{
    "_id": "BG10.14",
    "chapter": 10,
    "verse": 14,
    "slok": "सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |\nन हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ||१०-१४||",
    "transliteration": "sarvametadṛtaṃ manye yanmāṃ vadasi keśava .\nna hi te bhagavanvyaktiṃ vidurdevā na dānavāḥ ||10-14||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।10.14।। हे केशव ! जो कुछ भी आप मेरे प्रति कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्, आपके (वास्तविक) स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "10.14 I believe all this that Thou sayest to me to be true, O Krishna; verily, O blessed Lord! neither the gods nor the demons know Thy manifestation (origin).",
        "ec": "10.14 सर्वम् all? एतत् this? ऋतम् true? मन्ये (I) think? यत् which? माम् to me? वदसि (Thou) sayest? केशव O Krishna? न not? हि verily? ते Thy? भगवन् O blessed Lord? व्यक्तिम् manifestation? विदुः know? देवाः gods? न not? दानवाः demons.Commentary Bhagavan is He? in whom ever exist the six attributes in their fullness? viz.? Jnana (wisdom)? Vairagya (dispassion)? Aisvarya (lordship)? Dharma (virtue)? Sri (wealth) and Bala (omnipotence). Also? He Who knows the origin? dissolution and the future of all beings and Who is omniscient? is called Bhagavan.Vyakti Origin.Danavah Demons or the Titans.Arjuna addresses the Lord as Keshava (Lord of all) because the Lord knows what is going on in his mind? as He is omniscient. As the Lord is the source of the gods? the demons and others? they cannot comprehend His manifestation or origin. (Cf.IV.6)"
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "10.14 I believe in what Thou hast said, my Lord! For neither the godly not the godless comprehend Thy manifestation."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।10.14।। यहाँ अर्जुन अपने मन के भावों को स्पष्ट करते हुए गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को भी व्यक्त करता है जो कुछ आप मेरे प्रति कहते हैं उसे मैं सत्य मानता हूँ। केशव शब्द का अर्थ है जिनके केश सुन्दर हैं अथवा केशि नामक असुर का वध करने वाले। यद्यपि वह श्रीकृष्ण के कथन को सत्य मानता है? परन्तु वह उनके सम्पूर्ण आशय को ग्रहण नहीं कर पाता। तात्पर्य यह है कि उसे हृदय से भगवान के वचनों में पूर्ण विश्वास है? किन्तु उसकी बुद्धि अभी भी असन्तुष्ट ही है।ज्ञानपिपासा के वशीभूत अर्जुन का असन्तुष्ट व्यक्तित्व मानो कराहता है । यह ज्ञानपिपासा दूसरी पंक्ति में प्रतिध्वनित होती है जहाँ वह कहता है आपके व्यक्तित्व को न देवता जानते है और न दानव। दानव दनु के पुत्र थे? जो प्राय स्वर्ग पर आक्रमण करते रहते थे? यज्ञयागादि में बाधा पहुँचाते थे और आसुरी जीवन जीते थे। इसके विपरीत? पुराणों के वर्णनानुसार? देवतागण स्वर्ग के निवासी हैं जो र्मत्य मानवों की अपेक्षा शारीरिक? मानसिक और बौद्धिक क्षमताओं में अधिक शक्तिशाली होते हैं।