{
    "_id": "BG10.8",
    "chapter": 10,
    "verse": 8,
    "slok": "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |\nइति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ||१०-८||",
    "transliteration": "ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate .\niti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ ||10-8||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।10.8।। मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "10.8 I am the source of all; from Me everything evolves; understanding thus, the wise, endowed with meditation, worship Me.",
        "ec": "10.8 अहम् I? सर्वस्य of all? प्रभवः the source? मत्तः from Me? सर्वम् everything? प्रवर्तते evolves? इति thus? मत्वा understanding? भजन्ते worship? माम् Me? बुधाः the wise? भावसमन्विताः endowed with meditation. Commentary Waves originate in water? depend on water and dissolve in water. The only support for the waves is water. Even so the only support for the whole world is the Lord. Realising this? feeling the omnipresence of the Lord? the wise worship Him with devotion and affection in all places. The Supreme is the same in all countries and at all times. He is the material and the efficient cause.As Mulaprakriti or Avyaktam the Lord is the source of all forms. The Lord is the primum mobile. He gazes at His Sakti (creative power) and the whole world evolves and the forms move. The worldly man who has neither sharp nor subtle intellect beholds the changing forms only through the fleshly eyes. He has no idea of the Indwelling Presence? the substratum? the allpervading intelligence or the blissful consciousness. He is allured by the passing forms. He fixes his hopes and joy on these transitory forms. He lives and exerts for them. He rejoices when he gets a wife and children. If these forms pass away he is drowned in sorrow. But the wise ones constantly dwell in the Supreme? the source and the life of all? and enjoy the eternal bliss of the immortal? inner Self? their own nondual Atman? albeit all these forms around them change and pass away. They are steadfast in Yoga. They are endowed with unshakable Yoga. They are enthroned in Yoga. They worship the Supreme in contemplation and enjoy the indescribable bliss of Nirvikalpa Samadhi.Para Brahman? known as Vaasudeva? is the source of the whole world. From Him alone evolves the whole world with all its changes? viz.? existence (Sthiti)? destruction (Nasa)? action (Kriya)? fruit (Phala) and enjoyment (Bhoga). Understanding thus? the wise adore the Supreme Being and engage themselves in profound meditation on the Absolute. (Cf.IX.10)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "10.8 I am the source of all; from Me everything flows. Therefore the wise worship Me with unchanging devotion."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।