{
    "_id": "BG1.3",
    "chapter": 1,
    "verse": 3,
    "slok": "पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् |\nव्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ||१-३||",
    "transliteration": "paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṃ camūm .\nvyūḍhāṃ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā ||1-3||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।1.3।।हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र (धृष्टद्द्युम्न) द्वारा व्यूहाकार खड़ी की गयी पाण्डु पुत्रों की इस महती सेना को देखिये।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "1.3. \"Behold, O Teacher! this mighty army of the sons of Pandu,\narrayed by the son of Drupada, thy wise disciple.",
        "ec": "1.3 पश्य behold? एताम् this? पाण्डुपुत्राणाम् of the sons of Pandu? आचार्य O Teacher? महतीम् great? चमूम् army? व्यूढाम् arrayed? द्रुपदपुत्रेण son of Drupada? तव शिष्येण by your disciple? धीमता wise.No Commentary."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "1.3 Revered Father! Behold this mighty host of the Pandavas, paraded by the son of King Drupada, thy wise disciple."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।1.3।। वास्तव में दुर्योधन की यह मूर्खता है कि वह द्रोणाचार्य को पाण्डवों की सैन्य रचना के विषय में विस्तार से बताये। आगे हम देखेंगे कि वह आवश्यकता से अधिक बातें करता है जो युद्ध के परिणाम के विषय में उसके संदेह का स्पष्ट लक्षण है।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "1.3. O teacher !  Behold this mighty army of  the sons of  Pandu,  marshalled in  a military array by Drupada's son,  your intelligent pupil."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "1.3 Behold, O teacher, this mighty army of the Pandavas, arrayed by the son of Drupada, your intelligent disciple."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "1.3 O teacher, (please) see this vast army of the sons of Pandu, arrayed for battle by the son of Drupada, your intelligent disciple."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।1.3।।Sri Madhvacharya  did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।1.3।।तदेव वचनमुदाहरति   पश्येति।  एतामस्मदभ्याशे महापुरुषानपि भवत्प्रमुखानपरिगणय्य भयलेशशून्यामवस्थितां चमूमिमां सेनां पाण्डुपुत्रैर्युधिष्ठिरादिभिरानीतां महतीमनेकाक्षौहिणीसहितामक्षोभ्यां पश्येत्याचार्यं दुर्योधनो नियुङ्क्ते नियोगद्वारा च तस्मिन्परेषामवज्ञां विज्ञापयन्क्रोधातिरेकमुत्पादयितुमुत्सहते। परकीयसेनाया वैशिष्ट्याभिधानद्वारा परापरपक्षेऽपि त्वदीयमेव बलमिति सूचयन्नाचार्यस्य तन्निरसनं सुकरमिति मन्वानः सन्नाह   व्यूढामिति।  राज्ञो द्रुपदस्य पुत्रस्तव शिष्यो धृष्टद्युम्नो लोके ख्यातिमुपगतः स्वयं च शस्त्रास्त्रविद्यासंपन्नो महामहिमा तेन व्यूहमापाद्याधिष्ठितामिमां चमूं किमिति न प्रतिपद्यसे किमिति वा मृष्यसीत्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।1.3।। हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यूहरचना से खड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये",
