{
    "_id": "BG12.13",
    "chapter": 12,
    "verse": 13,
    "slok": "अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |\nनिर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ||१२-१३||",
    "transliteration": "adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .\nnirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||12-13||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।12.13।। भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "12.13 He who hates no creature, who is friendly and compassionate to all, who is free from attachment and egoism, balanced in pleasure and pain, and forgiving.",
        "ec": "12.13 अद्वेष्टा nonhater? सर्वभूतानाम् of (to) all creatures? मैत्रः friendly? करुणः compassionate? एव even? च and? निर्ममः without mineness? निरहङ्कारः without egoism? समदुःखसुखः balanced in pleasure and pain? क्षमी forgiving.Commentary Lord Krishna gives a description of the nature of a Bhagavata or a sage in the following eight verses. These eight verses are called Amritashtakam.The devotee who is established in God bears illwill to none. He looks on all with love and great compassion. He regards all beings as himself. He does not hate even a single being? not even the creature which gives him intense pain. He who entertains mercy towards suffering people and tries to relieve their sufferings is a man of Karuna. He puts himself in the position of the sufferer and feels the pain himself. Mercy is a divine attribute. God is allmerciful. If you wish to hold communion with the Lord? and if you desire to attain Godhead? you must also become allmerciful.The perfect devotee offers full security of life (Abhayadana) to all beings. He is a Paramahamsa Sannyasi. The devotee only can really understand the mysterious ways of the Lord. He beholds the Lord everywhere. He sees the Lord in all creatures. That is the reason why he has eal vision. He is like the sun or the river. The sun sheds its light eally on a palace or a cottage. Anyone can drink the water of a river. A river enches the thirst of cows as well as tigers and lions. The idea of mineness and Iness never arises in the devotees mind. He has no sense of mine and thine. He is indifferent to pleasure and pain. He is not attached to pleasant objects. He does not hate the objects that give him pain. He is as forgiving as the earth. He is not affected a bit when anybody insults? abuses or beats him."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "12.13 He who is incapable of hatred towards any being, who is kind and compassionate, free from selfishness, without pride, equable in pleasure and in pain, and forgiving,"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।12.13।। See Commentary under 12.14"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "12.13. He, who is not a hater, [but] only a compassionate friend of every being; who is free from the sense of  'mine, \t and the sense of  'I';  who is even minded in pain and pleasure and is endowed with forbearance;"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "12.13 He who never hates any being, who is friendly and compassionate, who is free from the feelings of I and mine, who looks upon all pain and pleasure the same as and who is enduring;"
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "12.13 He who is not hateful towards any creature, who is friendly and compassionate, who has no idea of 'mine' and the idea of egoism, who is the same under sorrow and happiness, who is forgiving;"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।12.13।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।12.13।।संप्रत्यद्वेष्टेत्याद्यवतारयितुं वृत्तं कीर्तयति -- अत्र चेति। तथोश्चेदात्यन्तिकोऽभेदो न तर्हीश्वरे मनःसमाधानरूपो योगोऽत्यन्ताभेदे ध्यातृध्येयत्वाभावात् नचात्यन्ताभेदे कर्मानुष्ठानं तत्फलत्यागो वा परस्परं तदयोगादित्यर्थः। भगवदुक्तिसामर्थ्यादपि कर्मयोगादिनाभेददृष्टिमतो भवतीत्याह -- अथेति। अक्षरोपासकस्य कर्मयोगायोगवत्कर्मयोगिनोऽक्षरोपासनानुपपत्तिरपि दर्शितेत्याह -- तथेति। अक्षरोपासकाः सम्यग्धीनिष्ठा यथाज्ञानं भगवन्तमेवाप्नुवन्ति न तथा कर्मिणः साक्षात्तदाप्तावुचितास्तथा च कर्मिणो नाक्षरोपासनसिद्धिरित्यर्थः। इतश्चाक्षरोपासनं कर्मानुष्ठानं न चैकत्र युक्तमित्याह -- अक्षरेति। नन्वक्षरोपासकवदन्येषामपीश्वरात्मत्वाविशेषात्कुतस्तदधीनत्वं तत्राह -- यदीति। कर्मयोगस्याक्षरोपास्तेश्च युगपदेकत्रायोगे हेत्वन्तरमाह -- यस्माच्चेति।