10.8।। व्यष्टि और समष्टि में जो भेद है वह उन उपाधियों के कारण है? जिनके माध्यम से एक ही सनातन? परिपूर्ण सत्य प्रकट होता है। इन दो उपाधियों के कारण ब्रह्म को ही क्रमश जीव और ईश्वर भाव प्राप्त होते हैं जैसे एक ही विद्युत् शक्ति बल्ब और हीटर में क्रमश प्रकाश और ताप के रूप में व्यक्त होती है। स्वयं विद्युत् में न प्रकाश है और न उष्णता। इसी प्रकार स्वयं परमात्मा में न ईश्वर भाव है और न जीव भाव। जो पुरुष इसे तत्त्वत जानता है वह अविकम्प योग के द्वारा ब्रह्मनिष्ठता को प्राप्त होता है।एक कुम्भकार कुम्भ बनाने के लिए सर्वप्रथम घट के निर्माण के उपयुक्त लचीली मिट्टी तैयार करता है। तत्पश्चात् उस मिट्टी के गोले को चक्र पर रखकर घटाकृति में परिवर्तित करता है। तीसरी अवस्था में घट को सुखाकर उसे चमकीला किया जाता है और चौथी अवस्था में उस तैयार घट को पकाकर उस पर रंग लगाया जाता है। घट निर्माण की इस क्रिया में मिट्टी निश्चय ही कह सकती है कि वह घट का प्रभव स्थान है। चार अवस्थाओं में घट का जो विकास होता है? उसका भी अधिष्ठान मिट्टी ही थी? न कि अन्य कोई वस्तु। यह बात सर्वकालीन घटों के सम्बन्ध में सत्य है। किसी भी घट की उत्पत्ति? वृद्धि और विकास उसके उपादान कारणभूत मिट्टी के बिना नहीं हो सकता। इसी प्रकार एक ही चैतन्यस्वरूप परमात्मा? ईश्वर और जीव के रूप में प्रतीत होता है।जिस पुरुष ने विवेक के द्वारा व्यष्टि और समष्टि के इस सूक्ष्म भेद को समझ लिया है? वही पुरुष अपने मन को बाह्य जगत् से निवृत्त करके इन दोनों के अधिष्ठान स्वरूप आत्मा में स्थिर कर सकता है। मन के इस भाव को ही यहाँ इस अर्थपूर्ण शब्द भावसमन्विता के द्वारा दर्शाया गया है।प्रेम या भक्ति का मापदण्ड है पुरुष की अपनी प्रिय वस्तु के साथ तादात्म्य करने की क्षमता। संक्षेपत? प्रेम की परिपूर्णता इस तादात्म्य की पूर्णता में है। जब एक भक्त स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि एक परमात्मा ही समष्टि और व्यष्टि की अन्तकरण की उपाधियों के माध्यम से मानो ईश्वर और जीव बन गया है? तब वह पराभक्ति को प्राप्त भक्त कहा जाता है।जिस भक्ति के विषय में पूर्व श्लोक में केवल एक संकेत ही किया गया था? उसी को यहाँ क्रमबद्ध करके एक साधना का रूप दिया गया है? जिसके अभ्यास से उपर्युक्त ज्ञान प्रत्येक साधक का अपना निजी और घनिष्ट अनुभव बन सकता है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "10.8. 'He is the source of all and from Him all comes forth' - Thus viewing, the wise men revere Me with devotion."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "10.8 I am the origin of all; from Me proceed everything thinking thus the wise worship Me with all devotion (Bhava)."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "10.8 I am the origin of all; everything moves on owing to Me. Realizing thus, the wise ones, filled with fervour, adore Me."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।10.8 -- 10.10।।सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह -- अहमित्यादिना।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।10.8।।