{
    "_id": "BG1.11",
    "chapter": 1,
    "verse": 11,
    "slok": "अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः |\nभीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ||१-११||",
    "transliteration": "ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ .\nbhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi ||1-11||",
    "tej": {
        "author": "Swami Tejomayananda",
        "ht": "।।1.11।।विभिन्न मोर्चों पर अपने-अपने स्थान पर स्थित रहते हुए आप सब लोग भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।"
    },
    "siva": {
        "author": "Swami Sivananda",
        "et": "1.11. \"Therefore do ye all, stationed in your respective positions,\nin the several divisions of the army, protect Bhishma alone.\"",
        "ec": "1.11 अयनेषु in the arrays (of the army)? च and? सर्वेषु in all? यथाभागम् according to division? अवस्थिताः being stationed? भीष्मम् Bhishma? एव alone? अभिरक्षन्तु protect? भवन्तः ye? सर्वे all? एव even? हि indeed.No Commentary."
    },
    "purohit": {
        "author": "Shri Purohit Swami",
        "et": "1.11 Therefore in the rank and file, let stand firm in their posts, according to battalions; and all you generals about Bheeshma."
    },
    "chinmay": {
        "author": "Swami Chinmayananda",
        "hc": "।।1.11।। इतने समय निरन्तर अकेले ही बोलने और उभय पक्ष की सार्मथ्य को तौलने के पश्चात युद्धतत्पर दुर्योधन में स्थित राजा अपने मन की सघन निराशा के मेघखण्डों को भेदकर सेना को आदेश देना प्रारम्भ करता है। उसका आदेश है कि सभी योद्धा एवं नायक स्वस्थान पर रहकर अनुशासनपूर्वक युद्ध करें और साथ ही भीष्म पितामह को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करें। उसे इस बात की आशंका है कि सुदूर राज्यों से आये हुये राजा एवं जनजातियों के नायक यदि इधरउधर बिखर गये तो विजय मिलना कठिन है। संगठित रूप से सब मोर्चों पर एक ही समय आक्रमण करना किसी भी सेना की सफलता का मेरुदण्ड है। इसलिये एक सही प्रकार की रणनीति अपनाते हुये वह सबको आदेश देता है कि विभिन्न स्थानों पर रहते हुये भी सब भीष्माचार्य का रक्षण करें।"
    },
    "san": {
        "author": "Dr.S.Sankaranarayan",
        "et": "1.11. Stationed firmly in all  [your]  respective paths,  every one of you without exception should guard Bhisma,  above all."
    },
    "adi": {
        "author": "Swami Adidevananda",
        "et": "1.11 Therefore all of you taking your places firmly in your respective divisions, guard Bhisma at all cost."
    },
    "gambir": {
        "author": "Swami Gambirananda",
        "et": "1.11 However, venerable sirs, all of you without exception, while occupying all the positions in the different directions as alloted (to you respectively), please fully protect Bhisma in particular."
    },
    "madhav": {
        "author": "Sri Madhavacharya",
        "sc": "।।1.11।।Sri Madhvacharya  did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11."
    },
    "anand": {
        "author": "Sri Anandgiri",
        "sc": "।।1.11।।स्वकीयबलस्य भीष्माधिष्ठितत्वेन बलिष्ठत्वमुक्त्वा भीष्मशेषत्वेन तदनुगुणत्वं द्रोणादीनां प्रार्थयते   अयनेष्विति।  कर्तव्यविशेषद्योती चशब्दः। समरसमारम्भसमये योधानां यथाप्रधानं युद्धभूमौ पूर्वापरादिदिग्विभागेनावस्थितिस्थानानि नियम्यन्ते तान्यत्रायनान्युच्यन्ते सेनापतिश्च सर्वसैन्यमधिष्ठाय मध्ये तिष्ठति तेषु सर्वेषु प्रक्लृप्तं प्रविभागमप्रत्याख्याय भवानश्वत्थामा कर्णश्चेत्येवमादयो भवन्तः सर्वेऽवस्थिताः सन्तो भीष्ममेव सेनापतिं सर्वतो रक्षन्तु तस्य हि रक्षणे सर्वमस्मदीयं बलं रक्षितं स्यात् परबलनिवृत्त्यर्थत्वेन तस्यास्माभी रक्षितत्वादित्यर्थः।"
    },
    "rams": {
        "author": "Swami Ramsukhdas",
        "ht": "।।1.11।। आप सब-के-सब लोग सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए ही पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें।",