कुरु कर्मैवे त्यादाविति शेषः। किंचाक्षरोपासको वाक्यादीश्वरमात्मानं वेत्ति नासौ क्रियायां गुणत्वेन कर्तृत्वमनुभवति गुणत्वेश्वरत्वयोरेकत्र व्याघातादतोऽपि नाक्षरोपासनं कर्मानुष्ठानं चैकत्र युक्तमित्याह -- नचेति। अक्षरोपास्तिकर्मयोगयोरेकत्र पर्यायायोगे फलितमाह -- तस्मादिति। अज्ञानां कर्मिणां वक्ष्यमाणधर्मजातस्य साकल्येनायोगादक्षरनिष्ठानामेवेदमुच्यतेऽविरुद्धांशस्य तु सर्वार्थत्वमिष्टमेवेत्यर्थः। सर्वेषां भूतानां मध्ये यो दुःखहेतुस्तं विद्वानपि द्वेष्ट्येवेत्याशङ्क्याह -- आत्मन इति। तत्र हेतुः -- सर्वाणीति। सर्वभूतानामित्युभयतः संबध्यते। ममप्रत्ययवर्जितो देहेऽपीति शेषः। व्रतस्वाध्यायकृताहंकारान्निष्क्रान्तत्वमाह -- निर्गतेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।12.13।।सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।",
        "hc": "।।12.13।। व्याख्या --'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्'--  अनिष्ट करनेवालोंके दो भेद हैं -- (1) इष्टकी प्राप्तिमें अर्थात् धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी प्राप्तिमें बाधा पैदा करनेवाले और (2) अनिष्ट पदार्थ, क्रिया, व्यक्ति, घटना आदिसे संयोग करानेवाले। भक्तके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सिद्धान्तके प्रतिकूल चाहे कोई कितना ही, किसी प्रकारका व्यवहार करे -- इष्टकी प्राप्तिमें बाधा डाले, किसी प्रकारकी आर्थिक और शारीरिक हानि पहुँचाये, पर भक्तके हृदयमें उसके प्रति कभी किञ्चिन्मात्र भी द्वेष नहीं होता। कारण कि वह प्राणिमात्रमें अपने प्रभुको ही व्याप्त देखता है, ऐसी स्थितिमें वह विरोध करे तो किससे करे --,'निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।' (मानस 7। 112 ख)।इतना ही नहीं; वह तो अनिष्ट करनेवालोंकी सब क्रियाओंको भी भगवान्का कृपापूर्ण मङ्गलमय विधान ही मानता है!\n\nप्राणिमात्र स्वरूपसे भगवान्का ही अंश है। अतः किसी भी प्राणीके प्रति थोड़ा भी द्वेषभाव रहना भगवान्के प्रति ही द्वेष है। इसलिये किसी प्राणीके प्रति द्वेष रहते हुए भगवान्से अभिन्नता तथा अनन्यप्रेम नहीं हो सकता। प्राणिमात्रके प्रति द्वेषभावसे रहित होनेपर ही भगवान्में पूर्ण प्रेम हो सकता है। इसलिये भक्तमें प्राणिमात्रके प्रति द्वेषका सर्वथा अभाव होता है।\n\n'मैत्रः करुण एव च' (टिप्पणी प0 648)--  भक्तके अन्तःकरणमें प्राणिमात्रके प्रति केवल द्वेषका अत्यन्त अभाव ही नहीं होता, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवद्भाव होनेके नाते उसका सबसे मैत्री और दयाका व्यवहार भी होता है। भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं --'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (गीता 5। 29)। भगवान्का स्वभाव भक्तमें अवतरित होनेके कारण भक्त भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् होता है --'सुहृदः सर्वदेहिनाम्' (श्रीमद्भागवत 3। 25। 21)। इसलिये भक्तका भी सभी प्राणियोंके प्रति बिना किसी स्वार्थके स्वाभाविक ही मैत्री और दयाका भाव रहता है --          हेतु रहित जग जुग उपकारी।         तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।(मानस 7। 47। 3)अपना अनिष्ट करनेवालोंके प्रति भी भक्तके द्वारा मित्रताका व्यवहार होता है; क्योंकि उसका भाव यह रहता है कि अनिष्ट करनेवालेने अनिष्टरूपमें भगवान्का विधान ही प्रस्तुत किया है। अतः उसने जो कुछ किया है, मेरे लिये ठीक ही किया है। कारण कि भगवान्का विधान सदैव मङ्गलमय होता है। इतना ही नहीं, भक्त यह मानता है कि मेरा अनिष्ट करनेवाला (अनिष्टमें निमित्त बनकर) मेरे पूर्वकृत पापकर्मोंका नाश कर रहा है; अतः वह विशेषरूपसे आदरका पात्र है।   साधकमात्रके मनमें यह भाव रहता है और रहना ही चाहिये कि उसका अनिष्ट करनेवाला उसके पिछले पापोंका फल भुगताकर उसे शुद्ध कर रहा है। जब सामान्य साधकमें भी अनिष्ट करनेवालेके प्रति मैत्री और करुणाका भाव रहता है, फिर सिद्ध भक्तका तो कहना ही क्या है, सिद्ध भक्तका तो उसके प्रति ही क्या, प्राणिमात्रके प्रति मैत्री और दयाका विलक्षण भाव रहता है।पातञ्जलयोगदर्शनमें चित्त-शुद्धिके चार हेतु बताये गये हैं--\n'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।' (1। 33)'सुखियोंके प्रति मैत्री, दुःखियोंके प्रति करुणा, पुण्यात्माओंके प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और पापात्माओंके प्रति उपेक्षाके भावसे चित्तमें निर्मलता आती है।' परन्तु भगवान्ने इन चारों हेतुओँको दोमें विभक्त कर दिया है -- 'मैत्रः च करुणः।' तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्तका सुखियों और पुण्यात्माओंके प्रति 'मैत्री' का भाव तथा दुःखियों और पापात्माओंके प्रति 'करुणा' का भाव रहता है।