कथं तावकविभूत्यैश्वर्यज्ञानमुक्तयोगस्य हेतुरिति मत्वा पृच्छति -- कीदृशेनेति। उक्तज्ञानमाहात्म्यात्प्रतिष्ठिता भगवन्निष्ठा सिद्ध्यतीत्याह -- उच्यत इति। प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः सर्वप्रकृतिः सर्वात्मेत्याह -- उत्पत्तिरिति। सर्वज्ञात्सर्वेश्वरान्मत्तो निमित्तात्सस्थितिनाशादि भवति मया चान्तर्यामिणा प्रेर्यमाणं सर्वं यथास्वं मर्यादामनतिक्रम्य चेष्टते तदाह -- मत्त इति। इत्थं मम सर्वात्मत्वं सर्वप्रकृतित्वं सर्वेश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं च महिमानं ज्ञात्वा मय्येव निष्ठावन्तो भवन्तीत्याह -- इत्येवमिति। संसारासारताज्ञानवतां भगवद्भजनेऽधिकारं द्योतयति -- अवगतेति। परमार्थतत्त्वे पूर्वोक्तरीत्या ज्ञाते प्रेमादरावभिनिवेशाख्यौ भवतस्तेन संयुक्तत्वं च भगवद्भजने भवति हेतुरित्याह -- भावेति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।10.8।। मैं संसारमात्रका प्रभव (मूलकारण) हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है -- ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धा-प्रेम रखते हुए बुद्धिमान् भक्त मेरा ही भजन करते हैं -- सब प्रकारसे मेरे ही शरण होते हैं।",
        "hc": "।।10.8।। व्याख्या --[पूर्व श्लोककी बात ही इस श्लोकमें कही गयी है। 'अहं सर्वस्य प्रभवः' में 'सर्वस्य' भगवान्की विभूति है अर्थात् देखने, सुनने, समझनेमें जो कुछ आ रहा है, वह सब-की-सब भगवान्की विभूति ही है। 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' में 'मत्तः' भगवान्का योग (प्रभाव) है, जिससे सभी विभूतियाँ प्रकट होती हैं। सातवें, आठवें और नवें अध्यायमें जो कुछ कहा गया है, वह सबकासब इस श्लोकके पूर्वार्धमें आ गया है।]\n\n'अहं सर्वस्य प्रभवः' --  मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज अर्थात् जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम यावन्मात्र जितने प्राणी होते हैं, उन सबकी उत्पत्तिके मूलमें परमपिता परमेश्वरके रूपमें मैं ही हूँ (टिप्पणी प0 543)।    यहाँ प्रभव का तात्पर्य है कि मैं सबका 'अभिन्न-निमित्तोपादानकारण' हूँ अर्थात् स्वयं मैं ही सृष्टिरूपसे प्रकट हुआ हूँ।    'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' --  संसारमें उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, पालन, संरक्षण आदि जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं, जितने भी कार्य होते हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं। मूलमें उनको सत्ता-स्फूर्ति आदि जो कुछ मिलता है, वह सब मेरेसे ही मिलता है। जैसे बिजलीकी शक्तिसे सब कार्य होते हैं, ऐसे ही संसारमें जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका मूल कारण मैं ही हूँ।    'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते' --  कहनेका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि प्राणिमात्रके भाव, आचरण, क्रिया आदिकी तरफ न जाकर उन सबके मूलमें स्थित भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये। कार्य, कारण, भाव, क्रिया, वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिके मूलमें जो तत्त्व है, उसकी तरफ ही भक्तोंकी दृष्टि रहनी चाहिये।           सातवें अध्यायके सातवें तथा बारहवें श्लोकमें और दसवें अध्यायके पाँचवें और इस (आठवें) श्लोकमें 'मत्तः' पद बार-बार कहनेका तात्पर्य है कि ये भाव, क्रिया, व्यक्ति आदि सब भगवान्से ही पैदा होते हैं, भगवान्में ही स्थित रहते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं। अतः तत्त्वसे सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है -- इस बातको जान लें अथवा मान लें, तो भगवान्के साथ अविकम्प (कभी विचलित न किया जानेवाला) योग अर्थात् सम्बन्ध हो जायगा।        