वैयक्तिक दृष्टि से? देव और दानव हमारे मन की क्रमश शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। जब अर्जुन कहता है कि आत्मा के स्वरूप का निर्धारण न तो सूक्ष्म और शुभ के दर्शन के समान हो सकता है? और न ही दानवी प्रवृत्ति के समान? तब उसकी निराशा स्पष्ट झलकती है। न तो हमारी दैवी प्रवृत्तियां सत्य का आलिंगन कर सकती हैं? और न ही दानवी गुण उसको युद्ध के लिए आह्वान करके शत्रु रूप में हमारे सामने ला सकते हैं। जगत् में हम वस्तुओं या व्यक्तियों को केवल दो रूप में मिलते हैं प्रिय और अप्रिय अथवा मित्र और शत्रु के रूप में। आत्मा के व्यक्तित्व की पहचान इन दोनों ही प्रकारों से नहीं हो सकती? क्योंकि वह योग और विभूति की अभिव्यक्तियों में द्रष्टा है।यदि सत्य को कोई नहीं जान सकता है? तो फिर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उसका वर्णन करने का अनुरोध क्यों करता है उनमें ऐसा कौन सा विशेष गुण है? जिसके कारण वे उस वस्तु का वर्णन करने में समर्थ हैं? जिसे अन्य कोई जान भी नहीं पाता है"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "10.14. What You tell me, I take all to be true, O Kesava !  For, O Bhagavat, neither the gods nor the great seers know Your manifestation."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "10.14 I deem as true all this that you say to Me, O Krsna. Verily O Lord, neither the gods nor the demons know Your manifestation."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "10.14 O Kesava, I accept to be true all this which You tell me. Certainly, O Lord, neither the gods nor the demons comprehend Your glory."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।"
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।10.14।।ऋषिभिस्त्वया चोक्तत्वादुक्तं सर्वं सत्यमेवेति मम मनीषेत्याह -- सर्वमिति। किं तदित्याशङ्क्यात्मरूपमित्याह -- यन्मामिति। देवादिभिः सर्वैरुच्यमानतया त्वद्रूपे विशिष्टवक्तृग्रहणमनर्थकमित्याशङ्क्याह -- नहीति। प्रभवो नाम प्रभावो निरुपाधिकस्वभावः? यदा देवादीनामपि दुर्विज्ञेयं तव रूपं तदा का कथा मनुष्याणामित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।10.14।। हे केशव ! मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं, यह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् ! आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।",
        "hc": "।।10.14।। व्याख्या --'सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव '--  क नाम ब्रह्माका है, 'अ' नाम विष्णुका है, 'ईश' नाम शंकरका है और 'व' नाम वपु अर्थात् स्वरूपका है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, और शंकर जिसके स्वरूप हैं, उसको 'केशव' कहते हैं। अर्जुनका यहाँ 'केशव' सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप ही,संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले हैं।   सातवेंसे नवें अध्यायतक मेरे प्रति आप 'यत्' --  जो कुछ कहते आये हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ; और,'एतत्' --  अभी दसवें अध्यायमें आपने जो विभूति तथा योगका वर्णन किया है, वह सब भी मैं सत्य मानता हूँ। तात्पर्य है कि आप ही सबके उत्पादक और संचालक हैं। आपसे भिन्न कोई भी ऐसा नहीं हो सकता। आप ही सर्वोपरि हैं। इस प्रकार सबके मूलमें आप ही हैं-- इसमें मेरेको कोई सन्देह नहीं है।भक्तिमार्गमें विश्वासकी मुख्यता है। भगवान्ने पहले श्लोकमें अर्जुनको परम वचन सुननेके लिये आज्ञा दी थी, उसी परम वचनको अर्जुन यहाँ 'ऋतम्' अर्थात् सत्य कहकर उसपर विश्वास प्रकट करते हैं।\n\n'न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः' --  आपने (गीता 4। 5 में) कहा है कि मेरे और तेरे बहुत-से जन्म बीत चुके हैं, उन सबको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता। इसी प्रकार आपने ( 10। 