दुःख पानेवालेकी अपेक्षा दुःख देनेवाले पर (उपेक्षाका भाव न होकर) दया होनी चाहिये; क्योंकि दुःख पानेवाला तो (पुराने पापोंका फल भोगकर) पापोंसे छूट रहा है, पर दुःख देनेवाला नया पाप कर रहा है। अतः दुःख देनेवाला दयाका विशेष पात्र है।\n  'निर्ममः'--  यद्यपि भक्तका प्राणिमात्रके प्रति स्वाभाविक ही मैत्री और करुणाका भाव रहता है, तथापि उसकी किसीके प्रति किञ्चिन्मात्र भी ममता नहीं होती। प्राणियों और पदार्थोंमें ममता (मेरेपनका भाव) ही मनुष्यको संसारमें बाँधनेवाली होती है। भक्त इस ममतासे सर्वथा रहित होता है। उसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें भी बिलकुल ममता नहीं होती। साधकसे भूल यह होती है कि वह प्राणियों और पदार्थोंसे तो ममताको हटानेकी चेष्टा करता है, पर अपने शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ममता हटानेकी ओर विशेष ध्यान नहीं देता। इसीलिये वह सर्वथा निर्मम नहीं हो पाता।\n  'निरहंकारः'--  शरीर, इन्द्रियाँ आदि जड-पदार्थोंको अपना स्वरूप माननेसे अहंकार उत्पन्न होता है।भक्तकी अपने शरीरादिके प्रति किञ्चिन्मात्र भी अहंबुद्धि न होनेके कारण तथा केवल भगवान्से अपने नित्य सम्बन्धका अनुभव हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणमें स्वतः श्रेष्ठ, दिव्य, अलौकिक गुण प्रकट होने लगते हैं। इन गुणोंको भी वह अपने गुण नहीं मानता, प्रत्युत (दैवी सम्पत्ति होनेसे) भगवान्के ही मानता है। 'सत्'-(परमात्मा-)के होनेके कारण ही ये गुण 'सद्गुण' कहलाते हैं। ऐसी दशामें भक्त उनको अपना मान ही कैसे सकता है! इसलिये वह अहंकारसे सर्वथा रहित होता है।  'समदुःखसुखः'--  भक्त सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम रहता है अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलता उसके हृदयमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार पैदा नहीं कर सकते।   गीतामें 'सुख-दुःख' पद अनुकूलता-प्रतिकूलताकी परिस्थिति-(जो सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें हेतु है) के लिये तथा अन्तःकरणमें होनेवाले हर्ष-शोकादि विकारोंके लिये भी आया है।\nअनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी बनाकर ही उसे बाँधती है। इसलिये सुख-दुःखमें सम होनेका अर्थ है-- अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अपनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंका न होना। भक्तके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, सिद्धान्त आदिके अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिका संयोग या वियोग होनेपर उसे अनुकूलता और प्रतिकूलताका 'ज्ञान' तो होता है, पर उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि कोई 'विकार' उत्पन्न नहीं होता। यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिये कि किसी परिस्थितिका ज्ञान होना अपने-आपमें कोई दोष नहीं है, प्रत्युत उससे अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न होना ही दोष है। भक्त राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। जैसे, प्रारब्धानुसार भक्तके शरीरमें कोई रोग होनेपर उसे शारीरिक पीड़ाका ज्ञान (अनुभव) तो होगा किन्तु उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका विकार नहीं होगा।\n\n'क्षमी'--  अपना किसी तरहका भी अपराध करनेवालेको किसी भी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे क्षमा कर देनेवालेको 'क्षमी' कहते हैं।भक्तके लक्षणोंमें पहले 'अद्वेष्टा' पद देकर भगवान्ने भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति द्वेषका अभाव बताया, अब यहाँ 'क्षमी' पदसे यह बताते हैं कि भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति ऐसा भाव रहता है कि उसको भगवान् अथवा अन्य किसीके द्वारा भी दण्ड न मिले। ऐसा क्षमाभाव भक्तकी एक विशेषता है।\n\n'संतुष्टः सततम्' (टिप्पणी प0 650.1)  -- जीवको मनके अनुकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके संयोगमें और मनके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके वियोगमें एक संतोष होता है। विजातीय और अनित्य पदार्थोंसे होनेके कारण यह संतोष स्थायी नहीं रह पाता। स्वयं नित्य होनेके कारण जीवको नित्य परमात्माकी अनुभूतिसे ही वास्तविक और स्थायी संतोष होता है।\n\nभगवान्को प्राप्त होनेपर भक्त नित्यनिरन्तर संतुष्ट रहता है क्योंकि न तो उसका भगवान्से कभी वियोग होता है और न उसको नाशवान् संसारकी कोई आवश्यकता ही रहती है। अतः उसके असंतोषका कोई कारण ही नहीं रहता। इस संतुष्टिके कारण वह संसारके किसी भी प्राणीपदार्थके प्रति किञ्चिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं रखता (टिप्पणी प0 650.2)।'संतुष्टः' के साथ 'सततम्' पद देकर भगवान्ने भक्तके उस नित्यनिरन्तर रहनेवाले संतोषकी ओर ही लक्ष्य,कराया है, जिसमें न तो कभी कोई अन्तर पड़ता है और न कभी अन्तर पड़नेकी सम्भावना ही रहती है। कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग -- किसी भी योगमार्गसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले महापुरुषमें ऐसी संतुष्टि (जो वास्तवमें है) निरन्तर रहती है।