यहाँ 'सर्वस्य 'और 'सर्वम्' --  दो बार 'सर्व' पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय इस सृष्टिका न कोई उत्पादक है और न कोई संचालक है। इस सृष्टिके उत्पादक और संचालक केवल भगवान् ही हैं।    'इति मत्वा भावसमन्विताः' --  भगवान्से ही सब संसारकी उत्पत्ति होती है और सारे संसारको सत्ता-स्फूर्ति भगवान्से ही मिलती है अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-रूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं -- ऐसा जो दृढ़तासे मान लेते हैं, वे 'भगवान् ही सर्वोपरि हैं; भगवान्के समान कोई हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं तथा होना सम्भव भी नहीं' -- ऐसे सर्वोच्च भावसे युक्त हो जाते हैं। इस प्रकार जब उनकी महत्त्वबुद्धि केवल भगवान्में हो जाती है तो फिर उनका आकर्षण, श्रद्धा, विश्वास, प्रेम आदि सब भगवान्में ही हो जाते हैं। भगवान्का ही आश्रय लेनेसे उनमें समता, निर्विकारता, निःशोकता, निश्चिन्तता, निर्भयता आदि स्वतः-स्वाभाविक ही आ जाते हैं। कारण कि जहाँ देव (परमात्मा) होते हैं, वहाँ दैवी-सम्पत्ति स्वाभाविक ही आ जाती है।   'बुधाः' --  भगवान्के सिवाय अन्यकी सत्ता ही न मानना, भगवान्को ही सबके मूलमें मानना, भगवान्का ही आश्रय लेकर उनमें ही श्रद्धा-प्रेम करना -- यही उनकी बुद्धिमानी है। इसलिये उनको बुद्धिमान् कहा गया है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायमें कहा है कि जो मेरेको क्षर-(संसारमात्र-) से अतीत और अक्षर-(जीवात्मा-) से उत्तम जानता है, वह सर्ववित् है और सर्वभावसे मेरा ही भजन करता है (15। 18 19)।'माम् भजन्ते'--  भगवान्के नामका जप-कीर्तन करना, भगवान्के रूपका चिन्तन-ध्यान करना, भगवान्की कथा सुनना, भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थों-(गीता, रामायण, भागवत आदि) का पठन-पाठन करना -- ये सब-के-सब भजन हैं। परन्तु असली भजन तो वह है, जिसमें हृदय भगवान्की तरफ ही खिंच जाता है, केवल भगवान् ही प्यारे लगते हैं, भगवान्की विस्मृति चुभती है, बुरी लगती है। इस प्रकार भगवान्में तल्लीन होना ही असली भजन है।\n\nविशेष बात\n\nसबके मूलमें परमात्मा है और परमात्मासे ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, घटना आदि सबको सत्ता-स्फूर्ति मिलती है -- ऐसा ज्ञान होना परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले सभी साधकोंके लिये बहुत आवश्यक है। कारण कि जब सबके मूलमें परमात्मा ही है, तब साधकका लक्ष्य भी परमात्माकी तरफ ही होना चाहिये। उस परमात्माकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही सम्पूर्ण विभूतियों और योगके ज्ञानका तात्पर्य है। यही बात गीतामें जगह-जगह बतायी गयी है; जैसे -- जिससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये (18। 46); जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विराजमान है और जो सब प्राणियोंको प्रेरणा देता है, उस परमात्माकी सर्वभावसे शरण जाना चाहिये (18। 61 62); इत्यादि। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-- ये साधन तो अपनी-अपनी रुचिके अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, पर उपर्युक्त ज्ञान सभी साधकोंके लिये बहुत ही आवश्यक है।\n\n सम्बन्ध --  अब आगेके श्लोकमें उन भक्तोंका भजन किस रीतिसे होता है-- यह बताते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।10.8।।अहं सर्वस्य विचित्रचिदचित्प्रपञ्चस्य प्रभवः उत्पत्तिकारणम् सर्वं मत्त एव प्रवर्तते इति इदं मम स्वाभाविकं निरङ्कुशैश्वर्यं सौशील्यसौन्दर्यवात्सल्यादिकल्याणगुणगणयोगं च मत्वा बुधाः ज्ञानिनो भावसमन्विताः मां सर्वकल्याणगुणान्वितं भजन्ते। भावो मनोवृत्तिविशेषः? मयि स्पृहयालवो मां भजन्त इत्यर्थः।कथम् --",