        "hc": "1.3।। व्याख्या--'आचार्य' द्रोणके लिये 'आचार्य' सम्बोधन देनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि आप हम सबके--कौरवों और पाण्डवों के आचार्य हैं। शस्त्रविद्या सिखानेवाले होनेसे आप सबके गुरु हैं। इसलिये आपके मनमें किसीका पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये।\n\n 'तव शिष्येण धीमता'--इन पदोंका प्रयोग करनेमें दुर्योधनका भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारनेके लिये पैदा होनेवाले धृष्टद्युम्नको भी आपने अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान है कि उसने आपको मारनेके लिये आपसे ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है।'द्रुपदपुत्रेण'--यह पद कहनेका आशय है कि आपको मारनेके उद्देश्यको लेकर ही द्रुपदने याज और उपयाज नामक ब्राह्मणोंसे यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न पैदा हुआ। वही यह द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आपके सामने (प्रतिपक्षमें) सेनापतिके रूपमें खड़ा है।यद्यपि दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्र' के स्थानपर 'धृष्टद्युम्न' भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्यके साथ द्रुपद जो वैर रखता था, उस वैरभावको याद दिलानेके लिये दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्रेण' शब्दका प्रयोग करता है कि अब वैर निकालनेका अच्छा मौका है।'पाण्डुपुत्राणाम् एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य'--द्रुपदपुत्रके द्वारा पाण्डवोंकी इस व्यूहाकार खड़ी हुई बड़ी भारी सेनाको देखिये। तात्पर्य है कि जिन पाण्डवोंपर आप स्नेह रखते हैं, उन्हीं पाण्डवोंने आपके प्रतिपक्षमें खास आपको मारनेवाले द्रुपदपुत्रको सेनापति बनाकर व्यूह-रचना करनेका अधिकार दिया है। अगर पाण्डव आपसे स्नेह रखते तो कम-से-कम आपको मारनेवालेको तो अपनी सेनाका मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार तो नहीं देते। परन्तु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसीको सेनापति बनाया है।यद्यपि कौरवोंकी अपेक्षा पाण्डवोंकी सेना संख्यामें कम थी अर्थात् कौरवोंकी सेना ग्यारह अक्षौहिणी  (टिप्पणी प0 5)  और पाण्डवोंकी सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी बता रहा है। पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी कहनेमें दो भाव मालूम देते हैं--\n\n(1) पाण्डवोंकी सेना ऐसे ढंगसे व्यूहाकार खड़ी हुई थी, जिससे दुर्योधनको थोड़ी सेना भी बहुत ब़ड़ी दीख रही थी और (2) पाण्डव-सेनामें सब-के-सब योद्धा एक मतके थे। इस एकताके कारण पाण्डवोंकी थोड़ी सेना भी बलमें, उत्साहमें बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेनाको दिखाकर दुर्योधन द्रोणाचार्यसे यह कहना चाहता है कि युद्ध करते समय आप इस सेनाको सामान्य और छोटी न समझें। आप विशेष बल लगाकर सावधानीसे युद्ध करें।पाण्डवोंका सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपदपुत्र ही; अतः उसपर विजय करना आपके लिये कौन-सी बड़ी बात है!'एतां पश्य' कहनेका तात्पर्य है कि यह पाण्डव-सेना युद्धके लिये तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः हमलोग इस सेनापर किस तरहसे विजय कर सकते हैं--इस विषयमें आपको जल्दी-से-जल्दी निर्णय लेना चाहिये।सम्बन्ध--द्रोणाचार्यसे पाण्डवोंकी सेना देखनेके लिये प्रार्थना करके अब दुर्योधन उन्हें पाण्डव-सेनाके महारथियोंको दिखाता है।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।1.3।।धृतराष्ट्र उवाच  सञ्जय उवाच  दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।",