\n'योगी' --  भक्तियोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त (नित्यनिरन्तर परमात्मासे संयुक्त) पुरुषका नाम यहाँ योगी है।वास्तवमें किसी भी मनुष्यका परमात्मासे कभी वियोग हुआ नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और सम्भव ही नहीं। इस वास्तविकताका जिसने अनुभव कर लिया है, वही योगी है।\n'यतात्मा'--  जिसका मनबुद्धिइन्द्रियोंसहित शरीरपर पूर्ण अधिकार है, वह यतात्मा है। सिद्ध भक्तको मनबुद्धि आदि वशमें करने नहीं पड़ते, प्रत्युत ये स्वाभाविक ही उसके वशमें रहते हैं। इसलिये उसमें किसी प्रकारके इन्द्रियजन्य दुर्गुणदुराचारी के आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।वास्तवमें मनबुद्धिइन्द्रियाँ स्वाभाविकरूपसे सन्मार्गपर चलनेके लिये ही हैं किन्तु संसारसे रागयुक्त सम्बन्ध रहनेसे ये मार्गच्युत हो जाती हैं। भक्तका संसारसे किञ्चिन्मात्र भी रागयुक्त सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये उसकी मनबुद्धिइन्द्रियाँ सर्वथा उसके वशमें होती हैं। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंके लिये आदर्श होती है।ऐसा देखा जाता है कि न्यायपथपर चलनेवाले सत्पुरुषोंकी इन्द्रियाँ भी कभी कुमार्गगामी नहीं होतीं। जैसे, राजा दुष्यन्तकी वृत्ति शकुन्तलाकी ओर जानेपर उन्हें दृढ़ विश्वास हो जाता है कि यह क्षत्रियकन्या ही है, ब्राह्मणकन्या नहीं। कवि कालिदासके कथनानुसार जहाँ सन्देह हो, वहाँ सत्पुरुषके अन्तःकरणकी प्रवृत्ति ही प्रमाण होती है --,'सतां हि संदेहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः'।।(अभिज्ञानशाकुन्तलम् 1। 21)जब न्यायशील सत्पुरुषकी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति भी स्वतः कुमार्गकी ओर नहीं होती, तब सिद्ध भक्त (जो न्यायधर्मसे कभी किसी अवस्थामें च्युत नहीं होता) की मनबुद्धिइन्द्रियाँ कुमार्गकी ओर जा ही कैसे सकती हैं'दृढनिश्चयः' --  सिद्ध महापुरुषकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव रहता है। उसकी बुद्धिमें एक परमात्माकी ही अटल सत्ता रहती है। अतः उसकी बुद्धिमें विपर्ययदोष (प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारका स्थायी दीखना) नहीं रहता। उसको एक भगवान्के साथ ही अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव होता रहता है। अतः उसका भगवान्में ही दृढ़ निश्चय होता है। उसका यह निश्चय बुद्धिमें नहीं, प्रत्युत,स्वयं में होता है, जिसका आभास बुद्धिमें प्रतीत होता है।संसारकी स्वतन्त्र सत्ता माननेसे अथवा संसारसे अपना सम्बन्ध माननेसे ही बुद्धिमें विपर्यय और संशयरूप दोष उत्पन्न होते हैं। विपर्यय और संशययुक्त बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती। ज्ञानी और अज्ञानी पुरुषकी बुद्धिके निश्चयमें ही अन्तर होता है स्वरूपसे तो दोनों समान ही होते हैं। अज्ञानीकी बुद्धिमें संसारकी सत्ता और उसका महत्त्व रहता है परन्तु सिद्ध भक्तकी बुद्धिमें एक भगवान्के सिवाय न तो संसारकी किसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता रहती है और न उसका कोई महत्त्व ही रहता है। अतः उसकी बुद्धि विपर्यय और संशयदोषसे सर्वथा रहित होती है और उसका केवल परमात्मामें ही दृढ़ निश्चय होता है।'मय्यर्पितमनोबुद्धिः'--जब साधक एकमात्र भगवत्प्राप्तिको ही अपना उद्देश्य बना लेता है और स्वयं भगवान्का ही हो जाता है (जो कि वास्तवमें है) तब उसके मनबुद्धि भी अपनेआप भगवान्में लग जाते हैं। फिर सिद्ध भक्तके मनबुद्धि भगवान्के अर्पित रहें -- इसमें तो कहना ही क्या हैजहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वाभाविक ही मनुष्यका मन लगता है और जिसे मनुष्य सिद्धान्तसे श्रेष्ठ समझता है, उसमें स्वाभाविक ही उसकी बुद्धि लगती है। भक्तके लिये भगवान्से बढ़कर कोई प्रिय और श्रेष्ठ होता ही नहीं। भक्त तो मनबुद्धिपर अपना अधिकार ही नहीं मानता। वह तो इनको सर्वथा भगवान्का ही मानता है। अतः उसके मनबुद्धि स्वाभाविक ही भगवान्में लगे रहते हैं।\n\n'यः मद्भक्तः स मे प्रियः' (टिप्पणी प0 651)-- भगवान्को तो सभी प्रिय हैं परन्तु भक्तका प्रेम भगवान्के सिवाय और कहीं नहीं होता। ऐसी दशामें 'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।' (गीता 4। 11)-- इस प्रतिज्ञाके अनुसार भगवान्को भी भक्त प्रिय होता है।\n\n सम्बन्ध--सिद्ध भक्तके लक्षणोंका दूसरा प्रकरण, जिसमें छः लक्षणोंका वर्णन है, आगेके श्लोकमें आया है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।12.13।।