{
    "_id": "BG10.4",
    "chapter": 10,
    "verse": 4,
    "slok": "बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः |\nसुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||१०-४||",
    "transliteration": "buddhirjñānamasammohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ .\nsukhaṃ duḥkhaṃ bhavo.abhāvo bhayaṃ cābhayameva ca ||10-4||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।10.4।। बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, दम (इन्द्रिय संयम), शम (मन: संयम), सुख, दु:ख, जन्म और मृत्यु, भय और अभय।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "10.4 Intellect, wisdom, non-delusion, forgiveness, truth, self-restraint, calmness, happiness, pain, existence or birth, non-existence or death, fear and also fearlessness.",
        "ec": "10.4 बुद्धिः intellect? ज्ञानम् wisdom? असंमोहः nondelusion? क्षमा forgiveness? सत्यम् truth? दमः selfrestraint? शमः calmness? सुखम् happiness? दुःखम् pain? भवः birth or existence? अभावः nonexistence? भयम् fear? च and? अभयम् fearlessness? एव even? च and. Commentary Intellect is the power which the Antahkarana (the fourfold inner instrument -- the mind? the subconscious mind? intellect and egoism) has of understanding subtle objects. Wisdom is knowledge of the Self. Nondelusion is freedom from illusion. It consists in acting with discrimination when anything has to be done or kown at the moment. Patience is the nonagitation of the mind when assaulted or abused. Not thinking of any harm of evil for those who ahve assulted or abused is also patience. Patience is enduring without lamentation the three kinds of pains? Adhyatmika? Adhidaivika and Adhibhautika Taapas. Fever? etc.? is Adhyatmika pain. Pain or discomfort from severe cold? heat? too much rain? thunder? and lightning is Adhidaivika pain. Pain from scorpionsting? snakite? and wild animals is Adhibhautika pain.Satyam or truth is veracity. It is speaking of ones own actual or real experience of things as actually heard or seen. There is not the least twisting or exaggeration or the slightest modification of facts. Dama or selfrestraint is control of the external senses. It is withdrawal of the senses (ear? skin? eyes? tongue and nose) from their respective objects (viz.? sound? touch? form? palatable foods and fragrance). Sama is calmness or tranillity of the mind produced by checking the mind from thinking of external objects of the senses and by disconnecting it from the senses.Sukham Happiness. That which has Dharma or virtue as its chief cause and that which is favourable to all beings? is happiness. Duhkham That which has Adhrama as its cause and that which is unfavourable to all beings? is pain.That which appears is Bhavah. Sat is Bhavah. Asat or unreality is Abhavah."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "10.4 Intelligence, wisdom, non-illusion, forgiveness, truth, self-control, calmness, pleasure, pain, birth, death, fear and fearlessness;"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।10.4।। See commentary under 10.5."
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "10.4. Intellect,  knowledge,  steadiness,  patience,  truth,  control  [over sense-organs],  tranility  [of mind],  pleasure,  pain,  birth,  death,  fear and courage;"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "10.4 Intelligence, knowledge, non-delusion, forbearance truth, restraint, self-control, pleasure, pain, exaltation depression, fear and fearlessness;"
