{
    "_id": "BG10.15",
    "chapter": 10,
    "verse": 15,
    "slok": "स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम |\nभूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ||१०-१५||",
    "transliteration": "svayamevātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama .\nbhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate ||10-15||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।10.15।। हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "Swami Sivananda did not comment on this sloka",
        "ec": "10.15 स्वयम् Thyself? एव only? आत्मना by Thyself? आत्मानम् Thyself? वेत्थ (Thou) knowest? त्वम् Thou? पुरुषोत्तम O Purusha Supreme? भूतभावन O source of beings? भूतेश O Lord of beings? देवदेव O God of,gods? जगत्पते O ruler of the world.Commentary Purushottama means the best among all Purushas. He assumes the four forms? viz.? the source of beings? the Lord of beings? God of gods and ruler of the world. Hence He is called Purushottama.Devadeva is He who is worshipped even by Indra and other gods.Jagatpati The Lord protects the world and guides the people through the instructions given in the Vedas. Hence the name ruler of the world."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "Shri Purohit Swami did not comment on this sloka"
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।10.15।। यह श्लोक दर्शाता है कि किस प्रकार श्रीकृष्ण उस परम सत्य का वर्णन करने में सक्षम हैं? जिसे न स्वर्ग के देवता जान सकते हैं और न दानवगण। आत्मा को कभी प्रमाणों (इन्द्रियों) के द्वारा दृश्य पदार्थ के रूप में नहीं जाना जा सकता है? और न वह हमारी शुभ अशुभ प्रवृत्तियों के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। परन्तु? आत्मा चैतन्य स्वरूप होने से स्वयं ज्ञानमय है  और ज्ञान को जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण (ज्ञान का साधन) की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए अर्जुन यहाँ कहता है? आप स्वयं अपने से अपने आप को जानते हैं।सांख्यदर्शन के अनुसार प्रतिदेह में स्थित चैतन्य? पुरुष कहलाता है। यहाँ श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम नाम से सम्बोधित किया गया है? जिसका अर्थ है? वह एकमेव अद्वितीय तत्त्व जो भूतमात्र की आत्मा है। पुरुषोत्तम शब्द का लौकिक अर्थ है पुरुषों में उत्तम तथा अध्यात्मशास्त्र के अनुसार अर्थ है परमात्मा। अब अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण के शुद्ध ब्रह्म के रूप में स्वीकार करके उनका गौरव गान करते हुए उन्हें इन नामों से सम्बोधित करता है? हे भूतभावन (भूतों की उत्पत्ति करने वाले)  हे भूतेश  हे देवों के देव  हे जगत् के शासक स्वामी किसी भी वस्तु का सारतत्त्व उस वस्तु के गुणों का शासक और धारक होता है। स्वर्ण आभूषणों के आकार? आभा आदि गुणों का शासक होता है। परन्तु चैतन्य की नियमन एवं शासन की शक्ति अन्य की अपेक्षा अधिक है? क्योंकि उसके बिना हम न कुछ जान सकते हैं और न कुछ कर्म ही कर सकते हैं। वस्तुओं और घटनाओं का भान या ज्ञान तभी संभव होता है जब इनके द्वारा अन्तकरण में उत्पन्न वृत्तियाँ इस शुद्ध चैतन्यरूप आत्म्ाा से प्रकाशित होती हैं।अपने आश्चर्य? आदर और भक्ति को व्यक्त करने वाले इस कथन के बाद? अब अर्जुन सीधे ही भगवान् के समक्ष अपनी बौद्धिक जिज्ञासा को प्रकट करता है --"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "Dr.S.Sankaranarayan did not comment on this sloka"