अद्वेष्टा सर्वभूतानां विद्विषताम् अपकुर्वताम् अपि सर्वेषां भूतानाम् अद्वेष्टा मदपराधानुगुणम् ईश्वरप्रेरितानि एतानि भूतानि द्विषन्ति अपकुर्वन्ति च इति अनुसंदधानः? तेषु द्विषत्सु अपकुर्वत्सु च सर्वभूतेषु मैत्रीं मतिं कुर्वन् मैत्रः? तेषु एव दुःखितेषु करुणां कुर्वन् करुणः? निर्ममः -- देहेन्द्रियेषु तत्सम्बन्धिषु च निर्ममः? निरहंकारः  -- देहात्माभिमानरहितः? तत एव समदुःखसुखः सुखदुःखागमयोः सांकल्पिकयोः हर्षोद्वेगरहितः? क्षमी स्पर्शप्रभवयोः अवर्जनीययोः अपि तयोः विकाररहितः? संतुष्टः यद्दच्छोपनतेन,येन केन अपि देहधारणद्रव्येन संतुष्टः? सततं योगी सततं प्रकृतिवियुक्तात्मानुसंधानपरः? यतात्मा नियमितमनोवृत्तिः? दृढनिश्चयः -- अध्यात्मशास्त्रोदितेषु अर्थेषु दृढनिश्चयः? मय्यर्पितमनोबुद्धिः भगवान् वासुदेव एव अनभिसंहितफलेन अनुष्ठितेन कर्मणाआराध्यते आराधितश्च मम आत्मापरोक्ष्यं साधयिष्यति इति मय्यर्पितमनोबुद्धिः? एवंभूतो मद्भक्तः एवंभूतेन कर्मयोगेन मां भजमानो यः स मे प्रियः।",
        "et": "12.13 - 12.14 In these and succeeding verses the Lord mentions the nature of the Karma Yogi who adores Him through his works. In other words the Bhakti element in Karma Yoga is emphasised. He never hates any being even though they hate him and do him wrong. For he thinks that the Lord impels these beings to hate him and do him wrong for atoning for his transgressions. He is 'friendly', evincing a friendly disposition towards all beings whether they hate him or do him wrong. He is 'compassionate', evincing compassion towards their sufferings. He is free from the 'feeling of mine,' i.e., he is not possessive with regard to his body, senses and all things associated with them. He is free from the feeling of 'I', i.e., is free from the delusion that his body is the self. Therefore, 'pain and pleasure are the same to him,' i.e., he is free from distress and delight resulting from pain and pleasure arising from his deeds. He is 'enduring', unaffected even by those two (i.e., pleasure and pain) due to the inevitable contact of sense-objects. He is 'content', namely, satisfied with whatever chance may bring him for the sustenance of his body. He 'ever meditates,' i.e., is constantly intent on contemplating on the self as separate from the body. He is 'self-restrained', namely, he controls the activities of his mind. He is of 'firm conviction' regarding the meanings taught in the science of the self. His 'mind and reason are dedicated to Me' i.e., his mind and reason are dedicated to Me in the form 'Bhagavan Vasudeva alone is propitiated by disinterested activities, and when duly propitiated, He wil bring about for me the direct vision of the self.' Such a devotee of mine, i.e., who works in this manner as a Karma Yogin, is dear to Me."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।12.13 -- 12.14।।अद्वेष्टेति।  सन्तुष्ट इति।  मैत्री अमत्सरता यस्य (N यस्मात् for यस्य) अस्तीति ( omits इति)।  एवं करुणः (S?N करुणा)।  ममामी इत्यादिः ( ममापीत्यादि) ममकारः अहमुदारः अहं तेजस्वी अहं सहनः (S??N तेजस्वी असहनः) इत्यादिः अहंकारः एतौ यस्य न स्तः।  क्षमा अपकारिणं शत्रुं प्रत्य [प्य] द्वेषबुद्धिः।  सततं योगी? व्यवहारावस्थायामपि प्रशान्तान्तःकरणत्वात्।",
        "et": "12.13 See Comment under 12.14"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।12.13।।इसलिये जिन्होंने समस्त इच्छाओंका त्याग कर दिया है? ऐसे अक्षरोपासक यथार्थ ज्ञाननिष्ठ संन्यासियोंका जो साक्षात् मोक्षका कारणरूप अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् इत्यादि धर्मसमूह है उसका वर्णन करूँगा? इस उद्देश्यसे भगवान् कहना आरम्भ करते हैं --, जो सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित है अर्थात् अपने लिये दुःख देनेवाले भी किसी प्राणीसे द्वेष नहीं करता? समस्त भूतोंको आत्मारूपसे ही देखता है। तथा जो मित्रतासे युक्त है अर्थात् सबके साथ मित्रभावसे बर्तता है और करुणामय है -- दीनदुखियोंपर दया करना करुणा है? उससे युक्त है? अभिप्राय यह कि जो सब भूतोंको अभय देनेवाला संन्यासी है। तथा जो ममतासे रहित और अहंकारसे रहित है? एवं सुखदुःखमें सम है अर्थात् सुख और दुःख जिसके अन्तःकरणमें रागद्वेष उत्पन्न नहीं कर सकते। जो क्षमावान् है अर्थात् किसीके द्वारा गाली दी जानेपर या पीटे जानेपर भी जो विकाररहित ही रहता है।",
        "sc": "।।12.13।। --,अद्वेष्टा सर्वभूतानां न द्वेष्टा? आत्मनः दुःखहेतुमपि न किञ्चित् द्वेष्टि? सर्वाणि भूतानि आत्मत्वेन हि पश्यति। मैत्रः मित्रभावः मैत्री मित्रतया वर्तते इति मैत्रः। करुणः एव च? करुणा कृपा दुःखितेषु दया? तद्वान् करुणः? सर्वभूताभयप्रदः? संन्यासी इत्यर्थः। निर्ममः ममप्रत्ययवर्जितः। निरहंकारः निर्गताहंप्रत्ययः। समदुःखसुखः समे दुःखसुखे द्वेषरागयोः अप्रवर्तके यस्य सः समदुःखसुखः। क्षमी क्षमावान्? आक्रुष्टः अभिहतो वा अविक्रियः एव आस्ते।।",