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "10.4 Intelligence, wisdom, non-delusion, forgiveness, truth, control of the external organs, control of the internal organs, happiness, sorrow, birth, death and fear as also fearlessness;"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।10.4।।तत्प्रथयति -- बुद्धिरित्यादिना। कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः। ज्ञानं प्रतीतिः।ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः इति ह्यभिधानम्। दम इन्द्रियनिग्रहः। शमः परमात्मनि निष्ठा।शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः [11।17।36] इति भागवते।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।10.4।।भगवतो लोकमहेश्वरत्वे हेत्वन्तरमाह -- इतश्चेति। मुमुक्षुभिराराध्यत्वसिद्धये बन्धमोक्षसाधनं पुरस्कृत्याशेषजगत्प्रकृत्यधिष्ठातृत्वलक्षणं सोपाधिकं भगवत्प्रभावमभिधत्ते -- बुद्धिरिति। सूक्ष्मादीत्यादिशब्देन सूक्ष्मतरः सूक्ष्मतमश्चार्थो गृह्यते। उक्तं सामर्थ्यं बुद्धिरित्यस्मिन्नर्थे प्रसिद्धिं प्रमाणयति -- तद्वन्तमिति। आत्मादीति। तदवबोधवन्तं हि ज्ञानिनं वदन्ति। अन्तःकरणस्योपशमो विषयेभ्यो व्यावृत्तिरिति शेषः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।10.4 -- 10.5।। बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।",
        "hc": "।।10.4।। व्याख्या--'बुद्धिः'--उद्देश्यको लेकर निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम बुद्धि है।'ज्ञानम्' --  सार-असार, ग्राह्य-अग्राह्य, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य -- ऐसा जो विवेक अर्थात् अलग-अलग जानकारी है, उसका नाम 'ज्ञान' है। यह ज्ञान (विवेक) मानवमात्रको भगवान्से मिला है।      'असम्मोहः' --  शरीर और संसारको उत्पत्ति-विनाश-शील जानते हुए भी उनमें 'मैं' और 'मेरा'-पन करनेका नाम सम्मोह है और इसके न होनेका नाम 'असम्मोह' है।     'क्षमा'--कोई हमारे प्रति कितना ही बड़ा अपराध करे, अपनी सामर्थ्य रहते हुए भी उसे सह लेना और उस अपराधीको अपनी तथा ईश्वरकी तरफसे यहाँ और परलोकमें कहीं भी दण्ड न मिले--ऐसा विचार करनेका नाम क्षमा है।      'सत्यम्' --  सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये सत्यभाषण करना अर्थात् जैसा सुना, देखा और समझा है, उसीके अनुसार अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये न ज्यादा, न कम -- वैसा-का-वैसा कह देनेका नाम 'सत्य' है।    'दमः शमः'--परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंसे हटाकर अपने वशमें करनेका नाम 'दम' है, और मनको सांसारिक भोगोंके चिन्तनसे हटानेका नाम 'शम' है।   'सुखं दुःखम्'--शरीर, मन, इन्द्रियोंके अनुकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम 'सुख' है और प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो अप्रसन्नता होती है, उसका नाम,'दुःख' है।  'भवोऽभावः' --  सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, भाव आदिके उत्पन्न होनेका नाम 'भव' है और इन सबके लीन होनेका नाम 'अभाव' है।   'भयं चाभयमेव च' --  अपने आचरण, भाव आदि शास्त्र और लोकमर्यादाके विरुद्ध होनेसे अन्तःकरणमें अपना अनिष्ट होनेकी जो एक आशङ्का होती है, उसको भय कहते हैं। मनुष्यके आचरण, भाव आदि अच्छे हैं, वह किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता, शास्त्र और सन्तोंके सिद्धान्तसे विरुद्ध कोई आचरण नहीं करता, तो उसके हृदयमें अपना अनिष्ट होनेकी आशङ्का नहीं रहती अर्थात् उसको किसीसे भय नहीं होता। इसीको 'अभय' कहते हैं।  'अहिंसा' --  अपने तन, मन और वचनसे किसी भी देश, काल, परिस्थिति आदिमें किसी भी प्राणीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम 'अहिंसा' है।  'समता'--  तरहतरहकी अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिके प्राप्त होनेपर भी अपने अन्तःकरणमें कोई विषमता न आनेका नाम 'समता' है।'तुष्टिः' --  आवश्यकता ज्यादा रहनेपर भी कम मिले तो उसमें सन्तोष करना तथा और मिले--ऐसी इच्छाका न रहना 'तुष्टि' है। तात्पर्य है कि मिले अथवा न मिले, कम मिले अथवा ज्यादा मिले आदि हर हालतमें प्रसन्न रहना 'तुष्टि' है। 'तपः' --  अपने कर्तव्यका पालन करते हुए जो कुछ कष्ट आ जाय, प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय, उन सबको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम तप है। एकादशी-व्रत आदि करनेका नाम भी 'तप' है।