        "hc": "1.11।। व्याख्या--'अयनेषु च सर्वेषु ৷৷. भवन्तः सर्व एव हि'--जिन-जिन मोर्चोंपर आपकी नियुक्ति कर दी गयी है, आप सभी योद्धालोग उन्हीं मोर्चोंपर दृढ़तासे स्थित रहते हुए सब तरफसे, सब प्रकारसे भीष्मजीकी रक्षा करें।\nभीष्मजीकी सब ओरसे रक्षा करें--यह कहकर दुर्योधन भीष्मजीको भीतरसे अपने पक्षमें लाना चाहता है। ऐसा कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब भीष्मजी युद्ध करें, तब किसी भी व्यूहद्वारसे शिखण्डी उनके सामने न आ जाय--इसका आपलोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उसपर शस्त्रास्त्र नहीं चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्ममें भी स्त्री था, और इस जन्ममें भी पहले स्त्री था पीछे पुरुष बना है। इसलिये भीष्मजी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है। यह शिखण्डी शङ्करके वरदानसे भीष्मजीको मारनेके लिये ही पैदा हुआ है। अतः जब शिखण्डीसे भीष्मजीकी रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बातको लेकर दुर्योधन सभी महारथियोंसे भीष्मजीकी रक्षा करनेके लिये कह रहा है।सम्बन्ध-- द्रोणाचार्यके द्वारा कुछ भी न बोलनेके कारण दुर्योधनका मानसिक उत्साह भङ्ग हुआ देखकर उसके प्रति भीष्मजीके किये हुए स्नेह-सौहार्दकी बात सञ्जय आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।"
    },
    "raman": {
        "author": "Sri Ramanuja",
        "sc": "।।1.11।।धृतराष्ट्र उवाच  सञ्जय उवाच  दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।",
        "et": "1.1 - 1.19 Dhrtarastra said - Sanjaya said  Duryodhana, after viewing the forces of Pandavas protected by Bhima, and his own forces protected by Bhisma conveyed his views thus to Drona, his teacher, about the adeacy of Bhima's forces for conering the Kaurava forces and the inadeacy of his own forces for victory against the Pandava forces. He was grief-stricken within.\n\nObserving his (Duryodhana's) despondecny, Bhisma, in order to cheer him, roared like a lion, and then blowing his conch, made his side sound their conchs and kettle-drums, which made an uproar as a sign of victory. Then, having heard that great tumult, Arjuna and Sri Krsna the Lord of all lords, who was acting as the charioteer of Arjuna, sitting in their great chariot which was powerful enough to coner the three worlds; blew their divine conchs Srimad Pancajanya and Devadatta. Then, both Yudhisthira and Bhima blew their respective conchs separately. That tumult rent asunder the hearts of your sons, led by Duryodhana. The sons of Dhrtarastra then thought, 'Our cause is almost lost now itself.' So said Sanjaya to Dhrtarastra who was longing for their victory.\n\nSanjaya said to Dhrtarastra:  Then, seeing the Kauravas, who were ready for battle, Arjuna, who had Hanuman, noted for his exploit of burning Lanka, as the emblem on his flag on his chariot, directed his charioteer Sri Krsna, the Supreme Lord-who is overcome by parental love for those who take shelter in Him who is the treasure-house of knowledge, power, lordship, energy, potency and splendour, whose sportive delight brings about the origin, sustentation and dissolution of the entire cosmos at His will, who is the Lord of the senses, who controls in all ways the senses inner and outer of all, superior and inferior - by saying, 'Station my chariot in an appropriate place in order that I may see exactly my enemies who are eager for battle.'"
    },
    "abhinav": {
        "author": "Sri Abhinav Gupta",
        "sc": "।।1.11।।अयनेषु इति  अयनानि वीययः।",
        "et": "1.11  Ayanesu etc. Paths : rows."
    },
    "sankar": {
        "author": "Sri Shankaracharya",
        "ht": "।।1.11।।Sri Sankaracharya did not comment on this sloka.",
        "sc": "1.11 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.",
        "et": "1.11 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10."
    },
    "jaya": {
        "author": "Sri Jayatritha",
        "sc": "।।1.11।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11."