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "Swami Adidevananda did not comment on this sloka"
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "Swami Gambirananda did not comment on this sloka"
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।10.15।।कश्चिदेव महता कष्टेनानेकजन्मसंसिद्धो जानाति त्वदनुगृहीतस्त्वद्रूपमित्यभिप्रेत्याह -- यत इति। स्वयमेवोपदेशमन्तरेणेत्यर्थः। आत्मना प्रत्यक्त्वेनाविषयतयेति यावत्। आत्मानं निरुपाधिकं रूपम्। नच तव सोपाधिकमपि रूपमन्यस्य गोचरे तिष्ठतीत्याह -- निरतिशयेति। पुरुषश्चासावुत्तमश्चेति क्षराक्षरातीतपूर्णचैतन्यरूपत्वं संबोधनेन बोध्यते। सर्वप्रकृतित्वं सर्वकर्तृत्वं च कथयति -- भूतानीति। सर्वेश्वरत्वमाह -- भूतानामिति। उक्तं ते सोपाधिकं रूपं देवादीनामाराध्यतामधिगच्छतीत्याह -- देवेति। जगतः सर्वस्य स्वामित्वेन पालयितृत्वमाह -- जगदिति।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।10.15।। हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।",
        "hc": "।।10.15।। व्याख्या--'भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते पुरुषोत्तम'--सम्पूर्ण प्राणियोंको संकल्पमात्रसे उत्पन्न करनेवाले होनेसे आप 'भूतभावन' हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके और देवताओंके मालिक होनेसे आप 'भूतेश' और 'देवदेव' हैं; जड-चेतन, स्थावर-जङ्गममात्र जगत्का पालन-पोषण करनेवाले होनेसे आप 'जगत्पति' हैं; और सम्पूर्ण पुरुषोंमें उत्तम होनेसे आप लोकमें और वेदमें 'पुरुषोत्तम' नामसे कहे गये हैं (गीता 15। 18) (टिप्पणी प0 550)।\n\nइस श्लोकमें पाँच सम्बोधन आये हैं। इतने सम्बोधन गीताभरमें दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं आये। कारण है कि भगवान्की विभूतियोंकी और भक्तोंपर कृपा करनेकी बात सुनकर अर्जुनमें भगवान्के प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं और उन भावोंमें विभोर होकर वे भगवान्के लिये एक साथ पाँच सम्बोधनोंका प्रयोग करते हैं (टिप्पणी प0 551)। 'स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्'--भगवान् अपने-आपको अपनेआपसे ही जानते हैं। अपने-आपको जाननेमें उन्हें किसी प्राकृत साधनकी आवश्यकता नहीं होती। अपने-आपको जाननेमें उनकी अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, कोई जिज्ञासा भी नहीं होती, किसी करण-(अन्तःकरण और बहिःकरण-) की आवश्यकता भी नहीं,होती। उनमें शरीर-शरीरीका भाव भी नहीं है। वे तो स्वतः-स्वाभाविक अपने-आपसे ही अपने-आपको जानते हैं। उनका यह ज्ञान करण-निरपेक्ष है, करण-सापेक्ष नहीं।इस श्लोकका भाव यह है कि जैसे भगवान् अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं, ऐसे ही भगवान्के अंश जीवको भी अपने-आपसे ही अपने-आपको अर्थात् अपने स्वरूपको जानना चाहिये। अपने-आपको अपने स्वरूपका जो ज्ञान होता है, वह सर्वथा करण-निरपेक्ष होता है। इसलिये इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिसे अपने स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवान्का अंश होनेसे भगवान्की तरह जीवका अपना ज्ञान भी करण-निरपेक्ष है।