\n\n'दानम्' --  प्रत्युपकार और फलकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी शुद्ध कमाईका हिस्सा सत्पात्रको देनेका नाम 'दान' (गीता 17। 20)। 'यशोऽयशः' --  मनुष्यके अच्छे आचरणों, भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी प्रसिद्धि, प्रशंसा आदि होते हैं, उनका नाम 'यश' है। मनुष्यके बुरे आचरणों, भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी निन्दा होती है, उसको 'अयश' (अपयश) कहते हैं। 'भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः' --  प्राणियोंके ये पृथक्पृथक् और अनेक तरहके भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उन सबको सत्ता, स्फूर्ति, शक्ति, आधार और प्रकाश मुझ लोकमहेश्वरसे ही मिलता है। तात्पर्य है कि तत्त्वसे सबके मूलमें मैं ही हूँ। यहाँ 'मत्तः' पदसे भगवान्का योग, सामर्थ्य, प्रभाव और 'पृथग्विधाः' पदसे अनेक प्रकारकी अलग-अलग विभूतियाँ जाननी चाहिये।\n\nसंसारमें जो कुछ विहित तथा निषिद्ध हो रहा है; शुभ तथा अशुभ हो रहा है और संसारमें जितने सद्भाव तथा दुर्भाव हैं, वह सब-की-सब भगवान्की लीला है-- इस प्रकार भक्त भगवान्को तत्त्वसे समझ लेता है तो उसका भगवान्में अविकम्प (अविचल) योग हो जाता है (गीता 10। 7)।   यहाँ प्राणियोंके जो बीस भाव बताये गये हैं, उनमें बारह भाव तो एक-एक (अकेले) हैं और वे सभी अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले हैं और भयके साथ आया हुआ अभय भी अन्तःकरणमें पैदा होनेवाला भाव है तथा बचे हुए सात भाव परस्परविरोधी हैं। उनमेंसे भव (उत्पत्ति), अभाव, यश और अयश--ये चार तो प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मोंके फल हैं और सुख, दुःख तथा भय--ये तीन मूर्खताके फल हैं। इस मूर्खताको मनुष्य मिटा सकता है।यहाँ प्राणियोंके बीस भावोंको अपनेसे पैदा हुए और अपनी विभूति बतानेमें भगवान्का तात्पर्य है कि ये बीस भाव तो पृथक्-पृथक् हैं, पर इन सब भावोंका आधार मैं एक ही हूँ। इन सबके मूलमें मैं ही हूँ, ये सभी मेरेसे ही होते हैं एवं मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने 'मत्तः एव' पदोंसे बताया है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उनके मूलमें मैं ही हूँ, वे मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। अतः यहाँ भी भगवान्का आशय विभूतियोंके मूल तत्त्वकी तरफ साधककी दृष्टि करानेमें ही है।       \n\nविशेष बात\n\nसाधक संसारको कैसे देखे? ऐसे देखे कि संसारमें जो कुछ क्रिया, पदार्थ, घटना आदि है, वह सब भगवान्का रूप है। चाहे उत्पत्ति हो, चाहे प्रलय हो; चाहे अनुकूलता हो, चाहे प्रतिकूलता हो; चाहे अमृत हो, चाहे मृत्यु हो; चाहे स्वर्ग हो, चाहे नरक हो; यह सब भगवान्की लीला है। भगवान्की लीलामें बालकाण्ड भी है, अयोध्याकाण्ड भी है, अरण्यकाण्ड भी है और लङ्काकाण्ड भी है। पुरियोंमें देखा जाय तो अयोध्यापुरीमें भगवान्का प्राकट्य है राजा, रानी और प्रजाका वात्सल्यभाव है। जनकपुरीमें रामजीके प्रति राजा जनक, महारानी सुनयना और प्रजाके विलक्षण-विलक्षण भाव हैं। वे रामजीको दामादरूपसे खिलाते हैं, खेलाते हैं, विनोद करते हैं। वनमें (अरण्यकाण्डमें) भक्तोंका मिलना भी है और राक्षसोंका मिलना भी। लंकापुरीमें युद्ध होता है, मार-काट होती है, खूनकी नदियाँ बहती हैं। इस तरह अलग-अलग पुरियोंमें, अलग-अलग काण्डोंमें भगवान्की तरह-तरहकी लीलाएँ होती हैं। परन्तु तरह-तरहकी लीलाएँ होते हुए भी रामायण एक है और ये सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अङ्ग हैं तथा इन अङ्गोंसे रामायण साङ्गोपाङ्ग होती है। ऐसे ही संसारमें प्राणियोंके तरहतरहके भाव हैं, क्रियाएँ हैं।    कहींपर कोई हँस रहा है तो कहींपर कोई रो रहा है, कहींपर विद्वद्गोष्ठी हो रही है तो कहींपर आपसमें लड़ाई हो रही है, कोई जन्म ले रहा है तो कोई मर रहा है, आदि-आदि जो विविध भाँतिकी चेष्टाएँ हो रही हैं, वे सब भगवान्की लीलाएँ हैं। लीलाएँ करनेवाले ये सब भगवान्के रूप हैं। इस प्रकार भक्तकी दृष्टि हरदम भगवान्पर ही रहनी चाहिये; क्योंकि इन सबके मूलमें एक परमात्मतत्त्व ही है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।10.4।।