2 में) कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि भी नहीं जानते। अपने प्रकट होनेके विषयमें आपने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है। कारण कि मनुष्योंकी अपेक्षा देवताओंमें जो दिव्यता है, वह दिव्यता भगवत्तत्त्वको जाननेमें कुछ भी काम नहीं आती। वह दिव्यता प्राकृत-- उत्पन्न और नष्ट होनेवाली है। इसलिये वे आपके प्रकट होनेके तत्त्वको, हेतुको पूरा-पूरा नहीं जान सकते। जब देवता भी नहीं जान सकते, तो दानव जान ही कैसे सकते हैं? फिर भी यहाँ 'दानवाः' पद देनेका तात्पर्य यह है कि दानवोंके पास बहुत विलक्षण-विलक्षण माया है, जिससे वे विचित्र प्रभाव दिखा सकते हैं। परन्तु उस माया-शक्तिसे वे भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्के सामने दानवोंकी माया कुण्ठित हो जाती है। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिकी जितनी शक्तियाँ हैं, उन सबसे भगवान् अतीत हैं। भगवान् अनन्त हैं, असीम हैं और दानवोंकी माया-शक्ति कितनी ही विलक्षण होनेपर भी प्राकृत, सीमित और उत्पत्ति-विनाशशील है। सीमित और नाशवान् वस्तुके द्वारा असीम और अविनाशी तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है।\n\nतात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य, देवता, दानव आदि कोई भी अपनी शक्तिसे, सामर्थ्यसे, योग्यतासे, बुद्धिसे भगवान्को नहीं जान सकते। कारण कि मनुष्य आदिमें जितनी जाननेकी योग्यता, सामर्थ्य, विशेषता है, वह सब प्राकृत है और भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। त्याग, वैराग्य, तप, स्वाध्याय आदि अन्तःकरणको निर्मल करनेवाले हैं, पर इनके बलसे भी भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्को तो अनन्यभावसे उनके शरण होकर उनकी कृपासे ही जान सकते हैं। (गीता 10। 11 11। 54)।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।10.14।।अतः सर्वम् एतद् यथावस्थितवस्तुकथनं मन्ये न प्रशंसाद्यभिप्रायम्। यद् मां प्रति अनन्यसाधारणम् अनवधिकातिशयं स्वाभाविकं तव ऐश्वर्यं कल्याणगुणगणानन्त्यं च वदसि। अतो भगवन् निरतिशयज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधे ते व्यक्तिं व्यञ्जनप्रकारं न हि परिमितज्ञाना देवा दानवाः च विदुः।",
        "et": "10.14 Therefore, I deem all this to be a statement of facts as they are in reality, and not merely an exaggeration - all this which You tell me of Your sovereign glory and infinite auspicious attributes which are unie, unbounded, unsurpassed and natural. Therefore, O Lord, O Treasure of unsurpassed knowledge, power, strength, sovereignty, valour and radiance! - neither the gods nor the demons who possess limited knowledge know 'Your manifestation', the way in which You manifest Yourself."
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।10.14।।No commentary.",
        "et": "10.14 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।10.14।।हे केशव  उपर्युक्त प्रकारसे ऋषियोंद्वारा और आपके द्वारा कही हुई ये सब बातें जो कि आप मुझसे कह रहे हैं? मैं सत्य मानता हूँ क्योंकि हे भगवन्  आपकी उत्पत्तिको न देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।",
        "sc": "।।10.14।। --,सर्वमेतत् यथोक्तम् ऋषिभिः त्वया च एतत् ऋतं सत्यमेव मन्ये? यत् मां प्रति वदसि भाषसे हे केशव। न हि ते तव भगवन्,व्यक्तिं प्रभवं विदुः न देवाः? न दानवाः।।यतः त्वं देवादीनाम् आदिः? अतः --,",