\n\n सम्बन्ध--विभूतियोंका ज्ञान भगवान्में दृढ़ करानेवाला है (गीता 10। 7)। अतः अब आगेके श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।10.15।।हे पुरुषोत्तम आत्मना आत्मानं त्वं स्वयम् एव स्वेन एव ज्ञानेन वेत्थ। भूतभावन सर्वेषां भूतानाम् उत्पादयितः? भूतेश सर्वेषां भूतानां नियन्तः? देवदेव दैवतानाम् अपि परमदैवत? यथा मनुष्यमृगपक्षिसरीसृपादीन् सौन्दर्यसौशील्यादिकल्याणगुणगणैः दैवतानि अतीत्य वर्तन्ते तथा तानि सर्वाणि दैवतानि अपि तैः तैः गुणैः अतीत्य वर्तमान? जगत्पते जगत्स्वामिन्।",
        "et": "Sri Ramanuja did not comment on this sloka"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।10.15।।No commentary.",
        "et": "Sri Abhinavgupta did not comment on this sloka"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।10.15।।क्योंकि आप देवादिके आदि कारण हैं? इसलिये --, हे पुरुषोत्तम  हे भूतप्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले भूतभावन  हे भूतेशभूतोंके ईश्वर  हे देवोंके देव  हे जगत्पते  आप स्वयं ही अपनेद्वारा अपने आपको अर्थात् निरतिशय ज्ञान? ऐश्वर्य? सामर्थ्य आदि शक्तियोंसे युक्त ईश्वरको जानते हैं।",
        "sc": "।।10.15।। --,स्वयमेव आत्मना आत्मानं वेत्थ जानासि त्वं निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तम् ईश्वरं पुरुषोत्तम। भूतानि भावयतीति भूतभावनः? हे भूतभावन। भूतेश भूतानाम् ईशितः। हे देवदेव जगत्पते।।",
        "et": "Sri Shankaracharya did not comment on this sloka"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।10.15।।किं तर्हि स्वयमेव वेत्थेति तदप्यात्मना? न साधनान्तरेण।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।10.15।।यतस्त्वं तेषां सर्वेषामादिरशक्यज्ञानश्चातः -- स्वयमेव अन्योपदेशादिकमन्तरेणैव त्वमेवात्मना स्वरूपेणात्मानं निरुपाधिकं सोपाधिकं च? निरुपाधिकं प्रत्यक्त्वेनाविषयतया सोपाधिकं च निरतिशयज्ञानैश्वर्यादिशक्तिमत्त्वेन वेत्थ जानासि नान्यः कश्चित्। अन्यैर्ज्ञातुमशक्यमहं कथं जानीयामित्याशङ्कामपनुदन्प्रेमौत्कण्ठ्येन बहुधा संबोधयति। हे पुरुषोत्तम? त्वदपेक्षया सर्वेऽपि पुरुषा अपकृष्टा एव। अतस्तेषामशक्यं सर्वोत्तमस्य तव शक्यमेवेत्यभिप्रायः। पुरुषोत्तमत्वमेव विवृणोति पुनश्चतुर्भिः संबोधनैः -- भूतानि सर्वाणि भावयत्युत्पादयतीति हे भूतभावन सर्वभूतपितः। पितापि कश्चिन्नेष्टस्तत्राह हे भूतेश सर्वभूतनियन्तः। नियन्तापि कश्चिन्नाराध्यस्तत्राह हे देवदेव देवानां सर्वाराध्यानामप्याराध्य। आराध्योऽपि कश्चिन्न पालयितृत्वेन पतिस्तत्राह हे जगत्पते हिताहितोपदेशकवेदप्रणेतृत्वेन सर्वस्य जगतः पालयितः। एतादृशसर्ववविशेषणविशिष्टस्त्वं सर्वेषां पिता सर्वेषां गुरुः सर्वेषां राजा अतः सर्वैः प्रकारैः सर्वेषामाराध्य इति किं वाच्यं पुरुषोत्तमत्वं तवेति भावः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।10.15।।किं तर्हि -- स्वयमिति। स्वयमेव त्वमात्मानं वेत्थ जानासि नान्यः तदप्यात्मना स्वेनैव वेत्थ न साधनान्तरेण। अत्यादरेण बहुधा संबोधयति हे पुरुषोत्तम। पुरुषोत्तमत्वे हेतुगर्भाणि संबोधनानि। हे भूतभावन भूतोत्पादक भूतानामीश नियन्तः? देवानामादित्यादीनां देव प्रकाशक? जगत्पते विश्वपालक।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।10.15।।