बुद्धिः मनसो निरूपणसामर्थ्यम्? ज्ञानं चिदचिद्वस्तुविशेषविषयः निश्चयः। असंमोहः पूर्वगृहीताद् रजतादेः विसजातीये शुक्तिकादिवस्तुनि सजातीयताबुद्धिनिवृत्तिः। क्षमा मनोविकारहेतौ सति अपि अविकृतमनस्त्वम्। सत्यं यथादृष्टविषयं भूतहितरूपं वचनम्? तद्नुगणा मनोवृत्तिः इह अभिप्रेता? मनोवृत्तिप्रकरणात्। दमः बाह्यकरणानाम् अनर्थविषयेभ्यो नियमनम्। शमः अन्तःकरणस्य तथा नियमनम्। सुखम् आत्मानुकूलानुभवः। दुःखं प्रतिकूलानुभवः। भवो भवनम् अनुकूलानुभवहेतुकं मनसो भवनम्। अभावः,प्रतिकूलानुभवहेतुको मनसः अवसादः। भयम् आगामिनो दुःखस्य हेतुदर्शनजं दुःखम्? तन्निवृत्तिः अभयम्। अहिंसा परदुःखाहेतुत्वम्। समता आत्मनि सुहृत्सु विपक्षेषु च अर्थानर्थयोः सममतित्वम्। तुष्टिः सर्वेषु आत्मसु दृष्टेषु तोषस्वभावत्वम्। तपः शीस्त्रीयो भोगसंकोचरूपः कायक्लेशः। दानं स्वकीयभोग्यानां परस्मै प्रतिपादनम्। यशो गुणवत्ताप्रथा? अयशः नैर्गुण्यप्रथा? कीर्त्यकीर्त्यनुगुणमनोवृत्तिविशेषौ तथा उक्तौ? मनोवृत्तिप्रकरणात्। तपोदाने च तथा। एवमाद्याः सर्वेषां भूतानां भावाः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतवो मनोवृत्तयो मत्त एव मत्संकल्पायत्ताः भवन्ति।सर्वस्य भूतजातस्य सृष्टिस्थित्योः प्रवर्तयितारः च मत्संकल्पायत्तप्रवृत्तय इत्याह --",
        "et": "10.4 - 10.5 'Intelligence' is the power of the mind to determine. 'Knowledge' is the power of determining the difference between the two entities - non-sentient matter and the individual self. 'Non-delusion' is freedom from the delusion of perceiving as silver the mother-of-pearl etc., which are different from silver etc., previously observed. 'Forbearance', is a non-disturbed state of mind, even when there is a cause for getting disturbed. 'Truth' is speech about things as they are actually seen, and meant for the good of all beings. Here, the working of the mind in conformity with the ideal is intended, because the context is with reference to the working of the mind. 'Restraint' is the checking of the outgoing organs from their tendency to move towards their objects and generate evil. 'Self-control' is the restraint of the mind in the same manner. 'Pleasure' is the experience of what is agreeable to oneself. 'Pain' is th experience of what is adverse. 'Exaltation' is that state of elation of the mind caused by experiences which are agreeable to oneself. 'Depression' is the state of mind caused by disagreeable experiences. 'Fear' is the misery which springs from the perception of the cause of future sufferings. 'Fearlessness' is the absence of such feelings. 'Non-violence' is avoidance of being the cause of sorrow to others. 'Eability' is to become eable in mind whether good or bad befalls and to look upon with the same eanimity on what happens to oneself, friends and enemies. 'Cheerfulness' is the natural disposition to feel pleased with everything seen. 'Austerity' is the chastising of the body by denying to oneself pleasures, as enjoined by the scriptures. 'Beneficence' is giving to another what contributes to one's own enjoyment. 'Fame' is the renown of possessing good alities. 'Infamy' is notoriety of possessing bad alities. The workings of the mind which are in accordance with fame and infamy must be understood here, because it is the subject-matter of the context. Austerity and beneficence are to be understood in the same way. All these mental faculties - these functioning of the mind - resulting either in activity or inactivity, are from Me alone, i.e., are dependent on My volition.\n\nSri Krsna declares:  'Thos agents who direct the creation, sustentation etc., of all beings, have their activity dependent on My Will.'"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते।  तथा चाह -- भूय एव इति।  उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति।  अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति।  इत्यध्यायतात्पर्यम्।  शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन  सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्।  असंमोहः उत्साहः।",