        "et": "10.14 O Kesava, manye, I accept; to be rtam, true indeed; sarvam, all; etat, this that has been said by sages and You; yat, which; vadasi, You tell, speak; mam, to Me. Hi, certainly; bhagavan, O Lord; na devah, neither the gods; na danavah, nor the demons; viduh, comprehend; te, Your; vyaktim, glory [Prabhavam in the Commentary is the same as prabhavam, glory, the unalified State.].\nSince You are the origin of the gods and others, therefore,"
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।"
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।10.12 -- 10.14।।एवं सकलेतरविसजातीयं भगवतो योगप्रभावं तादृशविभूतिहेतुत्वं स्वानन्यजनकात्मत्वं च निशम्य तद्विस्तारं ज्ञातुकामो भगवन्तं स्तुवन् अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्मेति सप्तभिः धर्मधर्म्यभिप्रायेण। इदं च सर्वं श्रुतेरिव प्रतिवाक्यभूतं भवान् परं ब्रह्मेत्यादि। त्वामेवाहुः सर्वे ऋषयः? तथा महाभगवदीयो मर्यादापुष्टिभक्तः देवर्षिर्नारदः आह असितो देवलो व्यासश्च -- एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य,ह्यागतो मधुरां पुरीम् [म.भा.3।88।24] इति भारते।कृष्ण एव हि भूतानामुत्पत्तिरपि चाव्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम् इत्यादीनि भूयांसि महर्षिवचनानि श्रूयन्ते। भागवते [10।37।10] देवर्षिवचनं -- कृष्ण कृष्ण प्रमेयात्मन्योगेश जगदीश्वर इत्यादि। स्वयं च ब्रवीषिअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इत्यादि। पुरुषोत्तम एव स्वमुखेन स्वस्वरूपं स्वमाहात्म्यं च वदति? नान्य इति। तदेतत्सर्वोक्तत्वात्सत्यमेव मन्ये यन्मां त्वं च वदसि। अतो भगवन् षडगुणपूण ज्ञानं त्वय्येव गुणः त्वद्दत्तमेवान्यत्रोद्भवतीति नान्ये देवा दानवाश्च ते व्यक्तिं अनन्यसाधारणं योगप्रभावं तत्तद्विभूतिरूपां व्यक्तिं च ते विदुः।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।10.14।।सर्वमेतदुक्तमृषिभिश्च त्वया च तदृतं सत्यमेवाहं मन्ये यन्मां प्रति वदसि केशव। नहि त्वद्वचसि मम कुत्राप्यप्रामाण्यशङ्का। तच्च सर्वज्ञत्वात्त्वं जानासीति केशौ ब्रह्मरुद्रौ सर्वेशावप्यनुकम्प्यतया वात्यवगच्छतीति व्युत्पत्तिमाश्रित्य निरतिशयैश्वर्यप्रतिपादकेन केशवपदेन सूचितम्। अतो यदुक्तंन मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः इत्यादि तत्तथैव -- हि यस्मात् हे भगवन् समग्रैश्वर्यादिसंपन्न? ते तव व्यक्तिं प्रभावं ज्ञानातिशयशालिनोऽपि देवा न विदुर्नापि दानवा न महर्षय इत्यपि द्रष्टव्यम्।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।10.14।। अतो ममेदानीं त्वदैश्वर्येऽसंभावना निवृत्तेत्याह -- सर्वमिति। एतद्भवानेव परं ब्रह्मेत्यादि सर्वमप्यृतं सत्यं मन्ये यन्मां प्रति त्वं कथयसिन मे विदुः सुरगणा इत्यादि तदपि सत्यमेव मन्य इत्याह -- न हीति। हे भगवन्? तव व्यक्तिं देवा न विदुः। अस्मदनुग्रहार्थमियमभिव्यक्तिरिति न जानन्ति। दानवाश्चास्मन्निग्रहार्थमिति न विदुरेवेति।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।10.14।।एतस्सर्वं सत्यं मन्ये यन्भां वदसि केशव ब्रह्मादीन्प्रत्यन्तर्यामितया गच्छतीति सः तस्य संबोधनं हे केशवेति। ब्रह्मदिमुखेनापि त्वमेव वदसीति भावः। हि यस्मात्त तव व्यक्तिं प्रभावं देवा न विदुःऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्य च ज्ञानस्य षण्णां भग इदीङ्गना इत्युक्तो भगवांस्तत्वमेव स्वप्रभावं कथयितुं समर्थोऽसि नत्वन्यः स्वसामर्थ्येनेति सूचयन्नाह -- हे भगवनन्निति।