        "et": "12.13 Advesta, he who is not hateful; sarva-bhutanam, towards any creature: He does not feel repulsion for anything, even for what may be the cause of sorrow to himself, for he sees all beings as his own Self. Maitrah, he who is friendly-behaving like a friend; karunah eva ca, and compassionate: karuna is kindness, compassion towards sorrow-stricken creatures; one possessing that is karunah, i.e. a monk, who grants safety to all creatures. Nirmamah, he who has no idea of 'mine'; nirahankarah, who has no idea of egoism; sama-duhkha-sukhah, who is the same under sorrow and happiness, he in whom sorrow and happiness do not arouse any repulsion or attraction; ksami, who is forgiving, who remains unperturbed even when abused or assaulted;"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।12.13।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।12.13।।एवमादिधर्मवतो भक्तस्य द्वात्रिंशल्लक्षणं पुष्टिसूचकमिति तस्य स्वप्रियत्वमाह षड्गुणभगवतोऽनुग्रहात्प्रीतिविषयत्वाच्चैकेन षड्भिः श्लोकैः। यद्यपि भगवन्मार्गे सत्सङ्गादेर्भगवद्भक्तिहेतुत्वं तथापि तं प्रति भगवदनुग्रहस्यैव निर्हेतुकस्य हेतुत्वं सम्भवतिभवापवर्गो भ्रमतो यदा भवेज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः इत्यादि भागवते [10।51।54] भगवत्सेवकवाक्ये भवं अपवर्जयतीति तद्व्याख्यानादनुग्रह एव तत्र,हेतुरिति मूलभूततदनुग्रहीतत्वात्। अद्वेष्टेति।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।12.13।।तदेवं मन्दमधिकारिणं प्रत्यतिदुष्करत्वेनाक्षरोपासननिन्दया सुकरं सगुणोपासनं,विधायाशक्तितारम्यानुवादेनान्यान्यपि साधनानि विदधौ भगवान्वासुदेवः। कथं नु नाम सर्वप्रतिबन्धरहितः सन्नुत्तमाधिकारितया फलभूतायामक्षरविद्यायामवतेरदित्यभिप्रायेण साधनविधानस्य फलार्थत्वात्। तदुक्तंनिर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः। ये मन्दास्तेऽनुकम्प्यन्ते सविशेषनिरूपणैः। वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात्। तदेवाविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम्।। इति। भगवता पतञ्जलिना चोक्तंसमाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् इति।ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च इति च। तत इतीश्वरप्रणिधानादित्यर्थः। तदेवमक्षरोपासननिन्दा सगुणोपासनस्तुतये नतु हेयतया उदितहोमविधावनुदितहोमनिन्दावत्। नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्ततेऽपि तु विधेयं स्तोतुमिति न्यायात्। तस्मादक्षरोपासका एव परमार्थतो योगवित्तमाःप्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः। उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् इत्यादिना पुनः पुनः प्रशस्ततमतयोक्तास्तेषामेव ज्ञानं धर्मजातं चानुसरणीयमधिकारमासाद्य त्वयेत्यर्जुनं बुबोधयिषुः परमहितैषी भगवानभेददर्शिनः कृतकृत्यानक्षरोपासकान्प्रस्तौति सप्तभिः -- अद्वेष्टेत्यादिना। सर्वाणि भूतान्यात्मत्वेन पश्यन्नात्मनो दुःखहेतावपि प्रतिकूलबुद्ध्यभावान्न द्वेष्टा सर्वभूतानां किंतु मैत्रः मैत्री स्निग्धता तद्वान्। यतः करुणः करुणा दुःखितेषु दया तद्वान् सर्वभूताभयदाता। परमहंसपरिव्राजक इत्यर्थः। निर्ममः देहेऽपि ममेति प्रत्ययरहितः निरहंकारः वृत्तस्वाध्यायादिकृताहंकारान्निष्क्रान्तः द्वेषरागयोरप्रवर्तकत्वेन समे दुःखसुखे यस्य सः। अतएव क्षमी आक्रोशनताडनादिनापि न विक्रियामापद्यते।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।12.13।। एवंभूतस्य भक्तस्य क्षिप्रमेव परमेश्वरप्रसादहेतून्धमानाह -- अद्वेष्टेत्यष्टभिः। सर्वभूतानां यथायथमद्वेष्टा? मैत्रः? करुणश्च उत्तमेषु द्वेषशून्यः? समेषु मित्रतया वर्तत इति मैत्रः। हीनेषु कृपालुरित्यर्थः। निर्ममो निरहंकारश्च। कृपालुत्वादेवान्यैः सह समे दुःखसुखे यस्य सः। क्षमी क्षमावान्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।12.13।।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः इत्यनेनाक्षरोपासकानां मोक्षप्राप्तौ स्वातन्त्र्यमुक्त्वाक्लेशोऽधिकतस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसां इत्यादिनाऽक्षरोपासनायां मन्दमतित्वादनधिकारिणामुद्धाराय करुणानिधिना भगवताऽधिकतरक्लेशं तत्र प्रदर्श्य आत्मेश्वरमेदमाश्रित्य विश्वरुपं परमेश्वरं चित्तसमाधानलक्षणयोगादिकमुक्तम्। तथाचअन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इति सूत्रस्ते कल्पतरौनिर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः। ये मन्दास्तेऽनुकम्पयन्ते सविशेषनिरुपणऐः।।वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात्। तदेवाविर्भवेत्साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् स्वाधीनं मन्यमान अक्षरोपासनायामधिकारसंपत्त्यर्थं सगुणोपासनां स्तौति नतु मोक्षस्यानन्यसाधनत्वेंन श्रुतिस्मृतिन्यायेतिहासपुराणस्तत्र तत्र प्रतिपादिताया इतरसाधनफलभूताया अक्षरोपासनाया हेयतायै। तस्मादस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा पूर्वपूर्वसाधनानुष्ठानक्रमेण प्राप्ताक्षरोपासनानां सम्यग्ज्ञाननिष्ठानां संन्यासिनां त्यक्तपुत्रदारवित्तैषणानां अद्वेष्टृत्वादिधर्मसमुदायः साक्षात्स्वातन्त्र्येण मोक्षासाधनं वक्तुकाम आह भगवान् -- अद्वेष्टेति। सर्वभूतानां यथायथं स्वस्मादुष्कृष्टेषु स्वस्मिन्द्वेषकर्तृषु च द्वेषवर्जितः समानेषु मित्रतया वर्तत इति मैत्रः। अज्ञेषु दुःखितेषु करुणा दया तद्वान्यतः सर्वाणि भूतान्यात्सत्वेवानुपश्यति। यद्वा सर्वाणि भूतान्यात्मत्वेन पश्यन्नात्मनो दुःखहेतावति प्रतिकूलबुद्य्धभावादद्वेष्टा सर्वभूतानां? न केवलमद्वेष्टा सर्वभूतानां किंतु मैत्रः स्नेहवान्। यतः करुणः। यद्वा सर्वभूतानामद्वेष्टा तर्हि द्वेषवर्जित उदासीनः स्यान्नेत्याह। मैत्रः। तर्हि उपकारमपेक्ष्योपकारकर्ता। बन्धनहेतुस्नेहयुक्तश्च स्यान्नेत्याह। करुणः कृपावान्। सर्वभूताभयप्रदः संन्यासीत्यर्थः। दुःखितेषु कृपया मैत्रः नतु रागादुपकारपेक्षया वा। ममत्वेन गृहीतस्य गेहादेः अहंकारास्पदत्वेन कल्पितस्य च देहादेः प्रतिकूलेषु द्वेषोऽनुकूलेषु रागश्च लोकस्य दृश्यते? तत्त्वविदः संन्यासिनानस्त्वेतन्नास्तीत्याह। निर्ममो निरहंकारः ममेतिप्रत्ययवर्जितः ममतास्पदानां गेहादीनां त्यागात् वृत्तस्वाध्यायकृतादहंकारप्रत्ययान्निर्गतः। अतएव समे द्वेषराग्योरप्रवर्तके सुखदुःखे यस्य। अतएव क्षमी क्षमावान् आकुष्योऽपि ताडितोऽप्यविक्रिय एवास्त इत्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।12.13।।एवंभक्तेः श्रैष्ठ्य(भक्तिशैघ्र्य)मुपायोक्तिरशक्तस्यात्मनिष्ठता इत्येतावदुक्तम्तत्प्रकारास्त्वतिप्रीतिर्भक्ते द्वादश उच्यते [गी.सं.16] इत्युक्तमुभयमवशिष्टम् तत्रापिये तु धर्म्यामृतम् [12।20] इत्यध्यायान्तिमश्लोकेनातिप्रीतिरुच्यन्ते? ततः पूर्वैःअद्वेष्टा इत्यादिभिः सप्तभिः श्लोकैरात्मनिष्ठाप्रकारा उच्यते इत्याहअनभिसंहितेति।तत्प्रकाराः इत्यनेनेतिकर्तव्यताविशेषरूपाः प्रकारा विवक्षिता इति ज्ञापनायोक्तम्उपादेयान् गुणानाहेति। ननुकर्मनिष्ठस्योपादेयान् गुणानाह इति कथं सङ्गच्छते तेषु हि श्लोकेषुमय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः [11।14]सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः [11।16]शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः [12।17]अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः [12।19] इति भक्तिनिष्ठ एव प्रियत्वेन पुनः पुनरुच्यते।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः [17] इति सप्तमोक्त एव ज्ञानी प्रियशब्देन प्रत्यभिज्ञायते तत्समानाधिकरणानां चअद्वेष्टा इत्यादीनां तदुपायभक्त्यङ्गपरत्वं युक्तमिति। अत्रोच्यते -- ध्यानात्कर्मफलत्यागः [12।12] इति कर्मप्रसङ्गानन्तरमेव पठितानां तदङ्गत्वं प्रतीयते। अङ्गभूतानां चैषामुपकारःत्यागाच्छान्तिरनन्तरम् [12।12] इत्युक्तः। प्रागपि कर्मयोगाङ्गतया चैते प्रतिपादिताः। या तु स्ववाक्येमद्भक्तः इत्यादिभिः प्रतीता भक्तिः? सा कर्मयोगान्तर्भूतभक्तिरेवेति तत्रतत्र श्लोके व्याख्यास्यति। नहि भक्तिगन्धरहितौ कर्मज्ञानयोगौ यथोक्तं -- त्रयाणामपि योगानां त्रिभिरन्योन्यसङ्गमः [गी.सं.24] इति। साक्षाद्भक्तिनिष्ठास्तुये तु इति श्लोकेन वक्ष्यन्ते। तत्र हि तुशब्देनमत्परमा भक्ताः इति मत्परमशब्दविशेषणेनअतीव मे प्रियाः [12।20] इति प्रियत्वातिशयवर्णनेन च भक्तान्तरप्रतिपत्तिर्दृढतरा जायते। ततश्च तत्पूर्वं प्रियत्वमात्रेण निर्दिष्टास्त्वर्वाचीना एव भक्ता इति सङ्ग्रहविस्तरकृतोराशयः।प्रसक्तप्रतिषेधायसर्वभूतानाम् इति सविशेषणनिर्देशाभिप्रेतमाहविद्विषतामपकुर्वतामपीति। विशेषणे तात्पर्यमिति ज्ञापनायसर्वेषामिति व्यासः।विद्विषतामिति मानसः?अपकुर्वतामिति वाचिकः कायिकश्च व्यापारः। न केवलं तेष्वद्वेषमात्रम्? अपितु मैत्री चेत्याहमैत्र इति। मैत्रीहेतुं दर्शयतिमदपराधेति। अयमेवाद्वेषस्यापि हेतुः।मैत्रीं मतिं कुर्वन्निति सामान्यविषये तद्धिताभिप्रेतविशेषोक्तिः।मैत्रीं हितैषिणीमित्यर्थः। करुणाया निरुपाधिकत्वायाहतेष्वेव दुःखितेष्विति।करुणां कुर्वन्निति करुणशब्दनिर्वचनम्। नामधातोः क्विबन्तात्पचादित्वादच्प्रत्ययः? अर्शआदित्वाद्वा मत्वर्थीयः। एवं मैत्रशब्दे। द्विषत्स्वपकुर्वत्स्वेवेति चैवकाराभिप्रायः। निरहङ्कारत्वं निर्ममत्वे हेतुः। ममकारप्रसङ्गस्थले हि निर्ममत्वं विधेयमित्यभिप्रायेणाहदेहेन्द्रियेषु तत्सम्बन्धिषु चेति। अनात्मन्यात्मबुद्धिर्ह्यत्र निषेध्योऽहङ्कार इत्यभिप्रायेणाह -- देहात्माभिमानरहित इति। एतेननिर्गताहम्प्रत्ययः इति परव्याख्या दूषिता? अहमर्थस्यैवात्मत्वसमर्थनात्।तत एवेति -- निर्ममत्वनिरङ्कारत्वाभ्यामित्यर्थः।क्षमीति -- नापकर्तृषु क्षमा विवक्षिता?अद्वेष्टा इत्यादिना गतार्थत्वात्। ततश्चतांस्तितिक्षस्व [2।