        "et": "1.1 - 1.19 Dhrtarastra said - Sanjaya said  Duryodhana, after viewing the forces of Pandavas protected by Bhima, and his own forces protected by Bhisma conveyed his views thus to Drona, his teacher, about the adeacy of Bhima's forces for conering the Kaurava forces and the inadeacy of his own forces for victory against the Pandava forces. He was grief-stricken within.\n\nObserving his (Duryodhana's) despondecny, Bhisma, in order to cheer him, roared like a lion, and then blowing his conch, made his side sound their conchs and kettle-drums, which made an uproar as a sign of victory. Then, having heard that great tumult, Arjuna and Sri Krsna the Lord of all lords, who was acting as the charioteer of Arjuna, sitting in their great chariot which was powerful enough to coner the three worlds; blew their divine conchs Srimad Pancajanya and Devadatta. Then, both Yudhisthira and Bhima blew their respective conchs separately. That tumult rent asunder the hearts of your sons, led by Duryodhana. The sons of Dhrtarastra then thought, 'Our cause is almost lost now itself.' So said Sanjaya to Dhrtarastra who was longing for their victory.\n\nSanjaya said to Dhrtarastra:  Then, seeing the Kauravas, who were ready for battle, Arjuna, who had Hanuman, noted for his exploit of burning Lanka, as the emblem on his flag on his chariot, directed his charioteer Sri Krsna, the Supreme Lord-who is overcome by parental love for those who take shelter in Him who is the treasure-house of knowledge, power, lordship, energy, potency and splendour, whose sportive delight brings about the origin, sustentation and dissolution of the entire cosmos at His will, who is the Lord of the senses, who controls in all ways the senses inner and outer of all, superior and inferior - by saying, 'Station my chariot in an appropriate place in order that I may see exactly my enemies who are eager for battle.'"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।1.2  1.9।।किं वा अनेन बहुपरिगणनेन (K omits बहु  )। इदं तावद्वस्तुतत्त्वम् इत्याह  ।",
        "et": "1.2  1.9  Why this exhaustive counting? The reality of things is this:"
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।1.3।।Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.",
        "sc": "1.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.",
        "et": "1.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।1.3।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।1.2  1.11।।दुर्योधनोऽपि वृकोदरादिभी रक्षितं पाण्डवानां बलं भीष्माभिरक्षितं स्वीयं च बलं विलोक्य आत्मजविजये तद्बलस्य पर्याप्ततां आत्मबलस्य तद्बिजयेऽपर्याप्ततां च आचार्ये निवेद्यान्तरेव विष्ण्णोऽभूत्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।1.3।।तदेव वाक्यविशेषरूपं वचनमुदाहरति  पश्यैतामित्यादिना।