        "et": "10.4 See Comment under 10.5"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।10.4।। इसलिये भी मैं लोकोंका महान् ईश्वर हूँ --, सूक्ष्म? सूक्ष्मतर आदि पदार्थोंको समझनेवाली अन्तःकरणकी ज्ञानशक्तिका नाम बुद्धि है। उससे युक्त मनुष्यको ही बुद्धिमान् कहते हैं। ज्ञान -- आत्मा आदि पदार्थोंका बोध? असंमोह -- जाननेयोग्य पदार्थ प्राप्त होनेपर उनमें विवेकपूर्वक प्रवृत्ति? क्षमा -- किसीके द्वारा अपनी निन्दाकी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी चित्तमें विकार न होना? सत्य -- देखने और सुननेसे जिस प्रकारका अपनेको अनुभव हुआ हो? उसको दूसरेकी बुद्धिमें पहुँचानेके लिये उसी प्रकार कही जानेवाली वाणी सत्य कहलाती है? दम -- बाह्य इन्द्रियोंको वशमें कर लेना? शम -- अन्तःकरणकी उपरति? सुख -- आह्लाद? दुःख -- सन्ताप? भव -- उत्पत्ति? अभाव -- उत्पत्तिके विपरीत ( विनाश ) तथा भय -- त्रास और अभय -- उसके विपरीत जो निर्भयता है वह भी।",
        "sc": "।।10.4।। --,बुद्धिः अन्तःकरणस्य सूक्ष्माद्यर्थावबोधनसामर्थ्यम्? तद्वन्तं बुद्धिमानिति हि वदन्ति। ज्ञानम् आत्मादिपदार्थानामवबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येषु विवेकपूर्विका प्रवृत्तिः। क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा अविकृतचित्तता। सत्यं यथादृष्टस्य यथाश्रुतस्य च आत्मानुभवस्य परबुद्धिसंक्रान्तये तथैव उच्चार्यमाणा वाक् सत्यम् उच्यते। दमः बाह्येन्द्रियोपशमः। शमः अन्तःकरणस्य उपशमः। सुखम् आह्लादः। दुःखं संतापः। भवः उद्भवः। अभावः तद्विपर्ययः। भयं च त्रासः? अभयमेव च तद्विपरीतम्।।",
        "et": "10.4 See Commentary under 10.5."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।10.4।।तर्ह्यादिमित्यनेन बुद्धिरित्यादिकं गतार्थमित्यत आह -- तदिति। सर्वादित्वं बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरमिति गौतमवचनात्। बुद्धिर्ज्ञानमिति पुनरुक्तिरित्यत आह -- कार्येति। कुत एतदित्यत आह -- ज्ञानमिति। ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं शास्त्रमित्यसत्? अध्यात्मिकधर्मप्रसङ्गात्। दमो बाह्येन्द्रियोपशमः? शमोऽन्तःकरणस्योपशम इति कश्चित् (शं.) तदसत्? एकेनैव शब्देन सिद्धत्वात्? किन्तु दमः क्रियासु विनयः? शमो बाह्यान्तःकरणसंयम इत्यपरः? तदप्यसदिति भावेनाह -- दम इति। कुत इत्यत आह --,शम इति।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।10.4 -- 10.5।।किञ्च अचिन्त्यैश्वर्ययोगकल्याणगुणान्मत्त एव बुद्धिर्ज्ञानं च भवति। ज्ञानमित्युपलक्षणं सर्वस्य सदसद्गुणसर्गस्यमत्तः सर्वं प्रवर्त्तते [10।8] इति वाक्यात्। तथाहि बुद्धिरित्यादि। बुद्धिः तत्त्वतोऽध्यवसायरूपा? ज्ञानमुपदेशजन्यम्?असम्मूढः [10।3] इत्यत्रोक्तोऽसम्मोहोऽपि मत्त एव भवति। क्षमा सहिष्णुता सत्यं प्रमाणेनावबुद्धस्यार्थस्य तथैव भाषणम्? दमो बाह्येन्द्रियाणां स्वविषयेभ्यो निवृत्तिः? शमोऽन्तःकरणस्य? सुखमात्मानुकूलानुभवः? दुःखं तद्विपरीतं च मत्त एव भवति। मार्गत्रयाधिष्ठाताऽहं यथामार्गानुसरणं तत्तदधिकृताय तथैव दुःखं सुखं प्रयच्छामीति भावः। एवं भवः उद्भवः? अभावस्तद्विपरीतः? भयमभयं च दानं यशः अयशश्चेति विंशद्भावास्तत्तन्मार्गरतानां प्राणिनां यथासर्गं पृथग्विधा मत्त एव भवन्तिरूपनामविभेदेन जगत् क्रीडति यो यतः इति निबन्धोक्तेः। अनेन स्वस्य मुख्यं कर्तृत्वं सर्वकारणत्वं चोक्तम्। प्रकृत्यादेस्तु करणत्वमेव? न कारणत्वं साधकतमत्त्वादिति स्वयोगमहिमोक्तः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।10.4।।आत्मनो लोकमहेश्वरत्वं प्रपञ्चयति -- बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्मार्थविवेकसामर्थ्यम्। ज्ञानमात्मानात्सर्वपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येषु कर्तव्येषु वाऽव्याकुलतया विवेकेन प्रवृत्तिः। क्षमा आकुष्टस्य ताडितस्य वा निर्विकारचित्तता। सत्यं प्रमाणेनावबुद्धस्यार्थस्य तथैव भाषणम्। दमो बाह्येन्द्रियाणां स्वविषयेभ्यो निवृत्तिः। शमोऽन्तःकरणस्य सा। सुखं धर्मासाधारणकारणमनुकूलवेदनीयम्। दुःखमधर्मासाधारणकारणकं प्रतिकूलवेदनीयम्। भवः उत्पत्तिः। भावः सत्ता। अभावोऽसत्तेति वा। भयं च त्रासस्तद्विपरीतमभयम्। एवंच एकश्चकार उक्तसमुच्चयार्थः। अपरोऽनुक्ताबुद्ध्यज्ञानादिसमुच्चयार्थः। एवेत्येते सर्वलोकप्रसिद्धा एवेत्यर्थः। मत्तएव भवन्तीत्युत्तरेणान्वयः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।