14] इति प्रागुक्तावर्जनीयसांस्पर्शिकद्वन्द्वतितिक्षा स्मार्यते। तत्पौनरुक्त्यपरिहारायसमदुःखसुखः इत्येतदाभिमानिकविषयम्। तथा सति निर्ममत्वनिरहङ्कारत्वानन्तरोक्तिश्च सङ्गच्छत इत्यभिप्रायेणसाङ्कल्पिकयोरित्युक्तम्। अहङ्कारममकारप्रयुक्तयोरित्यर्थः।सन्तुष्टो येनकेनचित् [12।19] इति वक्ष्यमाणत्वात्?यदृच्छालाभसन्तुष्टः [4।22] इति प्रागुक्तत्वाच्च।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।12.13।।तस्य स्वरूपमाह -- अद्वेष्टेति। सर्वभूतानां प्राणिमात्राणां मत्क्रीडात्मकत्वात् अद्वेष्टा आधिक्यादिदर्शने द्वेषरहितः मैत्रः भक्तेषु मित्रतया वर्त्तमानः करुणः भक्तिरहितेषु संसारदुःखनिश्चयात् करुणः उपदेशादिदानार्थं करुणावान्। एकारेण न कदाचित् कर्कशस्तिष्ठेदिति ज्ञापितम्। निर्ममः उपदेशदानानन्तरं तेषु सर्वत्र च ममत्वरहितः? निरहङ्कारः स्वस्योत्तमत्वज्ञानेनाऽहङ्काररहितः समदुःखसुखः समे दुःखसुखे वियोगसंयोगात्मके यस्य? क्षमी क्षमावान् दुष्टकृतावमानादिसहनशीलः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।12.13।।परमप्रकृतस्याक्षरस्योपासकं स्तौति तद्गुणकथने हि साधकानां तेषु गुणेष्वादरो भविष्यतीति बुद्ध्याह -- अद्वेष्टेति। अद्वेष्टा चेदुदासीनः स्यान्नेत्याह। मैत्रः मित्रमेव मैत्रो नतूदासीनः कदाचिदपि। नन्वन्यस्मिन् शत्रौ सति कथं मैत्रत्वं स्यात्तत्राह -- करुण इति। दुःखदातारमपि करुणया न बाधितुमीष्टे अपितु त्रातुमेवेच्छति। एतेन सर्वभूताभयप्रदः संन्यासी उक्तः। अतएव तस्य निर्मम इति विशेषणं युज्यते। मुख्यमक्षरविदो लक्षणं निरहंकार इति। अहंकारो हि सर्वानर्थनिदानं स एव निर्गतो यस्मात्स निरहंकारः। अतएव समे दुःखसुखे यस्य।तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः इति श्रुतेः। क्षमी क्षमावान्परिभवप्राप्तावपि स्वस्थचित्तः। अन्योऽपि मुमुक्षुरेतान्धर्माननुतिष्ठेदित्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "But those who completely dedicate all their activities to Me, regarding Me as the supreme goal, and meditate on Me with single-minded devotion, worshiping Me through the path of unalloyed devotion.",
        "ec": " Coming again to the point of pure devotional service, the Lord is describing the transcendental qualifications of a pure devotee in these two verses. A pure devotee is never disturbed in any circumstances. Nor is he envious of anyone. Nor does a devotee become his enemy’s enemy; he thinks, “This person is acting as my enemy due to my own past misdeeds. So it is better to suffer than to protest.” In the Śrīmad-Bhāgavatam (10.14.8) it is stated: tat te ’nukampāṁ su-samīkṣamāṇo bhuñjāna evātma-kṛtaṁ vipākam. Whenever a devotee is in distress or has fallen into difficulty, he thinks that it is the Lord’s mercy upon him. He thinks, “Thanks to my past misdeeds I should suffer far, far greater than I am suffering now. So it is by the mercy of the Supreme Lord that I am not getting all the punishment I am due. I am just getting a little, by the mercy of the Supreme Personality of Godhead.” Therefore he is always calm, quiet and patient, despite many distressful conditions. A devotee is also always kind to everyone, even to his enemy. Nirmama means that a devotee does not attach much importance to the pains and trouble pertaining to the body because he knows perfectly well that he is not the material body. He does not identify with the body; therefore he is freed from the conception of false ego and is equipoised in happiness and distress. He is tolerant, and he is satisfied with whatever comes by the grace of the Supreme Lord. He does not endeavor much to achieve something with great difficulty; therefore he is always joyful. He is a completely perfect mystic because he is fixed in the instructions received from the spiritual master, and because his senses are controlled he is determined. He is not swayed by false arguments, because no one can lead him from the fixed determination of devotional service. He is fully conscious that Kṛṣṇa is the eternal Lord, so no one can disturb him. All these qualifications enable him to fix his mind and intelligence entirely on the Supreme Lord. Such a standard of devotional service is undoubtedly very rare, but a devotee becomes situated in that stage by following the regulative principles of devotional service. Furthermore, the Lord says that such a devotee is very dear to Him, for the Lord is always pleased with all his activities in full Kṛṣṇa consciousness."
    }
}