अतः सर्वेषामादिस्त्वं स्वयमेवान्योपदेशमन्तरेणात्मना नत्वन्तःकरणादिकरणेनात्मानं निरुपाधिकं सोपाधिकं च निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तं जानासि नत्वन्यस्त्वदननुग्रीतः। भगवतः निरुपाधिकात्मज्ञानसामर्थ्यं संबोधनेनाप्याह -- हे पुरुषोत्तमेति। निरुपाधिकः परमात्मा त्वं निरुपाधिकं स्वस्वरुपं  वेत्थेति भावः। सोपाधिकोऽपि जगत्कर्तृत्वादिमांस्त्वमेवातस्तमपि त्वमेव जानासीति ध्वनयन् चतुर्धा संबोधयति। भूतभावनेत्यादिना। भूतोत्पादक? भूतेष भूतनियन्तः। देवदेव देवानां सूर्यादीनामपि द्योतक? जगत्पते जगत्पालक। तथाच जगत उत्प्तिस्थितिनियमकर्ता त्वमेव। ननु ब्रह्मादयः सूर्यादयो रुद्रादय एतत्कर्तारो दृश्यन्ते इत्याशङ्क्य देवानां ब्रह्मादीनामपि देव? त्वदधिष्ठिता एव ते उत्पत्त्यादिकर्तारो न स्वतन्त्रा इति भावः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।10.15।।देवादीनां भगवद्वैभवे वक्तृत्वयोग्यता प्रतिक्षिप्ता अथ भगवत एव स्ववैभववचनयोग्यतामाह -- स्वयमेव इतिश्लोकेन। अत्रपुरुषोत्तम इति संज्ञा शेषं तु तत्संज्ञान्वयौपयिकगुणपरमिति विभजनाय पूर्वमेवहे पुरुषोत्तमेत्युक्तम्। अत्रत्वमेव त्वां वेत्थ योऽसि सोऽसि [यजुःकाठ.1।3।1] इति श्रुतिस्मरणाद्यभिप्रायेणआत्मानम् इत्यस्य त्वामिति प्रतिपादनम्।स्वयमेव इत्यनेन फलितोक्तिःस्वेनैव ज्ञानेनेति।आत्मना -- अन्यैरननुगृहीत इत्यर्थः। यथाऽन्येषांमत्तः स्मृतिर्ज्ञानम् [15।15] इति न तथास्येति भावः। यद्वाआत्मना इत्यस्य व्याख्याज्ञानेनेति?आत्मा जीवे इत्यारभ्ययत्नेऽर्केऽग्नौ मतौ वायौ इति पाठात्। भावनशब्दस्य चिन्ताद्यर्थपरत्वव्युदासायाहउत्पादयितरिति। भूतेशजगत्पतिशब्दयोः पौनरुक्त्यशङ्काव्युदासाय नियन्तृत्वस्वामित्वकथनम्। रक्षणे व्युत्पन्नस्यापि पतिशब्दस्य शेषित्वे रूढिः। स कारणं करणाधिपाधिपः [श्वे.उ.6।9] तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं दैवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् [श्वे.उ.6।7] इति श्रुतिसिद्धाश्चत्वारोऽर्थाःभूतभावन इत्यादिभिश्चतुर्भिः प्रतिपाद्यन्त इति ज्ञापनायदैवतानामपि परमदैवतेति श्रुतिगतैः पदैर्व्याख्यातम्। देवशब्दस्य जातिविशेषवाचकत्वेन प्रतिसम्बन्धिशब्दत्वाभावात् द्वितीयो देवशब्द उत्कर्षविशेषविषयतया औपचारिक इति मुख्यगौणानुगतमुपचारनिमित्तं दर्शयतियथेति। अन्योन्यवैलक्षण्यस्याकिञ्चित्करत्वायात्यन्तवैलक्षण्यज्ञापनाय च मृगपक्षिसरीसृपग्रहणम्। यथा देवादीनां कीटाः? तथा परमात्मनो देवा अपि।कीटाः समस्ताः सुराः दृष्टे यत्र इति ह्याहुः।सौन्दर्यसौशील्येति विग्रहगुणानामात्मगुणानां चोपलक्षणम्।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।10.15।।यतोऽन्ये न विदुरतः स्वस्वरूपं स्वयमेव जानासीत्याह৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. -- स्वयमेवेति। स्वयं स्वेच्छयैव? न केनचित् प्रेरितः। आत्मना स्वस्वरूपेणैव आत्मानं यादृशोऽसि तादृशं त्वमेव वेत्थ? जानासीत्यर्थः। अन्यथा ज्ञानहेतुभूतत्वेन सम्बोधयति। हे पुरुषोत्तम केन कथं वा ज्ञातुं योग्य इत्यर्थः। अतएव ब्रह्माण्डपुराणे -- नैष भावयितुं योग्यः केनचित् पुरुषोत्तम् इत्युक्तम्। ननु तर्हियो मामजमनादिं च वेत्ति [10।3] इति कथमुक्तं इत्याशङ्क्य तत्कृपया स्ववेदनात्मकस्वशक्तिदानेन ज्ञापयतीतिददामि बुद्धियोगं तम् [10।