10.4।। लोकमहेश्वरतामेव स्फुटयति -- बुद्धिरिति त्रिभिः। बुद्धिः सारासारविवेकनैपुण्यम्? ज्ञानमात्मविषयम्? असंमोहो व्याकुलत्वाभावः? क्षमा सहिष्णुत्वम्? सत्यं यथार्थभाषणम्? दमो बाह्येन्द्रियसंयमः? शमोऽन्तःकरणसंयमः? सुखमनुकूलसंवेदनीयम्? दुःखं च तद्विपरीतम्? भव उद्भवः अभावस्तद्विपरीतः? भयं त्रासः? अभयं तद्विपरीतम्। अस्य लोकस्य मत्त एव भवन्तीत्युत्तरेणान्वयः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।10.4।।स्वस्य लोकमहेश्वरत्वं देवादिबुद्य्धगोचरत्वेन साधितं तदेव प्रपञ्चयति। बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्माद्यर्थावबोधनसामर्थ्यम्। ज्ञानमात्मादिपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु ज्ञातव्येषु विवेखपुरःसरा बुद्धिप्रवृत्तिः। आकुष्टस्य ताडितस्य वाऽविकृतचित्तता क्षमा। प्रमाणावगतार्थस्य यथार्थभाषणं सत्यं। बाह्येन्द्रियोपशमो दमः। अन्तःकरणशान्तिः शमः। आह्लादः सुखम्। तापो दुःखम्। भव उत्पत्तिः। अभावो नाशः। भयं त्रासः। अभयमत्रासः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।10.4।।भक्त्युत्पत्तिविवृद्ध्यर्था [गी.सं.14] इत्यत्र विवक्षितं विवृण्वन्नुक्तेन तत्फलितेन च वक्ष्यमाणप्रकरणस्य च सङ्गतिमाह -- एवमिति। बुद्धिज्ञानशब्दयोः पौनरुक्त्यपरिहारायबुद्धिमत्त्वाज्जानाति इति प्रयोगानुसारेण शक्तिलक्षणया बुध्यतेऽनयेति तद्व्युत्पत्त्या वा हेतुकार्यपरतया व्याख्यातिबुद्धिर्मनसो निरूपणसामर्थ्यमिति। असम्मोहासक्त्या तद्धेतुभूतं ज्ञानमिह विवक्षितमित्यभिप्रायेणाहज्ञानं चिदचिद्वस्तुविशेषविषयो निश्चय इति। बुद्धिज्ञानशब्दयोरध्यवसायमोक्षधीविषयत्वेन व्याख्यानं शब्दद्वयसङ्कोचादिप्रसङ्गादनादृतम्। विजातीये सजातीयताबुद्धिः सम्मोहः तदुदाहरति -- पूर्वेति।पूर्वगृहीतात्? आपणादिनिष्ठतयाऽनुभूतादित्यर्थः। इदं च स्मर्यमाणाध्यासोदाहरणम्। न कोपाख्यविकाराभावमात्रेण सुषुप्त्यादिषु क्षमाशब्दः? अपितु कोपहेतुषु सत्सु तदभावे तत्प्रयोग इत्यभिप्रायेणाह,मनोविकारेति। क्रोधहेतावाक्रोशताडनादौ सत्यपीत्यर्थः।ननु कथं हेतौ सति तत्कार्यनिवृत्तिः तथात्वे तस्य हेतुत्वमेव हीयेत उच्यते -- नह्यवश्यं हेतौ सति कार्येण भवितव्यमिति नियमः अपितु प्रतिबन्धकरहितायां सामग्र्यां सत्याम् अन्यथा प्रत्येकं हेतूनां प्रतिबद्धानां च तत्तत्कार्यजनकत्वे कार्यस्य सदातनत्वसार्वत्रिकत्वप्रसङ्गात्? नित्यविभोश्च कारणस्य सद्भावात् तर्हि कः क्षमाया विस्मयः इति चेद्यथा मणिमन्त्रादिभिः स्फोटसामग्री स्तभ्यते तथा प्रबलविवेकाख्यप्रतिबन्धकेन कोपसामग्र्या दुर्निवारायाः स्तम्भनादिति भावः। वस्तुसत्यत्वस्य यथार्थदर्शनमप्यपेक्षितम्? तथापि यथादृष्टवचनमात्रे वक्तुर्नापराधः? भ्रमस्य दैवागतत्वादित्यभिप्रायेणयथादृष्टविषयमित्येतावदुक्तम्। परमार्थत्वेऽपि परानर्थहेतोःसत्यं भूतहितं प्रोक्तम् इत्यादिभिः सत्यत्वप्रतिक्षेपात्भूतहितरूपेति विशेषितम्। भावशब्दस्य मनोवृत्तौ प्रसिद्धिप्रकर्षबलमग्र्यप्रायनयं चाभिप्रेत्य सत्यशब्दस्यात्र लाक्षणिकत्वमाहतदनुगुणेति। शमदमशब्दयोरेकैकस्योभयनियमनाभिधानसामर्थ्येऽपि पौनरुक्त्यपरिहाराय विषयभेदे वक्तव्ये नियमनक्रमेण दमशमयोर्बाह्यान्तरकरणविषयत्वोक्तिः। शास्त्रीयेभ्यो नियमनस्य निषिद्धत्वात्अनर्थविषयेभ्य इत्युक्तम्।तथेति अनर्थविषयेभ्य एव।अनुकूलत्वमात्रं प्रतिकूलत्वमात्रमेव च सुखदुःखयोर्लक्षणम् तथापि मनोवृत्तिरूपत्वसिद्ध्यर्थमनुभवशब्दः। सुखदुःखभयाभयमध्यपतितत्वात्भवोऽभावः इत्यत्रापि परस्परविरुद्धार्थविषयत्वं सम्भवदपरित्याज्यम् ततश्च भावाभावशब्दयोः प्रत्ययभेदमात्रमेव? न त्वर्थभेदः तत्र चाभाव इत्येव पदच्छेदः तयोरपि मनोवृत्तिरूपत्वं वक्तव्यम् प्रस्तुतयोरेव च सुखदुःखयोस्तद्धेतुत्वमुचितम् अत एवभवो भव्यता? भावोऽभिप्रायः इत्यादि परव्याख्यानं मन्दम् तदेतदखिलमभिप्रेत्याहअनुकूलेति।भवनमिति उद्धर्षोऽत्र विवक्षितः अवसादप्रतियोगित्वात्। अनवसादानुद्धर्षो हि सहोक्तौ वाक्यकारेणतल्लब्धिर्विवेकविमोकाभ्यासक्रियाकव्याणानवसादानुद्धर्षेभ्यः [बो.