    },
    "vallabh": {
        "author": "Sri Vallabhacharya",
        "sc": "।।1.2  1.11।।दुर्योधनोऽपि वृकोदरादिभी रक्षितं पाण्डवानां बलं भीष्माभिरक्षितं स्वीयं च बलं विलोक्य आत्मजविजये तद्बलस्य पर्याप्ततां आत्मबलस्य तद्बिजयेऽपर्याप्ततां च आचार्ये निवेद्यान्तरेव विष्ण्णोऽभूत्।"
    },
    "ms": {
        "author": "Sri Madhusudan Saraswati",
        "sc": "।।1.11।।समरसभारम्भसमये योधानां यथाप्रधानं युद्धभूमौ पूर्वापरादिदिग्विभागेनावस्थितिस्थानानि यानि नियम्यन्ते तान्यत्रायनान्युच्यन्ते। सेनापतिश्च सर्वसैन्यमधिष्ठाय मध्ये तिष्ठति। तत्रैवंसति यथाभागं विभक्तां स्वां स्वां रणभूमिमपरित्यज्यावस्थिताः सन्तो भवन्तः सर्वेऽपि युद्धाभिनिवेशात्पुरतः पृष्ठतः पार्श्वतश्चानिरीक्षमाणं भीष्मं सेनापतिमेव रक्षन्तु। भीष्मे हि सेनापतौ रक्षिते तत्प्रसादादेव सर्वं सुरक्षितं भविष्यतीत्यभिप्रायः।"
    },
    "srid": {
        "author": "Sri Sridhara Swami",
        "sc": "।।1.11।।  तस्माद्भवद्भिरेवं वर्तितव्यमित्याह   अयनेष्विति।  अयनेषु व्यूहप्रवेशमार्गेषु यथाभागं विभक्तां स्वां स्वां रणभूमिमपरित्यज्यावस्थिताः सन्तः सर्वे भीष्ममेवाभितो रक्षन्तु यथाऽन्यैर्युध्यमानः पृष्ठतः कैश्चिन्न हन्येत तथा रक्षन्तु। भीष्मबलेनैवास्माकं जीवितमिति भावः।"
    },
    "dhan": {
        "author": "Sri Dhanpati",
        "sc": "।।1.11।।तस्माद्भीष्ममेव सेनापतिं गुणभूता भवन्तो रक्षन्त्विति प्रार्थयते   अयनेष्विति।  संग्रामप्रारम्भे योधानां यथाप्रधानं संख्ये पूर्वपरादिविभागेन नियतेष्ववस्थितिस्थानेष्वयनेषु। तुना कर्तव्यविशेषो द्योत्यते। यथाभागं विभागेन प्राप्तं स्वस्थानमवस्थिताः सावधानतया स्थिताः सर्व एव भवन्तः सर्वसैन्यमधिष्ठाय मध्ये स्थितं युद्धे व्यग्रं सेनापतिं भीष्ममेवाभि समन्ताद्रक्षन्तु परबलनिवृत्त्यर्थमस्माभिस्तस्मिन्नक्षिते सर्वमस्मदीयं रक्षितं स्यादित्यर्थः।"
    },
    "venkat": {
        "author": "Vedantadeshikacharya Venkatanatha",
        "sc": "।। 1.11।।एवं सुयोधनविजयबुभुत्सया कृतस्य प्रश्नस्ययत्र योगेश्वरः 18।78 इति साक्षादुत्तरं वक्ष्यन् तत्प्रत्यायनार्थमखिलमवान्तरवृत्तमपि सञ्जय उवाच  दृष्ट्वेति। पाण्डवानीकं व्यूढं दृष्ट्वा इति सुयोधनस्य धैर्यभ्रंशहेतुः। तदधीनो धैर्यभ्रंशरूपोऽवस्थाविशेषःतुशब्देन सूच्यते। दृष्ट्वेत्यादेरनुनादयन्नित्यन्तस्याव्यक्तांशं व्यञ्जयति  दुर्योधन इत्यादिनाअकथयत् रा.भा.1।19 इत्यन्तेन। संज्ञार्थं सम्यग्ज्ञानार्थम् संज्ञया परिसंख्यानार्थं वा। तत्रअन्तर्विषण्णोऽभवत् इत्यन्तेनभीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि 1।11 इत्येतदन्तं व्याख्यातम्।अपर्याप्तं 1।10 इति श्लोकस्यायमर्थः  तत् तस्मात् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितमपर्याप्तं परबलविजयाय नालम् इदं त्वेतेषां पाण्डवानां बलं भीमाभिरक्षितं पर्याप्तमस्मद्बलविजयायालम्  इति। नन्विदमनुपपन्नं तद्बलमिति सामानाधिकरण्यप्रतीतिभङ्गायोगात् पूर्वत्र च परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतूपन्यासाभावात्। न च भीष्मद्रोणादिरक्षितं स्वबलमयमसमर्थं मन्यते। प्रबलानामेव हि भीष्मद्रोणादीनां वधः सोपाधिकः।