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।।10.14।।सङ्गत्यर्थमाह -- अत इति। आप्ततमैराम्नायैर्महर्षिभिर्भवतापि चोक्तत्वादिति भावः।ऋतं मन्ये इत्यस्याभिप्रेतमाहन प्रशंसाद्यभिप्रायमिति। अन्येषु हि तद्गुणारोपणेन प्रशंसेत्यभिप्रायः।माम् इत्यनेनशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् [2।7] इत्यादिकमभिप्रेतम्। वदिरिह शिष्टमनुवदन्नत्र शास्यर्थे वर्तमाने द्विकर्मकः। एवं शिष्टस्यानुभाषणं शासनविशेषप्राधान्यार्थम्।अनन्यसाधारणमनवधिकातिशयमिति विशेषणाभ्यां समाधिकराहित्यम्?स्वाभाविकमित्यनन्याधीनत्वं विवक्षितम्। अतो न विदुरित्यर्थः।ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः। भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः [वि.पु.6।5।79] इति भगवत्पराशरवचनानुसारेण देवादिभिरवेद्यत्वाय भगवच्छब्दार्थं दर्शयति -- निरतिशयज्ञानेत्यादिना। व्यक्तिशब्दोऽत्रकिमात्मिकैवैषा भगवतो व्यक्ति इत्यादिष्विव न विग्रहादिपरः? अप्रसक्तत्वात् अनन्तरं चापृच्छ्यमानत्वात्। अतोवक्तुमर्हस्यशेषेण [10।16] इत्यनन्तरं विवक्षोःअन्ये त्वत्प्रतिपादनप्रकारमपि न जानन्ति? किं पुनः प्रत्यक्षादिवत्प्रकाशनम् इत्ययमर्थोऽपेक्षितत्वात्स्वीकार्य इत्यभिप्रायेणाह -- व्यञ्जनप्रकारमिति।अक्षरक्षरयोर्व्यक्तिमिच्छाम्यरिनिषूदन। उपलब्धुम् इतिवत्।परिमितज्ञाना इति शब्दतात्पर्योक्तिः।"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।10.14।।परोक्ते स्वानुभवाभावे न विश्वासः स्यादित्यत आह -- सर्वमेतदिति। सर्वं पूर्वोक्तं परं ब्रह्म [श्वे.उ.3।7गी.10।12] इत्यादि अहं स्वानुभवात् ऋतं सत्यं मन्ये। किञ्चन मे विदुः [10।2] इत्यादिना देवाः क्रीडारूपाः। दानवाविरोधेऽपि मोक्षदातुः हे भगवन् ते व्यक्तिं प्राकट्यं स्वरूपं वा न विदुरिति। केशव दुष्टगुणव्याप्तयोरपि मोक्षदायक यत् मां वदसि एतत्सर्वं हि निश्चयेन ऋतं मन्ये।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।10.14।।व्यक्तिं प्रभवम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "O Kṛṣṇa, I totally accept as truth all that You have told me. Neither the demigods nor the demons, O Lord, can understand Your personality.",
        "ec": " Arjuna herein confirms that persons of faithless and demonic nature cannot understand Kṛṣṇa. He is not known even by the demigods, so what to speak of the so-called scholars of this modern world? By the grace of the Supreme Lord, Arjuna has understood that the Supreme Truth is Kṛṣṇa and that He is the perfect one. One should therefore follow the path of Arjuna. He received the authority of Bhagavad-gītā . As described in the Fourth Chapter, the paramparā system of disciplic succession for the understanding of Bhagavad-gītā was lost, and therefore Kṛṣṇa reestablished that disciplic succession with Arjuna because He considered Arjuna His intimate friend and a great devotee. Therefore, as stated in our Introduction to Gītopaniṣad, Bhagavad-gītā should be understood in the paramparā system. When the paramparā system was lost, Arjuna was selected to rejuvenate it. The acceptance by Arjuna of all that Kṛṣṇa says should be emulated; then we can understand the essence of Bhagavad-gītā , and then only can we understand that Kṛṣṇa is the Supreme Personality of Godhead."
    }
}