वृ.] इति। सुखदुःखशब्दाभ्यां पौनरुक्त्यव्युदासाय भयाभयशब्दयोस्तद्विशेषविषयतां दर्शयति -- आगामिन इति। आगामिप्रत्यवायोत्प्रेक्षा भयमिति लक्षणेऽपि तस्यैव ज्ञानविशेषस्य प्रतिकूलरूपत्वाद्दुःखत्वम् नह्यन्यो दुःखाख्यो गुणोऽस्मद्दर्शने।परदुःखाहेतुत्वमित्यत्र दुःखशब्देनाहितं विवक्षितम्? चिकित्सादौ हितरूपदुःखकरणस्य हिंसात्वाभावात्? प्रपञ्चितं चैतत्प्रागेव। अभयाहिंसयोरभावरूपयोरपि भावान्तरत्ववेषेण मनोवृत्तिरूपत्वं भाव्यम्। समत्वप्रकारेषु बहुषु सत्स्वपि हिंसानिषेधप्रसङ्गाद्धिंसाविषयभूतशत्रुस्मृतिर्जाता ततश्च द्वेषाद्यभावेन शत्रुमित्रादिसाम्यं प्रदेशान्तरप्रपञ्चितमिह विवक्षितमित्यभिप्रायेणाहआत्मनीति।न चलति निजवर्णधर्मतो यः सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे। न हरति नच हन्ति किञ्चिदुच्चैः सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम् [वि.पु.3।7।20] इति भगवत्पराशरवचनमिह तत्तत्पदैः स्मारितम्।अर्थानर्थयोरिति -- आत्मार्थपरार्थयोरात्मानर्थपरानर्थयोश्चेत्यादि भाव्यम्।तुष्टेः समतासहपाठात् शत्रूणां समृद्धिमतामपि सङ्ग्रहाय सर्वशब्दः। सर्वत्र सन्तोष एव ह्यात्मनः स्वारसिकः प्राप्तः? प्रातिकूल्यभावनाद्युपाध्यधीनं हि वैरादिकमित्यभिप्रायेणसन्तोषस्वभावत्वमित्युक्तम्। इदं च मैत्र्यादिषु चतुर्षु मुदिताख्यचित्तपरिकर्म। बाह्यागमादिमूलक्लेशस्य तपस्त्वव्यवच्छेदायोक्तंशास्त्रीय इति। शास्त्रधिस्यैव भोगसङ्कोचस्य व्याध्यादिवशादक्लेशात्मकत्वे तपस्त्वं नास्तीति व्यञ्जनायकायक्लेश इत्युक्तम्। दाने परकीयानां स्वकीयानामपि हेयभूतानां व्यवच्छेदायस्वकीयभोग्यानामित्युक्तम्।परस्मै प्रतिपादनं परस्वत्वापादनमित्यर्थः। अयशश्शब्दै नञो विरोधिपरत्वं प्रयोगप्रकर्षसिद्धमाह -- नैर्गुण्यप्रथेति। सदोषत्वप्रथेत्यर्थः। प्रथात्वमात्रमुभयसाधारणम् अतो गुणवत्त्वनैर्गुण्याभ्यां विशेषणम्।एतच्चेत्यादिकं पूर्ववत्। सिंहावलोकितकेनाह -- तपोदाने च तथेति मनोवृत्तिविशेषावित्यर्थः। उक्तमात्रव्युदासायोपलक्षणतामभिप्रेत्याहएवमाद्या इति। अभिप्रायेऽपि भावशब्दप्रयोगादत्र भावशब्दस्य मनोवृत्तिविषयता। सर्वेषां कर्तृकरणादीनां प्रवृत्तेः स्वाधीनत्वेऽपि मनोवृत्त्युदाहरणं प्राकरणिकभक्तिरूपमनोवृत्तेरपि स्वसङ्कल्पमूलत्वज्ञापनार्थम्। प्रवृत्तिनिवृत्त्योः स्वाधीनत्वे कैमुत्यार्थमाहप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतव इति।मत्त एव इत्यत्र परोक्तसन्निधिमात्रादिव्युदासाय,पञ्चम्यवगतं हेतुत्वं व्यापारमुखेनेत्याहमत्सङ्कल्पेति। पृथग्विधानां परस्परविरुद्धानामप्यहमेको हेतुरित्येवकाराभिप्रायः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।10.4।।एवं ये जानन्ति तेषामन्येषामजानतां च सर्वेश्वरत्वात् मत्त एव नानाविधा भावास्तत्तज्ज्ञानानुरूपा भवन्तीत्याह द्वयेन -- बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह इति। बुद्धिः धर्मज्ञानकौशलं? ज्ञानं स्वरूपात्मकम्? असम्मोहो मायाविलासेषु? क्षमा दुष्टादिकृतिसहिष्णुता? सत्यं आपदादिष्वपि यथार्थभाषणं? दम इन्द्रियनिग्रहः? शमः परमानन्दाप्तिरूपा शान्तिः? सुखं मद्भावानन्दरूपं? दुःखं आनन्दतिरोधानात्मकं? भवः संसारात्मकः? अभावो नाशः? भयं मृत्युकालादीनाम्। चकारेण यमयातनादयः। अभयं मच्चरणाप्त्या कालादिभयाभावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।10.4।।मम महेश्वरत्वादेव मत्तो बुद्ध्यादयो भवन्तीत्याह -- बुद्धिरिति। बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्मार्थावबोधने सामर्थ्यम्? ज्ञानमात्मानात्मादिपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येष्वव्याकुलतया विवेकपूर्विका प्रतिपत्तिः। क्षमा आकृष्टस्य ताडितस्य वाऽविकृतचित्तता। सत्यं प्रमाणेनावगतस्यार्थस्य यथार्थत्वेन भाषणम्। दमो बाह्येन्द्रियनियमः। शमो मनोनिग्रहः। सुखमाह्लादः। दुःखं तापः। भव उत्पत्तिः। भावः सत्ता अभावस्तद्विपर्ययः। भयं त्रासः। अभयमेव च तद्विपरीतम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Intelligence, knowledge, freedom from doubt and delusion, forgiveness, truthfulness, control of the senses, control of the mind, happiness and distress, birth, death, fear, fearlessness;",