न भेतव्यं महाराज म.भा.उ.प.55।1 इत्यादिषु च बहुशः स्वबलस्यैव सामर्थ्यं दुर्योधनेनोपन्यस्तम्। न चेदानीं तद्विपरीतप्रतीतौ कारणमस्ति। द्वितीयदिवसारम्भे च दुर्योधन एवं वक्ष्यति  अपर्याप्तं तदस्माकं बलं पार्थाभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं पार्थिवसत्तमाः म.भा.उ.प. इति। तत्र चास्माकमपर्याप्तमित्येवान्वयः न पुनरस्माकं बलमिति। ततोऽत्रापि तथैव वचनव्यक्तिरुचिता। तस्मात् पाठभेदेन व्यवहितान्वयेन वाक्यभेदेन पदार्थभेदेन वा योजना स्यात्। तत्र भीमभीष्मशब्दयोर्विपर्यासात्पाठभेदः। तथा च भीमाभिरक्षितं तद्बलमस्माकं अपर्याप्तमित्यन्वये सामानाधिकरण्यम् तदिति विप्रकृष्टनिर्देशस्वारस्यम् दुर्योधनाभिप्रायाविरोधश्च सिद्ध्यति। व्यवहितान्वयेऽप्ययमेवार्थः। द्विधा च व्यवहितान्वयोऽत्र शक्यः। भीमाभिरक्षितभीष्माभिरक्षितयोर्विपर्यासादेकःअपर्याप्तं तत् ৷৷. पर्याप्तं त्विदम् इत्यनयोर्विपर्यासाद्द्वितीयः। अर्थौचित्याय तु व्यवधानमात्रं सह्यते।वाक्यभेदेऽप्येवं योजना  अपर्याप्तं तदित्येका प्रतिज्ञा पर्याप्तं त्विदमिति द्वितीया। अत्र को हेतुरिति शङ्कायां हेतुपरं वाक्यद्वयम् अस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् एतेषां बलं भीमाभिरक्षितमिति। अस्मद्बलस्य प्रबलाधिष्ठितत्वात् परबलस्य च दुर्बलाधिष्ठितत्वादित्यर्थः। पदार्थभेदे त्वेवं योजना  पर्याप्तं पर्यापनं समापनम् पर्याप्तमिति कर्तरि क्तः नाशनसमर्थमित्यर्थः। अपर्याप्तं नाशनासमर्थमित्यर्थः। भीष्माभिरक्षितमस्माद्बलं तत् अपर्याप्तं नाशयितुं न शक्नोति।तत् इत्य पाण्डवबलं कर्तृतया निर्दिश्यतेइदम् इति च स्वबल परबलपर्यापनकर्तृतया। निष्ठायोगाच्च न कर्मणि षष्ठीप्राप्तिः यद्वा अपर्याप्तमपरिमितमित्यर्थः पर्याप्तं परिमितमित्यर्थः स्वबलस्यैकादशाक्षौहिणीयुक्तत्वात् परबलस्य सप्ताक्षौहिणी युक्तत्वाच्च। सर्वथा तावन्न स्वबलदौर्बल्यं परबलप्राबल्यं च युद्धारम्भे दुर्योधनः प्रसञ्जयेदिति  सोऽयं घण्टापथात्पाटच्चर कुटीरप्रवेशः। तथाहि  इह तावद्भीष्माभिरक्षितमित्येतत्प्रति शिरस्तया भीमाभिरक्षितमिति केनाभिप्रायेण निर्दिश्यते न तावद्भीष्मवद्भीमस्यापि सेनापतित्वेन धृष्टद्युम्नस्य तत्पतित्वेनोक्तत्वात्। नापि भीष्मसमपौरुषत्वेन अत्यन्तविषमतया प्रसिद्धेः। यथोक्तं भीष्मेणैव  शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान्। यद्येषां न भवेद्गोप्ता विष्णुः कारणपूरुषः म.भा. इति। नापि प्रतिबलाधीश्वरत्वेन धर्मसूनोस्तथात्वात्। नापि परबलभटप्रधानत्वेन अर्जुनस्यैव तथा प्रसिद्धेः। अतो भीमस्य समस्तधार्तराष्ट्रवधदीक्षितत्वात्तदुचितसाहसबलसहायादियुक्तत्वाच्च तस्य विशेषतो निर्देशः। एवं सति तत्प्रतिशिरस्त्वेन भीष्मस्य निर्देशोऽपि समस्तपाण्डुतनयसंरक्षणप्रवणत्वेन प्रतिपन्नत्वात्। अतः शत्रुभयसहायातिशङ्के पदद्वयसूचिते इत्युक्तं भवति। यत्तूक्तं पूर्वत्र परबलस्वबलयोः सामर्थ्यासामर्थ्यहेतुः कश्चिन्नोक्त इति तदप्यसमीक्षितवचनम्। उपक्रमे हि प्रथममेव स्वबलाच्चतुरक्षौहिणीन्यूनापिमहतीं चमूम् 1।3 इति प्रतिचमूर्वर्णिता। अनन्तरंधीमता 1।3 इत्यन्तेन प्रतिसेनापतिर्वर्णितः। तदनन्तरं चअत्र शूरा महेष्वासाः 1।4 इत्यारभ्यसर्व एव महारथाः 1।