तस्य संजनयन्हर्षम् इत्यतः प्राक्तनेन पाण्डवेषु प्रियशिष्येष्वतिस्निग्धहृदयत्वादाचार्यो युद्धं न करिष्यतीति संभाव्य तस्मिन्परेषामवज्ञां विज्ञापयन् तस्य क्रोधातिशयमुत्पादयितुमाह। एतामत्यासन्नत्वेन भवद्विधानपि महानुभावानवगणय्य भयशून्यत्वेन स्थितां पाण्डुपुत्राणां चमूं महतीमनेकाक्षौहिणीसहितत्वेन दुर्निवारां पश्यापरोक्षीकुरु। प्रार्थनायां लोट्। अहं शिष्यत्वात्त्वामाचार्यं प्रार्थय इत्याह  आचार्येति। दृष्ट्वा च तत्कृतामवज्ञां स्वयमेव ज्ञास्यसीति भावः। ननु तदीयावज्ञा सोढव्यैवास्माभिः प्रतिकर्तुशक्यत्वादित्याशङ्क्य तन्निरसनं तव सुकरमेवेत्याह  व्यूढां तव शिष्येणेति। शिष्यापेक्षया गुरोराधिक्यं सर्वसिद्धमेव। व्यूढां तु धृष्टद्युम्नेनेत्यनुक्त्वा द्रुपदपुत्रेणेति कथनं द्रुपदपूर्ववैरसूचनेन क्रोधोद्दीपनार्थम्। धीमतेति पदमनुपेक्षणीयत्वसूचनार्थम्। व्यासङ्गान्तरनिराकरणेन त्वरातिशयार्थं पश्येति प्रार्थनम्। अन्यच्च हे पाण्डुपुत्राणामाचार्य नतु मम। तेषु स्नेहातिशयात्। द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येणेति त्वद्वधार्थमुत्पन्नोऽपि त्वयाध्यापित इति तव मौढ्यमेव ममानर्थकारणमिति सूचयति। शत्रोस्तव सकाशात्त्वद्वधोपायभूता विद्या गृहीतेति तस्य धीमत्त्वम्। अतएव तच्चमूदर्शनेनानन्दस्तवैव भविष्यति भ्रान्तत्वान्नान्यस्य कस्यचिदपि। यंप्रतीयं प्रदर्शनीयेति त्वमेवैतां पश्येत्याचार्यंप्रति तत्सैन्यं प्रदर्शयन्निगूढं द्वेषं द्योतयति। एवंच यस्य धर्मक्षेत्रं प्राप्याचार्येऽपीदृशी दृष्टबुद्धिस्तस्य काऽनुतापशङ्का सर्वाभिशङ्कित्वेनातिदुष्टाशयत्वादिति भावः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।1.3।।  तदेव वाक्यमाह   पश्यैतामित्यादिनवभिः श्लोकैः।  भो आचार्य पाण्डवानां विततां चमूं सेनां पश्य। द्रुपदपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन व्यूढां व्यूहरचनया अधिष्ठिताम्।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।1.3।।तदेवोदाहरति   पश्येत्यादिना।  एतां भवदादीनतिरथानपरिगणय्य संमुखे स्थितां पाण्डुपुत्राणां युधिष्ठिरादीनां चमूं सेनां महतीमनेकाक्षौहिणीयुक्तामक्षोभ्यां द्रुपदस्य पुत्रेण धृष्टद्युम्नेन तव शिष्येण बुद्धिमतां व्यूढां व्यूहरचनया स्थापितां पश्य। हे आचार्य उभयेषामाचार्यस्यापि तव पाण्डवेषु प्रीतिर्न युक्ता यतस्त्वामपरिगणय्य तव संमुखे महती सेना तैः स्थापितेत्याशयः। द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येणेति पदद्वयेन द्रुपदपुत्रस्य स्वमृत्योरपि त्वया शिक्षणं कृतमिति मृत्योरपि तव भयं नास्तीति सूचितम्। एतेन स्वमृत्युना सह मया कथं योद्धव्यमिति शङ्कापि परिहृता। शिक्षितमपि मूर्खेण विस्मर्यते इति शङ्कानिरासाय धीमतेत्युक्तम्। परपक्षेऽपि त्वदीयमेव बलमिति सूचयन्नाचार्यस्य तन्निरसनभतिसुकरमिति मन्वानः सन्नाह   व्यूढामित्यादिनेत्येके।  द्रुपदपुत्रेणेति कथनं द्रुपदपूर्ववैरसूचनेन क्रोधाद्दीपनार्थम्। धीमतेत्यनुपेक्षणीयत्वसूचनार्थम्। पश्येति व्यासङ्गान्तरनिराकरणेन त्वरातिशयार्थम्। अन्यच्च राजा अवचनमब्रवीत्। हे पाण्डुपुत्राणामाचार्य नतु मम। तेषु स्नेहाधिक्यात्। द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येणेति त्वद्वधार्थमुत्पन्नोऽपि त्वयाध्यापित इति तव मौढ्यमेव ममानर्थकारणमिति सूचयति। शत्रोरपि सकाशात्तद्वधोपायभूता विद्या गृहीतेति तस्य धीमत्त्वमतएव तच्चमूदर्शनेनानन्दस्तवैव भविष्यति भ्रान्तत्वान्नान्यस्य कस्यचिदपि। यं प्रतीयं प्रदर्शनीयेति त्वमेवैतां पश्येत्याचार्यं प्रति निगूढं द्वेषं द्योतयति। एवंच यस्य धर्मक्षेत्रेऽपीदृक् दुष्टबुद्धिस्तस्य काऽनुतापशङ्केति भाव इति केचित्। अन्येच्चेत्यारभ्य युद्धार्थं प्रार्थनां कुर्वतो दुर्योधनस्य प्रणिपातादिपुरःसरं आचार्यसमीपं गतस्यात्मनः शिक्षितारं रक्षितारं च प्रत्येवमभिप्रायवर्णनं प्रकृतासंगतं नवेति विद्वद्भिर्निर्मत्सरैः पक्षपातवर्जितौर्विचार्यम्। अनुतापशङ्का मूलविरुद्धेति तु पूर्वमुक्तमेव। नन्वनेन कृतं प्रतारणं बुद्ध्वैवाचार्येणोत्तरं न दत्तमिति चेत्। न। आचार्याभाषणस्य प्रकृतविरुद्धार्थकल्पनांविनैव वक्ष्यमाणरीत्योपपत्तौ तत्कल्पनाया अन्याय्यत्वात्।