        "et": "10.8 I am the 'origin', namely, the cause of originating everything in this universe consisting of wonderful sentient and non-sentient beings. From Me proceed everything. Thinking thus of My sovereignty, natural and unhindered, and knowing Me as endowed with a multitude of auspicious attributes like condescension, beauty, parental affection etc., the wise or the men of knowledge worship Me with devotion endowed as I am with all auspicious attributes. 'Bhava' is a particular disposition, here a loving disposition, of the mind. The meaning is that they worship Me with intense yearning of the heart.\n\nHow?"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्।  परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S  -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या।  तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति।  श्रीभगवान् अथवा बहुना  इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist.  It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।",
        "et": "10.8 See Comment under 10.11"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।10.8।।किस प्रकारके अविचल योगसे युक्त हो जाता है सो कहा जाता है --, मैं वासुदेव नामक परब्रह्म समस्त जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ? और मुझसे ही यह स्थिति? नाश? क्रिया और कर्मफलोपभोगरूप विकारमय सारा जगत् घुमाया जा रहा है। इस अभिप्रायको ( अच्छी प्रकार ) समझकर भावसमन्वित -- परमार्थतत्त्वकी धारणासे युक्त हुए? बुद्धिमान् -- तत्त्वज्ञानी पुरुष? मुझे भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं।",
        "sc": "।।10.8।। --,अहं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यं सर्वस्य जगतः प्रभवः उत्पत्तिः। मत्तः एव स्थितिनाशक्रियाफलोपभोगलक्षणं विक्रियारूपं सर्वं जगत् प्रवर्तते। इति एवं मत्वा भजन्ते सेवन्ते मां बुधाः अवगतपरमार्थतत्त्वाः? भावसमन्विताः भावः भावना परमार्थतत्त्वाभिनिवेशः तेन समन्विताः संयुक्ताः इत्यर्थः।।किञ्च --,",
        "et": "10.8 Aham, I, the supreme Brahman called Vasudeva; am the prabhavah, origin; sarvasya, of all, of the whole world; sarvam, everything, the whole world of changes, consisting of continuance, destruction, action and enjoyment of the fruits of action; pravartate, moves on; mattah, owing to Me alone. Matva, realizing; iti, thus; the budhah, wise ones, the knowers of the supreme Reality; bhava-samanvitah, filled with fervour-bhava is the same as bhavana, meaning ardent longing for the supreme Reality; filled (samanvitah) with that, i.e. imbued with that; bhajante, adore; mam, Me.\nBesides,"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।10.8 -- 10.10।।ननुएतां विभूतिम् [10।7] इति परिज्ञातुः फलमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यतस्तात्पर्यान्तरमाह -- सन्ति चेति। उक्तफले विश्वासजननार्थमिति शेषः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।10.8 -- 10.10।।