6 इत्यन्तेन दृष्टान्तीकृतभीमार्जुनाभ्यां सहासन्नविंशतिसङ्ख्याः पुरुषा निरतिशयपौरुषतया वर्णिताः स्वपक्षे तु न चमूर्वर्णिता नापि सेनापतिः। स्वबलप्रधानपरिसंख्याने च सप्त पुरुषा उपात्ताः व्यतिरिक्तास्त्वाकृतिगणत्वेनअन्ये च बहवः शूराः इत्युक्ताःमदर्थे त्यक्तजीविताः 1।9 इति चोक्तम् न तुमदर्थे जिगीषवः इति साभिसन्धिकत्वमेव तेनापि प्रतिपाद्यत इति चेत् सत्यम्। तथापि वचनव्यक्तिप्रकार एवंविधः  अभिसन्धिद्योतनायापि हि त्यक्तजीवितत्ववचनं प्रतिभटानां बलीयस्त्वबुद्ध्यैव भवति। अनन्तरं चतस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः"
    },
    "puru": {
        "author": "Sri Purushottamji",
        "sc": "।।1.11।।एवं सति किं कर्त्तव्यमित्याकाङ्क्षायामाह  अयनेषु चेति। व्यूहप्रवेशमार्गेषु यथाभागं विभक्ताः स्वस्वस्थाने स्थिता भवन्तः सर्व एव भीष्ममेवाभितः सर्वतः रक्षन्तु। यतोऽस्माकं बलं भीष्मरक्षितमेव। चकारेण व्यूहप्रवेशमार्गात् परस्थानेऽपि स्थितैरिदमपि ज्ञापितम्। एवकारेणास्मदादिरक्षा कार्येति ज्ञापितम्। हीति युक्तत्वम्।"
    },
    "neel": {
        "author": "Sri Neelkanth",
        "sc": "।।1.11।।अयनेषु व्यूहरचनया स्थिते सैन्ये प्रवेशमार्गेषु स्वे स्वे स्थाने स्थिता यूयं मध्यस्थं भीष्ममेवाभिरक्षन्तु। अस्य सेनापतेश्चाञ्चल्ये सर्वापि सेना आकुलीभवेत्। तत्स्थैर्ये स्थिरा च भवेदतः स एव रक्ष्य इत्यर्थः।"
    },
    "prabhu": {
        "author": "A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada",
        "et": "All of you must now give full support to Grandfather Bhīṣma, as you stand at your respective strategic points of entrance into the phalanx of the army.",
        "ec": " Duryodhana, after praising the prowess of Bhīṣma, further considered that others might think that they had been considered less important, so in his usual diplomatic way, he tried to adjust the situation in the above words. He emphasized that Bhīṣmadeva was undoubtedly the greatest hero, but he was an old man, so everyone must especially think of his protection from all sides. He might become engaged in the fight, and the enemy might take advantage of his full engagement on one side. Therefore, it was important that other heroes not leave their strategic positions and allow the enemy to break the phalanx. Duryodhana clearly felt that the victory of the Kurus depended on the presence of Bhīṣmadeva. He was confident of the full support of Bhīṣmadeva and Droṇācārya in the battle because he well knew that they did not even speak a word when Arjuna’s wife Draupadī, in her helpless condition, had appealed to them for justice while she was being forced to appear naked in the presence of all the great generals in the assembly. Although he knew that the two generals had some sort of affection for the Pāṇḍavas, he hoped that these generals would now completely give it up, as they had done during the gambling performances."
    }
}