        "ec": " In these two verses the Supreme Lord gives a chance to the Māyāvādī philosopher, for here it is clear that the Supreme is different from the individual soul. Arjuna, after hearing the essential four verses of Bhagavad-gītā in this chapter, became completely free from all doubts and accepted Kṛṣṇa as the Supreme Personality of Godhead. He at once boldly declares, “You are paraṁ brahma, the Supreme Personality of Godhead.” And previously Kṛṣṇa stated that He is the originator of everything and everyone. Every demigod and every human being is dependent on Him. Men and demigods, out of ignorance, think that they are absolute and independent of the Supreme Personality of Godhead. That ignorance is removed perfectly by the discharge of devotional service. This has already been explained in the previous verse by the Lord. Now, by His grace, Arjuna is accepting Him as the Supreme Truth, in concordance with the Vedic injunction. It is not that because Kṛṣṇa is Arjuna’s intimate friend Arjuna is flattering Him by calling Him the Supreme Personality of Godhead, the Absolute Truth. Whatever Arjuna says in these two verses is confirmed by Vedic truth. Vedic injunctions affirm that only one who takes to devotional service to the Supreme Lord can understand Him, whereas others cannot. Each and every word of this verse spoken by Arjuna is confirmed by Vedic injunction. In the Kena Upaniṣad it is stated that the Supreme Brahman is the rest for everything, and Kṛṣṇa has already explained that everything is resting on Him. The Muṇḍaka Upaniṣad confirms that the Supreme Lord, in whom everything is resting, can be realized only by those who engage constantly in thinking of Him. This constant thinking of Kṛṣṇa is smaraṇam, one of the methods of devotional service. It is only by devotional service to Kṛṣṇa that one can understand his position and get rid of this material body. In the Vedas the Supreme Lord is accepted as the purest of the pure. One who understands that Kṛṣṇa is the purest of the pure can become purified from all sinful activities. One cannot be disinfected from sinful activities unless he surrenders unto the Supreme Lord. Arjuna’s acceptance of Kṛṣṇa as the supreme pure complies with the injunctions of Vedic literature. This is also confirmed by great personalities, of whom Nārada is the chief. Kṛṣṇa is the Supreme Personality of Godhead, and one should always meditate upon Him and enjoy one’s transcendental relationship with Him. He is the supreme existence. He is free from bodily needs, birth and death. Not only does Arjuna confirm this, but all the Vedic literatures, the Purāṇas and histories. In all Vedic literatures Kṛṣṇa is thus described, and the Supreme Lord Himself also says in the Fourth Chapter, “Although I am unborn, I appear on this earth to establish religious principles.” He is the supreme origin; He has no cause, for He is the cause of all causes, and everything is emanating from Him. This perfect knowledge can be had by the grace of the Supreme Lord. Here Arjuna expresses himself through the grace of Kṛṣṇa. If we want to understand Bhagavad-gītā , we should accept the statements in these two verses. This is called the paramparā system, acceptance of the disciplic succession. Unless one is in the disciplic succession, he cannot understand Bhagavad-gītā . It is not possible by so-called academic education. Unfortunately those proud of their academic education, despite so much evidence in Vedic literatures, stick to their obstinate conviction that Kṛṣṇa is an ordinary person."
    }
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