विभूतियोगज्ञानविपाकरूपभक्तिविवृद्धिं दर्शयति चतुर्भिः पुमर्थरूपैः अहमित्यादिभिः -- अहं सर्वस्य प्रभव इत्यादि। विश्वोत्पादकत्वप्रवर्त्तकत्वरूपस्वयोगविभूतिस्वरूपाविष्करणं इत्येवं मम योगं विभूतिं च भगवन्मार्गीयाचार्योपदेशद्वारा मयि भावो भक्तिस्तया समन्विता मां सेवन्ते बुधाः। एते च माहात्म्यज्ञानपूर्वकभक्तिमन्तो भगवत्सेवकाः स्वरूपतो निर्दिश्यन्ते भगवन्मार्गीया उद्धवादय इव। मच्चित्ता इति मदर्पितान्तःकरणाः। मद्गतप्राणा इति -- प्राणशब्द इन्द्रियप्राणवाचक इति मदर्पितेन्द्रियप्राणाः मयि सततं युक्ता देहेनेति? समर्पितदेहाः आत्मना वा भगवति सततं युक्ताः अयमेव ब्रह्मसम्बन्धः भगवते कृष्णाय दारागारपुत्राप्त -- इतिवाक्यात्आत्मना सह तत्तदीहापराणि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि तद्धर्मांश्च समर्पयित्वा स्वयं दासभूता नित्यं भगवन्तं भजन्ते सेवामार्गप्रकारेण सेवन्ते? न पूजाडम्बरेणेति? सेवायां स्थितिस्तेषामुक्तासेवायां वा कथायां वा इति भक्तिवर्द्धिन्यां कथायां च स्थितिमाह -- परस्परं बोधयन्तः कथयन्तश्च मां इति। तदपि नित्यं? न तु नैमित्तिकम्। तथैव च तुष्यन्ति मनउत्सवादिषु च रमन्ति अनुकरणेन वा क्री़डन्ति तथाभूतानां तेषां प्रीतिपूर्वकं पुष्टिमर्यादानुकूलापरानुरक्तिरीश्वरे सर्वात्मना प्रीतिस्तत्पूर्वकं भजतां सेवतां -- अनेनचेतस्तत्प्रवणं सेवा इति मानसीस्वरूपमुक्तं -- तेषामेव बुद्धियोगं विपाकदशामापन्नं ददामि येन ते मां पुरुषोत्तमं उप समीप एव प्राप्ता भवन्ति। इत्थं तेषां निर्गुणमुक्तिर्भावितया सूचिता।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।10.8।।यादृशेन विभूतियोगयोर्ज्ञानेनाविकम्पयोगप्राप्तिस्तद्दर्शयति चतुर्भिः -- अहं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यं सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिकारणमुपादानां निमित्तं च। स्थितिनाशादि च सर्वं मत्त एव प्रवर्तते भवति। मयैवान्तर्यामिणा सर्वज्ञेन सर्वशक्तिना प्रेर्यमाणं स्वस्वमर्यादामनतिक्रम्य सर्वं जगत्प्रवर्तते चेष्टत इति वा। इत्येवं मत्वा बुधा विवेकेनावगततत्त्वाभावेन परमार्थतत्त्वग्रहणरूपेण प्रेम्णा समन्विताः सन्तो मां भजन्ते।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।10.8।। यथा च विभूतियोगयोर्ज्ञानेन सम्यग्ज्ञानावाप्तिस्तद्दर्शयति -- अहमित्यादिचतुर्भिः। अहं सर्वस्य जगतः प्रभवो भृग्वादिरूपविभूतिद्वारेणोत्पत्तिहेतुः। मत्त एव चास्य सर्वस्यबुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः इत्यादि सर्वं प्रवर्तत इति? एवं मत्वाऽवबुध्य बुधा विवेकिनो भावसमन्विताः प्रीतियुक्ता मां भजन्ते।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।10.8।।ननु कथं तावकविभूतियोगज्ञानेनाविकम्पयोगप्राप्तिस्तवोपासनायास्तत्प्राप्तिसाधनत्वादित्याशङ्क्य विभूतियोगज्ञानमहिम्ना प्राप्त्या मदुपादनया मद्गतेनाविकम्पयोगेन युज्यते इत्याह -- अहमिति चतुर्भिः। अहं परमात्मा वासुदेवाभिधः सर्वस्य ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य प्रभवः प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः प्रकृतिरभिन्ननिमित्तोपादानं मत्त एव सर्वज्ञानत्सर्वेश्वरात्सर्वं स्थितिनाशक्रियाफलोपभोगलक्षणं जगत्प्रवर्तते इति मत्वा वासुदेवएव सर्वात्मा सर्वेश्वरः सर्वज्ञः सर्वोपादानं सर्वनियन्ता भजनीय इत श्रुत्वा मननेन निशित्य भजन्ते सेवन्ते। के ते इत्यत आह -- बुधा अवगतसंसारतत्त्वाः। संसारासारज्ञानवतामेव भगवद्भजनेऽधिकार इति भावः। भावो भावना अयमेव भगवान्वासुदेवः परमार्थतत्त्वं इत्यभिनिवेशस्तेन सम्यक् युक्ताः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।