप्रतिपादनप्रकरणत्वात् साक्षाद्भक्तियोगनिष्ठाद्व्यवच्छिन्दन् श्लोकद्वयस्य पिण्डितार्थमाहएवम्भूतेन कर्मयोगेनेति। उद्देश्यविशेषणेष्वपि तात्पर्यं मीमांसकैरेवाङ्गीकृतम्? यत्र विशेषणप्रयोगस्य गत्यन्तरं नोपलब्धमिति भावः। प्रियः प्रीतिविषयः? प्रीतोऽहं,तदभिलषितं ददामीति भावः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।12.14।।किञ्चसन्तुष्ट इति। सततं सन्तुष्टः निरन्तरं हृदयस्थितमत्स्वरूपेण आनन्दयुक्तः? योगी मच्चिन्तनशीलः? यतात्मा वशीकृतस्वभावः दृढनिश्चयः दृढः कामाद्यनुपहतो मत्परीक्षितदुःखादिष्वचलो मयि सर्वकरणसमर्थत्वेन निश्चयो यस्य? मयि अर्पिते मनोबुद्धी येन? य एतादृशः स मद्भक्तः मे प्रियः मदिङ्गितकरणादिति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।12.14।।संतुष्टो यदृच्छालाभेनैव संजातालंप्रत्ययः। सततं सर्वदा। योगी श्रवणादौ समाहितचित्तः। यतात्मा संयतशरीरेन्द्रियादिसंघातः। दृढः स्थिर आत्मतत्त्वविषये निश्चयो यस्य स दृढनिश्चयोऽसंभावनाशून्यो दृढश्रद्धावान्। मयि निर्गुणे ब्रह्मण्यर्पिते निहिते प्रविलापिते वा मनः संकल्पादिरूपं बुद्धिरध्यवसायस्ते उभे येन स मय्यर्पितमनोबुद्धिः। एतादृशो यो मे मम भक्तः स मे मम प्रियः आत्मत्वादेव स परमप्रेमास्पदम्ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् इत्युक्तम्। एतेन पूर्वश्लोकोक्ताया निरहंकारतायाः साधनान्युक्तानि।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "I swiftly deliver them from the ocean of birth and death, for their consciousness is merged in Me.",
        "ec": " Coming again to the point of pure devotional service, the Lord is describing the transcendental qualifications of a pure devotee in these two verses. A pure devotee is never disturbed in any circumstances. Nor is he envious of anyone. Nor does a devotee become his enemy’s enemy; he thinks, “This person is acting as my enemy due to my own past misdeeds. So it is better to suffer than to protest.” In the Śrīmad-Bhāgavatam (10.14.8) it is stated: tat te ’nukampāṁ su-samīkṣamāṇo bhuñjāna evātma-kṛtaṁ vipākam. Whenever a devotee is in distress or has fallen into difficulty, he thinks that it is the Lord’s mercy upon him. He thinks, “Thanks to my past misdeeds I should suffer far, far greater than I am suffering now. So it is by the mercy of the Supreme Lord that I am not getting all the punishment I am due. I am just getting a little, by the mercy of the Supreme Personality of Godhead.” Therefore he is always calm, quiet and patient, despite many distressful conditions. A devotee is also always kind to everyone, even to his enemy. Nirmama means that a devotee does not attach much importance to the pains and trouble pertaining to the body because he knows perfectly well that he is not the material body. He does not identify with the body; therefore he is freed from the conception of false ego and is equipoised in happiness and distress. He is tolerant, and he is satisfied with whatever comes by the grace of the Supreme Lord. He does not endeavor much to achieve something with great difficulty; therefore he is always joyful. He is a completely perfect mystic because he is fixed in the instructions received from the spiritual master, and because his senses are controlled he is determined. He is not swayed by false arguments, because no one can lead him from the fixed determination of devotional service. He is fully conscious that Kṛṣṇa is the eternal Lord, so no one can disturb him. All these qualifications enable him to fix his mind and intelligence entirely on the Supreme Lord. Such a standard of devotional service is undoubtedly very rare, but a devotee becomes situated in that stage by following the regulative principles of devotional service. Furthermore, the Lord says that such a devotee is very dear to Him, for the Lord is always pleased with all his activities in full Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