10] इत्यादिनोक्तम्। तथात्वेनैव सम्बोधयन्नाह -- भूतभावनेत्यादिभिः। हे भूतभावन भूतानि भावयसि स्वभावयुक्तानि करोषीति तथा। कथमेवं करोतीत्यत आह -- भूतेश तेषां स्वामी नियामकः तेन स्वीयत्वेन करोतीति भावः। ईशत्वेऽपि कथमेवं करोति इत्यत आह -- देवदेव पूज्यानामपि पूज्य तत्पूजादिसन्तुष्टस्तथा करोतीति भावः। तर्हि देवेष्वेव तथोचितं? न तु सर्वेष्वित्यत आह -- जगत्पते इति। जगतः सर्वस्यैव पतिः पालको रक्षक इति यावत् रक्षार्थं तथा करोतीति भावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।10.15।।हे भूतभावन भूतानां भावक।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "Indeed, You alone know Yourself by Your own internal potency, O Supreme Person, origin of all, Lord of all beings, God of gods, Lord of the universe!",
        "ec": " The Supreme Lord, Kṛṣṇa, can be known by persons who are in a relationship with Him through the discharge of devotional service, like Arjuna and his followers. Persons of demonic or atheistic mentality cannot know Kṛṣṇa. Mental speculation that leads one away from the Supreme Lord is a serious sin, and one who does not know Kṛṣṇa should not try to comment on Bhagavad-gītā . Bhagavad-gītā is the statement of Kṛṣṇa, and since it is the science of Kṛṣṇa, it should be understood from Kṛṣṇa as Arjuna understood it. It should not be received from atheistic persons. As stated in Śrīmad-Bhāgavatam (1.2.11) : vadanti tat tattva-vidas tattvaṁ yaj jñānam advayam brahmeti paramātmeti bhagavān iti śabdyate The Supreme Truth is realized in three aspects: as impersonal Brahman, localized Paramātmā and at last as the Supreme Personality of Godhead. So at the last stage of understanding the Absolute Truth, one comes to the Supreme Personality of Godhead. A common man or even a liberated man who has realized impersonal Brahman or localized Paramātmā may not understand God’s personality. Such men, therefore, may endeavor to understand the Supreme Person from the verses of Bhagavad-gītā , which are being spoken by this person, Kṛṣṇa. Sometimes the impersonalists accept Kṛṣṇa as Bhagavān, or they accept His authority. Yet many liberated persons cannot understand Kṛṣṇa as Puruṣottama, the Supreme Person. Therefore Arjuna addresses Him as Puruṣottama. Yet one still may not understand that Kṛṣṇa is the father of all living entities. Therefore Arjuna addresses Him as Bhūta-bhāvana. And if one comes to know Him as the father of all the living entities, still one may not know Him as the supreme controller; therefore He is addressed here as Bhūteśa, the supreme controller of everyone. And even if one knows Kṛṣṇa as the supreme controller of all living entities, still one may not know that He is the origin of all the demigods; therefore He is addressed herein as Deva-deva, the worshipful God of all demigods. And even if one knows Him as the worshipful God of all demigods, one may not know that He is the supreme proprietor of everything; therefore He is addressed as Jagat-pati. Thus the truth about Kṛṣṇa is established in this verse by the realization of Arjuna, and we should follow in the footsteps of Arjuna to understand Kṛṣṇa as He is."
    }
}