10.8।।उक्तार्थस्यानन्तरमुदाहरणप्रदर्शनमुखेन प्रपञ्चनं क्रियत इत्यभिप्रायेणाह -- विभूतिज्ञानेति। तदेव हि ज्ञानं भक्तिरूपेण परिणमत इत्यभिप्रायेण विभूतिज्ञानविपाकरूपत्वोक्तिः। असङ्कोचात्कार्यभूतब्रह्मादिसमस्तगोचरः सर्वशब्द इत्यभिप्रायेणविचित्रेत्यादिकमुक्तम्। प्रभवशब्दस्यात्रोत्पत्तिक्रियादिमात्रपरत्वव्युदासायाह -- उत्पत्तिकारणमिति। अत्र वक्ष्यमाणप्रकारेण सृष्ट्युपयुक्तकल्याणगुणयोगोऽपि गर्भितः। ब्रह्मादेरपि स्वप्रवृत्तिसामर्थ्यं मदधीनमितिमत्तः सर्वम् इत्यनेन विवक्षितमित्यभिप्रायेणाहसर्वं मत्त एवेति। पूर्वोक्तविभूत्याद्यनुवादरूपतां दर्शयतिइतीदमित्यादिना। स्वाभाविकनिरंकुशशब्दाभ्यां अर्वाचीनेश्वरव्यवच्छेदाय श्रुतिसिद्धाहेतुसाध्यत्वानवधिकत्वोक्तिः। वक्तृरूपावतारसौलभ्यपरास्मच्छब्दाभिप्रेतंमां भजन्ते इत्युच्यमानभजनस्यात्यन्तोपयुक्तं योगशब्दार्थमाह --,सौशील्येत्यादिना।सौशील्यवात्सल्येति दिव्यात्मगुणवर्गस्य प्रदर्शनार्थम्?सौन्दर्येत्याकर्षकतमदिव्यमङ्गलविग्रहगुणवर्गस्य। बुधशब्देनात्र प्रकृतज्ञानविशेषवन्तः प्रागुक्ता महात्मानो विवक्षिता इत्यभिप्रायेणज्ञानिन इत्युक्तम्। मत्वा भावसमन्विता इत्यन्वयः। एवंविधज्ञानस्य भक्तिसाधनत्वे तात्पर्यात्।माम् इत्यनेनात्र भजनदशानुसन्धेयगुणगणविशिष्टस्वरूपं विवक्षितमित्यभिप्रायेणोक्तंसर्वकल्याणगुणान्वितमिति। अनेकार्थस्य भावशब्दस्य प्रकृतानुगुणमर्थमाह -- भावो मनोवृत्तिविशेष इति। तमेव विशेषं विशदयति -- मयि स्पृहयालव इति।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।10.8।।एवं ज्ञानिनो भक्तियुक्तत्वं विशदयति -- अहमिति चतुर्भिः। अहं सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिस्थानं? सर्वं जगत् मत्तःबुद्धिर्ज्ञानं [10।4] इत्यादिरीत्या भृग्वाद्युक्तधर्मादिरीत्या च प्रवर्तते? मत्क्रीडार्थकभावयुक्तं भवतीत्यर्थः। भावंसमन्विताः मत्सेवनैकप्रयत्नवन्तः सन्तो बुधाः पण्डिता विवेकिनः? इति अमुना प्रकारेण क्रीडात्मकतया प्रकटीभूतरूपं मां भजन्ते सेवन्ते।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।10.8।।उपासनास्वरूपमाह द्वाभ्याम् -- अहमिति। बुधा मां प्रत्यगात्मानमिति मत्वा भजन्ते। इति कथम्। अहमेव सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिः। मत्तो मदनुग्रहं प्राप्यैव सर्वं बुद्ध्यादिकं स्वस्वकार्याय प्रवर्तते। अहमेव,जगतः कर्तान्तर्यामी चेत्यहंग्रहेणात्मानमुपासीतेति भावः। भावसमन्विताः भावनायुक्ताः एतच्चोत्तरार्थम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "I am the source of all spiritual and material worlds. Everything emanates from Me. The wise who perfectly know this engage in My devotional service and worship Me with all their hearts.",
        "ec": " A learned scholar who has studied the Vedas perfectly and has information from authorities like Lord Caitanya and who knows how to apply these teachings can understand that Kṛṣṇa is the origin of everything in both the material and spiritual worlds, and because he knows this perfectly he becomes firmly fixed in the devotional service of the Supreme Lord. He can never be deviated by any amount of nonsensical commentaries or by fools. All Vedic literature agrees that Kṛṣṇa is the source of Brahmā, Śiva and all other