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 1.3।।एवं सुयोधनविजयबुभुत्सया कृतस्य प्रश्नस्ययत्र योगेश्वरः 18।78 इति साक्षादुत्तरं वक्ष्यन् तत्प्रत्यायनार्थमखिलमवान्तरवृत्तमपि सञ्जय उवाच  दृष्ट्वेति। पाण्डवानीकं व्यूढं दृष्ट्वा इति सुयोधनस्य धैर्यभ्रंशहेतुः। तदधीनो धैर्यभ्रंशरूपोऽवस्थाविशेषःतुशब्देन सूच्यते। दृष्ट्वेत्यादेरनुनादयन्नित्यन्तस्याव्यक्तांशं व्यञ्जयति  दुर्योधन इत्यादिनाअकथयत् रा.भा.1।19 इत्यन्तेन। संज्ञार्थं सम्यग्ज्ञानार्थम् संज्ञया परिसंख्यानार्थं वा। तत्रअन्तर्विषण्णोऽभवत् इत्यन्तेनभीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि 1।11 इत्येतदन्तं व्याख्यातम्।अपर्याप्तं 1।10 इति श्लोकस्यायमर्थः  तत् तस्मात् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितमपर्याप्तं परबलविजयाय नालम् इदं त्वेतेषां पाण्डवानां बलं भीमाभिरक्षितं पर्याप्तमस्मद्बलविजयायालम्  इति। नन्विदमनुपपन्नं तद्बलमिति सामानाधिकरण्यप्रतीतिभङ्गायोगात् पूर्वत्र च परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतूपन्यासाभावात्। न च भीष्मद्रोणादिरक्षितं स्वबलमयमसमर्थं मन्यते। प्रबलानामेव हि भीष्मद्रोणादीनां वधः सोपाधिकः।न भेतव्यं महाराज म.भा.उ.प.55।1 इत्यादिषु च बहुशः स्वबलस्यैव सामर्थ्यं दुर्योधनेनोपन्यस्तम्। न चेदानीं तद्विपरीतप्रतीतौ कारणमस्ति। द्वितीयदिवसारम्भे च दुर्योधन एवं वक्ष्यति  अपर्याप्तं तदस्माकं बलं पार्थाभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं पार्थिवसत्तमाः म.भा.उ.प. इति। तत्र चास्माकमपर्याप्तमित्येवान्वयः न पुनरस्माकं बलमिति। ततोऽत्रापि तथैव वचनव्यक्तिरुचिता। तस्मात् पाठभेदेन व्यवहितान्वयेन वाक्यभेदेन पदार्थभेदेन वा योजना स्यात्। तत्र भीमभीष्मशब्दयोर्विपर्यासात्पाठभेदः। तथा च भीमाभिरक्षितं तद्बलमस्माकं अपर्याप्तमित्यन्वये सामानाधिकरण्यम् तदिति विप्रकृष्टनिर्देशस्वारस्यम् दुर्योधनाभिप्रायाविरोधश्च सिद्ध्यति। व्यवहितान्वयेऽप्ययमेवार्थः। द्विधा च व्यवहितान्वयोऽत्र शक्यः। भीमाभिरक्षितभीष्माभिरक्षितयोर्विपर्यासादेकःअपर्याप्तं तत् ৷৷. पर्याप्तं त्विदम् इत्यनयोर्विपर्यासाद्द्वितीयः। अर्थौचित्याय तु व्यवधानमात्रं सह्यते।वाक्यभेदेऽप्येवं योजना  अपर्याप्तं तदित्येका प्रतिज्ञा पर्याप्तं त्विदमिति द्वितीया। अत्र को हेतुरिति शङ्कायां हेतुपरं वाक्यद्वयम् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् एतेषां बलं भीमाभिरक्षितमिति। अस्मद्बलस्य प्रबलाधिष्ठितत्वात् परबलस्य च दुर्बलाधिष्ठितत्वादित्यर्थः। पदार्थभेदे त्वेवं योजना  पर्याप्तं पर्यापनं समापनम् पर्याप्तमिति कर्तरि क्तः नाशनसमर्थमित्यर्थः। अपर्याप्तं नाशनासमर्थमित्यर्थः। भीष्माभिरक्षितमस्माद्बलं तत् अपर्याप्तं नाशयितुं न शक्नोति।