demigods. In the Atharva Veda ( Gopāla-tāpanī Upaniṣad 1.24) it is said, yo brahmāṇaṁ vidadhāti pūrvaṁ yo vai vedāṁś ca gāpayati sma kṛṣṇaḥ: “It was Kṛṣṇa who in the beginning instructed Brahmā in Vedic knowledge and who disseminated Vedic knowledge in the past.” Then again the Nārāyaṇa Upaniṣad (1) says, atha puruṣo ha vai nārāyaṇo ’kāmayata prajāḥ sṛjeyeti: “Then the Supreme Personality Nārāyaṇa desired to create living entities.” The Upaniṣad continues, nārāyaṇād brahmā jāyate, nārāyaṇād prajāpatiḥ prajāyate, nārāyaṇād indro jāyate, nārāyaṇād aṣṭau vasavo jāyante, nārāyaṇād ekādaśa rudrā jāyante, nārāyaṇād dvādaśādityāḥ: “From Nārāyaṇa, Brahmā is born, and from Nārāyaṇa the patriarchs are also born. From Nārāyaṇa, Indra is born, from Nārāyaṇa the eight Vasus are born, from Nārāyaṇa the eleven Rudras are born, from Nārāyaṇa the twelve Ādityas are born.” This Nārāyaṇa is an expansion of Kṛṣṇa. It is said in the same Vedas, brahmaṇyo devakī-putraḥ: “The son of Devakī, Kṛṣṇa, is the Supreme Personality.” ( Nārāyaṇa Upaniṣad 4) Then it is said, eko vai nārāyaṇa āsīn na brahmā neśāno nāpo nāgni-somau neme dyāv-āpṛthivī na nakṣatrāṇi na sūryaḥ: “In the beginning of the creation there was only the Supreme Personality Nārāyaṇa. There was no Brahmā, no Śiva, no water, no fire, no moon, no heaven and earth, no stars in the sky, no sun.” ( Mahā Upaniṣad 1.2) In the Mahā Upaniṣad it is also said that Lord Śiva was born from the forehead of the Supreme Lord. Thus the Vedas say that it is the Supreme Lord, the creator of Brahmā and Śiva, who is to be worshiped. In the Mokṣa-dharma section of the Mahābhārata, Kṛṣṇa also says, prajāpatiṁ ca rudraṁ cāpy aham eva sṛjāmi vai tau hi māṁ na vijānīto mama māyā-vimohitau “The patriarchs, Śiva and others are created by Me, though they do not know that they are created by Me because they are deluded by My illusory energy.” In the Varāha Purāṇa it is also said, nārāyaṇaḥ paro devas tasmāj jātaś caturmukhaḥ tasmād rudro ’bhavad devaḥ sa ca sarva-jñatāṁ gataḥ “Nārāyaṇa is the Supreme Personality of Godhead, and from Him Brahmā was born, from whom Śiva was born.” Lord Kṛṣṇa is the source of all generations, and He is called the most efficient cause of everything. He says, “Because everything is born of Me, I am the original source of all. Everything is under Me; no one is above Me.” There is no supreme controller other than Kṛṣṇa. One who understands Kṛṣṇa in such a way from a bona fide spiritual master, with references from Vedic literature, engages all his energy in Kṛṣṇa consciousness and becomes a truly learned man. In comparison to him, all others, who do not know Kṛṣṇa properly, are but fools. Only a fool would consider Kṛṣṇa to be an ordinary man. A Kṛṣṇa conscious person should not be bewildered by fools; he should avoid all unauthorized commentaries and interpretations on Bhagavad-gītā and proceed in Kṛṣṇa consciousness with determination and firmness."
    }
}