तत् इत्य पाण्डवबलं कर्तृतया निर्दिश्यतेइदम् इति च स्वबल परबलपर्यापनकर्तृतया। निष्ठायोगाच्च न कर्मणि षष्ठीप्राप्तिः यद्वा अपर्याप्तमपरिमितमित्यर्थः पर्याप्तं परिमितमित्यर्थः स्वबलस्यैकादशाक्षौहिणीयुक्तत्वात् परबलस्य सप्ताक्षौहिणी युक्तत्वाच्च। सर्वथा तावन्न स्वबलदौर्बल्यं परबलप्राबल्यं च युद्धारम्भे दुर्योधनः प्रसञ्जयेदिति  सोऽयं घण्टापथात्पाटच्चर कुटीरप्रवेशः। तथाहि  इह तावद्भीष्माभिरक्षितमित्येतत्प्रति शिरस्तया भीमाभिरक्षितमिति केनाभिप्रायेण निर्दिश्यते न तावद्भीष्मवद्भीमस्यापि सेनापतित्वेन धृष्टद्युम्नस्य तत्पतित्वेनोक्तत्वात्। नापि भीष्मसमपौरुषत्वेन अत्यन्तविषमतया प्रसिद्धेः। यथोक्तं भीष्मेणैव  शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान्। यद्येषां न भवेद्गोप्ता विष्णुः कारणपूरुषः म.भा. इति। नापि प्रतिबलाधीश्वरत्वेन धर्मसूनोस्तथात्वात्। नापि परबलभटप्रधानत्वेन अर्जुनस्यैव तथा प्रसिद्धेः। अतो भीमस्य समस्तधार्तराष्ट्रवधदीक्षितत्वात्तदुचितसाहसबलसहायादियुक्तत्वाच्च तस्य विशेषतो निर्देशः। एवं सति तत्प्रतिशिरस्त्वेन भीष्मस्य निर्देशोऽपि समस्तपाण्डुतनयसंरक्षणप्रवणत्वेन प्रतिपन्नत्वात्। अतः शत्रुभयसहायातिशङ्के पदद्वयसूचिते इत्युक्तं भवति। यत्तूक्तं पूर्वत्र परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतुः"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।1.3।।तद्वाक्यमेवाह  पश्येत्यादिनवभिः। तत्र भीष्मस्याभिषिक्तत्वात्स्वत एवोत्साहः द्रोणस्यौदासीन्यमालक्ष्य प्रोत्साहयति परोत्कर्षवर्णनैः  एतां निकटस्थाम्। युधिष्ठिरस्य राजत्वाभावादविशेषेण पाण्डुपुत्राणामित्युक्तम्। हे आचार्य यद्यपि त्वमुभयोः समस्तथापि तेषां सेनायाः प्रबलत्वादस्मत्पक्षपातं कुर्वित्यतः सम्बोधनम्। पाण्डुपुत्राणां महतीं स्वभयजनिकां चमूं धीमता व्यूहरचनाकृतिना द्रुपदपुत्रेण धृष्टद्युम्नेन व्यूढां व्यूहरचनया सम्मार्जितां पश्य। तव शिष्येणेति विशेषणेन स्वस्य भयजनकत्वसामर्थ्यं द्योतितम्। तस्य भयाभावः।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।1.3।।द्रुपदपुत्रेणेति पूर्ववैरसूचनेन क्रोधोद्दीपनार्थं विशेषणम्।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "O my teacher, behold the great army of the sons of Pāṇḍu, so expertly arranged by your intelligent disciple the son of Drupada.",
        "ec": " Duryodhana, a great diplomat, wanted to point out the defects of Droṇācārya, the great brāhmaṇa commander in chief. Droṇācārya had some political quarrel with King Drupada, the father of Draupadī, who was Arjuna’s wife. As a result of this quarrel, Drupada performed a great sacrifice, by which he received the benediction of having a son who would be able to kill Droṇācārya. Droṇācārya knew this perfectly well, and yet as a liberal brāhmaṇa he did not hesitate to impart all his military secrets when the son of Drupada, Dhṛṣṭadyumna, was entrusted to him for military education. Now, on the Battlefield of Kurukṣetra, Dhṛṣṭadyumna took the side of the Pāṇḍavas, and it was he who arranged for their military phalanx, after having learned the art from Droṇācārya. Duryodhana pointed out this mistake of Droṇācārya’s so that he might be alert and uncompromising in the fighting. By this he wanted to point out also that he should not be similarly lenient in battle against the Pāṇḍavas, who were also Droṇācārya’s affectionate students. Arjuna, especially, was his most affectionate and brilliant student. Duryodhana also warned that such leniency in the fight would lead to defeat."
    }
}
